मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 181–190

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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आधुनिक विचारधारा १७७ जनसत्ताके स्थानपर नेतृसत्ता ही फॉसीवादकी विशेषता थी । रूसी समाजवाद एवं फॉसीवाद दोनों ही सर्वाधिकारवादी अधिनायकवादी हैं । समाजवादी जनवादका नाम लेते हैं । फॉसीवादी जनवादके स्पष्ट विरोधी थे । जनवाद जनवादकी व्याख्याएँ भी भिन्न-भिन्न ढंगसे होती रही है । अब्राहम लिंकनके अनुसार ' जनताका जनताके लिये जनताद्वारा किया जानेवाला शासन ही प्रजातन्त्र या जनतन्त्र माना जाता है । प्रतिनिधि जनवादका आधार राष्ट्रका सामान्य हित होता है । सुशासनके लिये सामान्यहितको कार्यान्वित करनेके लिये कुछ प्रतिनिधियोंका निर्वाचन होता है । यही ' परोक्ष-जनवाद ' है । ' आलोचकोंकी दृष्टिमें जनवादका अर्थ ' मूर्खोपर उनकी अनुमतिद्वारा शासन करना ' है । पर यह तो परम सत्य है कि जनवादमें जन-शिक्षा, निष्पक्ष जनमत, राजनीतिक दलोंका अस्तित्व, नागरिकोंका शासनमें सक्रिय भाग, सतर्कता और आदर्श निर्वाचन-व्यवस्था अनिवार्य है । इनके बिना तो जनवाद कोरा दम्भ ही है । राजनीतिक दलोंमें अर्धसैनिक - अनुशासन, नेताओंका बोलबाला और पूँजीपतियोंका दलोंपर अधिकार आदि जनवादके बाधक ही हैं । पक्षपातयुक्त प्रचार-साधन— रेडियो, पत्र, सिनेमा आदि भी बाधक हैं । समाचारपत्र आदि अपने दलों एवं मालिकोंका गुणगान करते हैं । इससे विवेकशीलताको धक्का पहुँचता है । सतर्कता भी इसमें परमावश्यक है । सतर्कता स्वतन्त्रताकी बहन है । कहा जा चुका है कि एतदर्थ विकेन्द्रीकरण और सक्रियता आवश्यक है । इसीलिये स्थानीय स्वशासनादि आवश्यक होते हैं । प्रतिनिधि जनवादमें योग्य उम्मीदवारोंका मिलना, स्वतन्त्र मतदान, निर्वाचकोंकी योग्यता, निर्वाचन- विधिकी सरलता और अल्पव्ययिता आदि भी आवश्यक हैं । यह सब इस समय असम्भव-सा ही हो रहा है । फिर भी इस समय इससे अन्य अच्छी व्यवस्था कोई नहीं है । यदि इसे शस्त्र एवं धर्म अथवा सामान्य मानव- धर्मसे भी नियन्त्रित कर दिया जाय, तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, ईश्वर- भक्ति आदि सद्गुणोंसे युक्त रामराज्य- प्रणालीका जनतन्त्र- राज्य राम- राज्य ही बन सकता है ।

