मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1081–1090
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090
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मार्क्स और आत्मा १०७९ ही ' महत्तत्त्व ' कहा जाता है । जैसे घोर नींदसे अकस्मात् जगाये जानेपर पहले अहंकार - ममकारसे शून्य केवल कुछ ज्ञान होता है, वैसे ही समष्टि सुषुप्तिके पश्चात् अज्ञानावृत सत्को अहंकार- ममकार- शून्य समष्टि ज्ञान उत्पन्न होता है । यह ज्ञान अज्ञानरूप अव्यक्तका परिणाम है । जैसे अप्रकाशरूप पर्वतकी खानसे प्रकाशमय मणिका प्रादुर्भाव होता है, किंवा जैसे सूर्यके प्रकाशको न व्यक्त करनेवाली मिट्टीसे ही उत्पन्न होकर काँच सूर्यप्रतिबिम्बका ग्राहक होता है, वैसे ही निखिल शक्तियोंके आश्रय केन्द्र अज्ञान ( अचित्तत्त्वसे ) चैतन्य -प्रतिबिम्बग्राहकज्ञान उत्पन्न होता है ( यहाँ चित्स्वरूप परमात्मासे विलक्षण अचित् या जड-शक्ति ही अज्ञान पदसे विवक्षित है, इसीका परिणाम वृतिरूप ज्ञान है ) । यह स्वप्रकाश परमात्मरूप नित्यबोध या ज्ञानसे भिन्न है, अतः उसीके प्रतिबिम्ब या आभाससे युक्त होनेके कारण अचित्परिणाममें औपचारिक ' ज्ञान ' पदका प्रयोग होता है । जाग्रत् एवं स्वप्नके ज्ञानोंका सुषुप्ति में लय हो जाता है और सुषुप्तिके पश्चात् ही इनका पुनः प्रादुर्भाव होता है । अतः जैसे मिट्टीसे उत्पन्न और उसमें लीन होनेवाले विकारोंका मिट्टी कारण समझी जाती है, वैसे ही जाग्रदादि ज्ञानोंका सौषुप्त अज्ञान कारण समझा जाता है । सोकर जागनेवालेके अहंकार- ममकारसे शून्य प्राथमिक ईक्षण ( ज्ञान ) - के समान ही अज्ञानोपहित सत्का अहंकार- शून्य केवल ईक्ष (ज्ञान ) ही महत्तत्त्व है । पुनश्च जैसे सामान्य ईक्षणके अनन्तर ' मैं अमुक हूँ ' इत्यादि रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है । वैसे ही सत्के ईक्षणके बाद उसमें ' एकोऽहं बहु स्याम्'– मैं एक हूँ, अनेक होऊँ, इस रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है, वही ' अहंतत्त्व ' है । सुषुप्तिकी ओर जाते हुए भी ' मैं कहाँ और कौन हूँ' इत्यादि अहंकारका पहले लय होता है । केवल कुछ चेत ( ज्ञानसामान्य ) रह जाता है । अन्तमें वह भी अज्ञान या सुषुप्तिमें लीन हो जाता है, परंतु आत्मा या परमात्मस्वयंरूप नित्यबोध या ज्ञान तो इन
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१०८० मार्क्सवाद और रामराज्य तीनोंका भासक है, स्वप्रकाश सत्रूप है । जैसे बादलकी टुकड़ी देखकर आकाशव्यापी मेघमण्डल बुद्धिमें आरूढ हो सकता है, वैसे ही व्यष्टि (जीवगत) अहंकार, बुद्धि ( ज्ञान ), अज्ञान ( सुषुप्ति ) -से ईश्वरगत समष्टि अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्ततत्त्वका बोध हो जाता है । जैसे अहंकारपूर्वक ही जीवका कार्य होता है, वैसे ही अहंकारपूर्वक ही परमात्मासे आकाशादि समस्त प्रपंच उत्पन्न होते