मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 441–450
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४३७ साथ, उपयोग एवं माँगका सम्बन्ध रहता है । एक ज्ञानशून्य मनुष्य और बकरेके लिये रोटी या नीमकी पत्तीका जो महत्त्व है, वह हीरेका नहीं । जो वस्तु जिसके बाह्य या आन्तरिक आवश्यकताओं, इच्छाओंकी पूरक होती है, उसके प्रति ही उसकी कीमत होती है । कभी- कभी एक गिलास पानी या एक टुकड़ा रोटी भी सैकड़ों हीरेके बराबर ठहरती है । गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं -' संपति सगरे जगत की, स्वासा सम नहिँ होइ । ' सारे संसारकी सम्पत्ति एक श्वासके बराबर नहीं होती । यदि कोई गुणी करोड़ों हीरा लेकर भी मरणकालमें श्वास लौटा दे, तो यह सौदा महँगा नहीं समझा जाता । वस्तुतः मार्क्स श्रमको ही आमदनी या मूल्यका आधार मानकर, प्राकृतिक वस्तु या कच्चे मालके उत्पादनका महत्त्व घटाकर मजदूर- राज्यका औचित्य सिद्ध करना चाहता है; परंतु उपर्युक्त कथनानुसार यही कहा जा सकता है कि मूल्यमें श्रम भी कारण है । जैसे श्रम बिना कभी मशीन एवं कच्चे माल तथा भूमि-खान आदि अन्य प्राकृतिक साधन मुर्दे पड़े रहते हैं, वैसे ही श्रम भी उपयुक्त साधनोंके बिना निरर्थक ही रह जाता है । काम लेनेवाला न हो तो कामका कुछ भी फल नहीं होता । काम लेनेवाला तथा दाम देनेवाला न मिलनेसे ही बेकारीका प्रश्न उठता है । यह ऊपर कहा ही जा चुका है कि अनेकों ऐसी वस्तुएँ हैं, जिनके उत्पादनमें श्रम कुछ नहीं हुआ और उनका उपयोग- मूल्य एवं विनिमय-मूल्य दोनों ही होता है । कोई भी कार्य लाभके लिये ही किया जाता है; तभी अति समान वस्तुका विनिमय नहीं होता । अर्थात् एक मन गेहूँका उसी ढंगके एक मन गेहूँके साथ विनिमय नहीं किया जाता । यातायातके द्वारा देशान्तर, कालान्तरके सम्बन्धसे क्रय -विक्रय या विनिमय लाभके लिये ही होते हैं । जैसे भारतका जूट विदेशोंमें विशेष मूल्य देता है; मार्गशीर्षका चावल श्रावणमें अधिक मूल्यवान् हो जाता है । अपनी आवश्यकतासे अधिक उत्पादन होने एवं अन्य वस्तुओंकी अपेक्षा होनेसे ही विनिमय या क्रय - विक्रयकी बात चलती है । अतएव खेती, मजदूरी और नौकरीके धन्धेके समान ही क्रय-विक्रयका एक धन्धा है । यदि
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४३८ मार्क्सवाद और रामराज्य उससे लाभ की सम्भावना न हो तो उसमें कोई प्रवृत्त ही क्यों हो? मूल्य और श्रम कहा जाता है, ' मशीनोंके नये आविष्कारों एवं उत्पादनके कामोंमें दक्षता आनेसे कम श्रममें वस्तु उत्पन्न होने लगती है । इसीलिये वस्तुका दाम कम हो जाता है । अतः सिद्ध है कि श्रम ही विनिमय - मूल्यका आधार है । ' पर यह बात ठीक नहीं जँचती । कारण, दूसरा पक्ष यह कह सकता