मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 281–290

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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विकासवाद २७७ ' आर्योंका आदिदेश भारत' पुस्तकमें भारतको ही आर्योंकी जन्मभूमि माना है । पाश्चात्त्य लोग गोरे, लम्बे, बड़े सिरवाले भारत, ईरान, योरोपवासियोंको आर्य कहते हैं, परंतु भारतीय कहते हैं कि ' जो रूप - रंग, आकृति - प्रकृति, धर्म- कर्म, ज्ञान -विज्ञान, आचार-विचार तथा शीलमें सर्वश्रेष्ठ है, वही आर्य है'- कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारेः यः स आर्य इति स्मृतः ॥ ( वसिष्ठ- स्मृति )

न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति ।

न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥

न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं नान्यस्य दुःखे भवति प्रहृष्टः ।

दत्त्वा न पश्चात् कुरुतेऽनुतापं स कथ्यते सत्पुरुषार्यशीलः ॥

( महा० उद्यो० ३३ । ११२-११३) वस्तुतः इस तरह भारतीय शास्त्रोंमें अभिगम्य और श्रेष्ठ अर्थमें ही ' आर्य ' शब्दका प्रयोग आता है- ' महाकुलकुलीनार्यसभ्यसज्जनसाधवः । ' ( अमरकोष २।७।३ ) वैश्य एवं स्वामीमें ' आर्य ' शब्दका प्रयोग न होकर ' अर्य ' शब्दका ही प्रयोग होता है- ' स्यादर्यः स्वामिवैश्ययोः । ' ( अमरकोष ३ । ३ । १४६) जातिकी दृष्टिसे अपने यहाँ चातुर्वर्ण्यमें ' हिन्दू' शब्द और वैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि शब्द ही प्रयुक्त होते हैं । ' मेनमार्या भाषन्ते ' इत्यादि वचनोंसे त्रैवर्णिकोंको आर्य कहा गया है । फिर भी बहुत -से विद्वान् विशिष्ट जातिमें आर्य शब्दका प्रयोग

करते हैं ।

हिमालयाभिधानोऽयंअर्धयोजनविस्तारः ख्यातो पञ्चयोजनमायतःलोकेषु पावनः ।॥

पृष्ठ 282

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२७८ मार्क्सवाद और रामराज्य

परिमण्डलयोर्मध्ये मेरुरुत्तमपर्वतः । ततः सर्वास्समुत्पन्ना वृत्तयो द्विजसत्तम ॥

ऐरावती वितस्ता च विशाला देविका कुहूः । प्रसूतिर्यत्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ ॥ ( महाभारत, वनपर्व ) इन वचनोंसे भी हिमालयपर ब्राह्मणादि आर्योंकी उत्पत्ति सिद्धकी जाती है । ' शतपथ ' के ‘ तदप्येतदुत्तरस्य गिरेः मनोरपसर्पणम्' ( १ । २ । १६ ) इस वचनसे हिमालयपर ही मनुका जलप्लावन सिद्ध किया जाता है । महाभारतके –' अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत मा चिरम्। ' ( महा० वनपर्व १८७ । ४९ ) -इस वचनसे हिमालयके श्रृंगमें जलप्लावनके समय नावका बाँधना सिद्ध होता है । कहा जाता है कि हिमालयके मानस स्थानपर मानसी सृष्टि हुई है, इसीलिये उसका नाम मानस पड़ा है । कुछ भी हो, हर दृष्टिसे एशिया एवं तदन्तर्गत भारतमें ही मनुष्यकी सृष्टि सिद्ध होती है । वैवस्वतमनुको हुए अबतक ( संवत् २०१३ में ) १२ करोड़ ५ लाख ३३ हजार तीस वर्ष होते हैं, परंतु सृष्टि उनसे भी पहलेकी है, अतएव सृष्टिको हुए १ अरब ९५ करोड़ ५८ लाख ८५ हजार ५७ वर्ष माने जाते हैं । ब्रह्माके एक दिनमें १४ मनु बीतते हैं, जिसमें कि ४ अरब ३२ करोड़ वर्ष होते हैं । १५ खरब ५५ अरब २० करोड़ मानववर्षका उनका एक वर्ष होता है । अबतक ब्रह्माके ५० वर्ष बीत चुके हैं, जिसमें ७ नील ७७ खरब ६० अरब वर्ष बीत गये । इस तरहके १०० वर्षोंकी ब्रह्माकी आयु होती है । विष्णु एवं शिवका कालमान इससे भी बड़ा है । विकासवादी प्रायः प्राचीन वस्तुओंकी खोजसे अनुमान करते हैं कि ' मनुष्य पहले बहुत जंगली हालतमें था; क्योंकि भूमिकी सबसे नीचेकी तहोंमें मनुष्योंके बनाये जो पदार्थ मिले हैं, वे पाषाण- सींग आदिके ही बने हुए हैं । इससे मालूम होता है कि तत्कालीन मनुष्योंको धातुओंका ज्ञान नहीं था । ऊपरी तहोंमें धातु - निर्मित शस्त्र मिलते हैं । इससे मालूम

