मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1071–1080
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080
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मार्क्स और आत्मा १०६ ९ हुई । मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही ' महान् ' और ' अहंकार ' शब्दका प्रयोग हुआ है । वेदान्तमतानुसार वीक्षण और विचिकीर्षा ( प्रपंचरूपसे आविर्भावकी इच्छा ) ही उनके अर्थ हैं । ' तदैक्षत ' इस श्रुतिसे जो ईक्षण कहा गया है, उसे ही महान् कहा जा सकता है । ‘ एकोऽहं बहु स्याम्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार अनेक होनेकी इच्छा ही अहंकार है, अतएव ईक्षणके पश्चात् ही ' अहं ' पदका उल्लेख हुआ है । ‘ अहङ्कारश्चाहं कर्तव्यश्च ' ' महाभूतान्यहङ्कारः ' इत्यादि श्रुति-स्मृतिमें अहंकारकी उत्पत्ति और लय बतलाया गया है । अतः उसमें व्यापकता कभी नहीं बन सकती । जहाँ भी कहीं अहमर्थकी व्यापकता कही गयी है, सर्वत्र ही अहंकारसे रहित, अहंकारके अधिष्ठानभूत व्यापक चैतन्यमें ही लक्षणासे अहंपदका प्रयोग हुआ है । जैसे ‘ अहं मनुरभवं सूर्यश्च ' इस वामदेवकी उक्तिमें यद्यपि आपातत: प्रतीत होता है कि परिच्छिन्न जीवकी ही सर्वरूपता कही जा रही है, तथापि सिद्धान्ततः वहाँ लक्षणासे अहंकाररहित व्यापक शुद्ध चैतन्यमें ' अहं ' का प्रयोग निर्णय किया गया है । वैसे ही जहाँ भी अहमर्थकी व्यापकता सुनायी दे, वहाँ व्यापक चैतन्य ही ' अहं ' का अर्थ समझना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि ' अहङ्कारश्चाहं कर्तव्यश्च ' इत्यादि स्थलोंमें महत्तत्त्वका कार्य और मन आदिका कारण अहंत्तत्त्व लिया गया है।‘महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यसम्भवात् । क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविधः समपद्यत ' ( श्रीमद्भा० ३ । २६ । २३ ) इत्यादि वचनोंके अनुसार यह सात्त्विक, राजस, तामस - त्रिविध अहंकार आत्मस्वरूप अहमर्थसे सर्वथा भिन्न है । यदि अहमर्थ और अहंकारमें भेद न माना जायगा, तब तो इसी तरह ' बुद्धिरव्यक्तमेव च ' ( गीता १३ । ५ ) इस वचनमें भी विवाद खड़ा हो सकेगा । यहाँ ' बुद्धि' पद क्षेत्रान्तर्गत दृश्यविशेषके लिये आया है । परंतु यदि ' बुद्धि' शब्दसे संवित् ( स्वप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा) -का बोध हो, तब तो संवित्का भी क्षेत्रकोटिमें ही परिगणन होगा । अतः कहना होगा
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१०७० मार्क्सवाद और रामराज्य कि भले ही कहीं ' बुद्धि' और ' ज्ञान ' पदसे संवित् या आत्मा कहा जाय, पर ' बुद्धिरव्यक्तमेव च ' इस क्षेत्रस्वरूपके निरूपण- प्रसंगका ' बुद्धि ' शब्द संवित्का बोधक नहीं है । ठीक इसी तरह क्षेत्रमें प्रयुक्त अहंकार शब्दका अर्थ आत्मा नहीं है; किंतु ' अहमात्मा गुडाकेश ' ( गीता १०।२० ) इत्यादि स्थलोंका ही ' अहं ' पद आत्माका बोधक है । ‘ दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः ' ( गीता १७।५ ) इत्यादि स्थलोंमें ' अहं ' पदका प्रयोग देहमें, अहंबुद्धि और गर्वमें होता है । ' गर्वोऽभिमानोऽहङ्कारः ' ( अमर० १।७।