मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 331–340
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३२७
जन्मसंस्कारविद्यादेः शक्तेः स्वाध्यायकर्मणोः ।
ह्रासदर्शनतो ह्रासः सम्प्रदायस्य मीयताम्॥
(२।३ ) —कारिकामें दिखलाया है कि स्वाभाविक रूपसे ह्रास हो रहा है । पूर्वजोंकी बुद्धिशक्तिकी तुलनामें आजकी बुद्धिशक्तिका अत्यन्त ह्रास हो गया है । पहलेके मनुष्य- शरीर तथा आजके मनुष्य - शरीरमें पर्याप्त अन्तर हो गया है । अभी अनेक स्थलोंमें ऐसे भाले और तलवारें मिली हैं, जिसे आजके लोग उठा भी नहीं सकते । चारित्रिक स्तर तो इतने नीचे गिर गये हैं कि उनकी पूर्वजोंके सामने कोई तुलना ही नहीं । सृष्टिक्रममें देखते हैं कि कारण कार्यकी अपेक्षा व्यापक, स्वच्छ तथा उच्च कोटिका होता है । कार्य व्याप्य, अस्वच्छ तथा निम्न कोटिका होता है । हाँ, कार्यमें गुण एवं विशेषण आदि बढ़ जाते हैं । घट- पट आदिसे जलानयन, अंगप्रावरणादि कार्य सधते हैं; परंतु मृत्तिका, तन्तु आदिसे उक्त कार्य नहीं सधते । फिर भी घटादिकी अपेक्षा मृत्तिका, तेज, जल, वायु आदि कारणोंमें व्यापकता आदि अधिक स्पष्ट हैं । मृत्तिकामें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध- ये पाँच गुण हैं । जलमें गन्धको छोड़ चार, तेजमें शब्दादि तीन, वायुमें दो और आकाशमें केवल एक शब्द ही गुण होता है । व्यापकता, स्वच्छता आकाशमें सर्वाधिक है । इसीलिये परम कारण सर्वापेक्षया स्वच्छ, व्यापक तथा उच्चकोटिका मान्य है । विकासवादियोंका यह कथन कि ' पूर्वजोंमें क्रिया, ज्ञानशक्तियाँ पूरी विकसित न हुईं, ' सर्वथा भ्रममात्र हैं । तथ्य तो यह है कि पूर्वजोंसे ही आंशिक ज्ञान-क्रियाशक्ति उत्तरोत्तरके लोगोंको प्राप्त होती है, पुस्तकोल्लेखन, शिक्षणालयस्थापन तभी सार्थक होंगे । यदि उत्तरोत्तर लोगोंमें ज्ञान-क्रियाशक्तिका विकास अधिक मानते हैं तो वे किनके लिये पुस्तकोल्लेखादि करते हैं? अल्पज्ञ पूर्वज अतीत हो चुके । उत्तरोत्तर आनेवाली संतान पूर्वजोंकी अपेक्षा बुद्धिमान् होगी ही । उनके लिये ज्ञानोपदेश व्यर्थ ही है । खूब ही हो तो भी पिता, पितामहादिको पुत्रादिकोंके ही छात्र होना
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३२८ मार्क्सवाद और रामराज्य चाहिये । पुत्रादिकोंको अध्यापक बनना चाहिये । पर नहीं, अध्यात्मवादकी दृष्टिसे ईश्वर पूर्ण सर्वज्ञ है । उसकी संतानें ब्रह्मा, वशिष्ठादि तदपेक्षया अल्पज्ञ हैं । जिन लोगोंमें कुछ विशेषता व्यक्त हुई, उनमें ईश्वरके अनुग्रहसे ही । आध्यात्मिकोंकी अनभिज्ञता केवल विकासवादियोंको ही सम्मत है, पर विकासवादियोंकी अनभिज्ञता उभयसम्मत है; क्योंकि वे स्वयं ही अपने पुत्रादिकोंकी अपेक्षा अपनेको उसी