मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1131–1140
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1131–1140
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उपसंहार ११२ ९ सत्यवादिताका भी पता लग जाता है । अवैरकारिता, भद्रता, क्षुद्रताका ज्ञान भी प्रसंगवशात् प्रत्यक्षसे ही जाना जा सकता है । आपत्तिके समय उत्साह, प्रभाव तथा क्लेश, सहिष्णुता, धैर्य, अनुराग, स्थिरताका परिज्ञान होता है । भक्ति, मैत्री तथा स्थिरताका परिज्ञान व्यवहारसे करना चाहिये- उत्साहं च प्रभावं च तथा क्लेशसहिष्णुताम् । धृतिं चैवानुरागं च स्थैर्यं चापदि लक्षयेत्॥ भक्तिं मैत्रीं च शौचं च जानीयाद् व्यवहारतः । (कामं० नीतिसार ४ । ३७-३८ ) मन्त्रीकी शास्त्रज्ञता एवं शिल्पज्ञता तत्-तद् विद्याओंके विद्वानोंसे जानना चाहिये । उसके स्वजनोंसे कुल, स्थान एवं संयमका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । कर्ममें प्रयुक्तकर दक्षता, विज्ञान एवं धारयिष्णुताकी परीक्षा होती है । सहवासियों, पड़ोसियोंसे उसके बल, सत्त्व ( शक्ति), आरोग्य, शील, अस्तब्धता एवं अचापलका ज्ञान हो सकता है । दारुण कृच्छ्र उत्पन्न होनेपर उसकी कुलीनताका ज्ञान हो सकता है; क्योंकि दारुण अवसरपर ही स्वच्छहृदय कुलीन अपनी विशेषताको दिखलाता है- साधुतैषाममात्यानां तद्विद्येभ्यस्तु बुद्धिमान् । चक्षुष्पतां च शिल्पं च परीक्षेत गुणद्वयम्॥
स्वजनेभ्यो विजानीयात् कुलं स्थानमवग्रहम् ।
परिकर्मसु दाक्ष्यं च विज्ञानं धारयिष्णुताम् ॥
गुणत्रयं परीक्षेत प्रागल्भ्यं प्रतिभां तथा । संवासिभ्यो बलं सत्त्वमारोग्यं शीलमेव च । समुत्पन्नेषुअस्तब्धतामचापल्यंकृच्छ्रेषुवैरिणां दारुणेष्वप्यसंशयम्चापि कर्तृताम्॥ दर्शयत्यच्छहृदयः (कामंकुलीनश्चतुरस्रताम्० ना० ४ । ३४-३६; ३॥९; ६ ९ ) आचार्य, सन्त, महात्मा और विद्वान् ही विद्याओंके प्रकाशक, प्रवर्तक तथा संचालक होते हैं । राजा भी विद्वानोंसे ही राजनीतिका विज्ञान प्राप्त करता है । इसीलिये स्वराज्यकी स्थापनामें मित्र-लाभादिसे भी प्रथम
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११३० मार्क्सवाद और रामराज्य विद्या-चिन्तनका ही निर्देश किया गया है; क्योंकि सम्पूर्ण लोकस्थिति विद्यापर निर्भर होती है । तत्रायं प्रथमोपायः यद् विद्यावृद्धैः सार्धं विद्याचिन्ता । विद्याप्रतिबद्धत्वाल्लोकस्थितेः ॥ ( नीतिवाक्यामृत ) राजाको सक्रिय विद्वानोंके साथ बैठकर विनययुक्त होकर आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीतिका विचार करना चाहिये- आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्तां दण्डनीतिं च पार्थिवः । तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेद् विनयान्वितः ॥ (का० नी० २।१ ) वात्स्यायनने भी भूमि, हिरण्य, पशु, धान्य, भाण्डोपस्कर, मित्रादिके पहले विद्याके ही उपार्जन एवं वर्धनको अर्थ माना है-' विद्याभूमिहिरण्यपशु- धान्यभाण्डोपस्करमित्रादीनामर्जितस्य विवर्धनमर्थः ।' ( वात्स्या० कामसूत्र १।२।