मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1091–1100
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1091–1100
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मार्क्स और ईश्वर १०८९ सार्थक बनाता है । संसारकी सभी वस्तुओं एवं घटनाओंसे किसी विशेष प्रयोजनकी सूचना मिलती है । भले ही प्रयोजन समझमें न आये, परंतु है अवश्य । एक मशीनमें हजारों पुर्जे होते हैं, कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई गोला, कोई टेढ़ा- इनमें परस्पर पर्याप्त भिन्नता है, परंतु बनानेवालेका उद्देश्य कार्यसिद्धि ही है । कपड़ा बुनना, आटा पीसना, पुस्तक छापना आदि इसी प्रयोजनसे प्रेरित होकर वैज्ञानिकोंने भिन्न-भिन्न पुर्जोंको बनाकर फिर सबको इस प्रकार मिलाया कि जिससे कार्यकी सिद्धि हो । पुर्जे न तो सब बराबर हैं, न एक- से हैं, न सबके साथ एक- से जुड़े हुए हैं । सब असमान होते हुए भी एक उद्देश्यपूर्तिके लिये जुड़े हुए हैं । उनमें बहुत-से कल-पुर्जे छोटे एवं भद्दे हैं । उनके स्थानपर अच्छे एवं सुन्दर पुर्जे हो सकते हैं, परंतु कल चलानेमें जिसका उपयोग नहीं, वह कितना भी सुन्दर हो, व्यर्थ ही है । इसी तरह जगत् एक महाप्रयोजनके लिये निर्मित है । इसकी छोटी- से-छोटी वस्तुएँ एवं घटनाएँ भी निष्प्रयोजन नहीं हैं । राबर्ट फ्लिप्सके अनुसार जिस मण्डलका हमारी पृथ्वी एक अवयवमात्र है, वह अति विशाल, विचित्र तथा नियमित है । जिन ग्रहों, उपग्रहोंसे इसका निर्माण है, उनका भी परिमाण बहुत विस्तृत है । हमारी पृथ्वी ही सूर्य-चन्द्र आदिसे इस प्रकार सम्बन्धित है कि बीज बोने, खेत काटनेके समयोंमें बाधा नहीं पड़ती । समुद्रके ज्वारभाटे कभी हमें धोखा नहीं देते । करोड़ों मण्डलोंमेंसे सूर्यमण्डल एक है । बहुत- से तो इससे असंख्यगुने बड़े हैं । फिर ये करोड़ों, अरबों सूर्य एवं तारागण जो आकाशमें बिखरे हैं, परस्पर एक-दूसरेसे ऐसे सम्बद्ध तथा गणितके गूढ़तम नियमोंके इतने अनुकूल हैं कि उनसे प्रत्येककी रक्षा होती है और प्रत्येक स्थानमें साम्य तथा सौन्दर्य दिखायी देता है । प्रत्येक ग्रह दूसरेके मार्गपर प्रभाव डालता है । प्रत्येक कोई-न-कोई ऐसा कार्य कर रहा है, जिसके बिना न केवल वही, किंतु समस्त मण्डल नष्ट हो सकता था । यह समस्त मण्डल बड़ी विलक्षणतासे बना हुआ है । जो घटनाएँ देखनेमें भयानक और विघ्नरूप प्रतीत होती हैं, वे वस्तुतः 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_35_1_Front
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१० ९० मार्क्सवाद और रामराज्य उसे नष्ट होनेसे रोकती एवं विश्वकी दृढ़ताका साधक होती हैं; क्योंकि वे परस्पर अपनी शक्तियोंका इस प्रकार व्यय करती हैं कि एक नियत समयमें उनमें सहयोग हो जाता है । यह सहयोग ही विशाल जगत्के विशाल प्रयोजनका परिचायक है I। एक छोटा-सा पुष्प जहाँ मनुष्योंकी आँखोंको तृप्त करता है, उसकी सुगन्ध घ्राणोंको आनन्द देती है, वैद्य लोग उसका औषधमें भी प्रयोग करते हैं, चित्रकार उससे चित्रकारी सीखते हैं, रँगरेज रंग निकालते हैं, कवि काव्यमें उससे सहायता लेते हैं । भ्रमर उसका रसास्वादन करता है, शहदकी मक्खियाँ उससे शहद निकालती हैं, तितलियाँ उन फूलोंपर बैठकर अलग आनन्द लेती हैं । उसके बहुत से ऐसे भी