न्यायसे अनभिज्ञ मानते हैं । ' परिमाणसम्बन्धी विकाससे गुणसम्बन्धी विकासतकका नाम द्वन्द्वात्मक विकास है । ' इसकी व्याख्या करते हुए एंजिल्सने लिखा है कि ' भौतिक विज्ञानमें प्रत्येक परिवर्तनका अर्थ है- परिमाणका गुणमें संक्रमण । जो किसी भी वस्तुमें निहित अथवा प्रविष्ट गतिके परिमाणके परिवर्तन होता है, वह भी क्रमसे ही होता है । उदाहरणके लिये पानीके ताप-मानका प्रभाव पहले उसके द्रवगुणपर नहीं पड़ता, परंतु उस द्रवगुणका परिमाण ज्यों- ज्यों चढ़ता या गिरता है, त्यों-त्यों वह क्षण निकट आता -जाता है, जब पानी या तो बर्फ होगा या भाप बनेगा । जलकी द्रवस्थिति ज्यों -की- त्यों नहीं बनी रहती । प्लेटिनमके तारको भी दहकानेके लिये एक अल्पतम विद्युत्प्रवाह आवश्यक होता है । प्रत्येक धातुका एक निश्चित तापमान होता है, जब वह पिघलने लगती है । आवश्यक तापमान पानेके हमारे पास जो साधन हैं, उनका प्रयोग करके द्रवपदार्थके शीतोष्ण दिन निश्चित कर दिये गये हैं, जब कि यथेष्ट शीतोष्ण प्रभावसे वह पदार्थ जमने या खौलने लगता है । अन्तमें प्रत्येक गैसके लिये वह चरम विन्दु निश्चित है, जब यथावश्यक दबाव और शीतसे वह द्रव पदार्थके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है, भौतिक विज्ञानमें जिन्हें हम स्थिर विन्दु कहते हैं, जहाँसे पदार्थकी स्थिति बदलकर दूसरी हो जाती है; वे अधिकतर और कुछ नहीं, क्रान्ति विन्दुओंके ही नाम हैं, जहाँ गति परिमाण-सम्बन्धी ह्रास किंवा वृद्धिसे उस पदार्थकी स्थितिमें एक गुणात्मक परिवर्तन हो जाता है । फलतः इन क्रान्ति- विन्दुओंपर परिमाणमें गुणका रूपान्तर हो जाता है । '
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३२९ एंजिल्सका प्रकृतिसम्बन्धी द्वन्द्ववाद इसी प्रकार एंजिल्सने रसायनशास्त्रके विषयमें लिखा है कि ' पदार्थोंकी अणुबद्ध रचनामें परिवर्तन होनेसे गुणात्मक परिवर्तन सम्भव होते हैं । इन गुणात्मक परिवर्तनोंके विज्ञानको हम ' रसायनशास्त्र ' कह सकते हैं । हेगलको यह मालूम हो चुका था । उदाहरणके लिये आक्सिजनके अणुमें दो परमाणु होते हैं । इन दोके बदले यदि तीन परमाणु कर दिये जायँ, तो ओजोन बन जाता है, जो गन्ध और प्रतिक्रियामें साधारण आक्सिजनसे नितान्त भिन्न होता है । जब आक्सिजन विभिन्न अनुपातोंमें नाइट्रोजन या गन्धकसे मिलाया जाता है, तब तो उसका कहना ही क्या? हर अनुपातसे ऐसा पदार्थ बनता है, जो गुणात्मक दृष्टिसे दूसरे पदार्थोंसे भिन्न होता है । ' उपर्युक्त दोनों ही प्रघट्टकोंसे यह सिद्ध होता है कि निर्दिष्ट कारणोंसे वस्तुओंकी अवस्थाओंमें परिवर्तन ही सिद्ध होता है । वेदान्त- सिद्धान्तके अनुसार तेजसे ही जल उत्पन्न होता है, शीतके योगसे वह बर्फ बन जाता है । तेजसे जलका