हैं । तभी अहंतत्त्वसे शब्दतन्मात्रा या अपंचीकृत सूक्ष्म आकाशकी उत्पत्ति मानी गयी है । सर्वप्रथम अज्ञान या अचित् भी स्वप्रकाश सत्की ही शक्ति है । अतः वह भी सत्से स्वतन्त्र होकर स्वतः सत् नहीं है । जैसे सिता ( शर्करा ) –के सम्बन्धसे अमधुर वस्तु भी मधुर प्रतीत होती है, वैसे ही स्वप्रकाश सत्के सम्बन्धसे ही अव्यक्तादि सभी प्रपंचमें सत्ता और स्फूर्ति प्रतीत होती है । अतएव जैसे लहरोंमें भीतर- बाहर जल ही रहता है, वैसे ही अव्यक्तसे लेकर सभी प्रपंचके भीतर- बाहर सत् ही है, स्फूर्ति ही है । जैसे जलके बिना लहर कोई वस्तु ही नहीं, वैसे ही सत्के बिना- स्फूर्तिके बिना अव्यक्त, अचित्, महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, आकाशादि सब असत् हो जाते हैं । जबतक उनमें सत्का योग है, तबतक उनका होना, उनकी सत्ता या स्फूर्ति है । सत्के बिना सब - के - सब असत् हो जाते हैं । इसीलिये कहा है-'जासु सत्यता तें जड़ माया । भास सत्य इव मोह सहाया॥ ' अतः अचित् आदि सभी मिथ्या हैं । अधिष्ठानका साक्षात् बोध होते ही सब मिट जाते हैं । आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, घटादि सब उत्पन्न होते हैं और क्रमेण सब उसीमें लीन हो जाते हैं तथापि घटाकाश, शरावाकाश, महाकाश आदि अनेक कल्पनाएँ हो जाती हैं । आकाशसे ही सूर्य, उससे ही घट और जल, उसका ही आकाश और सूर्यरूपसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब होना संगत है और पार्थिव प्रपंच पृथ्वीमें, पृथ्वी जलमें, जल तेजमें, तेज वायुमें और वायुके आकाशमें मिलते ही सब कुछ केवल आकाश ही
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मार्क्स और आत्मा १०८१ रह जाता है । उसी तरह स्वप्रकाश सत्से ही उत्पन्न अनेक उपाधियोंसे बिम्ब- प्रतिबिम्ब जीव, जगत् आदि अनेक भेद बनते हैं, परंतु उत्पत्तिके विपरीत क्रमसे जब सब कुछ परमात्मामें लीन हो जाता है, तब एक ही परमात्मा रह जाता है । जैसे आकाशसे ही क्रमेण घट, उसीसे जल, उसीसे प्रतिबिम्ब और वही बिम्ब होता है, अन्तमें आकाश कार्य होनेसे सबका उसीमें लय हो जाता है, वैसे ही सर्व प्रपंच अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश चित्से ही उत्पन्न होता है, उसीमें लीन हो जाता है । ' अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥ ' (श्रीमद्भा० २ । १० । ३२ ) भगवान्की उक्ति है कि सृष्टिके पहले एक मैं ही था, मुझसे भिन्न कार्यकारण कुछ भी नहीं था, सृष्टि होनेपर भी जो प्रपंच उपलब्ध होता है, वह भी मैं ही हूँ और अन्तमें जो अवशिष्ट रहता है, वह भी मैं हूँ । ' आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ।' ( माण्डूक्यकारिका ४।