मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1121–1130

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130

पृष्ठ 1121

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उपसंहार १११ ९ मात्स्यन्यायको रोककर सर्वसामंजस्य सर्वहित सम्पादनार्थ राज्य- व्यवस्था होती है । अहिंसा, सत्यादि धर्मका प्रतिष्ठापन, ब्रह्मविज्ञान -विस्तार और दण्डविधान— ये ही मात्स्यन्याय निरोधके मूल उपाय हैं, यह कहा जा चुका है । चाणक्यके अनुसार ' सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलमर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यम्, राज्यमूलमिन्द्रियजयः, इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः, विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा' ( चाणक्य- सूत्र १ - ६ ) । सातिशय, निरतिशय– सर्वविधसुखका मूल धर्म है, परंतु धर्मका मूल अर्थ है । अर्थ रहनेपर ही धर्मानुष्ठान सम्भव होता है । अर्थका मूल राज्य है, राज्यका मूल इन्द्रियजय है, इन्द्रियजयका मूल विनय है, विनयका मूल वृद्धसेवा है । वृद्धोंकी सेवाका भी मूल विज्ञान है; इसलिये विज्ञानसम्पन्न होकर, जितात्मा होकर सर्वसुखार्थ प्रवृत्त होना आवश्यक है 1। मनुके अनुसार- आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः ॥ (मनु० १।५-६ ) सम्पूर्ण जगत् सृष्टिके प्रथम नाम-रूपरहित, कल्पनातीत, अलक्षण, सर्वतः प्रसुप्त, तमोमय अर्थात् अनिर्वचनीय अज्ञान- विशिष्ट चिन्मात्र था । सर्वकारण परब्रह्म परमेश्वर स्वयम्भू भगवान् ही तमको अभिभूत करके इस अव्यक्त जगत्को व्यक्त करते हुए प्रादुर्भूत होते हैं । जैसे वसंत, ग्रीष्म आदि ऋतुओंके बदलनेपर ऋतुलिंग प्रकट होते हैं, उसी तरह प्राणी समयानुसार अपने - अपने कर्मोंको प्राप्त होते हैं । कर्मानुसार ही चराचर विश्वका उत्पादन भगवान् करते हैं -' यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम्' ( मनु० १ । ४१ ) । कर्मानुसार ही विविध योनियोंमें प्राणियोंके जन्म होते हैं । कर्ममूलक सृष्टिका विस्तार वर्णाश्रमव्यवस्थाका प्रतिपादन करके मनु कहते हैं कि संसारमें अराजकता होनेपर सारी प्रजा घबड़ाकर भयसे इधर- उधर भागने लगी, तब उसकी ( प्रजाकी ) रक्षाके

पृष्ठ 1122

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११२० मार्क्सवाद और रामराज्य लिये प्रजापतिने इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र और कुबेर-इन आठ लोकपालोंके अंशसे राजाका निर्माण किया— रक्षार्थमस्यअराजके हि लोकेऽस्मिन्सर्वस्य राजानमसृजत्सर्वतो विगुते भयात्प्रभुः ॥। इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च। चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ (मनु० ७।३-४) देवताओंके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण ही राजा अपने तेजसे सब प्राणियोंको दबा लेता है । राजा बालक हो तो भी मनुष्य समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिये । उस राजाके लिये भगवान्ने सब प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले धर्मस्वरूप ब्रह्मतेजोमय दण्डका निर्माण किया । उस दण्डके भयसे ही स्थावरजंगम सभी प्राणी अपने पदार्थोंका उचित उपभोग कर पाते हैं तथा अपने कर्तव्यसे विचलित भी नहीं

होते- तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।

भयाद् भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च॥

(मनु० ७।१५ ) दण्ड ही राजा, पुरुष, नेता, शासक और चारों आश्रमोंके धर्मका

साक्षी है- स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः ।

चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥

(मनु० ७।१७ ) दण्ड ही सब प्रजाका शासक एवं रक्षक है । सबके सोनेपर दण्ड ही जागता है । विद्वानोंने दण्डको ही धर्म कहा है । विचारपूर्वक प्रयुक्त हुआ दण्ड प्रजाका अनुरंजन करनेवाला और अविचारित दण्ड प्रजाका विनाशक होता है । यदि राजा आलस्य छोड़कर दण्डका विधान न करे तो बलवान् प्राणी दुर्बलोंको वैसे ही पकाकर खा जायँ, जैसे लोग मछलियोंको भूनकर खा जाते हैं । कौवा पुरोडाश खाने लग जाय, कुत्ता

