मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 51–60
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
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- पाश्चात्य दर्शन ४७ एवं शाश्वत भी है और वही पुरुषार्थ है । प्रकृति और प्राकृत प्रपंचका जो भान है, जिसके अनुग्रहसे प्रकृति और प्राकृत प्रपंच प्रस्फुरित होता है, उसको प्रकृतिपार या प्रकृतिसे अतीत कहना अनिवार्य है । चक्षुका द्रष्टा चक्षुसे अतीत है, यह निर्विवाद है । महान् उद्देश्यकी प्राप्तिके लिये सूक्ष्म, आवश्यक नियम अपरिहार्य होते हैं । अतएव वे नियम उद्वृत्त राजाओं और पुरोहितोंद्वारा निर्मित नहीं हुए, अपितु अब्भक्ष, वायुभक्ष, कन्द - मूल-फलाशी, वल्कल-वसनधारी, अरण्य-वासी, शान्त, ऋतम्भरा प्रज्ञावाले, महातपा महर्षियोंद्वारा आविष्कृत हुए हैं । बर्कले ( १६८५-१७५३ ) भौतिकवादियोंके विरुद्ध है । उसके मतमें ' सब कुछ संकल्पमात्र ही है, भौतिक नहीं । इसकी अनुभूतिका मूल ईश्वर है, कारण उसीकी अनुभूतिमें सबकी अनुभूतिका अन्तर्भाव हो जाता है । संकल्पोंके परस्पर सम्बन्धका नियामक ईश्वर ही है । उसीसे वस्तुओंके भी सम्बन्धका नियम प्रतीत होता है । जिह्वासे दन्तस्पर्श होते समय ' मैं दन्तस्पर्शवान् हूँ' यह प्रतीति होती है । प्रतीतिके अतिरिक्त दाँतोंका अस्तित्व नहीं ही है । किसी काष्ठका अंगुलियोंसे स्पर्श करनेपर काठिन्य, चिक्कणता और शैत्यका अनुभव होता है । यहाँ अनुभूतिसे भिन्न बाह्य वस्तु कुछ भी नहीं है । जैसे सुवर्णका पीत रूप और विशिष्ट गुरुत्व होता है और दोनोंका सहज साहचर्य भी होता है, परंतु उनका कार्यकारण - सम्बन्ध नहीं है । इस प्रकार वे लोग घटनामात्रका अपलाप कर देते हैं । ' इन्द्रियानुभूतिवादियोंका कहना है कि ' बुद्धिसे किसी भी विषयका अस्तित्व नहीं जाना जाता । वास्तविकताके प्रत्यक्षीकरणसे ही अस्तित्वावगम होता है । ' जैसे प्रज्ञावादियोंके मतमें प्रत्यक्षानुभूतिका स्थान नहीं है, वैसे ही प्रत्यक्षानुभूतिवादियोंके मतमें व्यापक सिद्धान्तोंका भी स्थान नहीं है, जिन व्यापक सिद्धान्तोंके लिये दृश्य वस्तुओंका एकीकरण, उनका पारस्परिक सम्बन्ध - स्थापन तथा तुलनात्मक आलोचना होती है । इसलिये इन्द्रियानुभूतिको सत्य माननेपर बुद्धिप्राप्त ज्ञान ही असम्भव है । यदि प्रज्ञावाद सत्य हो तो इनका ज्ञान असम्भव है ।
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४८ मार्क्सवाद और रामराज्य ज्ञानका विषय कुछ है, परंतु यह भी सत्य है कि अनुभूतियोंमें बुद्धि प्रयुक्त होती है । उसके परिणामका भी अपने जगत्में प्रयोग होता है, परंतु उभयवादियोंके सामंजस्यकी समस्या तो वैसी ही रह जाती है । इस विषयमें काण्टका कहना है कि ' अनुभूतिका विषय अकृत्रिम नहीं है । इसलिये वस्तुतत्व