मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 271–280
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280
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विकासवाद २६७ दूसरे नियमका उदाहरण कलमी आम है । कलमी आम बोनेसे दो पीढ़ियोंमें वह साधारण आम हो जाता है । भेड़िये कुत्ते और चीते - सिंहके संयोगसे यदि संतान होती है, तो भी कुछ ही पीढ़ियोंके बाद वह कुत्ते और चीतेकी-सी हो जाती है । यही सिद्धान्त सन् १ ९ २२ के ' न्यू एज ' में प्रकाशित है । हेनरी डमंड्रसका भी यही मत है । मेन्डलके ' कभी- कभी बच्चोंका पिताकी अपेक्षा पितामहके साथ बहुत मेल दिखलायी पड़ता है ', इस कथनका भी यही अभिप्राय है । यदि कोई व्यक्ति अपनेमें कुछ अमर्यादित हेर- फेर कर डाले तो भी उसकी संतानमें वे चिह्न प्रकट नहीं होते, किंतु वह पितामहके गुणोंकी ही होती है । इससे पता लगता है कि प्रकृति पुरानी जातियोंकी ही रक्षा चाहती है । तीसरे नियमके अनुसार बेहिसाब ( अमर्यादित ) परिवर्तन होते ही वंश रुक जाता है, जैसे घोड़े - गधेके संयोगसे खच्चर उत्पन्न होते हैं, परंतु उनका वंश नहीं चलता है । जापानके मुर्गोंका भी वंश बन्द हो जाता है । पाँच पैरकी गाय, पेबन्दी बेर आदिका वंश भी बन्द हो जाता है । लामार्कने चूहोंकी दुम काटकर बिना दुमके चूहे पैदा करना चाहा था । अनेकों पीढ़ियोंतक वह प्रयत्न करता रहा, परंतु बिना पूँछके चूहे नहीं हुए । लेसिस्टर शायरके कुछ भेड़ चरानेवाले अपनी कुछ भेड़ोंको घोड़ेके बराबर और कुछ भेड़ोंको चूहोंके बराबर बनाना चाहते थे, परंतु दोनों प्रयत्न विफल हुए, उनका घटना बढ़ना सीमित ही रहा । प्राकृतिक चुनावके नमूने तो प्रायः सभी हैं, सामान्य भेद इन सबमें होता है । समान जातिमें समान उमरकी स्त्रियों, पुरुषों तथा पशुओं आदि सबमें भेद पहचाना जाता है । भेदके बिना तो पहचान और व्यवहार ही नहीं चल सकता । विकासवादी कहते हैं कि ' हममें और आपमें जो भेद है, यही आगे चलकर गिलहरीको रीछ बना देता है । ' परंतु यह असत्य है । सामान्य भेद तो व्यवहारमें अत्यन्त उपयोगी और ईश्वरदत्त ही है । हिन्दू लाखों वर्षोंसे कान छिदवाते हैं; मुसलमान सैकड़ों वर्षोंसे खतना कराते हैं; चीनकी स्त्रियाँ हजारों वर्षोंसे अपने पैर छोटे बनानेका प्रयत्न करती हैं; परंतु उनसे वैसी संतानें कभी नहीं हुईं । अतः कहना होगा कि कृत्रिम
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२६८ मार्क्सवाद और रामराज्य विकास अमर्यादित नहीं होता । विलायतकी विधाओंसे गायोंकी वृद्धिसे भी नवीन जातिकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती । डार्विनका सिद्धान्त है कि ' माता-पिताके प्रत्येक अंगसे सार एकत्रित होकर संततिका जन्म होता है । ' वाइजमैनका कहना है कि ' इस सारके एकत्रित होनेमें यदि बीचमें कोई परिवर्तन उद्भूत हो तो वह संततिमें संक्रमित न होगा । ' मेन्डलका मत है कि ' कभी लड़का पिताकी अपेक्षा पितामहके गुणका संग्रह करता है । ' ह्वाइजकी राय है कि ' कभी- कभी नयी - नयी जातियाँ अकस्मात् उत्पन्न हो जाती हैं । ' ये सिद्धान्त तथा हेतुवाद और अज्ञात- ज्ञेय आदि सिद्धान्त मिलकर विकासके विरुद्ध ही ठहरते हैं । इनमेंसे पहली बात ' अङ्गादङ्गात्सम्भवसि ' इत्यादि वेदोंकी ही हैं । पुत्रमें नया परिवर्तन नहीं आता । ऐसे स्थलमें पुत्र पितामहके ही गुणोंको ग्रहण करता है । इससे जातिकी स्थिरता ही सिद्ध होती है । नवीन जलकृमियोंकी उत्पत्तिमें भी किसी शरीर बननेके लिये विकास आवश्यक नहीं । हेतुवाद और अज्ञात ज्ञेयशक्तिसे तो यही निश्चय किया जा सकता है कि ईश्वर ही कर्मानुसार प्राणियोंकी रचना करता है, क्रम- विकास आवश्यक नहीं है । ' विकासवाद ' पुस्तकमें भी लिखा है कि ' प्राणियोंकी उत्पत्ति विकासद्वारा हुई या नहीं, एक प्रकारके प्राणीसे भिन्न-भिन्न प्रकारके प्राणी बनते हैं या नहीं, इस प्रकार निरीक्षण करनेवाला मनुष्य भी विकास- क्रियाके किसी अत्यन्त सूक्ष्म भागको भी प्रत्यक्ष होते हुए पूर्णतया नहीं देख सकता । कई प्रश्नोंके सम्पूर्ण उत्तर प्राप्त करनेकी आशा भी नहीं करनी चाहिये । ' अतः विकासवाद एक कल्पना ही है, सिद्धान्त नहीं । ' समाजमें निर्बलोंको जीनेका हक नहीं है ', यह कल्पना कितनी भीषण है । मनुष्य और रीछ अथवा भैंसकी तुलना करें तो यह स्पष्ट ही है कि शरीर, बलमें रीछ और भैंस दोनों अधिक ठहरेंगे । मनुष्य इनसे शरीर, बलमें अवश्य हार जायगा तथापि मनुष्य बुद्धिके कारण अधिक बलवान् सिद्ध होता है । मनुष्योंमें भी अधिक बुद्धिमान् ही प्रबल ठहरता है । नीतिबल, बुद्धि और शरीर- बलसे भी अधिक महत्त्वका है । सोडम और
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विकासवाद २६९ गभोरानिवासी अनीतिके कारण ही नष्ट हो गये । नीतिमान्, शान्त, निर्व्यसन अधिक दीर्घजीवी होते हैं । जो जाति परमार्थ- बुद्धिकी अपेक्षा अधिक स्वार्थ- बुद्धि रखती है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है । जानवरोंमें भी परमार्थ - बुद्धि पायी जाती है । शेर, व्याघ्र-जैसे खूँखार प्राणी भी अपने बच्चोंको दूध पिलाते हैं, प्यार करते हैं । मनुष्यका स्वार्थ त्यागी होना ही महत्त्व है । अतः ' जीवन - संग्राममें बलवानोंकी ही विजय होती है, यह कहना सत्य नहीं । कई लोग पुराणोंकी चौरासी लक्ष योनियोंके वर्णन और मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह आदि अवतारोंके द्वारा भी विकासवाद सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं । इसी तरह कई लोग कुछ वेद- मन्त्रोंको भी विकास- सिद्धिके लिये उद्धृत करते हैं, परंतु वेदों और पुराणोंसे डार्विनका विकास कथमपि सिद्ध नहीं हो सकता । पुराणोंके अनुसार एक प्राणीसे दूसरे प्राणीका विकास सिद्ध नहीं होता । किंतु सभी योनियाँ स्वतन्त्र मानी गयी हैं । अवतारोंमें भी मत्स्य; कच्छपादि स्वतन्त्र अवतार हैं । ' मत्स्यसे कच्छपका विकास हुआ है ' यह पुराणोंसे नहीं सिद्ध होता । ' क्रिश्चियन हेरल्ड ' में छपे अनुसार ' ब्रिटिश साइन्स सोसाइटी ' के आस्ट्रेलिया अधिवेशनमें सभापति -पदसे प्रो० विलियम वेटसनने कहा था कि ‘ डार्विनका विकासवाद बिलकुल असत्य और विज्ञानके विरुद्ध है । ' अमेरिकाकी कई रियासतोंने स्कूलोंमें डार्विन- सिद्धान्तकी शिक्षाको कानूनके विरुद्ध ठहराया । वहाँके एक जजने अपने एक फैसलेमें लिखा था कि ‘ ऊँचे दरजेके विद्वान् अब विकासवादपर विश्वास नहीं करते । ' प्रो० पेट्रिक गेडिसका कहना है कि ' मनुष्यके विकासके प्रमाण संदिग्ध हैं । साइन्समें