९ ) मधुकरकी वृत्तिसे राजाका संगृहीत कोष भी अपने उपभोगार्थ न होकर प्रजाहितार्थ ही होना चाहिये । शास्त्रधर्मनियन्त्रित शासन ही रामराज्य है । इसमें प्रजाकी रुचि तथा सम्मतिका पूरा ध्यान रखा जाता है तथापि शास्त्र एवं धर्म - विरुद्ध बहुमतके आधारपर कोई अनर्थ नहीं किया जाता । फिर भी जहाँ अनेक जाति- उपजाति तथा सम्प्रदायके लोग बसते हों, वहाँ सबके धर्म, संस्कृतिकी रक्षा होनी चाहिये । किसीके देवस्थान, धर्मग्रन्थ, आचार्य एवं आचार- व्यवहारकी अवहेलना कदापि न होनी चाहिये । सभीके धर्मका निर्णय उन-उन सम्प्रदायोंके धर्मग्रन्थों तथा धर्माचार्योंपर ही छोड़ा जाना चाहिये । शासनका उसमें हस्तक्षेप न होना चाहिये । राष्ट्रके परमोपकारक गोवंशका सभी दृष्टिसे पालन होना चाहिये । उसका वध सर्वदा अवरुद्ध होना रामराज्यकी विशेषता है । देशको सर्वथा अखण्ड रखना चाहिये । प्रान्तों या राज्योंको अपने घरेलू मामलोंमें स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये । पर राष्ट्रहितके व्यापक कार्यमें सम्पूर्ण देशकी एक नीति रहनी चाहिये । राजा या राष्ट्रपति किंवा शासनपरिषद्के नीचे आठ विद्वानोंकी एक परिषद् होनी चाहिये ।
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उपसंहार ११३१ विद्वान् वेद, धर्मशास्त्र, राजनीति, समाजनीति, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि विद्याओं तथा विविध भाषाओं एवं देश - विदेशकी नीतिके वेत्ता हों । यदि सभी सब विषयोंके ज्ञाता न भी हों तथापि पूरी परिषद् मिलकर उपर्युक्त विषयोंकी पूरी जानकारी अवश्य रखे । परिषद्के सदस्य अपनी सहायताके लिये पृथक् - पृथक् परामर्शसमिति भी रख सकते हैं । प्रजाकी सम्मति, रुचि तथा आन्तरिक स्थिति एवं शासनप्रणालीके सुपरिणाम, दुष्परिणाम जाननेके लिये एक लोकसभा होनी चाहिये । उनके सदस्य प्रजाप्रिय हों । उन्हें प्रजाकी सम्मतिसे उपर्युक्त अमात्य परिषद् ही नियुक्त करेगी । मुण्डगणनाके आधारपर यह कार्य न होना चाहिये । राजा, प्रजा, अमात्यमण्डल सभीमें ईश्वरपरायणता और धर्मनिष्ठा होनेसे शासनव्यवस्था ठीक चल सकेगी । वैसा न होनेसे छल, कपट तथा मिथ्या आचरणका ही बोलबाला रहेगा । धर्मनिष्ठाके बिना कानूनकी वंचना की जाती है, परंतु यदि धर्मनिष्ठा है तो अपराधी स्वयं अपराध व्यक्त करके शुद्धिके लिये दण्ड माँगता है । भारतमें आज भी गोहत्या आदि होनेपर अपराधी ' मिताक्षरासे ' व्यवस्था माँगने स्वयं जाता है । वैसे तो सभीको धर्मात्मा तथा ईश्वरविश्वासी होना चाहिये । विशेषकर अमात्यमण्डल और उससे भी अधिक राजाको वैसा अवश्य होना चाहिये । गुणवान् पुरुष थोड़े होनेसे दुर्लभ होते हैं । अतः जहाँतक हो सके, अधिकार थोड़े ही लोगोंके हाथमें होने चाहिये । इसीलिये राजा और अमात्योंका हर समय बदलते रहना ठीक नहीं, यही राजतन्त्रका अभिप्राय है । युद्ध आदिके समय लोकतन्त्रमें भी एकके ही हाथमें अधिकार देने पड़ते हैं । अधिक लोगोंकी अपेक्षा थोड़े लोगोंको साधु -सज्जन बनानेमें सरलता होती है । यदि वंशपरम्पराका राजा हो, तो वह अपने ऊपर अधिक जिम्मेदारीका अनुभव करता है । अतः यथासम्भव वैसा ही राजा होना चाहिये । यदि वैसा न मिले, तो किसी योग्य व्यक्तिको राष्ट्रपति बनाना चाहिये । शीघ्र बदलते रहनेसे किसी योग्य व्यक्तिको भी अपनी नीति कार्यान्वित करनेका पूरा समय नहीं मिल पाता । इसके अतिरिक्त सामान्य व्यक्तिको थोड़े ही दिनोंमें स्वार्थसिद्धिकी चिन्ता लग जाती है,