पृष्ठ 283

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विकासवाद २७९ होता है कि उस समयके लोग पिछले लोगोंसे कुछ उन्नत तथा सभ्य थे, परंतु यह बात असत्य है; क्योंकि अबतक जहाँ -जहाँ खुदाई हुई है, वहाँ- वहाँ एक ही गहराईपर दोनों ही प्रकारके तथाकथित उन्नत एवं अवनत शस्त्र मिलते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि एक ही समयमें दोनों ही प्रकारकी अवस्थाएँ थीं । आज भी भिन्न-भिन्न ढंगकी अवस्थाएँ होती हैं । लोकमान्य तिलकने ' आर्योंका उत्तरी ध्रुव-निवास ' में लिखा है कि ' यूरोपमें अनेक जगह प्राचीन छावनियों, किलोंकी दीवालों, श्मशानों, देवालयों, जलाशयोंके खोदनेसे पत्थर तथा धातुके हजारों शस्त्र मिलते हैं । इनमेंसे कितने ही स्वच्छ किये हुए, घुटे हुए और कितने ही अस्वच्छ एवं भद्दे हैं । पुरातत्त्ववेत्ताओंने इनके तीन विभाग किये हैं । पहले ‘ पाषाणशस्त्र, जिनमें सींग, काष्ठ एवं हड्डियोंके शस्त्रोंका भी समावेश है । दूसरेमें काँसेके शस्त्र और तीसरेमें लोहेके शस्त्र माने गये हैं । ' परंतु इससे यह समझना भूल है कि एककी समाप्तिपर दूसरेका आरम्भ हुआ है । इस तरह तो ताँबे और राँगेसे काँसा बनता है, अतः एक ताम्रयुग भी मानना पड़ेगा; किंतु ताम्र- युगका पता नहीं चलता । ' वस्तुस्थिति तो यह है कि जिस समय यूरोपके लोग पाषाणयुगकी भूमिकामें थे, उसी समय ईसवी सन्से ६ हजार वर्ष पूर्व मिस्रवासी उच्चतम सभ्यता प्राप्त कर चुके थे । इसी तरह जिस समय यूनानी लोग ' लौह- युग ' में थे, उस समयतक इटालियन ' काँस्य युग ' में ही थे । यूरोपके पश्चिमी भागके लोग तो उस समय पाषाणयुगमें ही थे । इससे पाषाणादि युगोंकी कल्पना ही निराधार है । जैसे आज बैलगाड़ी और वायुयान दोनों ही हैं, वैसे ही उन्नत-अवनत सभी प्रकारके साधन सदा ही मिलते हैं । किसीने एक ही जगह एक आधुनिक घड़ी और जंगली मनुष्योंकी चकमक पथरी पायी । घड़ी जंगलके अफसरकी थी और चकमक जंगलीका था । यदि यही चीजें दब जातीं और कालान्तरमें मिलतीं तो इससे यही अनुमान करना पड़ता कि सभ्यता और जंगलीपन दोनों साथ थे । फिर ' ज्ञानका धीरे- धीरे विकास हुआ' यह कथन कैसे सत्य माना

