मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 451–460

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४४७ स्थिति लाभ और कामकी स्थितिको देखकर समाज या सरकार भी औचित्यके आधारपर मजदूरीका दर निर्णय कर सकते हैं । शास्त्रोंमें साझेकी खेतीकी एवं साझेके व्यापारोंकी भी पर्याप्त चर्चा है, परंतु लाभमें साझेदारोंका हिस्सा मान्य होता है, नौकरोंका नहीं; क्योंकि उन्हें नौकरी मिलती ही है । मालिक इसी लाभके लिये रुपया, कच्चा माल, मशीन और बुद्धि- परिश्रमका उपयोग करता है । कभी- कभी घाटा भी उठाता है, जिसमें साझेदार ही हिस्सेदार होते हैं, मजदूर नहीं । कहा जाता है कि ‘ पूँजी, मशीन आदि साधन भी मजदूरोंके ही श्रमका फल है; क्योंकि छोटे व्यापार एवं छोटी मात्रामें होनेवाली खेतीसे जो क्रमशः धनराशि संगृहीत हुई है, वह भी मजदूरों एवं मालिकों ( हलवाहों ) -के अतिरिक्त परिश्रमके फलस्वरूप अतिरिक्त आयका ही संग्रह है, परंतु यह भी तो हो सकता है कि कोई स्वयं खेती करनेवाला किसान अपने ही खेतसे अन्न या तेलहन आदि उत्पन्न करता है और स्वयं ही कोल्हूमें तेल पेरता है । अन्य तेल बेचकर पूँजी इकट्ठा करता है, या वकालत, डॉक्टरी पेशेसे जिससे कि सैकड़ों, हजारोंकी प्रतिदिन आमदनी होती है या इंजिनियरीके पेशेसे पर्याप्त धन कमाता है । वह अपने ही परिश्रमसे कमाया हुआ धन है, उस पूँजीसे व्यापार करनेवालेके व्यापारमें या औद्योगिक कार्यमें होनेवाला लाभ तो पूँजीपतिका मानना ही पड़ेगा । ' कहा जाता है कि ' मशीनोंके अधिकाधिक विकाससे मशीनोंकी सहायतासे पैदावार बढ़ जाती है; परंतु मेहनतकी शक्ति घट जाती है, अर्थात् बहुत मजदूरोंकी जरूरत नहीं पड़ती; अतः उसका दाम भी कम पड़ता है । इससे पूँजीपतिका लाभ खूब बढ़ जाता है । ' परंतु यह अनुचित भी तो नहीं है, जब वैज्ञानिकों और मशीनोंपर पर्याप्त पैसा लगाया गया है, तभी तो मशीनें बनी हैं । फिर उनका फायदा उठाना क्यों अनुचित है? जैसे मार्क्सवादी इंजीनियरके इंजीनियरी सीखनेके समयके श्रमके दामका भी कामके घंटोंके दाममें वसूल करना उचित मानते हैं, वैसे ही वैज्ञानिकोंके शिक्षाका खर्च, अन्वेषणका व्यय, मशीन बनानेका व्यय,