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१७८ मार्क्सवाद और रामराज्य अराजकतावाद मार्क्सवादियोंसे भी बढ़े- चढ़े अराजकतावादी हैं । इसके प्रवर्तक माइकेल बाकुनिन ( १८१४-१८७६ ) और प्रिंस क्रोपोटकिन ( १८४२- १ ९ १ ९ ) हुए हैं । उनके मतानुसार क्रान्तिद्वारा पूँजीवादका अन्त होते ही राज्यका भी अन्त हो जाना चाहिये । श्रमिक क्रान्तिके पश्चात् वर्गीय संस्थाका अन्त हो जाना चाहिये । न मर्ज ( वर्ग ) रहे, न मरीज ( राज्य ) रहना चाहिये । मार्क्सवादी भी राज्यको वर्ग- विशेषकी ही संस्था मानते हैं । लेनिनके अनुसार भी राज्य दमन-यन्त्र हैं । किंतु वे विरोधियोंको कुचलनेके लिये उसकी आवश्यकता मानते हैं, परंतु अराजकतावादी इसका विरोध करते हैं । वे कहते हैं कि ' ऐतिहासिक दृष्टिसे राज्य आवश्यक नहीं । राज्यकी उत्पत्तिके पहले भी मनुष्य रहते थे और अपने समूहोंमें सुखी एवं स्वतन्त्र जीवन -निर्वाह करते थे । श्रमिक क्रान्तिके बाद भी वैसे ही बिना राज्यके सुखी एवं सम्पन्न रह सकते हैं । वर्गविहीन समाजमें, जो कि श्रमिक क्रान्तिका फल है, वर्गीय संस्था- राज्यकी आवश्यकता ही क्या है?' अराजकतावादी कहते हैं कि ' इतिहासके अनुसार राज्य कभी भी न्यायपूर्ण नहीं था । व्यक्तिगत सम्पत्तिके द्वारा ही राज्यका जन्म हुआ है । व्यक्तिगत सम्पत्ति एक चोरी है, राज्य इसका रक्षक रहा है । राज्य सदा ही शोषकोंका पक्षपाती तथा शोषितोंके विपरीत रहा है । जो संस्था सदा मजदूरोंके हितोंको कुचलती रही है, उससे मजदूर कैसे प्रेम कर सकता है । ' क्रोपोटकिनने कहा है कि ' पूँजीवादी प्रथा अभावका नाम ही शासन-प्रथाका अभाव है ।' अराजकतावादी राज्यको निरंकुशताका प्रतीक मानते हैं, चाहे वह राज्य जैसा भी हो । जैसे राजतन्त्र या कुलीनतन्त्रमें अल्पसंख्यकोंद्वारा बहुसंख्यकोंकी स्वतन्त्रताका अपहरण होता है, वैसे प्रजातन्त्रके बहुमतद्वारा भी वैयक्तिक स्वतन्त्रताका अपहरण होता है । अराजकतावादियोंके अनुसार ' कोई मनुष्य दूसरेका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता । ' अ' का प्रतिनिधि सभामें ठीक ' अ' की भाँति नहीं बोल सकता । फिर समूहोंका प्रतिनिधि तो कोई हो ही कैसे सकता

पृष्ठ 183

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आधुनिक विचारधारा १७९ है? कोई विधान -विशेषज्ञ धारा-सभाका सदस्य बनता है । वह सफाई, शिक्षा तथा शासनके सम्बन्धमें अनुभवशून्य होता है । फिर उसके द्वारा इन विषयोंके सम्बन्धमें बनाये नियम किस तरह लाभदायक होंगे? अतः प्रतिनिधियोंकी सरकार वही होती है, जो सभी कार्योंको अयोग्यतापूर्वक करती है । निर्वाचनद्वारा जनताकी सामान्य इच्छाएँ तक व्यक्त नहीं हो सकतीं । शक्तिका मद तो शासकमें आ ही जाता है । ' अराजकतावादियोंके मतानुसार साधारणतया मनुष्य नेक होता है; परंतु पदपर पहुँचते ही वह बुरा हो जाता है । मनुष्य राजनीतिज्ञ होनेसे ही बुरा हो जाता है । गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीका भी कहना है कि अधिकार पाकर किसे गर्व नहीं होता- 'प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं । ' अराजकतावादियोंके मतानुसार राज्यके बिना भी मनुष्य खाता, सोता, बोलता, पढ़ता है । जुआड़ी जुएमें हारकर बिना राज्यके दबावके ही रुपया देता है । चोर भी आपसमें समझौता करते ही हैं । कितने ही खेलोंमें खिलाड़ी स्वयं नियम बनाते और उसका पालन करते हैं । इसी तरह राज्यके बिना भी स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा सब काम चल सकता है । बाह्य आक्रमणका भी सामना राज्य - सेनाकी अपेक्षा जनताकी सेना अधिक अच्छा कर सकती है । अराजकतावादी दण्ड-विधान एवं जेल आदिद्वारा भी सुधारमें विश्वास नहीं करते । क्रोपोटकिनके अनुसार ' जेलें पाखण्ड और कायरताकी स्मारक हैं । ' वह स्वयं रूस और फ्रांसकी जेलोंमें रहा था । जेलोंके अपने अनुभव बतलाते हुए वह लिखता है कि ' जेलोंमें आधेसे अधिक हत्यारे तथा चोर थे, जो अनेक बार जेलोंमें रह चुके थे । दण्डके भयसे प्राणी अपराध नहीं करेगा, यह समझना सर्वथा भ्रम है । एक अपराधी अपराध करते समय यही सोचता है कि वह दण्डसे अपने आपको बचा लेगा । किसी व्यक्तिको फाँसी देनेसे उसके बाल-बच्चे निराश्रित असहाय होकर समाजके लिये अधिक हानिकर सिद्ध हो सकते हैं । अराजकतावादियोंके अनुसार इतिहास बतलाता है कि राज्यने कभी भी उच्च आदर्शकी पूर्ति