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११३२ मार्क्सवाद और रामराज्य जिससे प्रजाके कल्याणमें बाधा पड़ती है । अतः यह आवश्यक है कि राजा या राष्ट्रपतिको जीवनपर्यन्त या दीर्घकालके लिये नियुक्त किया जाय । किंतु कर्तव्यच्युत होनेपर उसको हटाना आवश्यक है । राजाके स्थानकी पूर्ति उसका योग्य उत्तराधिकारी न होनेपर मन्त्रियोंद्वारा होनी चाहिये । मन्त्रिमण्डलमें किसीकी मृत्यु होने अथवा किसीके हटनेपर शेष मन्त्रियोंके परामर्शसे राजाको नयी नियुक्ति करनी चाहिये । राजा, अमात्य, कोष, सेना और न्याय– राज्यके पाँच मुख्य विषय हैं । ग्राम, मण्डल, प्रान्तके भेदसे उत्तरोत्तर अधिक शक्तिशाली अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । कोषके लिये सर्वत्र कर- संग्रह-विभाग रहने चाहिये । रक्षाविभाग तथा न्यायविभागकी भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये । रक्षाके लिये सेना दो प्रकारकी होनी चाहिये - एक वह जो प्रतिदिनकी शान्ति स्थापित रखे अर्थात् पुलिस और दूसरी वह, जो विशेष अवसरपर शत्रुके साथ युद्ध करे । न्यायालय प्रत्येक विभागके लिये पृथक् - पृथक् होना चाहिये । मण्डल और प्रान्तमें बड़े - बड़े न्यायालय और सम्पूर्ण राष्ट्रका एक सर्वोच्च न्यायालय होना चाहिये । अन्तिम न्यायालयमें अमात्यमण्डल तथा राजाको न्याय करनेका अधिकार होना चाहिये । न्यायाध्यक्षके पदपर धर्मात्मा, विद्वान् तथा सदाचारी व्यक्तियोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सम्पूर्ण स्थितिका पूर्ण परिचय रखनेके लिये गुप्तचरविभाग होना चाहिये । उसका कार्य केवल अपराधी या राजाके विरोधियोंका पता लगाना ही नहीं, किंतु लोकसेवी, परोपकारी, सदाचारी विद्वानों तथा दुखी आर्तोंके सम्बन्धमें भी सरकारको सूचित करते रहना चाहिये, जिससे निग्रहानुग्रह आदिमें पूरी सहायता मिल सके । कोषका उपयोग उपर्युक्त विभागोंके संचालन, शस्त्रास्त्र -निर्माण तथा संग्रह, यातायातसाधनोंका निर्माण तथा व्यवस्था और राष्ट्रके स्वास्थ्य तथा शिक्षा आदिमें होना चाहिये । प्रचार, यातायात, परराष्ट्रसम्बन्ध एक विभागसे, डाक, तार, शिक्षा, स्वास्थ्य दूसरेसे और उद्योग, खाद्य आदि तीसरे विभागसे सम्बद्ध हों तो अच्छा है । इसी तरह कोष, न्याय एवं सेनाकी व्यवस्था होनी चाहिये । आजकल एक सबसे बड़ा विभाग व्यवस्थापनका
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उपसंहार ११३३ अर्थात् कानून बनानेका है, जिसके लिये धारासभाओंका निर्वाचन होता है, परंतु अपने यहाँ तो इसकी आवश्यकता ही नहीं । केवल विशिष्ट विद्वानोंकी एक निर्णेत्री- परिषद् होनी चाहिये, जो मनु, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति, नारद, अंगिरा, पराशर आदिके मतानुसार ठीक-ठीक व्यवस्था दे सके । अहिन्दुओंके लिये उनके धर्मशास्त्रानुसार उनके आचार्योंकी व्यवस्था होनी चाहिये । भारतीय धर्मशास्त्र और राजनीतिके सम्यक् विद्वान् ही व्यवहारमें शास्त्रार्थके अधिकारी होंगे । व्यवहारनिर्णायक