मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 321–330
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330
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विकासवाद ३१७ जाने किसी भी तरह पीनेसे उसका फल होता है । किन्हीं मूषकोंकी शिवमन्दिरमें दीपककी बाती उसका देनेसे, किसी पक्षीकी बाजके भयसे अन्नपूर्णाकी परिक्रमा कर लेनेसे सद्गति हुई है? इसी तरह बहुत- से ऐसे जीव हैं, जिनके शरीर सूक्ष्म तन्मात्राओंके ही बने होते हैं । उनके द्वारा बहुत - से मानस कर्म होते हैं । उनकी संख्या भी अपार है । 'जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ ।' एक वटबीजके भीतर वटवृक्ष, उसमें अपरिगणित फल, उससे फिर अगणित बीज और उनमें वृक्ष, इस दृष्टिसे जैसे एक वटबीजमें अनन्तकोटि वटवृक्षोंकी असम्भावना हो सकती है, वैसे ही एक परमाणुके पाँचवें अंश स्पर्शतन्मात्रामें वायु, उसके एक देशमें प्राण और उसके एक देशमें मन तथा मनमें ब्रह्माण्ड होता है । फिर ब्रह्माण्डके अनन्त मनोंमें अनन्त ब्रह्माण्ड होते हैं । एक क्षणके स्वप्नमें अपरिगणित जीव दिखायी देने लगते हैं । फिर उनके कर्मों और भोगोंका सिवा ईश्वरके और किसको पता लग सकता है? फिर विद्वान् तो फल- बलसे कारणकी कल्पना करते हैं । कार्य देखकर कारणकी कल्पना करनी उचित है । अतः भोगयोनिके जीवोंको देखनेसे ही उनका कर्मयोनिमें जन्म सिद्ध हो जाता है । अतः सर्वज्ञ ईश्वर प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मानुसार ही विश्वको रचता है । स्वतन्त्र जड प्रकृति या परमाणुओंसे विश्वकी उत्पत्तिकी कल्पना तो सर्वथा ही बेतुकी बात है । प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मोंकी वासनाओंसे वासित प्रकृति भी कर्मानुसार ईश्वराधिष्ठित होकर ही अपने प्रवाहमें निपतित जीवोंको चैतन्य--साम्राज्य या जड- साम्राज्यकी ओर प्रवाहित करती है ।
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पञ्चम परिच्छेद माक्सय द्वन्द्ववाद ' डायलेक्टिस ' ( द्वन्द्ववाद ) ग्रीक ( यूनानी ) भाषाका शब्द है । यह ' दियालेगो ' से निष्पन्न होता है । इसका अर्थ है चर्चा या विवाद करना । इसी विवादस्वरूप द्वन्द्ववादके आधारपर प्राचीन कालमें कोई वक्ता विपक्षीके तर्ककी असंगति दिखलाकर उसका निराकरण कर सत्यसिद्धान्तका प्रतिपादन करता था । उस समयके दार्शनिकोंका ऐसा विश्वास था कि विचारोंमें परस्पर विरोधप्रदर्शनसे अथवा विरोधी मतोंके संघर्ष स्पष्ट कर देनेसे सत्यकी प्रतिष्ठा होती है । सत्य सिद्धान्त प्रतिष्ठित करनेकी सर्वश्रेष्ठ प्रणाली ही द्वन्द्ववाद या ‘ डायलेक्टिकल ' है । विचार- क्षेत्रके बाहर प्राकृतिक घटनाओंपर भी इस द्वन्द्वात्मक- प्रणालीको लागू किया जाता है । प्रकृतिकी बूझने- परखनेकी द्वन्द्वात्मक प्रणालीमें ही द्वन्द्ववादका विकास हुआ । इसके अनुसार प्रकृतिके बाह्यरूप सतत गतिशील हैं और उनमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है । तदनुसार ही प्रकृतिकी शक्तियोंकी परस्पर क्रियाप्रक्रियाको एवं प्रकृतिके असंगतियोंके फलस्वरूप प्रकृतिका विकास हुआ । (जे० स्टालिनका द्वन्द्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद ) वस्तुतः आधुनिक पाश्चात्य दर्शनोंको ' दर्शन ' कहनेमें ही संकोच होता है; क्योंकि उनकी तत्त्व - दृष्टि सर्वथा धुँधली और अस्पष्ट ही रहती है । इसका मूल कारण यह है कि उनमें प्रमाणोंका स्पष्ट विश्लेषण नहीं होता । उदाहरण या दृष्टान्तको ही ये कभी - कभी प्रमाण मान बैठते हैं, जो कि पौरस्त्यदर्शनमें परार्थानुमानके पञ्चावयवमें केवल एक अंग है । चर्चा या विवाद स्वयं कोई प्रमाण नहीं, जिसके आधारपर स्वयं कोई प्रमेय सिद्ध हो सके— 'लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः । ' - लक्षण और प्रमाणसे वस्तुसिद्धि होती है, केवल चर्चासे नहीं । पौरस्त्यदर्शनोंमें चर्चा वाद, जल्प, वितण्डा- भेदसे तीन प्रकारकी होती
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३१ ९ है । तत्त्व-निर्णीषा, विजिगीषा, परपक्ष -निराचिकीर्षासे प्रेरित वादी- प्रतिवादियोंद्वारा परस्पर पक्ष-प्रतिपक्षोंका प्रमाणोंद्वारा साधन -बाधन करनेको ' चर्चा या विवाद ' कहा जा सकता है । प्रामाणिक असंगति और विरोधप्रदर्शन, परपक्षनिराकरण, स्वपक्षसाधनका एक आंशिक साधनमात्र है । अनुमानके अंग, व्याप्तिनिर्णयमें अनुकूल तर्क अपेक्षित होता है । व्याघात - प्रदर्शन करके संशय - निवृत्तिरूप अनुकूल तर्कसे व्याप्तिज्ञान दृढ़ हो जाता है । फलतः निर्दोष अनुमानसे अनुमेय पदार्थोंकी अनुमिति होती है । उसीके एक अंशको ' वाद ' मानकर उसे विचार- क्षेत्रके बाहर लागू करना असंगत ही है । हाँ, अनुमानोंके आधारपर प्राकृतिक पदार्थोंका गुणस्वभावादि निर्णय करना गुण ही है, फिर इसे कोई खास व्यक्तिका वाद मानना व्यर्थ है । वेदान्ती अन्य मतोंसे असंगति दिखलाकर सर्वमतखण्डनावधि निराकर्ताके प्रत्यगात्माकी स्वतः सिद्धि मानते हैं । इसी पक्षको लेकर हेगेलने अखण्ड नित्यबोधकी सिद्धिमें उसे प्रयुक्त किया है— नेतिनिराकर्तुमशक्यत्वात्तदस्मीतिनेतीति नेतीति शेषितं यत्सुखी परं पदम्भव ॥। नेति नेति नेति– इन तीन निषेधोंसे स्थूल, सूक्ष्म, कारण- इन त्रिविध दृश्योंका निषेध कर देनेपर सर्वनिषेधावधि, निषेधाधिष्ठान, निषेधसाक्षी निराकर्ताका प्रत्यगात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है । उसका निषेध अशक्य है, अतः वह स्वत:सिद्ध है । पर इस असंगति-प्रदर्शनमात्रसे किसी गुणधर्मकी सिद्धि शक्य नहीं । किसी भी साध्यकी सिद्धिके लिये प्रमाण अपेक्षित है । मार्क्सवादके अनुसार ' द्वन्द्वमान ' ( Dieletics ) में एकके द्वारा तर्ककी उत्थापना होती है, फिर उसका खण्डन होता है, पुनः नये तर्ककी उत्थापना होती है । इस प्रकार एक नीचे दर्जेके सत्यसे ऊँचे दर्जेके सत्यपर पहुँचते हैं । यह क्रमोन्नति प्रक्रिया है । इसमें स्थिरता नहीं, वेग है । यही प्रक्रिया सारी प्रकृतिमें वर्तमान है । मानव- समाज और प्रकृतिके इतिहाससे ही द्वन्द्वमानके नियम निकाले गये हैं । ये नियम व्यापकरूपसे सब प्रकारकी गतिके नियम हैं । यहाँ भी
