मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1141–1150

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150

पृष्ठ 1141

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उपसंहार ११३९ ' नराणां च नराधिपम्' ( गी० १० । २७ ) ' नाविष्णुः पृथिवीपतिः । ' (दे० भा० ) ' महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति । ' (मनु० ७।८ ) ' राजा ईश्वररूप है, नरोंमें नराधिप ईश्वरीय विभूति है, विष्णुसे अतिरिक्त पृथ्वीपति नहीं हो सकता, वह कोई मनुष्यरूपमें विशेष दिव्य शक्ति है इत्यादि । ' इस प्रकारके राजधर्मका पालन श्रुताध्ययनसम्पन्न धर्मज्ञ, सत्यवादी, रागद्वेषविहीन विद्वानोंकी सहायता बिना राजा भी नहीं कर सकता । इसीलिये राजाके लिये आवश्यक है कि वह ऐसे विद्वानोंको अपना सभासद् बनाये- श्रुताध्ययनसम्पन्ना धर्मज्ञाः सत्यवादिनः । राज्ञा सभासदः कार्या रिपौ मित्रे च ये समाः ॥ ( याज्ञवल्क्यस्मृति २ । २ ) शासनारूढ शासककी भूल प्रमादको रोकनेके लिये परम निरपेक्ष विरक्त विद्वान् भी लोककल्याण-कामनासे राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे । इतना ही नहीं, कभी -कभी तो वेन-जैसे अन्यायी राजाको, जो समझाने-बुझानेसे भी न माने, शासनाधिकारसे च्युत या नष्ट भी कर देते थे एवं उनके स्थानमें पृथु -जैसे योग्य शासकको प्रतिष्ठित करते थे । यह भी लोक- कल्याणार्थ विद्वानोंके राजनीतिमें हस्तक्षेपका उदाहरण है । ' इतिहास ' बतलाता है कि संसारके प्रमुख राजनीतिज्ञ शासकोंने अपनी राजनीतिकी बागडोर तप: पूत, लोक- हितैषी, राग- द्वेषविहीन ऋषियोंके ही हाथमें दे रखी थी । देवराज इन्द्रकी राजनीति देवगुरु बृहस्पतिके हाथमें थी, दैत्यराज बलिकी राजनीति महर्षि शुक्राचार्यके हाथमें थी तथा रामचन्द्रकी राजनीति वसिष्ठके हाथमें थी । धर्मराज युधिष्ठिरकी राजनीति धौम्य, व्यास, कृष्ण, विदुर आदिके हाथमें थी । चन्द्रगुप्तकी राजनीति महर्षि चाणक्यके हाथमें थी तथा शिवाकी राजनीति भी समर्थ रामदासके हाथमें थी । वस्तुतः जैसे बिना अंकुशके हस्ती, बिना लगामके घोड़ा आदि हानिकारक होते हैं, वैसे ही अंकुश एवं नियन्त्रणके बिना शासन भी हानिकारक होता है । राज्यश्रीसम्पन्न राजापर भी अंकुश होना ही चाहिये । इसी अर्थमें राजापर

