मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 201–210
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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विकासवाद १९७ अनुसार वास्तविक सत्ताके अस्तित्वका ज्ञान उसके दृश्योंद्वारा होता है । यह दृश्य उसकी प्रतिलिपि नहीं, किंतु उसके संकेत हैं । जैसे वर्णोंका संकेत लिपिद्वारा होता है, उच्चरित एवं लिखित शब्दोंमें समानता नहीं होती । वैसे ही वास्तविक सत्ता तथा उसके दृश्योंमें समानता नहीं है । यही ' रूपान्तरित सद्वाद ' है । वस्तुवादमें बाहरी सत्ताको माना जाता है । इस विषयपर विचार करनेसे विदित होता है कि यह व्यावहारिक सत्ता ही पारमार्थिक सत्तारूपसे कही जाती है । व्यवहारकालमें जिसका बाध न हो, वह व्यावहारिक सत्ता है । अत्यन्ताबाध्य वस्तु ही पारमार्थिक सत्तावाली होती है । ' जी० एच० ल्यू विकासवादके सिद्धान्तको मानता हुआ भी रूपान्तरित वस्तुवादका विरोध करता है । उसका कहना है कि ' जो अनुभवमें आनेवाला है, वही सत्य और वास्तविक है । उसे संकेत मानकर उसके अतिरिक्त वास्तविक सत्ताकी खोज करना मानो रोशनीके पीछे रोशनीकी खोज करना है । ' वह लिखता है कि ' यदि रूपान्तरितवादका भ्रम दूर करना है, तो मेरा युक्तियुक्त वस्तुवाद बुद्धिके भ्रमको दूर करता है । निद्रा, स्वप्न, मूर्च्छा, मृत्यु आदिको देखकर प्राचीन मनुष्योंका ऐसा विश्वास हुआ कि चित्त कोई शरीरसे भिन्न वस्तु है । मरनेके बाद यह चित्त या आत्मा कहीं रहता है, ऐसा विश्वास रखकर ही लोग जादू, प्रार्थना तथा पितृपूजा आदि करते थे । जैसे अन्य विषयोंमें विकास हुआ, वैसे ही धर्मके सम्बन्धमें भी विकास हुआ । प्रेत- पिशाचकी कल्पना ही परिष्कृत होकर देवताओंकी कल्पना बनी और देवताओंकी कल्पना ईश्वरकी कल्पना बनी । वही अब अप्रमेय कल्पनाके रूपमें व्यक्त हुई है । ' उपर्युक्त विचार भी असंगत हैं; क्योंकि शरीरातिरिक्त आत्माका अस्तित्व, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिकी व्यावृत्ति एवं साक्षीकी अनुवृत्ति आदिसे सिद्ध होता है । आत्मा एवं परमेश्वरका निर्णय प्रामाणिक है, कल्पना नहीं । इसपर आगे विचार किया जायगा । फलीभूत सुखके आधारपर आचारका निर्णय होता है । जिससे अधिक सुख हो, वही
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१ ९८ मार्क्सवाद और रामराज्य आचार श्रेष्ठ है । यदि सुख कम मिले तो आचार बुरा है । स्वार्थ, परार्थ दोनों पृथक् होनेके कारण अनर्थकारक हैं । दोनोंमें मेल होनेसे आचारकी उन्नति होती है । स्वार्थसे परार्थ एवं परार्थसे स्वार्थ साधन होता है । सर्वप्रथम स्वार्थप्रयुक्त कलह होता है; फिर प्रत्येकका स्वार्थ परस्पर अधीन देखकर मनुष्य प्रेममय जीवन पसन्द करते हैं । सामाजिक आचारोंमें न्याय और उपकार मुख्य हैं । प्रत्येक