पृष्ठ 452

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४४८ मार्क्सवाद और रामराज्य मशीन खरीदनेका खर्च आदिका भी तो दाम और उसका मुनाफा वसूल करना उचित है । पैसेका सूद रूसी मार्क्सवादी भी देते हैं; अतः पैसेका भी लाभ होना उचित है । जैसे कोई कच्चे मालसे पक्का माल पैदा करनेवाला उपयोगी सौदा बनाकर कच्चे मालके दामसे अधिक दाम वसूल करता है, वैसे ही पैसेके दामसे कहीं अधिक दाम पैसेको काममें लगाकर वसूल किया जाना उचित ही है । मार्क्सके मतसे मशीनोंके द्वारा पैदावार बढ़ जानेसे एवं मजदूरोंकी कम अपेक्षासे मजदूरोंकी बेकारी बढ़ती है । मजदूरोंकी बेकारीसे पंचानवे प्रतिशत मजदूरवाले समाजमें क्रय ( खरीदने ) -की शक्ति घट जाती है । इसलिये बाजारमें मालकी खपत कम होती है । तदर्थ माल कम पैदा करनेकी चेष्टामें और मजदूर कम करने पड़ते हैं । इससे और बेकारी बढ़ती है । फलस्वरूप खपत और कम हो जाती है । इस तरह पूँजीवादी प्रणालीमें उत्पन्न हुए गतिरोधको समाप्त करनेका मार्सीय उपाय यह है कि ' समाजकी आवश्यकताओंको पूर्ण करनेके लिये जितने आवश्यक सामाजिक श्रमकी जरूरत हो, उसे सम्पूर्ण समाज सहयोगसे करे, कोई भी व्यक्ति बेकार न रहे । पैदावारकी उन्नतिके साधनोंकी सहायतासे प्रत्येक व्यक्तिको कम परिश्रम करना पड़े और साथ ही पैदावारको भी बढ़ाया जाय । अपने परिश्रमके अनुसार सब फल पायें । इससे प्रत्येक श्रमिकको परिश्रम कम करना पड़ेगा, परंतु खरीदनेकी शक्ति सबके पास बनी रहेगी, अतः मालके खपतमें कमी न होगी । ' अध्यात्मवादी रामराज्यमें यद्यपि लाभका अधिकारी उद्योगपति ही है, तथापि लाभका पंचधा विभाजन करके एक हिस्सा मालिकके काम आता है । अवशिष्ट धर्म, यश आदिके नामपर राष्ट्रके काममें खर्च कर दिया जाता है । लाभ एवं कामके अनुसार ही मजदूरोंकी मजदूरीका भी दर निश्चित किया जाता है 1। कामके घंटोंमें कमी और मजदूरोंकी संख्यामें वृद्धिका नियम रहता है । जब आठ घंटे एक हल चलानेके लिये आठ हृष्ट- पुष्ट बैलोंका उपयोग किया जाता है, तो फिर मनुष्योंके लिये भी कामके घंटोंकी कमी और मजदूरकी अधिक संख्याका नियम स्वाभाविक

पृष्ठ 453

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माक्सय अर्थ-व्यवस्था ४४९ है । मजदूरोंका उन्नत जीवनस्तर एवं शिक्षा- स्वास्थ्य - समुन्नतिका उत्तरदायित्व भी मालिकपर रहता है । फिर भी अवशिष्ट लोगोंके लिये दूसरी रोजी और कामकी व्यवस्था करनेकी जिम्मेदारी समाज एवं सरकारके ऊपर रहती है, यह विस्तारसे पीछे लिखा जा चुका है । इस दृष्टिसे बेकारीका निराकरण, यन्त्रोंका नियन्त्रण, पूँजी और श्रमका संतुलन होनेसे विरोध उपस्थित ही नहीं होता । उपयोगी वस्तु और सौदेकी वस्तु कहा जाता है कि ‘ उपयोगी पदार्थोंकी पैदावार आवश्यकता पूर्ण करनेके लिये होती है । सौदेकी पैदावार विनिमयके लिये होती है, आवश्यकता पूर्ण करनेके लिये पैदावार करनेमें मुनाफा उद्देश्य नहीं रहता । विनिमयके लिये पैदा करनेमें पैदावारका उद्देश्य उपयोग नहीं, किंतु मुनाफा कमाना ही रहता है । पूँजीवादीका सब पैदावार विनिमयके लिये होता है । लेनिनने पूँजीवाकी यही परिभाषा की है कि ' समाजके सभी पदार्थोंको सौदेके रूपमें विनिमयके लिये उत्पन्न करना और परिश्रमकी शक्तिको भी विनिमयकी वस्तुकी तरह खरीदकर व्यवहारमें लाना पूँजीवादकी अवस्था है । ' मार्क्सने भी कहा है कि पूँजीवादी प्रणालीमें सभी पदार्थ विनिमयके लिये तैयार किये जाते हैं, परिश्रमकी शक्ति बाजारमें बेची जाती है और मेहनत करनेवालोंसे अतिरिक्त श्रम या अतिरिक्त मूल्यके रूपमें मुनाफा उठाकर पूँजीद्वारा पूँजी कमायी जाती है । ' वस्तुतः पैदावारके ये दो भेद व्यर्थ हैं । अध्यात्मवादी अर्थव्यवस्थाके प्रायः प्रत्येक कार्य इसी दृष्टिसे होते हैं कि समाजकी आवश्यकताकी पूर्ति भी हो और कार्य- संलग्न लोगोंकी जीविकाका भी प्रश्न हल हो जाय । जैसे ब्राह्मण मस्तिष्कद्वारा याजन, अध्यापन एवं प्रतिग्रह करता है । इससे समाजकी आवश्यकता भी पूर्ण हो सकती है और उसकी जीविकाका प्रश्न भी हल होता है । क्षत्रियकी शासन तथा शस्त्रास्त्रदक्षता, संग्रामदक्षता सम्पादन आदि कार्यसे समाजकी आवश्यकता भी पूरी होती है और उसकी जीविकाका भी प्रश्न हल होता है । इसी तरह वैश्यका व्यापार कार्य है । उससे विभिन्न देशोंमें अपेक्षित पदार्थको पहुँचाने एवं 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_15_1_Front

