मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 61–70

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

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- पाश्चात्य दर्शन ५७ विचार एवं पदार्थ तथा कर्ता एवं कर्मके सम्बन्धको ठीक रूपमें समझ सकते हैं । मैं स्वयं अपने लिये मैं हूँ, परंतु दूसरोंके लिये तुम । मैं एक साथ कर्ता हूँ एवं कर्म भी, मैं अमूर्त- सत्ता नहीं । मेरा वास्तविक अस्तित्व है मेरा शरीर ही । अपने समग्ररूपमें मेरी वास्तविक सत्ता है । जो विचार करता है वह अमूर्त नहीं, भौतिक अस्तित्व ही कर्ता है, विचार उसकी क्रिया है । विचार एवं विरोधके अस्तित्वकी समस्याका यही हल है । प्रकृति या भूतोंको दबाकर या मिथ्या कहकर समस्याका हल नहीं हो सकता । ' फायरवाखका कहना है कि ' यदि स्पिनोजाके सिद्धान्तसे धर्म विद्याका जंजाल निकाल दिया जाय तो मूलतः यह बहुत सही है । ' कहते हैं, आदर्शवादसे नाता तोड़नेके बाद पहले -पहल मार्क्स एवं एंजिल्सने इसी दर्शनको अपनाया था । फायरवाखका कहना था कि ' बाहरी वस्तुकी क्रियाका विषयमात्र बनकर मनुष्य उन वस्तुओंको पहचानता है ' परंतु मार्क्सका कहना है कि ' वस्तुके ऊपर अपनी प्रतिक्रियाद्वारा हम उसकी पहचान करते हैं । ' उपर्युक्त विद्वानोंके विचार भारतीय दर्शनोंकी दृष्टिसे बहुत स्थूल हैँ । विषयेन्द्रियसंयोगजन्य सुख ही वास्तविक सुख नहीं हैं । अनश्वर सुख आत्मस्वरूप ही है । यों तो दादके खुजलानेमें भी सुखकी प्रतीति होती है, पर क्या उसे कोई बुद्धिमान् सुख मान सकता है? इसी तरह सूक्ष्म विवेचन बिना अस्तित्वयुक्त पदार्थको ही अस्तित्व मानकर उसके कर्ता एवं विचारको कर्म मान लिया गया । अस्तित्व तो वह सूक्ष्म वस्तु है, जो विचारमें भी अनुस्यूत है, जिस अस्तित्वके बिना देह एवं देहान्तर्गत उसकी समग्रताके पूरक सभी असत् हो जाते हैं । सर्व विशेषणरहित अस्तित्व ही सर्वत्र समानरूपसे अनुस्यूत होनेके कारण सर्वबीज है, विचारकी सूक्ष्मता उससे अधिक संनिकट है । उसमें ही मैं और तुम सबका अन्तर्भाव हो जाता है । अवश्य ही बहिर्मुख प्राणीकी ' मैं ' की अपेक्षा ' तुम ' अधिक स्पष्ट है । इसीलिये तो भाष्यकार शंकराचार्यने ' युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयो: ' इत्यादि रूपसे तुमसे ही विचार प्रारम्भ किया था । भौतिकवादियोंके मैं और तुम सभी शंकरके युष्मत्प्रत्ययगोचर ही

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५८ मार्क्सवाद और रामराज्य ठहरते हैं; क्योंकि दृश्य अनात्ममात्र युष्मत्प्रत्ययगोचर होता है । निर्दृश्यदृक् आत्मा ही अस्मत्प्रत्ययगोचर भाष्यकारको मान्य है । मार्क्सने फायरवाखके दर्शनपर टिप्पणी करते हुए लिखा है -' उस भौतिक सिद्धान्तमें जिसके अनुसार मनुष्य परिस्थितियों एवं शिक्षाक उपज कहा जाता है, इस बातको भुला दिया जाता है कि मनुष्य परिस्थितियोंमें परिवर्तन कर सकता और करता है और शिक्षकको स्वयं शिक्षित