है कि मालकी अधिकताके कारण ही माँग घटी और माँग घटनेसे विनिमय - मूल्य घटा । माल बढ़ानेके कारण मशीनें भी हैं ही । आवश्यकतासे अधिक सौदा तैयार हो जानेपर मार्क्सवादी श्रमको निरर्थक मानते हैं । वस्तुतः उपयोग- मूल्य और विनिमय मूल्य, यह विभाजन ही व्यर्थ है । उद्देश्यभेदसे वस्तुभेद नहीं होता । अग्नि अपने लिये जलायी जाती है, वह दूसरोंके काममें भी आती है । अग्निहोत्रके उद्देश्यसे अग्निमन्थन कर अग्नि प्रकट की जाती है, फिर वही भोजन बनानेके काम आती है । कभी उसीसे यज्ञशाला भी जल जाती है, पर इतनेसे ही अग्नि दो नहीं हो जाती । भारतीय दृष्टिसे तो कोई वस्तु केवल अपने लिये पैदा ही नहीं की जाती । यज्ञ, दान, देवता, पितर तथा पड़ोसीका हित भी उद्देश्य रहता है । फिर जब अन्य वस्तुएँ तथा रुपये भी अपने काममें आते हैं, तब बेचनेके लिये तैयार किया हुआ माल भी तो प्रकारान्तरसे आत्मार्थ ही हुआ । यदि वस्त्रादि पदार्थ या रुपयादि अपेक्षित न हों तो क्यों श्रमसे वस्तु -निर्माण करें और निर्मित वस्तुको दूसरोंको क्यों दें? अतः निष्पक्षरूपसे सर्व -हितकारी रामराज्य है । यह ठीक है कि श्रम बिना कच्चा माल तथा मशीनें व्यर्थ हैं, पर श्रम भी प्राकृतिक साधनों ( कच्चे माल ) -के अभावमें निरर्थक ही है । अतएव श्रमको केवल सहकारी कारण माना जा सकता है । जैसे घटका कारण मृत्तिका है, पर जल सहकारी कारण है; क्योंकि जलके बिना घटका निर्माण नहीं हो सकता, तो भी घटके कारणोंमें मृत्तिकाकी प्रधानताका खण्डन नहीं हो सकता, पर सहकारी कारण होनेसे जलकी तरह श्रम भी अवश्य महत्त्वपूर्ण है । साथ ही प्राकृतिक साधन तो
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४३ ९ श्रमानपेक्ष भी कुछ मूल्य रखते हैं, पर अन्य साधनोंके अभावमें श्रमकी कोई कीमत नहीं । मजदूरी कहा जाता है, ‘ यद्यपि मालूम पड़ता है, मजदूरको उसके श्रमके बदले पूरी मजदूरी मिल रही है, परंतु उसको घोड़ाको दाना देनेके तुल्य केवल उतनी ही मजदूरी दी जाती है, जितनेमें वह जीवन- निर्वाह कर सके और उसमें काम करनेकी शक्ति बनी रहे । जब कभी वस्तुओंकी दर घट जाती है, तो मजदूरीका परिमाण ज्यों-का- त्यों बना रहनेपर भी मजदूर जीवन-निर्वाहकी अधिक सामग्री पा सकते हैं । वस्तुओंके दर बढ़नेपर कम सामग्री मिलने लगती है । इस दृष्टिसे मजदूरोंके वेतन रुपयोंकी संख्या ज्यों -की -त्यों बनी रहनेपर भी वास्तवमें उनकी मजदूरी घटती - बढ़ती रहती है । पूँजीवादी अर्थशास्त्रकार इस नियमको स्पष्ट और न्याययुक्त मानते हैं । पर मार्क्स इससे सन्तुष्ट नहीं । उसका कहना है कि कोई पूँजीपति उसी नौकरको रखता है, जो उसे दी जानेवाली मजदूरीसे अधिक माल तैयार करता है । यदि अपने जीवन -निर्वाहके लायक सामग्री पानेके लिये