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१८० मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं की । उसके द्वारा सदा ही दुःख एवं अन्यायको स्थायी बनानेका प्रयत्न किया गया है । राज्यकर्णधारोंके सदियोंके प्रचारद्वारा राज्य नितान्त आवश्यक वस्तु समझी जाने लगी है । जन्ममें यही सुनते, विद्यालयोंमें पढ़ते और पुस्तकों, लेखों और समाचार- पत्रोंमें राज्यकी आवश्यकताका वर्णन पढ़ते - पढ़ते मनुष्यके मस्तिष्कमें यह बात बैठ जाती है कि राज्य नितान्त आवश्यक संस्था है । कोई भी राजनीतिज्ञ यही कहता है कि ' मुझे अधिकार दीजिये तो मैं देशमें घी- दूधकी नदियाँ बहा दूँगा । ' राज्यका अन्त हुए बिना इन पाखण्डोंकी समाप्ति नहीं हो सकती । ' अराजकतावादियोंका अपना कार्यक्रम भी है । उनके मतानुसार ' क्रान्तिके पहले अराजकतावादकी शिक्षा होनी चाहिये । मनुष्य समाज अराजकताकी ओर अग्रसर हो रहा है । क्रोपोटकिन जीवशास्त्रज्ञ था । उसके अनुसार मनुष्य जातिने सहयोगद्वारा ही प्रगति की है, प्रतियोगिताद्वारा नहीं । सहयोगद्वारा ही मनुष्यने प्रकृतिपर विजय पायी है, सहयोगद्वारा ही प्राचीन मनुष्य जीवित रहते थे । आधुनिक युगमें भी सहयोगकी मात्रा बढ़ रही है, अतएव स्वेच्छात्मक संस्थाओंकी वृद्धि हो रही है । राज्यके कार्योंकी सीमा भी घट रही है । मनुष्य जितना सभ्य होगा, उतना ही सहयोगी होता है । सभ्यताकी प्रगतिसे स्वेच्छात्मक संस्थाओंद्वारा राज्य- कार्य सीमित हो रहे हैं । अब थोड़े ही प्रयत्नसे राज्यका अन्त एवं स्वेच्छात्मक संस्थाओंका युग आरम्भ होगा, यही अराजकतावादी युग है । वैज्ञानिक तर्कोंद्वारा जनताको अराजकताके पक्षमें कर लेना चाहिये । जनताके मस्तिष्कमें यह विचार कूट- कूटकर भर देना चाहिये ि अराजकतावादी युग अब बहुत ही निकटवर्त्ती है । जनता स्वागतके लिये तैयार रहे । यह अन्धविश्वास नहीं, किंतु वैज्ञानिक सत्य है । इसके लिये क्रान्ति आवश्यक है । अराजकतावादी समितियों तथा केन्द्रीय समितिके प्रयत्नसे यह क्रान्ति होगी । इनका भावी समाज साम्यवादी, स्वेच्छावादी और सहयोगवादी होगा । नागरिककी हैसियतसे राज्यसे, उत्पादककी हैसियतसे पूँजीवादसे और मनुष्यकी हैसियतसे शासनमात्रसे स्वतन्त्रता प्राप्त करना अराजकतावादका ध्येय है । '