३१ ) अर्थात् जो आदिमें नहीं, अन्तमें नहीं, वह मध्यमें भी नहीं ही है । यद्यपि मध्य सत्-सा प्रतीत होता है तथापि है असत् ही । घटादि कार्य अपनी उत्पत्तिके पहले नहीं थे, अन्तमें नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहते हैं । अतः मध्यमें सत्- से प्रतीत होनेवालोंको भी असत् ही समझना चाहिये । जलकी लहरें, पानीके बुलबुले और स्वप्नके पदार्थ, उत्पत्ति या प्रतीतिके पहले भी नहीं रहते, अन्तमें भी नहीं रहते, केवल मध्यमें प्रतीत होते हैं, तो भी उन्हें असत् ही समझना उचित है । ' अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ ' ( गीता २ । २८ ) सभी प्रपंच उत्पत्तिके पहले अव्यक्त ही था, अन्तमें भी सब अव्यक्त हो जाता है, केवल मध्यमें व्यक्त है, फिर उसके लिये क्या रोना? कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु या व्यक्ति अदर्शन -अज्ञानसे ही आया, अन्तमें पुनः अदर्शनमें ही चला गया । फिर जो न अपना है, न जिसके हम हैं, उसके लिये क्या रोना? ' अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः । नैते तव न तेषां
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१०८२ मार्क्सवाद और रामराज्य त्वं तत्र का परिदेवना ॥ ' ( महा० स्त्रीपर्व २।१३ ) जैसे मिट्टी या जलके भीतर ही तरह-तरहके पात्र और तरंग आ जाते हैं, वैसे ही मनके भीतर ही सब दृश्य आ जाते हैं । मनकी हलचलमें ही दृश्य दिखलायी पड़ता है और उसके मिटनेमें मिट जाता है, अतः सब कुछ मन ही है । वह मन स्वप्रकाश सत् या भानके भीतर आ जाता है, अतः स्वप्रकाश सत् या अबाध्य अनन्त भान ही सब कुछ है । जैसे दर्पणके भीतर भूधर- सागर, गगनमेघमाला, सूर्य -चन्द्र-नक्षत्र, वन - उपवन, नगर आदि प्रतिबिम्बरूपमें दिखायी देते हैं, वैसे ही अव्यक्तादि स्थावरान्त सदसत् सकल प्रपंच कूटस्थ स्वप्रकाश सत् या भानमें दिखायी देता है । जाग्रत्- स्वप्नके द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, सुषुप्तिकी निद्रा या अज्ञान जिससे प्रकाशित होते हैं, वही शुद्ध भानरूप आत्मा है । ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, जाग्रत्- स्वप्न-सुषुप्ति, प्रकाश- प्रवृत्ति- मोह ( रज -तम- सत्त्व) इन सबका प्रकाशक, सबका अधिष्ठान, सबका कारण, सबसे अतीत सत् ही आत्मा है । वह प्रतिबिम्बके समान है, प्रतिबिम्ब नहीं । अतः उससे पृथक् बिम्बकी सत्ता नहीं अपेक्षित है । जैसे शुद्ध दर्पण देखनेसे प्रतिबिम्ब दृष्टि मिट जाती है, वैसे शुद्ध सत् देखनेसे प्रपंच- बुद्धि मिटती है । बोध होनेके उपरान्त यद्यपि प्रपंचका मूल अज्ञान मिट जाता है तथापि प्रारब्धदोषसे प्रारब्ध -स्थितितक प्रपंचकी प्रतीति होती है । भोगसे प्रारब्ध मिटनेपर अवश्य ही प्रपंचप्रतीति भी मिट जाती है — ' तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये ', (छां० उ० ६ । १४ । २ ) ' भोगेन त्वितरे क्षपयित्वाथ सम्पद्यते । ' फिर भी मनको निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये प्रथम वाक्, चक्षु आदि कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको रोक लेना चाहिये अर्थात् भाषण, दर्शन आदि इन्द्रियोंके व्यापारोंको रोककर केवल मनसे जप या ध्यान करते रहना चाहिये । जब कुछ कालके अभ्याससे दर्शनादि व्यापाररहित होकर मानस ध्यान, जपादि स्थिर हो