मजदूरको प्रतिदिन ५ घंटा काम करना पर्याप्त हो, तो उसे ५ घंटे पूँजीपतिके लिये भी काम करना आवश्यक होता है । अतः मार्क्सके मतानुसार मजदूरके अपने लिये किये गये श्रमको आवश्यक श्रम और पूँजीपतिके लिये किये गये श्रमको अतिरिक्त श्रम कहा जाता है । मार्क्स अतिरिक्त श्रमको बिना मूल्यका श्रम कहता है । इस तरह बदलेमें बिना कुछ दिये ही पूँजीपति मजदूरकी कमाई हजम करता रहता है । ' मजदूरोंको उनके कामके अनुसार मजदूरी मिलनी परमावश्यक है । निष्पक्ष सरकार, जनता अथवा उभयपक्षीय विशेषज्ञ विद्वान् उचित मजदूरीकी दर निश्चित कर सकते हैं । समष्टि - हितकी दृष्टिसे सरकारको उस निश्चयको मान्यता देनी चाहिये । उचित भोजन-वस्त्र, औषध, आवास-स्थान एवं शिक्षाकी व्यवस्था सबके लिये होनी परमावश्यक है । उसके ऊपर भी योग्यता एवं कामके अनुसार मजदूरको अधिकाधिक विकसित सुखी तथा साधनसम्पन्न होने, अपने श्रम न करनेलायक माता-
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४४० मार्क्सवाद और रामराज्य पिता तथा बालक एवं अपनी अगली पीढ़ीके लिये धन -संग्रह करनेका अधिकार होना चाहिये । यह सामान्य बात है कि दूसरोंकी वस्तु छीनना किसीको बुरा नहीं लगता; परंतु जब अपनी वस्तु छिनने लगती है, तब अवश्य पीड़ा प्रतीत होती है । मजदूरोंके भी कुटुम्ब होते हैं । वे भी अपने कुटुम्बके भविष्यकी दृष्टिसे अनेक वस्तुओं संग्रह करते हैं । जब उनका संग्रह छिनने लगता है, तब उन्हें भी यह नहीं जँचता । कोई भी व्यापार, धन्धा, उद्योग अपने फायदेके लिये किया जाता है । मजदूर भी फायदेके लिये नौकरी करता है । कोई आदमी अपनी खेती करके भी जीवन चला सकता है । फिर भी वह नौकरी करनेके लिये शहरोंमें जाता है, वहाँ देहातोंकी अपेक्षा कम परिश्रममें ही अधिक लाभ दिखायी देता है । तब फिर यह स्वाभाविक है कि पूँजीपति भी मजदूरी देकर मजदूरोंसे लाभ उठाये । शास्त्रोंके अनुसार भी ऋत्विक् आदिको जितनी दक्षिणा देकर यज्ञ किया जाता है, उससे लाखों गुणा अधिक फल यजमानको मिलता है । इसी तरह मजदूरोंकी उचित वेतन दे देनेपर उनके द्वारा मालिकको अधिक लाभ होता हो तो उससे मजदूरका कुछ भी नुकसान नहीं होता । यदि उत्पादनमें श्रम ही सब कुछ होता, प्राकृतिक साधनों, मशीनोंका महत्त्व न होता, मजदूर मजदूरी न लेता; तब अवश्य ही सब कुछ मजदूरका ही होना चाहिये था, परंतु जब अन्य साधन भी प्रधानरूपसे अपेक्षित होते हैं, मजदूर मजदूरी लेता है, तो उत्पादनसे पूँजीपतिका लाभ अनुचित नहीं कहा जा सकता । अपने निर्वाहलायक ही काम करना तब उचित होता, जब दूसरेसे कोई प्रयोजन नहीं होता । अर्थात् जब वह अपनी पूँजीसे कच्चा माल लेकर उसे स्वयं पक्का बनाकर बाजारमें ले जाता है और पूँजीसे अधिक मूल्य प्राप्त करता है, तब वह अधिक मूल्यको श्रम-फल मानता है । लेकिन जब कोई दूसरा पूँजी देता है, तब उस लाभमें पूँजीवाला भी भागीदार बनेगा । इस अवस्थामें श्रमसे ही लाभ हुआ, यह नहीं कहा जा सकता । बिना लाभमें भाग पाये पूँजीवाला पूँजी देना स्वीकार भी न करेगा । दूसरा जब दाम देकर काम लेता है तो वह अवश्य चाहेगा कि इस कमाईसे मजदूरकी मजदूरी निकल आये और हमें भी कुछ मिल जाय । मजदूर