पृष्ठ 185

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आधुनिक विचारधारा १८१ अराजकतावाद ' पूर्णस्वतन्त्रताका युग है । इसमें जो स्वस्थ और योग्य होगा, वह काम करेगा । २४ से ५० वर्षतक काम करनेकी अवस्था होगी । प्रत्येक व्यक्तिको प्रतिदिन ४ या ५ घण्टे काम करना होगा । मनुष्य वेतन और प्रोत्साहनके बिना ही काम करेगा । काम करना मनुष्यका स्वभाव है । मनुष्यको सभी सुगम एवं रोचक कार्य ही पसन्द होते हैं । अतः भावी समाजमें सभी काम सुगम एवं रोचक बना दिये जायँगे । विज्ञानकी प्रगतिसे कोई काम गन्दा न रह जायगा । अराजकतावादमें उत्पादन एवं उपभोगकी वस्तुओंमें कोई अन्तर न होगा । भोजन, वस्त्र, साइकिल, मोटर आदिकी सहायतासे, जो कि उपभोगकी वस्तु मानी जाती हैं, मनुष्य उत्पादन भी करता है; अतः सभी वस्तुओंका वितरण अराजकतावादी संघोंद्वारा होगा । पहले बच्चों, बूढ़ों, अंगहीनोंको उनके आवश्यकतानुसार चीजें दी जायँगी, फिर अन्य लोगोंको पहले जीवनोपयोगी वस्तुएँ दी जायँगी, फिर आरामकी वस्तुएँ । सामाजिक बहिष्कारसे असामाजिक कार्योंकी स्वतः निवृत्ति होगी । इतनेपर भी सुधार न होनेपर अपराधीका डॉक्टरी इलाज होगा, उसे सुधार-गृहमें भेजा जायगा । मनुष्य अपने सामाजिक समझौतोंको भंग न करेगा । आधुनिक समाज-रचनासे ही मनुष्यमें दुर्गुण आये हैं । संघटनके लिये छोटे - छोटे प्रादेशिक संघ होंगे । इनमें प्रत्यक्षजनवादी प्रबन्ध होगा । इन्हींसे प्रान्तीय समितियाँ बनेंगी और प्रान्तीय समितियोंसे देश-समिति बनेगी । वहाँसे यूरोपको प्रतिनिधि भेजे जायँगे और वहाँसे फिर संसारको प्रतिनिधि भेजे जायँगे । ये प्रतिनिधि विशेषज्ञ होंगे, अल्पज्ञ या अज्ञ नहीं । समस्या-पूर्ति होनेपर इन अस्थायी संघोंका भी अन्त हो जायगा । दूसरी समस्या आनेपर पुनः उस प्रकारके विशेषज्ञ प्रतिनिधि भेजे जायँगे; अर्थात् रोग-निवृत्तिके लिये चिकित्साविशेषज्ञ प्रतिनिधि होगा और खेलके लिये खेलका विशेषज्ञ खेलाड़ी- प्रतिनिधि होगा । स्वतन्त्र स्वेच्छात्मक संघोंको समुच्चय ही अराजकतावादी संघ होगा ।' अराजकतावादका सार ' व्यवस्थाका अन्त नहीं, किंतु निरंकुशताका अन्त है । ' इसके अनुसार ' समाजके बिना स्वतन्त्रतासे शोषण और अन्याय बढ़ता है एवं स्वतन्त्रताके बिना समाजवादसे दासता और पशुता बढ़ती है । '