प्रयोजन हैं, जिन्हें मनुष्य नहीं जानता । इतना प्रयोजन सिद्ध करके भी वृक्षकी संततिरक्षाके लिये वह बीज उगाता है । यह एक छोटे- से फूलका कार्य है । इसी प्रकार संसारकी सभी वस्तुओंके अनेक विशाल प्रयोजन हैं । संसार कितना विशाल है? समुद्र, पहाड़, पृथ्वी तथा पृथ्वीसे बहुत बड़ा सूर्य और फिर करोड़ों सूर्य, अरबों तारे वेदान्तमतानुसार पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाशादि - सब उत्तरोत्तर एक- दूसरेसे दस-दस गुने बड़े हैं । फिर ऐसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड मायाके एक अंशमें हैं । वह माया भगवान्के एक अंशमें ऐसी प्रतीत होती है, जैसे महाकाशके एक प्रदेशमें बादलका छोटा- सा टुकड़ा । स्थूलताके साथ ही संसारमें सूक्ष्मताका भी अत्यन्त महत्त्व है । जो जल आज बर्फ या नीलमणिके रूपमें स्थूलरूपसे उपलब्ध हो रहा है, वही कभी बादल और उससे भी पहले सूर्यकी रश्मियोंमें था । सूर्य-रश्मिका वह नगण्य कण जिसे परमाणु कहा जा सकता है, उसका एक पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा था । उसके अल्पांशमें वायु और वायु अल्पांशमें प्राण, प्राणके अल्पांशमें मन और मनमें ब्रह्माण्ड था । फिर ब्रह्माण्डके भीतर अनन्तकोटि प्राणी और मन थे, उन मनोंमें फिर भी उसी तरह ब्रह्माण्डकी सत्ता थी । इस तरह एक सूक्ष्म वटबीज-कणिकामें महान् वटवृक्षका अस्तित्व और उस वटवृक्षमें अपरिगणित बीज- कणिका 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_35_1_Back
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मार्क्स और ईश्वर १० ९ १ और उन कणिकाओंमें अनन्त वटवृक्षका अस्तित्व एक साधारण-सी बात जँचने लगती है । इसी तरह विश्वके छोटे-छोटे नियमोंको देखते हैं, तो नियमोंका समूह उसी ढंगसे एक विशाल नियम बन जाते हैं, जैसे छोटे-छोटे कणोंका समूह एक पहाड़ । समुद्र भी जलकणोंका समुदाय ही है । यद्यपि मनुष्यकृत वस्तुओंमें भी बड़ी- बड़ी विलक्षणता दिखायी देती है । बड़े - बड़े विशालकाय पुल, दुर्ग, बाँध चकित कर देते हैं । विद्युत्के विचित्र चाकचिक्य चन्द्र- सूर्यसे होड़ करते हैं । वायुयानका चमत्कार भी कुछ ऐसा ही है । फिर भी यह सब स्वाभाविक ईश्वरीय वस्तुओंका एक छोटा-सा अनुकरणमात्र है । कितना भी बड़ा विशाल एवं नियमबद्ध संसार कार्य ही है, इसकी कभी -न-कभी सृष्टि हुई है, यह मानना पड़ता है । किसी भी कार्यके लिये उपादान, निमित्त एवं साधारण कारण अवश्य होते हैं । जैसे एक घटका मिट्टी उपादान, कुलाल निमित्त एवं देशकाल आदि साधारण कारण होते हैं । साधारण क्रिया भी छोटी -छोटी अनेक क्रियाओंका समुदाय ही होती है । एक घट- निर्माणरूप क्रियामें कितनी ही चेष्टाओंका समुदाय है । संसारके अनन्त क्रियाजालोंमें बहुत-सी क्रियाएँ मनुष्यकृत होती हैं, जैसे घट, पट, मठ आदिका बनाना, रोना, हँसना, चलना आदि । जब घटका निर्माण मनुष्यद्वारा प्रत्यक्ष देखते हैं, तो किसी भी घटको देखकर उसका निर्माता कोई मनुष्य होगा, यह अनुमान कर लिया जाता है । इसी तरह किसी भी कार्यको देखकर उसके कर्ताका अनुमान होना स्वाभाविक है । बहुत से कार्य हैं, जिनका मनुष्यद्वारा निर्माण सम्भव नहीं, जैसे वृक्षका उगना, सूर्यका निकलना, भूकम्पका आना आदि । यह सभी क्रियाएँ हैं, इनका भी कोई कर्ता होना आवश्यक है । नास्तिक मेजका बनानेवाला बढ़ई तो अवश्य मानता है, परंतु वृक्षों, पहाड़ोंको बनानेवाला कर्ता आवश्यक नहीं मानता । लोटेका बनानेवाला ठठेरा जरूरी है, परंतु नदी, समुद्रके लिये कर्ता आवश्यक नहीं । संसारकी सभी क्रियाएँ दो ही प्रकारकी हैं । एक प्राणिकृत, दूसरी 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_35_2_Front
