मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 171–180

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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आधुनिक विचारधारा १६७ मार्क्सका जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवारमें हुआ । पहले उसने वकालतकी शिक्षा ग्रहण की । फिर वह पत्रकार बना, समय पाकर उसने ' हीगेलवाद ' का अध्ययन किया । मानवतावादसे प्रेरित होकर वह श्रमिक आन्दोलनमें अग्रसर हुआ और शीघ्र ही आन्दोलनका नेता बन गया । उसकी जीविकाका आधार उसके लेख एवं एंजिल्सकी सहायता ही थी । गरीबी अवस्थामें भी उसने अपना ध्येय नहीं त्यागा । अफलातून, अरस्तू, हीगेलकी श्रेणीमें ही वह भी उच्च दार्शनिक गिना जाता है । ' पावर्टी ऑफ फिलॉसफी ' ' मेनिफेस्टो ऑफ कम्युनिस्ट पार्टी ' ' एटीन्थ ब्रूमेयर ऑफ लुई बोनापार्ट ' ' ए कंट्रिब्यूशन टु दी क्रिटिक ऑफ पोलेटिकल इकोनॉमी ' ' दास कैपिटल ' ' सिविल वार इन फ्रांस ' ' दी गोथा प्रोग्राम ' ' क्लास स्ट्रगल इन फ्रांस ' ' रेवेल्यूशन एण्ड काउण्टर रेवेल्यूशन ' आदि उसके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं । एंजिल्स एक धनी व्यवसायी कुटुम्बमें जन्मा था । उसका पिता प्रशाका एक व्यवसायी था । युद्धमें एंजिल्स ब्रिटेनके व्यवसायी नगर मेनचेस्टरमें रहने लगा । वह स्वयं एक मिलमालिक था । उसने मार्क्सको आर्थिक, बौद्धिक दोनों ही प्रकारकी आजन्म सहायता दी । मार्क्सकी मृत्युके बाद कम्युनिस्ट आन्दोलनका नेतृत्व उसने ही किया । उसने मार्क्सके सिद्धान्तोंको विज्ञान तथा दर्शनपर लागू किया । उसकी कई पुस्तकें प्रसिद्ध हैं । लेनिन क्रान्तिकारी वॉलशेविक दलका जन्मदाता हुआ । २०वीं शताब्दीमें रूसके समाजवादी जनतान्त्रिकदलमें दो पक्ष हो गये । एक वॉलशेविक, दूसरा मेनशेविक । वॉलशेविक दल पहले क्रान्तिकारी था, लेनिन उसका नेता था । बहुत संघर्षोंके बाद १ ९ १७ में उसके नेतृत्वमें समाजवादी क्रान्ति हुई और जीवनपर्यन्त वह सोवियत-शासनका प्रमुख सूत्रधार बना रहा । उसकी सारी कृतियाँ ग्यारह ग्रन्थोंमें संकलित हैं । मार्क्सके दर्शनको द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ( डाइलेक्टिकल मेटिरियलिज्म ) या ऐतिहासिक भौतिकवाद ( हिस्टॉरिकल मेटेरियलिज्म ) भी कहा जाता है । यह द्वन्द्वात्मक दृष्टिसे प्राकृतिक घटनाओंकी परख और पहचान करता है । भौतिकवादी दृष्टिसे प्राकृतिक घटनाओंकी