शुष्क हो जाना लोकसिद्ध है, परंतु फिर भी इन परिणामोंकी निश्चित सीमा है, अतएव अचेतन चेतन नहीं बन सकता । इस तरह असत्य सत्य, अनित्य नित्य नहीं बन सकते । स्टालिनका कहना है कि ' द्वन्द्ववादका सिद्धान्त है कि प्रकृतिके सभी बाह्य रूपों और पदार्थोंमें आन्तरिक असंगतियाँ सहजरूपसे विद्यमान हैं । इन पदार्थों और रूपोंके भाव पक्ष और अभाव - पक्ष दोनों हैं । उनका अतीत है तो अनागत भी है । एक अंश मरणशील है तो दूसरा विकासोन्मुख । इन दो विरोधी अंशोंका संघर्ष ही विकासक्रमकी आन्तरिक प्रक्रिया है । परिमाण- भेदके गुण- भेदमें परिवर्तित होनेकी यही आन्तरिक प्रक्रिया है । इसलिये द्वन्द्वात्मक प्रणालीके अनुसार निम्नसे ऊर्ध्वकी ओर विकास इस क्रममें नहीं होता कि प्रकृतिके स्तर एकके बाद एक सहज गतिसे खुलते जायँ । इसके प्रतिकूल विकासक्रममें पदार्थों और प्रकृतिके बाह्यरूपोंमें सहजरूपसे विद्यमान असंगतियाँ ही खुलती जाती हैं । इन असंगतियोंके आधारपर जो विरोधी प्रवृत्तियाँ
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३३० मार्क्सवाद और रामराज्य क्रियाशील हैं, उनका संघर्ष ही खुलता जाता है । ' लेनिनके शब्दोंमें ' वास्तवमें पदार्थोंके सारतत्त्वोंमें ही अन्तर्निहित असंगतियोंके अध्ययनका ही नाम द्वन्द्ववाद है । ' ( लेनिनदर्शन-सम्बन्धी नोटबुक रूसी संस्करण, पृ० २६७ ) । लेनिनने यह भी कहा था कि ' विरोधी तत्त्वोंका संघर्ष ही विकास है । ' ( संक्षिप्त लेनिन ग्रन्थावली, रूसी संस्करण, खण्ड १३, पृष्ठ ३०१ ) उपर्युक्त बातोंपर विचार करनेसे विदित होगा कि अंश- भेदसे निर्वाण- निर्माणकी परम्परा चलती है, परंतु अंशभेदसे जब दोनों बातें चलती हैं, तब उनमें संघर्ष क्या? एक व्यक्ति मरता, दूसरा पैदा होता है, इसमें संघर्षकी कोई बात नहीं । क्रमेण वनस्पति, पश्वादि एक ओर उत्पन्न हो रहे हैं तो दूसरी ओर नष्ट हो रहे हैं । हाँ, यदि उसी क्षण उसी अंशमें उसी रूपसे भाव, अभाव, निर्वाण, निर्माण आदि हों, तभी विरोध और संघर्ष हो सकता है । पर यह असम्भव है ही; क्योंकि यदि भाव, अभाव, निर्वाण, निर्माण समान देश, समान कालमें रह जायँ तो संसारमें विरोध ही मिट जायगा । फिर संघर्ष भी क्या रहेगा? यदि रात्रि और दिन समकालमें हों, तभी संघर्ष सम्भव है । दो विरोधी मल्लोंका ही संघर्ष हो सकता है, अतीत- अनागत मल्लोंका संघर्ष क्या होगा? साथ ही यदि सहभाव सम्भव हो जाय तो भी विरोध असम्भव है; क्योंकि स्वानुचित देशकाल-स्थायित्व ही विरोधका कारण होता है । धरणी, अनिल, जलके संघर्ष, बीजके विध्वंससे अंकुरकी उत्पत्ति होती है । कुछ लोग इसी आधारपर असत्कारणवाद सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं, परंतु अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि ऐसा हो तो कार्यमें कारणका अनुवेध रहनेसे हर कार्यमें कारणका अनुवेध रहना चाहिये, किंतु उपलब्धि इसके विपरीत रहती है । कार्यमात्रमें सत्ताका ही अनुवेध दिखायी देता है । अतः सत्कार्यवाद ही ठीक है । बीजके अंश ही अंकुरादिमें अनुस्यूत रहते हैं । सर्वथापि व्यवहारमें कार्योत्पादनानुकूल सामग्रियाँ ही कार्य - विकासमूल समझी जा सकती हैं, असंगतियाँ विरोध या संघर्ष नहीं । कार्यके प्रतिबन्धकादि दोषका निवारण अवश्य अपेक्षित
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३३१ होनेपर पुरातन या निर्वाण स्वयं विनाशोन्मुख है । अतः उसकी प्रतिबन्धकता असिद्ध है । स्टालिनका कहना है कि ' समाजके जीवन और इतिहासके अध्ययन करनेके लिये सामाजिक क्षेत्रके द्वन्द्वात्मक प्रणालीका प्रचार कितना महत्त्वपूर्ण है और समाजके इतिहास तथा सर्वहारावर्गकी पार्टीकी प्रत्यक्ष कार्यवाहीपर उन सिद्धान्तोंका लागू करना क्या महत्त्व रखता है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है । यदि संसारमें कोई भी वस्तु विच्छिन्न और एकाकी नहीं है, यदि सभी वस्तुएँ सम्बद्ध और परस्पर निर्भर हैं, तो सिद्ध है कि इतिहासकी किसी भी समाज व्यवस्था या सामाजिक आन्दोलनका मूल्यांकन हम किसी भी सनातन न्याय अथवा पूर्वकल्पित सिद्धान्तसे नहीं कर सकते । इस प्रकारके मूल्यांकनका इतिहासोंमें नितान्त अभाव नहीं है । यह मूल्यांकन परिस्थितियोंपर विचार करके वे ही कर सकते हैं, जिन्होंने उस समाज- व्यवस्थाके सामाजिक आन्दोलनको जन्म दिया होगा, जिससे वे सम्बद्ध हैं । वर्तमान परिस्थितियोंमें दासप्रथा निरर्थक, अस्वाभाविक और मूर्खतापूर्ण होगी । पर जब पंचायती-व्यवस्था छिन्न- भिन्न हो रही थी, तब दासप्रथाका होना समझमें आ सकता था । तबकी परिस्थितिमें वह एक स्वाभाविक घटना थी; क्योंकि प्राचीन समाजकी पंचायती व्यवस्थाको देखते हुए वह उन्नत व्यवस्था थी । जब जारशाही और पूँजीवादी व्यवस्था विद्यमान थी, तब उदाहरणके लिये १ ९०५ के रूसमें एक पूँजीवादी जनवादी प्रजातन्त्रकी माँग अच्छी तरहसे समझमें आ सकती थी । वह उचित और क्रान्तिकारी माँग थी; क्योंकि उस समय इनकी प्राप्तिका अर्थ होता ' प्रगतिकी राहपर एक कदम आगे बढ़ना । ' पर अब सोवियतसंघकी परिस्थितियोंमें पूँजीवादी जनवादी प्रजातन्त्रकी माँग एक अर्थहीन और क्रान्तिविरोधी माँग होगी; क्योंकि सोवियत प्रजातन्त्रकी तुलनामें पूँजीवादी प्रजातन्त्र निकृष्ट है । यह तो पिछली मंजिलकी ओर लौटना होगा । देशकाल- परिस्थितियोंके अनुसार ही प्रगति और प्रतिक्रियाका निर्णय हो सकता है, यह स्पष्ट है । सामाजिक घटनाओंके प्रति इस ऐतिहासिक दृष्टिकोणके बिना ऐतिहासिक विज्ञानका