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१० ९ २ मार्क्सवाद और रामराज्य अप्राणिकृत । सिद्धकोटिकी वस्तुएँ दृष्टान्तकोटिमें आती हैं, साध्यकोटिकी नहीं । दृष्टान्त वही होता है, जो दोनों पक्षोंको मान्य होता है । सूर्य, चन्द्र, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि सावयव होनेसे कार्य हैं । आस्तिक कह सकता है कि जैसे मेज आदि कर्तासे निर्मित होते हैं, वैसे ही कार्य होनेसे सूर्य आदि भी किसी ( ईश्वर ) कर्तासे निर्मित हैं । यहाँ मेका दृष्टान्त आस्तिक-नास्तिक दोनोंको ही मान्य है । नास्तिक कहता है कि चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी आदिके कर्ता आवश्यक नहीं है, जैसे नदी बहनेके लिये कोई कर्ता आवश्यक नहीं होता, परंतु नास्तिकका दृष्टान्त सिद्धकोटिमें नहीं है, किंतु साध्यकोटिमें है । आस्तिकके लिये नदीका बहना, सूर्यका निकलना- दोनों ही एक कोटिमें हैं । जैसे सूर्य, चन्द्र आदिका उगना ईश्वरप्रेरणापूर्वक होता है, उसी तरह नदीका बहना भी ईश्वरकृत ही है । चार्वाकमतानुयायी कहते हैं कि ' अविनाभावसम्बन्ध दुर्ज्ञेय होता है ' अतः अनुमानादि प्रमाण मान्य नहीं हैं । धूमादि ज्ञानके अनन्तर जो अग्न्यादिमें प्रवृत्ति होती है, वह प्रत्यक्षमूलक है अथवा भ्रान्तिसे ही समझनी चाहिये; क्योंकि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ- वहाँ अग्नि होती है - यह जानना दुष्कर है; क्योंकि सर्वदेश, सर्वकालके धूम- वह्निका जिसे ज्ञान हो, वही ऐसी बात कह सकता है, परंतु किसी भी मनुष्यको सर्वदेशकालके धूम और वह्निका ज्ञान होता ही नहीं । फिर वह कैसे कह सकता है कि जहाँ -जहाँ धूम होता है, वहाँ- वहाँ वह्नि होता है । कतिपय स्थलमें तो यह देखा गया है कि जहाँ-जहाँ वह्नि है, वहाँ- वहाँ धूम होता है, पर अग्नितप्त लौहपिण्डमें व्यभिचार दिखनेसे व्यभिचार निश्चित हो जाता है । परंतु चार्वाकका यह कहना भी तभी सम्भव होता है, जबकि अनुमानादि प्रमाण मान्य हों; क्योंकि प्रत्यक्षसे भिन्न अनुमानादि प्रमाण नहीं हैं, यह कहना भी अज्ञ, संदिग्ध, विपर्यस्त तथा जिज्ञासुके प्रति ही उचित है । जिस किसीके प्रति वचनप्रयोगको पागलपनका ही परिणाम समझा जाता है । दूसरोंका अज्ञान, संशय, भ्रान्ति या जिज्ञासा दूसरेको प्रत्यक्ष प्रमाणसे कभी भी विदित नहीं हो सकती । अतः उनके वचनों, 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_35_2_Back