पृष्ठ 186

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१८२ मार्क्सवाद और रामराज्य कहना न होगा कि इतिहास भी एक विचित्र गोरखधन्धा है । इसके द्वारा ही भिन्न-भिन्न मतवादी अपना-अपना पक्ष सिद्ध करते हैं । इन लोगोंके इतिहास रामायण, महाभारतके समान महर्षियोंके आर्षविज्ञान एवं समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके आधारपर नहीं बनते । इनके इतिहास तो कुछ ईंट- पत्थरों, मुद्राओंके आधारपर ही कल्पनाओंके खड़े किये गये महल हैं, जिनमें कि प्रायः अटकलपच्चूअनुमान भिड़ाये जाते हैं । आज भी प्रायः विभिन्न समाचार एजेंसियोंके तारों, टेलिप्रिंटरोंके आधारपर समाचार प्रकाशित होते हैं, उनमें भी परस्पर पर्याप्त मतभेद दिखायी देता है । लड़ाईके दिनोंमें तो आँखों देखी घटनाओंसे भी विभिन्न एजेंसियोंके समाचार - संकलनोंमें पर्याप्त पार्थक्य दृष्टिगोचर होता है । उन्हें भी विभिन्न पत्र- प्रकाशक अपने - अपने दृष्टिकोणसे तोड़ - मरोड़कर अपने उद्देश्यके उपयोगी बनाते हैं । सम्पादकीय टिप्पणियों एवं पर्यवेक्षकों, समालोचकोंकी विवेचनाओंके विभिन्न रूपोंमें ढलकर उन घटनाओंका सर्वथा ही रूपान्तर हो जाता है । उससे भी भिन्न-भिन्न मतवादी अपना मत सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । सर सुन्दरलालको ' भारतमें अंगरेजी राज्य ' पुस्तकमें इतिहासके तोड़ -मरोड़ और मिथ्या मनगढ़ंत इतिहास निर्माणके सम्बन्धमें बहुत कुछ कहा गया है । जर्मनीके बुद्धिमानोंने सुझाव दिया था कि ' संसारका इतिहास नये सिरेसे लिखा जाना चाहिये और उसका आरम्भ होना चाहिये जर्मनीके पर्वतों, नदियों, ग्रामों एवं नगरोंसे । उसमें जर्मन जातिकी वीर गाथाओंका वर्णन होना चाहिये । ' इंग्लैण्डकी पार्लमेंटमें अपने अनुकूल इतिहास गढ़नेके लिये मिथ्या पार्लामेंटरी प्रस्ताव प्रस्तुत किये गये हैं । आर्योंका पश्चिमोत्तर एशियासे भिन्न देशोंमें जाकर आबाद होना, उन्हींकी एक श्रेणीका भारतमें आना; ग्रीक, लैटिन, जेन्द आदि भाषाओंके समान ही सर्वभाषाओंकी जननी संस्कृत भाषाको सब भाषाओंकी बहन मानना और किसी अनुपलब्ध भाषाको ही सर्वभाषाओंकी जननी मानना; आर्यों-अनार्योंका भेद खड़ा करना आदि बहुत -सी भीषण ऐतिहासिक कल्पनाएँ जान - बूझकर गढ़ी गयी है । इस तरह जब सही इतिहास ही नहीं, तब उसके आधारपर किसी भी

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आधुनिक विचारधारा १८३ सिद्धान्तकी स्थिति कैसे हो सकती है? अराजकतावादी सिद्धान्त वस्तुतः अराजकताकी ही सृष्टि करेगा । जिसके कारण समाजमें मात्स्यन्याय फैलेगा और मनुष्य पशुप्राय हो जायगा । हाँ, यदि सभी सात्त्विक धर्मनिष्ठ जितेन्द्रिय तत्त्ववित् हो जायँ तो अवश्य राज्य, राजा आदिके बिना भी कार्य चल सकता है । यह पीछे महाभारतके राजधर्मसे 'न वै राज्यं न राजासीत्' इत्यादिसे दिखलाया जा चुका है । जबतक यह स्थिति नहीं हो तो तबतक अराजकतावादसे सुख-शान्ति सर्वथा असम्भव हो जायगी । वाल्मीकिरामायणके अयोध्याकाण्डके ६७वें सर्गमें अराजकताकी दुरवस्थाका वर्णन किया गया है, जो नीचे दिया जा रहा है—

नाराज जनपदे विद्युन्माली महास्वनः ।

अभिवर्षति पर्जन्यो महीं दिव्येन वारिणा ॥

नाराजके जनपदे बीजमुष्टिः प्रकीर्यते ।

नाराजके पितुः पुत्रो भार्या वा वर्तते वशे ॥

अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके । इदमत्याहितं चान्यत्कुतः सत्यमराजके ॥ नाराज जनपदे कारयन्ति सभां नराः । उद्यानानिनाराज चजनपदेरम्याणि हृष्टाःयज्ञशीलापुण्यगृहाणिद्विजातयःच ॥। सत्राण्यन्वासते दान्ता ब्राह्मणाः संशितव्रताः ॥ ( वाल्मीकिरामायण २ । ६७ । ९ –१३ )