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१६८ मार्क्सवाद और रामराज्य व्याख्या, कल्पना तथा सिद्धान्तकी विवेचना करता है । स्टालिनके मतानुसार ' मार्क्सवाद अन्धश्रद्धा नहीं है । ' अतः उसकी व्याख्या समयानुसार बदलती रहती है । साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रान्तियुगमें लेनिनने उसकी पुनः व्याख्या की थी । इसीलिये लेनिनवादको प्रधानरूपसे सर्वहाराके अधिनायकत्वका दर्शन कहा जाता है । इतिहास और समाजकी आर्थिक व्याख्या, मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्यका सिद्धान्त वर्ग संघर्ष तथा सर्वहाराका अधिनायकत्व उसके दर्शनके मुख्य विषय हैं । मार्क्सने निम्नलिखित वस्तुओंको सिद्ध किया— १. वर्गोंका अस्तित्व उत्पादन व्यवस्थाके अनुकूल होता है । दासताके युगमें वर्गोंका अस्तित्व और संघर्ष उस युगकी उत्पादन व्यवस्थाके अनुकूल था । इसी तरह सामन्तशाही एवं पूँजीवादी युगोंमें इनका अस्तित्व तथा संघर्ष इन युगोंके उत्पादनके अनुकूल था । २. वर्ग- संघर्ष अनिवार्य रूपसे सर्वहारा दलके अधिनायकत्वका मार्ग प्रशस्त करता है । ३. यह अधिनायकत्व संक्रमणकालिक होगा । इसके बाद वर्गोंका अन्त हो जायगा और एक वर्गविहीन समाजका जन्म होगा । हीगेलका द्वन्द्ववाद, ब्रिटेनका अर्थशास्त्र, फ्रांसका समाजवादी दर्शनके अध्ययनद्वारा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादके नामसे उसने नये दर्शनका आविर्भाव किया । हीगेलके द्वन्द्ववादमें विचारका प्रमुख स्थान है । उसके मतानुसार ‘ बाह्य जगत् आन्तरिक विचारोंका ही प्रतिबिम्ब है, परंतु मार्क्सने भौतिक संसारकी ही सत्ता मानी है और उसे आन्तरिक विचारोंका जनक माना है । इस प्रकार दोनोंके द्वन्द्वात्मक प्रणालीमें भेद है । प्रायः इतिहासकार मनुष्यको ही सर्वश्रेष्ठ स्थान देते आये हैं । इतिहासमें परिवर्तन अपूर्व बुद्धि मनुष्योंद्वारा ही मानते आये हैं, परंतु मार्क्सवादके अनुसार इतिहासकी प्रगतिमें सर्वप्रधान है अर्थव्यवस्था । आर्थिक ढाँचेपर ही एक युगका सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ढाँचा आश्रित होता है । उत्पादनके साधन और उत्पादनके सम्बन्ध ही आर्थिक ढाँचा हैं । इतिहासके परिवर्तनमें मनुष्यका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, परंतु वह

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आधुनिक विचारधारा १६९ परिस्थितियोंका दास होता है । उसके विचार भी उन्हीं परिस्थितियोंपर आश्रित रहते हैं । एक व्यक्ति नेता तभी बन सकता है, जब उसकी योजनाएँ तत्कालीन परिस्थितियोंके अनुसार होती हैं । ' अपनी परिस्थिति, अपनी सम्पत्ति, विपत्तिकी प्रतिक्रिया ही आधुनिक दार्शनिकोंका दर्शन होता है । वे अपने सुख - दुःख, राग-द्वेषके संस्कारोंसे घिरे हुए होते हैं । अतः जैसे लाल-पीले चश्मेवालोंको सारा जगत् ही लाल- पीला दिखायी देता है, उसी प्रकार अपनी परिस्थितियों तथा भावनाओंके अनुसार ही उनकी प्रतिक्रियास्वरूप तर्क तथा सिद्धान्तोंका आविष्कार होता है । कामुकके लिये संसार कान्तामय ही उपलब्ध होता है । परिस्थितियोंसे ऊँचे उठे हुए तत्त्वज्ञोंको संसार ब्रह्ममय दिखायी देता है । गरीबीकी हालतमें आर्थिक कष्टसे पीड़ित मार्क्सके मस्तिष्कमें जैसी प्रतिक्रिया हुई, वैसा ही मासीय दर्शन हुआ । आर्थिक कष्टपीड़ित मनुष्य ही अर्थका महत्त्व समझता है । प्यासा पानीका, भूखा भोजनका महत्त्व समझता है । इस दृष्टिसे मार्क्सको संसारमें सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु अर्थ ही प्रतीत हुआ । ब्रह्म, चेतन आत्मा, श्रेष्ठ मनुष्य, धार्मिक, सामाजिक, शाश्वत नियम- सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ उसे अर्थके सामने नगण्य जँचीं । यद्यपि—

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।

यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥

(महा० शां० प० ८।१९ ) यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः । स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ॥ (नीतिशतक ४१ ) अर्थेभ्योऽथ प्रवृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः । क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ( वाल्मीकिरामायण ६ । ८३ । ३२ )