अनुभवसे गृहीत नहीं होता, किंतु ज्ञानप्राप्तिकी क्रियासे परिष्कृत देशकालादि-सम्बद्ध ही वस्तुका ग्रहण होता है । इससे यह तो सम्भव है कि वस्तु उन नियमोंका पालन करे, जिन नियमोंसे वस्तु बुद्धिसे मण्डित होती है । ' यदि भौतिकवादके अनुसार प्रकृतिको क्रियाशील और ज्ञानको अक्रिय माना जाता है तो ज्ञानमें व्यवस्थापकत्व कैसे बन सकता है? काण्ट आदिके ज्ञानका रचनात्मक कार्य- कर्तृत्व इस दृष्टिसे होता है कि मनस या सर्वमनस ही ज्ञान है, भारतीय वेदान्तकी दृष्टिसे मन स्वयं ही भौतिक कार्य है, उसकी उत्पत्ति होती है और वह व्यापारवान् होता है, सक्रिय तो है ही । इंगलिश- फ्रेंच भौतिकवादियोंका यह मत भी ठीक नहीं कि वस्तुका अस्तित्व-विचार कर्ताके अस्तित्वसे पहले है, विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त कर सकता है । यदि आत्मा भूतका ही परिणाम है, तब तो सुतरां कार्यभूत आत्माके पहले कारणरूप भूतका रहना ठीक ही है, परंतु जड़भूतोंके किसी परिणाममें चेतनता या विचारकर्तृता किसी भी प्रमाणसे नहीं सिद्ध हो सकती, हाब्सके विचार भी इस सम्बन्धमें भौतिकवादी ही हैं । भौतिकवादी भूतपरिणामको ही ज्ञान मानते हैं, अतएव ज्ञानका उद्गमस्थान उनकी दृष्टिसे इन्द्रियग्राह्य रूपोंके मूलभूत ही हैं, किंतु अध्यात्मवादी जड़भूतोंके अतिरिक्त आत्माको ही ज्ञानका उद्गमस्थान मानते हैं । वह आत्मा नैयायिक, वैशेषिक आदिके अनुसार ज्ञान-गुणवाला है, कुछके मतानुसार ज्ञानस्वरूप होकर ज्ञानधर्मक है और कुछके मतानुसार अखण्ड नित्य बोधस्वरूप है । उससे ही सर्वभूतों एवं भूतप्रकृतिकी उत्पत्ति होती है, उससे भौतिक अन्तःकरण मन आदि उत्पन्न होता है, उसीसे साभास वृत्तिरूप अनित्य ज्ञान उत्पन्न होते हैं, परंतु इन सबसे पृथक् अखण्ड स्वतः सिद्ध नित्यबोध है, जिससे अनित्य
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- पाश्चात्य दर्शन ४९ ज्ञानोंकी उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय आदिका बोध होता है । हीगेल- दर्शन हीगेल ( १७७०-१८३१ ) - ने काण्टकी वस्तुस्वरूप धारणाका खण्डन किया और बतलाया कि ' वस्तुको उसके आवेष्टन गुणों और अवस्थाओंसे अलग करके देखना ही वस्तु स्वरूपकी धारणा है, परंतु ऐसा सम्भव नहीं । अत: वह ज्ञानसे परे है । ' हीगेलके जगत्का भी स्रष्टा मन ही है, काण्टके असल जगत् एवं दृश्यमान जगत्के द्वित्वका भी इसने खण्डन किया है । स्पिनोजाके समान हीगेल भी आत्मा- मन और भूतको अभिन्न ही मानता है । अर्थात् आत्मासे अभिन्न मन एवं मनसे अभिन्न भूत हैं । उसके अनुसार ' पूर्णतत्त्व ही सब कुछ है, दृश्यमान जगत् उसीका अंग है । ' किसी वस्तुको समझनेके लिये दूसरी वस्तुओंसे तुलना आवश्यक होती है । जैसे एक मुर्गीका अण्डा गेंदसे कम गोल है, चमड़ेसे अधिक टूटनेवाला