होनेकी आवश्यकता रहती है । ज्यों ही इस समस्याका समाधान होता है, इतिहासकी भौतिक धारणाका रहस्य खुल जाता है । ' फायरवाख विचारप्रणालियोंके विकासका आधार मानवसत्ताके विकासको ही कहता है । ‘ मानवसत्ता क्या है ' इसका उत्तर देते हुए वह कहता है कि ' मानवसत्ता मनुष्यके साथ मनुष्यके ऐक्यमें उनके परस्पर संयोगमें मिलती है । ' मार्क्स कहता है ' सामाजिक सम्बन्धी समग्रता ही मानवसत्ता है । ' पहलेसे इसमें स्पष्टता अधिक है । फायरवाखने पहले घोषणा की कि ' भूत मानस ( ज्ञान) -की उपज नहीं है, मानस ही भूतकी सर्वोत्कृष्ट उपज है । ' उसने हीगेलके द्वन्द्ववादका भी खण्डन किया था, पर मार्क्सने उसे ग्रहण कर ही अपना द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद बनाया । वह जगत्का असली रूप भूतको ही मानता है । जगत्के विचित्र एवं विभिन्न रूप व्यापारभूतकी ही गतिके विभिन्न रूप हैं । इन व्यापारोंके आपसी सम्बन्ध गतिशील भूतके विकासके नियम हैं । इन्हीं नियमोंके अनुसार जगत्‌का विकास होता है, इसे किसी विकासकर्ताकी आवश्यकता नहीं है । भूत- प्रकृति जीवका अस्तित्व भी भूतके अन्दर है । प्रथम भूत ही है, मन द्वितीय है; क्योंकि यह भूतसे ही उत्पन्न होता है । उसके अनुसार मनन या चिन्तन - क्रिया भूतकी ही उपज है और भूत ही मस्तिष्कका रूप प्राप्त कर चुका है । एंजिल्सके शब्दोंमें ' भौतिक अस्तित्व, मनन, प्रकृति और जीवात्माके अस्तित्वका प्रश्न ही दर्शनशास्त्रका मुख्य प्रश्न है ।' आदर्शवादी जीवात्माको पहले मानते हैं, भौतिकवादी प्रकृतिको । मार्क्स कहता है-' जो भूत- चिन्तन करता है, उस भूतसे चिन्तनको पृथक् नहीं किया जा सकता ।

पृष्ठ 63

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- पाश्चात्य दर्शन ५९ जो ज्ञान प्रयोग एवं अनुभवद्वारा व्याप्त है, वही वास्तविक ज्ञान है । इसको बाह्य जगत्से मिलाकर जाँचा जा सकता है । जगत्में कोई अज्ञेय वस्तु नहीं है । जगत् और उसके नियम पूर्णरूपसे जाने जा सकते हैं । यह बात अलग है कि अभी हम पूर्णरूपसे नहीं जानते । ' उपर्युक्त बातोंपर विचार करनेसे मालूम होता है कि यह भी अनुमान है कि मनुष्य सब संसार एवं उसके नियमोंको जान सकेगा; क्योंकि अभीतक सम्पूर्ण जगत्की तो बात ही क्या, एक सूर्यके ही अन्दर कितने तत्त्व हैं, इसीका पूरा अन्वेषण नहीं हुआ । एक कोयला या मिट्टीके तेलमें या एक परमाणुमें कितनी शक्तियाँ हैं, इसका भी परिज्ञान पूरा नहीं हुआ । विज्ञानके बलसे आज वैज्ञानिक एक वस्तुको जाननेका दावा करता है, कुछ दिन बाद उसे अपनी भूल भी मालूम पड़ती है । किसी चीजको आज किसी रोगपर लाभदायक समझा जाता है, कालान्तरमें उसे ही हानिकारक मान लिया जाता है । फिर स्वेतरसकलवस्तुप्रतियोगी घटको ही आजतक कौन जान सका है? और आगे भी जाननेकी आशा कौन बुद्धिमान् कर सकता है? किसी भी संयोग या यन्त्रसे कोई भी सम्पूर्ण प्रपंच एवं तद्गत विचित्रताको कैसे जान सकता है? जैसे एक उदुम्बरके भीतर ही