व्यक्ति दूसरोंके स्वातन्त्र्यका विरोध न कर जितना और जो चाहे कर सकता है । यही न्यायका नियम है । स्पेंसरके मतानुसार ' समाज और व्यक्तिका अवयवावयवीभाव है । अवयव अवयवीसे पृथक् नहीं हो सकता । जो कार्य समाजके लाभका है, उससे व्यक्तिका भी लाभ होता है । जिस कार्यसे समाजको हानि होती है, उससे व्यक्तिकी भी हानि होती है, यही परार्थका आधार है । परस्पर विरोधके कारण समाजमें राज्य शासनकी आवश्यकता पड़ी । प्रजामें परस्पर आन्तर भेदको बचाना, प्रजाकी बाहरी शत्रुओंसे रक्षा करना राज्यका कार्य है । ' व्यक्तिके कार्योंमें राज्यका हस्तक्षेप उसे अमान्य है । सापेक्षतावादी हेमिल्टनका कहना है कि ' हमारी मानसिक शक्तियोंमें ही सब ज्ञान होते हैं, निरपेक्ष ज्ञान नहीं होता । ' परंतु निरपेक्ष पदार्थ भी असम्भव या असत् नहीं । केवल दृश्य ही प्राणीको दिखायी पड़ते हैं । वे द्रष्टाकी अपेक्षा रखते हैं । यह दृश्य, यह गुण, अवश्य किसी पदार्थके दृश्य होंगे, परंतु वह पदार्थ अज्ञेय रहता है । दृश्य श्रृंखलाकी भिन्नतासे मूल द्रव्यमें भेद भी समझा जा सकता है । डीन मैन्सलका कहना है ' दार्शनिकोंके निश्चित ज्ञानतक न पहुँचनेके आधारपर ही धर्मकी पुष्टि की गयी है । ' बुद्धिवादी लोग धर्ममें जो कठिनाइयाँ देखते हैं, वही तो विज्ञानमें भी कठिनाइयाँ हैं । फिर धर्ममें ही आपत्ति क्यों उठायी जाय? जब एक और अनेकके दुर्भेद्य रहस्यके आगे दार्शनिक मूक हैं और सभी चीजोंकी उत्पत्तिका रहस्य नहीं जान सकते, तब ईश्वरकृत अद्भुत चमत्कारोंको न समझ पाना तो सर्वथा स्वाभाविक है ।
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विकासवाद १९९ हक्सलेके मतानुसार ‘ अपनी रुचि एवं इच्छाओंको सत्यके निर्णयमें बिलकुल स्थान न देना चाहिये । स्वर्ग, अमरत्व आदि यद्यपि इच्छाओंके अनुकूल हैं तथापि जबतक वैज्ञानिक प्रत्यक्ष प्रमाण न मिले, तबतक उनपर विश्वास नहीं करना चाहिये । प्रयोगात्मक जाँचमें जो ठीक उतरे, वही सत्य है । अनुमानमात्र पर्याप्त नहीं है । जो बातें अनुभवमें नहीं आतीं, उनके सम्बन्धमें वैज्ञानिकको चुप रहना चाहिये । ' वैज्ञानिक लोग जो एक मूल द्रव्यको सबका कारण मान लेते हैं, यह अपने अधिकारसे आगे जाना है । यद्यपि उन्होंने प्रत्ययवादियोंके संवित्को बड़ा महत्त्व दिया है, फिर भी ये कहते हैं कि ' भूतवादकी कल्पना अधिक पट सकती है । ' इस तरह वे संवित्का आधार भी मानते हैं और यह भी कहते हैं कि ‘ संवित्के बाहर कोई वस्तु नहीं हो सकती । ' इस तरह भूत या आत्माके सम्बन्धमें ह्यूमके समान यह भी अज्ञेयवादी हैं । इनका कहना है कि भौतिकवादके सम्बन्धमें जहाँतक व्याख्या हो, ठीक ही है, परंतु हमें तो व्यवहारके लिये प्राकृतिक नियमोंका ज्ञान भी पर्याप्त है । हमें आम खानेसे काम है, पेड़ गिननेसे क्या लाभ? अज्ञेय पदार्थ एक