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४४१ सरकारको भी सरकारी काम चलानेके लिये लाभ चाहिये । यदि मजदूर अपने ही निर्वाह या लाभके लिये काम करे, संचालक सरकारके लिये कुछ न करे तो सरकारी खर्च कैसे चलेगा? गुप्तचर, पुलिस, पलटन, शस्त्रास्त्र तथा वैज्ञानिकों, अन्वेषकों और विभिन्न आविष्कारोंके लिये अरबोंका लाभ आवश्यक है । लाभ बिना पूँजीपति दिवालिया हो जायगा । अकाल, दुष्काल, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, शलभ, मूषक, भूकम्प तथा अन्य उत्पातोंके कारण नुकसान या घाटा होनेपर पूँजीपतिको कारखानों, मजदूरों एवं अपना भी काम चलाना ही पड़ेगा । यदि लाभ न हो तो यह सब काम कैसे चलेगा? पूँजी या लाभ बिना किसी भी राष्ट्र या सरकारका काम ही नहीं चल सकता । यह बात अलग है कि पूँजी एवं लाभ व्यक्तिके पास न जाकर मजदूर- सरकारके पास जाय, जो पूँजी एवं लाभ एक जगह दोष था, वही दूसरी जगह जाकर गुण हो जाय, यह भी कम्युनिष्टोंकी विचित्र बात है । अतएव मालिक सीधे - सीधे घंटों और महीनोंके हिसाबसे श्रमको खरीदते हैं । कभी - कभी उससे लाभ न होनेपर भी उन्हें दाम देना पड़ता है । कभी कुछ लाभ मिलता है, कभी ज्यादा लाभ भी मिलता है । कोई सौदा भी खरीदनेमें यही बात होती है । कभी घाटा, कभी लाभ प्राप्त होता है । इसमें बिना कुछ दिये हजम कर जानेका प्रश्न ही नहीं उठता । अतः अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना इस दृष्टिसे सर्वथा व्यर्थ हो जाती है । अतिरिक्त लाभ मशीनोंके आविष्कार होनेपर मशीनोंद्वारा लाखों मजदूरोंका काम हो जाता है । फिर तो मशीनकी कमाईका फल मशीन -मालिकको मिलना ठीक ही है । कहा जाता है कि 'जमीन खोदनेवाले मजदूरको एक घंटेके परिश्रमका फल उतना नहीं मिलता, जितना कि एक इंजीनियरके परिश्रमका होता है । ' इसका कारण मार्क्सवादियोंकी दृष्टिसे यह है कि ‘ जमीन खोदनेका काम मनुष्य एक या दो दिनमें सीख सकता है, परंतु इंजीनियरका काम सीखनेके लिये १० वर्षका परिश्रम अपेक्षित होता है । १० वर्षकी मेहनतका दाम इंजीनियर अपने मेहनतके प्रत्येक घंटे और
