मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 641–650

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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- मार्क्स दर्शन ६३ ९ तो अभाव सभीको सर्वत्र सुलभ ही है । फिर कार्योत्पत्तिमें बाधा न होनेसे सदा ही कार्योत्पत्ति होती रहनी चाहिये । यदि कारण-व्यापारसे पूर्व कार्य असत् हो तो वह किसी तरहसे सत् नहीं बनाया जा सकता । सैकड़ों शिल्पियोंके प्रयत्नसे भी नीलरूप पीत नहीं बनाया जा सकता । यह भी नहीं कहा जा सकता कि सत्त्व- असत्त्व—दोनों ही घटके धर्म हैं; क्योंकि यदि घटधर्मी सत् हो तभी उसके धर्म हो सकते हैं, असत् धर्मीके धर्म कैसे हो सकेंगे? सत्त्व असत्त्व धर्मका आधार माननेपर भी घटादि कार्यको सत् ही कहना पड़ेगा । यदि असत्त्व धर्मका घटकी आत्मा या घटसे सम्बन्ध नहीं है, तो घटको असत् कैसे कहा जा सकता है? तत्सम्बन्धितया तत्स्वरूप होनेसे ही किसी वस्तुमें तद्रूपताकी प्रतीति होती है । अतः कारण- व्यापारके ऊर्ध्व और पहले भी कार्य सत् ही होता है । उसी सत् कार्यकी कारणसे अभिव्यक्ति होती है, जैसे निपीडनद्वारा तिलसे तैल व्यक्त होता है, अवघातद्वारा धान्यसे तण्डुलकी व्यक्ति होती है, दोहनसे गोदुग्ध, उसके मन्थनसे नवनीत अभिव्यक्त होता है, उसी तरह अंकुरादि कार्य भी सत् ही रहते हैं । कारण- व्यापारसे उनकी अभिव्यक्ति सम्भव है, परंतु असत्की उत्पत्तिका कोई भी दृष्टान्त नहीं है । अभिव्यक्त होती वस्तु कहीं भी असत् नहीं देखी जाती । कार्यके लिये प्रतिनियत उपादान कारणोंका ग्रहण किया जाता है । पटार्थी तन्तु, घटार्थी मृत्तिका, कुण्डलार्थी सुवर्ण ढूँढ़ता है । इससे मालूम पड़ता है कि वे कार्य उन -उन कारणोंसे विशेषरूपसे सम्बद्ध रहते हैं । तभी प्रतिनियत कारण ढूँढ़ना संगत हो सकता है । असत् कार्य होगा तो वह किसीसे कैसे सम्बद्ध होगा? यदि कारणसे असम्बद्ध ही कार्य हो तो असम्बद्धता समान होनेसे सब कार्य सभी कारणोंसे उत्पन्न होने चाहिये । फिर अमुक कार्य अमुक कारणसे उत्पन्न होनेका नियम न होना चाहिये । साथ ही कार्य -कारणकी स्पष्ट ही अव्यवस्था होगी । कुछ लोग कहते हैं, ' असम्बद्ध होनेपर भी जो कारण जिस कार्यके उत्पादनमें शक्त होता है, उस कारणसे वही कार्य उत्पन्न होता है । शक्ति