उनके लिये कोई स्थान नहीं । ' सर जे० डब्ल्यू० डासनका कहना है ‘ विज्ञानको बन्दर और मनुष्यके बीचकी आकृतिका कुछ भी पता नहीं है । मनुष्यकी प्राचीनतम अस्थियाँ भी वर्तमान-जैसी ही हैं । ' प्रसिद्ध विद्वान् बुड जोन्सका कहना है कि ' डार्विनसे गलती हुई मनुष्य बन्दरसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु बन्दर मनुष्यसे उत्पन्न हुए हैं । ' सिडनी कालेटका कहना है कि ' साइन्स स्पष्ट साक्षी है कि मनुष्य अवनत दशासे उन्नत दशाकी ओर चलनेके स्थानमें उलटा अवनतिकी ओर जा रहा है ।
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२७० मार्क्सवाद और रामराज्य उसकी आरम्भिक दशा उत्तम थी । ' प्रागुत्तर अश्मकालकी एक खोपड़ी मिली है । यह खोपड़ी जिस सिरकी है, वह यूरोपमें सबसे बड़ा समझा जाता है । यह खोपड़ी एक सौ चौदह क्यूबिक ( घन) इंच है । यूरोपमें छोटे -से-छोटे सिर ५० क्यूबिक इंच और बड़े - से- बड़ा ७५ क्यूबिक इंचका पाया गया है । इससे स्पष्ट है कि वर्तमान यूरोपनिवासियोंकी दिमागी ताकत बढ़ नहीं रही है । सन् १८८३ में एक सिर हालैण्डमें निकला, जो यूरोपनिवासियोंके औसत घेरेसे बड़ा है । इसका घेरा १५० क्यूबिक इंच है । भूगर्भशास्त्रियों और पुरातत्त्वज्ञोंने ' हालींग सेक्शन ' को २५ हजार वर्ष पुराना बतलाया है । इसका घेरा भी १५० क्यूबिक इंच है । इन सब बातोंसे सिद्ध होता है कि प्राचीन मनुष्योंका विकास हीनमस्तिष्क बन्दरोंसे नहीं हुआ, किंतु वे परमात्माकी विशिष्ट रचना थे । आजके उत्तम- से -उत्तम मनुष्योंकी अपेक्षा वे अधिक उन्नत थे । विकासवादी शंका करते हैं कि ' यदि क्रमोन्नतिका सिद्धान्त न माना जाय तो फिर दीर्घकाय प्राणियोंकी उत्पत्ति कैसे सम्भव हो सकती है? इतना बड़ा मनुष्य एकाएक आदि कालमें कैसे पैदा हो गया? ' परंतु वे एक कोष्ठके अमीबाकी एकाएक उत्पत्ति मान लेते हैं; परंतु अनेक कोष्ठसंयुक्त मनुष्य प्राणीका आप-से- आप उत्पन्न होना नहीं मानते । परंतु बात सरल है, जिस महाशक्तिके प्रभावसे एक कोष्ठवाला अमीबा उत्पन्न हो सकता है, उस शक्तिको अनेक कोष्ठवाले मनुष्यके उत्पादनमें क्या कठिनाई है? जो बड़े - बड़े सूर्य, चन्द्र और छोटे- छोटे अमीबाको बना सकती है, वही शक्ति गाय, बैल, हाथी, बन्दर, मनुष्य सबको बना सकती है । आरम्भिक सृष्टिको नये पुराने सभी विद्वान् ' अमैथुनी सृष्टि ' नामसे कहते हैं । प्रो० मैक्समूलर लिखता है -' कहा जाता है कि आदिमें एक ही मनुष्य नहीं था, किंतु हम हर प्रकारसे यह ख्याल कर सकते हैं कि आदिमें कुछ पुरुष और स्त्रियाँ उत्पन्न हुई थीं । ' मद्रास हाईकोर्टके जज टी० एल० स्ट्रेन्ज अपनी ' दि डेव्लप्मेंट ऑफ क्रियेशन् ऑन दी अर्थ ( पृथ्वीपर सृष्टिका विकास ) ' पुस्तकमें लिखते हैं कि ' आदि सृष्टि अमैथुनी होती है । इस अमैथुनी सृष्टिमें उत्तम और