रहनेवाला नगण्य कीट बाहरकी वार्ताको नहीं जानता, उसी तरह एक क्षुद्र भूखण्ड तथा ब्रह्माण्डगोलकके भीतरका जन्तु सर्वज्ञ होनेका दावा करे, यह साहसमात्र है । एक तीक्ष्ण संखियाके स्वादका वैशिष्ट्य समझ लेनेके लिये लाखों जीवन समाप्त हो जाना भी पर्याप्त नहीं है, फिर उसके अन्य रस, वीर्य, गुण, विकारादिको समझना, चींटीद्वारा आकाश - परिवेष्टनकी कल्पना जैसी बात है । एंजिल्सका यह कहना भी सही नहीं कि ' यदि हम अपनी किसी कल्पनाकी सत्यताका प्रमाण उस वस्तुको स्वयं बनाकर दे सकें, उसको अपनी अवस्थाओंके बाहर उत्पन्न कर उसको अपने व्यवहारोपयोगी बना सकें तो काण्टके वस्तुस्वरूपका अन्त हो जाता है । कारण, इससे भी उपर्युक्त तर्कका समाधान नहीं होता । मनुष्य अपने नेत्रों, श्रोत्रों एवं तत्सहायक भौतिक साधनोंसे बहुत कुछ जान सकता है सही, परंतु इतनेसे

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६० मार्क्सवाद और रामराज्य ही वह सब वस्तुओंको जान लेगा- यह नहीं सिद्ध होता; क्योंकि इन्द्रियों और तत्सहायक साधनोंकी भी एक सीमा है । योगज अतिशयता भी उसे लंघन करनेमें असमर्थ होती है । अतएव चक्षुसे रूपकी अनुभूति होती है, स्पर्शकी नहीं । श्रोत्रसे गन्धकी उपलब्धि नहीं हो सकेगी, भले ही वैज्ञानिक सहस्रों साधनोंका प्रयोग कर ले । किसी यन्त्रद्वारा सूक्ष्म चक्षु-इन्द्रियको देख सकना भी दुष्कर है । व्यापक नियम है कि द्रष्टासे दृश्यका दर्शन होता है, किंतु दृश्यद्वारा द्रष्टाका दर्शन नहीं होता । चक्षुद्वारा रूप दिखायी देता है, किंतु रूप या चक्षुद्वारा चक्षुका दर्शन नहीं होता, मनसे चक्षुके व्यापारोंकी मन्दता- पटुता आदिका तो बोध होता है, किंतु चक्षुसे मनके व्यापारोंका बोध नहीं होता । मनसे तो मनका पता लग सकता है, परंतु मन एवं अहं सबका भान जिससे होता है, उसका बोध- भास्यभूत मन या अहंसे कैसे हो सकता है? सर्वविज्ञाताको किससे जाना जा सकता है —' विज्ञातारमरे केन विजानीयात् । ' ( बृहदा० उप० ) आर्गेनिक केमिस्ट्रीके बलपर अवश्य कई सूक्ष्म रसायनोंका बोध हो सकता है, किंतु इसीसे निर्दृश्य दृक्का भी बोध हो जायगा, यह निरा भ्रम है । हृदय या मस्तिष्कके जिन तन्तुओंको ज्ञानचक्षु कहनेका प्रयत्न किया जाता है, वह भी ज्ञानव्यंजक अन्त: करण वृत्तिके ही व्यंजक हैं । ठण्डे एवं गर्म तारोंके संयोगसे प्रकाश शक्ति विद्युत् व्यक्त होती है, परंतु ' दोनों तार या उनका संयोग ही विद्युत् है ' यह नहीं कहा जा सकता । एंजिल्सका यह कहना भी ठीक नहीं है कि कोपर्निकसकी सूर्यमण्डलीका तथ्य एक अनुमान था, परंतु जैसे लारियरने गणनाओंसे उसके अस्तित्वका पता लगाया, गालेने खोज निकाला, वैसे ही सर्वज्ञानका अनुमान भी सही निकलेगा; क्योंकि दृश्यद्वारा द्रष्टाके ज्ञानका समर्थन इस उदाहरणसे भी नहीं होता । इतना ही क्यों? ऋषियोंका ज्ञान आजसे कहीं बढ़ा हुआ था, उनके संनिकृष्ट - विप्रकृष्ट, लोक- परलोक, अस्त्र - शस्त्र, विमान आदिके विज्ञानतक अभी भी भौतिकवादी वैज्ञानिक नहीं पहुँचे हैं । वे ऋषि भी सर्वज्ञ होनेका दावा नहीं करते । ब्रिटेनके प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर लोका कहना है कि ' मेरी रायमें इस युगकी सबसे बड़ी खोज