पृष्ठ 642

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६४० मार्क्सवाद और रामराज्य फल-बलसे कल्प्य होती है । अर्थात् जिस कारणसे जिस कार्यकी उत्पत्ति होती दिखती है, उस कार्यकी उत्पत्तिकी शक्ति उसी कारणमें है; यह मालूम पड़ता है । अतः अव्यवस्था नहीं होगी । ' सांख्यवादी सत्कार्यवादी होते हुए भी अचेतन प्रकृतिको ही कारण कहते हैं, परंतु वेदान्ती चेतन ब्रह्मको कारण कहते हैं । जो उत्पत्तिके पहले जिस रूपमें होता है, वह उसीसे उत्पन्न होता है । घट मृत्तिका रूपमें उत्पत्तिसे पहले रहता है; अतः मृत्तिकासे उत्पन्न होता है । तैल उत्पत्तिसे पहले तिल-रूपसे रहता है; अतः तिलसे उत्पन्न होता है । वह सिकता- रूपसे नहीं रहता, अतः सिकतासे नहीं उत्पन्न होता । अतः उत्पत्तिके पहलेका कार्य कारणरूप ही रहता है । उत्पत्तिके पश्चात् भी कार्य कारणसे अभिन्न ही रहता है । इसीलिये श्रुतिने भी इदं पदार्थ कार्य प्रपंचको उत्पत्तिके प्रथम सद्रूप ही बतलाया है -' सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्। असद् वा इदमग्र आसीत्॥ ' यहाँ अव्याकृत या अव्यक्त ही असत्- पदसे कहा गया है, कारण असत् किसी कालसे सम्बद्ध नहीं हो सकता । असत्का आसीत्के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता है; क्योंकि आसीत्से सत्ता बोधित होती है तथा च सत्ता एवं असत्का परस्पर विरोध होनेसे असत्का आसीत्के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता । संसारमें घट, कुण्डल और दधि चाहनेवाले क्रमेण मृत्तिका, सुवर्ण तथा क्षीर ग्रहण करते हैं । दधि चाहनेवाला मिट्टी या घट चाहनेवाला क्षीर नहीं ढूँढ़ता । यह बात सत्कार्यवादमें ही बनती है । यदि उत्पत्तिके पहले कार्य अत्यन्त असत् हो तो असत् तो सर्वत्र ही अविशिष्ट-रूपसे है, फिर क्षीरसे दधि क्यों उत्पन्न होता है, मृत्तिकासे क्यों उत्पन्न नहीं होता? यदि यह माना जाय कि क्षीरमें ही दधिकी कुछ विशेषता है, मृत्तिकामें ही कुछ घटकी विशेषता है, अन्यत्र नहीं है; अतः क्षीरसे दधि तथा मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, तब तो उत्पत्तिसे पहले कार्यकी कोई विशेषता मान्य हो ही गयी, फिर असत् कार्यवाद कहाँ रहा? कारणमें कार्यानुकूल शक्ति माननेपर भी यह विकल्प होगा कि वह शक्ति कारण एवं कार्यसे भिन्न है या अभिन्न? भिन्न है तो भी सती