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विकासवाद २७१ सुडौल शरीर बनते हैं । ' ' वैशेषिक दर्शन ' का भी कहना है कि ' शरीर दो प्रकारका होता है - योनिज और अयोनिज'-' तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजं च । ' इसपर ' प्रशस्तपादीय भाष्य ' है— ' तत्रायोनिजमनपेक्षितशुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेष- सहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । ' अर्थात् देवता और ऋषियोंके शरीर शुक्र- शोणितके बिना ही धर्मविशेषसहित अणुओंसे उत्पन्न होते हैं । इन सब बातोंसे सिद्ध होता है कि विकासवाद अत्यन्त भ्रान्तिपूर्ण वाद है । मनुष्य जाति ' मनुष्य-जातिका विकास वनमनुष्योंसे हुआ है ', ' जावाद्वीपके कलिंग नामक मनुष्य अधिकतर वनमनुष्योंसे मिलते हैं, अतः वे ही मनुष्य-जातिके पूर्वपितामह हैं ', यह सब कथन भ्रान्तिपूर्ण हैं । अतएव जो कहा जाता है कि ' यही मनुष्य-समुदायकी समस्त शाखाओंका जन्मदाता है ' यह सब भी भ्रान्तिपूर्ण है; क्योंकि जब विकासवादका सिद्धान्त ही खण्डित हो गया, तब उसके आधारपर शास्त्र- विरुद्ध कोई कल्पना निराधार ही है । आजकलका सिद्धान्त है कि मनुष्य-जातिके चार विभाग हैं, उसीके भीतर हजारों विभाग आ जाते हैं- ( १ ) श्वेत रंग, लम्बी आकृतिवाला काकेशस, ( २ ) पीले रंग, चौड़ी आकृतिवाला मंगोलिक, ( ३ ) काले रंग, मोटी आकृतिवाला ईथियोपिक ( निग्रो ) और (४ ) लाल रंग और पतली आकृतिवाला रेड-इण्डियन । आधुनिक वैज्ञानिकोंका कहना है कि मनुष्य-जातिके चारों विभागोंमें काकेशस विभाग सर्वश्रेष्ठ है । इस विभागके लोग गौरांग हैं । इसी विभागसे सब रंगवालोंकी उत्पत्ति हुई है । विद्वानोंकी खोज है कि हेमाइट लोग काकेशस वंशके हैं और सफेदसे भूरे और काले रंगके हो गये हैं । उनके बाल सीधे और नीग्रो जातिके -से घुँघराले होते हैं । ' हेमिटिक शाखाके लोग मिस्रमें रहते हैं । विद्वानोंने यह भी स्वीकार किया है कि अमेरिकाके लाल रंगवाले मूल निवासियोंका मिलान मिस्रनिवासी हेमिटिकोंसे ही होता है । इन्हींकी एक हिमेराइत जाति लाल मनुष्य भी कहलाती है । यह जाति जिस समुद्रके किनारे रहती है, उसे
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२७२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी लाल सागर कहा जाता है । श्वेतांग यूरोपियन भी अपनेको काकेशिक विभागके ही कहते हैं । इस तरह लाल, पीले, काले और सफेद रंगके चारों समुदाय काकेशिक विभागसे ही उत्पन्न हुए देखे जाते हैं । दूसरी खोज यह है कि संसारके जितने मनुष्य हैं, सब हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओंमें अन्तर्भूत हो जाते हैं । मिस्रनिवासी हेमिटिक हैं । इनके यहाँ मुर्दोंमें मसाला भरकर रखनेका रिवाज था । मिस्रके पिरामिड इन्हीं मुर्दोंको रखनेके लिये बनाये जाते थे । अब पता चलता है कि अमेरिकाके लाल रंगवाले मूल- निवासियोंमें भी यही रिवाज था । अन्वेषकोंको यहाँ भी पिरामिड मिले हैं । इससे इन दोनोंकी एकता ही प्रतीत होती है । ' ' काकेशस- विभागकी दूसरी शाखा सेमिटिक है । इसमें अरब, बेबिलोन, सीरिया और जुडियाके यहूदी आदि सम्मिलित हैं । इसीकी एक शाखा अब हिट्टाइट है, जो पहले कभी मेसोपोटामियामें रहा करती थी । मेसोपोटामियामें अन्वेषकोंको ३४ सौ वर्षकी ईंटें मिली हैं, जिनमें इनके सुलहनामे लिखे हुए हैं । इन्हीं लोगोंका एक दल भारतवर्षमें रहता है, जिसे ' द्रविड़ ' कहते । भारतके द्रविड़ोंकी भाषा मंगोलिक और निग्रो विभागोंको जोड़ती है । भाषा ही नहीं, उनका रूप, रंग और शारीरिक गठन भी एक ही है । विद्वानोंने पता लगाया है कि भारतके द्रविड़ोंकी भाषा आस्ट्रेलियाकी भाषाकी