नाराज जनपदे प्रहृष्टनटनर्तकाः । उत्सवाश्च समाजाश्च वर्धन्ते राष्ट्रवर्धनाः ॥

नाराजके जनपदे सिद्धार्था व्यवहारिणः । कथाभिरभिरज्यन्ते कथाशीलाः कथाप्रियैः ॥ नाराज प द्या समागताः । सायाने क्रीडितुं यान्ति कुमार्यो हेमभूषिताः ॥

पृष्ठ 188

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१८४ मार्क्सवाद और रामराज्य नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः । शेरते विवृतद्वाराः ( वाल्मीकिरामायणकृषिगोरक्षजीविनः२ । ६७ । १५–१८॥ ) नाराज जनपदे वणिजो दूरगामिनः । गच्छन्ति क्षेममध्वानं बहुपण्यसमाचिताः ॥ नाराज जनपदे चरत्येकचरो वशी । भावयन्नात्मनाऽऽत्मानं यत्र सायं गृहो मुनिः ॥ ( वाल्मीकिरामायण २ । ६७ । २२-२३ )

नाराजके जनपदे योगक्षेमः प्रवर्तते । न चाप्यराजके सेना शत्रून् विषहते युधि ॥

( वाल्मीकिरामायणशास्त्रविशारदाः२ । ६७॥ २५ ) नाराज जनपदे नराः संवदन्तोपतिष्ठन्ते वनेषूपवनेषु च॥ ( वाल्मीकिरामायण २ । ६७ । २६ )

यथा ह्यनुदका नद्यो यथा वाप्यतृणं वनम् ।

अगोपाला यथा गावस्तथा राष्ट्रमराजकम्॥

( वाल्मीकिरामायण २ । ६७ । २९ ) सभीका शासनमें भाग लेना सम्भव न होनेसे ही प्रतिनिधिकी कल्पना करनी पड़ती है । प्रतिनिधि मुख्यसे भिन्न होता ही है; किंतु वह मुख्यका अपेक्षित एवं निश्चित कार्यकारी होता है । अराजकता- वादियोंको भी तो संसारके लिये प्रतिनिधि निश्चित करना पड़ता है, अतः धर्मनियन्त्रित राजा या धर्मनियन्त्रित जनप्रतिनिधियोंका शासन अपेक्षित ही है ।

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चतुर्थ परिच्छेद विकासवाद [प्राणिशास्त्र, शरीर रचना ] आजकल धर्म, संस्कृति, राजनीति, भाषाविज्ञान, इतिहास सभी क्षेत्रोंमें विकासवाद सिद्धान्त लागू किया जा रहा है । आधुनिक विज्ञान तथा -भौतिकवादका एक प्रकारसे यही मूल हो रहा है । बहुत- से भारतीय विद्वान् भी इसे ही मानकर भारतीय विषयोंकी व्याख्या करते हैं । मार्क्सवादके सिद्धान्तोंका आधार भी बहुत कुछ विकासवाद ही है । अतः विकासवादका सिद्धान्त और उसके समर्थनमें जो तर्क रखे जाते हैं, उनपर भी विचार करना बहुत आवश्यक है । डार्विनका मत चार्ल्स डार्विन विकासवादके ' प्रवर्तक' माने जाते हैं । उन्होंने जहाजद्वारा यथासम्भव संसारभरकी यात्रा की । दूर- दूरके टापुओंमें जाकर विविध जातिके जन्तुओंका अवलोकन किया । एक-एक जाति प्राणियोंमें उन्होंने अगणित भेद पाये । उन्हें इन भेदों, अन्तरोंसे आश्चर्य हुआ । इसीलिये मालथसके प्राणिसंख्या- वृद्धि- विचारको पढ़कर उन्होंने यह भी देखा कि ' जीवधारियोंकी संख्या १, २, ४, ८, १६ के हिसाबसे ज्यामितिक रेखागणितके अनुसार बढ़ रही है और खाद्यकी संख्या १, २, ३, ४ के क्रमसे अंकगणितके अनुसार बढ़ती है । लड़ाइयों, बीमारियों तथा अन्य विविध विप्लवोंद्वारा होनेवाले संहारोंसे ही जनसंख्या नियमित है ( आजकल यह मत मान्य नहीं है ) । डार्विनने यह निश्चित किया कि प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष स्वाभाविक है । इसमें जो योग्यतम होता है, वही बच सकता है । किसी कारण- विशिष्ट शारीरिक रचना एवं विशिष्ट शक्तिसे ही विशेष प्रदेशोंमें प्राणियोंको प्राण बचानेकी सुविधा होती है । इस तरह जो विशेष निवास- स्थानके योग्य शरीरवाले होते हैं, उन्हींकी संतानें भी बढ़ती हैं । औरोंकी जातियाँ या तो नष्ट हो जाती हैं अथवा