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मार्क्स और आत्मा १०८३ जाय, तब मनको बुद्धिमें लय कर देना चाहिये । अर्थात् संकल्प-विकल्पात्मक मनके व्यापारको निश्चयात्मिका बुद्धिमें लीन कर देना चाहिये । केवल ध्येय लक्ष्यके दृढ़ निश्चयमें संकल्प समाप्त कर देना चाहिये । पश्चात् व्यष्टि- बुद्धिको समष्टि-बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वमें लीन करना चाहिये और उसे फिर समष्टिबुद्धिके भी भासक शान्त आत्मामें लय करना चाहिये अथवा वागादिव्यापारोंका मनमें लय करके मनको निश्चयात्मिका बुद्धिमें, फिर उसे समष्टिबुद्धिमें और उसे शान्त आत्मामें नियन्त्रित या लीन करना चाहिये । बुद्धिके भासक शुद्ध भानका ही चिन्तन करना तदभिन्न वस्तुका चिन्तन न करना ही उसका लय है । ' यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ ' ( कठोप० १ । ३ । १३ ) कुछ महानुभावोंने और तरहसे भी इस मन्त्रका आशय कहा है । वागादि व्यापारोंका चिन्तन न करके केवल मनोव्यापारको देखना चाहिये । पश्चात् मनका चिन्तन करके ज्ञान आत्मा अर्थात् अहमर्थ (मैं ) -का ध्यान करना चाहिये । अर्थात् पहले वागादि व्यापारोंकी उपेक्षा करके मनोव्यापारको देखे, फिर मनोव्यापारका उसके प्रेरक ' मैं ' में लय करना चाहिये । यहाँ ' जानातीति ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे ज्ञानका जाननेवाला ' अहं ' ( मैं ) अर्थ होता है और फिर उस अहंका भी सूक्ष्म अहं ( अस्मिता ) -में लय करना चाहिये । अर्थात् स्थूल अहं ( मैं ) -को छोड़कर अस्मिताका ध्यान करना चाहिये । ' अहं ' का मैं कर्ता- भोक्ता, सुखी-दुखी यह स्थूल रूप है । अस्मि ( केवल हूँ) यह उसका सूक्ष्मरूप है । यही महान् आत्मा है, उसे भी उसके भासक शुद्ध भानरूप आत्मामें लय करना चाहिये । अर्थात् ' अस्मि ' ( हूँ) ऐसा भी चिन्तन छोड़कर, उसके भासक अनन्त सत् और भानरूप आत्माका ध्यान करना चाहिये ।
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१०८४ मार्क्सवाद और रामराज्य महाविक्षेपकालमें भी सब कुछ भगवान् ही है, इस बुद्धिसे शान्ति मिलती है । ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । ' ( छां० उ० ३।१४।१ ) अर्थात् जैसे तरंग, लहर, बुद्बुद आदि जलराशिसे उत्पन्न, उसीमें स्थित और उसीमें लीन होते हैं, अतः जलस्वरूप ही है, वैसे ही सर्व दृश्यादृश्य जगत् तज्ज, तल्ल, तदन है अर्थात् स्वप्रकाश सत्स्वरूप ब्रह्म भगवान्से ही उत्पन्न, उन्हींमें स्थित और उन्हींमें लीन होता है, अत: सब कुछ भगवान् ही है - ऐसी भावना आते ही राग- द्वेष, वैर - वैमनस्य, उद्वेग मिटकर ध्रुव शान्ति मिलती है ।