२१ ) इस कोषसे भी मालूम होता है कि अहंकार शब्द केवल अहमर्थ ( आत्मा) -का ही वाचक नहीं है । आत्माका बोधक ' अहं ' शब्द ‘ अस्मद् ' शब्दसे बना है और अहंकार शब्द अनात्माका बोधक है । उसका पर्यायभूत ' अहं ' शब्द मान्त ( मकारान्त) अव्यय है । परंतु यह सब कथन असंगत है । मान्त एवं दान्तभेदसे अर्थभेद कल्पनामें कोई भी प्रमाण नहीं है । अहंरूपसे प्रतीयमान अहंकारके ही बोधक सभी ' अहं ' शब्द हैं । ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि स्थलोंमें लक्षणाद्वारा ही अहंकारसे अतिरिक्त आत्माका बोध होता है । कौन ' मान्त ' है, कौन ' दान्त ' इस तरह जिसका निर्धारण नहीं है, ऐसे ' अहं ' शब्दका अधिक प्रयोग अहंकारमें ही होता है । जब अहंकार शब्दको आप भी अनात्माका वाची मानते हैं; तब ' सोऽहङ्कार इति प्रोक्तः ' ( सर्वद० सं० ) इत्यादि पूर्व वचनोंमें, आत्मामें अहंकार पदका प्रयोग लाक्षणिक ही होगा । बस, फिर तो ' मान्त ' ' दान्त ' साधारण अहंशब्द भी मुख्य वृत्तिसे अहंकारका वाची होकर लक्षणासे आत्माका वाचक होगा । जैसे ' अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्परः ॥ योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् । सोऽहङ्कार इति प्रोक्तः ० ' ( सर्वदर्शनसं० ४ ) यहाँ लक्षणासे ही आत्मामें प्रयोग मानना उचित है । कुछ लोग अहमर्थमें आत्मा- अनात्मा - दोनोंका मिश्रण नहीं मानते और कर्तृत्व आदिको मुख्य आत्माका ही धर्म मानते हैं, परंतु यह असंगत
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मार्क्स और आत्मा १०७१ है; क्योंकि असंग, अनन्त आत्मामें कर्तृत्व माननेमें मुक्तिका होना अत्यन्त असम्भव हो जायगा । कहा जाता है कि ' यदि अहंकार या अहंशब्द चिज्जड - ग्रन्थिका वाचक हो, तब तो दूसरोंकी ग्रन्थिमें भी ' अहं ' का प्रयोग होना चाहिये । ' परंतु उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनके ही मतमें अहंकार और मान्त अहम्का प्रयोग दूसरोंके अन्तःकरण या क्षेत्रमें क्यों नहीं होता? यदि उन्हें ऐसा इष्ट हो तो हमें भी इष्ट ही है । भेद यही है कि हमारे यहाँ इन पदोंकी अपने उच्चारयितामें शक्ति है । शुद्ध आत्मा उच्चारयिता है नहीं, अतः जैसे वहाँ लक्षणासे प्रयोग होता है, वैसे ही दूसरी ग्रन्थिमें भी होगा । कहा जाता है कि कर्तृत्व आदिके अनात्म- धर्म होनेपर भी उसे अपने आश्रय-प्रतीतिके बिना भी आत्मामें वैसे ही प्रतीति होनी चाहिये, जैसे ' गौरोऽहम्' यहाँ गौरत्वके आश्रय देहकी प्रतीति न होनेपर भी गौरत्वकी आत्मामें प्रतीति होती है, परंतु ध्यान देनेपर स्पष्ट प्रतीत होता है कि दृष्टान्तमें भी देहत्वरूपसे देहका भान होनेपर भी गौरत्व मनुष्यत्वरूपसे देहका भान अवश्य रहता है । फिर दान्तिक कर्तृत्व आदि आश्रयभूत अहमर्थकी प्रतीतिके बिना कैसे प्रतीत होंगे? सार यह है कि जहाँ आरोप अनुभूयमान होता है, वहाँ या तो प्रतिबिम्बरूपता होती है अथवा धर्मीका अध्यास अवश्य होता है । जब कर्तृत्वादि प्रतिबिम्बरूप नहीं है, तब अवश्य ही धर्मीका अध्यास मानना चाहिये । अहं प्रत्ययका विषय होनेसे शरीरके समान अहमर्थ अनात्मा है इत्यादि अनुमानसे भी अहमर्थकी अनात्मता सिद्ध होती है । कहा जाता है कि इस तरह तो अहमर्थके भीतर अधिष्ठानभूत चैतन्य भी अहं प्रत्ययका विषय है, फिर उसे भी अनात्मा कहना पड़ेगा । परंतु इसका उत्तर स्पष्ट है । जिस रूपसे उसे अहंप्रत्यय- विषयता है, उस रूपसे उसकी अनात्मता इष्ट ही है और स्वरूपसे वह सर्वथा अविषय है, अतः उससे अनात्मताकी प्रसक्ति नहीं है । अहमर्थ आत्मासे अन्य है । ' अहं ' शब्दका अभिधेय ( वाच्य ) होनेसे अहंकारशब्द- वाच्यके समान पर्यायता