हो या अनेक, इसके बारेमें कुछ निश्चय कहा नहीं जा सकता । कर्तव्यके सम्बन्धमें उसका कहना है कि ' हमें प्रकृतिसे ऊँचे उठना चाहिये, उसका अनुकरण नहीं करना चाहिये । ' क्लीफोर्डके अनुसार ‘ सर्व मानसद्रव्य ही सर्वत्र संसारमें फैला है । यही द्रव्यविकासद्वारा ऐन्द्रियक शरीरोंमें इकट्ठा होकर चेतना हो जाता है । मेरे मनसे भिन्न अन्य मनके द्वारा भी जो वस्तु उपलब्ध होती है, वही वस्तुकी वस्तुता है । ' विलियम रीडका कहना है कि ' मनुष्यजाति एक व्यक्ति है । वह पूर्णताकी ओर जा रही है, वही ईश्वर है । ' विकासवादियोंके मतानुसार ' विकासकी पराकाष्ठामें जब मनुष्यमें सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता होगी, तभी ईश्वर कल्पनाकी बात पूरी होगी । ' कहना न होगा कि ' इन जडवादियोंकी कल्पनाओंमें भी परस्पर महान् मतभेद है । ' अनेकों ऐसे पदार्थोंको ' अज्ञेय ' कहकर ही वे सन्तोष कर लेते हैं । डीन मैन्सलके अनुसार ' जब भूतद्रव्यके ही समझनेमें
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२०० मार्क्सवाद और रामराज्य वैज्ञानिकोंको कठिनाई है, तब आध्यात्मिक द्रव्यमें कठिनाई होनेमात्रसे उसमें अविश्वास क्यों किया जाय? जब किसी पदार्थके अस्तित्वके लिये प्रमाण अपेक्षित होता है । तब उसके अभावके लिये भी तो प्रमाण चाहिये ही । यह तो निश्चय ही है कि आधिभौतिक शास्त्रज्ञ भी एक अव्यक्त प्रकृतिको किसी -न- किसी नामसे स्वीकार करते हैं और उसीसे अनेक प्रकारकी सृष्टि मानते हैं । ' इस सम्बन्धमें लोकमान्य तिलकने ' गीता रहस्य ' में लिखा है- ' हेकलकी विश्वकी पहेली ' (Riddle of the universe) - के अनुसार आधुनिक पदार्थ विज्ञानवादीकी दृष्टिमें कार्यके कोई भी गुण कारणके बाहरके गुणोंसे उत्पन्न नहीं होते । जब कारणको कार्यका स्वरूप प्राप्त होता है, तब उस कार्यमें रहनेवाले द्रव्यांश एवं कर्मशक्तिका कुछ भी नाश नहीं होता । पदार्थकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंके द्रव्यांश और कर्मशक्तिके जोड़का वजन भी सदैव एक-सा ही रहता है । न वह घटता है, न बढ़ता है । यह बात प्रत्यक्ष प्रयोगसे सिद्ध है । 'नासतो विद्य भावः ' ( गीता २ । १६ ) -का ठीक यही अर्थ है । प्रथम अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञ प्रपंच सृष्टिके ९२ मूलतत्त्व मानते थे । परंतु अब उन्होंने यह माना कि ' यह मूलतत्त्व स्वयंसिद्ध नहीं । इनकी जड़में कोई एक ही तत्त्व है, उसीसे सूर्य, चन्द्र, तारागण, पृथ्वी आदि सृष्टि उत्पन्न हुई है । उस एक पदार्थको सांख्यानुसार ' प्रकृति ' कहा जाता है । ' इन्द्रियोंके अगोचर, अव्यक्त, सूक्ष्म, अखण्डित एक ही निरवयव मूल द्रव्यसे व्यक्तकी सृष्टि होती है, इस सांख्यमतको ही पाश्चात्य भौतिकवादी भी मान गये हैं । हाँ, वे यह भी कहते हैं कि ' इस मूल द्रव्यकी शक्तिका क्रमशः विकास हो रहा है । पूर्वापर-क्रम छोड़कर अचानक निरर्थक कुछ भी निर्माण नहीं होता । ' इसी मतको ' उत्क्रान्तिवाद ' या ' विकासवाद ' कहा जाता है । तदनुसार सूर्यमालामें पहले कुछ एक ही सूक्ष्म द्रव्य था, उसकी गति अथवा उष्णता परिमाण घटता गया । तब उक्त द्रव्यका अधिकाधिक संकोच होने लगा और पृथ्वीसमेत सब ग्रह क्रमशः उत्पन्न हुए । अन्तमें जो शेष अंश बचा, वही सूर्य है । पृथ्वीका भी सूर्यके सदृश
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विकासवाद २०१ पहले एक उष्ण गोला था । ज्यों - ज्यों उष्णता कम होती गयी, त्यों- त्यों मूल द्रव्योंमेंसे ही कुछ द्रव्य पतले और कुछ घने हो गये । इस प्रकार पृथ्वीके ऊपरका भाग हवा और पानी तथा उसके नीचेका पृथ्वीका जड़ गोला - ये तीन पदार्थ बन गये । इन तीनोंके मिश्रण अथवा संयोगसे सब सजीव एवं निर्जीव सृष्टि उत्पन्न हुई । डार्विन आदिकोंके अनुसार ' छोटे कीड़ोंसे ही विकास होते -होते मनुष्य बन गया। ' यह पीछे कहा जा चुका है कि ' इन लोगोंने चेतनाको भी जडका ही परिणाम माना है । ' परंतु काण्ट आदिका कथन है कि ' सृष्टिका ज्ञान आत्माके एकीकरण व्यापारका फल है । इसलिये आत्माको स्वतन्त्र पदार्थ मानना ही चाहिये । ' बाह्य सृष्टिके ज्ञाता आत्माको स्वयं भी बाह्य सृष्टिका एक भाग मानना वैसा ही असंगत है, जैसा कि किसीका अपने कन्धेपर स्वयं ही बैठ सकना । सांख्योंके सत्त्व, रज, तमके स्थानमें भौतिकवादी गति, उष्णता और आकर्षणशक्ति मानते हैं । पदार्थ एक होनेपर भी उसमें गुणभेदके बिना विचित्र सृष्टि उपपन्न नहीं हो सकती, अतः उस प्रकृतिमें सत्त्व, रज, तम गुण माने जाते हैं । हेकलका कहना है कि ' मन, बुद्धि, आत्मा आदि शरीरके ही धर्म हैं । अतएव जब मनुष्यका मस्तिष्क बिगड़ जाता है, तब उसकी स्मरण-शक्ति नष्ट हो जाती है और वह पागल हो जाता है । सिरपर चोट लगनेसे जब मस्तिष्कका कोई भाग बिगड़ जाता है, तब भी मानसिक शक्ति नष्ट हो जाती है । मस्तिष्कके साथ ही मनोधर्म और आत्मा भी शामिल हैं । इस दृष्टिसे फिर केवल जड अव्यक्त ही रह जाता है । मूल प्रकृतिकी शक्ति ही धीरे- धीरे बढ़ती जाती है । उसीमें चैतन्य या आत्माका स्वरूप व्यक्त होता है । ' सत्कार्यवादके समान ही इस प्रकृतिके भी कुछ नियम हैं । उन्हीं नियमोंके अनुसार जड जगत् और मनुष्य भी उत्पन्न होते हैं । प्रकृति जैसा कराती है, वैसा ही सबको करना पड़ता है । संसार एक कारागार है, सब प्राणी उसके कैदी हैं और पदार्थोंके गुण- धर्म ही बेड़ियाँ हैं । उनका तोड़ना असम्भव है । इसलिये, हेकलके मतानुसार ' एक अव्यक्त प्रकृति ही सब कुछ है । ' यही उसका ' जडाद्वैतवाद ' है । सांख्य-
