मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 211–220
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
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विकासवाद २०७ विकासवाद सर्वथा ही धराशायी हो गया । पृथ्वीकी आयु अबतक जितने भी प्रकारोंसे सिद्ध की गयी, उनमेंसे कोई भी प्रकार इस जूतेके कारण विकासवादकी सब कड़ियोंको उपपन्न करनेमें समर्थ नहीं है । अमीबासे लेकर मनुष्यतक न जाने कितनी कड़ियाँ हैं, यदि एक-एक कड़ी करोड़ वर्ष ले, तो ज्यादा -से-ज्यादा पृथ्वी कितनी पुरानी हो सकती है, इसका अन्दाजा लगाना भी कठिन है । अभी हालमें यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि ' मनुष्योंका विकास बन्दरोंसे नहीं हुआ, प्रत्युत बन्दरोंका जन्म मनुष्योंसे हुआ है । ' इन वैज्ञानिकोंका कहना है कि ' पूर्वकालके मनुष्योंने ज्ञानविज्ञानमें बहुत उन्नति की थी; इसलिये उनके सिर कमजोर हो गये थे । कुछ दिनोंके बाद वे असभ्य जंगली हो गये । उनमेंसे कुछ वनमानुष और कुछ बन्दर बन गये । ' ये नवीन वैज्ञानिक पुराने वैज्ञानिकोंसे कहीं अधिक सूक्ष्मदर्शी हैं । इन्होंने अपने तजुर्बेसे पुराने ज्ञानोंमें अधिक वृद्धि की है । अतः परिस्थिति संयोग या इत्तिफाकके अनुसार नहीं, किंतु कर्मोंके अनुसार ईश्वराज्ञानुसार ही प्रकृति जीवोंके शरीरोंको विकसित करती है । जैसे बीजसे वृक्ष, कलीसे फूलका विकास होता है, वैसे ईश्वरीय नियमानुसार ही सब विकास ठीक हैं । ' विकासवादियोंके मतानुसार -' प्राकृतिक पदार्थोंका मूल कारण ' ईथर ' है । उसीको कल्पना और तरंगावलीसे विद्युत्, प्रकाश, शब्द और गर्मी उत्पन्न होते हैं । उसीके अति सूक्ष्म कणोंको ' इलैक्ट्रोन ' कहते हैं । इनके ही संघातसे विद्युत् बनती है । यही शक्तिके रूपसे स्थूल आकारमें ' मैटर ' कहलाती है । मैटरकी विरलदशाको ' गैस', तरल दशाको 'लिक्विड ' तथा ठोस दशाको ' सॉलिड ' कहते हैं । ईथरसे उत्पन्न ये पदार्थ घनीभूत होकर और आकर्षण- विकर्षणके नियमसे चक्राकारगतिमें हो जाते हैं । कुछ समयके बाद वही चक्र सूर्य बन जाता है । सूर्यमें गर्मी तथा गतिके कारण चक्कर पड़ जाते हैं । उसके कुछ अंश अलग होकर दूसरे ग्रह बन जाते हैं । उन ग्रहोंसे उपग्रह बनते हैं । इसी प्रकारके ग्रहोंमेंसे हमारी पृथ्वी एक ग्रह है । यह पहले गर्म थी, फिर धीरे - धीरे ठण्डी हुई । उसीसे भाप, बादल, पानी, समुद्र, भूमि एवं जीव पैदा हुए । वनस्पति एवं