भाँति है और वह भाषा मंगोलिक विभागसे भी मिलती है । आस्ट्रेलियानिवासी शुद्ध निग्रो जातिके हैं, जो द्रविड़ जातिसे भी सम्बन्ध रखते हैं । इसी तरह मंगोलिक विभागसे भी द्रविड़ लोग सम्बन्ध रखते हैं । इन सब बातोंसे द्रविड़ जाति निग्रो और मंगोलिक विभागोंको जोड़कर अपना मूल स्रोत सेमिटिक शाखासे स्थापित करती है । इसी तरह हेमिटिक शाखा अमेरिकाके मूल निवासियोंको जोड़ती है । इस तरह काकेशिक विभागके हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओंसे ही मंगोलियन, अमेरिकन और निग्रो विभागोंका सम्बन्ध सूचित होता है । इस तरह संसारके काले, पीले, लाल और सफेद रंगवाले चारों विभाग काकेशिक विभागकी हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओंसे ही उत्पन्न हुए हैं । '
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विकासवाद २७३ वस्तुतः नूहका तूफान, वैवस्वत मनुकी मछलीवाली कथाका अनुवाद है । नूहके पुत्र हेमकी संतति, जो मिस्रमें रहती है, अपना सम्बन्ध राजा मनुसे बतलाती है और अपनेको सूर्यवंशी कहती है और मनु वैवस्वतके मूल विवस्वान् सूर्यको अपना इष्ट समझती है । इन मिस्रवालोंकी ही संतति अमेरिकाके मूल निवासी बतलाये जाते हैं । वे भी सूर्यवंशी राजा रामचन्द्रका ' राम- सीतव ' उत्सव मनाते हैं । अन्वेषकोंको वहाँ सूर्यका मन्दिर भी मिला है । मनुकी मछली एवं नूहके प्लावनकी कथा मिस्र, बेबिलोन, सीरिया, चाल्डिया, जूड़िया, फारस, अरब, ग्रीस, भारत, चीन, अमेरिका आदि संसारके सभी देशों एवं सभी जातियोंमें पायी जाती है । इससे भी सिद्ध होता है कि मनुसे ही समस्त मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है । बाइबिलमें बतलायी हुई नूहकी पीढ़ियाँ काल्पनिक हैं । आदमसे नूहतक ११ पीढ़ियाँ होती हैं और वर्ष -संख्या २२६२ है । नूहके पुत्र सेमसे इब्राहीमतक ११ पीढ़ियोंके तेरह सौ दस वर्ष कहे गये हैं । यह गणना विश्वासयोग्य नहीं । जब मनु और नूह एक ही हैं, तब उन्हें हुए लाखों वर्ष हो गये । कहा जाता है कि मिस्रकी भाषामें ' नून ' शब्दका ' मछली ' अर्थ होता है । ' नून ' अक्षर फिनीशियामें ' ईल ' नामक मछलीकी शकलका होता है । अंग्रेजी तथा अरबीमें भी यह अक्षर मछलीकी तरह ही होता है । मछलीके ही ढंगकी नाव होती है । हजरत नूहको ' नौवा' भी कहा जाता था । इस नौवाका सम्बन्ध मनुके जलप्लावनसे ही है । यह नाव और मनुकी मछली एक ही है । मनुको वैवस्वत कहा जाता है । विवस्वान् सूर्य है । हजरत नूहके दो पुत्र हेम, सेम- सूर्यवंश और चन्द्रवंश ही हैं । हेमगर्भ, हिरण्यगर्भ, सूर्यवंशका ही बोधक है और सेम = सोम चन्द्रवंशका बोधक है । सूर्यवंशियोंकी पुत्री इलासे ही सोमवंशकी उत्पत्ति हुई है । इस दृष्टिसे दोनों मनुके पुत्र कहे जा सकते हैं । मनुस्मृतिके अनुसार क्षत्रियोंसे ही
संसारके मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है- शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥
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२७४ मार्क्सवाद और रामराज्य
पौण्ड्रकाश्चौडद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः ।
पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराताः दरदाः खशाः ॥