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४४२ मार्क्सवाद और रामराज्य दिनमें वसूल करता है । इसीलिये उसके परिश्रमके एक घंटेका दाम मामूली मजदूरके एक घंटेके परिश्रमके दामसे दसगुना अधिक होता है । ' उपर्युक्त तर्क अविचारितरमणीय है । वस्तुतः यहाँ श्रमवैचित्र्यसे ही उसके मूल्यका वैचित्र्य मानना उचित है । किस ढंगके परिश्रमका फल कितना और कैसा होता है, इसी आधारपर उसका दाम आँका जाना ठीक है । अन्यथा जबसे ही इंजीनियर काम सीखना आरम्भ करता है, तबसे ही गरीब किसान जमीन खोदने, हल जोतने, बोझा ढोनेका काम करता रहता है । इस तरह हर दृष्टिसे इंजीनियरके परिश्रमसे मजदूरोंका परिश्रम अधिक ही होता है । अध्यात्मवादीकी दृष्टिसे इसी तरह कालान्तर एवं जन्मान्तरके कर्मों एवं उनके विचित्रतासे ही फलोंमें भेद होता है । समष्टि जगत्के परमहितकी दृष्टिसे विचारपूर्ण सूक्ष्म कर्मोंके फलस्वरूप ही उच्चकोटिके ज्ञान -विज्ञान सम्पन्न जन्म होते हैं । जन्मान्तरीय सुकृत- दुष्कृत कर्मोंके अनुसार ही प्राणियोंको विविध प्रकारके वैध भूमिधन आदि दान, क्रय, दान, पुरस्कार आदिरूपमें प्राप्त होते हैं । जन्मान्तरीय सुकृत- दुष्कृत वैचित्र्य बिना मनुष्य -पशु आदिके जन्म- वैचित्र्यका हेतु जड़वादी कुछ भी नहीं कह सकते । हेतु विचित्रता बिना कार्यमें विचित्रता असम्भव ही होती है । अतः धर्माधर्म -वैचित्र्यमें ही फल- वैचित्र्य मानना पड़ेगा । वस्तुतः मार्क्स आदि भौतिकवादी विश्वको निरीश्वर ही मानते हैं । उनकी दृष्टिमें न ईश्वर है, न जड़- देहादि संघातसे भिन्न आत्मा और न जन्मान्तर । अतएव जन्मान्तरीय कर्म तथा जन्मान्तरीय कर्मफल भोग भी उन्हें मान्य नहीं है । जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं, उनके सभी विचार विकासवादकी दृष्टिसे चलते हैं । इनके मतानुसार पक्षी, पशु, वानर, वनमानुष आदि क्रमसे मनुष्यका विकास हुआ है । संसार अल्पशक्तिसे बहुशक्तिमत्ताकी ओर, अज्ञतासे विज्ञताकी ओर, असभ्यतासे सभ्यताकी ओर तथा जंगलीपनसे नागरिकताकी ओर जा रहा है । फलतः सभीके पूर्वज पिता- पितामहादि अपने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदिकी अपेक्षा अल्पज्ञ, अल्पशक्ति, असभ्य तथा जंगली थे । इस दृष्टिसे ऋषि, महर्षि
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४४३ अज्ञानी एवं जंगली ही थे । अतएव व्यास, वसिष्ठ, अत्रि, बृहस्पति, शंकर आदि ऋषि- महर्षियोंकी शास्त्रीय व्यवस्थाओंको भी ये लोग अवैज्ञानिक, असंगत, संकीर्ण एवं शोषणमूलक मानते हैं । बृहस्पति आदि ऋषियोंने व्यापारको मालिक एवं मजदूरकी सम्मतिसे निश्चित लाभके लिये ही बताया है । वेतन- मजदूरी आदिको परिमित ही माना है । लाभांश पूँजीपतिका ही माना है । भूमिका लगान भी इन ऋषियोंने मान रखा है, परंतु मार्क्सवादी इसे स्वीकार नहीं करते । वे आर्ष इतिहासको प्रमाण नहीं मानते- भले ही आधुनिक मिथ्या मनगढ़ंत इतिहासोंको ही सत्य मान लें । उनके अनुसार ‘ पहले सब