पृष्ठ 1123

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उपसंहार ११२१ हवि चाटने लग जाय - किसी पदार्थपर किसीका स्वत्व न रहे और छोटे बड़े तथा बड़े छोटे हो जायँ । सभी वर्ण दूषित हो जायँ, मर्यादाएँ भंग हो जायँ और सारे संसारमें उथल- पुथल मच जाय- दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति । दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥

समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।

असमीक्ष्य प्रणीत विनाशयति सर्वतः ॥

यदि न प्रणयेद् राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।

शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥

अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वावलिह्याद् हविस्तथा । स्वाम्यंदुष्येयुः च नसर्ववर्णाश्चस्यात् कस्मिंश्चित्भिद्येरन्प्रवर्तेताधरोत्तरम्सर्वसेतवः ॥। सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद् दण्डस्य विभ्रमात्॥ (मनु० ७।१८ - २१; २४ ) राजा दण्डका ठीक - ठीक विधान करनेवाला, सत्यवादी, विचारपूर्वक काम करनेवाला, बुद्धिमान्, धर्म, अर्थ और कामका ज्ञाता होना चाहिये, ऐसा मनुतस्याहुःआदि धर्मशास्त्रकारोंकासम्प्रणेतारं मतराजानंहै— सत्यवादिनम् । समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम्॥ (मनु० ७।२६ ) दण्ड बड़ा तेजस्वी है । अजितेन्द्रिय लोग ठीक-ठीक उसका विधान नहीं कर सकते । वह धर्मविचलित राजाको बन्धु - बान्धवोंसहित नष्ट कर देता है तथा दुर्ग, राज्य, स्थावर- जंगम जगत्, आकाशचारी देवगण और ऋषिगणको भी पीड़ित करता है । राजा या शासकको न्यायपूर्वक अपने राज्यकी प्रजाका पालन करना चाहिये । शत्रुओंको उग्र दण्ड देना चाहिये । मित्रोंके साथ छल- कपटका व्यवहार नहीं करना चाहिये । प्रेमीजनों और सज्जनोंके साथ सहिष्णुता रखनी चाहिये । ऐसा व्यवहार करनेवाला राजा भले ही कोषरहित हो, उसका यश ऐसा 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_36_1_Front

पृष्ठ 1124

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११२२ मार्क्सवाद और रामराज्य फैलता है, जैसे जलपर तैल- बिन्दु । राजाको चाहिये कि वह पवित्र विद्वान्, ब्राह्मण एवं वृद्धोंकी नित्य सेवा करे । ऐसा करनेसे राक्षस भी राजाका सम्मान करते हैं तथा विनय (जितेन्द्रियता, नम्रता ) भी प्राप्त होती है । अविनय ( उद्दण्डता ) -से सुसमृद्ध राजा भी सपरिवार नष्ट हो जाते हैं और विनयसे जंगलमें रहनेवाले कोषविहीन राजा भी राज्य पा लेते हैं । शिकार, द्यूत, दिवास्वप्न, निन्दा, स्त्री, मद ( नशा ), नृत्य, गीत, वादित्र और व्यर्थ घूमना ( हवाखोरी ), इन दश कामज व्यसनों तथा चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया ( गुणोंमें भी दोषदृष्टि), दूसरेका धन छीन लेना, गाली -गलौज और मारपीट- इन आठ क्रोधज व्यसनोंसे तथा इन दोनोंके मूल लोभसे राजाको अत्यन्त बचना चाहिये । कामज व्यसनमें मदिरापान, द्यूत, स्त्री और मृगया– ये चार तथा क्रोधज व्यसनमें गाली-गलौज, मारपीट और दूसरेका धन छीन लेना ये तीन बहुत ही भयंकर हैं । इनसे तो सर्वथा बचना चाहिये । अत्यन्त सुकर कर्म भी एक असहाय पुरुषद्वारा दुष्कर होता है । अतः राजाको शास्त्रज्ञानी, शूर, लब्धप्रतिष्ठ, कुलीन, सुपरीक्षित सात या आठ मन्त्री रखने चाहिये । सन्धि, विग्रह, सेना, खजाना, खेती, खान, रक्षा ( बन्दोबस्त ) आदिके विषयमें पृथक् - पृथक् प्रत्येककी राय जानकर विद्वान् ब्राह्मणके साथ विचारकर निर्णय करना चाहिये । राज्यका काम जितने लोगोंसे अच्छी तरहसे चल सके, उतने लोगोंको परीक्षा करके उपमन्त्री बनाना चाहिये । खान, चुँगी और कर वसूल करनेके लिये शूर, पवित्र, निर्लोभ लोगोंको और पापभीरु लोगोंको घर आदिके प्रबन्धसम्बन्धी काममें लगाना चाहिये । इसी तरह सर्वशास्त्र - विशारद इंगित आकार और चेष्टा जाननेवाले पवित्र कुशल कुलीनको दूत बनाना चाहिये । दूत अनुरक्त, पवित्र, चतुर, स्मृतिशाली, प्रतिभासम्पन्न, देश- काल - परिस्थितिका ज्ञाता, सुन्दर, निर्भीक और वाग्मी होना चाहिये । सेनापतिके अधीन चतुरंगिणी सेना, सेनाके अधीन युद्ध तथा विनय सिखाना, राजाके अधीन खजाना और राज्य तथा दूतके अधीन सन्धि-विग्रह होते हैं । दो राजाओंमें मेल कराना या मिले हुए राजाओंको परस्पर 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_36_1_Back