न्यायाध्यक्ष स्वधर्मनिष्ठ एवं ईश्वर -विश्वासी होना चाहिये । अमात्यमण्डलको राजाके आज्ञानुसार सभी कर्मचारियोंके नियोजन, पृथक्करण, संशोधन आदिका अधिकार होना चाहिये । गुप्तचरोंके अतिरिक्त विशिष्ट व्यक्तियोंकी एक अन्वेषणसमितिद्वारा जटिल विषयोंकी जानकारी प्राप्त करनेका प्रयत्न होना चाहिये । अमात्यमण्डलके सदस्य और राजा सर्वसाधारणके लिये दुर्दर्श, दुर्लभ न होकर सुदर्श और सुलभ रहें, जिसमें प्रजा उनसे अपनी स्थिति निवेदन कर सके । ऐसे अनेक स्थान होने चाहिये, जहाँ नियत समयपर अर्थी आकर अमात्यों या राजासे मिल सकें । मन्त्री तथा राजाओंको भी गुप्त वेषसे प्रजाकी स्थिति तथा राजकर्मचारियोंका व्यवहार जानना चाहिये । इस मार्गसे गुप्त तथा जटिल रहस्योंका भी पता लग सकता है । हिंसा, मद्यपान, व्यभिचार, द्यूत आदिपर कड़ा नियन्त्रण होना चाहिये । प्रत्येक पदपर सच्चे और शुद्ध अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । पुलिस प्रजाकी सेवक बनकर नम्रतापूर्वक काम करे, पर साथ ही दुष्टदमनार्थ आवश्यक उग्रताका निषेध न होना चाहिये । प्राचीन ढंगपर ग्रामपंचायतें विधिवत् स्थापित होनी चाहिये । आपसी झगड़े वहीं तय हुआ करें, जिसमें न्यायालय जानेकी आवश्यकता ही न पड़े । पंचायतोंका काम ठीक होता है या नहीं, इसकी देख -रेखके लिये एक निरीक्षक विभाग होना चाहिये । क्रय - विक्रयके सम्बन्धमें यथासम्भव ऐसा प्रबन्ध होना चाहिये कि अन्नवाले अन्न, तेलवाले तेल, गुड़वाले गुड़ दें । नाई, धोबी आदि अपना काम करें, जिसके बदलेमें उन्हें अन्न मिले । यथासम्भव नकद क्रय- विक्रयके स्थानपर वस्तु- विनिमय होना चाहिये और जिसका
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११३४ मार्क्सवाद और रामराज्य जो परम्पराप्राप्त व्यवसाय है, उसे वही करना चाहिये । इस तरह परस्पर सम्बन्ध स्थापित रखनेमें सुविधा होगी । जहाँतक हो प्रजाको विशुद्ध क्षत्रियवंशका राजा, विद्वान् ब्राह्मण पुरोहित तथा महामात्य बनाना चाहिये । न्यायाध्यक्ष तथा अध्यापकके पदपर भी ब्राह्मणोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सेनापतिके पदपर पवित्र वीर क्षत्रिय तथा सैनिक भी अधिकतर कुलीन क्षत्रिय ही होने चाहिये । कोषाध्यक्ष वैश्य तथा सेवाध्यक्ष शूद्र होने चाहिये । चर्मके व्यापारों तथा यन्त्रोंके अध्यक्ष चर्मकार होने चाहिये । शुचिता ( सफाई ) विभागका अध्यक्ष अन्त्यज होना चाहिये । इसी तरह प्रायः सभी यन्त्र, शिल्प, कल-कारखाने आदिपर शूद्रोंका ही प्राधान्य रहना चाहिये । सर्वसाधारणके व्यवहारमें आनेवाली राष्ट्रकी भाषा हिन्दी होनी चाहिये । पर विशिष्ट विवरणोंमें संस्कृतका प्रयोग आवश्यक है । राजाको उदार, सौम्य, धार्मिक, निर्व्यसन, विद्वान्, शुद्ध तथा रहस्यज्ञ होना चाहिये । उसे वेदान्त, न्याय तथा दण्डनीतिका विद्वान् और अपने दोषोंका ज्ञाता होना चाहिये । कोई काम करनेके पहले उसपर उसे स्वयं तथा मन्त्रियोंके साथ एकान्तमें अच्छी तरह विचार करना चाहिये । किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्यमें शुभ मुहूर्त, नीति और आथर्वणिक प्रयोगोंका उपयोग किया जा सकता है । अच्छा तो