मनुष्य जंगली थे, असम्भ थे, परिवार आदि नहीं बसाते थे । हजारों वर्ष बाद परिवारकी प्रथा चली; फिर खेती करना सीखा । अनेक वस्तुओंका बनाना और उनका उपयोग करना सीखा । आवश्यकतासे अधिक अन्न तथा अन्य वस्तुएँ पैदा होने लगीं । तब दूसरे पड़ोसियोंसे विनिमयकी बात भी सीखी । भूमि पहले किसीकी नहीं थी, खेती करनेसे लाभ होते देखकर प्रबल लोगोंने दुर्बलोंसे भूमि छन । दुर्बलोंसे धन भी छीन लिया तथा उनसे जबर्दस्ती काम लेकर उनकी कमाईको हड़पकर राजा, जमींदार, धनवान् या पूँजीपति बन गये । दुर्बलोंको साधनहीन बनाकर युगोंसे उनका शोषण चल रहा है । उन्हींके परिश्रम एवं कमाईका सब वैभव है, जिससे पूँजीपति और जमींदार, सामन्त लोग मौज ले रहे हैं । इसीलिये आजके यान्त्रिक महान् औद्योगिक विकास युगका जो कुछ भी भूमि, पूँजी या मुनाफा है, सब मजदूरोंका ही है, सब उन्हींकी कमाई है । लागत खर्चसे अधिक जो भी दाम सौदा बेचनेसे मिलता है, सब मजदूरोंकी मेहनतका ही फल है । वह सब मजदूरोंको न मिलकर उसका स्वल्पांश मिलता है, यह अन्याय है । अतः अब सब भूमि, पूँजी, कल-कारखाने, मशीन पूँजीपतियोंके हाथसे छीनकर सम्पूर्ण राष्ट्रोंका मालिक मजदूरको ही बनाना चाहिये । मजदूरका अधिनायकत्व सम्पादितकर पूँजीपति, सेठ आदिकोंको इतना कुचल देना चाहिये, जिससे वे कभी भी सिर उठानेलायक न रह जायँ । इसके लिये न्याय- अन्याय, हिंसा -अहिंसा, अपहरण आदि जो भी करना पड़े, वही
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४४४ मार्क्सवाद और रामराज्य धर्म है, वही न्याय है, वही शास्त्र है । किसी भी पुराने न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा या शास्त्र और तदनुकूल नियम व्यवस्थाओंको एकदम नष्ट कर देना चाहिये । ' इस तरह अध्यात्मवादी धर्मनियन्त्रित शासन रामराज्य अर्थात् धर्मसापेक्ष पक्षपातहीन राज्यका भौतिकवादी समाजवाद, साम्यवादके साथ किसी तरह भी कोई समन्वय हो सकना असम्भव है । पूर्व-पश्चिम या अन्धकार-प्रकाशके समान इनका परस्पर आधारमें, साधनमें, साध्यमें, व्यवहारमें महान् मतविरोध है । अध्यात्मवादीके मतानुसार जगत्प्रपंच चेतन सर्वज्ञ ईश्वरका कार्य है, देहभिन्न अनादि, अनन्त जीवोंके शुभाशुभ जन्मान्तरीय कर्मोंकी विचित्रतासे ही जगत्की विचित्रता होती है । जड़वादी कहते हैं कि ईश्वर नहीं है; परंतु ईश्वरका अभाव भी उन्होंने कैसे जाना? यदि कहें कि उपलब्ध नहीं होता — इसलिये ईश्वर नहीं है, तो यह असंगत है; क्योंकि कितनी वस्तुएँ विद्यमान रहनेपर भी सूक्ष्म रहनेसे उपलब्ध नहीं होतीं । अति दूर रहनेपर पर्वत आदि तथा आकाशमें उड़ते हुए पक्षी नहीं दीखते । अति सामीप्यके कारण नेत्रस्थ अंजन भी अपने ही नेत्रोंसे नहीं दीखता । इन्द्रियघात अन्धत्व, बधिरत्वसे