मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1151–1158
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1158
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रामराज्यका स्वरूप ११४९ भी उस समय माता, पिता एवं गुरुजनोंका अनादर नहीं करता था । नन च वाक्यंभूमिहरणंहि वृद्धानामुल्लङ्घयतितत्र परनारीपराङ्मुखाःपुण्यकृत् ॥। नापवादपरो लोको न दरिद्रो न रोगवान् । न स्तेयो द्यूतकारी च मैरेयी पापिनो न हि ॥
न हेमहारी ब्रह्मघ्नो न चैव गुरुतल्पगः ।
न स्त्रीघ्नो न च बालघ्नो न चैवानृतभाषणः ॥
न वृत्तिलोपकश्चासीत् कूटसाक्षी न चैव हि ।
न शठो न कृतघ्नश्च मलिनो नैव दृश्यते ॥
सदा सर्वत्र पूज्यन्ते ब्राह्मणा वेदपारगाः । नावैष्णवोऽव्रती राजन् रामराज्येऽतिविश्रुते ॥ कोई भी वृद्धों ( अपनेसे बड़ों ) की बातका उल्लंघन नहीं करता था । सब पुण्यकर्मा थे । कोई किसीकी भूमि नहीं छीनता था । सभी पर- स्त्रीसे विमुख रहते थे । [ रामराज्यमें ] लोग किसीकी निन्दा नहीं करते थे । न कोई दरिद्र था, न रोगी । कोई चोर नहीं था, जुआरी कोई नहीं था, कोई शराबी नहीं था । कोई भी पापी नहीं था । [ स्वर्णकारों तथा अन्योंमें ] कोई स्वर्णचोर नहीं था, ब्रह्महत्यारा कोई नहीं था, गुरुकी पत्नीसे कोई कदाचार नहीं करता था । न कोई स्त्रीहन्ता था, न बाल- हत्यारा और न कोई झूठ बोलनेवाला था । कोई किसीकी जीविकाका नाश नहीं करता था । कोई झूठी गवाही नहीं देता था । कोई दुष्ट, कृतघ्न या मलिन रामराज्यमें दिखता ही नहीं था । उस अत्यन्त प्रसिद्ध रामराज्यमें वेदोंके पारंगत ब्राह्मण सर्वदा सर्वत्र पूजे जाते थे । पूरे राज्यमें कोई ऐसा नहीं था, जो भगवद्भक्त न हो अथवा व्रत ( संयम -नियम) -का पालन न करता हो । ( घ ) श्रीरामचरितमानस
राम राज बैठें त्रैलोका । हरषित भए गए सब सोका ॥
बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो
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११५० मार्क्सवाद और रामराज्य गये, उनके सारे शोक जाते रहे । कोई किसीसे वैर नहीं करता । श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता ( आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी ।
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥
सब लोग अपने - अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद- मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं । उन्हें न किसी बातका
भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है ।
दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥
राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा । सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ॥
नहिं दरिद्र कोठ दुखी न दीना । नहिं कोड अबुध न लच्छन हीना ॥
सब निर्दभ धर्मरत पुनी । नर अरु नारि चतुर सब गुनी ॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी । सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ॥
' रामराज्य ' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते । सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति ( मर्यादा) - में तत्पर रहकर अपने - अपने धर्मका पालन करते हैं । धर्म अपने चारों चरणों ( सत्य, शौच, दया और दान) -से जगत्में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है । पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति ( मोक्ष ) -के अधिकारी हैं । छोटी अवस्थामें मृत्यु नहीं होती, न किसीको कोई पीड़ा होती है । सभीके शरीर सुन्दर और नीरोग हैं । न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है । न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है । सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं । पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं । सभी गुणोंका आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं । सभी कृतज्ञ ( दूसरेके किये हुए उपकारको माननेवाले ) हैं, कपट- चतुराई ( धूर्तता ) किसीमें नहीं है ।
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रामराज्यका स्वरूप ११५१
सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक हैं । सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं । इसी प्रकार स्त्रियाँ
भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं ।
हरषित रहहिं नगर के लोगा । करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा ॥
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं । श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं ॥
नगरके लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकारके देवदुर्लभ ( देवताओंको भी कठिनतासे प्राप्त होनेयोग्य ) भोग भोगते हैं । वे दिन- रात ब्रह्माजीको मनाते रहते हैं और [उनसे ] श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रीति
चाहते हैं ।
सब कें गृह गृह होहिं पुराना । राम चरित पावन बिधि नाना ॥
नर अरु नारि राम गुन गानहिं । करहिं दिवस निसि जात न जानहिं ॥
सबके यहाँ घर - घरमें पुराणों और अनेक प्रकारके पवित्र रामचरित्रोंकी कथा होती है । पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजीका गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन -रातका बीतना भी नहीं जान पाते ।
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज ।
सहस सेष नहिं कहि संकहिं जहँ नृप राम बिराज ॥
जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-सम्पत्तिके समुदायका वर्णन हजारों शेषजी
भी नहीं कर सकते ।
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं । बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥
भज प्रनत प्रतिपालक रामहि । सोभा सील रूप गुन धामहि ॥
लोग जहाँ- तहाँ श्रीरघुनाथजीके गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरेको यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करनेवाले श्रीरामजीको भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजीको भजो ।
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११५२ मार्क्सवाद और रामराज्य सहायक पुस्तकोंकी सूची लेखक पुस्तकका( नाम ) १. मार्क्स कैपिटल मराठी अनुवाद भारत-सम्बन्धी लेख २. 29 ऐतिहासिक भौतिकवाद.४३.. स्टालिन" लेनिनवाद अराजकतावाद या समाजवाद ५. 17 अक्टूबरकी क्रान्ति और कम्यु- ६. "" निस्टोंकी कार्यनीति ७. मार्क्सवाद और जातियोंका प्रश्न (अनुवादक ओमप्रकाश ) लेनिनवादकी समस्याएँ ८. " ९. मार्क्सवाद और भाषा- शास्त्र कम्युनिस्टपार्टीका इतिहास १०. 27 (अनु० - रामविलास शर्मा ) कम्युनिस्टपार्टीका घोषणापत्र ११.?? १२. फ्रेड्रिक एंजिल्स समाजवाद काल्पनिक और वैज्ञानिक १३. परिवार, व्यक्ति, सम्पत्ति और राज- सत्ताकी उत्पत्ति कार्लमार्क्स और उनके सिद्धान्त १४.?? (अनु० - रामबालक शर्मा ) मार्क्सवाद क्या है? १५. " ( अनु० - ओमप्रकाश ) समाजवाद और व्यक्ति.१६.?? (अनु०- नरेन्द्र) १७. भूपेन्द्रनाथ सान्याल मार्क्सका दर्शन १८. सत्यभक्त कार्लमार्क्स १ ९. यशपाल मार्क्सवाद २०. त्रिलोकीनाथ मिश्र यूनानका राजदर्शन २१. डॉक्टर गणेशप्रसाद राजनीतिक विचारधाराएँ (प्रथम -संस्करण) २२. कन्हैयालाल वर्मा पाश्चात्य राज्यदर्शन ( - ) २३. स्पेंसर ज्ञेय मीमांसा अनु० कन्नमूल २४. रघुनन्दन शर्मा वैदिक सम्पत्ति
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