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२०२ मार्क्सवाद और रामराज्य मतानुसार ' प्रकृतिका कार्य जड प्रपंच ही है, चेतन प्रकृतिसे भिन्न है । ' जड सामग्रीसे ही सब वस्तुओंकी उत्पत्ति हो जाती है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । सांख्यवादी भी स्वतन्त्र, व्यापक, असंग, चेतन, आत्मा और प्रकृतिके समन्वयसे ही सृष्टिप्रपंच मानते हैं । इसी सम्बन्धमें सांख्योंका ‘ पंगु - अन्धन्याय ' * प्रसिद्ध है । जैसे पंगु चल नहीं सकता और अन्धा देख नहीं सकता, दोनोंका जब मेल होता है, पंगुको कन्धेपर चढ़ाकर जब अन्धेके पैर और पंगुके आँखका सहयोग मिलता है, तब गमनादि क्रिया सम्पन्न होती है । वैसे ही अन्धके तुल्य अचेतन प्रकृति और पंगुके तुल्य गति-शक्तिरहित चेतन पुरुष, इन दोनोंके सम्बन्धसे सृष्टि - प्रपंच चलता है । व्यवहारमें अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन अश्वके आधारपर ही होती है । यान्त्रिक प्रवृत्तियोंके भी मूलमें संयोजक होता है । एकत्रित सामग्री कर्ता नहीं बन जाती । संघात या समुदायमात्रमें कर्तृत्व नहीं हो सकता । क्षेत्ररूपी कारखानेमें मनुष्य बुद्धि, मन आदि नौकरोंसे काम करानेवाला कौन है? एकत्रिक सामग्रियाँ भी विलग न हो जायँ, एतदर्थ उन्हें धागासे बाँधना भी पड़ता है अन्यथा वे कभी भी अलग हो जायँगी, अतः कोई नियामक चेतन परमावश्यक है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि ' समुच्चयका गुण चैतन्य है '; क्योंकि जिसमें जो वस्तु असत् है, वह कभी भी सत् नहीं हो सकती-' नासतो विद्यते भावः ' फिर भी समुच्चयोत्पन्न गुणकी अपेक्षा भौतिकवादी समुच्चयको हो चेतन आत्मा मानते हैं, परंतु जब अग्निके बदले लकड़ी, विद्युत्के स्थानपर मेघ और आकर्षणशक्तिके बदले पृथ्वी आदि नहीं ग्रहण किये जाते, तब यह क्यों न माना जाय कि देहादि संघातका, मन, बुद्धि आदिका व्यवस्थापूर्वक काम चलता रहे, एतदर्थ संघातसे भिन्न किसी शक्तिका अंगीकार करना आवश्यक है । भले ही उस शक्तिका अधिष्ठान अगम्य हो, परंतु उसका अपलाप नहीं किया जा सकता । ' संघातका ज्ञान स्वयं संघात ही कर लेता है । ' यह कहना तो सर्वथा असंगत ही है । अतः संघात जिसके लिये प्रवृत्ति होता है, जो संघातका ज्ञाता या प्रवर्तक होता है, उसे मानना * देखिये सांख्यदर्शन ( १।५५ ) तथा सांख्यकारिका ( २१ ) ।
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विकासवाद २०३ आवश्यक है । काण्टका कहना है ' बुद्धिके व्यापारोंका सूक्ष्म निरीक्षण करनेपर मालूम होता है कि मन, बुद्धि, अहंकार, चेतना ये सभी शरीर - क्षेत्रके गुण हैं । उनका प्रवर्त्तक आत्मा इनसे भिन्न स्वतन्त्र और इनसे परे है । किसी भी जीवशास्त्रके तर्क या विज्ञान अथवा यान्त्रिक साधनोंसे इसके विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं मिलता । विकासवादी अधिक -से - अधिक आत्मा या परमेश्वरको अज्ञेय कहते