भी रूप-शब्द आदि नहीं गृहीत होते । मनकी अनवस्थितिसे, कामादिसे उपहतमनस्क स्फीतालोक-मध्यवर्ती घटको भी नहीं देख सकता । अति सूक्ष्म होनेसे समाहितमनस्क प्राणी भी परमाणु आदिको नहीं देख सकता । व्यवधानसे वस्तु अन्तर तिरोहित वस्तुका दर्शन नहीं होता, जैसे कुड्यादि व्यवहित वस्तुका अदर्शन । तारों आदिका अदर्शन अभिभवके कारण ही नहीं होता, जैसे सूर्यकी प्रभासे अभिभूत होनेके कारण दिनमें रहते हुए भी तारागण नहीं दीखते । समानाभिहारसे भी वस्तुका उपालम्भ नहीं होता, जैसे जलाशयमें निपतित तोय - बिन्दुका भेद अनुभूत नहीं होता । क्षीर आदि अवस्थामें दधि, घृत आदि अनुद्भूत होनेसे भी अनुपलब्ध होते हैं, वैसे ही परमाणु, प्रकृति, परमेश्वरकी भी अनुपलब्धि होती है । अभावके कारण अनुपलब्धि नहीं कही जा सकती ।
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४४५
' अतिदूरात्सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् ।
सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥
सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः ' ( सांख्यकारि० ७, सां० द० १।१०८, महाभाष्य ४ । १ । ३, चरकसूत्र० १०।८) कहा जा सकता है कि ' फिर तो उपलब्ध न होनेपर भी जैसे ईश्वर, आत्मा आदिकी सत्ता मान लेते हैं, उसी तरह अनुपलब्ध होनेपर भी सप्तम रस एवं खपुष्पादि भी मान लेना पड़ेगा । ' परंतु इसका उत्तर यह है कि प्रकृति, आत्मा, परमात्मा आदि प्रमाणसिद्ध हैं, सप्तम रस खपुष्पादि प्रमाणसिद्ध नहीं हैं । प्रमाणसे ही प्रमेयकी सिद्धि होती है । जैसे रूपोपलब्धि रूप-क्रियाके द्वारा नेत्ररूप सूक्ष्म इन्द्रियकी सत्ता सिद्ध होती है, वृक्षके द्वारा बीजका अनुमान होता है, वैसे ही प्रपंचरूपी कार्यके द्वारा उसका उपादान कारण एवं कर्तारूपी निमित्त कारणका अनुमान होता है । वही उपादान और निमित्तकारण प्रकृतिविशिष्ट ईश्वर है । शय्या, प्रासाद आदि संघात-विलक्षण चेतन देवदत्त आदिके लिये होते हैं । इसी तरह देहेन्द्रियादि संघात भी स्वविलक्षण किसी असंहत चेतनके लिये अवश्य होने चाहिये । इन युक्तियोंसे तर्क -अनुमानोंसे चेतनात्मा तथा परमेश्वरकी सिद्धि होती है । यदि प्रत्यक्षद्वारा अनुपलब्ध होनेसे ही वस्तुका अभाव निर्णय किया जाय, तब तो गृहसे विनिर्गत जनोंको न देखकर उनका भी अभाव समझ लिया जायगा । अतः प्रत्यक्षयोग्यकी प्रत्यक्षानुपलब्धिसे ही अभावका निर्णय किया जा सकता है । घ्राणातिरिक्त श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियोंसे अग्राह्य होनेपर भी केवल घ्राणद्वारा उपलब्ध होनेसे गन्धकी सत्ता मान्य है । अतः गन्धका अभाव नहीं कहा जा सकता । चित्तकी एकाग्रतारूपी योगसे उद्भूत सामर्थ्ययुक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा तथा अपौरुषेय आगमद्वारा आत्मा, परमात्माका दृढ़ निर्णय होता है । विवेक-विज्ञानद्वारा सर्वभासक अखण्ड बोध, अखण्ड सत्ताका, जो कि सभी परिच्छिन्न बोधों एवं सत्ताओंका उद्गमस्थान है, स्वप्रकाशरूपसे स्पष्ट साक्षात्कार होता है । चक्षुरादि स्थूल प्रत्यक्ष साधन एवं काँच, यन्त्र या यान्त्रिक