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- पाश्चात्य दर्शन ६१ यह है कि हम किसी वस्तुके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं जानते । प्रसिद्ध वैज्ञानिक मिस्टर कैल्डरने भी ब्रिटिश वैज्ञानिक - विकास - संघके अधिवेशनमें रूपान्तरसे इसी बातको प्रकट किया है । सुकरातका भी ऐसा ही मत था । भर्तृहरिका भी कहना है— यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः । यदा किञ्चित् किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतं तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥ (नीतिशतक ८ ) अर्थात् जब मैं अत्यन्त नासमझ था, तब हाथीके समान मदान्ध होकर अपनेको सर्वज्ञ मानता था; किंतु जब बुधजनोंके अनुग्रहसे कुछ समझने लगा, तब मुझे मालूम पड़ा कि मैं तो निरा मूर्ख ही हूँ और तब ज्वरके समान मेरा सर्वज्ञताका मद भी उतर गया । अध्यात्मवादियोंकी आज भी चुनौती है । सब वस्तुका ज्ञान तो दूर रहा, एक घटका भी सम्यक् ज्ञान कोई सिद्ध कर दे । वस्तुतः सत्त्वकी शुद्धतासे ज्ञानमें विशेषता आती है । उपासना एवं योगसे जितनी सत्त्वकी शुद्धता बढ़ती है, उतना ही ज्ञान बढ़ता है । सर्वातिशायी सत्त्व-बुद्धि ईश्वरकी है, अतः पूर्ण सर्वज्ञ वही है । अन्योंमें सर्वज्ञताकी कल्पना होती है, वस्तुतः सर्वज्ञता नहीं होती । इसी प्रकार भूत और मानसकी प्राथमिकताकी बात भी भौतिकवादियोंकी भ्रमपूर्ण है । वस्तुतः भूतसे प्रथम अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश-सत्का अस्तित्व ही वेदान्त-सिद्धान्त है । उसे भौतिकवादी भ्रमसे मानस कहते हैं । मनको तो अद्वैतवादी वेदान्ती भी भौतिक ही मानते हैं । प्रमाणाधीन प्रमेयकी सिद्धि होती है । बोधाधीन बोध्य तथा उसके व्यवहारकी सिद्धि होती है । सत्ता एवं बोध बिना सब वस्तुएँ ही अस्तित्वहीन होनेसे असत् ठहरेंगी । फिर तत्स्वरूप बोध पहले कि भूत पहले? मृत्तिका बिना घट रहता ही नहीं । घटके बाहर- भीतर मृत्तिका ही है । फिर मृत्तिका पहले या घट पहले? इसका क्या उत्तर है? घट न रहनेपर भी मृत्तिका उदंचनमें है ही । वैसे ही अस्तित्व एक वस्तुमें

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६२ मार्क्सवाद और रामराज्य न सही दूसरी वस्तुमें बना ही रहता है । घटबुद्धि यद्यपि घटान्तरमें हो सकती है तथापि पटमें घट- बुद्धि नहीं होती; परंतु सद्बुद्धि सबमें ही अनुवृत्त होती है । भूत परस्पर व्यावृत्त हैं, परंतु सत् सर्वत्र अव्यावृत्त है । अतः जैसे व्यावृत्त पुष्पोंसे अनुवृत्त-सूत्रको पहले ही मानना पड़ेगा, उसी तरह व्यावृत्त भूतोंसे पहले ही सबमें अनुवृत्त सत् तथा तत्स्वरूप बोधको मानना अनिवार्य होगा । कोई प्रयोग, प्रयोक्ता