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मार्क्स और ईश्वर १० ९ ३ मुखाकृति या व्यवहारसे अन्यके संशय-अज्ञान आदिका अनुमानादिसे बोध होता है तथा अज्ञान -संशयादि मिटानेके लिये वचनप्रयोग सार्थक होता है । चार्वाक अंगनालिंगनजन्य सुखको पुरुषार्थ कहता है । इससे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सुख और स्त्रीगमनका अविनाभाव सम्बन्ध है । यदि स्त्रीगमन और सुखका अविनाभाव सम्बन्ध न हो तो उस सुखको पुरुषार्थ कैसे कहा जा सकता है? इसी प्रकार क्षुधा-निवृत्तिके लिये नियमतः भोजनमें प्रवृत्ति भी सिद्ध करती है कि प्राणी अनुमान-प्रमाण मानकर ही क्षुधा -निवृत्तिके लिये भोजन-निर्माणमें संलग्न होता है । उसी प्रकार कृषि, व्यापार आदि सभी कार्योंमें आनुमानिक कार्यकारणभावका निश्चय करके ही प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है । बिना अनुमान-प्रमाण अंगीकार किये आस्तिक, नास्तिक, चार्वाक ही क्या- पशुतककी भी कोई प्रवृत्ति नहीं हो सकती । पूर्वकी प्रवृत्तियोंसे लाभ देखकर, तादृश प्रवृत्तियोंसे लाभका अनुमान करके ही प्राणी प्रवृत्त होता है । अनुमान बिना माने प्रत्यक्ष भी व्यर्थ हो जाता है । अनुमानके आधारपर अप्राणिकृत कार्योंका भी कोई कर्ता अवश्य सिद्ध होता है । कारण, सिद्धकोटिके जितने भी दृष्टान्त हैं, सभी कर्तापूर्वक ही हैं । अतः जैसे प्राणिकृत क्रिया कर्तासे होती है, वैसे ही अप्राणिकृत क्रिया भी कर्तासे ही सिद्ध होती है । प्राणिकृत, अप्राणिकृत क्रियासे भिन्न कोई क्रिया है ही नहीं । यदि बिना घड़ीसाजके घड़ी नहीं बन सकती, बिना बढ़ईके मेज नहीं बन सकती तो यह भी मानना ही चाहिये कि बिना चेतनसत्ताके चन्द्र, सूर्य, पहाड़, नदियाँ आदि भी नहीं बन सकतीं । कई लोग 'क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत्'– पृथ्वी, वृक्ष आदि सकर्तृक हैं, कार्य होनेसे, घटादिके तुल्य – इस अनुमानमें शरीरजन्यत्वरूप उपाधि दोष बतलाते हैं । अर्थात् जहाँ- जहाँ शरीरजन्यता होती है, वहाँ- वहाँ सकर्तृकता होती है । घटादि शरीरजन्य हैं, अतः सकर्तृक हैं; परंतु कार्यत्व तो पृथ्वी-अंकुरादिमें भी होता है, पर वहाँ शरीरजन्यता नहीं है । साध्य- व्यापक, साधनाव्यापक धर्मको ही
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१० ९४ मार्क्सवाद और रामराज्य उपाधि कहा जाता है । इस तरह उनके मतानुसार कार्यत्वहेतु सोपाधिक होनेसे साध्यसिद्धिमें समर्थ नहीं होगा, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि उपाधिके द्वारा या तो व्याप्ति- व्यभिचारका अनुमान होता है या पक्षमें उपाध्यभावसे साध्याभावका अनुमान होता है । तभी प्रकृत अनुमान दूषित समझा जाता है । इस तरह यहाँपर शरीराजन्यत्वरूप उपाध्यभावसे सकर्तृकत्वाभावका अनुमान करना पड़ेगा, परंतु उसमें शरीर विशेषण व्यर्थ होगा । जब अजन्यत्वमात्रसे सकर्तृकत्वाभाव सिद्ध होता है तो शरीर विशेषण व्यर्थ ही है । पृथ्वी, वृक्ष आदिमें शरीराजन्यता होनेपर भी अजन्यता नहीं है । अतः अजन्यता न होनेसे सकर्तृकत्वाभाव नहीं सिद्ध हो सकता । सुतरां कार्यत्वरूप हेतुसे पृथ्वी- वृक्षादिमें सकर्तृकत्वसिद्धि निर्बाध है । कई लोग पौर्वापर्यको ही कार्य- कारणभावके स्थानपर बिठलाते हैं । उनके अनुसार सदा पूर्वमें रहनेवाला कारण और सदा पश्चात् होनेवाला कार्य है; परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि अन्धकार सदा सूर्योदयके पूर्व होता है, तो भी अन्धकार सूर्योदयका कारण नहीं माना जाता, रविवारसे पूर्व सदा शनिवार रहता है, फिर भी वह रविवारका कारण नहीं होता । कार्य कारणसे पीछे होता है, इतना ही नहीं, किंतु कारणके द्वारा होता है । तर्कसंग्रहकारकी