पृष्ठ 284

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२८० मार्क्सवाद और रामराज्य जा सकता है? पत्थरोंसे लोहा - ताँबा निकालना भी तो सामान्य बात नहीं । जिसको धातु विश्लेषणकी शिक्षा मिलती है, वही यह कार्य कर सकता है । अतः जिसे लोह- युग, जंगली युग नहीं कहा जा सकता, ऐसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ोंके खंडहरोंमें जहाँ सभ्यताके चिह्न मिलते हैं, वहीं पत्थरके शस्त्र– जंगलीपनके चिह्न भी मिलते हैं । इस तरह भूगर्भकी जाँचसे यह नहीं सिद्ध होता कि ज्ञानकी उन्नति क्रमसे हुई है । पीछे कहा जा चुका है कि एक जगहके धरातलमें जिस कालके पाषाण - शस्त्र मिलते हैं, उसी कालके दूसरे देशके धरातलमें पूर्ण सभ्यताके पदार्थ मिलते हैं । आज भी जो पढ़ता-लिखता है, सभ्य होता है, उसके पड़ोसमें बिना पढ़े -लिखे जंगली जैसे लोग भी रहते हैं । बड़े - बड़े विद्वानोंके पुत्र- पौत्र मूर्ख निकलते हैं । अतः ज्ञानके क्रमिक विकासका पक्ष गलत है? जान्स बोसनने १ ९ २३ के ' न्यू एज ' में लिखा है कि ' यदि मनुष्य-जातिका इतिहास उत्तरोत्तर विकासकी ओर है तो क्यों चीनी लोग ईसवी संवत्के पूर्व बारूद और कपास काममें लेते थे, परंतु पीछे चलकर वे उसे भूल गये? इसी तरह मिस्रमें पिरामिड बननेके समय वहाँके लोग रेखागणितकी चरम सीमापर पहुँचे थे, पर पीछे उन्हें वह विद्या भूल गयी । ' दिल्लीकी लोहेकी लाट भारतमें ही बनी, पर क्या आज यूरोप भी वैसी बना सकता है? इसलिये कहना पड़ता है कि संसारमें ह्रास, विकास दोनों चलते रहते हैं 1। दीपकके पास पतंग आता है, आँच लगती है, भागता है, फिर आता है; बादमें कूदकर दीपकपर जल जाता है । यदि ज्ञानका विकास होता तो अनुभवसे पतंगोंको सबक सीखना था और दीपकके पास जाना बन्द करना था, परंतु ऐसा नहीं देखा जाता, अतः यही कहना पड़ेगा कि जहाँ ज्ञान -शिक्षाकी परम्परा कायम रहती है, वहाँ ज्ञान रहता है और जहाँ परम्परा टूट जाती है, वहाँ नष्ट हो जाता है । इसीलिये बिना सीखे ज्ञान नहीं होता । सृष्टिके आदिमें परमेश्वरसे ज्ञान प्राप्त होता है और अब भी पूर्वजों, अध्यापकों, आचार्योंसे ही ज्ञान सीखा जाता है । डिस्कार्टेका कहना

पृष्ठ 285

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विकासवाद २८१ है कि ' ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान मनुष्यके हृदयमें स्वतः उत्पन्न नहीं होता; क्योंकि वह अनन्त है । ' मैडम ब्लवेट्स्कीने ' सिक्रेट डॉक्टरिन ' में लिखा है कि ' कोई नवीन धर्मका प्रवर्तक नहीं हुआ । ' आर्यों, सेमिटिकों, तुरानियोंने नया धर्म, नयी सभ्यताका आविष्कार किया था, ' इसका मतलब यही है कि वे धर्मके पुनरुद्धारक थे, मूल शिक्षक नहीं । ' भाषा -विज्ञान ज्ञानके लिये भाषा भी अपेक्षित होती है; क्योंकि ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्दका अनुवेध न हो । भाषा भी सीखकर ही बोली जाती है । माता तथा कुटुम्बियोंकी बोलचाल सुनकर ही प्राणी बोलता है । स्वतन्त्रतासे कोई नयी भाषा बना भी नहीं सकता । कहते हैं कि गूँगे बहरे भी होते हैं । वे सुन नहीं सकते, इसीलिये बोल भी नहीं सकते, परंतु उनके मुँहमें बोलनेके साधन होते हैं । इसीलिये यन्त्रोंद्वारा उनसे बुलवाया जाता है । बिना सिखलाये कोई बोल नहीं सकता । गूँगा दूसरोंको मुँह फैलाकर बोलते देखकर वैसी नकल करता है । कहा जाता है कि भेड़ियेकी माँदसे निकले हुए मनुष्योंके बच्चे भेड़ियों -जैसा ही बोलते हैं । गूँगे और इन बच्चोंसे अ, इ, उ, ए, ओ के अतिरिक्त ककारादि वर्णमालाके अक्षर उच्चरित नहीं होते । यदि गूँगा अन्धा भी हो तो अ, इ आदिका उच्चारण नहीं कर सकता । प्रो० मैक्समूलरने ' भाषा-विज्ञान ' ( साइन्स ऑफ दि लैंगवेज ) -में लिखा है कि ' मिस्रके बादशाह सामिटकरने सद्यःप्रसूत दो बालकोंको गड़रियोंके सुपुर्द करके यह प्रबन्ध किया कि उन्हें पशुओंके अतिरिक्त किसीकी भाषा सुननेको न मिले । उन लड़कोंके बड़े होनेपर देखा गया कि वे अ, इ, उ के सिवा कुछ भी बोल नहीं सकते थे । ' इसी प्रकार द्वितीय फ्रेडरिक, चतुर्थ जेम्स, अकबर आदिने भी परीक्षा की थी । निष्कर्ष वही निकला कि मनुष्य बिना सिखाये भाषा सीख नहीं सकता । भाषा- विज्ञानके आधुनिक विद्वान् मनुष्य सृष्टिके साथ ईश्वरद्वारा भाषाका प्रादुर्भाव नहीं मानते । उनके अनुसार पहले हस्तसंकेत आदिद्वारा ही व्यवहार होता था । बादमें व्यवहारके लिये बुद्धिपूर्वक मनुष्योंने भाषा बनायी । विचारों और भाषाओंका अटूट सम्बन्ध