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२०८ मार्क्सवाद और रामराज्य जन्तुओंके भी पहले चेतनता उत्पन्न हुई । उसीकी एक शाखा एक कोष्ठधारी ' अमीबा ' बन गयी । अमीबा इतने बढ़े कि उन्हें खाने - पीनेकी वस्तुओंकी दिक्कत होने लगी । उन्हींकी वे संतानें, जो शारीरिक प्रयत्न तथा मानसिक अभ्यासमें बलवान् थीं, जीवन - संग्राममें बच गयीं । वे फिर बढ़ीं और भोजनके लिये संग्राम जारी रहा । योग्य बचे, अयोग्य मारे गये । बचे हुए अमीबा पहलोंसे कुछ भिन्न प्रकारके थे । इनमें भी वही संघर्ष चला । मरते - बचते परिस्थितिके अनुसार आकार- प्रकार बदलते - बदलते मछली, मेढक, साँप, पक्षी, गाय, बैल, बन्दर, वनमानुष और मनुष्यकी उत्पत्ति हुई । ' ' सब प्राणियोंका एक ही तत्त्वसे बनना, सबमें जीवन और संतति धारण करनेवाले समान अवयवोंका होना सिद्ध करता है कि सब एक ही मूलयन्त्रके उसी प्रकार सुधरे हुए रूप हैं, जिस प्रकार आरम्भकी साइकिल भद्दे ढंगकी थी, उसमें सुधार होते - होते आजकी साइकिल बन गयी । अबतककी सभी साइकिलोंको एक कतारमें रखें तो पता लगेगा कि एकके ही ये सब सुधरे हुए रूप हैं । उसी प्रकार सभी प्राणी ' अमीबा ' के सुधरे हुए रूप हैं । जैसे तीन पहिये और दो पहियेकी मोटर दो वस्तुएँ नहीं, वैसे ही बिना पैरका साँप और सैकड़ों पैरवाला कनखजूरा कोई दो वस्तु नहीं । पहलेका सुधारा हुआ रूप ही दूसरा है । पहले सादी फिर संकीर्ण, पहले बिना हड्डीवाली फिर हड्डीवाली, पहले जोड़ोंवाली फिर सपाट रचनाका क्रम यान्त्रिक ही है । जमीन खोदनेसे भी यही क्रम मिलता है । सादी रचनावाले नीचेकी तहोंमें और क्लिष्ट रचनावाले हड्डीवाले ऊपरकी तहोंमें मिलते हैं । मनुष्य गर्भ पहले अमीबाकी तरह एक कोष्ठवाला, फिर मछलीके आकारका, फिर क्रमशः मण्डूक, सर्प एवं पक्षीके आकारका होता है । फिर बन्दरकी शकलका होकर मनुष्य होता है । इस तरहसे भूगोलके प्राणियोंकी शरीर रचना, यत्र- तत्र प्राप्त हड्डियोंकी रचना तथा विभिन्न देशोंमें स्थित प्राणियोंकी शरीर रचनाकी तुलना करनेसे यही प्रतीत होता है कि सब एक ही मौलिक यन्त्रके परिशोधित एवं परिवर्धित स्वरूप हैं । कई स्त्रियोंके चार या आठ स्तन
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विकासवाद २० ९ होते हैं, कई मनुष्योंके पूँछ होती है । इससे मालूम होता है कि मनुष्य भी उन योनियोंसे होकर आया है, जिनमें अधिक स्तन एवं पूँछ होते हैं । कान हिला सकने और आँत उतरनेकी बीमारीसे प्रतीत होती है कि मनुष्यके ये अंग शक्तिहीन हो गये । कहीं एक ही प्राणीमें इन दो प्रकारके प्राणियों- जैसे अंग पाये जाते हैं । चमगादड़, उड़ती गिलहरी, लुप्त कड़ियोंके उत्तम निदर्शक और विकासके प्रमाण हैं । ' इस सम्बन्धमें कहना यह है कि यन्त्रोंका विकास जैसे किसी चेतनकी बुद्धिका परिणाम है, वैसे ही विश्वका विकास भी किसी चेतन ईश्वरसे ही सम्भव है । भले साइकिलें एक ही यन्त्रके विकास हों, फिर भी मोटर, रेल, वायुयान तथा कारखानोंके यन्त्र, सब साइकिलके ही विकास नहीं । इसी तरह साँपोंके अवान्तर भेद साँपोंके विकास भले ही हों, परंतु