है, गौरैयाके अण्डेसे बड़ा है । इस तरह सभी घटनाओंको मिलाकर ही वस्तुविशेष बनती है । अतः दूसरी वस्तुओंसे इसके सम्बन्ध इसकी प्रकृतिको बताते हैं । साथ ही दुनियाकी सभी वस्तुओंसे भी इस अण्डेका सम्बन्ध है । भले ही यह सम्बन्ध समतासे हो या विषमतासे । इसलिये एक अण्डेको पूर्णरूपसे जाननेके लिये हर विद्यमान वस्तुका ज्ञान होना चाहिये, जो कि अल्पज्ञ प्राणीके लिये असम्भव ही है । अतः भेद असत्य है, एक ही महान् वस्तुके सब अंगोपांग हैं । यही बात विचारोंके सम्बन्धमें भी है । किसी सत्यके अस्तित्वके प्रकाशके साथ - साथ उसके विपरीत असत्यके अस्तित्वका भी प्रकाश होता है । शंख श्वेत है, इस प्रकारकी घटनाके विवरणके लिये ही यह सत्य नहीं, किंतु सिद्धान्तोंके विचारके लिये भी यही सत्य है । जैसे स्वतन्त्र इच्छाके ही सिद्धान्तको देखें, अपनी इच्छाके अनुसार काम करनेकी स्वतन्त्रता हमें नहीं है । हमारा कार्य पूर्वनिर्धारित है । घटनावश उस कार्यको करनेके लिये हम बाध्य हैं । इसे ही ' पूर्वनिर्धारणका सिद्धान्त ' कहा जाता है । इन सिद्धान्तोंके विपरीत सिद्धान्तके अस्तित्वका अर्थ ही यही है कि कोई भी सिद्धान्त स्वतन्त्ररूपसे पूर्ण सत्य नहीं है । इसलिये वह कहता है कि ' कोई उपाय
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५० मार्क्सवाद और रामराज्य ऐसा अवश्य होना चाहिये, जिससे एक सत्य एवं उसके विपरीत सत्यको मिलाकर व्यापक सत्यकी प्रतिष्ठा हो, जिसमें दोनों आंशिक सत्य मिले हों । ' इन आंशिक सत्योंका परस्पर विरोध रहता है, अतः इनके अधूरेपनमें मनका टिकना सम्भव नहीं । इसीलिये मन व्यापक सत्यकी खोजमें बढ़ता रहता है । यद्यपि कारणरूपी सत्यमें विरोधी कार्योंका समन्वय हो जाता है, जैसे मृत्तिकामें घट- शरावादि विविध कार्य अन्तर्गत होते हैं तथापि मृत्तिका भी स्वयं कार्य है, अतः अन्तिम ( अधिष्ठान ) सत्यपर जबतक मन नहीं पहुँचता, जहाँ किसी भी आंशिक सत्यका विरोध विलीन हो जाता है, तबतक आंशिक सत्योंको मिलाकर एक व्यापक सत्यमें परिणत करनेकी क्रिया जारी रहती है । यह अन्तिम सत्य ही सब कुछ है और वह सत्य आन्तर अखण्ड बोधस्वरूप ही है । मन एवं मनद्वारा ज्ञात विषय एवं उनकी विभिन्नताएँ इसके अन्दर ही हैं । मन इसी पूर्णका अंशमात्र है । इसीलिये यह विश्वको भी गलतरूपमें देख सकता है और अलग वस्तुओंके पुंजके रूपमें देखता है । आम तौरपर समझा जाता है कि सत्यता सम्मति या रायका एक गुण है । कोई सम्मति सत्य है, यह एक ही वस्तुपर निर्भर है । हीगेल सिवा पूर्णके और किसीको सत्य नहीं मानता । जो कुछ पूर्णसे कम है, वह सत्य घटना नहीं, वह दूसरी घटनाओंसे सम्बन्धित है । जिनसे विच्छिन्न करके इसको नहीं समझा जा सकता । इसीलिये विचार एवं विचारका विषय मिथ्या है, परम सत्य अधिष्ठानस्वरूप