दृष्टिसे उपादानगोचरापरोक्ष ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिवाला चेतन ही कर्ता होता है, जैसे घटका निमित्तकारण कुलाल है; वही घटका कर्ता है । उसे घटके उपादानकारण मृत्तिकाका अपरोक्षनिकटतम ज्ञान है, उसकी चिकीर्षा है, घटनिर्माणकी इच्छा है और उसमें घट बनानेका प्रयत्न है । बिना ज्ञानके इच्छा और बिना इच्छाके कृति नहीं हो सकती । इस तरह 'जानाति इच्छति अथ करोति ' किसी चीजको प्राणी पहले जानता है, फिर इच्छा करता है और फिर तद्विषयक प्रयत्न करता है । इस तरह ज्ञान, इच्छा और कृति जहाँ होती है, वहीं कर्ता होता है । अतः भले ही घटसे मिट्टी गिरती हो, फिर भी वह मिट्टी गिरनेका कारण नहीं समझा जाता । प्रत्येक कार्यको कर्ताकी अपेक्षा होती है, ये नियम सभीके मस्तिष्कपर शासन करते हैं । अतः जहाँ किसी कार्यमें प्रत्यक्ष ज्ञान एवं
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मार्क्स और ईश्वर १० ९५ इच्छाका सम्बन्ध नहीं दिखायी पड़ता, वहाँ प्राणी अदृष्ट इच्छाशक्तिकी कल्पना करता है । किसी पुल या किलाको देखकर प्राणी यह अवश्य सोचता है कि किसीने अपनी ज्ञानेच्छा तथा कृतिसे इसे बनाया है । इसी तरह एक प्रफुल्लित कमलको भी देखकर बुद्धिमान् अवश्य सोचता है है कि यह इतनी सुन्दर वस्तु बिना किसीकी इच्छा-कृतिके कैसे सम्पन्न हो सकती है? बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता, इस दृष्टिसे सृष्टिका भी कारण होना अनिवार्य है । अतः सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ज्ञानेच्छा - कृतिसे ही सृष्टिकी रचना उचित है । कई लोग सृष्टिको आकस्मिक कहते हैं, परंतु वस्तुतः बिना हेतुके कोई भी घटना कभी हो ही नहीं सकती । यदि विभिन्न शक्तियोंद्वारा होनेवाले कार्योंके आकस्मिक सम्बन्धमात्रको आकस्मिक कहा जाय, जैसा कि काकतालीय-न्याय कहलाता है ( काकका वृक्षपर बैठना- काकके प्रयत्नका फल है, तालफलका पतन अपने कारणोंसे सम्पन्न हुआ, परंतु दोनोंका मेल आकस्मिक हो गया ) तो इस पक्षमें निर्हेतुक कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता, भले सृष्टिकी विभिन्न घटनाओंका मेल कभी आकस्मिक भी हो तो भी सृष्टिका कोई कार्य निर्हेतुक नहीं सिद्ध होता । वस्तुतस्तु मनसे भी अचिन्त्य रचनारूप संसारका निर्माण सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् चेतन कर्ताके बिना उपपन्न नहीं हो सकता और उस सर्वज्ञका कोई भी कार्य असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । कुछ लोग स्वयम्भू प्रकृति या उसके परमाणुओंसे ही विश्वका निर्माण मानते हैं, किंतु सर्वज्ञ ईश्वरकी ज्ञप्ति, इच्छा एवं कृतिके बिना प्रकृति या परमाणुसे संसारका निर्माण कैसे हो सकता है? बिना बुद्धिप्रबन्धके परमाणु अपने-आप इतने विलक्षण संसारको बना सकते हैं, इससे बढ़कर युक्तिशून्य कोई बात हो नहीं सकती । किसी नास्तिक पितासे जब आस्तिक पुत्रने कहा कि जो संसारको बनानेवाला है, वही परमेश्वर है । तो पिताने कहा कि परमाणुओंके अपने - आप ही एकत्रित हो जानेसे संसार बन जाता है । इसके लिये कोई सर्वज्ञ ईश्वर क्यों माना जाय? दूसरे दिन पुत्रने बहुत सुन्दर हस्ती, अश्व, शुक, पिक, मयूरोंके चित्र बनाकर उसके सामने कुछ