कनखजूरा, बड़ी गिजाया और छोटी गिजाई आदिका स्वतन्त्र ही अस्तित्व क्यों न माना जाय? निराकार जीव कर्मवश विभिन्न योनियोंसे होता हुआ मनुष्य योनिमें आया, इसमें कोई मतभेद नहीं । किंतु अमुक जीवित देहसे ही सब प्रकारके जीवित देह बने, यह कल्पना सर्वथा निराधार है । कहा जाता है कि ' सम्पूर्ण संसार परिवर्तनका फल है । ' किंतु परिवर्तन या गति जड पदार्थका स्वाभाविक धर्म नहीं हो सकती । व्यवहारमें देखते हैं कि घड़ीमें गतिका परिवर्तन घड़ीका स्वाभाविक धर्म नहीं, बन्दूकद्वारा चलनेवाली गोलीकी गति स्वाभाविक नहीं है, घड़ी और गोली पहले गतिहीन थीं, अन्तमें भी गतिहीन होनेवाली हैं । बीचमें किसी चेतनद्वारा ही उनमें गति मिलती है । इस तरह संसारमें तेज, जल, किरण, वायु आदि सभी पदार्थोंमें गति या परिवर्तन किसी चेतनसे ही मिलना चाहिये । घड़ी और गोलीकी गतिके तुल्य ही संसारकी गति भी न पहले थी, न अन्तमें रहेगी । उसे गति देनेवाला चेतन ईश्वर ही है । ' साइंस एण्ड रिलीजन ' में प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० जे० एम० फ्लेमिंगका कहना है कि ' साइंसके स्वाध्यायसे हमें इस प्राकृतिक जगत्में तरकीब, योजना, धारणा और विचार दिखलायी पड़ते हैं । ये बातें इत्तिफाकसे
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२१० मार्क्सवाद और रामराज्य अचानक नहीं आ गयीं । ये विचार चैतन्यकी सूचना देते हैं । यह संसार बिना विचारवान्के कभी नहीं बन सकता । महर्षिव्यासने भी उपनिषदोंके आधारपर शारीरक सूत्रमें कहा ही है कि जड प्रकृतिमें ईक्षण नहीं बन सकता, किंतु यह संसार ईक्षणपूर्वक ही हो सकता है –' ईक्षतेर्नाशब्दम् । ' ( ब्रह्मसूत्र १।१।५ ) कुछ विकासवादियोंकी कल्पना है कि ' पृथ्वीपर गिरनेवाली तारिकाओंके द्वारा जीवनका बीज हमारे यहाँ पहुँचा । ' परंतु इसमें शंका यह होती है कि क्या प्रोटोप्लॉज्ममें इतनी शक्ति है कि तारिकाओंसे पृथ्वीपर पहुँचनेतक उनमें जीवन अवशिष्ट रह सकता होगा? दूसरी कल्पना यह है कि ‘ असंख्य वर्षोंके पहले अनुकूल स्थिति पानेपर जीवनका एकदम प्रादुर्भाव हुआ । ' परंतु इसपर विकासवादी ही कहते हैं कि ' जीवनका आरम्भ कब हुआ, कैसे हुआ- इसपर वैज्ञानिकोंको अबतक कुछ ज्ञात नहीं । इससे स्पष्ट है कि ' चैतन्य कैसे बनता है, ' यह वैज्ञानिकोंको मालूम नहीं, परंतु उनका विश्वास है कि ' वह है प्राकृतिक, ' क्योंकि उनके मतमें चेतन प्रोटोप्लॉज्म ही है । प्रोटोप्लॉज्म, जो शहदकी भाँति तरल पदार्थ है, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बारह भौतिक पदार्थोंसे बना है, जो कि जड ही हैं । ये भौतिक पदार्थ ' इलेक्ट्रॉनों ' के न्यूनाधिक मेलसे बनते हैं । इलेक्ट्रॉन खण्ड- खण्ड है, अर्थात् ये सब पदार्थ परमाणुओंसे बने हैं, जीव भी