पृष्ठ 1142

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११४० मार्क्सवाद और रामराज्य धर्मका नियन्त्रण होना चाहिये । यही बृहदारण्यक ' क्षत्रस्य क्षत्रम्' ( १।४।१४ ) के अनुसार धर्मनियन्त्रित राजतन्त्रका सिद्धान्त है । धर्म-कर्म, संस्कृति, धर्मसंस्थाकी रक्षा तभी हो सकती है, जब धर्म -नियन्त्रित शासक हो । अन्यथा उच्छृंखल शासक सबको ही चौपट कर देता है । सत्पुरुषोंसे एक निवेदन कुछ लोग कहते हैं कि उपासना या ज्ञान तो मनकी चीज है । सब कुछ गड़बड़ होनेपर भी महात्मा या विद्वान्‌को इन टंटोंसे दूर रहकर भजन ही करना चाहिये । ठीक है, परंतु शास्त्र एवं धर्म-स्थान नष्ट हो जानेपर विद्वानों या महात्माओंका शण्डामर्कके तुल्य सरकारीकरण हो जानेपर भजन करनेका, धार्मिक होनेका मन भी कैसे बन सकेगा? आखिर धार्मिक, आध्यात्मिक भावनाओंसे ओतप्रोत मन भी तो शास्त्रों एवं सत्पुरुषोंकी कृपासे ही बनता है, बिना शास्त्रादिके वैसा मन भी नहीं बन सकता है । यदि प्रह्लादने भी यही सोचा होता कि चलो पितासे विवाद कौन करे? मनमें ही रामनाम जपते रहेंगे, ऊपरसे पिताकी ही बात मान लें तो आज कोई राम-नाम लेनेवाला रह सकता था? परंतु जब सच्चाई साथ प्रह्लादने अपने जीवनको संकटमें डालकर भी सिद्धान्तकी रक्षा की, तभी संसारमें सिद्धान्तकी स्थिरता रह सकी है । इस तरह विद्वान् एवं महात्मा राजतन्त्र शासनमें भी राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे, फिर अब तो जनतन्त्र- शासन है । इस सिद्धान्तके अनुसार तो शासनकी सर्वोच्च सत्ता जनतामें ही निहित होती है । अतः वास्तविक राजा जनता ही होती है, अतः राजनीतिक दक्षता सम्पादन करना प्रत्येक व्यक्तिका परम कर्तव्य है, फिर तो जनताके धन एवं धर्मकी रक्षाका उत्तरदायित्व जनतापर ही होता है । इसलिये जनताके प्रत्येक व्यक्तिका कर्तव्य होता है कि वह उदारता, गम्भीरता और दक्षताके साथ राष्ट्र एवं धर्मका हिताहित देखकर कर्तव्यका निर्धारण एवं पालन करे । जहाँ न राजतन्त्र हो, न जनतन्त्र हो; किंतु अधिनायकतन्त्र डिक्टेटरशिप हो, वहाँपर तो विशिष्ट दक्ष राजनीतिज्ञ विद्वानों एवं महात्माओंके सिवा दूसरा कोई कुछ कर ही नहीं सकता है । जनताका संग्रह, उसे प्रोत्साहन देना एवं क्रान्तिके लिये उसे तैयार

पृष्ठ 1143

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उपसंहार ११४१ करना भी राजनीतिज्ञोंके ही वशकी बात है । ऐसे समयमें धर्म एवं धर्मशास्त्रोंकी रक्षाके लिये विद्वानोंको सामने आना पड़ता है । इसी

अभिप्रायसे कहा गया है- स्थापयध्वमिमं मार्गं प्रयत्नेनापि हे द्विजाः ।

स्थापिते वैदिके मार्गे सकलं सुस्थिरं भवेत्॥

( सूतसंहिता, ज्ञानयोगखं० २० । ५४ ) विद्वानोंको वैदिक - धर्मकी स्थापनाके लिये सुदृढ़ प्रयत्न करना चाहिये । वैदिक- धर्मके स्थिर होनेपर सब कुछ स्थिर हो जायगा । यहीं यह भी कहा गया है कि ' जो समर्थ होनेपर भी सर्वप्रकारसे धर्मरक्षार्थ प्रयत्नशील नहीं होता, वह पापका भागी होता है । माता-पिताके, गुरुजनोंके या जनसमूहके धन- धर्म एवं प्राणोंका विनाश हो रहा हो, कोई समर्थ पुरुष बैठे - बैठे तमाशा देखे, कुछ प्रयत्न न करे, यह प्रत्यक्ष ही पाप है—