पृष्ठ 454

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४५० मार्क्सवाद और रामराज्य आवश्यक पदार्थ उत्पादनद्वारा समाजकी आवश्यकता पूरी होती है और उनकी जीविकाके लिये लाभ भी प्राप्त होता है । इसी प्रकार शूद्र शिल्प- सेवा आदिके कार्योंके द्वारा अपनी जीविका लाभ भी करते हैं, समाजकी आवश्यकता भी पूरी होती है । शरीरमें मुख, बाहु, उदर एवं पदका जैसे अपने कार्योंके द्वारा समष्टि शरीरकी आवश्यकता भी पूरी होती है और उनका काम भी चलता है, उदर जिस प्रकार भोजन आदि संग्रह करता है और रस इत्यादि उत्पन्न कर शरीरके विभिन्न अवयवोंको लाभ पहुँचाता है, वही स्थिति व्यापारी, उद्योगपति वैश्योंकी भी है । अतः समाजकी आवश्यकता पूर्ण हो, उद्योगपतिको लाभ हो–इन दोनों ही उद्देश्योंसे उत्पादन होता है और यही उचित है । अध्यात्मवादियोंमें ' एका क्रिया द्व्यर्थकरी ' का दृष्टान्त प्रसिद्ध है—

एको मुनिः कुम्भकुशाग्रहस्तो ह्याम्रस्य मूले सलिलं ददाति ।

आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा ॥

( पद्मपुराण सृष्टिखण्ड ११ । ७५) एक मुनि हाथमें घड़ेका जल तथा कुश लेकर आम्र-मूलमें पितृतर्पण करता है, इससे आम्रका सिंचन तथा पितृतर्पण दोनों ही कार्य सम्पन्न होता है । राजनीतिमें तो एक-एक कार्यसे अनेकों प्रयोजन सिद्ध किये जाते हैं । रामचन्द्रने लोकाराधनके लिये सीताको वनवास दिया । लोकराधन भी हुआ, सीताकी वन जानेकी इच्छा- पूर्तिद्वारा दोहद पूर्ति भी । राम और सीता दोनोंका ही संयत आध्यात्मिक तपोमय जीवन सम्पन्न हुआ । सीताके निष्कलंक यशकी प्रख्याति एवं लवकुशकी आर्ष - ढंगसे दिव्य शिक्षाकी व्यवस्था भी हो गयी । इसीलिये कहा जाता है- नीति प्रीति परमारथ स्वारथु । कोउ न राम सन जान जथारथु ॥ उपयोगी पदार्थोंको उत्पन्न कर सकनेकी शक्तिको ही मार्क्स परिश्रमकी शक्ति कहता है । उसका यह भी कहना है कि ' अपने परिश्रमका फल मुनाफा ही कहा जा सकता है । इस कमाईसे बड़ी मात्रामें पूँजी जमा नहीं हो सकती । अतः बड़े परिमाणमें मुनाफा कमानेके लिये दूसरोंके परिश्रमका भाग मुनाफेके रूपमें ले लिया जाता है । इसके लिये 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_15_1_Back