प्राकृतिक परमाणुओंसे ही बना है । ' हक्सलेके मतानुसार ' चेतन ' पदार्थ दीपज्योति अथवा पानीके भँवरके तुल्य नित्य प्रतीत होनेपर भी प्रतिक्षण बदलनेवाली व्यक्तियाँ ही हैं । नये- नये परमाणु मिलते जाते हैं, पुराने अलग होते रहते हैं, यह धारा निरन्तर बहती रहती है, इसलिये ज्ञान एवं चैतन्यका सिलसिला नहीं टूटता । नवीन विज्ञानके अनुसार ' प्रत्येक परमाणु कई इलेक्ट्रानोंसे बना होता है । इलेक्ट्रॉन एक- दूसरेसे चिपकते नहीं, प्रत्युत दूर - दूर रहते हैं । जिस प्रकार तारका समूह दूर- दूर रहकर भी एक तारापिण्ड या सौर जगत् कहलाता है, उसी प्रकार अनेकों इलेक्ट्रानोंसे बना हुआ ' ऐटम '
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विकासवाद २११ भी है । इसी ऐटमसे उपर्युक्त बारह पदार्थ बनते हैं । इन्हीं बारह पदार्थोंसे ज्ञान, चैतन्य या आत्मा बना है । अतः वह भी परिवर्तनशील है । ' वैज्ञानिकोंके अनुसार परमाणुओंकी गति प्रति सेकेण्ड एक लाख मील है । यहाँ विचारणीय यह है कि जुदा-जुदा रहकर इतने वेगसे चलनेवाले परमाणु किस प्रकार अपना ज्ञान दूसरे परमाणुमें डालते हैं अथवा किस प्रकार ज्ञान एक परमाणुसे उड़कर दूसरे परमाणुमें जाता है और चैतन्य स्थिर रहता है? बीसों वर्ष पढ़ानेपर भी विद्यार्थी भूल जाता है, परंतु बिना किसी साधनके दूर- दूर स्थित परमाणु इतने वेगसे दौड़ते हुए अपना ज्ञान दूसरेमें फेंककर चले जाते हैं और दूसरे उस ज्ञानको ले लेते हैं । यह कितनी आश्चर्यजनक और कितनी असंगत बात है? दिसम्बर सन् १ ९ २३ के ' चिल्ड्रेन्स न्यूज ' पत्रमें प्रो० रिचर्ड की ' थर्टी इयर्स ऑफ साइकिकल रिसर्च ' नामक पुस्तकका विज्ञापन छपा है । उसीमें पुस्तकका एक उद्धरण है कि ' पचास वर्ष पूर्व भौतिक विज्ञानका यही रुख था कि जो बात भौतिक विज्ञानसे सिद्ध न हो, उसका अस्तित्व ही नहीं, वह ढोंग है । किंतु आज ऐसे भी प्रमाण मिल रहे हैं कि भौतिक विज्ञानकी पहुँचके बाहर भी पदार्थोंका अस्तित्व है । ऐसे पदार्थोंको ‘ साइकिकल ' कहते हैं । यह शब्द जीवके लिये व्यवहृत होता है । जीवात्माको अब कोई भी भौतिक नहीं कहता । ' डार्विनके सुपुत्र प्रो० जार्ज डार्विनने —१६ अगस्त, सन् १ ९ ०५ को दक्षिण अफ्रीकामें ब्रिटिश एशोसियेशनके प्रधानकी हैसियतसे कहा है कि ' जीवनका रहस्य अब भी उतना ही गूढ है, जितना कि पहले था । ' प्रो० गेडिस कहते हैं कि ‘ कुछ प्रामाणिक विज्ञानवेत्ता, जो जीवके एक लोकसे दूसरे लोकमें आगमनकी कल्पनाको संतोषजनक मानते हैं, ऐसा भी मानते हैं कि जीव प्रकृतिकी भाँति अनादि है । ' एक दूसरे विद्वान्का कहना है कि ' चेतनके प्रभावके बिना जड पदार्थोंमें चेतना आ ही नहीं सकती ।' विज्ञानका यह नियम पृथ्वीके आकर्षण नियमके समान अटल प्रतीत होता है । जबसे