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३२० मार्क्सवाद और रामराज्य वादी - प्रतिवादियों, तर्क -प्रतितर्कोंद्वारा पक्ष - प्रतिपक्षका साधन- बाधन ही द्वन्द्वमान ठहरता है । ' वाद ' में भी भारतीय प्रणालीके अनुसार नियम होते हैं । मध्यस्थ और सदस्य उसके नियामक होते हैं । निर्दोष तर्कद्वारा सिद्ध पदार्थका तर्कान्तरसे खण्डन नहीं हो सकता । तर्कशतसे भी पदार्थ-स्वभाव नहीं बदलता । यथार्थ- ज्ञान वस्तुतन्त्र होता है, पुरुषतन्त्र नहीं । केवल तर्क अनवस्थित होता है । उसके आधारपर किसी भी वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती । कुशल तार्किक तर्कद्वारा जिस वस्तुको सिद्ध करता है, दूसरे तार्किक उसे अन्यथा ही उपपादित कर देते हैं- यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । 11 अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ( वार्त्तिकसार) प्राग्लोप, अविनिगमकत्व, प्रमाणापगम- इन दोषोंसे अनवस्था दोष दुष्ट होती है । माक्र्सीय द्वन्द्वात्मक प्रणालीके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं- अतिभूतवादके प्रतिकूल द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृति ऐसे पदार्थोंका आकस्मिक संघटन नहीं, जो परस्पर स्वतन्त्र, विच्छिन्न और असम्बद्ध हैं । द्वन्द्ववादके अनुसार प्रकृति सम्बद्ध और पूर्ण इकाई है । उसके पदार्थ और बाह्यरूप एक- दूसरेपर निर्भर तथा एक- दूसरेसे सजीवरूपमें सम्बद्ध हैं और परस्पर एक - दूसरेकी रूप-रेखा निश्चित करते हैं । कुछ पदार्थोंका कार्य - कारणभाव अवश्य मान्य है । पर अनेक संनिहित पदार्थ ऐसे भी हैं, जिनका आपसमें कोई सम्बन्ध नहीं; जैसे पशुके दोनों शृंगोंमें आपसमें कोई कार्य -कारण सम्बन्ध नहीं, इसीलिये यह भी कहना ठीक नहीं कि ' द्वन्द्वात्मक- प्रणालीका यह सिद्धान्त है कि अपने चारों ओरके संघटनसे अलग करके कोई प्राकृतिक घटना अपने - आपमें समझी नहीं जा सकती । कारण यह है कि उसके चारों ओरकी परिस्थितियोंसे और उनके प्रसंगमें उनका विचार न करके वह घटना प्रकृतिके किसी भी प्रदेशकी घटना हमारे लिये निरर्थक सिद्ध होती है । फलतः हम प्रकृतिकी कोई भी घटना तभी समझ सकते तथा उसकी व्याख्या कर सकते हैं, जब हम उसके
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माक्सय द्वन्द्ववाद ३२१ चारों ओरके संघटनके अविभाज्यरूपमें उसपर विचार करें और हम यह सोचकर उसकी व्याख्या करें कि उसकी रूपरेखा उसके चारों ओरके संगटनसे निश्चित हुई है । ' इससे भी सभी संनिहित पदार्थों या घटनाओंमें परस्पर कार्य- कारण भाव नहीं होता । कई घटनाएँ और पदार्थ एक साथ उत्पन्न होते हैं, फिर भी उनमें कोई सम्बन्ध नहीं होता । कार्य - कारण निर्णयके लिये अन्वय- व्यतिरेकादि युक्तियाँ अपेक्षित होती हैं । अन्वय- व्यतिरेक दृढ़ होनेपर अव्यवहित पौर्वापर्य होनेपर भी उसे काकतालीय- न्याय कहा जाता है । जैसे काकके बैठते ही ताल- फल गिरनेसे कई अविवेकी काक एवं ताल- पतनका कार्य- कारणभाव मान लेते हैं । मार्क्सवादी कहते हैं- ' अतिभूतवादीकी तरह द्वन्द्ववादका यह सिद्धान्त नहीं है कि विराम, गतिहीनता एवं अचल जडता और स्थिरताका माप प्रकृति है । ' किंतु इस मतमें प्रकृतिका लक्षण है –' अविराम गतिशीलता, परिवर्तन एवं नित्य नवोन्मेष- विकास । इस परिवर्तनक्रममें कुछ तत्त्वोंका उन्मेष और विकास होता है, तो कुछका ह्रास और निर्माण होता जाता है । इसलिये द्वन्द्ववाद-प्रणालीके द्वारा