नित्य बोध ही रहता है । हीगेलका ' स्वयंगतिविवर्तनवाद' का विचार बड़े महत्त्वका माना जाता है । अरस्तू एवं उसके अनुयायियोंके मतानुसार ' कोई नयी चीज हो ही नहीं सकती; क्योंकि वह एक आनुमानिक प्राथमिक वस्तुसे ही हमारे सारे संसारका सूत्र जोड़ लेती हैं । ' अरस्तूके अनुसार ' एक वस्तु एवं तदनुरूप विचार एक ही वस्तु है, दो नहीं ।' इससे भिन्न हीगेलने कहा कि ' प्रत्येक वस्तुमें एक अन्तर्विरोध है, जो उसको गतिमान करता है और इस स्वयं विकासकी क्रियामें वह दूसरी वस्तुके रूपमें परिवर्तित हो जाती है । ' हीगेल वस्तुकी अपेक्षा विचारको ही तात्त्विक मानता है ।
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- पाश्चात्य दर्शन ५१ संसारका क्रमविवर्तन उसके मतानुसार विचारका ही क्रमविवर्तन है । उसके अनुसार प्रथम ' विचारका नाम वाद है, इसके साथ ही विपरीत विचार भी वर्तमान रहता है, उसका नाम प्रतिवाद है । इन दोनोंके संघर्षसे जो नया विचार उत्पन्न होता है, उसका नाम समन्वयवाद है । इस समन्वयवादमें पुनः अन्तर्विरोधकी सृष्टि होती है और एक नये संघर्षके परिणामस्वरूप गति उत्पन्न होती है, जो एक नये और बृहत्तर समन्वयवादमें लीन होती है । विश्व-लीला इसी विचार-संघर्षकी ही क्रिया है । अनन्तः यह लय होती है पूर्णमें । ' हीगेलके विचार वेदान्तके अद्वैत- दर्शनसे मिलते - जुलते हैं । वेदान्तका ब्रह्म अखण्डबोधस्वरूप है, उसीका विवर्त विश्व है, विश्वके पहले भी मन बनता है ।
स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान् ।
समनाङ् मननीशक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥
(पंचदशी १३ ।२० ) वह स्वप्रकाश ब्रह्मात्मा किंचित् मननी शक्तिको धारण कर मन हो जाता है । यह भी वेदान्तका ही सिद्धान्त है कि हर एक वस्तु व्यावृत्तरूपसे ही उपलब्ध होती है । अर्थात् अपनेसे भिन्न समस्त वस्तुनिरूपित भेदसे युक्त ही वस्तुका बोध होता है । किसी अल्पज्ञको सम्पूर्ण पदार्थोंका बोध हो नहीं सकता, अतः तन्निरूपित भेदका भी ज्ञान असम्भव है, फिर स्वेतर सर्व वस्तु भिन्नरूपसे किसी भी पदार्थका जानना सम्भव नहीं । इसीलिये घटज्ञानमें व्यावृत्तरूपसे घटका भान होता है, परंतु व्यावृत्ति एवं उसके निरूपक घटातिरिक्त सकल पदार्थोंका बोध है नहीं, अतः अतत्में तद्बुद्धि होनेके कारण व्यावृत्ताकारेण घट- बोध ही भ्रम है, सुतरां उसमें भासित होनेवाला घट भी भ्रम-सिद्ध ही है । विचार या ज्ञानमें भिन्न वस्तु नहीं । विचार या ज्ञान अखण्ड बोध ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, इस दृष्टिसे वस्तु एवं विचार सबका ही पर्यवसान अखण्ड बोधस्वरूप वस्तुमें ही होता है । हीगेलका अन्तर्विरोध या द्वन्द्वमानका अभिप्राय क्रमिक विवर्तके