यह है कि राजा योग्य व्यक्तियोंद्वारा श्रौतस्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान करता रहे । राजाका कर्तव्य है कि वह अप्राप्त धन, भूमि आदि वस्तु धर्ममार्गसे प्राप्त करे, प्राप्तकी रक्षा करे तथा उन्हें बढ़ाये और फिर उन्हें पात्रोंमें प्रदान भी करे । दत्त वस्तुओंका आगामी राजाओंद्वारा भी पालन होता रहे, इसलिये दान- पत्र आदिका उचित उल्लेख होना चाहिये । राजधानी ऐसे प्रदेशमें भी होनी चाहिये, जो रम्य हो और जहाँ मनुष्योंके लिये अन्न तथा पशुओंके लिये चारा पर्याप्त मिल सके । वहाँ विस्तृत दुर्ग ( किला ) बनवाना चाहिये, जिसमें जन, धनकी पूर्ण रक्षा हो सके । राजाको चाहिये कि वह विद्वान् ब्राह्मणोंके प्रति क्षमाशील, शत्रुओंके प्रति क्रोधयुक्त और भृत्यवर्ग तथा प्रजाओंके प्रति पिताके समान हो । प्रजाके पुण्यका छठा भाग राजाको मिलता है, अतः न्यायसे प्रजाका पालन ही राजाके लिये
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उपसंहार ११३५ सबसे बड़ा धर्म और दान है । अन्यायियोंसे ठीक रक्षा न कर सकनेके कारण प्रजाके पापोंका आधा भाग राजाको मिलता है, अतः उसे सदा सावधान रहना चाहिये । राजनीतिके अयोग्यों, नास्तिकोंके हाथमें जाते ही विद्वानोंके ही मुँह बन्द हो जाते हैं । शुक्राचार्यके पुत्र शण्डामर्क -जैसे योग्य विद्वान् भी हिरण्यकशिपु -जैसोंको ही ईश्वर बतलाने लगते हैं । वे किसी अयोग्य शासकको भी ' त्वमर्कस्त्वं सोमः ' ( शिवमहिम्न० ) कहने लगते हैं । शासकोंसे भयभीत विद्वान् स्पष्ट सत्य कहनेमें हिचकने लगते हैं । आचार्य, साधु -सन्त भी या तो चुप साध लेते हैं या सरकारी साधु -समाजमें प्रविष्ट होकर ईश्वर- गुणगानके बदले सरकारका गुणगान करने लगते हैं । गोहत्या, धर्म -हत्या, शास्त्रहत्या-जैसे जघन्य कृत्योंको होते देखकर भी वे मौन रह जाते हैं और इन सबके प्रवर्तक, प्रेरक सरकारका गुणगान करते हैं । रावणकी मायासे बने अनेकों हनुमान् देखकर जैसे बन्दर भ्रममें पड़ गये कि इनमेंसे कौन रामके हनुमान् हैं, कौन रावणके हनुमान्, उसी तरह जनता भी भ्रममें पड़ जाती है कि कौन रामके साधु-सन्त हैं और कौन सरकारी साधु- सन्त? शास्त्र एवं धर्मके नियन्त्रणशून्य उच्छृंखल शासक जनताके धर्मके साथ धनका भी अपहरण कर लेते हैं । राष्ट्रियकरण, समाजीकरण आदि नामोंसे जनताकी व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदि छीन लेते हैं । जनताके व्यक्ति शासनयन्त्रके नगण्य पुर्जे बन जाते हैं । शासन- यन्त्र तानाशाह शासकोंके हाथका खिलौना बन जाता है । उच्छृंखल शासकोंकी इच्छा ही कानून-कायदा बन जाती है । सनातन सत्य, न्याय, विवेक, शास्त्र- सब लुप्त हो जाते हैं । धनहीन होनेके कारण जनतामें ऐसे शासनके विरोधकी भी शक्ति नहीं रह जाती । आजके सरकारी साधुसमाजका यह प्रस्ताव कि ' साधु-समाज गोहत्याबन्दी आन्दोलनका समर्थन नहीं कर सकता; क्योंकि वह ऐसे अपराधी साधुओंद्वारा चलाया गया है, जिनसे साधु-समाजकी सत्ताको बहुत ठेस पहुँची है ' आँख खोल देनेवाला है । विश्वनाथमन्दिर- हरिजनप्रवेश, हिन्दू-विवाह, तलाक आदि प्रश्नोंपर सरकारी