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१०७२ मार्क्सवाद और रामराज्य दिखलायी जा चुकी, अतः असिद्धिकी कल्पना नहीं की जा सकती । कहा जाता है कि वेदान्ती भी तो ' गौरोऽहम्' इस तरह आत्माको गौरत्वकी कल्पनाका अधिष्ठान मानता है और ' मा न भूवम्, भूयासम्' इत्यादि रूपसे आत्माको ही परप्रेमास्पद मानता है । साथ ही अहमर्थ अपनी सत्तामें प्रकाश ( बोध ) - से रहित नहीं होता, अतः आत्माकी स्वप्रकाशता भी कही जाती है । यदि अहमर्थ अनात्मा ही हो, तब तो यह सब उपर्युक्त कथन कथमपि संगत न हो सकेगा; क्योंकि ' गौरोऽहम्', ' मा न भूवम्' अहमर्थकी प्रकाशाव्यभिचारिता यह सभी अहमर्थसे ही सम्बन्धित है । अतः यदि वह अनात्मा है, तब तो यह अहमर्थसे सम्बन्धित स्वप्रकाशत्वादि अनात्मामें ही पर्यवसित होंगे, परंतु यह कथन ठीक नहीं है । गौरत्वादि अनात्माके आरोपका अधिष्ठान अहमर्थ नहीं है, अपितु आत्मा ही है । किंतु जैसे ‘ इदम् ' ( पुरोवर्ती शुक्तिकादि) अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है, वैसे ही अहमर्थ भी अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है । वास्तवमें अहमर्थ अनात्माके आरोपका अधिष्ठान नहीं है । आत्मामें अहंकारका ऐक्यारोप ( भ्रम) होनेसे ही अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होती है । जो कहा जाता है कि ' ऐसा माननेसे अन्योन्याश्रय- दोष होगा', वह भी ठीक नहीं । सुषुप्तिकालमें आत्माका प्रकाश होता है, अहमर्थका प्रकाश नहीं होता । इसीसे उन दोनोंका भेद सिद्ध हो जाता है । कहा जाता है कि ' अहमर्थके प्रेमसे भिन्न अन्य प्रेमका अनुभव ही नहीं होता, अतः अहमर्थको ही प्रेमास्पद मानना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं । परामर्शसे सिद्ध सुषुप्तिमें अहमर्थशून्य आत्माके प्रेमका अनुभव स्पष्ट है, अतः अहमर्थ-प्रेमसे भिन्न भी आत्मप्रेम है ही । यहाँ सन्देह होता है कि यद्यपि अहितमें हितबुद्धिसे प्रेम उत्पन्न होता है तथापि जो प्रेमका आस्पद नहीं है, उसमें प्रेमास्पदताका आरोप कहीं भी नहीं देखा गया । अतः यदि अहमर्थ-प्रेमास्पद आत्मा नहीं है, तब इसमें
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मार्क्स और आत्मा १०७३ प्रेमास्पदताका आरोप कैसे हो सकता है?' परंतु इसका समाधान यह है कि अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वका आरोप होता है, ऐसा नहीं; किंतु यह कहा जा रहा है कि अहमर्थमें आत्माके ऐक्यका आरोप होनेसे प्रेमास्पदता है; स्वाभाविक नहीं । स्वाभाविक प्रेमका आस्पद आत्मा ही है । इच्छा और प्रेममें भेद है, अतएव सिद्ध वस्तुमें भी स्नेहात्मक- वृत्तिरूप प्रेम होता है । रहा यह कि ' अहमर्थका प्रकाशके साथ व्यभिचार न होनेसे