पृष्ठ 286

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२८२ मार्क्सवाद और रामराज्य होता है । विकासवादियोंका कहना है कि ' भाषाकी उत्पत्ति न एकाएक मनुष्यकी स्वेच्छासे हुई, न स्वभावसे, न दैवीशक्तिकी प्रेरणासे; किंतु सभ्यताके अन्य अंगोंकी तरह इसका भी धीरे - धीरे विकास हुआ है । ' उनके मतानुसार ‘ जडचेतनात्मक बाह्य जगत्की ध्वनियोंके अनुकरण आधारपर नाम रखे गये हैं, जैसे कू-कू बोली सुनकर कोकिलका अंग्रेजीमें ' कुक्कू ' नाम रखा गया । काँव-काँव सुनकर संस्कृतमें कौवेका ' काक ' नाम रखा गया । इसी तरह हर्ष, शोक, आश्चर्य आदिसे कुछ स्वाभाविक ध्वनियाँ मुखसे निकल पड़ती हैं, जैसे- हा हा, हाय - हाय, अहह, वाह -वाह इत्यादि । इस तरह पहले इशारों या संकेतसे, फिर ध्वनियोंको सुननेसे और उद्गारात्मक शब्दोंके स्वभावतः निकलनेसे शनैः - शनैः भाषा बनी । ' पर विचार करनेपर यह पक्ष भी असंगत ही प्रतीत होता है; क्योंकि यदि ऐसी ही बात है, तब तो पशुओंमें भी इसी प्रकार भाषाका विकास होना चाहिये, परंतु ऐसा नहीं देखा जाता । इशारे व्यवहार असभ्य जंगली तथा अज्ञानियोंका नहीं हो सकता । तारमें ' ट्रा टक्कू' की ध्वनियोंसे, जहाजोंपर झण्डियोंसे, युद्धके समय चिनगारियोंसे बात करनेवाले जंगली नहीं, किंतु विशिष्ट बुद्धिमान् ही समझे जाते हैं । इसी प्रकार नृत्य, नाट्यमें अभिनयद्वारा भावकी अभिव्यक्ति विशेषज्ञोंका ही काम है, किसी अज्ञानीका नहीं । यहाँतक कि इशारेकी कला तो बोलनेकी अपेक्षा भी ऊँची है । इसीलिये पशुतुल्य अज्ञानी, जंगली इशारोंसे बातचीत नहीं कर सकता था । जैसे वर्णोंका उच्चारण सीखा जाता है, वैसे ही इशारा भी सीखना ही पड़ता है । गूँगोंको भी इशारा समझना पड़ता है । वे आँखोंसे देखकर इशारा सीखते हैं । यदि वे अन्धे भी होते हैं तो और भी अधिक कठिनाई पड़ती है । इसी तरह कोकिलके कू-कू और कौवेके काँव-काँवसे कुक्कू एवं काक शब्द बननेकी बात भी निराधार है । जब पहले क, ख, ग आदि वर्णोंका उच्चारण सीख लिया जाय, तभी यह अनुकरण बन सकता है । ये कोई शब्द वर्णात्मक नहीं होते हैं । यह तो वर्ण उच्चारण