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१८६ मार्क्सवाद और रामराज्य सुविधाके अनुकूल कहीं अन्यत्र जाकर उन्हें प्राण बचाना पड़ता है । प्रकृति योग्यतमका चुनावकर उसकी ही रक्षा करती तथा औरोंकी उपेक्षा करती है । अतः वे नष्ट हो जाते हैं । डार्विनके मतानुसार प्रतिद्वन्द्विता प्राकृतिक, शाश्वत एवं सार्वत्रिक नियम है । प्राणियोंकी अभिवृद्धिसे यह स्पष्ट होता है कि यही जीवन- संग्रामका भी मूल है । बलवान् निर्बलोंको नष्ट करके अपनेको सुरक्षित रखते हैं, जिनमें अपने आपको परिस्थितिके अनुसार बना सकनेकी क्षमता होती है, उसीकी संतानवृद्धि भी चलती है । इस जीवन -संघर्षसे विभिन्न गुणों, विभिन्न परिस्थितियोंके अनुसार भेद होते हैं और परम्परानुगत होनेसे वे और भी पुष्ट होते हैं । इसी अवस्थानुरूप परिवर्तनके कारण ही विभिन्न जातियोंका प्राकट्य हुआ । यह भिन्न या स्वतन्त्र सृष्टि नहीं । ' इस तरह निरीक्षण, अनुमान एवं परीक्षणद्वारा डार्विनने विकास सिद्धान्त स्थिर किया । यात्राद्वारा अनेकविध प्राणियोंका निरीक्षण किया एवं प्राणि-संख्या-वृद्धिका सिद्धान्त देखकर प्रतिद्वन्द्विता एवं उसमें योग्यतमके ही रक्षणका अनुमान किया । पश्चात् उसने परीक्षा आरम्भ की । उन्होंने देखा कि घोड़े एवं भेड़ पालनेवाले लोग बहुतोंको छाँटकर अपने मतलबके जानवरोंका संग्रह कर लेते हैं और उनमें इच्छानुरूप विभिन्नता उत्पन्न करते हैं । इसके अतिरिक्त, पशु -पक्षियोंकी बहुत - सी जो जातियाँ नष्ट हो गयीं, उनका वर्तमान जातियोंसे बहुत कुछ सादृश्य उपलब्ध होता है । भेद इतना ही है कि पहली जातियाँ वर्तमान जातियों -जैसी उत्तमताको प्राप्त नहीं हुई थीं । पृथ्वीकी वर्तमान जातियोंका सादृश्य भी तीसरा प्रमाण है । इससे निश्चय किया जाता है कि किसी समय छोटे जन्तुओंकी एक ही जाति रही होगी । उनके ही सूक्ष्म अण्डे या बीज जल, वायु आदिके प्रवाहसे समस्त भूमण्डलमें फैले । उन्हींमेंसे विकासक्रमसे वर्तमान जातियाँ निकलीं । विकासका चौथा एक यह भी कारण है कि ' गर्भावस्थामें सभी प्राणी एक-से ही देख पड़ते हैं । अनेक जन्तुओंमें कितनी ही आरम्भिक इन्द्रियाँ गर्भावस्थामें पायी जाती हैं, जिनका पूर्ण विकास नहीं होता । इससे भी प्राकृतिक