पृष्ठ 174

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१७० मार्क्सवाद और रामराज्य इत्यादि शब्दोंद्वारा शास्त्रोंमें धनका बड़ा महत्त्व बतलाया गया है और यह ठीक भी है; परंतु ' अर्थसे अधिक कुछ है ही नहीं । धार्मिक, आध्यात्मिक नैतिक उन्नतियाँ तथा तदनुकूल सभी नियम, सबकी आधारभित्ति अर्थ ही है, वही सर्वश्रेष्ठ है '– यह समझना तथा अर्थके लिये सनातन सत्य, शाश्वत न्याय, नित्य आत्मा परमात्मा तथा धार्मिक नियमोंका भी परित्याग कर देना तो गरीबी एवं दरिद्रताकी ही शुद्ध प्रक्रिया है । गरीबीमें धनवान् से ईर्ष्या-द्वेष भी होता है । उन्हें मिटा देनेकी इच्छा भी होती है, फिर तदनुकूल कुछ युक्तियाँ तथा तर्क भी ढूँढ़ लिये जाते हैं । इस तरह अधिकांश पाश्चात्य दर्शन विशेषतः मार्क्सदर्शन प्रतिक्रियावादी दर्शन है । कोई भी वस्तु भोक्ताद्वारा माँग होनेपर ही मूल्यवान् होती है । भोक्ताकी माँग न होनेपर उसका कुछ भी मूल्य नहीं होता । चेतन पुरुष ही अर्थका उत्पादक, वर्धक एवं रक्षक भी है । फिर भोक्ता या चेतन मनुष्यका महत्त्व कम आँकना, उसे आर्थिक व्यवस्थाओंका दास बनाना कहाँतक संगत है? अवश्य ही सामान्य स्थिति यह है कि बड़े - से - बड़े लोग भी अर्थके दास होते हैं- ' अर्थस्य पुरुषो दासः । ' सामान्य मनुष्य मनका दास, परिस्थितियोंका गुलाम, इन्द्रियोंका किंकर एवं विषयोंका कीड़ा होता है, परंतु विशिष्ट जितेन्द्रिय संयमी प्राणी निश्चय ही मन, इन्द्रिय, भोग, परिस्थिति सबको अपना दास बनाकर उनका स्वामी हो जाता है । अनेक राजाओं, धनवानोंने परोपकारके लिये, पुण्यके लिये, अध्यात्मनिष्ठाके लिये धन ही नहीं, शरीर एवं प्राणतक दे दिये हैं । रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, रन्तिदेव, शिवि, दिलीप आदि इसीके उदाहरण हैं । ' रन्तिदेवने कहा था- नकामयेत्वहं कामयेदुःखतप्तानांराज्यं न प्राणिनामार्तिनाशनम्स्वर्गं नापुनर्भवम्॥। ( महा० ) ' मुझे राज्य, स्वर्ग, मोक्ष कुछ न चाहिये, केवल प्राणियोंकी दुःख- निवृत्ति ही मुझे इष्ट है । ' रामचन्द्र, हरिश्चन्द्रका राज्यत्याग तथा दिलीप