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५२ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वरूपका ही विवेचन है । मूल वस्तु अखण्डबोध आन्तरिक वस्तु है । मन, विचार आदि उसके अति संनिहित हैं । अतः उनमें हलचल होनेसे ही विचारान्तर या वस्त्वन्तर उत्पन्न होते हैं । विचार -संघर्षसे विरोधी विचारोंसे सर्वबाध होनेके अनन्तर बाधाधिष्ठान परमार्थ वस्तुका बोध होता है । वहीं सब विरोधों, सब संघर्षोंका अन्त हो जाता है । सुन्दोपसुन्दन्यायसे सत्कार्यवाद- असत्कार्यवाद दोनोंके ही सांख्यों एवं नैयायिकोंद्वारा खण्डित हो जानेपर अनिर्वचनीयता एवं विवर्तकी सिद्धि होती है । इसी तरह जैसे बीजमें अन्तर्विरोधद्वारा उसका विध्वंस होता है, तब अंकुरकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही हर एक कारणमें अन्तर्विरोध होनेके बाद विध्वंस या विकृति आनेपर ही कार्यान्तरका विकास होता `है । अव्यक्तका महान्, महान्का अहं, अहंका आकाश, आकाशका वायु आदिरूपसे विवर्त या विकास इसी क्रमसे होता है । सत्त्व-रज-तम तीनों ही गुणोंके विमर्द - वैचित्र्यसे ही सृष्टि होती है । विमर्द भी संघर्ष ही है । निर्विरोध शान्त सम गुणोंसे सृष्टि नहीं होती । विमर्दवैषम्यसे ही तत्त्वान्तरका विकास होता है । उस तत्त्वान्तरको कारणकी अपेक्षा अनिर्वचनीय कहा जाता है । इन्हीं वस्तुओंको हीगेलने अपनी भाषामें वाद, प्रतिवाद, समन्वय, द्वन्द्वमान या अन्तर्विरोध आदि शब्दों में कहा है । विचारोंके बाद प्रतिवाद एवं संवादके अनुसार उत्तरोत्तर सत्य वस्तुपर उपनीत होनेके कारण कारणातीत परमार्थ सत्य ब्रह्मकी ओर पहुँच सकते हैं । वस्तुगत अन्तर्विरोध, संघर्षवाद, प्रतिवाद एवं संवादसे उत्तरोत्तर कार्यसृष्टिकी ओर अग्रसर हो सकते हैं । फिर भी यह विवेचनकी एक शैलीमात्र है । इसका सदुपयोग-दुरुपयोग दोनों ही हो सकता है । इसीलिये अन्तिम पूर्णपर ब्रह्मनिर्णयरूप संवादको भी इतर संवादोंके समान वाद बनानेका प्रयत्न भी हो सकता है । इसी तरह अन्तिम कार्यके भी अन्तर्विरोधके क्रमसे पुनः व्यापक कार्यान्तरमें समन्वयका प्रयत्न हो सकता है । यह सब अनवस्था -दोष-दुष्ट होनेसे वैसे ही अनादरणीय है, जैसे अन्तिम मूलको भी मूल होनेसे ही समूल माननेका आग्रह, परंतु सिद्धान्ततः अनवस्था- दोषके कारण अन्तिम मूल अमूल ही
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- पाश्चात्य दर्शन ५३ माना जाता है । वस्तुतः हर एक तर्ककी अवधि आशंका होती है । आशंकाकी अवधि व्याघात ही होता है । जैसे ' धूमो यदि वह्निव्यभिचारी स्यात् तर्हि किं स्यात्' धूम यदि वह्निव्यभिचारी हो तो क्या होगा? इस शंकाका समाधान होता है ' तर्हि धूमो वह्निजन्यो न स्यात्' यदि धूम वह्निव्यभिचारी हो तो उसे वह्निजन्य नहीं होना चाहिये । यदि कोई इसपर भी तर्क करे तो उसके सामने