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११३६ मार्क्सवाद और रामराज्य साधुओं एवं सरकारी पण्डितोंका चुप रहना भी एक विचित्र बात है । आचार्य कहे जानेवाले लोगोंकी भीषण निद्रा या जान- बूझकर आँख मीचनेकी बात भी इसी ओर संकेत करती है कि राजनीतिक विप्लुत होनेके बाद सब विद्याएँ व्यर्थ हो जाती हैं । राजनीतिमें किसका अधिकार? कई लोग कहते हैं कि विद्वानों, महात्माओंको राजनीतिमें नहीं पड़ना चाहिये, परंतु राजनीतिका विद्वान् होना चाहिये । वे समारोहके साथ सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं कि राजनीतिका विद्वान् होना ही विद्वान्का अन्तिम कृत्य है, पर प्रत्यक्ष राजनीतिमें भाग लेना नहीं । वे समर्थ रामदास और चाणक्यकी प्रशंसा करते हुए भी उनके कर्तृत्वको दुर्लक्ष्य करते हैं । वे लोग ' मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्' ( म० शां० ६३ । २८ ) का भी यही अर्थ करते हैं कि ' राजनीतिके जाने बिना त्रयी डूब जाती है । ' पर ' दण्डनीति ' का ' दण्डनीतिज्ञान ' अर्थ करना असंगत है । वे इस बातपर ध्यान नहीं देते कि ब्रह्मज्ञानसे भिन्न सभी ज्ञान परांग ही होते हैं, स्वतन्त्र नहीं । भट्टपादकुमारिलका स्पष्ट कहना है कि ' सर्वत्रैव हि विज्ञानं संस्कारत्वेन गम्यते । पराङ्गं चात्मविज्ञानादन्यमित्यवधार्यताम् ॥ ' ( तन्त्रवार्तिक ) पीछे कहा गया है कि सक्रिय विद्वानोंसे ही राजाको आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीतिका विचार करना चाहिये -' तद्विद्यैस्त- त्क्रियोपेतैश्चिन्तयेत् । ' ( का० नी० २।१ ) ब्रह्मात्मविज्ञान तो स्वसत्तामात्रसे अविद्या, तत्कार्यका निवर्तक होनेसे पुरुषार्थरूप है । ऐसे कतिपय स्थलोंको छोड़कर अन्यत्र सर्वत्र ही ज्ञान कर्तृत्वके बिना सफल नहीं होता । 'जानाति इच्छति अथ करोति ' यह क्रम प्रसिद्ध है । जाननेसे इच्छा होती है, इच्छासे क्रिया होती है । ' यः क्रियावान् स पण्डितः ' ( सुभा० मं० ) की कहावत प्रसिद्ध ही है । प्रयोगहीन शिल्पविज्ञान एवं शस्त्रादि-विज्ञानके तुल्य प्रयोगहीन राजनीति-विज्ञान भी व्यर्थ ही रहता है । क्रियाहीन तर्क -वितर्क एवं ज्ञान-विज्ञान, बुद्धि- व्यवसायमात्र ही रह जाता है ।
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उपसंहार ११३७ रावणके समयमें ज्ञान- विज्ञानवाले ऋषियोंकी कमी न थी । फिर ऋषियोंका वध चालू था । रक्तघटका उपहार देनेपर भी रावणको सन्तोष
नहीं हुआ था । ऋषियोंकी अस्थियोंका पहाड़ लग गया था ।
अस्थि समूह देखि रघुराया । पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाए । सुनि रघुबीर नयन जल छाए ॥
(रा०च ० मा० ३।९ ।६, ८) उस समय विश्वामित्रकी सक्रिय राजनीति ही सफल हुई । उसीके द्वारा राम मैदानमें आये और दुष्टोंका दर्प- दलन करके त्रयी - धर्मकी रक्षा एवं साधु -सत्पुरुषोंका पोषण किया । हाँ, जहाँ राजनीतिके योग्य प्रयोक्ता एवं प्रयोग-साधन ठीक उपलब्ध हों, वहाँ विद्वान् केवल उपदेशमात्र कर सकता है; परंतु जहाँ प्रयोक्ता, प्रयोग-साधन नहीं, वहाँ उनका अन्वेषण एवं निर्माण भी विद्वान्का ही काम है । राजाके अभावमें यह सब उत्तरदायित्व विद्वान्पर ही आता है । ' चाणक्य ' ने यही सब किया था, समर्थ रामदासने भी यही किया । शुक्र, बृहस्पति आदि भी अनेक ढंगसे सक्रिय राजनीतिका प्रवर्तन करते थे । हाँ, विद्वान् राज्याधिकारके प्रलोभनमें न पड़े, यह अवश्य ठीक है । अतः ठीक राजनीति बिना त्रयी एवं तत्प्रोक्त धर्म संकटग्रस्त हो जाता है ।