उसे ही आत्मा माना जाय ' यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह तो अहमर्थ और आत्माके भेदमें भी बन सकता है, परंतु स्वप्रकाश आत्मसम्बन्धके बिना जड अहमर्थका प्रकाशाव्यभिचार नहीं हो सकता । अतएव वह भी अहमर्थ भिन्न आत्मामें प्रमाण है; अर्थात् अहमर्थके प्रकाशाव्यभिचारसे उसकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जा सकती, अपितु इससे स्वप्रकाश आत्माका सम्बन्ध ही निश्चित होता है । कहा जाता है कि ' समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत् । विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत्॥ ' अर्थात् आरोपितके रूपसे विषय रूपवान् होता है, विषय ( अधिष्ठान ) -के रूपसे समारोपित पदार्थ रूपवान् नहीं होता । इस युक्तिसे आरोपित अहमर्थके अप्रेमास्पदत्वसे ही आत्मामें अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होनी चाहिये, परंतु यहाँ विचार करना चाहिये कि क्या अधिष्ठानका धर्म आरोपितमें प्रतीत होना चाहिये अथवा आरोप्यगत धर्मका अधिष्ठानमें भान होना चाहिये? पहला पक्ष तो इसलिये ठीक नहीं है कि अधिष्ठान जिस धर्मसे विशिष्ट स्वरूपज्ञानसे आरोपितकी निवृत्ति हो जाती है, वह धर्म आरोप्यमें कदापि नहीं प्रतीत होता- ऐसा नियम है । जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिगत इदन्ताकी प्रतीति होनेपर भी शुक्तिगत नीलपृष्ठत्व, त्रिकोणत्व, शुक्तित्वादि धर्मका भान नहीं होता; क्योंकि शुक्तित्वादिविशिष्ट शुक्तिकाके ज्ञान होनेसे आरोपित रजतकी निवृत्ति हो ही जाती है । अतः अधिष्ठानके उसी रूपसे समारोप्य रूपवान् नहीं होता, जिसके ज्ञानसे आरोपित मिट जाय । प्रेमास्पदत्व वैसा धर्म नहीं है । अतः जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिकी
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१०७४ मार्क्सवाद और रामराज्य इदन्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मगत प्रेमास्पदताके अहमर्थमें अभानका नियम नहीं कहा जा सकता । दूसरा पक्ष भी संगत नहीं है; क्योंकि आरोप्यगत वे ही धर्म अधिष्ठानमें प्रतीत हो सकते हैं, जो अधिष्ठानगत धर्म- प्रतीतिके विरोधी न हों । अतएव सर्पगत भीषणता, अधिष्ठानगत इदन्ता - प्रतीतिके अविरुद्ध होनेके कारण अधिष्ठानमें भासित होती है, परंतु अधिष्ठानगत धर्म इदन्ताकी प्रतीतिके विरुद्ध देशान्तरस्थत्वादि अन्य धर्मकी प्रतीति नहीं होती । ठीक उसी तरह आत्मामें भी आरोप्य अहमर्थके वे ही धर्म प्रतीत हो सकेंगे, जो आत्मधर्म- प्रतीतिके बाधक न हों । परंतु यहाँ तो अप्रेमास्पदत्वरूप आरोप्यधर्म प्रेमास्पदत्वरूप अधिष्ठानभूत आत्मधर्म- प्रतीतिसे विरुद्ध है, अतः आत्मामें उसका आरोप नहीं हो सकेगा । जिस समय ही अहमर्थसे आत्मैक्यका अभ्यास होगा, उसी समय आरोप्यमें भी प्रेमास्पदत्व प्रतीत होगा । फिर तो आरोप्यमें अप्रेमास्पदत्व नहीं प्रतीत होगा । ऐसी स्थितिमें अधिष्ठानभूत आत्मामें उसके अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति कैसे हो सकती है? कुछ लोग परिहार करते हैं कि आत्मा सुख एवं अनुभवरूप है, इसीलिये ' अहं सुखमनुभवामि' - मैं सुखका अनुभव करता हूँ, इस तरह अहमर्थसे