पृष्ठ 287

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विकासवाद २८३ कर सकनेवाला व्यक्ति ही इन अव्यक्त शब्दोंमें व्यक्त शब्दोंकी कल्पना करता है । चूहेने ' कट्ट ' से काट दिया, साँप ' सर्र ' से चला गया, पीठपर डण्डा ‘ गद्द ' से गिरा, बकरी ' में- में ' कर रही है - यहाँ वर्णका उच्चारण करनेवाला ही अनुकृतिसे नाम रख सकता है, परंतु बाहरकी ध्वनियाँ ही जब स्पष्ट नहीं हैं, तब उनके द्वारा शब्दोंका उच्चारण कैसे सीखा जा सकता है? बाहरकी ध्वनियोंको भले, हम ' टन्- टन्' ' धम्- धम् ' ‘ खट्– खट्' ‘ पूँ- पूँ' ‘ झन्–झन्' कहें; परंतु ये वर्ण बिलकुल नहीं होते । इसी तरह तोतेके, सारंगीके शब्दमें वर्णोंकी कल्पना वर्णज्ञ ही कर सकता है । मनुष्यके मुखको छोड़कर अन्यत्रसे वर्णोंका उच्चारण हो ही नहीं सकता । उसके लिये मनुष्यके जैसे कण्ठ, तालु, मूर्द्धा, दाँत, ओष्ठ, जिह्वा एवं आन्तरबाह्य प्रयत्न अपेक्षित होते हैं । जिनसे ' ट' का उच्चारण नहीं बनता, वे लोग ' टन्- टन्' का अनुकरण भी नहीं करते । यह विभिन्न वर्णोंके उच्चारण सीखे बिना कभी आ ही नहीं सकता । बाह्य अव्यक्त शब्दोंमें वर्ण नहीं होते, इसीलिये मुर्गेकी बोलीमें हम ‘ कुकडूकूँ ' की कल्पना करते हैं । अंग्रेज लोग इसीको ' कॉक ए डू डिल् डू' कहते हैं । इसी प्रकार हर्ष, शोक आदिसे ' हाय, हा-हा' आदि शब्द भी उन्हींके मुखसे निकल सकते हैं, जिन्होंने वर्णोंका उच्चारण सीख रखा है । पशुओं और गूँगोंके मुखसे ' हा-हा ' ' हाय -हाय ' आदिका उच्चारण नहीं बनता है । बोलनेवालेका सम्पर्क हुए बिना किसी दुधमुँहे बच्चेके मुँहसे क, ख, ग, घ आदि वर्णमालाका उच्चारण नहीं हो सकता । आधुनिक लोग भी जब यह मानते हैं कि मनुष्यमें ही स्पष्ट शब्द उच्चारणकी शक्ति है अन्यमें नहीं, तब यह गुण जब इसके पूर्वजोंमें नहीं था, तब इसमें क्यों और कैसे आ गया? कुछ लोग कहते हैं कि ' ईश्वरने ही मनुष्यके मुखमें वर्णोंके उच्चारणकी शक्ति दी है । ' तब फिर यह भी क्यों नहीं माना जाता कि ईश्वरने ही मनुष्यको भाषा सिखायी? जब पशु मनुष्यकी बोली नहीं बोलता, तब मनुष्य ही पशुकी बोलीकी नकल करके भाषा बोलना कैसे सीख गया?