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आधुनिक विचारधारा १७१ एवं रन्तिदेवका सर्वस्व त्याग प्रसिद्ध है । समर्थ विद्वान्, महातपा, महात्यागी पुरुष तो इतिहासकी धारा ही बदल सकते हैं, यह प्रत्यक्ष सत्य है । जो तर्कसे इस प्रत्यक्षको मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं, वे प्रत्यक्ष सूर्यको भी अपनी बुद्धि-वैभवसे अन्धकार बतला सकते हैं । परिस्थितियाँ तथा अवसरके प्रवाहमें बह जाना वैसा ही है, जैसे मुर्देका नदीप्रवाहमें बहना । बुद्धिमान साहसी महापुरुष प्रवाहको चीरकर बाहर निकलते हैं और प्रवाहको भी वैसे ही बदल देते हैं, जैसे नदी प्रवाहमें पड़ा व्यक्ति प्रवाहको काटकर निकलता है और बाँध- बाँधकर नहर निकालकर, प्रवाहका मुँह भी मोड़ देता है । ईर्ष्या- द्वेषकी स्थिति भी सामान्य स्थिति | उत्तम स्थिति तो यही है कि अपने पुरुषार्थसे अपनी गाढ़ी कमाईके कुछ पैसोंसे ही सन्तुष्ट रहे । लूटकर, दूसरोंको मारकर धनवान् बनना अच्छा नहीं है । ये संस्कार अभीतक ग्रामीणों, नागरिकों सभीके हृदयोंमें बद्धमूल हैं । ईर्ष्या - द्वेष आदि मनुष्यके दोष हैं, गुण नहीं । मार्क्सवादी इन्हीं विकारोंको उत्तेजित करके उनके द्वारा राजनीतिक समस्या सुलझाना चाहते हैं । स्वार्थ- साधनमें भी नैतिकताका कुछ ध्यान रखा जाता है, परापहरण आदि निन्द्य समझा जाता है । पर मार्क्सके मतसे परकीय वस्तुका अपहरण न्याय ही है; अन्याय नहीं । समष्टिवाद समष्टिवादका भी मार्क्सवादसे अंशतः मतभेद है । उसका स्रोत है फेवियनवाद और संशोधनवाद । इसे ही ' समाजवादी जनतन्त्र ' या ' जनतन्त्रीय समाजवाद ' कहा जाता है । द्वितीय अन्ताराष्ट्रिय मजदूर संघके कई दल इसके समर्थक थे । इसे ही सुधारवादी या विकासवादी समाजवाद भी कहा जाता है । इंग्लैण्डका मजदूर- दल इसी विचारधाराका है । मिल इस वादका उद्गम है । वार्करने मार्क्सवादसे बचकर ब्रिटेनमें समाजवादी दर्शनका निर्माण किया है । उसने ब्रिटिश व्यक्तिवादी परम्पराके अनुसार सुधारवादी समाजवादकी रूपरेखा प्रस्तुत की है । पीजका कहना था कि ' हम समाजवाद बनाना चाहते हैं, समाजवादी नहीं । ' बर्न स्टाइन

पृष्ठ 176

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१७२ मार्क्सवाद और रामराज्य ( १८५० - १ ९ २२ ) -ने मार्क्सवादका संशोधन करते हुए बतलाया था कि ' संसदीय नीतिद्वारा समाजवादकी स्थापना सम्भव है । ' मार्क्सने भी अमेरिका और इंग्लैण्डमें संसदीय व्यवस्थाद्वारा भी समाजवादकी स्थापनाको सम्भव बतलाया था । एक तरहसे यह दर्शन विधानवादका समर्थक है । इनके अनुसार व्यक्ति विवेकशील होता है, अतः निर्वाचक समाजवादके पक्षमें मतदान करेंगे । इसलिये प्रचारद्वारा उन्हें यह बतलाना ही पर्याप्त है कि आधुनिक कुरीतियोंका अन्त समाजवादसे ही सम्भव है । निर्वाचनकी सफलतासे समाजवादी सरकार बनेगी । वह शनैः - शनैः पूँजीवादी व्यवस्थाको समाजवादमें परिवर्तन करेगी । मैकडोनल्डके अनुसार समाजवाद अवश्यम्भावी है, अतः संसदीय नीति और प्रचारद्वारा क्रमेण सुधार करना इनकी नीति है । मार्क्सवाद सुधारवादको सड़ियल मानता है । समष्टिवादियोंका समाजवादकी स्थापनाका एक ही लक्ष्य होना चाहिये, फिर अन्य विषयोंमें मतभेद रखनेवाले भी उसमें सम्मिलित हो सकते हैं । इनके यहाँ संघटनकी एकतापर जोर है, मार्क्सवादियोंकी तरह दर्शनकी एकता आवश्यक नहीं है । अन्य समाजवादियोंके विपरीत समष्टिवादियोंका यह भी कहना है कि सामन्तों तथा पूँजीपतियोंके अनुपार्जित लाभको राज्यद्वारा समाजहितके लिये प्रयोगमें लाना चाहिये, परंतु परोपजीवी पूँजीवादका अन्त वह भी चाहता है । किंतु इस कार्यमें समष्टिवादी शीघ्रता नहीं करना चाहते । इनके मतानुसार खजाना, खान, इस्पात, विद्युत्, यातायात आदि व्यवसायोंका शीघ्र ही राष्ट्रियकरण कर लेना चाहिये । साबुन, तेल, वस्त्र आदि व्यवसायोंके परिपक्व होनेपर ही उनका राष्ट्रियकरण होना चाहिये । नाई, बढ़ई, होटल आदि व्यवसायोंका व्यक्तिगत संचालन ही वे लाभदायक मानते हैं । शनैः -शनै - वादी नीति अनुभवकी दृष्टिसे हितकर है । इनके अनुसार पूँजीपति आदिकी पूँजी लेनेपर उन्हें उसका मुआविजा देना उचित है । एटलीके मतानुसार ऐसा न करना अन्याय है । जनमत-निर्वाचन ही उनके परिवर्तनका आधार है । डॉक्टर डाल्टनके अनुसार पूँजीवाद एवं