व्याघातदोष उपस्थित होता है । अर्थात् कार्य - कारणभाव तो प्रत्यक्ष दृष्ट ही है । दृष्ट व्याघात इस शंकाकी अवधि है । ' ' व्याघातावधिराशङ्का शङ्का तर्कावधिर्मतः । इस तरह अन्तिम परम सत्य पर संवादको वाद बनाना तथा अन्तिम कार्यरूप संवादको भी वाद बनाकर कार्यान्तरकी कल्पना करना भी अनवस्था एवं दृष्ट व्याघात -दोषसे दुष्ट है । यों तो हीगेलके द्वन्द्ववादको भी वाद बनाकर उसका भी ऐकात्म्यवादमें लय हो जानेकी कल्पना की ही जाती है । जब द्वन्द्ववादके आधारपर अधिनायकवाद, समष्टिवाद, भूतवाद और चेतनवाद-जैसे परस्पर विरुद्ध मत सिद्ध हो सकते हैं, तब उसके बलपर तो किसी ' इदमित्थम्' सिद्धान्तका निर्णय असम्भवप्राय ही है । हीगेलके मतानुसार ' राज्य मानवकी सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा है । ' इसका अर्थ है कि ' वह संवाद आगे वाद नहीं बनेगा', परंतु मार्क्सने उसे भी वाद बनाया ही । वह मजदूर- नायकत्व या समष्टिवादको चरम संवाद कहता है, परंतु रामराज्यवादी जड- चेतन दोनोंको आध्यात्मिक सम्बन्धसे समन्वित करता है तथा राजतन्त्र-प्रजातन्त्र, व्यष्टि - समष्टि वित्तविभाग एवं श्रमविभागको समन्वित करता है । इस तरह अध्यात्मवादपर आधृत धर्म -नियन्त्रित धर्मसापेक्ष पक्षपातविहीन शासन- तन्त्र राज्यको ही अन्तिम संवाद एवं सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा मानता है । इस पक्षमें निश्चित प्रत्यक्षानुमान, अपौरुषेय आगम आर्षशास्त्र एवं परम्परा सभी अनुकूल है । भारतीय अध्यात्मवादमें समष्टि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मा कार्य- कारणातीत ब्रह्मका स्थूल रूप है । उसके भीतर समष्टि लिंगात्मा हिरण्यगर्भ सूक्ष्मरूप है । उसमें भी आन्तरसमष्टिकारणात्मा महाकारण
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५४ मार्क्सवाद और रामराज्य ईश्वर है और सर्वान्तर सूक्ष्मतम कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म है । महाविराट्की अपेक्षा भी हेगेलका विश्वात्मा बहुत स्थूल एवं संकीर्ण है । मार्क्स-दर्शन कार्लमार्क्स ( १८१८-८३ ) -ने हीगेलके द्वन्द्वमानको भौतिकवादसे जोड़ लिया, परंतु मार्क्स मानस या बोधको स्वयंविकास या विवर्त मानता है । इस प्रक्रियाका प्रथम अंश है एक अविभाजित इकाई । यह इकाई दो विरोधी अंशोंमें विभाजित हो जाती है । पुनः इन विरोधोंका समन्वय होकर एक नयी सम्बन्धित इकाईका जन्म होता । इसी प्रकार सृष्टिका विकास होता रहता है । इन बातोंको ब्रह्मवादमें भी जोड़ा जा सकता है । अविभाजित ब्रह्मका भी दृक् - दृश्य, ज्ञान- ज्ञेयरूपमें विभाजन हुआ । पुनः दोनोंके समन्वयसे ही महदादि प्रपंचकी सृष्टि होती है । इसी तरह उत्तरोत्तर कारणका विभाजन, विध्वंस या समन्वयसे उत्तरोत्तर सृष्टि होती है । एक बीजमें धरणि, अनिल, जलके सम्पर्कसे उच्छूनावस्था ( अंकुरोत्पत्तिके पहले बीजकी फूलनेकी अवस्था) होती है । फिर अन्तर्विरोधसे बीजका विध्वंस या विभाजन होता है, पुनः समन्वय होकर अंकुर उत्पन्न होता है । मार्क्स इसी अन्तर्विरोधको द्वन्द्वमान मानकर कहता है 'यह क्रिया भूतकी ही है, मनकी नहीं, मनमें तो भूतकी ही क्रिया प्रतिबिम्बित होती है । ' परंतु वेदान्त- मतानुसार विनाश या विध्वंसको अंकुरका कारण नहीं माना जाता, किंतु बीजके अवयव ही अंकुरके रूपमें परिणत या विवर्तित होते हैं; क्योंकि कार्यमें बीजके अवयवोंका ही अन्वय दिखायी देता है । अतः विनाश या विध्वंस विकासका कारण नहीं, इसके अतिरिक्त कारण ब्रह्म कार्यरूपमें परिणत होनेपर भी अविकृत मुक्तोपसृप्य ब्रह्म बना ही रहता है । आकाश, वायु आदि भी उन- उन कार्योंके रूपमें परिणत होनेपर भी समाप्त नहीं हो जाते । उनका भी पृथक् अस्तित्व बना ही रहता है । इसके अतिरिक्त हीगेलके यहाँ इस संघर्ष - क्रियाकी सीमा है । हर कार्यमें अन्तर्विरोध या संघर्षसे उत्तम वस्तुका विकास नहीं होता, इसीलिये कोई कार्योंके विनाशसे कोई भी अच्छी चीज उत्पन्न नहीं होती । तभी लोग
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- पाश्चात्य दर्शन ५५ कार्यध्वंससे उद्विग्न होते हैं । वस्तुतः मार्क्सने हीगेलके द्वन्द्वमानका गलत अभिप्राय समझकर दुरुपयोग किया है । किसी कार्यमें भावरूप उसका उपादान कारण एवं रजके हलचलके साथ तमका अवष्टम्भ तथा सत्त्वका प्रकाश भी अपेक्षित होता है, इस तरह कार्योत्पत्तिमें आंशिक संघर्षसे अधिक प्रकाश एवं अवष्टम्भका महत्त्वपूर्ण हाथ रहता है । हलवांश एवं हलवैशियस अठारहवीं शताब्दीके भौतिकवादियोंके प्रतीक समझे जाते थे । हलवांशकी पुस्तक ' प्रकृति-विश्वास ' है । उसका कहना है कि ' यदि सत्ताका अर्थ है सच्चा स्वरूप तो हमें वस्तुकी सत्ताका कोई ज्ञान नहीं । प्रत्यक्षावलोकनसे तथा तज्जनित स्पन्दन और विचारोंसे हमें भूतका ज्ञान प्राप्त है । इन्द्रियोंके अनुसार विषमेच्छा-अच्छी या बुरी राय कायम करते हैं । उसकी प्रतिक्रियाके अनुसार उसके कुछ गुणोंका परिचय यद्यपि हमें मिलता है, फिर भी भूतकी सत्ता या सच्चे स्वरूपका ज्ञान नहीं होता । मनुष्य भूतोंका ही बना है । अतः भूतोंके अतिरिक्त उसका और कोई विचार नहीं है । अतः भूत ही विचार- शक्ति- सम्पन्न है अथवा भूतका परिणाम ही मनन शक्ति है । ' पृथ्वीके सम्बन्धमें इसका अनुमान है कि ' सम्भव है कि यह एक भूतपिण्ड है, जो किसी नक्षत्रसे विच्छिन्न हो गया होगा अथवा सूर्यस्थित काले बिन्दुओंके विस्तारका ही परिणाम है अथवा बुझी हुई धूमकेतु होगी । ' ऐसे ही वह मनुष्यको भी प्रकृतिकी आकस्मिक उपज होनेकी कल्पना करता है । इस समयके दार्शनिक धर्मके विरोधी थे और बुद्धि