हैं । वेदान्तशास्त्र भी समाधि- सम्पन्न ऋतम्भरा प्रज्ञाके बिना सर्वसाधारणके लिये आत्माको अज्ञेय कहा गया है । दृश्यका प्रकाश द्रष्टासे होता है । दृश्यसे द्रष्टाका प्रकाश नहीं होता । इसीलिये देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि सभी प्रपंचका भासक सर्वद्रष्टा आत्मा है । इन दृश्योंके द्वारा उसका प्रकाश नहीं हो सकता, इसीलिये उसे अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य माना जाता है । फिर भी वही सबका अधिष्ठान एवं सबका भासक, स्वयंप्रकाश है । अतः उसके सम्बन्धमें संशय, भ्रम एवं अज्ञान हो ही नहीं सकते; क्योंकि जिसके द्वारा संशय, भ्रम तथा अज्ञानका भी भान होता है, उसकी सत्ताका अपलाप कौन कर सकता है? '- ' येनेद सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात्। ' (बृहदा० उप ० २।४।१४ ) -अर्थात् जिसके द्वारा सब वस्तुओंको जाना जाता है, उसे किससे जाना जाय । नियमपूर्वक प्रवृत्तिके लिये ही प्रकृतिका प्रथम परिणाम महत्तत्त्व माना जाता है । समष्टिबुद्धि ही महत्तत्त्व है, परंतु चैतन्य -सम्पर्कके बिना जड प्रकृतिके परिणाम बुद्धितत्त्व या महत्तत्त्वसे भी नियमित प्रवृत्तिका उपपादन नहीं हो सकता । ईश्वर एवं आत्माके सम्बन्धमें विकासवादियोंका मत अस्पष्ट, अधूरा एवं भ्रान्तिपूर्ण है । ' संघर्ष एवं स्वार्थ ही जीवनका सार है । परोपकारका भी अन्तिम लक्ष्य स्वार्थ ही है ' यह मत भी विकासवादियोंका असंगत ही है । कहा जा चुका है कि कितने ही लोग परोपकारको ही स्वार्थ समझते हैं । व्याघ्र - जैसे हिंस्र प्राणी भी अपने बच्चोंके लिये प्राणतक
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२०४ मार्क्सवाद और रामराज्य देते देखे जाते हैं । डॉक्टर गेडोके मतानुसार ' पानीकी मछलियोंका मनुष्यतक विकास होनेमें ५३७५००० पीढ़ियाँ बीत गयीं । ' कई लोग इससे भी अधिक संख्याका अनुमान लगाते हैं । मछलियोंसे पहलेकी संख्या यदि गिनी जाय, तब तो पीढ़ियोंकी संख्या भी बढ़ जाती है । सूक्ष्म जन्तुओंका ही मछलियों, कछुओं, पक्षियों, बन्दरों तथा मनुष्योंके रूपमें परिणाम बतलानेवाले दार्शनिक अनेक चित्रों और फोटो आदिद्वारा विकासक्रमको प्रत्यक्ष- सा दिखला देते हैं, परंतु यदि यह विकासक्रम वास्तविक है, तो फिर बन्दरोंसे बन्दरोंकी, मनुष्योंसे मनुष्योंकी, पक्षियोंसे पक्षियोंकी और मछलियोंसे मछलियोंकी उत्पत्तिका नियम क्यों उपलब्ध हो रहा है? आज भी बन्दरोंकी परम्परासे मनुष्योंका जन्म होता हुआ दिखायी क्यों नहीं देता? किंचिन्मात्र सादृश्यसे अन्यत्र अन्य रूपमें परिणाम नहीं सिद्ध किया जा सकता । कितने ही पौधे समान ढंगके होते हुए भी गुणोंमें भिन्न हैं । कोई जहर है तो कोई अमृत है । समान घोड़ोंमें भी हय, अश्व, अर्वा आदिमें जातिभेद माना जाता है । मनुष्योंमें भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि जातिभेद मान्य होता है । वृक्षों, पशुओं तथा जलचर जन्तुओंमें अवान्तर बहुत अधिक समानता होनेपर भी उनमें जाति, गुण आदिका भेद होता है । शुभ- अशुभ कर्मोंके अनुसार ही जातिभेद शास्त्रीय दृष्टिसे मान्य है । जाति, आयु, भोगका आरम्भक कर्म ही प्रारब्धकर्म माना जाता है । कार्यकी विलक्षणता कारणकी विलक्षणतासे ही सम्भव होती है । अतः कर्म -वैचित्र्यसे जाति -वैचित्र्यकी मान्यता संगत है । विभिन्न ढंगके बीजोंसे विभिन्न ढंगके अंकुरोंकी उत्पत्ति होती है । विभिन्न प्राणियोंके सजातीय शुक्र- शोणितोंसे सजातीय प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है । विजातीय प्राणियोंसे विजातीयोंकी उत्पत्ति अदृष्टचर है । विजातीय शुक्र- शोणितोंसे भी संतानोत्पत्तिमें बाधा पड़ती है । फिर इस दृष्ट कार्य-कारण- भावको छोड़कर अदृष्टकी कल्पना सर्वथा अपार्थक है । जब भिन्न-भिन्न परम्पराएँ उपलब्ध हैं ही, तब बीजरूपसे तथा शक्तिरूपसे उन्हें स्वतन्त्र ही क्यों न माना जाय? निम्बसे आम्रकी उत्पत्ति नहीं होती, बालूसे तैल
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विकासवाद २०५ नहीं निकलता तथा अश्वसे महिषकी उत्पत्ति नहीं होती; क्योंकि निम्ब आदिमें आम्र आदिका शक्तिरूपसे अस्तित्व नहीं है । ' असत्की उत्पत्ति और सत्का विनाश नहीं होता, ' यह सिद्धान्त दृढ़ है । इसीलिये बन्दरोंसे मनुष्योंकी उत्पत्ति दृष्ट नहीं होती । इस तरह एक मूल प्रकृति या कारणब्रह्मसे ही समस्त प्रपंचकी उत्पत्ति होती है । सर्वकार्यानुगुण शक्तियाँ कारणमें रहती हैं । राजनीतिके सम्बन्धमें भी विकासवादियोंकी ऐसी ही कल्पनाएँ हैं । स्पेंसरका यह भी कहना है कि ' गरीबी एवं निर्बलता भी प्राकृतिक है । जो योग्य होता है, वही जीवित रहता है । जो परिस्थितिके अनुकूल अपने -आपको नहीं बना सकते, ऐसे प्राणी मर जाते हैं । इसी तरह जो व्यक्ति वैज्ञानिक परिवर्तनके साथ अपनेको परिवर्तित नहीं कर सकता और विपरीत परिस्थितिमें नहीं रख सकता, वही गरीब होता है । उसके सुधारमें शासनको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये । ' इसके मतानुसार ' यदि कोई अध्यापक उष्णता न सह सकनेके कारण मूर्च्छित हो गया हो तो विद्यार्थियोंको उसे वैसे ही मूच्छित छोड़कर चल देना चाहिये और उसे स्वयं परिस्थितिसे मुकाबला करनेके लिये छोड़ देना चाहिये । ' विज्ञान या साइंसमें भी पर्याप्त मतभेद है । डार्विन, हेकल आदि समयके प्राचीन साइंसने आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म आदिके सम्बन्धमें बहुत-सी उलटी बातें कहीं, परंतु सत्यकी खोज करनेवाले वैज्ञानिकोंकी खोज निरन्तर चल ही रही है । लगभग अर्धशताब्दीसे तो विज्ञानने ही प्राणिविज्ञान-सिद्धान्तमें पर्याप्त रद्दो -बदल कर दिया । विकासवाद तो वस्तुतः खण्डित ही हो गया, किंतु स्वेच्छाचारियोंके लिये आत्मा, ईश्वर, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि जहरके समान कडुए प्रतीत होते हैं । अतः वे लोग अब भी उसी जडवाद विकासवादकी रट लगा रहे हैं; क्योंकि विकासवादमें ईश्वर, धर्म आदिसे छुट्टी मिल जाती है । अतः जो वस्तु वैज्ञानिकोंकी दृष्टिसे गलत, सिद्ध हो चुकी, उसी विकासवाद– जडवादके पीछे उच्छृंखल लोग पड़े हुए हैं । ' साइंस ऐण्ड रिलीजन ' ( धर्म एवं विज्ञान) पुस्तकमें सर ओलिवर
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२०६ मार्क्सवाद और रामराज्य जोजेफ लाज एफ् ० आर० एस० डी० एस -सी०, एल-एल० डी०, प्रो० जॉन एम्बोज, प्रो० डब्ल्यू० बी० बाट्मली, प्रो० एडवर्ड हल, जॉन एलन हार्कर, प्रो० जर्मन सिम्स उडहेड तथा प्रो० सिलवेनिस फिलिप्स थॉम्पसन— इन सात प्रसिद्ध वैज्ञानिकोंके मन्तव्योंका उल्लेख है । इस पुस्तकमें ईश्वर, जीव, धर्म एवं विकासके सम्बन्धमें डार्विन आदिके मतका खण्डनकर आस्तिक पक्षका समर्थन किया गया है । वर्तमान वैज्ञानिक प्राचीन वैज्ञानिकोंको ' पुराना ' कहकर उनके मतकी उपेक्षा करते हैं । प्रो० बाट्मली कहते हैं कि ' हेकलका प्राचीन भौतिकवाद वर्तमान युगसे बिलकुल दूर है । हेकलकी ' दि रिड्ल ऑफ युनिवर्स ' का उत्तर ' रद्दी विचार एवं नूतन उत्तर ' ( दि ओल्ड रिड्ल एण्ड न्यूएस्ट आंसर) पुस्तकमें दिया गया है । उस पुस्तकमें यह भी कहा गया है कि ' नवीन वैज्ञानिक पहलेकी अन्धी प्रकृतिके हाथमें न रहकर प्रकृतिको अपने हाथमें रखनेकी शिक्षा देते हैं । विकासको मनमाना नहीं, प्रत्युत नियमबद्ध होकर कार्य करनेवाला बतलाते हैं । विकासके द्वारा परमात्माका दर्शन करते हैं । डार्विन, हक्सले, हेकल आदिके समयका संसार केवल प्राकृतिक था; परंतु अबके वैज्ञानिकोंको सर्वज्ञ परमेश्वर भी स्वीकृत है । डार्विनकी प्रकृति भी अब ईश्वरसे नियन्त्रित है । साइकोलॉजी ( मनोविज्ञान ), फ्रीनालोजी ( मस्तिष्कशास्त्र ) और स्पिरिचुअलिज्म ( आधुनिक परलोकवाद) - के पण्डित जीवका अस्तित्व एवं उसका जन्मान्तर भी स्वीकृत करते हैं । ' इस तरह कर्मोंद्वारा जीवोंकी अवस्था बदलती है । मनमानी प्रकृति मक्खीसे चिड़िया और चिड़ियासे साँप नहीं बना सकती । सर ओलिवर लाजका कहना है कि ' विकास तो कुड्मल ( कलिका) -से पुष्प एवं बीजसे अंकुर बनानेवाला निश्चित नियम है । नवीन विज्ञानके अनुसार कई प्राणी ऐसे पाये गये हैं, जिन्होंने अपने आदि जन्मसे लेकर अबतक अपना रूप बिलकुल नहीं बदला । यही ' स्थिर शरीरवाले ' कहे जाते हैं । हेकल आदिके अनुसार मनुष्यको हुए ८ लाख २० हजार वर्ष हुए । इसी बीच उसने अपनी उन्नति की । पर मि० जॉन् टी० रोडको नेवादामें एक ६० लाख वर्षका पुराना जूतेका तल्ला पत्थरकी दशामें मिला, तबसे तो