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४४६ मार्क्सवाद और रामराज्य विश्लेषणोंसे वैज्ञानिकोंको उपलब्ध न होनेमात्रसे प्रकृति, परमेश्वरादिका अभाव नहीं कहा जा सकता । अनेक चीजोंको वैज्ञानिक पहले नहीं जानते थे, अब जानने लगे हैं । प्रथम जिन परमाणु हाइड्रोजन शक्तियोंका ज्ञान उन्हें नहीं था, उन्हींका आज प्रत्यक्ष हो रहा है, एतावता वे शक्तियाँ पहले नहीं थीं- यह कैसे कहा जा सकता है? वायुयानका जब आविष्कार नहीं हुआ था, तब यही भी असम्भव-जैसी चीज थी; परंतु अब सम्भव हो गयी । पहले सूर्यमण्डलसे भूमण्डलकी उत्पत्ति मानकर ही विकासवादी सन्तुष्ट हो गये थे, परंतु फिर बादमें पृथ्वी आदि भूत- चतुष्टयको सूर्यका भी कारण समझा । फिर कई लोगोंने आकाशको भी स्वीकार कर लिया । अब बहुतोंको प्रकृतिमें भी विश्वास होने लगा है । सम्भव है आगे चलकर आत्मा, परमात्मा आदिका भी कुछ आभास उपलब्ध हो । जो विज्ञान स्वयं अभी अपनेको प्रकृतिके अनन्त भण्डारमेंसे अतिक्षुद्र कणके भी सम्पूर्णतया जानकार होनेका दावा नहीं करता, उस विज्ञान एवं वैज्ञानिक यन्त्र- बलपर ईश्वर, धर्मशास्त्र तथा सर्वज्ञकल्प ऋषियों, महर्षियों तथा योग्य सामर्थ्यका खण्डन करना एक दुस्साहसपूर्ण मूर्खता है । अध्यात्मवादी प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आर्ष एवं अपौरुषेय आगमोंके आधारपर परमेश्वरसे सृष्टि मानते हैं; शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार जगत्की विचित्रता मानते हैं । जैसे शास्त्रानुसार ही निकृष्ट कर्मोंके फलस्वरूप श्वान, शूकर, गर्दभ आदि योनियोंमें जन्म होता है, उन्हें मनुष्योचित शय्या, प्रासाद, भोजन आदि नहीं प्राप्त होता, वैसे ही पशु आदिकी अपेक्षा उत्कृष्ट; परंतु निकृष्ट कर्मोंके कारण ही कुछ ऐसे मनुष्योंका भी जन्म होता है, जिनके पास पर्याप्त भूमि, सम्पत्ति आदि नहीं होती । इसी तरह कर्मोंके उत्कर्षापकर्षके कारण ही भूमि, धन, उच्च मस्तिष्क विद्यादिसम्पन्न मनुष्य तथा देवादि जन्म होते हैं । इस दृष्टिसे कुछ लोग उत्पादन, साधन एवं श्रम दोनोंसे ही सम्पन्न होते हैं । कुछ लोग श्रमसे ही जीविका उपार्जन करते हैं । उन्हींके सम्बन्धमें वेतन, मजदूरी आदिका विवेचन शास्त्रोंमें है । यद्यपि काम करनेवाले और काम करानेवालोंके ही आपसी समझौतेसे मजदूरी या वेतन आदिका दर निश्चित होता है, तथापि राष्ट्रकी आर्थिक