पृष्ठ 455

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४५१ आवश्यक है कि दूसरी ऐसी श्रेणी हो, जिसके पास पैदावारके साधन न हों; क्योंकि जिसके पास पैदावारके साधन होंगे, वह कभी भी यह पसन्द न करेगा कि उसके परिश्रमका फल दूसरा ले ले । साधनहीन लोगोंद्वारा मशीनकी सहायतासे बहुत अधिक काम कराकर थोड़ी - सी मजदूरी उनको देकर उनके परिश्रमका फल वह स्वयं रख लेता है । इसका कारण यही है कि साधनहीन लोगोंके पास साधन नहीं है, है भी तो साधारण, जो बड़ी मशीनोंके सामने टिक नहीं सकता । इसीलिये साधनहीन या घटिया साधनवालोंकी शारीरिक शक्तिकी पैदावारका दाम बहुत कम रह जाता है । ' लाभ या मुनाफा कहा जाता है कि ' बिक्रीके लिये माल या सौदा तैयार करनेवाला मनुष्य माल बनानेके लिये कुछ सामान खरीदता है । खरीदे हुए सामानको अपनी मेहनतसे बिक्रीयोग्य माल या सौदा तैयार करके उसे बाजारमें बेचनेसे जो दाम मिलता है, उसमेंसे खरीदे हुए सामानका दाम निकाल देनेपर बाकी बचा हुआ दाम लाभ या मुनाफा कहलाता है, वह शुद्धरूपसे मेहनतका ही फल है । इसी प्रकार जब पूँजीपति बड़े पैमानेपर सौदा तैयार कराता है, तब भी लागत खर्चसे अधिक जो भी दाम मिलता है, वह लाभ या मुनाफा मजदूरोंकी मेहनतका ही फल है । सौदेके मूल्यमेंसे कच्चे मालका मूल्य निकाल लेनेपर केवल सौदेका खर्च और मेहनतका ही मूल्य बच जाता है, पर पूँजीपति मेहनतका पूरा फल मजदूरको दे देता है तो मुनाफेकी कोई गुंजाइश ही नहीं रहती । अतः मजदूरकी मेहनतका जितना फल उसको मिलता है, उतना ही पूँजीपतिको अधिक लाभ होता है । ' पर यह विचार एकांगी दृष्टिकोणसे ही है । लाभ या मुनाफा केवल मेहनतका फल नहीं हो सकता, किंतु वह कच्चे माल एवं मेहनत दोनोंका ही फल है । यदि मेहनत बिना कच्चा माल अल्प मूल्यका था, तो कच्चे माल बिना मेहनत भी व्यर्थ थी । फिर तो जैसे पूँजीपतिने दाम देकर कच्चा माल खरीदा, वैसे ही दाम देकर श्रम भी खरीदा । दोनोंके खरीदनेमें खर्च 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_15_2_Front