पृष्ठ 643

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- मार्क्स दर्शन ६४१ ही है या असती? दोनों ही पक्ष ठीक नहीं हैं; क्योंकि अन्य एवं असत् शश- शृंगादि अन्यके नियामक नहीं होते । कार्य- कारण दोनोंसे जैसे असम्बद्ध अन्य है, वैसे ही शक्ति भी, तथापि शशशृंगवत् असत् हो, तब ऐसी शक्तिके आधारपर क्षीरसे ही दधि उत्पन्न हो, मृत्तिकादिसे घट उत्पन्न हो, यह नियम कैसे बनेगा? अतः शक्तिको कारणकी आत्मभूता एवं कार्यको शक्तिका आत्मभूत मानना चाहिये । इस तरह सत्कार्यवाद तथा कारण- कार्यका अभेद भी सिद्ध हो जाता है । कार्य - कारण एवं द्रव्य- गुणादिमें अश्व -महिषवत् भेदबुद्धि नहीं होती; अतः उनका अभेद मानना चाहिये । इसी प्रकार कार्य -कारणका समवाय सम्बन्ध माना जाय, तब भी प्रश्न होगा कि समवाय एवं समवादियोंका सम्बन्ध है या नहीं? यदि सम्बन्ध मान्य है, तब तो अनवस्था-प्रसंग होगा । सम्बन्ध नहीं है, तो असम्बद्ध समवाय कार्य -कारणका नियामक ही कैसे होगा? यदि समवाय स्वयं सम्बन्धरूप होनेसे सम्बन्धान्तरकी अपेक्षा न करे, वह स्वतः सम्बद्ध होकर नियामक होता है, तो संयोगके सम्बन्धमें भी ऐसा ही क्यों न हो? परंतु नैयायिक आदि संयोगको संयोगियोंसे सम्बद्ध करनेके लिये समवाय-सम्बन्ध मानते हैं । यदि संयोग कार्य है और कार्य समवायिकारणजन्य होता है, अतः वहाँ समवाय आवश्यक है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो आत्मा, कालादि नित्य संयोगमें समवाय नहीं अपेक्षित होना चाहिये । किं च सम्बन्धियोंके अधीन ही समवायका निरूपण होता है । फिर भी वह सम्बन्धियोंके भेदसे भिन्न नहीं होता । उनकी उत्पत्ति- विनाशमें उत्पन्न तथा नष्ट नहीं होता, किंतु नित्य एवं एक ही समवाय रहता है, वैसे ही संयोग भी क्यों न हो? किं च कार्य द्रव्य अवयवी है, कारणरूप द्रव्यमें रहता है । यहाँ यह प्रश्न होता है कि सम्पूर्ण अवयवोंमें अवयवी रहता है अथवा व्यस्त पृथक्- पृथक् अवयवोंमें? यदि कहें सम्पूर्णमें, तो अवयवी द्रव्यका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा; क्योंकि समस्त अवयवोंके साथ संनिकर्ष ही अशक्य है । समस्त आश्रयोंमें वर्तमान बहुत्व व्यस्त आश्रयोंके ग्रहणमें नहीं गृहीत होता । यह भी नहीं कहा जा सकता कि अवयवशः समस्त अवयवोंमें कार्य ( अवयवी ) रहता 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_21_1_Front

पृष्ठ 644

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६४२ मार्क्सवाद और रामराज्य है; क्योंकि इस तरह तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न अवयवीके अवयव मानने पड़ेंगे, जिनके द्वारा आरम्भक अवयवोंमें अवयवी रहता है । जैसे म्यानके अवयवोंसे भिन्न अपने अवयवोंद्वारा तलवार म्यानमें व्याप्त होती है । किंतु इस तरह अनवस्था-दोष होगा; क्योंकि उन अवयवोंमें भी रहनेके लिये कार्यके अन्य अवयव मानने पड़ेंगे । यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवीको मानें, तब तो एक अवयवमें जब अवयवी रहेगा, उस समय अन्य अवयवोंमें नहीं रहेगा; क्योंकि देखते ही हैं, जब देवदत्त काश्मीरमें रहता है, उसी समय काशीमें नहीं रहता । यदि एक कालमें अनेकों स्थलोंमें अस्तित्व कहा जायगा तो अवश्य ही अवयवीका नानात्व हो जायगा । जैसे काशी, काश्मीरमें रहनेवाले चैत्र, मैत्र अनेक ही होते हैं । फिर भी कहा जाता है कि जैसे गोत्व जाति प्रत्येक व्यक्तिमें होनेपर भी प्रत्येकमें गृहीत होती है, फिर भी एक ही है । उसी तरह अवयवी प्रत्येक अवयवमें रहते हुए उपलब्ध होगा और एक ही रहेगा, परंतु यह सब कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी पूर्णरूपसे उपलब्ध होगा, तब तो गोके श्रृंगसे भी स्तनका कार्य एवं पुच्छसे पृष्ठका कार्य होना चाहिये, किंतु ऐसा होता नहीं, अतः कारणसे अभिन्न ही कार्य है । यदि कार्य उत्पत्तिके पहले असत् है, तब तो वह उत्पत्ति क्रियाका कर्ता भी नहीं बनेगा । उत्पत्ति भी एक क्रिया है । क्रिया कभी अकर्तृका नहीं होती । घटकी उत्पत्तिका कर्ता घट ही होता है । ' घट उत्पद्यते ' घट उत्पन्न होता है, ऐसा ही व्यवहार सर्वसम्मत है । यदि घटोत्पत्तिके कर्ता कुलालादि हों, तब तो ' कुलालादय उत्पद्यन्ते ' कुलालादि उत्पन्न हो रहे हैं, ऐसा व्यवहार होना चाहिये । स्पष्टरूपसे कुलालादिकी उत्पद्यमानता नहीं प्रतीत होती । घटकी उत्पद्यमानता प्रतीत होती है । कुछ लोग कहते हैं स्वकारण एवं सत्ताके साथ सम्बन्ध ही कार्यकी उत्पत्ति है, परंतु यदि कार्य स्वयं असत् है, निरात्मक है, तब उसका किसीके साथ सम्बन्ध भी क्या होगा? क्योंकि दो सत्का ही सम्बन्ध होता है, सत् तथा असत्का 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_21_1_Back