यश्च स्थापयितुं शक्तो नैव कुर्याद् विमोहितः ।

तस्य हन्ता न पापीयानिति वेदान्तनिर्णयः ॥

( सूतसंहिता २ । २० । ५५ ) किंतु जो समर्थ न होनेपर भी यथाशक्ति धर्मशास्त्र - मर्यादाकी रक्षाके लिये प्रयत्न करता है, वह उसी पुण्यके प्रभावसे सब पापोंसे मुक्त होकर सम्यक् ज्ञानका भागी होता है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि यम कहे जाते हैं । यह निवृत्तिमार्गानुसारियोंके लिये बड़े ही महत्त्वके हैं । शौच, सन्तोष, स्वाध्याय आदिमें कुछ गड़बड़ी क्षम्य भी हो सकती है, परंतु यमके सेवनमें तो पूर्ण तत्परता होनी चाहिये । इसीलिये कहा गया है — ' यमान् सेवेत सततं नियमान् मत्परः क्वचित्' ( श्रीमद्भा० ) यमोंका सेवन सर्वदा ही करना चाहिये । नियमोंमें सातत्य न होनेपर भी काम चल सकता है । अहिंसा आदिका अभिप्राय है- मनसा-वाचा- कर्मणा प्राणिरक्षण करना, प्राणियोंको पीड़ा न पहुँचाना । यही लोकरक्षण, प्राणिरक्षण, धर्मरक्षण राजनीतिका मुख्य लक्ष्य है, यही क्षत-त्राण है । इसी कारण महात्माओंकी इन कार्योंमें प्रवृत्ति होती थी ।

पृष्ठ 1144

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११४२ मार्क्सवाद और रामराज्य कालकवृक्षीय-जैसे अरण्यवासी, चाणक्य-जैसे बालब्रह्मचारी, समर्थ स्वामी -जैसे निवृत्तिनिष्ठ लोग भी इस काममें संलग्न हुए । फिर भले ही इस काममें सफलता मिले अथवा न मिले, समुचित प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता । उसका अदृष्ट फल तो अवश्य ही प्राप्त हो जाता है, तभी तो भगवान् कृष्णने कहा था- यः स्थापयितुमुद्युक्तः श्रद्धयैवाक्षमोऽपि सन्। सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग् ज्ञानमवाप्नुयात्॥ धर्मकार्यं यतञ्छक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः । प्राप्तो भवति तत् पुण्यमत्र मे नास्ति संशयः ॥ ( महा० उद्यो० ९ ३ । ६ ) इन सब बातोंसे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान दुरवसरपर जबकि जनताके धन- धर्मपर संकट उपस्थित है, विशिष्ट विद्वानों, महात्माओं तथा धार्मिक सद्-गृहस्थोंको भी राजनीतिसे न डरकर आगे आना चाहिये और धर्म -रक्षणके लिये जो भी आवश्यक कार्य हो करना चाहिये । परिणाम निश्चयेन शुभ- मंगलमय ही होगा । शिवमिति दिक् ।

पृष्ठ 1145

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परिशिष्ट भगवान् श्रीरामके द्वारा उपदिष्ट राजनीति शुक्राचार्यजी अपने ' नीतिसार ' में लिखते हैं कि श्रीरामके समान नीतिमान् राजा पृथ्वीपर न कोई हुआ और न कभी होना सम्भव ही है— 'न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् । ' (शुक्र० ५।५७) [ श्रीराम लक्ष्मणजीसे कहते हैं- ]

न हि स्वसुखमन्विच्छन् पीडयेत् कृपणं जनम् ।

कृपणः पीड्यमानो हि मन्युना हन्ति पार्थिवम्॥

राजाको चाहिये कि वह अपने लिये सुखकी इच्छा रखकर दीन-दुःखी लोगोंको पीड़ा न दे; क्योंकि सताया जानेवाला मनुष्य दुःखजनित क्रोधके द्वारा अत्याचारी राजाका विनाश कर डालता है । अहिंसा सूनृता वाणी सत्यं शौचं दया क्षमा । वर्णिनां: लिङ्गिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते ॥ प्रजा समनुगृह्णीयात् कुर्यादाचारसंस्थितिम् । वाक्सूनृता दया दानं दीनोपगतरक्षणम्॥

इति सङ्गः सतां साधु हितं सत्पुरुषव्रतम् ।

आधिव्याधिपरीताय अद्य श्वो वा विनाशिने ॥

को हि राजा शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् । किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना- कष्ट न पहुँचाना, मधुर वचन बोलना, सत्यभाषण करना, बाहर और भीतरसे पवित्र रहना एवं शौचाचारका पालन करना, दीनोंके प्रति दयाभाव रखना तथा क्षमा ( निन्दा आदिको सह लेना) – ये चारों वर्णों तथा आश्रमोंके सामान्य धर्म क