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१० ९६ मार्क्सवाद और रामराज्य विभिन्न रंगकी पेन्सिलें रख दीं । जब पिताने चित्रोंका निर्माता पूछा तो पुत्रने कहा कि इन्हीं पेन्सिलोंके परमाणु उड़- उड़कर कागजपर एकत्रित हो गये, उन्हींसे ये चित्र बन गये । पर पिताने इसे स्वीकार नहीं किया । तब पितासे पुत्रने कहा कि यदि परमाणुओंके उड़ -उड़कर एकत्रित हो जानेपर ऐसे चित्र भी नहीं बन सकते तो चन्द्रमण्डल और सूर्यमण्डल, भूधर, सागर, मनुष्य, पशु आदि विलक्षण वस्तुएँ बुद्धिके सहयोगके बिना केवल परमाणुओंसे कैसे बन सकती हैं? अतएव ऐसे- ऐसे अनुमान ईश्वरसिद्धिमें उपस्थित किये जा सकते हैं । ( १ ) संसारका व्यवस्थित रूप देखकर अनुमान किया जा सकता है कि जगत्की व्यवस्था प्रशास्तृपूर्विका है, व्यवस्था होनेके कारण, राज्य- व्यवस्थाके समान । ( २ ) लोकोपकारी सूर्य- चन्द्रादिका निर्माण किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा ही हो सकता है । यद्यपि आजकल लोग सूर्य-चन्द्रादिको ईश्वरनिर्मित न मानकर स्वतःसिद्ध या प्रकृतिनिर्मित मानते हैं; परंतु यह असंगत है; क्योंकि दीपकादि बुद्धिमान् चेतनद्वारा ही बनाये जाते हैं । यह दृष्टान्त वादी -प्रतिवादी उभय-सम्मत है, परंतु कोई वस्तु स्वतःसिद्ध है - इसमें उभय - सम्मत कोई दृष्टान्त नहीं है; क्योंकि ईश्वरवादी सभी पदार्थोंको ईश्वरकर्तृक मानता है । प्रकृति भी जड होनेसे स्वतन्त्रकर्त्री नहीं हो सकती । अतः सूर्य, चन्द्र किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा निर्मित हैं, प्रकाश होनेके कारण, प्रदीपके समान । जैसे व्यवहारके लिये दीपक होता है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादि भी व्यवहारोपयोगी हैं । ( ३ ) सूर्य -चन्द्रकी विशिष्ट चेष्टा देखकर भी इसी तरह उनके नियन्ताका अनुमान होता है -' सूर्य-चन्द्र नियन्तृपूर्वक हैं, विशिष्ट चेष्टावाले होनेके कारण, भृत्यादिके समान । जैसे भृत्यकी नियमित प्रवृत्ति होती है, वैसे सूर्य- चन्द्रादिकी भी नियमित प्रवृत्ति होती है । ' उपर्युक्त अनुमानसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वरसे नियन्त्रित होनेके कारण ही सूर्य-चन्द्र स्वयं ईश्वर और स्वतन्त्र होते हुए भी उदयास्तमय एवं वृद्धि- क्षयसे युक्त होकर प्रकाशादि कार्यमें संलग्न रहते हैं ।
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मार्क्स और ईश्वर १० ९७ ( ४ ) पृथिवीके विधारकके रूपमें भी प्रयत्नवान् ईश्वरकी सिद्धि होती है । विवादास्पद पृथिवी प्रयत्नवान्के द्वारा विधृत है, सावयव, गुरु, संयुक्त होनेपर भी अस्फुटित, अपतित, अवियुक्त होनेके कारण, हस्तन्यस्त पाषाणादिके समान । यदि किसी चेतनसे धारण न हो तो उसमें पतन, स्फुटन होना अनिवार्य होता, बिना किसी धारकके कोई भी गुरु पदार्थ टिक नहीं सकता । परस्पराकर्षणसे भी स्थिति असम्भव है; क्योंकि स्थिति और ज्ञप्ति अन्योन्याश्रित नहीं होती । कहा जाता है, मानवी मस्तिष्ककी सहायताके बिना भी यदि कोई अंग्रेजी भाषाके अक्षरोंको उछालता रहे तो कभी शेक्सपीयरका नाटक निर्मित हो सकता है । यदि थोड़ी देरके लिये यह मान भी लिया जाय तो भी संसारके विलक्षण प्रबन्धका विधान बिना सर्वज्ञ बुद्धिके नहीं हो सकता । भले ही किन्हीं अक्षरोंको अनन्त बार उछालो, परंतु