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आधुनिक विचारधारा १७३ समाजवादमें गुणात्मक नहीं, अपितु परिमाणात्मक भेद है । समष्टिवादके अनुसार व्यक्तिगत क्षेत्र धीरे - धीरे कम होना और सामाजिक क्षेत्र बढ़ना चाहिये । इनके मतानुसार आधुनिक जनवाद अपूर्ण है । इसकी पूर्णता होनेपर ही राष्ट्रियकरण समाजके लिये हितकर होगा । ब्रिटिश- मजदूर दल राजतन्त्रको उपयुक्त सुधारोंद्वारा जनतन्त्रीय बनाना चाहता है । बड़ी धारा- सभाको भी वह जनवादीरूप देना चाहता है । उसके अनुसार छोटी धारा - सभाकी सत्ताका वास्तवीकरण जनवादके लिये नितान्त आवश्यक है । यह कमेटियोंकी संख्यामें वृद्धिमें सम्भव है । निर्वाचन तथा प्रचार आदिद्वारा जनतन्त्रकी पुष्टि होती है । ये न राज्यकी एकवर्गीय संस्था मानते हैं और न वर्ग संघर्षको समाजका आधार मानते हैं । इनके अनुसार राज्य एक अवयवी है । नागरिकका एवं राज्यका हित अन्योन्याश्रित है । श्रमिकों एवं पूँजीपतियोंका हित अवश्य वर्गीय है तथापि सामाजिक जीवनमें वर्ग-सहयोगकी भी प्रधानता होती है । ये लोग वैयक्तिक स्वतन्त्रताका भी पूर्ण सम्मान करते हैं, परंतु यह व्यक्तिवादके विपरीत समाजवादी व्यवस्थामें ही सम्भव मानते हैं । ये साम्राज्यके स्थानमें राष्ट्रमण्डलका समर्थन करते हैं । औपनिवेशिक देशोंमें भी ये आर्थिक, राजनीतिक प्रगति तथा औपनिवेशिक स्वराज्य स्थापित करना चाहते हैं । सर क्रिप्सने राष्ट्र मण्डलको प्रजातन्त्रीय विकासशील संस्था बना दिया था । यह संस्था केन्द्रीकरण एवं विकेन्द्रीकरणका प्रतीक है । समष्टिवाद, पूँजीवाद एवं साम्राज्यवादके एकाधिकारका और व्यक्तिवाद तथा रूढिवादका भी विरोधी है । साथ ही मार्क्सवाद पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य एवं श्रमिक एकाधिकारका और अधिनायकवाद एवं पूर्ण नवीन समाजका भी विरोधी है । वह डार्विनकी पूँजीवादी दुनियाके वैयक्तिक स्वतन्त्रता और साम्यवादी दुनियाकी अर्थयोजनाका समन्वय करना चाहता है । एक तरहसे समष्टिवाद विभिन्न मतोंकी खिचड़ी है । रामराज्य-प्रणालीके अनुसार निश्चित शास्त्रानुसारी सिद्धान्तोंके बिना स्थिरता नहीं हो सकती । मार्क्सवादियों तथा समष्टि - वादियोंका सुन्दोपसुन्दन्यायानुसारी विरोध इन दोनों ही सिद्धान्तोंकी त्रुटियोंको स्पष्ट करता है ।