पृष्ठ 1146

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११४४ मार्क्सवाद और रामराज्य गये हैं । राजाको चाहिये कि वह प्रजापर अनुग्रह करे और सदाचारके पालनमें संलग्न रहे । मधुर वाणी, दीनोंपर दया, देश- कालकी अपेक्षासे सत्पात्रको दान, दीनों और शरणागतोंकी रक्षा तथा सत्पुरुषोंका संग- ये सत्पुरुषोंके आचार हैं । यह आचार प्रजा- संग्रहका उपाय है, जो लोकमें प्रशंसित होनेके कारण श्रेष्ठ है तथा भविष्यमें भी अभ्युदयरूप फल देनेवाला होनेके कारण हितकारक है । यह शरीर मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे घिरा हुआ है, आज या कल इसका विनाश निश्चित है । ऐसी दशामें इसके लिये कौन राजा धर्मके विपरीत आचरण करेगा? ' शुचिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवताः सदा । देवतावद् गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम्॥ ' बाहर और भीतरसे शुद्ध रहकर राजा आस्तिकता ( ईश्वर तथा परलोकपर विश्वास ) -द्वारा अन्तःकरणको पवित्र बनाये और सदा देवताओंका पूजन करे । गुरुजनोंका देवताओंके समान ही सम्मान करे तथा सुहृदोंको अपने तुल्य मानकर उनका भलीभाँति सत्कार करे । ' अनिन्दा परकृत्येषु स्वधर्मपरिपालनम् । कृपणेषु दयालुत्वं सर्वत्र मधुरा गिरः ॥ प्राणैरप्युपकारित्वं मित्रायाव्यभिचारिणे । गृहागते परिष्वङ्गः शक्त्या दानं सहिष्णुता ॥ स्वसमृद्धिष्वनुत्सेकः परवृद्धिष्वमत्सरः । नान्योपतापि वचनं मौनव्रतचरिष्णुता ॥ बन्धुभिर्बद्धसंयोगः सुजने चतुरश्रता । तच्चित्तानुविधायित्वमिति वृत्तं महात्मनाम्॥ ' दूसरे लोगोंके कृत्योंकी निन्दा या आलोचना न करना, अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुरूप धर्मका निरन्तर पालन, दीनोंके प्रति दया, सभी लोकव्यवहारोंमें सबके प्रति मीठे वचन बोलना, प्राण देकर भी अपने अनन्य मित्रका उपकार करनेके लिये उद्यत रहना, घरपर आये हुए मित्र

पृष्ठ 1147

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भगवान् श्रीरामके द्वारा उपदिष्ट राजनीति ११४५ या अन्य सज्जनोंको भी हृदयसे लगाना—उनके प्रति अत्यन्त स्नेह एवं आदर प्रकट करना, आवश्यकता हो तो उनके लिये यथाशक्ति धन देना, लोगोंके कटु व्यवहार एवं कठोर वचनको भी सहन करना, अपनी समृद्धिके अवसरोंपर निर्विकार रहना ( हर्ष या दर्पके वशीभूत न होना ), दूसरोंके अभ्युदयपर मनमें ईर्ष्या या जलन न होना, दूसरोंको ताप देनेवाली बात न बोलना, मौनव्रतका आचरण ( अधिक वाचाल न होना), बन्धुजनोंके साथ अटूट सम्बन्ध बनाये रखना, सज्जनोंके प्रति चतुरश्रता ( अवक्र - सरलभावमें उनका समाराधन ), उनकी हार्दिक सम्मति अनुसार कार्य करना- ये महात्माओंके आचार हैं । ' आजीव्यः सर्वसत्त्वानां राजा पर्जन्यवद्भवेत्।

आयद्वारेषु सर्वेषु कुर्यादाप्तान् परीक्षितान् ।

आददीत धनं तैस्तु भास्वानुस्त्रैरिवोदकम्॥

' राजा मेघकी भाँति समस्त प्राणियोंको आजीविका प्रदान करनेवाला हो । उसके यहाँ आयके जितने द्वार ( साधन ) हों, उन सबपर वह विश्वस्त एवं परीक्षित किये गये लोगोंको नियुक्त करे । जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीसे जल लेता है, उसी प्रकार राजा उन आयुक्त पुरुषोंद्वारा धन ग्रहण करे । '