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३३२ मार्क्सवाद और रामराज्य अस्तित्व और विकास असम्भव है । इतिहास विज्ञान-तारतम्य - हीन घटनाओंकी सूची और क्षुद्रतम भ्रान्तियोंका संकलन न बने, यह इस दृष्टिकोणद्वारा ही सम्भव है । ' उपर्युक्त बातोंकी समालोचनामें सबसे पहली बात यह है कि जिस इतिहासके आधारपर द्वन्द्ववादकी कल्पना खड़ी की जाती है, वह इतिहास स्वयं किसी सिद्धान्तका साधक या बाधक नहीं हो सकता । इतिवृत्त, ऐतिह्य, इतिहासादि शब्द पुरानी घटनाओंके लिये प्रयुक्त होते हैं । ' इति ह आस' – ऐसा था, ऐसी प्रसिद्धि ही इतिहास कहलाता है । वह प्रामाणिक, अप्रामाणिक दोनों ही प्रकारका होता है । इतिहास यदि प्रत्यक्षानुमानमूलक हो या शब्दमूलक हो तो प्रमाणके निर्दुष्ट होनेसे ही निर्दुष्ट हो सकता है । प्रमाण दुष्ट है तो इतिहास भी दुष्ट ही होता है । प्रायः आजकलके इतिहास दुरभिसन्धि एवं भ्रान्तिपूर्ण होते हैं । इस सम्बन्धमें अनेक पाश्चात्य विद्वानोंकी सम्मतियाँ ' भारतमें अंग्रेजी राज्य ' पुस्तकमें उद्धृत हैं । किसी सिक्के या खण्डहर आदिके आधारपर ऐतिहासिक कल्पनाओंका महल खड़ा कर दिया जाता है । चतुर लोग अपने विभिन्न उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये मनगढन्त इतिहासका निर्माण कर देते हैं । आँखों देखी घटनाओंके सम्बन्धमें विभिन्न संवाददाताओंकी विभिन्न रायें होती हैं । तार, टेलीप्रिन्टर, रेडियो, अखबारोंतक पहुँचते- पहुँचते उनके अनेक रूप बन जाते हैं । फिर इनके आधारपर किसी सत्य घटनाका निर्णय कैसे किया जा सकता है? ऋतम्भरा- प्रज्ञायुक्त ऋषियोंके इतिहास अवश्य प्रामाणिक कहे जा सकते हैं । वे समाधिके द्वारा संनिकृष्ट, विप्रकृष्ट, स्थूल, सूक्ष्म वस्तुओंका साक्षात्कार कर सकते हैं, परंतु उनकी दृष्टिसे पुरानी घटनाओंका दुहराना मात्र, ' इतिहास ' गड़े मुर्दोंको उखाड़नेके अतिरिक्त और कुछ नहीं । सत्य ऐतिहासिक घटनाओंमें भी समीचीन, असमीचीन, इष्ट, अनिष्ट, उचित, अनुचित कई तरहकी घटनाएँ होती हैं । इसीलिये व्यवहारमें इतिहास प्रमाण नहीं होता, अपितु विधान प्रमाण होता है । इसीलिये रामायण, भारतसे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि रामादिवत् आचरण करना चाहिये, न कि
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३३३ रावणादिवत् । यही इतिहासका प्रयोजन है । जिन घटनाओंसे राष्ट्र या विश्वको धार्मिक, आर्थिक, चारित्रिक उन्नतिमें सहायता मिलती हो, उन्हीं घटनाओंका इतिहासमें उल्लेख होना उचित है । आज भी विशिष्ट पुरुषोंका ही इतिहासमें उल्लेख होता है । मार्क्स, लेनिन-जैसा अन्य कम्युनिष्टोंका इतिहासमें महत्त्व नहीं । म्युनिसिपालिटीके दफ्तरमें मनुष्यके जन्म- मरणका उल्लेख होता है । कीट- पतंगोंका नहीं; क्योंकि उनका