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२१२ मार्क्सवाद और रामराज्य मनोविज्ञान, मस्तिष्कशास्त्र एवं आत्मविद्याका अन्वेषण हुआ, तबसे जीव-सम्बन्धी सभी शंकाएँ निवृत्त हो गयीं । मनोविज्ञानके एक विद्वान्का कहना है कि ' किसी भी जीवनकार्यकी संगति भौतिक नियमोंसे स्पष्ट नहीं होती । आँसू या पसीना निकलनेके नियमोंका भी स्पष्टीकरण अभीतक नहीं हो सका ।' मस्तिष्क- शास्त्रके जन्मदाता गॉलका कहना है कि ' मेरी रायमें एक ही निरवयव वस्तु है, जो देखती, सुनती, स्पर्श करती है; प्रेम, विचार एवं स्मरण करती है; पर अपना कार्य करनेके लिये वह मस्तिष्कमें अनेक भौतिक साधन चाहती है । ' इससे वेदान्तके द्रष्टा, स्रष्टा, श्रोता, घ्राता आत्माका ही वर्णन मिलता-जुलता है । आत्मविद्याके प्रसिद्ध पण्डित सर ऑलिवर लॉज लिखते हैं कि ' एक बार आप इस बातको देखें कि अन्तःकरण बड़ी वस्तु है । वह इस मशीन ( शरीर) - से बाहरकी वस्तु है । ऐसा नहीं कि जब शरीर नष्ट होता है, तब वह अपना अस्तित्व खो देती है । हम जितने दिनोंतक पृथ्वीपर रहते हैं, उतने ही दिनोंके लिये हमारा अस्तित्व परिमित नहीं । हम बिना शरीरके भी रह सकते हैं । हमारा अस्तित्व बना ही रहेगा । मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? इसलिये कि ये सब बातें विज्ञानके आधारपर स्थित हैं । बहुतोंने अभी इसका अनुभव नहीं किया, पर यदि कोई तीस-चालीस वर्षतक अपनी आयु इस विषयमें लगाये, तभी वह यह कह सकनेका अधिकारी होगा कि अब मैं किसी स्थितिमें पहुँचा हूँ । ' इन बातोंसे ज्ञात होगा कि जीवका स्वतन्त्र अस्तित्व विज्ञानसम्मत है । अब ईश्वरनियन्त्रित प्रकृतिसे विकास उसी प्रकार मान्य है, जिस प्रकार कलीसे फूलका विकास होता है । जैसे कलीसे फूल ही होगा, भ्रमर नहीं; बीजसे वृक्ष ही होगा, मूँगा नहीं, वैसे ही ईश्वरीय नियमानुसार पदार्थोंका विकास होगा । यह टी० एच० हक्सलेके ' एनीवर्सरी ऐड्रेस ' के इन वाक्योंसे स्पष्ट है कि ' प्रत्येक पशु और वनस्पतिकी सभी जातियोंमें कुछ विशेष प्राणी ऐसे होते हैं, जिनको मैं ' स्थिर आकृति ' नाम देता हूँ; उनमें सृष्टिसे लेकर अबतक कोई विकार नहीं हुआ । '
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विकासवाद २१३ मद्रास हाईकोर्टके जज टी० एल० स्टेजका कहना है कि 'जल- कृमियोंमें बहुत प्रकारके भिन्न-भिन्न रूपवाले जन्तु प्रतिदिन उत्पन्न होते हैं । इनके लिये यह आवश्यक नहीं कि वे एक- दूसरेसे विकृत होकर उत्पन्न हों, प्रत्युत वे तो एक- दूसरेसे अपेक्षारहित होकर एक ही समयमें अलग-अलग आकारके साथ उत्पन्न होते हैं । इससे क्रम - विकासका स्पष्टतया खण्डन हो जाता है । अनुभव भी यही है कि सिरमें मैल जमनेसे जुएँ साक्षात् उत्पन्न होती हैं । वे अनेक अन्य देह धारण करनेके