साम दानं च भेदश्च दण्डोपेक्षेन्द्रजालकम् ।

मायोपायाः सप्त परे निक्षिपेत् साधनाय तान् ॥

' साम, दान, दण्ड, भेद, उपेक्षा, इन्द्रजाल और माया — ये सात उपाय हैं; इनका शत्रुके प्रति प्रयोग करना चाहिये । इन उपायोंसे शत्रु ' [ ]वशीभूत हो जाता है । अग्निपुराण

पृष्ठ 1148

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रामराज्यका स्वरूप ' रामराज्य ' शासन एवं प्रशासनका परम आदर्शस्वरूप है । धर्म एवं ईश्वरभक्ति— ये रामराज्यके प्राण हैं । शासनकी सुव्यवस्था, प्रजाकी सुखमयता और सम्पन्नता, अनुशासन एवं सदाचार- ये रामराज्यरूपी शरीरके अवयव हैं । रामराज्यके स्वरूपका वर्णन वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, पुराणों एवं श्रीरामचरितमानस आदिमें विस्तृत रूपसे उपलब्ध होता है । उसका कुछ अंश यहाँ साररूपमें प्रस्तुत किया जा रहा है— ( क ) अध्यात्मरामायण राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ । वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तश्च भूरुहाः ॥ जना धर्मपराः सर्वे पतिभक्तिपराः स्त्रियः । नापश्यत् पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥ त्रिलोकीनाथ लक्ष्मीपति भगवान् रामके शासनकालमें पृथिवी धन- धान्यसे पूर्ण और वृक्ष फलादिसे सम्पन्न थे । श्रीरघुनाथजीके राज्यमें समस्त पुरुष धर्मपरायण थे, स्त्रियाँ पति सेवामें तत्पर रहती थीं और किसीको भी अपने पुत्रका मरण नहीं देखना पड़ता था । ( ख ) आनन्दरामायण रामराज्य सदानन्दः सर्वानासीज्जनान् भुवि । नासीत्राज्यमासीदसापत्नंकुत्रापि कलहश्चौर्यं समृद्धबलवाहनम्निन्दाभयं तदा ।॥ ऋषिभिर्हृष्टपुष्टैश्च रम्यं हाटकभूषणैः ॥ सञ्जुष्टमिष्टापूर्तानां धर्माणां नित्यकर्तृभिः । सदा सम्पन्नशस्यं च सुचिरं क्षेत्रसङ्कुलम् ॥

सुदेशं सुप्रजं सुस्थं सुतृणं बहुगोधनम् । देवतायतनानां च राजिभिः परिराजितम्॥

रामचन्द्रजीके राज्यमें संसारके सब लोगोंको सदा आनन्द रहता था । उस समय न कहीं चोरी होती, न लड़ाई - झगड़ा होता, न कोई किसीकी निन्दा

पृष्ठ 1149

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रामराज्यका स्वरूप ११४७ करता और न कोई किसीसे डरता था । राज्य भी उस समय शत्रुओंसे रहित और विविध प्रकारके वाहन तथा सेनासे परिपूर्ण था । रामराज्यमें प्रजाजन हृष्ट - पुष्ट, ज्ञानी और सोने - चाँदीके गहनोंसे लदे रहते थे । इष्ट - आपूर्त आदि धार्मिक कृत्य होते रहते थे और सारे खेत धान्यसे परिपूर्ण रहा करते थे । भाव यह है कि उस समय समस्त देश सुन्दर था, प्रजा अच्छी थी और रहन-सहन उत्तम था । गौओंके चरनेको सुन्दर घास उपजती थी । गोधनकी अधिकता थी । सारा देश देवालयोंसे भरा पड़ा था ।