पृष्ठ 178

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१७४ मार्क्सवाद और रामराज्य संघवाद १ ९वीं सदीके अन्तमें फ्रांसीसी संघवाद भी मार्क्सवाद एवं अराजकतावादके आधापर ही बना है । इसका भी अनेक देशोंपर प्रभाव फैला । कोकरके कथनानुसार यह राज्य- विरोधी, देशभक्ति-विरोधी, सैन्यवाद- विरोधी, राजनीतिक दल- विरोधी, संसद्- विरोधी, मध्यमवर्ग-विरोधी और सोवियतवाद- विरोधी भी है । उस समयके वोलेञ्जर, ग्रेवी- विल्सन, पनामा आदि अनेक भ्रष्टाचारकाण्ड इसके कारण थे । लेवीनके मतानुसार जिस शासनमें नागरिक स्वयं निर्माण करे, वही वास्तविक जनवाद है । मार्क्सके अनुसार ये भी देशभक्तिको ढोंग मानते हैं । श्रमिकोंकी न कोई मातृभूमि होती है और न कोई देश । भूखों और नंगोंके लिये मातृभूमिका आदर्श खोखला है, यह पूँजीपतियोंका प्रचारमात्र है । संघवादी सैनिकोंसे कहते थे कि ' वे अपने वर्गीय - बन्धुओंपर गोली न चलायें; क्योंकि वे भी श्रमिक कुटुम्बके ही सदस्य हैं और अन्तमें उन्हें उन्हींमें रहना है । ' वे युद्ध- विरोधी भी थे । इनके मतमें संसदीय नीति एवं वर्ग -सहयोगसे श्रमिकोंका हित नहीं हो सकता, इसके लिये वर्ग- संघर्ष ही आवश्यक है । वे तोड़- फोड़में, आम हड़ताल करने और वोटमें भाग न लेनेमें विश्वास रखते थे । जॉर्ज सोरेलके अनुसार पूँजीपतियोंको सदा भयभीत रखना चाहिये । आम हड़ताल प्रोत्साहन एवं प्रेरणाके द्वारा ही सफल होती है । अराजकतावादियोंके अनुसार इनका भावी समाज श्रमिक संघोंद्वारा बनेगा, परंतु फ्रांसके संघवादियोंने प्रथम महायुद्धमें क्रान्तिकारी मार्ग छोड़कर राष्ट्रभक्ति और सुधारका मार्ग ग्रहण कर लिया । अन्यत्रके भी संघवादी शिथिल हो गये । इसी तरह इंग्लैण्डका श्रेणी समाजवाद भी कुछ दिन पनपकर खत्म हो गया । यह फ्रांसीसी संघवादका आँग्ल- संस्करण था । ए० जे० पेन्दी, ए० आर० ओरेल, एम० जी० हॉब्सन, जे० डी० एच० कोल इनके प्रमुख विचारक थे । पूँजीवादके अन्तसे ही सब बुराइयोंका अन्त मानते थे । इनके अनुसार श्रेणीवादी समाजवाद ही मुख्य जनतन्त्र है ।

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आधुनिक विचारधारा १७५ हॉब्सनके अनुसार भावी समाजमें भी राज्यका महत्त्वपूर्ण स्थान होगा । वह एक समाज- सेवक संस्था होगी । उसके द्वारा अन्य सामाजिक तथा आर्थिक संस्थाओंका समन्वय होगा, परंतु लोकके अनुसार राज्यका कोई महत्त्वपूर्ण स्थान न होना चाहिये । वह राज्यके स्थानपर कम्यूनकी स्थापना चाहता था । उसके अनुसार राज्यके अधिकार इतने कम होने चाहिये कि वह धीरे- धीरे समाप्त हो जाय । इसके कार्य -क्रममें व्यावसायिक संघोंकी स्थापना महत्त्वपूर्ण है । १ ९ २५ तक वह भी खत्म हो गया । वस्तुतः सिद्धान्तकी दृष्टिसे नहीं, किंतु बहुत -से पक्षोंकी सफलता परिस्थितियोंके अनुकूल हो जाती है । उन परिस्थितियोंको बदला जा सकता है अवश्य, परंतु उसमें अनेक साधनों तथा समयकी अपेक्षा होती है । यदि मार्क्सवादियोंकी रूसमें सफलता न होती, तो मार्क्सवादकी भी वही हालत होती, जो इन दूसरे वादोंकी हुई । यदि हिटलरकी जीत हो गयी होती, तो भी मार्क्सवाद अबतक मर चुका होता । कई बार शून्यवादियोंकी भी जीत हो जाया करती है, परंतु इससे ही यह नहीं कहा जा सकता कि सिद्धान्त भी वही ठीक है, यह तो ' बन आयेकी बात ' है । किसीका सिद्धान्त बहुत श्रेष्ठ हो, परंतु अन्य साधन न हों तो वह केवल सिद्धान्तके आधारपर नहीं जीत सकता । बहुलवाद इसी प्रकार ब्रिटेनमें ही एक सत्तावादका विरोधी बहुलवाद दर्शन प्रकट हुआ । एक सत्तावाद एकात्मव्यवस्थाका समर्थक था । बहुलवादके अनुसार व्यक्ति उसकी स्वतन्त्रता उसके संघोंका समर्थक है । लॉस्की मुख्यरूपसे इस दर्शनका वेत्ता था । व्यक्ति अपने अनेक ध्येयोंकी पूर्तिके लिये अनेक संघ बनाता है । राज्यद्वारा यह काम पूरा नहीं होता । उसके अनुसार कोई भी संस्था ' मेरे पूरे मैंके लिये ' नियम नहीं बना सकती । मैकाइवरके अनुसार राज्य अर्थैक्यका प्रतिनिधित्व करता है, परंतु सम्पूर्ण अर्थैक्यका नहीं । संघोंकी दृष्टिसे सहयोग एवं संघर्ष विश्वव्यापी है । लॉस्कीके मतानुसार आदर्श नागरिकका सर्वप्रथम कर्तव्य अपनी आत्माकी