पृष्ठ 1125

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उपसंहार ११२३ लड़ा देना, यह दूतका काम है । कृषक जैसे खेतमेंसे घासको निकालकर धान्यकी रक्षा करता है, उसी तरह राजा दुष्टोंका निग्रहकर प्रजाकी रक्षा करे । जैसे शरीरको कष्ट देनेसे प्राणोंका क्षय होता है, उसी तरह राष्ट्रको पीड़ा पहुँचानेसे राजाके प्राणोंका क्षय होता है । जो राजा अज्ञानवश राष्ट्रको पीड़ा पहुँचाता है, वह अपने बन्धु - बान्धवोंसमेत जीवनसे भ्रष्ट हो जाता है । राजाको लगानवसूली, नौकरोंका मासिक वेतन, मन्त्री आदिको बाहर भेजना, किसीको हानिकर काम करनेसे रोकना, किसी कामको कराना, मुकदमोंका निर्णय, अपराधियोंको दण्ड, पापियोंका प्रायश्चित्त, पाँच प्रकारके गुप्तचर, प्रजाका प्रेम या असंतोष और अन्य राजाओंके व्यवहार, इन बातोंपर भलीभाँति विचार करना चाहिये । मध्यम ( अपने और शत्रुदेशके बीचका राजा) -का व्यवहार, विजिगीषु ( अपनेको जीतनेके लिये आनेवाले राजा) -का कर्म तथा उदासीन और शत्रुकी कार्यवाहियोंपर पूरी दृष्टि रखनी चाहिये । द्वादश राजन्य- मण्डलकी चार मूल-प्रकृतियाँ हैं— ( १ ) मध्यस्थ, ( २ ) विजिगीषु, ( ३ ) उदासीन और ( ४ ) शत्रु । अर्थात् इनके वशमें रहनेसे सभी राष्ट्र वशमें रहते हैं । आठ और प्रकृतियाँ हैं - मित्र, शत्रु- मित्र, मित्र- मित्र, अरि- मित्रमित्र, आक्रन्द, पाष्णिग्राह, आक्रन्दासार और पाष्णिग्राहासार । इन प्रत्येककी मन्त्री, राष्ट्र ( प्रजा ), दुर्ग, खजाना और शासन-विभाग- ये पाँच- पाँच प्रकृतियाँ होती हैं, इस तरह ६० प्रकृतियाँ हुईं और मूल १२ मिलकर सब ७२ हो गयीं । अपनी चारों ओरकी सीमाके राजा तथा उनके मित्रोंको शत्रु समझना चाहिये । उनसे आगेके राजाओंका अपना मित्र और उनसे भी आगेके राजाओंको उदासीन समझना चाहिये । इन सबको साम, दान, भेद और दण्ड- इन प्रत्येक उपायोंसे अथवा सभी उपायोंसे सबको अथवा अधिक -से - अधिक जितने बने रह सकें, उनको मित्र बनाये रखना चाहिये । यद्यपि आज परिस्थिति बदली हुई है तथापि रूपान्तरसे यह शत्रु -मित्रकी व्यवस्था आज भी अक्षुण्ण ही है । 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_36_2_Front