( मनुस्मृति १० । ४३-४४) इतिहासकार मैनिंग कहता है कि ' यह बात विद्वानोंने मान ली है कि ' मनुष्य जातिके पूर्वपितामह ' मनु ' या ' मनस्' उसी तरह हैं, जिस तरह जर्मनोंके ' मनस्' हैं, जो ट्यूटनोंके मूल पुरुष माने जाते हैं । अंग्रेजीका ' मैन ' तथा जर्मनका ' मिन्न ' शब्द ' मनु ' से उसी तरह मिलता है, जैसे जर्मनका ‘ मेनष् ' और संस्कृतका ' मनुष्य ' शब्द मिलता है । अतः मनुसे ही मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है । ' यह मनु मूल पुरुष हिरण्यगर्भसे अभिन्न समझा जाता है और उसी हिरण्यगर्भके मुख, बाहु, ऊरु एवं पादसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी उत्पत्ति हुई— एतमे वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्॥ ( मनु० १२ । १२३ )
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥
(ऋग्वेद १० । ९ ० । १२; यजु० ३२ । ११ ) मानवसृष्टिका मूलस्थान ' इसी तरह जब समस्त मनुष्य बन्दरोंसे उत्पन्न हुए हैं, तब जहाँ- जहाँ बन्दरोंका निवास है, वहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई और जब मनुष्योंकी उत्पत्ति वनमानुषोंसे हुई, तब वनमानुष जहाँ-जहाँ मिलते हैं, वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । वनमानुष अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, मेडागास्कर, जावा आदिमें होते हैं । वहाँका नीग्रोदल सभ्यतामें अबतक भी मनुष्य-समुदायसे पीछे है । उनमें कई जातियाँ और दल ऐसे हैं, जो वनमानुषोंसे कुछ थोड़े उन्नत हैं । ' वैसे विकासवादके खण्डनसे सब मत खण्डित हो ही जाते हैं । इसके अतिरिक्त एक ही स्थानमें सृष्टि होनेपर भी देश, काल, सम्पर्कसे उनमें भेद प्रतीत होने लगता है । बीजके बिना कोई भी पौधा तैयार नहीं हो सकता । समुद्रके टापुओंमें भी जबतक बीज नहीं पहुँचता,
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विकासवाद २७५ मिट्टी लस नहीं आता, तबतक किसी तरहके पौधे उत्पन्न नहीं होते । कोई भी माली बीजोंसे पौधोंको ऐसी ही जगह तैयार करता है, जहाँ उसकी सुरक्षाके योग्य स्थान हो । आँधी, तूफान, जलप्लावन, अग्नि, भूकम्प आदिका उपद्रव जहाँ न रहा होगा, वहीं ईश्वरने मनुष्यादि सभी प्राणियोंको उत्पन्न किया होगा । कई लोग कहते हैं कि ' अमेरिकामें बन्दर नहीं थे, अतः वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती थी । ' पहले यूरोपका भी जलवायु मनुष्यकी उत्पत्तिके अनुकूल नहीं था । विद्वान् अन्वेषकोंका कहना है कि ' स्तनधारी प्राणी एशियासे ही यूरोपमें आया है । ' वार्न साहब तथा उनकी पुस्तकसे प्रभावित होकर लोकमान्य तिलकने उत्तरी ध्रुवमें ही प्राणियोंकी सृष्टि मानी है । किंतु विद्वानोंका मत है कि ' उत्तरी ध्रुवमें प्रति साढ़े दस हजार वर्षमें भीषण हिमपात होता रहा है, अतः वहाँ सृष्टिका होना सर्वथा असम्भव है । ' इंग्लैण्डके डॉ० एलेन्सनका कहना है कि ‘ मनुष्यकी खालपर ध्रुव-प्रदेशनिवासी पशुओंके समान लम्बे बाल नहीं हैं, इसलिये मनुष्य वहाँका प्राणी नहीं है । मनुष्यके शरीरपर पसीना निकलनेके लिये छोटे -छोटे रोम छिद्र होते हैं, अतः यह अतिशीत प्रदेशका प्राणी नहीं है । ' भूगोल- विशेषज्ञोंका यह भी कहना है कि ' उत्तरी ध्रुवमें वनस्पतियाँ नहीं होतीं, वहाँ मनुष्योंका