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त्रयोदश परिच्छेद मार्क्स और ईश्वर मार्क्सवादी विद्वान् धर्मके समान ही ईश्वरको भी अनावश्यक समझते हैं । उनकी दृष्टिमें ' भीरुता या भ्रान्तिके कारण कल्पनाप्रसूत भूत- प्रेत ही सभ्यताके साबुनसे धुलते - धुलते देवता बन गया और फिर वह कल्पित देवता ही विज्ञानकी चमत्कृतिसे चमत्कृत होकर ईश्वर या निर्गुण ब्रह्म बन गया । ईश्वर या ब्रह्म न तो कोई वास्तविक वस्तु है, न उसकी आवश्यकता ही है । ईश्वरकी कल्पनासे लाभके बदले हानि अधिक हो सकती है । कारण, ईश्वरीय शास्त्र या ईश्वरीय नियमका नाम लेकर अन्धविश्वासी लोग प्रगतिके मार्गमें बार - बार रोड़ा अटकाते रहते हैं । ' एक कम्युनिस्टका कहना है कि 'जो ईश्वर या धर्मको मानते हुए भी मार्क्सकी अर्थनीति कार्यान्वित करनेकी बात करता है या तो वह धूर्त मक्कार है अथवा महामूर्ख । ईश्वर दिखावटी हुंडी नहीं है । ईश्वर माना जायगा तो उसके नियम भी मानने पड़ेंगे । फिर व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीकरण भी ईश्वरीय नियमके विरुद्ध ठहरेगा । ' परंतु ईश्वर यदि वस्तु है तो किसीके चाहने या न चाहनेसे उसका कुछ भी बिगड़ नहीं सकता । भले ही चमगादड़ोंको सूर्यका प्रखर प्रकाश असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत होता हो, परंतु एतावता सूर्य असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक नहीं सिद्ध होते । वैसे किसीको ईश्वर भी भले ही असत् अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत हो, फिर भी उसकी प्रचण्ड सत्ताका अपलाप होना असम्भव है । वस्तुतः सूर्यनारायणसे भी अधिक सूर्य एवं चन्द्रका भी भासक ईश्वर एक स्वतःसिद्ध सर्वमान्य वस्तु है । यह बात आधुनिक अन्वेषण, न्याय-सांख्य- वेदान्त - दर्शन, आस्तिक सिद्धान्तों तथा आस्तिक वादोंसे स्पष्ट सिद्ध है । धर्म एवं ईश्वर परम सत्य वस्तु है, इसीलिये सर्वकाल एवं सर्वदेशमें इसकी मान्यता रही है । कहा जाता है कि द्वितीय युद्धके प्रसंगमें अमेरिका एवं अफ्रीकाके कई ऐसे प्रदेशोंमें वैज्ञानिकोंने अनुसंधान
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१०८६ मार्क्सवाद और रामराज्य किया तो वहाँ यही पता चला कि वहाँके जंगली लोगोंमें धर्म एवं ईश्वरके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी धारणा नहीं है, परंतु ठीक इसके विपरीत यह भी कहा जाता है कि जब उन प्रदेशोंमें जाकर कई आस्तिकोंने वहाँके लोगोंसे बात की तो पता चला कि वे लोग आसमानी पिता एवं स्वर्गीय लोकपर विश्वास रखते हैं; परंतु विदेशी सभ्य कहे जानेवाले लोगोंकी पहले तो वे बात ही नहीं समझते और समझनेपर भी डरकर अपना भाव नहीं व्यक्त कर सकते । प्रोफेसर मैक्समूलरके अनुसार पादरी डॉक्टर कौल, जुलूजातिके मध्यमें बहुत दिनोंतक रहे । जब वे उनकी भाषा भली प्रकार बोलने और समझने लगे तो उन्हें मालूम पड़ा कि जुलूजातिमें भी धर्म है । उनके विश्वासानुसार