भिन्न सुख और अनुभवकी प्रतीति होती है । परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि वैषयिक सुख और अनुभव आत्मासे पृथक् वस्तु है और वही विषयोपप्लवविवर्जित स्वप्रकाश अनन्त आनन्दरूप ही है । कहा जाता है कि मोक्षमें यदि अहमर्थ न रहेगा, तब तो ' आत्मनाश ही मोक्ष है ' यह बाह्य ( शून्यवादी ) मत आ जायगा; क्योंकि उस मतके समान ही तुम्हारे मतमें भी प्रेमास्पद अहमर्थका नाश स्वीकार्य है । अहमर्थसे भिन्न अन्य किसीकी तरह तो शून्यवादीके यहाँ भी शून्य बना ही रहता है, परंतु यह सब निरर्थक है । औपाधिक प्रेमास्पद अहमर्थके नाशसे यदि आत्मनाशापत्ति हो तो औपाधिक प्रेमास्पद देहनाशमें भी
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मार्क्स और आत्मा १०७५ आत्मनाशकी प्रसक्ति होगी । अतएव जो यह कहा जाता है कि ' मामृतं कृधि ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासम्' इत्यादि श्रुतियोंसे अहमर्थके ही अमृतत्व, विरजस्त्व विपाप्मत्वादिकी आकांक्षा होती है, अतः मुक्तिमें अहमर्थका होना अनिवार्य है । यह भी ठीक नहींप क्योंकि वहाँ सर्वत्र ' अहम्' के लक्ष्यार्थ चैतन्यके ही अमृतत्वादिकी आकांक्षा है । जैसे ' अहं पुष्टः स्याम्'– मैं पुष्ट होऊँ, यहाँ स्वसमयविद्यमान शरीरकी ही पुष्टता अभीष्ट है, वैसे ही उपर्युक्त विषयमें भी समझना चाहिये । यद्यपि ' शरीरं पुष्टं स्यात्'– शरीर पुष्ट हो, इस इच्छाके समान ‘ आत्ममात्रं मुक्तं स्यात्' – आत्ममात्र मुक्त हो ऐसी इच्छा नहीं दिखायी देती, अतः मुक्तिकी अनिष्टतापत्ति कही जा सकती है तथापि विचार करनेसे विदित होगा कि इच्छाके समय अन्तःकरणका अध्यास होता है । अतएव यद्यपि आत्ममात्रकी मुक्तिकी इच्छा नहीं अनुभूत होती तथापि विशिष्टगत मुक्तिकी इच्छाका ही शुद्धात्मगतत्वेन पर्यवसान होता है । आशय यह है कि इच्छाके भासक साक्षीसे ही अहमर्थका भान होता है, अतः इच्छाके उल्लेखकालमें अहमर्थका उल्लेख होनेपर भी विवेकियोंको अहमर्थके विविक्त आत्मगतरूपसे ही मुक्तिकी इच्छा होती है । अविवेकीको भी, जो दुःखमूलवाला हो, उसमें दुःखमूलका उच्छेद हो, ऐसी इच्छा होती है । इस तरह शुद्धात्मामें दुःखमूलोच्छेदरूप मुक्तिकी इच्छा पर्यवसित होती है; क्योंकि दुःखमूल अज्ञानवाला नहीं है । कहा जाता है कि यदि अहमर्थ अन्तःकरण ग्रन्थिरूप ही है, तब तो 'मम मनः ' - मेरा मन, मेरा अन्तःकरण- ऐसी बुद्धि नहीं होनी चाहिये; क्योंकि अन्त: करण और मन दोनों एक ही वस्तु हैं, परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अन्तःकरण जडमात्र है । परंतु चेतन आत्मा और अन्तःकरण- इन दोनोंकी ग्रन्थि अहमर्थ है । इस भेदसे ' मेरा मन ' इस रूपमें षष्ठी अर्थात् सम्बन्ध बन सकता है । फिर भी कहा जाता है कि ‘ मनः स्फुरति, मनोऽस्ति ' इस ज्ञानमें भी मनकी सत्ता और स्फूर्तिरूप