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१७६ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रगति है । वह उसी संघका अनुसरण करेगा, जिससे उसकी आत्मतुष्टि हो । अतः राज्यसत्ताधारी पदके योग्य तभी हो सकता है, जब वह व्यक्ति प्रगतिको पूरी करे । इतिहासके अनुसार संघोंने अनेक बार राज्यकी निरपेक्षताको सीमित किया है । नागरिककी सक्रियता ही सच्चा जनतन्त्र है । यह बहुलवादी संघात्मक समाजमें ही सम्भव है । ऑस्टिनके अनुसार अन्ताराष्ट्रिय निरपेक्षता भी सम्भव नहीं है । विश्वजनमतको कोई राज्य उल्लंघन नहीं कर सकता । लॉस्कीके अनुसार ब्रिटेनका आदर्श दृष्टिकोण यह होना चाहिये कि वह विश्व कल्याणमें अपना कल्याण समझे । उसके अनुसार नैतिक क्षमताको पूर्ण करनेवाली व्यवस्था या नियम मान्य होना चाहिये । यदि अव्यवस्थाका लक्ष्य मानव-प्रगति है, तो वह अन्यायसे कई गुना अच्छी है । व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, व्यक्ति-प्रगति और व्यक्ति- संघोंका अस्तित्व ही उनके दर्शनका सार है । फॉसीवाद मुसोलिनी एवं हिटलरके फॉसीवाद एवं नाजीवादने डार्विनके संघर्षको बहुत महत्त्व दिया और स्पेंसर आदिके इस पक्षको अपनाया कि 'जो संघर्षमें सफल हो, वही जीवित रहे । ' अर्थक्रियाकारित्ववाद इसका प्राण है । उत्कृष्ट जातिका यह प्रकृतिसिद्ध अधिकार है कि वह निकृष्ट जातिका शासन करे । उसके अनुसार मानव-इतिहास एक युद्धकी कहानी है । मानव-प्रगति युद्धके द्वारा ही होती है । इसमें भी वर्गसों तथा सोरेलकी भाँति अन्ध- श्रद्धाको बढ़ाना आवश्यक माना जाता था । उसके मतानुसार ‘ जन- समूह एक स्त्रीकी भाँति होता है, जो बलवान् एवं नाटकीय व्यक्तिकी तरफ आकृष्ट होता है । ' इसीलिये राज्य, देश एवं नेताकी भक्तिको खूब प्रोत्साहन दिया गया, रक्तकी पवित्रतापर भी बहुत बल दिया गया, भौतिकताके स्थानपर आध्यात्मिकता, गौरव, मान, चरित्रको मानव जीवनका लक्ष्य बतलाया गया । राज्यको साध्य और व्यक्तिको साधन कहा गया । इनके मतानुसार सर्वाधिकारी राज्यके संरक्षणमें ही व्यक्तिकी सर्वविध उन्नति सम्भव है, राज्य ही सर्वेसर्वा है । केन्द्रिय कार्यपालिका एक प्रकारकी अधिनायककी परामर्श समिति थी ।