एवं अनुभवपर प्रतिष्ठित नीतिके साथ धर्मके सम्बन्धको भयंकर समझते थे; क्योंकि धर्मको वे बुद्धिविरुद्ध एवं नैतिक शिक्षाको कमजोर बनानेवाला मानते थे । हलवांश वासनाको ही वासना पूर्तिकी औषध समझता था । वह वासनाओंका दमन अनावश्यक समझता था । उसका कहना है ' मनुष्यमात्र सुख चाहता है । दुःखसे घबराता है । इसीलिये सुख-साधन भले तथा दुःख- साधन बुरे हैं । कोई सरकार ऐसा कष्ट नहीं उठाती, जिससे उसकी प्रजाको न्याय, भलाई और ईमानदारीमें ही सुविधा मालूम हो । इसके विपरीत अन्यायी दोषी बननेके लिये प्रेरित किया जाता
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५६ मार्क्सवाद और रामराज्य है । प्रकृतिने मनुष्यको बुरा नहीं बनाया । सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिये जिम्मेदार है । ' वाल्टेयरके मतानुसार ' समाज न्याय-अन्यायकी धारणा बिना नहीं रह सकता । ' किंतु हलवांश इसमें ईश्वरकी आवश्यकता नहीं समझता । ' न्याय, संयम, उपकार जीवनके लिये लाभदायक हैं, यह सभी समझ सकते हैं । ' रूसो कहता है, ' फिर भी अपने सुखके लिये कोई मौतका सामना क्यों करेगा? अतः ऐसे स्थलोंका स्वार्थ सामाजिक स्वार्थ ही समझा जाना चाहिये, व्यक्तिगत नहीं । ' १८ वीं शतीके भौतिकवादी समझते थे कि ' भूलसे ही मनुष्यको दुःख होता है, यदि मनुष्य अपने स्वभावपर कायम रहेगा तो सदा सुखी रहेगा । ' सियरवेलके शंकावाद, लंक, कनडिलाक बर्क आदिके इन्द्रियानुभूतिवादसे भौतिकवादको बड़ा बल मिला, हलवेशियसने भी बताया कि ' मनुष्यकी बुद्धिमें प्रकृतिगत समानता, विचारशक्ति तथा उद्योगकी उन्नतिमें एकता तथा पालन-पोषणकी महान् शक्ति स्वाभाविक गुण है । ' इन सबसे समाजवादको बल मिला । सेंट साइमन लूई तथा राबर्ट एडवर्ड लासाल आदिने समाजवादकी रूपरेखा व्यक्त की । यद्यपि ये सभी ईश्वर एवं धर्ममें विश्वास रखते थे । मार्क्स यद्यपि दार्शनिक विचारोंमें हीगेलका शिष्य था, तो भी उसका कहना था कि ' हीगेल सिरके बल खड़ा था । आज मैं उसे पैरके बल खड़ा कर रहा हूँ। ' हीगेल एवं मार्क्सके बीच फायरवाखका दर्शन है ।I इसके कई अंशोंको मार्क्सने ग्रहण किया, कईका खण्डन किया । वीटेने लिखा है- ' ईश्वर मेरा पहला विचार है, ज्ञान दूसरा तथा मनुष्य तीसरा और अन्तिम । ' इसपर फायरवाखने कहा है, ' आदर्शवाद एवं भौतिकवादके झगड़ेका केन्द्र है मनुष्यका मस्तिष्क । मस्तिष्क किस प्रकारकी वस्तुसे बना है, यह मालूम हो जाय, तब अन्य वस्तुओंके सम्बन्धमें विचार स्पष्ट होते हैं । ' उसका यह भी कहना है कि ' अस्तित्व कर्ता है और विचार क्रिया है । विचार अस्तित्वका कार्य है, कारण नहीं । अस्तित्व स्वयं मूल है ।' वह कहता है, ' आदर्शवादी दर्शनका आरम्भ ही गलत है । सच्चे दर्शनका आरम्भ केवल मैंसे न होकर मैं और तुमसे होना चाहिये । यहाँसे