पृष्ठ 645

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- मार्क्स दर्शन ६४३ एवं दो असत्का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त अभाव या असत् निरुपाख्य असत् ही होता है, तब उत्पत्तिके प्रथम कार्य असत् था- यह मर्यादाकरण भी नहीं बन सकता । यह व्यवहार नहीं होता कि अमुक राजाके पहले वन्ध्यापुत्र राजा था । यदि कारकव्यापारसे वन्ध्यापुत्र, खपुष्प भी उत्पन्न हो सके तभी यह कहा जा सकता है कि उत्पत्तिके पहले असत् कार्य कारकव्यापारसे उत्पन्न हुआ है । कहा जा सकता है कि जैसे प्रथमसे ही सिद्ध होनेसे कारणकी स्वरूपसिद्धिके लिये कोई व्यापृत नहीं होता तो उसी तरह यदि कारकव्यापारके पहले भी कार्य स्वरूपसिद्ध ही हो तो उसके लिये कौन व्यापृत होगा? कारणसे यदि कार्य अनन्य ही है, तब कारणके समान ही कार्यके लिये भी कारकव्यापार नहीं होना चाहिये, परंतु व्यापार देखा जाता है, अतः कारकव्यापारकी सार्थकताके लिये उत्पत्तिके पहले कार्यका अभाव मानना उचित ही है । किंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि कारणको कार्याकारसे व्यवस्थापन करनेके लिये ही कारकव्यापार अपेक्षित होता है । वह कार्याकार कारणका आत्मभूत ही है; विशेष दर्शनमात्रसे वस्तुभेद नहीं होता । देवदत्त हाथ- पाँव फैलाने या संकुचित करनेसे भिन्न नहीं हो जाता है; क्योंकि ' स एवायम्' वही यह है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) होती है । प्रतिदिन ही पिता, माता, भ्राता आदिमें ह्रास -विकास आदि होते रहते हैं । फिर भी वस्तुभेद नहीं प्रतीत होता; क्योंकि पिता- माता, भ्राताकी एक रूपसे प्रत्यभिज्ञा होती रहती है । यदि कहा जाय कि वहाँ जन्मका व्यवधान न होनेसे ही अभेद प्रतीत होना ठीक है, परंतु कार्य- कारणमें ऐसा नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि यहाँ तो कारण बीज, मृत्पिण्डादिका नाश एवं अंकुर, घटादिकी उत्पत्ति होती है, अतः प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ भी कारण नाश आदि नहीं अनुभूत होता । क्षीरादिका दधि आदि रूपसे संस्थान प्रत्यक्ष दिखायी देता है । वट- बीजादिसे समान जातीय अवयवोंके उपचयद्वारा अंकुर वृक्षादिकी उत्पत्ति एवं अवयवोंके अपचयसे विनाशका व्यवहार होता है । वस्तुतः कारणका विनाश और कार्यकी उत्पत्ति यहाँ 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_21_2_Front