जी सकना ही मुश्किल था । ' अनेक विद्वान् एशियामें भी मनुष्योंकी उत्पत्ति मानते हैं । उनका कहना है कि ' पश्चिमोत्तर एशियामें ही मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई, वहींसे भिन्न-भिन्न श्रेणीके रूपमें लोग विभिन्न देशोंमें गये हैं । ' मैक्समूलरने मध्य एशियामें और स्वामी दयानन्दजीने तिब्बतमें मनुष्योंकी उत्पत्ति मानी है । उमेशचन्द्र दत्तके मतानुसार मंगोलियामें मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है । अन्यान्य विद्वान् विभिन्न स्थान मानते हैं । संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जेन्द आदि भाषाओंकी तुलना करनेपर भी अधिकांश विद्वान् इस निष्कर्षपर पहुँचे हैं कि इन भाषाओंके भाषी लोग कभी एक भाषा- भाषी रहे होंगे । जैसे -जैसे वे एक- दूसरेसे दूर होते गये, वैसे - वैसे उनकी भाषामें कुछ भेद पड़ता गया । यद्यपि वे लोग इन भाषाओंको परस्पर भगिनी ही मानते हैं । उनकी जननी कोई अन्य भाषा
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२७६ मार्क्सवाद और रामराज्य रही होगी — ऐसी कल्पना करते हैं तथापि संस्कृत भाषा ही सब भाषाओंकी जननी है — यह अधिक प्रमाणसिद्ध है । आज भी संसारमें सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद माना जाता है । मोहेनजोदड़ो, हड़प्पाक खुदाईसे मिलनेवाली वस्तुओंसे भी वैदिक सभ्यताकी अतिप्राचीनता विदित होती है । ' वाचा विरूपनित्यया ' – विरूप नित्य वेदलक्षण वाणीद्वारा आप सृष्टि करते हैं । इस वेद- वाक्यसे वेद अनादि सिद्ध होते हैं । मनु भी ' अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा' – स्वयम्भूने अनादि- निधन-उत्पत्ति-नाशविवर्जित वेद- लक्षण वाणीका उत्सर्ग किया; सम्प्रदायप्रवर्तन किया- इस वचनसे वेदको अनादि बतलाते हैं । अतः सर्वप्राचीन भाषा संस्कृत भाषा ही सिद्ध होती है । उससे ही अन्य भाषाओंका उद्गम हुआ है । उन अनादि अपौरुषेय वेदों, मनुस्मृति, चरक आदि ग्रन्थोंसे मालूम पड़ता है कि सप्तद्वीपा मेदिनीमें जम्बूद्वीप श्रेष्ठ है और जम्बूद्वीपमें भी भारतवर्ष ही सर्वोत्कृष्ट है । चतुर्दश भुवनोंमें पृथ्वी और पृथ्वीमें भारतवर्ष विराट् पुरुषका हृदय-स्वरूप है । इसीमें आर्यावर्त्त, ब्रह्मावर्त्त एवं हिमालय हैं । इसीमें सांगोपांग सभी ऋतुओंका विकास होता है । इसीमें सभी रंगके मनुष्य भी मिलते हैं, अतः यहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है- तेषां कुरुक्षेत्रं देवयजनमास । तस्मादाहुः कुरुक्षेत्रं वै देवानां देवयजनम् । ( शतपथ ) यदनु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम् । ( रामोत्तरतापि० १ । १; तारसार० २ ) डॉक्टर ई० आ० एलंसका ' मेडिकल ' पुस्तकमें कहना है कि ‘ हिमालयमें वनस्पति, घास खूब होते हैं, अतः गाय, भैंस, बकरी, हाथी, कुत्ता आदि जानवर और मनुष्यका भी वहाँ होना संगत है । हिमालयमें प्राणियोंके बहुत पुराने शेषांश मिलते हैं । ' भाषाशास्त्री टेलर स्वर्गतुल्य काश्मीरको मनुष्य-जातिकी जन्मभूमि कहते हैं । पुरातत्त्वके विद्वान् अविनाशचन्द्र दासकी ' ऋग्वेदिक इण्डिया ' में कहा गया है कि ' आर्योंका आदिदेश काश्मीर ही है । ' उत्तरप्रदेशके मुख्यमन्त्री श्रीसम्पूर्णानन्दने अपनी