प्राकृतिक घटनाओंकी परस्पर निर्भरता और सम्बद्धता ध्यानमें रखकर ही उनपर विचार करना यथेष्ट नहीं । हमें उनको गति, परिवर्तन, विकास तथा उनके निर्माण और निर्वाण ध्यानमें रखकर उनपर विचार करना चाहिये । ' भारतीय दर्शनोंके अनुसार सत्त्व, रज, तमकी साम्यावस्था प्रकृति है । तीनों ही स्वप्रकाश चेतनसे भिन्न होनेसे जड अवश्य हैं; परंतु वृत्तिरूप ज्ञान सत्त्वसे होता है, हलचल या क्रिया रजसे होती है और अवष्टम्भ या रुकावट तमसे । अतः तीनों क्रमसे प्रकाश, हलचल एवं अवष्टम्भ स्वभाव माने गये । तीनों गुणोंकी समता भंग होने और विषमता होनेसे सृष्टि होती है । प्रकृति परिणामशील एवं गतिशील है, अतएव नियमित परिणाम एवं विकास उसका होता है, पर उसका किसी द्वन्द्ववादी सिद्धान्तसे सम्बन्ध नहीं । द्वन्द्वात्मक प्रणालीके अनुसार ' मूलतः वह वस्तु महत्त्वपूर्ण नहीं, जो किसी समय स्थायी मालूम पड़ती है, पर जिसका ह्रास तब भी आरम्भ 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_11_1_Front
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३२२ मार्क्सवाद और रामराज्य हो चुका है । महत्त्वपूर्ण वस्तु वह है, जिसका अभ्युदय और विकास हो रहा है, चाहे उस समय वह स्थायी ही प्रतीत होती हो; क्योंकि द्वन्द्वात्मक प्रणाली उसीको अजेय मानती है, जिसका अभ्युदय और विकास हो रहा है । एंजिल्सका कहना है कि ' छोटीसे बड़ीतक वस्तु- बालूसे सूर्यतक, लघुतम जीवकोषसे मनुष्यतक सम्पूर्ण प्रकृति सतत गतिमय और परिवर्तनशील है । उसकी स्थिति-निर्माण और निर्बीजके अविराम प्रवाहमें है । ' ( एंजिल्सका प्रकृति-सम्बन्धी द्वन्द्ववाद) उपर्युक्त बातें आंशिक सत्य हो सकती हैं, पर इनका द्वन्द्वमानसे क्या सम्बन्ध? द्वन्द्वमान भी कोई प्रमाण नहीं, जिससे ये सब बातें सिद्ध हों । उपर्युक्त बातोंके सम्बन्धमें विचार करनेसे विदित होगा कि मार्क्सवादियोंका ‘ प्रकृति ' शब्द भी भ्रामक है; क्योंकि वे पृथ्वी, तेज, जल, वायु, भूतसमुदायसे भिन्न किसी प्रकृतिका अस्तित्व नहीं मानते । ठीक इसके विपरीत सांख्यमतानुयायी सत्त्व, रज, तमकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहते हैं । सम्पूर्ण विभक्त कार्यवर्गका निर्माण करनेवाली अर्थात् महदादि कार्यवर्गके रूपमें परिणत होनेवाली वस्तु प्रकृति है । प्रकृति शब्द उपादानका वाचक है तथा च विश्वके उपादानको प्रकृति कहा जा सकता है । कहा जा चुका है कि किसी भी कार्यकी उत्पत्तिमें प्रकाश, हलचल और अवष्टम्भ (रुकावट) - ये तीन चीजें अपेक्षित होती हैं । प्रकाश, क्रिया तथा उचित नियन्त्रण बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता । इन्हीं तीनोंकी साम्यावस्था प्रकृति है । भूतोत्पत्ति, अहंतत्त्व या महत्तत्त्वकी उत्पत्ति भी इनपर निर्भर है । प्रकृति उपादान है, इसीलिये हर एक विकृतिमें इनका अनुस्यूत होना उचित ही है । ये सब परस्पर सम्बद्ध होते हैं, यह सांख्यका सिद्धान्त ही है- ' गुणानां सम्भूयार्थक्रियाकारित्वम् । ' गुण मिलकर ही क्रिया कर सकते हैं । गुण चल अर्थात् गतिशील होते हैं । ' चलं च गुणवृत्तम्' यह भी सांख्य-सिद्धान्त है । सत्त्व, रज, तम-तीनों ही गुणोंमें अंगांगिभावकी विचित्रतासे ही विचित्र संसार बनता है— 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_11_1_Back