प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून् ।
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥
(मनु० स्मृ० ९ । ३२७ ) प्रजापतिने सृष्टि रचकर वैश्योंको पशु दिया, ब्राह्मण एवं राजाको सारी प्रजा दी । अतः राजाके अभावमें विद्वानोंपर सर्वाधिक भार आता है । विद्वान् आस्तिक, सद्गृहस्थ एवं साधु-सत्पुरुषोंके बिना राजनीति सर्वथा उच्छृंखल लोगोंके हाथमें चली जाती है, फिर तो गुंडागर्दीका ही शासन होने लगता है । अतः धार्मिक लोगोंके प्रवेशसे ही समस्या हल हो सकती है । यह ठीक है कि ' सच्छिक्षा एवं सद्विद्याके प्रचारसे सद्बुद्धि होती है, सद्बुद्धिसे सदिच्छा एवं सदिच्छासे सत्प्रयत्न होता है और सत्प्रयत्न ही सब प्रकारके सत्फलोंका स्रोत होता है । परंतु आज
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११३८ मार्क्सवाद और रामराज्य तो शिक्षा भी स्वतन्त्र विद्वानोंके हाथमें नहीं है । जिस विचारके शासक हैं, उसी विचारका समर्थन करनेवाली आजकी शिक्षा बनती जा रही है । स्वतन्त्र विद्वान्, स्वतन्त्र विद्यालय एवं उनके छात्र भी सरकारी-शिक्षाके प्रभावसे स्पष्ट ही प्रभावित हैं । कथावाचक मण्डलेश्वर आदि भी उसी ढंगकी कथा कहनेमें लाभका अनुभव करते हैं । घोर नास्तिक उच्छृंखल मिनिस्टरों, सरकारी पदाधिकारियोंकी भी विद्वान्, महन्त, मण्डलेश्वर प्रशंसा करते फिरते हैं । इस दृष्टिसे नास्तिकोंके हाथसे राजनीतिका उद्धार करने योग्य, धार्मिक, सुशील लोगोंके हाथमें राजनीति लानेके लिये विद्वान्का प्रयत्न अत्यावश्यक है ही । महाभारतका स्पष्ट वचन है— क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्तः पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥ ( महा० शां० ६४ । २१ ) परमेश्वरसे सर्वप्रथम राजधर्मका ही आविर्भाव हुआ । उसके पीछे राजधर्मके अंगभूत अन्य धर्मोंका प्रादुर्भाव हुआ । अतः राजधर्म- राजनीतिके नष्ट होनेपर त्रयीधर्मके डूब जानेकी बात आती है । अराजकता या उच्छृंखल राजाके धर्महीन अधार्मिक राज्यमें कोई धर्म पनप ही नहीं सकता । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वके लौकिक- पारलौकिक अभ्युदय एवं निःश्रेयसके सम्पादनमें होनेवाले सब प्रकारके विघ्नोंको रोककर सब प्रकारकी सुविधा उपस्थित करना भारतीय राजधर्म, राजनीति या क्षात्र धर्मका मूलमन्त्र है । भले ही कभी राजनीति राजाओं, राजमन्त्रियों एवं राजकीय पुरुषोंतक ही सीमित रहे, उसमें सर्वसाधारणका प्रवेश आवश्यक भी न ठहरे, तब भी विशिष्ट विद्वानोंके लिये तो कभी भी राजनीति उपेक्ष्य नहीं रही है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वको लौकिक- पारलौकिक- विनाशसे बचाना, उनको अभ्युदय, निःश्रेयस-प्राप्तिसे वंचित होनेसे बचाना क्षात्र या राजाका धर्म है । वही क्षात्रधर्म है, वही राजनीति है । इसीलिये राजाकी प्रशंसा है—