पृष्ठ 456

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४५२ मार्क्सवाद और रामराज्य हुए दामसे अधिक दाम जो मुनाफाके रूपमें मिला, वह पूँजीपतिका ही होता है । जैसे श्रमवाला अपने श्रमका फल चाहता है, वैसे ही कच्चा मालवाला अपने कच्चे मालका फल चाहता है । जैसे किसी - किसी अवसरपर कच्चे मालमें तेजी -मन्दी आती रहती है, वैसे ही श्रममें भी सस्तापन और मँहगापन आता रहता है । दुर्लभता एवं माँगकी अधिकता होनेपर कच्चा माल मँहगा हो जाता है, वैसे ही दुर्लभता एवं माँग अनुसार ही श्रम भी महँगा हो जाता है । कभी बाजारमें सस्ते दाममें कच्चा माल भी मिलता है, कभी सस्ते दाममें श्रम मिलता है । कहा जा सकता है कि ' कच्चे मालका जो दाम मिल गया, वह उसका दाम है ' परंतु इसी तरह यह भी तो कहा जा सकता है कि मजदूरोंको भी श्रमका वेतन उन्हें मिल गया । इसी तरह श्रम और कच्चा माल दोनों ही श्रमिकका होता तो दोनोंका ही फल उसे ही मिलता या कच्चा माल खरीदनेका दाम और श्रम दोनों ही श्रमिकके होते तो भी सब फल उसीको मिलता । किंतु जब श्रम श्रमिकका है, कच्चा माल और उसका दाम दूसरेका है, तब तो जैसे श्रमका फल श्रमिकको मिलना चाहिये, वैसे ही कच्चे मालका भी फल उसके मालिकको मिलना ही चाहिये । जैसे श्रमिक मिलनेवाली मजदूरीको कम कहता है, वैसे ही कच्चे मालका विक्रेता भी अपने मालके मिलनेवाले दामको कम कहता है । इन दोनोंको जो अपने पैसेसे इकट्ठा करता है, दोनोंका प्रबन्ध करता है, यद्यपि लाभकी आशा ही करता है, तथापि कभी - कभी अनुमानके विपरीत उसे नुकसान भी होता है । जो इन सब खतरोंको अपने सिरपर झेलता है, उसे उसके पैसे, परिश्रम, साहस, हानि एवं खतरा उठानेका आखिर क्या फल होगा? अतः कच्चे मालके दाम निकालकर बचे हुए सौदेका दाम श्रमका ही फल है, यह कहना गलत है । हाँ, कच्चे माल एवं श्रमके उचित मूल्यका निर्धारण करना आवश्यक है । इसपर भारतीय शास्त्रोंने पर्याप्त प्रकाश डाला है । इससे पूँजीपतिके आयपर भी नियन्त्रण हो जाता है । शास्त्रोंने मजदूरी या वेतनके सम्बन्धमें मुख्यरूपसे यही नियम माना है कि मालिक और नौकरका जो 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_15_2_Back

पृष्ठ 457

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४५३ आपसी सम्मतिसे तय हुआ हो, वही उसकी मजदूरी है । भृतककी मिताक्षरामें इस प्रकार व्याख्या की है- ' मूल्येन यः कर्म करोति स भृतकः । ' ( याज्ञ ० स्मृति, मिता० व्यव० १८३ ) मजदूरी या नौकरीको भृति शब्दसे कहा गया है । भृतिकी परिभाषा यों है— यत्र यादृशी भृतिः परिभाषिता स्वामिभृत्याभ्यां तादृशी तत्र भृतिर्भृत्येन लभ्यते । ( याज्ञ० स्मृति, वीरमित्रोदय टीका १७३ ) वहीं ' मिताक्षरा ' में नारद-स्मृतिका यह वचन उद्धृत किया है—

भृत्याय वेतनं दद्यात् कर्मस्वामी यथाक्रमम् ।

आदौ मध्येऽवसाने वा कर्मणो यद्विनिश्चितम् ॥

( नारदस्मृति ६।२ ) भृत्य एवं स्वामीद्वारा निश्चित मूल्य ही वेतन है । हाँ, जहाँ वेतन बिना निश्चित किये ही मालिक श्रम कराता है, वहाँ वाणिज्य, पशु तथा सस्य (फसल) -से होनेवाले लाभका दसवाँ भाग नौकरको राजाद्वारा दिलाया जाना चाहिये— भृतिमपरिच्छिद्य यः कर्म कारयति तं प्रत्याह- दाप्यस्तु दशमं भागं वाणिज्यपशुसस्यतः (। मिता० ) अनिश्चित्य भृतिं यस्तु कारयेत् स महीक्षिता ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १ ९ ४ ) खाली हल चलानेवाला उससे होनेवाली आमदनीसे तीसरा भाग पा सकता है । यदि उसे भोजन -वस्त्र भी मिलता हो, तो उसे लाभका पाँचवाँ भाग मिलना चाहिये—

त्रिभागं पञ्चभागं वा गृह्णीयात् सीरवाहकः ।

भक्ताच्छादभृतः सीराद् भागं भुञ्जीत पञ्चमम्॥

( बृहस्पतिस्मृ० ) परंतु जो नौकर देशकालानुसार विक्रय, कर्षण आदि कार्य ठीक-ठीक नहीं करता और प्रकारान्तरसे लाभ उठाता है, वहाँ स्वामीकी इच्छा

पृष्ठ 458

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४५४ मार्क्सवाद और रामराज्य ही मुख्य है । अर्थात् उसे सम्पूर्ण वेतन नहीं देना चाहिये । अधिक लाभ करता है, तो दशमांशसे अधिक देना चाहिये—