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३२३ ' गुणानां विमर्दवैचित्र्यात् सर्गवैचित्र्यम् । ' यह सभी पौरस्त्य दार्शनिकोंके निश्चित सिद्धान्त हैं । इनमें मार्क्स या एंजिल्सका कोई भी नया आविष्कार नहीं । उन्होंने जो भी नयी बात कही, वही असंगत तथा अप्रामाणिक है । जैसे ' प्रकृतिके पदार्थ और बाह्यरूप एक- दूसरेपर निर्भर हैं; एक-दूसरेसे सजीवरूपसे सम्बद्ध हैं, ' इत्यादि अंश अतिशयोक्तिपूर्ण हैं । यदि सभी सम्बद्ध हों तो सम्बन्धके भावाभावका कोई मूल्य ही नहीं रह जाता । फिर किसका क्या सम्बन्ध है, इस गवेषणाका भी कोई अर्थ नहीं रह जाता । फिर तो खपुष्प, बन्ध्यापुत्र, शशशृंगको भी सम्बद्ध ही कहना पड़ेगा । इसी तरह ' एक- दूसरेकी रूप-रेखा निश्चित करते हैं ', यह भी असंगत है । जडभूत घटादिके समान स्वयं अपनेको ही नहीं जानते, फिर वे दूसरेकी रूप- रेखा क्या निश्चित करेंगे? निश्चय आदि चेतनके धर्म हैं-' ईक्षतेर्नाशब्दम् । ( १।१।५ ) इस ब्रह्मसूत्रमें, जड प्रकृतिमें ईक्षणधर्म अनुपपन्न होनेसे उससे ईक्षणपूर्वक सृष्टिका निषेध किया है । जल, वायु, तेजकी प्रवृत्ति विचारपूर्वक नहीं होती । जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथि- अश्वादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, उसी तरह अचेतन वायु आदि भी स्वाधिष्ठाता चेतन देवतासे अधिष्ठित होनेसे प्रवृत्त होते हैं । किसी कार्यमें अवश्य ही अनेकों पार्श्ववर्त्ती कारण हुआ करते हैं, परंतु सभी पार्श्ववर्त्ती कारण हों, तब तो कार्य -कारणभावकी विशेषता ही नष्ट हो जायगी । अणु- परिमाण, पारिमाण्डल्य आदि किसीके प्रति भी कारण नहीं होते । किसी चोरी या हिंसाके अनेक पार्श्ववर्ती कारण होते हैं, तब केवल हिंसक या चोरको ही क्यों दण्ड दिया जाता है? यह भी विचारणीय है । वस्तुतः शब्दाडम्बरके अतिरिक्त उपर्युक्त मार्क्सय वादोंमें कोई तत्त्व नहीं । नवनवोन्मेष और विकासपर भी विचार आवश्यक है । उन्मेष या विकास विद्यमान वस्तुका ही होता है । कारण सामग्री, आवरण, प्रतिबन्धक आदि हटाकर कार्यको व्यक्त कर देती है । जैसे तिलसे तैल, दुग्धसे नवनीत, तन्तुसे पट आदि । बालूसे तेल, आकाशसे तन्तु या पटका साक्षात् विकास कभी भी सम्भव नहीं । इसीलिये परावर द्रष्टाओंके यहाँ 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_11_2_Front
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३२४ मार्क्सवाद और रामराज्य केवल विकास ही नहीं । किसी भी कार्यमें ' जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति- अर्थात् उत्पत्ति, अस्तित्व, वर्द्धन, विक्रिया, अपक्षय तथा विनाश- ये छ: विकार देखे जाते हैं । स्पष्ट ही है कि कोई मनुष्य, पशु या वनस्पति उत्पन्न होता है, अस्तित्वको प्राप्त होकर वृद्धि, अपक्षय तथा विनाशको प्राप्त होता है । वर्षामें उत्पन्न होनेवाले तृण ग्रीष्मतक विनष्ट हो जाते हैं । बहुत- से जीव प्रतिवर्ष तत्तद् ऋतुओंमें व्यक्त होते हैं । वसन्तके पतझड़, आमोंके बौर, कोकिलाकूजन, ग्रीष्मकी उष्मा, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिरकी अपनी - अपनी विशेषताएँ प्रतिवर्ष व्यक्त होती ही हैं । वेद और गीता इसी तरह सृष्टिका पुनः प्रादुर्भाव मानते हैं ।—' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । ' पूर्वसृष्टिके समान ही विधाता उत्तरोत्तर सृष्टिमें सूर्य-चन्द्र आदिका विधान करते हैं । ' भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ' ( गीता ८। १ ९ ) यह भूतग्राम पुनः -पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन होता है । ' इसी तरह निर्माण और निर्वाणकी बात भी कोई नयी नहीं । एक ओर मनुष्य उत्पन्न और विकसित होता है, परंतु एक ओर यदि निर्माण- निर्वाण- परम्परामें अनुस्यूत एक आत्मा मानकर जन्म, कर्मका सुसम्बद्ध कार्य - कारण भाव माना जाय, तो वह अनियन्त्रित, अप्रामाणिक, असम्बद्ध, निर्माण - निर्वाणकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ है । जन्मकर्मकी परम्परामें अनुस्यूत एक नित्य वस्तु बिना माने ' अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाश ' दोष अनिवार्यरूपसे उपस्थित होता है । जब लोकमें कारण-वैलक्षण्य बिना कार्य - वैलक्षण्य नहीं हो सकता, तब हेतुकी विलक्षणता बिना जन्मों एवं तत्सम्बन्धी सुख दुःखकी विलक्षणता कैसे हो सकेगी? इसी तरह जब लौकिक कर्मोंका कुछ परिणाम होता है, तब अदृष्टफलवाले कर्म बिना फल दिये कैसे नष्ट हो सकेंगे? अतः कोई नित्य आत्मा है, जो कि पूर्व- पूर्वके शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार उत्तरोत्तर जन्म ग्रहण करता है । ' अभ्युदयोन्मुख लघु वस्तु भी महत्त्वपूर्ण होती है, पतनोन्मुख महान् वस्तु भी नगण्य होती है ', यह भी कोई नयी बात नहीं । प्रतिपद्का चन्द्र और पूर्ण चन्द्र इसके उदाहरण हैं, पर इतनेमात्रसे किसी सिद्धान्तका पतन, 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_11_2_Back
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३२५ किसी व्यक्ति या समूहका उत्थान या पतन ऐकान्तिकरूपसे नहीं कहा जा सकता । काल- भेदसे एक ही वस्तुके उत्थान और पतनकी स्थिति आती है । सूर्यका ही उदय- अस्त तथा पुनः उदय होता है । चन्द्रमाका ह्रास होता है और पुन: उसीका विकास भी । किसी व्यक्तिका भी जीवनमें कई बार उत्थान और कई बार पतन होता है । जो घटनाएँ व्यष्टिमें होती हैं, वही समष्टिमें होती रहती हैं । काल- भेद हो सकता है । ' अतिभूतवादकी तरह द्वन्द्ववादका यह सिद्धान्त नहीं है कि विकसित होनेका अर्थ सीधे -सीधे बढ़ना है । जब कि परिमाणमें परिवर्तन होनेसे गुणोंमें परिवर्तन नहीं होता, द्वन्द्ववादके अनुसार विकास-क्रममें हम अदृश्य और अकिंचन परिमाणसम्बन्धी परिवर्तनोंसे स्पष्ट और मौलिक गुणसम्बन्धी परिवर्तनोंतक पहुँच जाते हैं । इस परिवर्तनक्रममें गुणसम्बन्धी परिवर्तन धीरे - धीरे न होकर हठात् एक मंजिलसे दूसरे मंजिलतक छलाँग मारकर शीघ्रतासे होते हैं । ये परिवर्तन आकस्मिक नहीं होते । वे धीरे- धीरे होनेवाले प्रायः अदृश्य परिमाणसम्बन्धी संघटनके स्वाभाविक परिमाण हैं । इसीलिये द्वन्द्वात्मक प्रणालीके अनुसार विकास-क्रमका यह अर्थ नहीं कि पहले जो हो चुका, अब वही सीधे - सीधे दुहराया जा रहा