पृष्ठ 1126

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११२४ मार्क्सवाद और रामराज्य सन्धि, विग्रह ( लड़ाई), यान ( चढ़ाई), आसन ( किलेके अन्दर ही बन्द रहना ), द्वैधीभाव ( भेद ) और संश्रय ( किसी बलवान्‌का आश्रय) - इन छः गुणोंका बराबर विचार करना चाहिये । एक साथ काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना तथा पृथक्- पृथक् काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि -लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना- ये सन्धिके भेद हैं । शुद्ध सन्धिमूलक ही शान्ति होती है । आस्तिकता तथा धर्म-प्रधानताके बिना सन्धियाँ अनेक हेतुओंसे अव्यवस्थित रहती हैं, इसीलिये शान्ति भी अव्यवस्थित रहती है । अतः धर्मनिष्ठा तथा आस्तिकता ही शुद्ध सन्धि एवं स्थिर शान्तिका मूल मन्त्र है । अपनी विजयके लिये लड़ना और मित्रकी हानिके निमित्त मित्रके शत्रुसे लड़ना- ये विग्रहके दो भेद हैं । आपद्ग्रस्त शत्रुको देखकर उसपर अकेले चढ़ाई करना अथवा मित्रकी सहायतासे चढ़ाई करना- ये यानके दो भेद हैं । सैन्य बल कमजोर देखकर किलेमें रह जाना अथवा मित्रके अनुरोधसे किलेमें रह जाना - ये आसनके दो भेद हैं । सेनामें फूट डाल देना अथवा दो मित्र राजाओंमें फूट डाल देना– ये भेदनीतिके दो प्रभेद हैं । शत्रुसे पीड़ित होकर किसी बलवान्‌का आश्रय लेना अथवा शत्रु पीड़ा न पहुँचाये, इसलिये किसी बलवान्‌का आश्रय लेना- यह दो प्रकारका संश्रय है । सन्धि करनेसे भले ही थोड़ी तात्कालिक पीड़ा हो, किंतु भविष्यमें लाभ हो तो सन्धि अवश्य कर लेनी चाहिये । जब सारी प्रकृति सन्तुष्ट हो और कोष तथा युद्धके साधन पर्याप्त हों, तब युद्ध करना चाहिये । जब अपनी सेना हृष्ट - पुष्ट - सन्तुष्ट हो और शत्रुसेना दुर्बल तथा असन्तुष्ट हो, तब भी युद्ध करना चाहिये । जब सेना, वाहन और कोष क्षीण हों तो शत्रुसे समझौताकी बातचीत करते हुए अपने दुर्गमें ही रहना चाहिये । जब राजा देखे कि शत्रु बलवान् है, तब अपनी सेनाका दो विभागकर एक विभाग लड़ाईपर भेजे और एक विभागको शत्रुकी सेनामें भेजकर शत्रु- सेनाके लोगोंको अपनी ओर मिला लेना चाहिये । यदि राजा देखे 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_36_2_Back

पृष्ठ 1127

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उपसंहार ११२५ कि शत्रु अब हमें जीत लेगा, तो झट किसी ऐसे बलवान् धर्मात्मा राजाका आश्रय ले ले, जो अपनी दुष्ट प्रजा और शत्रुको भी दण्ड दे सकता हो तथा गुरुके समान प्रत्येक प्रकारसे उसकी सेवा करनी चाहिये । यदि उसका आश्रय लेनेपर भी कोई लाभ न हो, अपितु हानि होनेकी ही सम्भावना हो, तो बेखटके युद्ध ही करना चाहिये । गुण- दोष विचारकर भविष्यका निर्णय करनेवाले, वर्तमान-निर्णयमें विलम्ब न करनेवाले तथा भूतकालिक शेष कार्यको शीघ्र पूर्ण करनेवाले राजाको शत्रु- मित्र या उदासीन अभिभूत नहीं कर सकते । मनुने राजाका यद्यपि बहुत महत्त्व माना है, फिर भी उसे निरंकुश नहीं बतलाया । सर्वप्रथम राजापर ही धर्मका नियन्त्रण आवश्यक है । राजाके हाथमें जो दण्ड होता है, वह दूसरोंपर ही नियन्त्रण नहीं करता, वरन् धर्मविरुद्ध राजाको भी नष्ट कर डालता है, यह पीछे कहा जा चुका है । शुक्रके अनुसार भी राजाके लिये अमात्योंकी अत्यन्त आवश्यकता कही गयी है । जो राजा मन्त्रियोंके मुखसे हिताहितकी बात नहीं सुनता, वह राजाके रूपमें प्रजाका धनहरण करनेवाला डाकू होता है—