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१०७६ मार्क्सवाद और रामराज्य आत्मासे सम्बन्ध है, अतः इसे भी चिदचिद् ग्रन्थि कहा जा सकता है । फिर अहं इस ज्ञान और ' मनः स्फुरति ' इस ज्ञानमें समता क्यों नहीं प्रतीत होती? यह ठीक नहीं है; क्योंकि सम्बन्धमात्र ही ग्रन्थि या संवलन नहीं कहा जाता, किंतु तादात्म्येन प्रतिभास ( अभेदरूपसे प्रतीति ) ही संवलन या ग्रन्थि है । ' मनः स्फुरति, मनोऽस्ति ' इत्यादि स्थलोंमें आख्यातसे मनमें स्फुरण एवं सत्ताकी आश्रयता ही प्रतीत होती है, मनमें स्फुरणादिका तादात्म्य नहीं प्रतीत होता । अहं इस स्थानमें तो अन्तःकरणका चेतनमें तादात्म्याध्यास है । कहा जाता है कि सभी भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश और आरोप्य– इन दो अंगोंकी अवश्य प्रतीति होती है । यदि ' इदं रजतम्' इत्यादि भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश इदन्ताकी प्रतीति न अपेक्षित हो, तब तो बिना अधिष्ठानका भ्रम मानना पड़ेगा, जिससे शून्यवादकी प्रसक्ति अवश्य होगी । परंतु ' अहं ' इस भ्रान्तिमें तो दो अंशकी प्रतीति ही नहीं होती । यदि कहा जाय कि वहाँ भी दो अंशकी कल्पना कर लेनी चाहिये, तब तो फिर ' आत्मा ' इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनासे भ्रान्तिता-सिद्धि माननी होगी । यदि दो अंशकी प्रतीति न होनेसे ' आत्मा ' इस प्रतीतिकी भ्रान्ति न मानें, तब तो ' अहं ' इस प्रतीतिको भी भ्रान्ति मानना व्यर्थ है । इन सन्दहोंका समाधान यह है कि यदि भ्रान्तिमें अधिष्ठान और आरोप्य– इन दो अंशकी प्रतीतिका आपादन करना है तो वह तो मान्य ही है । अहमर्थका मिथ्यात्व ही उसके द्वितीय अंशके होनेमें प्रमाण है । परंतु ' आत्मा ' इस बुद्धिके विषयमें भी दो अंश है, इसमें तो कुछ भी प्रमाण नहीं है । अतः ' आत्मा ' इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनाका अवकाश नहीं है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि भिन्न -भिन्न दो प्रकारोंसे अवच्छिन्न, अधिष्ठान और आरोप्यका विषय करना ही भ्रान्ति दो अंश हैं; क्योंकि जहाँ रजतत्वसंसर्गके आरोपसे ही ' इदं रजतम् ' ऐसी प्रतीति होती है, वहाँ दो प्रकारका भान नहीं होता है । रजतत्वमें कोई
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मार्क्स और आत्मा १०७७ भी दूसरा प्रकार ( विशेषण ) नहीं है । रजतादिको रजतत्वका प्रकार माननेमें भी कोई प्रमाण नहीं है । कुछ महानुभाव यह भी कहते हैं कि अहमर्थाध्यासमें भी ' अज्ञोऽहं स्फुराम्यहम्' इस तरह स्फुरण और अहं –इन दो अंशोंकी प्रतीति होती ही है । जैसे कभी ' रजतम्' इतनेका ही उल्लेख होता है, वैसे ही ' अहं ' इतनेका भी उल्लेख बन सकता है । अतः 'रूप्यं स्फुरति ' की तरह ' अहमस्मि, अहं स्फुरामि' यहाँपर स्पष्ट दोनों ही अंशोंकी प्रतीति होती है । इतना भेद अवश्य है कि जहाँ इदन्त्वावच्छिन्न स्फुरण अधिष्ठान है, वहाँ ' इदं रूप्यम्' इत्यादि प्रकारसे बुद्धि होती है, जहाँ केवल स्फुरणभाव ही अधिष्ठान है, वहाँ ' स्फुरामि ' ऐसी ही बुद्धि होती है । फिर भी ' मनः स्फुरति, अहं स्फुरामि' इन दोनों प्रतीतियोंमें विलक्षणता इसलिये है कि ' मन ' शब्दसे मनस्त्वमात्र विवक्षित है और ' अहं ' शब्दसे मन और देहसे अवच्छिन्न चित्स्वरूप उच्चारयितृत्वका उल्लेख होता है । यहाँ सन्देह होता है कि ' अहं स्फुरामि' यह भ्रम तो अध्यस्त है, अतः वह अधिष्ठान कैसे होगा? परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ स्फुरणरूप चैतन्यको ही अधिष्ठान कहा