महत्त्व नहीं है । सारांश यह है कि इतिवृत्तमात्रसे कोई सिद्धान्त नहीं निकाला जा सकता; क्योंकि इतिवृत्तकी घटनाएँ उचित- अनुचित - दोनों ही ढंगकी हो सकती हैं । विधानमें औचित्य -निर्णयके अनन्तर ही कोई ऐतिहासिक घटना स्थान पा सकती है । यदि सूर्योदय- सूर्यास्त, चन्द्रमाका ह्रास- विकास, समुद्रके ज्वार- भाटादिके नियम सनातन हैं तो कोई सनातन न्याय या सिद्धान्त भी हो ही सकता है, पर व्यक्तिविशेष या परिस्थितिविशेषसे कुछ क्रियाओंमें अन्तर पड़ सकता है । सनातन न्याय एवं सिद्धान्तोंपर इनका कुछ भी असर नहीं पड़ सकता । उष्णता अग्निका स्वभाव है, वह व्यक्ति या परिस्थितिविशेषसे बदल नहीं सकता । दासप्रथाको कितना भी निरर्थक अस्वाभाविक या मूर्खतापूर्ण क्यों न कहा जाय; परंतु किसी -न-किसी रूपमें उसका अस्तित्व सर्वत्र है और रहेगा । हाँ, नाममें भेद हो सकता है । कौन नहीं जानता कि ' सोवियतसंघ ' में सरकारसे मतभेद रखनेवाले लोगोंके साथ दासोंकी अपेक्षा भी बुरा बर्ताव किया जाता है? विरुद्ध व्यक्तियोंको शासनारूढ़ व्यक्तियों या संघोंके नियन्त्रणमें दासोंसे भी निकृष्ट बनकर जीवन बिताना पड़ता है । शासन, न्याय, शिक्षा, सेना आदि सभी विभागोंमें उच्च कर्मचारियों और निम्न कर्मचारियोंमें अंगांगिभाव या शेष - शेषिभाव अनिवार्य रहता है । ' एक व्यक्ति दूसरेका हुक्म माननेके लिये बाध्य हो, न माननेपर दण्डित हो ', यही दास प्रथाका नमूना है । इसका कब अभाव हो सकता है । धर्मनियन्त्रित राज्यमें ही शासन एवं शासित आदिका अभाव कहा जा सकता है । वहाँ भी धर्ममूलक नियम्य- नियामकभाव, गुरु - शिष्य, अग्रज-अनुज, पिता- पुत्र, पति-पत्नीका नियम्य-नियामकभाव रहता ही है ।
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३३४ मार्क्सवाद और रामराज्य सोवियत प्रजातन्त्रकी तुलनामें पूँजीवादी, जनवादी प्रजातन्त्रको निकृष्ट कहना भी स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्त है । इस सम्बन्धमें उत्तरोत्तर ऐतिहासिक प्रगतिकी बात करना निराधार है । आजके प्रजातन्त्र, गणतन्त्र सबकी अपेक्षा दो हजार वर्ष पहलेके अशोकके साम्राज्यकी सुख- समृद्धि कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थी । उसमें सभी अपनेको सुखी और समृद्ध अनुभव करते थे । पाँच हजार वर्ष पहले युधिष्ठिरके शासनमें तो धर्मराज्य था ही । लाखों वर्ष पहले होनेवाले रामराज्यका मुकाबला करनेवाला कोई भी शासन न कभी हुआ और न भविष्यमें ही होनेकी आशा है । आजके पण्डितम्मन्य बड़े गर्वसे कहते हैं कि ' यह बीसवीं शताब्दी है, पुराना जमाना लद गया । दुनिया बहुत आगे बढ़ गयी । पुरानी धर्म- कर्मकी सड़ी-गली बातें अब नहीं चल सकतीं । उनका समय बीत गया, परंतु वे यह नहीं देखते कि