है और न कोल्हूके बैलकी तरह एक ही जगह चक्कर खानेका नाम ही विकास है । विकासकी गति ऊर्ध्वोन्मुख होती है । पहलेकी गुणात्मक स्थितिसे दूसरी गुणात्मक परिस्थितितक संक्रमणका नाम विकास है । विकास साधारणसे संश्लिष्ट और निम्नसे ऊर्ध्वकी ओर होता है । ' एंजिल्सका कहना है कि ' द्वन्द्ववादकी कसौटी है प्रकृति और आधुनिक विज्ञान । ' प्रकृतिविज्ञानके विषयमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि उसने इस कसौटीके लिये अत्यन्त मूल्यवान् सामग्री दी है, जो प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । इस प्रकार अन्ततोगत्वा प्राकृतिक क्रम द्वन्द्वात्मक ही सिद्ध होता है न कि अतिभूतवादी । यह क्रम किसी चिर अपरिवर्तनशील वृत्तमें चक्कर काटनेकी गति नहीं; बल्कि वास्तविक इतिहासके निर्माणकी गति है । यहाँपर सबसे पहले डार्विनका उल्लेख करना चाहिये, जिसने प्रकृतिकी अतिभौतिक कल्पनापर दुःसह प्रहार किया था और सिद्ध किया
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३२६ मार्क्सवाद और रामराज्य था कि आजका चराचर वनस्पति जीव और मनुष्य भी उस विकास-क्रमका परिणाम है, जो करोड़ों वर्षसे लगातार होता चला आ रहा है । उपर्युक्त बातोंमें भी निर्माण-निर्वाण, उत्पत्ति - विनाशसे भिन्न पदार्थ नहीं । कार्य - मात्रका उत्पत्ति- विनाश अनिवार्य होता है । पर इस भूत-प्रकृतिसे अतीत, नित्य कूटस्थ वस्तु नहीं है, यह सिद्ध नहीं होता । बहुत - सी बातें अतिभूतवादियोंके नामसे बेतुकी लिखी गयी हैं । कम- से - कम भारतीय अध्यात्मवादकी दृष्टिमें मार्क्स, एंजिल्सकी दुष्कल्पनाएँ सर्वथा उपहासास्पद हैं । भारतीय अध्यात्मवादी हर एक विकासमें क्रमिक एवं धीरे - धीरे विकसित होनेका सिद्धान्त नहीं मानते 1। मेघमण्डलसे महाविद्युत्- प्रकाशका विकास अतिशीघ्रतासे मान्य ही है । इसीको एक मंजिलसे दूसरे मंजिलपर छलाँग मारनेकी बात कही जा सकती है । उस विकासमें भी क्रम रहता ही है । तापमानके बढ़ जानेसे जलका भाप बन जाना, ताप -मान घट जानेसे बर्फ बन जाना भी इसी कोटिका विकास है । मार्क्सवादियोंके शब्दोंमें ' यही प्रकृतिका एक मंजिलसे दूसरी मंजिलपर छलाँग मारना है । ' अध्यात्मवादी आत्म- परमात्म- सम्बन्धमें ही ऐसी बात करते हैं । ये भौतिकवादियोंको सम्मत न हों, पर भौतिक वस्तुओंके सम्बन्धमें प्रत्यक्षानुमानादिसिद्ध जो भी बातें हैं, उन्हें माननी ही है । दुग्धका दधि परिणाम है, जलका बर्फ परिणाम है । इसी प्रकार विरोधी -कारणोंसे कारणमें जलका विलय या शोषण होता है । इसी तरह ' कोल्हूके बैलके समान चक्कर खानेका नाम विकास नहीं ', यह भी असंगत है । कौन नहीं जानता कि पुनः पुनः दिन- रात, सूर्योदयास्त, चन्द्रमाका ह्रास- विकास तथा ग्रीष्म-वसन्तके आगमनमें पुरानी बातें ही दुहरायी जाती हैं । सदासे ही वैचित्र्य - सादृश्यका ही लक्षण है । जो समझते हैं कि विकासकी गति सदा ऊर्ध्वोन्मुख ही होती है, उनकी दृष्टिमें ऊर्ध्वकी सीमा कोई है या निःसीम? यदि निःसीम तो इसमें प्रमाण क्या? पुनश्च जब विकसित वस्तुका भी निर्वाण या विनाश भी मानते ही हैं, तो इस तरह ह्रास - विकासका चक्कर ही परिलक्षित होता है । उदयनाचार्यने ' न्यायकुसुमांजलि ' की-