धर्मेण राजा धर्मज्ञः सीतारामः प्रतापवान्।

चकार राज्यं निर्द्वन्द्वमयोध्यायां सुनिश्चलम् ॥

स धर्मराजवद राजा धर्माधर्मविवेचकः ।

अदण्ड्येऽदण्डयन् रामो दण्ड्यांश्च परिदण्डयन् ॥

ततापसोमवत् सूर्य सुहृदामासीन्मानसेषुइव स दुर्हृदां हृदिस्वकेष्वपिनेत्रयोः ।॥ हृष्टपुष्टाः प्रजाः सर्वाः फलवन्तोऽभवन्नगाः । एकपत्नीव्रताःआसन् सदा सुकुसुमैर्विनम्राःसर्वे पुमांसस्तस्यसौख्यदा मण्डलेनृणाम्॥। नारीषु काचिन्नैवासीदपतिव्रतधर्मिणी ॥ एवं तद्रामराज्यं महामङ्गलसंयुतम् । आसीदनुपमेयं च श्रवणान्मङ्गलप्रदम्॥ धर्मका तत्त्व जाननेवाले प्रतापशाली श्रीसीतासहित रामचन्द्रजीने अविचल एवं निर्द्वन्द्वभावसे धर्मपूर्वक राज्य किया । महाराज रामचन्द्रजी धर्मराजकी तरह भलीभाँति धर्म- अधर्मकी विवेचना करके काम करते थे । जो दण्डके योग्य नहीं होता था, उसे दण्ड नहीं देते थे । वे शत्रुओंके हृदय तथा नेत्रोंमें सदा सूर्यकी भाँति तपते थे और स्वजनों एवं मित्रोंके हृदयमें चन्द्रमाकी तरह ठंडक पहुँचाते थे । रामके शासनकालमें अयोध्याकी प्रजा हृष्ट- पुष्ट रहती थी और वृक्ष फल- फूलसे लदे रहनेके कारण झुके रहते तथा वे मनुष्योंको सुखी रखते थे । उनके राज्यमें सभी पुरुष

पृष्ठ 1150

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११४८ मार्क्सवाद और रामराज्य एकपत्नीव्रती थे और स्त्रियोंमें भी कोई ऐसी नहीं थी, जो अपने पातिव्रतधर्मका पालन न करती रही हो । इस प्रकार वह रामका राज्य महामंगलमय, अनुपमेय और नाममात्र सुननेसे ही महामंगलदायक था । स्कन्दपुराण रामराज्ये तदा( ग ) लोका हर्षनिर्भरमानसाः । बभूवुर्धनधान्याढ्याः पुत्रपौत्रयुता नराः ॥ कामवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि गुणवन्ति च।

गावस्तु घटदोहिन्यः पादपाश्च सदाफलाः ॥ नाधयो व्याधयश्चैव रामराज्ये नराधिप ।

नार्यः पतिव्रताश्चासन् पितृभक्तिपरा नराः ॥

द्विजा वेदपरा नित्यं क्षत्रिया द्विजसेविनः ।

कुर्वते वैश्यवर्णाश्च भक्तिं द्विजगवां सदा ॥

न योनिसङ्करश्चासीत् तत्र नाचारसङ्करः ।

न वन्ध्या दुर्भगा नारी काकवन्ध्या मृतप्रजा ॥

विधवा नैव काप्यासील्लप्यते न सभर्तृका ।

नावज्ञां कुर्वते केऽपि मातापित्रोर्गुरोस्तथा ॥

उस समय श्रीरामके राज्यमें सब लोगोंका मन हर्षोत्फुल्ल रहता था । धन- धान्यसे सब सम्पन्न थे और सभी लोगोंके पुत्र - पौत्र थे । बादल इच्छानुसार जलवर्षा करते थे । अन्न बहुत गुणवान् होता था । गायें पूरा घड़ाभर दूध देती थीं । वृक्ष सभी ऋतुओंमें फले रहते थे । श्रीरामके राज्यमें न किसीको कोई शारीरिक रोग होता था, न मानसिक चिन्ता । स्त्रियाँ पतिव्रता थीं और पुरुष पितृभक्त थे । ब्राह्मण सदा वेदाध्ययनमें तत्पर रहते थे, क्षत्रिय ब्राह्मणसेवी थे; तथा वैश्य सदा गौ-ब्राह्मणोंकी भक्ति करते थे । उस रामराज्यमें वर्णसंकर संतान नहीं उत्पन्न होती थी और न कर्मोंका ही संकर था । कोई स्त्री वन्ध्या, केवल एक संतान उत्पन्न करनेवाली, अभागिनी या जिसकी संतान होते ही मर जाय, ऐसी नहीं थी । कोई स्त्री विधवा नहीं थी । सधवा स्त्रीको कभी विलाप नहीं करना पड़ता था । कोई