प्रत्येक घरानेका एक पूर्वज था और फिर समस्त मानवजातिका भी एक पूर्वज था, जिसका नाम उन्होंने ' उनकुलंकुलू' ( प्रपितामह ) रखा है । जब उनसे पूछा गया कि उनकुलंकुलूका पिता कौन है? तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह बाँससे निकला था । जुलूभाषामें बाँसको उथलंग कहते हैं । बाप संतानका उथलंग कहलाता है । जैसे बाँससे कुल्ले फूटते हैं, उसी प्रकार बापसे संतानकी उत्पत्ति होती है । डॉक्टर कौलसे एक जुलूने कहा कि यह ठीक नहीं कि स्वर्गीय राजाको हमने गोरे आदमियोंसे सुना है । गर्मियोंमें जब बादल गरजते हैं, तो हम कहते हैं— राजा ( ईश्वर ) खेल रहा है । एक बुड्ढेने कहा कि ' हम बचपनमें यही सुना करते थे कि राजा ऊपर है, हम उसका नाम नहीं जानते । संसारको पैदा करनेवाला उम्दबूको ( राजा ) है, जो कि ऊपर है । ' एक बुड्डीने कहा कि जिसने सब संसार बनाया, उसीने अन्न भी बनाया । ' ईश्वर कहाँ है? ' यह पूछनेपर वृद्धलोग कहते हैं कि वह स्वर्गमें है, राजाओंका भी राजा है । मैडम ब्लेवैट्स्कीका कहना है कि 'जिस प्रकार मछली पानीके बाहर नहीं रह सकती, उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी किसी प्रकारके धर्मके बाहर नहीं रह सकता । ' संसारमें चेतन-अचेतन दो प्रकारके पदार्थ मिलते हैं, उनमें अचेतनसे चेतन प्रबल होता है । एक चींटी बड़े - बड़े मिट्टीके चट्टानोंको
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मार्क्स और ईश्वर १०८७ काट देती है । छोटे - छोटे कीड़े पहाड़ोंको तोड़ देते हैं । छोटा पक्षी बड़े-से- बड़े वृक्षोंको हिला देता है । वस्तुतः जहाँ चेतनता है, वहीं बल होता है । जड वस्तुएँ निर्बल होती हैं । घोड़ा गाड़ी खींचता है, गाड़ीकी अपेक्षा घोड़ा बलवान् है । जडशरीर भी चेतनके सहारे चलता है । मरे हुए हाथीसे जीवित चींटी भी बलवान् है I। चेतनोंमें भी मनुष्यकी शक्ति बहुत ही प्रबल है । एक शिशु भी हाथीका नियन्त्रण करता है । सिंह- जैसा क्रूर जन्तु भी मनुष्यकी इच्छाका अनुसरण करता है । जल, वायु, बिजली आदि भूतोंपर मनुष्यका अधिकार है । रेल, तार, वायुयान आदि मनुष्यशक्तिके ही परिचायक हैं । मनुष्य सृष्टिमें भी रद्दोबदल करता रहता है । वह समुद्रको पारकर, पहाड़ - जंगलको काटकर शहर बसा देता है, नदियोंपर बड़े - बड़े पुल बाँध देता है, उनके प्रवाहको बदल देता है, स्थलोंमें जल एवं जलमें स्थल बना देता है । फिर भी विचित्र सृष्टिमें कितने ही प्राणी मनुष्यसे भी कहीं अधिक बलवान् होते हैं । गृध्रकी दृष्टि और हिरणोंके दौड़के सामने मनुष्यकी शक्ति कमजोर है । बड़े - बड़े वैज्ञानिक, बलवान्, बुद्धिमान् भी महाशक्तिमान् सर्वज्ञके सामने कुछ नहीं हैं । बड़े - बड़े बलवान् अन्तमें अपने - आपको प्राकृतिक शक्तियोंके सामने नगण्य पाते हैं । वस्तुतः निश्चयके आधारपर आशा होती है और आशाके आधारपर ही प्राणीकी प्रवृत्ति होती है । कहा जाता है, ‘ जियोलॉजी ( भूगर्भशास्त्र ) - ने पता लगाया है कि अमुक चट्टानें किस प्रकार और कब बनीं? हिमालय -जैसा महान् पर्वत भी कभी - न-कभी उत्पन्न हुआ है । एक-एक वस्तु दूसरेकी अपेक्षा नयी है । वृक्षका फूल पत्तेसे नया है । पत्ता भी जड़से नया और जड़ भी उस मिट्टीकी अपेक्षा नयी है, जिसपर जड़ उत्पन्न हुई । कहा जाता है ' पृथ्वी ' एक आगका गोला थी । जैसे अंगारोंपर ठण्डा होनेके समय सिकुड़न पड़ जाती है, उसी प्रकार पृथ्वीका गोला जब ठण्डा होने लगा तो उसमें सिकुड़न पड़ गयी । ऊँचे स्थान पहाड़ हो गये, नीचे समुद्र बन गये । बहुत पदार्थोंकी उत्पत्ति हम देखते हैं । बहुतोंका हम विश्लेषण कर सकते हैं । वे इन्द्रियाँ जिनसे ज्ञान प्राप्त किया जाता है और वे पदार्थ
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१०८८ मार्क्सवाद और रामराज्य जिनका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, दोनों ही कार्य हैं । जिन -जिन वस्तुओंका विश्लेषण हो सकता है; वह कार्य समझा जाता है । जिनका विश्लेषण या विभाजन नहीं हो सकता, वे ही परमाणु हैं । आजकल यद्यपि कहा जाता है कि परमाणुका विभाजन वैज्ञानिक कर लेते हैं । परंतु जब परमाणुकी यही परिभाषा है, तब तो जिसका विश्लेषण हो सकता है, वह परमाणु है ही नहीं । जो लोग परमाणु न मानकर केवल शक्ति ही मानते हैं, उन्हें भी तो मानना ही पड़ेगा कि शक्ति कभी वर्तमान जगत्के रूपमें परिणत हुई है । चाहे परमाणुओंसे, चाहे शक्तिसे, चाहे प्रकृतिसे, चाहे ब्रह्मसे जगत्की सृष्टि हुई और उस सृष्टिमें क्रम भी मान्य होने चाहिये । यह नहीं कि पहले फल हुआ फिर फूल हुआ । मालीको यह नियम मालूम होता है कि पहले अंकुर, फिर नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प, फलका आविर्भाव होता है । इसी तरह निम्बके बीज एवं आमकी गुठलीसे तथा अन्यान्य विभिन्न बीजोंसे विभिन्न ढंगके अंकुरादि उत्पन्न होते हैं । निम्बका बीज बोनेसे आमका फल नहीं लगता, यह नियम भी लोगोंको ज्ञात है । इसी तरह गेहूँ बोनेसे चनेकी उत्पत्ति नहीं होती । मनुष्य तथा प्राणियोंकी भी वृद्धिका नियम है शैशव, यौवन, वार्धक्य अवस्थाएँ क्रमेण आती हैं । चिकित्सक चिकित्सालयोंमें शारीरिक नियमोंके आधारपर ही चिकित्सा करते हैं । पहाड़ एवं पहाड़ी नदियोंका निर्माण कैसे होता है, इनका किस ओर क्यों प्रवाह है, आदिके सम्बन्धमें भूगर्भके विद्वानोंका भी भूगर्भ- सम्बन्धी नियम प्रसिद्ध है । मनोविज्ञानकी जटिलता और भी विलक्षण है । यद्यपि मनकी गति बड़ी विलक्षण होती है, फिर भी मनोविज्ञानके नियम हैं ही । इसी तरह सभी शास्त्रोंके नियम हैं । इस तरह सृष्टिकी नियमबद्धता दिखायी देती है । इन नियमोंका विधायक और पालक कोई मान्य होना चाहिये । नियमकी दृष्टिसे सृष्टिमें एकता है । ' हर एक नियमका प्रयोजन भी होता है । लड़कोंका प्रतिदिन एक साथ विद्यालयमें जानेका नियम व्यर्थ नहीं होता । प्रयोजन ही कार्यको