बाद जुएँ नहीं बनतीं । खाटका खटमल मलिनतासे ज्यों -का- त्यों उत्पन्न होता है । मूत्रके कीड़े संसारके समस्त देशोंमें एक ही आकारके उत्पन्न होते हैं । ' इन घटनाओंसे सिद्ध होता है कि अमुक आकार प्राप्त करनेके लिये अनेक आकारोंका चक्कर लगाना आवश्यक नहीं । जिस ईश्वरके द्वारा चन्द्र- सूर्य बनते हैं, जिससे अमीबा बनते हैं, उसीसे स्वतन्त्र अन्य शरीर भी बन सकते हैं । इसीलिये एक आधुनिक वैज्ञानिक अपनी ' प्रिंसिपल्स ऑफ जूलोजी ' (प्राणिविज्ञानके सिद्धान्त ) पुस्तकमें लिखता है कि ' पृथ्वीपर उत्पन्न बिना हड्डीके जन्तुओं और मनुष्यादि हड्डीवाले प्राणियोंमें एक समान ही उन्नति देखी जाती है, परंतु इस समानताका यह अर्थ नहीं कि एक प्रकारके प्राणीसे दूसरे प्रकारके प्राणी विकसित हुए हैं । आदिम मत्स्य ही सर्पणशील प्राणियोंका पूर्वज नहीं और न मनुष्य ही अन्य स्तनधारियोंसे विकसित हुआ है । प्राणियोंकी श्रृंखला किसी अभौतिक तत्त्वसे सम्बन्ध रखती है, जिसने पृथ्वीपर अनेक प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि करके अन्तमें मनुष्यको बनाया है -' ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः । ' ( श्रीमद्भा० ११ । ९ । २८ ) इसके अतिरिक्त परमेश्वरका अस्तित्व माननेपर प्रकृतिकी स्वतन्त्रताका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । फिर तो अनादिसिद्ध जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार उनके सुख-दुःखादि फल- भोगार्थ ही देहका निर्माण अपेक्षित होता है । सुख- दुःखकी न्यूनता-अधिकता देहकी बनावटपर निर्भर है । इस दशामें जिन प्राणियोंको उनके
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२१४ मार्क्सवाद और रामराज्य कर्मानुसार जैसा सुख -दुःख देना है, सीधे तदुपयोगी ही शरीरका निर्माण आवश्यक है । व्यर्थ असंख्य शरीरोंमें घुमा- फिराकर जीवको उस शरीरमें लाना परमात्माके लिये उचित नहीं । कर्मफलोंको भोगानेके लिये यदि किसी अपराधीको तीन मासकी कालकोठरीकी सजा देनी है, तो पुलिस उस व्यक्तिको वर्षों इधर -उधरकी हवालातोंमें भटकाती फिरे, यह न्याय नहीं । अतः ईश्वर एवं जीव-तत्त्व मान लेनेपर फिर क्रम-विकासका कोई भी स्थान नहीं रह जाता । ' विकास -सिद्धान्तकी मान्यता है कि ' चेतनकोष्ठसे प्राणी बनता है । इन्हीं चेतनकोष्ठोंसे समस्त प्राणियोंकी रचना हुई । ' इन सब जीवित प्राणियोंमें तीन सामान्य बातें हैं - ( १ ) सब प्राणियोंके शरीर एक ही सरल पदार्थोंसे बने हैं । पशु-पक्षियोंके शारीरिक तत्त्वोंमें कोई अन्तर नहीं । ( २ ) सब प्राणी अपनी क्षीण शक्ति फिरसे प्राप्त कर लेते हैं । प्रतिदिन काम करके श्रान्त होते हैं, विश्रामके अनन्तर पुनः ताजे हो जाते हैं । ( ३ ) यन्त्रोंकी भाँति सुधरते - सुधरते एक शरीरसे अन्य शरीरवाले होते हैं । सब प्राणियोंके आठ स्थान होते हैं - ( १ ) पोषण- बाहरसे पदार्थ लेना, पचाना और सारे शरीरमें पहुँचाना, ( २ ) श्वासोच्छ्वास, ( ३ ) मलत्याग, ( ४ ) रक्तप्रसार, ( ५ ) प्रेरणा, ( ६ ) आधारस्थान (जिससे शरीर सधा रहता है ), ( ७ ) ज्ञानतन्तु ( जिससे समस्त शरीरका हाल मालूम होता है ) और ( ८) प्रसव | इस तरह सब प्राणियोंके तत्त्व एक-से हैं और आठ स्थान भी एक-से होते हैं । किंतु ये सब बातें भारतके लिये कोई नयी खोज नहीं हैं । यहाँका एक गँवार भी जानता है कि ' पंच रचित अति अधम सरीरा ।' जो जीते, खाते, काम करते तथा संतति उत्पन्न करते हैं, उनमें आठ संस्थान होने ही चाहिये । क्या कोई ऐसा भी मूर्ख होगा, जो समझेगा कि ' भोजन किया जाता है और मलत्याग न किया जायगा?' नालेके पानीकी तरह रक्तका बहना, संतति उत्पन्न करना सभी दुनियाँको अवगत है । हाँ, विचारणीय यह है कि जिस प्रकार यन्त्र धीरे - धीरे सुधरता है, क्या उसी प्रकार प्राणी और से और हो जाता है । वस्तुतः यन्त्र मनुष्यकी परिमित बुद्धिसे बनता है, उसमें अनुभवके आधारपर कुशलता होती है;
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विकासवाद २१५ इसलिये आरम्भिक और अन्तिम रूपमें अन्तर पड़ जाता है; परंतु सर्वज्ञ परमेश्वरकी बुद्धिकी रचना मनुष्य-बुद्धि-जैसी नहीं हो सकती । प्राणियोंके कर्मफलभोगार्थ परमेश्वर तदुचित देह बनाते हैं । जिसके जैसे कर्म, उसे वैसा ही सुख-दुःख भोगना पड़ता है । उसके लिये उसी प्रकारका देह - निर्माण आवश्यक है । शरीरका बनाना यदि स्वतन्त्र प्रकृति या जीवके अधीन माना जाय, तो यन्त्रका दृष्टान्त ठीक हो सकता है । पर यहाँ तो कर्मानुसार शरीर प्रदान करनेवाला ईश्वर है । अतः यन्त्रका दृष्टान्त व्यर्थ है । विकासवादीका कहना है कि ' वैज्ञानिकोंने अबतक कोई ऐसी रीति आविष्कृत नहीं की, जिससे इन परिवर्तनोंको वे परीक्षणोंद्वारा सिद्ध कर सकें और न उनको अबतक यही ज्ञात हो सका कि इस प्रकारके परिवर्तनके नियम क्या हैं? वैज्ञानिकोंको परिवर्तन नियम मालूम नहीं । यह भी मालूम नहीं कि परिवर्तन कैसे होता है? परिवर्तन होते हुए भी किसीने नहीं देखा । अमुक प्राणीका अमुक प्राणी बन गया, इसे किसीने नहीं देखा । आज किसीको भी बन्दरसे मनुष्य बनते नहीं देखा जाता और मनुष्यके बाद मनुष्यसे दूसरा भी कोई प्राणी उत्पन्न होते नहीं दिखायी देता । ऐसी स्थितिमें परिवर्तन सिवा कल्पनाके और कुछ भी सिद्ध नहीं होता । विज्ञानके प्रखर पण्डित भी यही कहते हैं कि ' जीवकी श्रेणियों एवं जातियोंकी उत्पत्तिका रहस्य हमको ज्ञात नहीं । ' थाम्पसनका कहना है कि ' हम नहीं जानते कि ' पृथ्वीपर जीवधारीकी उत्पत्ति कबसे हुई? ' दूसरा एक विद्वान् भी कहता है कि ' इस उजाड़ पृथ्वीपर प्राणीकी उत्पत्ति कैसे हुई, यह हम नहीं जानते । ' कुछ तीसरे लोग डार्विनके ही शब्दोंमें स्वीकार करते हैं कि ' एक जातिसे दूसरी उपजातिकी भिन्नताके नियमोंके सम्बन्धमें हमलोग कुछ नहीं जानते । ' जातिविधान इसी तरह विकासवादी जातिविभाग-शास्त्रके अनुसार साधर्म्य-वैधर्म्यके अनुसार प्राणिवर्गका वर्गीकरण पृष्ठवंशधारी और पृष्ठवंशविहीनोंके भेदसे करते हैं । जबसे रक्तकी परीक्षाका सिलसिला जारी हुआ, तबसे विकासवादियोंका वर्ग - विन्यास गलत सिद्ध हो गया । अबतक लोग ' गिनी
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२१६ मार्क्सवाद और रामराज्य फाउल ' को मुर्गीकी किस्मका समझते थे । पर अब रक्तकी परीक्षासे वह शुतुरमुर्गकी जातिका मालूम होता है । इसी तरह ' विकासवाद ' के लेखकने भालूको श्वान -जातिमें लिखा है । परंतु उसके रुधिरकी परीक्षासे वह सील आदिकी भाँति जलजन्तु सिद्ध हो रहा है । इसके अतिरिक्त जब विकासवादी एक ही प्रकारके मूल प्राणीसे समस्त भूमण्डलके प्राणियोंकी उत्पत्ति मानता है, जब सबके संस्थान एक समान गिनता है और एक ही तरीकेसे विकास मानता है, तब इन सबके रुधिरकण एक ही बनावटके क्यों नहीं होते? किसी जातिके प्राणीका रुधिरकण गोल, किसीका चपटा क्यों होता है? यह रुधिरका पृथक्त्व सिद्ध करता है कि प्रत्येक जातिका शरीर भिन्न प्रकारके रुधिरकणोंसे बना होता है । इससे यह सिद्ध होता है कि समस्त जातियाँ एक ही प्रकारके प्राणीसे विकसित नहीं हुईं; प्रत्युत सबकी उत्पत्ति मूलतः अलग -अलग हुई । तुलनात्मक शरीर- रचना - शास्त्रसे विकासवादकी बहुत ही सामग्री मिलती है । बाह्यरूपमें अत्यन्त भिन्नता होनेपर भी कई प्राणियोंका जातिविभाग इस शास्त्रने एक ही वर्गमें किया है । आन्तरिक रचना- साम्यपर इसका निर्णय होता है । तदनुसार ' चमगादड़, ह्वेल और गौ अनुक्रमसे नभचर, जलचर और भूमिचर होनेपर भी तीनोंका एक ही वर्गमें अन्तर्भाव किया गया है; क्योंकि तीनों ही स्तनधारी हैं । इसके अनुसार अनेक जातिके कुत्तोंमें साधर्म्य वैधर्म्य दोनों ही मौजूद हैं । साधर्म्यसे सब कुत्ते एक ही वर्गके हैं । वैधर्म्यसे बुलडॉग, ताजी और लैंडी आदि अलग - अलग हैं; किंतु हैं सब एक ही पूर्व जन्तुकी संतति । इसी तरह लोमड़ी, सियार और भेड़िया वैषम्यसे अलग हैं । पर मांसभक्षण आदि साम्यसे एक ही पूर्वजन्तुकी संतति प्रतीत होते हैं । बिल्ली और बनबिलाव अलग होते हुए भी एक ही हैं । चीता, व्याघ्र, सिंह अलग-अलग होते हुए भी एक हैं । इन सबका मांसाहारी, स्तनधारी कक्षामें समावेश होता है । इनमें व्याघ्र तथा सिंहके मेलसे और भेड़िये तथा कुत्तेके मेलसे संतति भी होती है । भालू भी मांसभक्षक प्राणी है । इसकी आन्तर- रचना कुत्ते, बिल्लीकी रचनासे कुछ पृथक् है । पर इसका मेल