पृष्ठ 288

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२८४ मार्क्सवाद और रामराज्य मैक्समूलरका कहना है कि ' मनुष्यकी भाषा ध्वनि अथवा पशुओंकी बोलीसे नहीं बनी । ' लॉक एडम स्मिथ एवं ड्यू गल्ड स्टुवर्ट आदि कहते हैं कि ' मनुष्य बहुत कालतक गूँगा रहा, संकेतसे, भ्रूक्षेपसे वह काम चलाता रहा । जब काम न चला, तब परस्पर संवाद करके शब्दोंके अर्थ नियत करके भाषा बना ली । ' इसके उत्तरमें मैक्समूलरने लिखा है कि ' मैं नहीं समझता कि भाषाके बिना उनमें संवाद कैसे जारी रह सका? क्या अर्थ नियत करनेके पूर्व संवाद निरर्थक ही चला आता था? जबतक उनके पास कोई सार्थक ध्वनि नहीं थी, तबतक ' अमुक 'शब्दका अमुक अर्थ है ' यह नियत करना कैसे सम्भव था? एकने दूसरेसे कैसे कहा कि रोटीको चूँ-चूँ कहना और समझना चाहिये ' और कैसे दूसरोंने ये सब बातें समझ लीं? अतः ज्ञानके बिना भाषा नहीं बन सकती और भाषाके बिना ज्ञान नहीं बन सकता । नाम-नामीका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है । ऐसी दशामें यही तथ्य उपलब्ध होता है कि आदिम मनुष्य ज्ञान भाषाके सहित उत्पन्न हुआ है । इसपर भी विचार करनेसे मालूम पड़ता है कि जब ज्ञान और भाषा दोनोंहीके लिये शिक्षा अपेक्षित है, तब बिना शिक्षाके ज्ञान और भाषा कैसे उत्पन्न हुई? अतः अन्तिम सिद्धान्त यह मानना ही पड़ता है परमेश्वरने ही मनुष्यको निर्मित करके उसे ज्ञान और भाषा प्रदान की । वेदोंसे भी यही स्पष्ट मालूम पड़ता है कि परमेश्वरने ब्रह्माको उत्पन्न करके उन्हें वेद प्रदान किया— 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । ' ( श्वेताश्वतर० ६ । १८ ) ब्रह्माने अपने पुत्रोंको और उन्होंने इसी तरह अपने पुत्रों और शिष्योंको आदिम भाषा और ज्ञानका उपदेश किया । आगे चलकर ज्ञान और भाषामें अपभ्रंश भी होता गया । यह पीछे कहा जा चुका है कि कोई भी बोध या ज्ञान ऐसा नहीं होता, जिसमें सूक्ष्म शब्दका सम्बन्ध न हो । फिर इस दृष्टिसे अनादि ईश्वरके अनादि ज्ञानमें जो शब्द अनुविद्ध थे, वही अनादि भाषा थी । कोई भी कार्य ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिपूर्वक ही

पृष्ठ 289

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विकासवाद २८५ सम्पन्न होता है । इस तरह सृष्टि कार्यमें भी ईश्वरकी ज्ञप्ति, चिकीर्षा और कृति अपेक्षित ही है । उस अनादि ज्ञानमें अनुविद्ध अनादि शब्द- समूहका होना अनिवार्य है । जब संस्कृत भाषा एवं वेदसे पुरानी पुस्तक संसारमें उपलब्ध नहीं है, इसकी अतिप्राचीनता तर्कोंसे भी सिद्ध होती है, तब मनु आदिके अनुसार उसे ही अनादि भाषा मानना युक्त है । उसके व्यापक धातुओंसे संसारकी सभी भाषाएँ निष्पन्न भी हो ही जाती हैं । अतः ' ईश्वरने आदिम प्राणियोंको भाषा एवं विज्ञान सिखलाया ' यही पक्ष ठीक है । जैसे आजकल हिप्नोटिज्म करनेवाला अपने माध्यम ( सब्जेक्ट) -के मुँहसे मानसिक प्रेरणाद्वारा ऐसी भाषाओंके शब्द उच्चारण करा देता है, जिसको माध्यमने कभी सुना भी नहीं, वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर भी मनुष्योंको अपनी शक्तिद्वारा शब्दोच्चारण करा सकता है । इसीलिये आदिम मनुष्य परम ज्ञानवान् थे- यही पक्ष श्रेष्ठ I सुकरातके मतानुसार भी कोई किसीको नया ज्ञान नहीं सिखलाता, अपितु भूले हुए ज्ञानको याद दिलाता है । जिसमें ज्ञान -शक्ति नहीं, उसे ज्ञान कराया नहीं जा सकता, जैसे- पाषाणोंको ज्ञान कराना असम्भव है । अतएव कोलबूकके मतानुसार भी भाषा मनुष्यका एक आत्मिक साधन है । आर० सी० ट्रीनिचने ' शब्दोंका अध्ययन ' ( स्टडी ऑफ वर्डस्) -में कहा है कि ' ईश्वरने मनुष्यको वाणी उसी प्रकार दी, जिस प्रकार बुद्धि दी; क्योंकि मनुष्यका विचार ही शब्द है, जो बाहर प्रकाशित होता है । ' मैक्समूलरका कहना है कि ' भिन्न-भिन्न भाषा परिवारोंमें जो चार - पाँच सौ धातु मूल तत्त्वरूप शेष रह जाते हैं, वे न तो मनोराग-व्यंजक ध्वनियाँ ही हैं और न अनुकरणात्मक शब्द ही । हम उनको वर्णात्मक शब्दोंका साँचा कह सकते हैं । ' प्लेटोके साथ हम कह सकते हैं कि ' वे स्वभावसे ही विद्यमान हैं । ' वैदिकोंका तो स्पष्ट कहना है कि अनादि-निधन, सच्चिदानन्द ब्रह्म ही शब्द ब्रह्म है, उसीसे विश्वकी प्रक्रिया चलती है । अनन्त सदानन्दका ही प्रकाशविशेष अर्थ है । अनन्त चित् या अखण्ड बोधकी ही अभिव्यक्ति -विशेष शब्द है । दोनों एक सच्चिदानन्दके प्रकाश हैं, अतएव दोनोंमें विषय-विषयी भाव होते हुए भी अभेद है । इसीलिये