एवं प्रयोगफल भी स्वप्रकाश सत्के बिना सिद्ध नहीं हो सकते । फिर बोधके प्रथम भूतको मानना सर्वथा ही निराधार है । वस्तुतः जैसे घटानुस्यूत मृत्तिका सामान्य ही घटविशेष रूपसे उपलब्ध होता है; कटक, मुकुट आदिमें अनुस्यूत सुवर्ण सामान्य ही कटकादि सुवर्णविशेष रूपमें व्यक्त होता है, वैसे ही सर्वप्रपंचानुस्यूत सत्सामान्य ही सद्विशेष प्रपंचके रूपमें उपलब्ध होता है । अतः वही सर्वप्रथम है ।

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( द्वितीय परिच्छेद पाश्चात्य-राजनीति यूनानका राज्यदर्शन पाश्चात्य राजनीतिपर विचार करते समय सर्वप्रथम उसके प्राचीन यूनानी राज्यदर्शनपर विचार करना पड़ता है । वहाँकी सबसे प्राचीन रचनाएँ होमरकृत महाकाव्य ‘ इलियड ' तथा ' ओडेसी ' हैं । इनका महाभारतके साथ इतना साम्य है कि सिकन्दरके सैनिकोंको भ्रम हो गया कि ' कहीं महाभारत होमरकी रचनाओंका भारतीय संस्करण तो नहीं है । ' उक्त महाकाव्योंमें प्राप्त जीवनदर्शनके अनुसार राजाका स्वरूप सामने आता है । राजा न्यायकर्ता था, किंतु तभी जब कोई समस्या सार्वजनिक हितके लिये उठती अथवा कोई प्रपीड़ित व्यक्ति फरियाद लेकर राजद्वारपर आता, अन्यथा नरवधके मामले भी कुलपतियोंद्वारा सुलझा दिये जाते थे । राजा सैन्यशक्तिका प्रधान था । राजाकी स्थिति यद्यपि जनस्वीकृतिपर आधारित थी, फिर भी राजाका व्यक्तित्व उसके अधिकारप्रयोगमें अधिक महत्त्व रखता था । हेसियड अपने वर्तमानको निकृष्ट तथा अतीतको स्वर्ण युग मानता था । उसका विश्वास था कि मानव -इतिहासका उषःकाल अत्यन्त सुखमय था । क्रमशः दुःखकी वृद्धि मानववर्गमें होती गयी, जिससे स्वर्णके बाद रौप्य ( चाँदी ) युग आया । इसके बाद ताम्रयुग तथा अन्तमें लौहयुग आया । अपने समयको वह लौहयुग मानता था । प्लूटार्कने अपोलोके सात सन्तोंका उल्लेख किया है, किंतु अर्नस्ट वार्करके अनुसार इनमें केवल सोलन नामक संत ही ऐतिहासिक है । सोलनने सामाजिक तथा राजनैतिक जीवनमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये । उसका प्रमुख आधार न्याय एवं दण्ड था । वह एक ही साथ निर्धनोंका मित्र तथा धनवानोंका रक्षक था । उसका युग शोषणका युग था । उसके

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६४ मार्क्सवाद और रामराज्य लिये उसने केवल वैधानिक राज्यकी ही स्थापना नहीं की, अपितु कार्यकारिणीकी अपेक्षा न्यायकी उच्चता एवं राज्यसत्ताका आधार जनता सत्ता स्थापित किया तथापि उसका जनतन्त्र न्यायकी सीमाके अन्दर ही था । सीधे - सीधे राज्यकी नीति तथा संचालनमें जनताको कोई अधिकार नहीं था । जनता इस बातका ध्यान रख सकती थी कि ' स्वीकृत नियमों तथा परम्पराके अनुसार ही वह शासित हो रही है । ' साफिस्टोंके पूर्व, उपर्युक्त दार्शनिकोंके अतिरिक्त, आयोनियाके भौतिकवादी दार्शनिकोंका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । वस्तुतः यूनान विषमताओंका पुंज था । एक ओर गणतन्त्रीय राज्यसंघ तथा दूसरी