जाता है, अविद्यावृत्तिको नहीं । इस तरह ' अहमर्थ आत्मा है ' इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है । मोक्षसाधन कृतिका आश्रय होनेसे अहमर्थ मोक्षमें अन्वयी है, यह अनुमान भी प्रमाण नहीं है; क्योंकि कृत्याश्रयमें मोक्षान्वयित्वकी व्याप्तिका कहीं दृष्टान्त ही नहीं है । सामान्य व्याप्तिमें भी व्यभिचार है । ऋत्विज लोग स्वर्गसाधन कृतिके आश्रय तो होते हैं, परंतु स्वर्गान्वयी नहीं होते । अहमर्थ अनर्थका आश्रय होनेसे सम्प्रतिपन्नकी तरह अनर्थ-निवृत्तिका आश्रय है, इस अनुमानसे भी अहमर्थकी आत्मता नहीं सिद्ध होती; क्योंकि यह अनुमान शरीरमें व्यभिचारी है । ' अहमज्ञः ' इस प्रतीतिसे जैसे अहमर्थमें अनर्थाश्रयताक प्रतीति होती है, वैसे ही ' स्थूलोऽहमज्ञः ' इस प्रतीतिसे शरीरमें भी अनर्थाश्रयता सिद्ध होती है ।
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१०७८ मार्क्सवाद और रामराज्य कहा जाता है कि ' कस्मिन् न्वहमुत्क्रान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि, कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि', ' स प्राणमसृजत ', ' हन्ताहमिमास्तिस्त्रो देवता: ' इत्यादि श्रुतियोंमें प्राण और मनके पहले ही अहंका श्रवण है । ' तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि ' इस श्रुतिमें भी शुद्धात्मामें ' अहं ' पदका प्रयोग है । ' अहमित्येव यो वेद्यः स जीव इति कीर्तितः । स दुःखी स सुखी चैव स पात्रं बन्धमोक्षयोः ' इत्यादि श्रुतियोंमें भी अहमर्थसे ही बन्ध- मोक्षका होना सिद्ध होता है । ' तद्योऽहं सोऽसौ ', ' मामेव ये प्रपद्यन्ते ' ( गीता ७। १४ ) इनसे भी मालूम होता है कि अहमर्थ ही आत्मा है, परंतु यह सब विचार असंगत है । उपर्युक्त सभी स्थानोंमें लक्षणासे ही विशिष्ट वाचक अहं शब्दका शुद्ध आत्मामें प्रयोग मानना चाहिये, यह बात पहले ही कही जा चुकी है । जैसे ' युष्मद्' शब्द सम्बोध्य चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणया अचेतनमात्रका बोधक होता है; वैसे ही ' अस्मद् ' शब्द अहंकारविशिष्ट चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणासे केवल शुद्ध चेतनमें ही प्रयुक्त होता है । आन्तर- बाह्य सभी प्रपंचका अधिष्ठान ( आधार ) सत् ही है, इसलिये घट, पट, मठ, पृथ्वी, जल, तेज, आकाश सबके साथ ' सत्' ( है ) लगता है; जैसे आकाश सत् ( है ), वायु सत् ( है ), घट सत् (है ) आदि । जैसे मिट्टीके घट-उदंचन आदि हर एक कार्यमें मिट्टी है, जलके तरंग, बुलबुले आदि हर एक कार्यमें जल है, वैसे ही एक कार्यमें सत्, सत्ता या हस्ती है, अतः वही सत् कारण है । आकाशका कारण ' अहं तत्त्व ' है और उसका कारण ' महत्तत्त्व' और उसका भी ' अव्यक्त तत्त्व ' है । जैसे सुषुप्तिमें अज्ञान या निद्रासे आवृत स्वप्रकाश सत्द्वारा ही मेघसे ढँके हुए सूर्यमें बादलकी तरह अज्ञान या निद्राका प्रकाश होता है, वैसे ही समष्टि अज्ञान या निद्रासे आवृत व्यापक स्वप्रकाश सत् ही उसका प्रकाशक होता है । आवृत सत्से भासित समष्टि अज्ञानको ही ' अव्यक्त ' कहा जाता है । उस अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाली समष्टि बुद्धि या ज्ञानको