यदि धर्म और सभ्यताका समय बीत गया तो सुख, शान्ति एवं समृद्धिका भी समय बीत गया । यदि सुख- शान्तिके बीते दिनोंको लौटाना है तो धर्म, सभ्यता एवं सुव्यवस्थाओंके दिनोंको भी लौटाना ही पड़ेगा । ' कुछ लोग अपने दृष्टिकोणके अनुसार तोड़- मरोड़कर इतिहासका भी दृष्टिकोण बना लें, परंतु इतने मात्रसे ऐतिहासिक घटनाओंका सर्वसिद्धरूप मिटाया नहीं जा सकता । ह्रास- विकासका चक्र ही संसार है । विकारी पुरानी चीजका क्षय, नवीनका अभ्युदय होता है सही; परंतु आत्मा- काल आदि कुछ पुरातन ऐसी भी तो वस्तुएँ होती हैं, जो नित्य हैं, जिनका कभी क्षय नहीं होता । इसी तरह व्यक्तियोंके अनित्य होनेपर भी प्रवाह नित्य होता है । जैसे गंगादि प्रवाहकी अपेक्षा दीपशिखादि प्रवाह अधिक अस्थिर है । सत्त्व, रज, तमके अनुसार संसारका प्रवाह अनुकूल- प्रतिकूल चलता है । कभी काम- क्रोधका तो कभी शम-दमका प्रवाह चलता है । अविवेकी कामादि-प्रवाहमें बहते हैं । विवेकी उन्हें रोककर शान्त्यादिका प्रवाह चलाता है । महापुरुष कभी प्रवाहमें नहीं बहते, वे उसे रोककर धर्मनियन्त्रित बनाते हैं । अतः कभी नास्तिक भौतिकवादियोंका बाहुल्य होता है, फिर आस्तिकपक्ष उठता है । सत्य- अनृत, आसुर- दैव
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माक्सीय द्वन्द्ववाद ३३५ दोनों पक्षोंका कालानुसार उद्भव, अभिभवादि होता रहता है । फिर भी ' सत्यं जयति नानृतम्' के अनुसार अन्तमें सत्य ही जीतता है, भले ही पहले अनृतका बोल- बाला फैल गया हो । इसी तरह धर्मकी ही विजय होती है, अधर्मकी नहीं । इसलिये चिरन्तन शाश्वत सत्य सिद्धान्तका अवलम्बन करनेसे ही अनृत अधर्मका अतिक्रमण किया जा सकता है । एतावता यह कहना सर्वथा असंगत है कि ' संसार निरन्तर गतिशील है, पुरातनका विनाश और नवीनका उदय होता रहता है; पुरातन व्यवस्थाएँ चिरन्तन नहीं हो सकतीं । ' कोई वस्तु स्थायी रहनेपर ही स्थायी कही जा सकती है । स्टालिनका यह कहना भी ठीक नहीं कि ' शोषण और व्यक्तिगत सम्पत्तिके सिद्धान्त शाश्वत सत्य नहीं हो सकते । किसानपर जमीनदारके, मंजदूरपर पूँजीपतिके प्रभुत्वका सिद्धान्त त्रिकालाबाध्य नहीं हो सकता; क्योंकि यह एक साधारण वस्तुका अतिरंजित बीभत्स वर्णनमात्र है । ' व्यक्तिगत सम्पत्तिके सिद्धान्तको शोषणका सिद्धान्त नहीं कहा जा सकता । ( आगे चलकर तर्कके आधारपर व्यक्तिगत सम्पत्तिका सिद्धान्त निरूपित किया जायगा, ‘ देखिये पृष्ठ २४८ ) । कम्युनिष्टकी दृष्टिमें तो किसी गिरहकट व्यक्तिको रोका नहीं जा सकता और न तो उसका पुनरुत्थान ही सम्भव है । इसलिये उसे और धक्का दे देना चाहिये, जिससे वह शीघ्र ही नष्ट हो जाय । ' इस तरह वे सर्वदा अभ्युदयोन्मुख वर्गके साथी होते हैं । ‘ बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय ' बहुमतका सिद्धान्त वहाँ असम्भव है । स्टालिनका कहना है कि ' १ ९वीं शतीके नवें दशकमें जब • मार्क्सवादियों तथा लोकवादियोंमें संग्राम चल रहा था, रूसी सर्वहारावर्ग साधारण जनताका एक झुंड-अल्प भाग था, इसके विपरीत खेतिहर किसान जनताका बहुसंख्यक भाग था । पर सर्वहारावर्ग एक विकासमान वर्ग था, जबकि वर्गके रूपमें किसान छिन्न -भिन्न हो रहे थे । पर चूँकि सर्वहारावर्ग एक विकासमान वर्ग था, अतः मार्क्सवादियोंने इसीके आधारपर अपनी नीति निर्धारित - स्थापित की । उनकी यह धारणा भ्रान्त न थी । अतएव आगे चलकर यही वर्ग एक क्षुद्र शक्तिसे विकसित होकर
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३३६ मार्क्सवाद और रामराज्य उच्च कोटिका ऐतिहासिक और राजनीतिक शक्ति बन गया । ' ( जे० स्टालिनका द्वन्द्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद ) पर यह कहना ठीक नहीं । उत्थान- पतन संसारका धर्म है । जो सूर्य कभी अस्त होता है, वही उदय होता है । जीवनमें भी ग्रहदशाके अनुसार कभी 'पतननीचैर्गच्छत्युपरि, कभी उत्थान भीचहोता दशाहै- चक्रनेमिक्रमेण । ' (मेघदूत २।५२) खेतिहर किसान वर्गको शोषक भी नहीं कहा जा सकता । उसकी कमाई सबको खानेको मिलती है । अतः ' बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय ' उसकी दशा सुधारना क्या उचित न था? फिर जब कम्युनिष्ट शोषितका ही पक्ष लेता है, तब यह भी कहना होगा कि ' जो सर्वाधिक शोषित हो, उसीका पक्ष लेकर शोषकोंका मुकाबला करना चाहिये । ' इस दृष्टिसे भी सर्वाधिक बहुसंख्यक समाजके हितार्थ प्रयत्न आवश्यक है । फिर केवल सर्वहारा मजदूर समाजका ही पक्षपात क्यों? पुनश्च यदि परिणाम सम्बन्धी, क्रमिक परिवर्तन और अकस्मात् एवं शीघ्रतासे होनेवाले गुण- सम्बन्धी परिवर्तन विकासके नियम हैं तो जैसे सर्वहारा वर्गद्वारा की गयी क्रान्ति स्वाभाविक अनिवार्य घटना हो सकती है, वैसे ही खेतिहर वर्गद्वारा भी की गयी क्रान्ति महत्त्वपूर्ण क्यों न होगी? फिर यदि द्वन्द्वमानके अनुसार निर्माण और निर्वाणका क्रम चलता ही रहेगा तो किसी दिन साम्यवादकी कल्पना भी पुरानी होगी और फिर इसे भी मिटानेके लिये कम्युनिष्टको प्रयत्नशील होना पड़ेगा । आजकल जो ' सुधारवाद ' चलता है, जिसका उद्देश्य प्राचीन वस्तुओंका एकाएक विनाश नहीं, किंतु दोषोंको दूर कर उन्हें अच्छा बनाना होता है, स्टालिन आदिने उसे नगण्य बताया है । समाजवादक मुख्य तीन प्रवृत्तियाँ हैं — सुधारवाद, अराजकतावाद और मार्क्सवाद । सुधारवाद— ( बर्न्सवीक आदिकी विचारधारा ) समाजवादको बहुत दूरकी बात समझता है । उससे आगे कुछ है ही नहीं । सुधारवाद समाजवादी क्रान्तिको नहीं मानता और शान्तिपूर्ण उपायोंसे समाजवाद कायम करना