उनके द्वारा विचार व्यक्त हो सकना असम्भव ही है । विचार व्यक्त करनेकी बात तो दूर रही, सही -सही एक पंक्तिका भी निर्माण असम्भव है 1। फिर अक्षरोंको उछालनेवाला भी कोई चेतन ही होता है । फिर बिना चेतनके जड-परमाणुओंसे विश्वका निर्माण कहाँतक सम्भव है? फिर क्या आजकल कोई अक्षरोंको उछाल-उछालकर किसी छोटे - से ग्रन्थका भी निर्माण कर सका? संसारमें रोटी बनानेसे लेकर मकान, पुल, दुर्ग आदिका निर्माण बिना बुद्धिके अपने - आप ही ईंट, चूना, पत्थर, लोहा- लक्कड़ आदि कर लेते हों, यह नहीं देखा जाता । फिर अकस्मात् ही परमाणुओंके द्वारा संसारका निर्माण और अकस्मात् ही परमाणुओंका निष्क्रिय हो जाना या संसारका नष्ट हो जाना आदि कैसे संगत होगा? फिर यदि परमाणु बिना सर्वज्ञ चेतनके प्रयत्नसे अपने- आप ही सूर्य, समुद्र, नदी, पर्वत बन सकते हैं, तब अन्य उपयोगके दुर्ग, पुल, गृहादिका निर्माण भी उसी तरह क्यों नहीं होता? तदर्थ मनुष्योंको प्रयत्न क्यों करना पड़ता है? यदि पहाड़ अकस्मात् बन सकता है, तब कोई पुल या किला अपने -आप क्यों नहीं बन सकता? स्वभाववादी स्वभावसे ही सृष्टिका निर्माण मानता है, परंतु स्वभाव यदि शक्तिशाली कोई चेतन है, तब तो नाममात्रका ही
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१० ९८ मार्क्सवाद और रामराज्य भेद हुआ । यदि सृष्टि नियमसे ही संसारका निर्माण माना जाय तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि नियमके निर्माता प्रयोक्ता बिना नियम अकिंचित्कर ही होता है । भूगर्भतत्त्ववेत्ता पुरानी वस्तुओंको देखकर बुद्धिमानोंकी कारीगरीका अनुमान करते हैं । मोहन्जोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईमें मिलनेवाली वस्तुओंके आधारपर सभ्यताकी कल्पना की जाती है । यदि सब वस्तुएँ स्वभावसे ही बनती हैं, तब उन कल्पनाओंका कोई स्थान ही नहीं रह जाता । वस्तुतः किसी प्रकारके नियम ही सिद्ध करते हैं कि कोई समझदार पूर्वापरदर्शी बुद्धिमान् ही नियम बनाता है और वही नियामक भी है । नियामक बिना नियमोंका कुछ मूल्य भी नहीं होता । अतः नियमोंके रहते हुए भी ज्ञानयुक्त, उपयुक्त चुनावसे ही सुप्रबन्ध होता है । मिट्टी - जलादिसे घट बननेका नियम है सही, पर जबतक कोई कुम्भकार नियमोंके अनुसार कार्य नहीं करेगा, तबतक घट निर्माण असम्भव ही है । धरणि, अनिल, जलके संयोगसे बीजोंके अंकुरित होनेका नियम है तथापि जबतक किसान उन नियमोंका प्रयोग करके काम नहीं करेगा, तबतक गेहूँ- यवादिकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । पृथ्वीकी आकर्षणशक्ति भले ही प्रत्येक परमाणुपर शासन करती रहे तथापि सहयोग एवं सुदृढ़ताके साथ प्रबन्ध बिना उसका कोई भी सदुपयोग नहीं हो सकता । आस्तिकोंका कहना है कि जिसने हंसके अंगमें शुक्लरंगका निर्माण किया, शुकके अंगका हरा रंग बनाया, मयूरोंको चित्रित किया और फूलोंपर बैठनेवाली तितलियोंको चमकीली साड़ी बनाकर पहनाया - वही
ईश्वर है । वही सबको वृत्ति देता है- येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः ।
मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति ॥
( हितोपदेश १ । १७ ९ ) परंतु स्वभाववादियोंका कहना है कि— शिखिनश्चित्रयेत्कोस्वभावव्यतिरेकेण वाविद्यतेकोकिलान्नात्रकः प्रकूजयेत्कारणम्॥।