देश कालं च योऽतीयाल्लाभं कुर्याच्च योऽन्यथा ।

तत्र स्यात् स्वामिनश्छन्दोऽधिकं देयं कृतेऽधिके ॥

( याज्ञ० स्मृ० २ । १ ९ ५ ) अनेक मजदूर जहाँ मिलकर काम करते हैं, वहाँ उनके कामके अनुसार वेतन मिलना चाहिये I। कोई नौकर दो आदमीका काम करे तो उसे दुगुना तथा कोई यदि एक आदमीसे भी कम करे तो उसे कुछ कम वेतन भी मिलना चाहिये । यथा निश्चय अथवा मध्यस्थद्वारा निर्णीत वेतन मिलना उचित है, सभीको समान नहीं—

यो यावत् कुरुते कर्म तावत्तस्य तु वेतनम्।

उभयोरप्यसाध्यं चेत् साध्यं कुर्याद्यथाश्रुतम् ॥

( याज्ञ० स्मृ० २ । १ ९ ६ ) गोपालन करनेवाले गोपालकी मजदूरीका रूप मनुने लिखा है कि ' जो भोजन - वस्त्र नहीं पाता, ऐसा गोपाल यदि दस गौओंका पालन करता हो, तो एक गायका दूध उसे मजदूरीके रूपमें मिलना चाहिये'–

गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद् दशतो वराम्।

गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात् पालेऽभृते भृतिः ॥

(मनु० ८।२३१ ) राजकीय कर्मचारियोंके लिये दूसरे ढंगका भी वेतन है । दस ग्रामपर शासन करनेवालेके लिये एक कुलका लाभ मिलना चाहिये । बीस गाँवोंपर शासन करनेवालेको पाँच कुलका, शताध्यक्षको एक ग्राम एवं सहस्राध्यक्षको पुरका लाभ मिलना चाहिये । ग्रामवासी जो अन्न- पान, ईंधन आदि राजाको देते हैं, वह उस कर्मचारीको मिलना चाहिये । यह सब अधिकार, शिक्षा, योग्यता आदिके आधारपर समझना चाहिये- दशी कुलं तु भुञ्जीत विंशी पञ्चकुलानि च । ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्राधिपतिः पुरम्॥ (मनु० ७ । ११ ९ )

पृष्ठ 459

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४५५ कौटल्यने वेतन- निर्णयके प्रसंगमें सूत्र कातनेके लिये कहा है कि ' सूतकी चिक्कणता, स्थूलता, मध्यता आदि जानकर वेतन निर्धारण करे'- ' श्लक्ष्णस्थूलमध्यतां च सूत्रस्य विदित्वा वेतनं कल्पयेत् । ' (कौटलीय अर्थशास्त्र २ । २३ । ३ ) अच्छा काम देखकर वेतनसे अतिरिक्त तेल, उबटन आदि देकर मजदूरोंको सम्मानित करे-' सूत्रप्रमाणं ज्ञात्वा तैलामलकोद्वर्तनैरेता अनुगृह्णीयात्' ( कौट० अर्थ० २।२३।५ ) काममें कमी हो, तो वेतनमें कमी होनी चाहिये –'सूत्रह्रासे वेतनह्रास: ' ( वही ७ ) । वेतनका समय बीत जानेपर मध्यम वेतन देना चाहिये -' वेतनकालातिपाते मध्यमः ' ( वही १६ ) । तीसरे अधिकरणके १४वें अध्यायमें कौटल्यने मजदूरोंके सम्बन्धमें बहुत कुछ कहा है । उससे भी प्रायः मालिक एवं नौकरद्वारा वेतन और कामका परिणाम निश्चित होता है । इसीलिये कहा गया है कि मालिकद्वारा निर्धारित कामसे अधिक करनेपर उतनी मेहनत व्यर्थ ही समझनी चाहिये — ' सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं मोघं कुर्यात्' ( ३ । १४ । १३ ) इस प्रकरणमें याजकों तथा ऋत्विजोंके वेतनपर विचार किया गया है । अतिरिक्त श्रम और मुनाफा मार्क्सवादियोंका कहना है कि ' मजदूरको मेहनतके फलका वह भाग जिसका दाम मजदूरको नहीं मिला, मालिकका मुनाफा है । ' मजदूर जितने समयतक मेहनत कर परिश्रमकी शक्तिका दाम पैदा करता है, उससे जितना भी वह अधिक करेगा, वह सब मालिकका मुनाफा होगा । यदि वह पाँच घंटे काम करके अपने परिश्रमकी शक्तिका दाम पूरा कर लेता है तो दिनभरके मेहनतके शेष घंटे मालिकके मुनाफेमें जाते हैं, वही अतिरिक्त श्रम है । अपनी श्रम- शक्तिको कायम रखनेके लिये मजदूरको जितना श्रम करना जरूरी है, उससे जितना भी अधिक मजदूरको करना पड़ता है, वह आवश्यक या अतिरिक्त श्रम है । उसका दाम अतिरिक्त मूल्य है । यह अतिरिक्त श्रम एवं अतिरिक्त मूल्य ही मालिकका मुनाफा है ।