पृष्ठ 290

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२८६ मार्क्सवाद और रामराज्य कोई बोध बिना सूक्ष्म शब्दके नहीं होता । शब्द और अर्थका मीमांसकोंके मतसे औत्पत्तिक ( स्वाभाविक ) सम्बन्ध है । घटत्वादि जाति शब्दका शक्य होता है, अतः शब्दके समान ही अर्थ भी नित्य ही है-' औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः ' ( पू० मी० ) । नैयायिक लोग शब्द और अर्थके सम्बन्धरूप संकेतको औत्पत्तिक, अकृत्रिम नहीं मानते, किंतु संकेतको पौरुषेय मानते हैं, परंतु जीव पुरुषके द्वारा नहीं; अपितु ईश्वरसे संकेतका होना मानते हैं । ' अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये, ' इस प्रकार ईश्वर ही आदिम ऋषियोंको उपदेश करता है । इसपर मीमांसकोंकी आपत्ति यह है कि ' ईश्वर जिन शब्दोंसे ऋषियोंको शब्दार्थ -सम्बन्ध बतलाता है, उन शब्दों और अर्थोंका सम्बन्ध यदि उससे पहले ऋषियोंको ज्ञात नहीं है, तो वे समझ कैसे सकते? यदि कहा जाय कि ' हस्त, मुख, भ्रूक्षेप आदि इशारोंसे ईश्वर संकेत ग्रहण करायेगा ' तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि पहले तो ईश्वर निराकार है, उसका हस्त, भ्रूक्षेप आदि संकेत कैसे सम्भव होगा? यदि लीलाशक्तिसे उसे साकार भी मानें, तो भी अल्पज्ञ प्राणियोंको सब संकेतों, इशारोंका बोध भी कितना कठिन है? इसके अतिरिक्त, जितने असंख्यात शब्द और अर्थ हैं, उतने संकेत इशारोंसे हो सकना भी सम्भव नहीं । हस्त, मुख, भ्रू आदिके विक्षेप सीमित हैं, परंतु शब्द और अर्थ अपार समुद्रतुल्य हैं'– ' इन्द्रादयोऽपि यस्यान्तं न ययुः शब्दवारिधेः । ' यदि ईश्वर शब्दोंके द्वारा संकेत ( शब्दार्थ-सम्बन्ध ) -को बोधित करे कि अमुक शब्दसे अमुक अर्थको समझना चाहिये, तो यह मानना ही पड़ेगा कि जिन शब्दोंके द्वारा वह बोध कराता है, उनका स्वार्थ सम्बन्धरूप संकेत प्रतिपादयिता और प्रतिपत्ता दोनोंको ही विदित होना चाहिये । इस दृष्टिसे नव- नवोत्पन्न अर्थों और अपभ्रंश शब्दोंका सम्बन्ध भले ही मनुष्यकृत हो; परंतु जिन गो आदि शब्दों एवं सास्नादिमत् व्यक्ति आदि अर्थोंके सम्बन्ध अनादि वृद्ध व्यवहारमें प्रचलित हैं, उनका संकेत अकृत्रिम एवं औत्पत्तिक ही मानना उचित है ।