ओर मेसेडोनियाका विशाल साम्राज्य । एक ओर हेराक्लीटसका पदार्थ- परिवर्तनवाद और दूसरी ओर परमेनाईडीजके द्वारा उसका खण्डन । ये सब विरोधीभाव साथ ही चल रहे थे । इसी प्रकार यूनानमें जिस समय डायनीशसका परिष्कृतरूप आरफ्यूसवाद बनकर जनप्रिय हो रहा था, उसी समय आयोनियामें उसका विरोधी पक्ष भी उपस्थित हो गया था । यह नवीन विचारधारा अपने उद्गम आयोनियासे पेरिकिल्सके समयमें अनेक्सागोरसद्वारा एथेन्स लायी गयी थी । इस दार्शनिक विचारकी उत्पत्तिका कारण वार्करके अनुसार ' पूर्वका प्रभाव ' है । हेराक्लीटसका सर्वव्यापक तत्त्व अग्नि, जल थे । जिस प्रकार उसके दर्शनमें अग्नि, जल तथा उष्ण एवं शीतकी धारणाएँ थीं, उसी प्रकार समाजके क्षेत्रमें वह ऊँच- नीचका विचार मानता था । वह शुष्क एवं अग्निप्रधान व्यक्तिको श्रेष्ठ, गीले एवं जलप्रधान व्यक्तिको नीच मानता था । आयोनियाके अन्य दार्शनिकोंकी भाँति पाइथागोरस भी अनेक रूपात्मक जगत्में एक तत्त्वकी व्यापकता मानता था । किंतु उसका एक तत्त्व अग्नि तथा जल आदिसे अधिक सूक्ष्म ' संख्या ' था । ' संख्या ' के अस्तित्वमें स्थान ( अवकाश) भी सम्मिलित है । इस प्रकार संसारकी प्रत्येक वस्तुका सार संख्या ही है । पाइथागोरसके मतसे ' समस्त प्राणियोंकी आत्मा समान है तथा 'जन्मचक्र ' में एक मनुष्यकी आत्मा अगले या पिछले जन्ममें कुत्ते, हाथी या किसी जन्तुके देहमें भी हो सकती

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- पाश्चात्य राजनीति ६५ है । 'जन्म- चक्र ' से मुक्ति पानेके लिये साधना और संस्कार अपेक्षित हैं । साथ ही ज्ञानकी महत्ता सर्वाधिक है । ' प्लेटो ( अफलातून ) प्लेटोके दर्शनमें दो पक्ष हैं- आदर्श तथा वास्तविक । अपने समयके स्वरूप अध्ययन करनेके बाद वह इस निष्कर्षपर पहुँचा कि ' लोग पतनशील हैं । ' उसने एक आदर्श राज्यका चित्रण ' रिपब्लिक ' नामक ग्रन्थमें किया, किंतु वह अमानवीय हो गया । इसके अनुसार इस आदर्शके निकट जितना ही पहुँचा जायगा, उतना ही कल्याण होगा । इस प्रकार वह आदर्शवादका जन्मदाता माना जाता है । कहा जाता कि साम्यवाद तथा फासीवादका मूल प्लेटोके दर्शनमें ही था । वह कहता है ' अच्छे राज्य और अच्छे नागरिकका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि आदर्श राज्यके बिना आदर्श व्यक्ति सम्भव नहीं । इसी प्रकार आदर्श राज्य भी आदर्श व्यक्तिके बिना सम्भव नहीं । आदर्श नागरिकका विस्तृत प्रतिबिम्ब आदर्श राज्य है । वह अपने गुरु सुकरातके वाक्य ' सद्गुण ज्ञान है ' का कायल था । अतः राज्यमें वह सद्गुणका प्राधान्य मानता था । उसके युगमें तीन वर्ग थे - संरक्षक, सहायक- संरक्षक तथा कृषक- वर्ग । उनको वह ज्ञान ( स्वर्ण), मान (चाँदी ) तथा वासना ( लोहा ) मानता था । इन्हींको वह शरीरकी तीन विशेषताएँ भी मानता था । ' सद्गुणी जीवनकी स्थापनाके लिये वह साम्यवादकी स्थापना करना चाहता था । साम्यवादी राज्यमें वह सामान्य सम्पत्तिका पक्षपाती था । प्लेटो