पृष्ठ 460

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४५६ मार्क्सवाद और रामराज्य मार्क्सके आर्थिक सिद्धान्तोंकी यही आधारशिला है । उसके मतानुसार ' इस अतिरिक्त श्रम एवं अतिरिक्त दामको पानेका आन्दोलन ही मजदूर आन्दोलन है । इसके फलस्वरूप समष्टिवाद या समाजवाद स्थापित होगा । जिसमें प्रत्येक व्यक्ति शक्तिभर परिश्रम करे और अपनी आवश्यकताके अनुसार पदार्थोंको प्राप्त करे । इससे शोषणका अन्त होगा, किसीको अपनी इच्छाविरुद्ध जीवन-निर्वाहके लिये विवश न होना पड़ेगा । फिर न उसके लिये नियन्त्रणकी जरूरत होगी, न शासन रहेगा और न सरकार रहेगी । ' अतिरिक्त दामके सम्बन्धमें लेनिनका कहना है कि सौदेके विनिमयसे अतिरिक्त दाम ( मुनाफा) प्राप्त नहीं हो सकता; क्योंकि उसे तो समान लागतके सौदोंको एक- दूसरेसे बदला जाता है । सौदेका दाम न बढ़ने या घटनेसे भी अतिरिक्त दाम पैदा नहीं हो सकता; क्योंकि उसका तो इतना ही अर्थ होगा कि समाजके कुछ आदमियोंके हाथसे दाम निकलकर दूसरोंके हाथमें चला जायगा । समाजमें जो आज खरीदनेवाला है, वही कल बेचनेवाला और जो आज बेचनेवाला है, वही कल खरीदनेवाला बन जाता है । अतः अतिरिक्त दाम प्राप्त करनेके लिये पूँजीपतिको बाजारमें एक ऐसे सौदेकी खोज करनी पड़ती है, जिसे व्यवहारमें लाकर उसपर खर्च किये गये दामसे अधिक दाम प्राप्त किया जा सके । बाजारमें ऐसा सौदा मनुष्यकी श्रम - शक्ति ही है । मनुष्यकी श्रम- शक्तिका उपयोग है परिश्रम । परिश्रमका मूल है दाम । पूँजीपति मनुष्यकी मेहनतकी शक्तिको बाजार दामपर खरीद लेता है । दूसरे सब सौदोंकी तरह मनुष्यकी परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम भी उसे पैदा करनेके लिये आवश्यक सामाजिक श्रमसे निश्चित करना पड़ता है । मनुष्यकी मेहनत- शक्तिको दस घंटेके लिये पूँजीपति उसे कामपर लगा देता है । मजदूर पाँच घंटे काम करके ही उतने दामका सौदा पैदा कर लेता है, जितना उसे दस घंटे काम करनेके बाद मिलता है । शेष पाँच घंटेमें मजदूर अतिरिक्त दाम या सौदा पैदा करता है, जो पूँजीपतिकी जेबमें जाता है । मार्क्सके मतानुसार अतिरिक्त श्रम या अतिरिक्त दाम ले सकना ही