हिताहितं न शृणुते राजा मन्त्रिमुखाच्च यः ।

स दस्युः राजरूपेण प्रजानां धनहारकः ॥

( शुक्रनीति २ । २४८ ) शुक्रके अनुसार राजाको राज्यका कार्य चलानेके लिये पुरोधा, युवराज, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्रतिनिधि, पण्डित, सुमन्त्र, अमात्य दूत–इन दस प्रकृतियोंका संग्रह आवश्यक है । इनकी योग्यता एवं कार्योंका विस्तृत वर्णन शुक्रनीतिमें है । किसी भी शासन लेखपर मन्त्री आदिकी स्वीकृति होनी चाहिये । उसपर मन्त्री, प्राड्विवाक, पण्डित और दूतको यह लिखना चाहिये कि यह हमारी सम्मतिसे लिखा गया है, अमात्यको लिखना चाहिये कि यह ठीक लिखा गया है, सुमन्त्रको लिखना चाहिये कि इसपर पूर्ण विचार कर लिया गया है, प्रधानको लिखना चाहिये कि यह यथार्थ सत्य है, प्रतिनिधिको लिखना चाहिये कि

पृष्ठ 1128

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११२६ मार्क्सवाद और रामराज्य यह अंगीकार करने योग्य है, युवराज लिखे कि यह स्वीकृत किया जाय, तब पुरोहित अपना मत लिखे कि यह मुझे सम्मत है । सबके अन्तमें राजा लिखे कि यह स्वीकृत हुआ । अपने लेखके अन्तमें सबकी मुहर

लगनी चाहिये- मन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसंज्ञकः ।

स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ॥

अमात्यः साधु लिखितमस्त्येतद् प्राग् लिखेदयम् ।

सम्यग् विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ॥

सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत् स्वयम्।

अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत्॥

अङ्गीकर्तव्यमिति च युवराजो लिखेत् स्वयम् ।

लेख्यं स्वाभिमतं चैतद् विलिखेच्च पुरोहितः ।

स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युरैव हि ॥

(शुक्रनीति २ । ३५५ – ३५ ९ ) मन्त्रिमण्डलके लेखबद्ध युक्तिसहित पृथक् मतोंको लेकर विचार करना चाहिये । फिर जो बहुमत हो, उसे स्वीकार करना चाहिये—

पृथक्पृथङ् मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् ।

विमृशेत् स्वमतैनैव कुर्याद् यद् बहुसम्मतम्॥

जो राजा प्रकृतिकी बात नहीं सुनता, वह अन्यायी है । जो प्रजाका रक्षक बनकर भी रक्षा नहीं करता, उस राजाको पागल कुत्तेके समान मार देना चाहिये—

अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।

स संहत्या निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥

( शुक्रनीति ) इस तरह भारतीय राजनीतिशास्त्रानुसारी शासक उच्छृंखल नहीं होता था । आजके लोकतन्त्र- शासनका आधार मुण्ड-गणना है । इसके अनुसार योग्य शासकोंका संग्रह कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव भी हो जाता