जब वास्तविक स्वरूपपर आता है, तब वैयक्तिक सम्पत्ति, परिवार-नियम- प्राधान्य कुछ अंशमें मानने लगता है । उसके अनुसार स्त्री- पुरुषके स्थायी ( जीवनपर्यन्त) समागमसे लोलुपता बढ़ती है । बालकोंकी देख-रेखका उत्तरदायित्व राज्यपर माना गया; क्योंकि आदर्श राज्यमें ही आदर्श नागरिककी स्थापना हो सकेगी । वह स्त्रियोंको घरकी सीमासे बाहर नागरिक जीवनतक ले आया । उसने उनके समानाधिकारकी स्थापना की । उसने आदर्श स्थितिके लिये आदर्श शिक्षाकी आवश्यकता बतलायी । उसके मतानुसार '१८ वर्षतक शिक्षा, व्यायाम आवश्यक है; क्योंकि इससे 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_3_1_Front

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६६ मार्क्सवाद और रामराज्य धैर्य, सहनशीलता तथा मनपर प्रभाव पड़ता है । इसी बीच संगीतका भी अध्ययन होना चाहिये; क्योंकि इसके द्वारा मनपर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता तथा आत्मसंयम बढ़ता है । १८ से २० वर्षतक सैनिकशिक्षा, २० से ३० वर्षतक बुद्धिगम्य विषय ( गणित, तर्क, ज्योतिष), ३० – ३५ वर्षतक दर्शन, ३५–५० वर्षतक समाज- सेवा तथा ५० वर्षके बाद सत्यप्राप्तिके लिये संन्यास, यही उसकी शिक्षाका क्रम था । ऐसी शिक्षासे ही व्यक्ति सद्गुणी बन सकता है । उसकी राजनीतिका सार तत्त्व है - १. आदर्श राज्य, २. ज्ञानका प्राधान्य, ३. सद्गुणी राज्य, ४. सद्गुणी नागरिक, ५. शिक्षा और ६. साम्यवाद । वह ' सामाजिक तथा आर्थिक ' न्याय मानता था । उसके अनुसार ' व्यक्ति योग्यतानुसार कार्य करे और वह वस्तु ले, जिसे वह लेनेके योग्य हो । उसे अन्य कामोंमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये । न्याय जीवनका क्रम है । न्यायकी विशाल धारामें समस्त जीवन ही आ जाता है । ' अरस्तू यह यथार्थवादी दार्शनिक था । अपने युगके लगभग १५० संविधानोंका अध्ययन करके इसने ' पालिटिक्स ' नामक ग्रन्थ लिखा था । इसने प्लेटोकी आगमन- पद्धतिके स्थानपर निगमन-पद्धतिको स्वीकार किया । इसके अनुसार अध्ययनके बाद आदर्शकी स्थापना करनी चाहिये । उसने राजनीतिक तथा आर्थिक -दो पक्षोंसे अध्ययनकर राज्योंको छः भागोंमें बाँटा । राजतन्त्र, उच्चजनतन्त्र, लोकहिताय जनवादको वह प्राकृतरूपमें मानता था । अत्याचार, सामन्ततन्त्र तथा जनवाद ( डेमोक्रेसी ) -को उनका विकृतरूप मानता था । इस प्रकार नियमनिर्धारण संविधानोंका वर्गीकरण— ये दो देनें उसकी हुईं । तीसरी देन उसकी ' शक्ति- पृथक्कीकरण है । इसके अनुसार व्यवस्थापन, शासन तथा न्याय - इन तीनोंको उसने अलग किया । ४. प्लेटोने विवेकको प्रधान माना था । यद्यपि आगे चलकर उसने भी नियमपर जोर दिया, किंतु अरस्तूने नियमका ही प्राधान्य माना है, जिनमें परम्परागत तथा नैसर्गिक नियम मुख्य है । सत्ताधारीको इनके अधीन होना चाहिये । ५. आदर्श राज्य वह है, जिसमें मध्यममार्गीय व्यवस्था हो-न 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_3_1_Back