पृष्ठ 1129

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उपसंहार ११२७ है । बहुमत जिसे प्राप्त हो, उसीके हाथमें शासनसूत्र आ जाता है । विधान-सभा एवं लोकसभाका काम है विधान या कानूनका निर्माण करना । पर स्थिति यह है कि भारतमें सैकड़ों नहीं हजारों विधानसभायी मेम्बर इस प्रकारके हैं, जो कानूनसे सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं । उनका अपना मुकदमा होता है तो वे रुपया खर्चकर अन्य वकीलोंका सहारा लेते हैं, परंतु वे ही राष्ट्रके लिये कानून बनाते हैं । साधारण तौरपर भारतीय राजनीतिशास्त्र वेदों एवं मन्वादि धर्मशास्त्रोंको ही राष्ट्रका संविधान एवं कानून मानते हैं । उनकी दृष्टिमें शास्त्रज्ञों एवं सदाचारी धर्मनिष्ठ विद्वानोंकी परिषद् विधान -निर्णेत्री है, विधान - निर्मात्री नहीं । शासन - परिषद्की सहायतासे राजा शास्त्रानुसारी विधानद्वारा शासन करता है । राजा या शासक, वह चाहे जन-प्रतिनिधि हो या कुल-परम्परागत राजा, उसका परम कर्तव्य है कि वह पहले अपने - आपको शास्त्र एवं आचार्योंकी शुश्रूषाद्वारा विनयसे युक्त बनाये । पुनः अपने पुत्रों, मन्त्रियोंको विनययुक्त बनाये, पश्चात् भृत्यों एवं प्रजाको विनययुक्त बनाये- विनयेनोपपादयेत्। आत्मानं प्रथमं राजा ततः पुत्रांस्ततोऽमात्यान् ततो भृत्यान् ततः प्रजाः ॥ (शुक्रनी० १।९ २ ) राजाको व्यसनमुक्त होना चाहिये । कठोर भाषण, उग्र दण्ड, अर्थदूषण, पान, स्त्री, मृगया और द्यूत- ये राजाके लिये भीषण व्यसन हैं । पीछे अष्टादश व्यसनोंकी चर्चा आयी ही है- वाग्दण्डयोश्च पारुष्यमर्थदूषणमेव च। पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनानि महीपतेः ॥ ( कामन्दकीयनीतिसार १४ । ६) मन्त्रीके लिये भी ये सब दूषण हैं । आलस्य, स्तब्धता, घमण्ड, प्रमाद, वैरकारिता आदि ये और भी मन्त्रीके व्यसन हैं । दक्षता, शीघ्रता, अमर्ष, शौर्य एवं उत्साह आदि गुणोंसे युक्त ही राजा होना चाहिये-

पृष्ठ 1130

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११२८ मार्क्सवाद और रामराज्य दाक्ष्यंगुणैरेतैरुपेतःशैघ्यं तथामर्षःसन् शौर्यंराजा चोत्साहलक्षणम्भवितुमर्हति ।॥ ( कामन्दकीयनीति० ४। २३ ) मन्त्रियोंके उपयोगी और भी बहुत -से गुण कहे गये हैं । जिनके बिना शासन करनेकी योग्यता ही नहीं हो सकती है । स्वावग्रहो जानपदः कुलशीलबलान्वितः । वाग्मी प्रगल्भश्चक्षुष्मानुत्साही प्रतिपत्तिमान्॥ स्तम्भचापलहीनश्च मैत्रः क्लेशसहः शुचिः ।11 सत्यसत्त्वधृतिस्थैर्यप्रभावारोग्यसंयुतः कृतशिल्पश्च दक्षश्च प्रज्ञावान् धारणान्वितः । स्मृतिस्तत्परतार्थेषुदृढभक्तिरकर्ता च वैराणांवितर्को सचिवोज्ञाननिश्चयःभवेत् ॥। दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिसम्पत्प्रकीर्तिता( कामन्दकीयनीति० ४। २८–३१॥ ) आत्मनियन्त्रित, स्वदेशस्थ, कुलीन, शीलवान्, बलवान्, वाग्मी, निर्भीक, शास्त्रज्ञ, उत्साही, प्रत्युत्पन्नमति, निरभिमान, अचंचल, मैत्रीवर्धक, सहिष्णु, पवित्र, धैर्य-स्थैर्य - सत्य एवं सत्त्वसे युक्त, प्रतापी, नीरोग, शिल्पज्ञ, दक्ष, बुद्धिमान्, धारणावान्, स्वामिभक्त तथा उससे कभी वैर- विद्वेष न करनेवाला सचिव होता है । स्मृतिमान्, पुरुषार्थ- तत्पर, विचारशील, निश्चित ज्ञानवाला, दृढ़ता, मन्त्रगुप्ति, क्षमता आदि गुणोंसे युक्त मन्त्री हो । मन्त्रियोंकी योग्यता राजाको स्वयं प्रत्यक्ष देखकर, परोक्ष ( परोपदेश ) - से तथा अनुमानसे ( कार्य देखकर यह जान लेना कि कितना कार्य नहीं किया) जाननी चाहिये- 'प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः । स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम् । परोप- दिष्टं परोक्षम् । कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम्। ' ( कौ० अर्थ० १।९।११–१३ ) वाद, जल्प, वितण्डारूप कथाके प्रसंगसे मन्त्रीकी प्रगल्भता, निर्भीकता, प्रतिभा एवं वाक्कुशलताको जाना जाता है । उसी प्रसंगसे