पृष्ठ 646

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६४४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी नहीं है । जैसे मृत्पिण्डके अवयव घटमें अन्वित हैं, वैसे ही वटबीजके अवयव वटबीज भी अन्वित हैं । इस तरहके अवयवोपचय तथा अवयवापचयसे यदि वस्तुमें भिन्नता हो और इसीसे सत्की उत्पत्ति तथा सत्का विनाश हो तो गर्भस्थ तथा पर्यंकस्थ शिशुमें भी भेद कहना पड़ेगा और बाल्ययौवनादि शरीरमें भी भेद कहना पड़ेगा; क्योंकि अवयवोंका उपचय- अपचय वहाँ भी देखा ही जाता है । फिर तो पित्रादि व्यवहार भी बाधित होगा । इस तरह सत्कार्यवादमें तो कारणको कार्याकाररूपसे व्यवस्थापन करनेमें कारकव्यापार सार्थक है, परंतु असत्-कार्यवादमें तो कारकव्यापार सर्वथा निर्विषय हो जायँगे । जैसे आकाशके हननके लिये खड्ग आदिका प्रयोग व्यर्थ है, वैसे ही कार्याभाव या असत्में भी कारकव्यापार व्यर्थ होंगे । कहा जाता है कि समवायी कारणमें अर्थात् तन्तु-मृत्तिका आदि कारकव्यापार होगा, परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्यविषयक व्यापारसे अन्यकी निष्पत्ति असम्भव है । अन्यता यदि समान ही है तो फिर सिकता - विषयक व्यापारसे भी पट क्यों नहीं उत्पन्न होता? जो कहते हैं कि समवायी कारणका ही आत्मातिशय कार्य है, उन्हें तो सत्कार्यवाद मानना ही पड़ेगा । अतः क्षीर आदि द्रव्य ही दध्याद्याकारसे अवस्थित होकर कार्य - द्रव्यके रूपमें व्यवहृत होते हैं, वेदान्तमतानुसार तो मूल कारण परब्रह्म ही घटादि अन्तिम कार्यपर्यन्त उस -उस कार्यके आकारसे नटवत् सर्वव्यवहारका आस्पद होकर प्रतीत होता है । जैसे लपेटा हुआ वस्त्र स्पष्ट नहीं दीखता, फैला हुआ स्पष्ट दीखता है, उसी तरह कारणावस्थित कार्य स्पष्ट नहीं उपलब्ध होता, कार्यावस्थित होकर स्पष्ट दीखता है । यह भी शंका होती है कि लोकमें कुलाल घट आदि कार्योंके लिये मृत्तिका, दण्ड-चक्रादिका संग्रह करते हैं, परंतु ब्रह्म बिना सामग्री - संग्रहके किस तरह विश्वनिर्माण कर सकेगा? परंतु जैसे क्षीर स्वभावसे दधिनिर्माणक्षम होता है, जल हिमरूपसे परिणत हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म भी प्रपंचात्मक व्यक्त हो जाता है । यद्यपि औष्ण्य, शैत्य आदिकी अपेक्षा करके ही क्षीर, नीर आदि दधि, हिम आदि रूपमें परिणत होते हैं, तथापि 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_21_2_Back

पृष्ठ 647

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- मार्क्स दर्शन ६४५ इन साधनोंसे केवल शीघ्रता -सम्पादन की जाती है । यदि स्वयं दधि आदि बननेकी शक्ति न होती तो बाह्य साधनोंसे भी क्षीर आदि दधि आदि नहीं बन सकते । इसीलिये वायु, आकाश आदिसे दधि नहीं बनता; क्योंकि उनमें दधि बननेका स्वभाव नहीं है । जैसे ऋषि, मुनि, देवादि बाह्य साधनोंके बिना ही विविध शरीरों एवं प्रासाद आदिका निर्माण कर सकते हैं, तन्तुनाभ ( मकड़ी ) बिना बाह्य साधनके तन्तु- निर्माण करती है, बलाका ( बगुली ) बिना शुक्रके ही घन-गर्जन - श्रवणसे गर्भ धारण करती है, कमलिनी बिना किसी गमन-साधनके ही दूसरे सरोवरमें पहुँच जाती है, उसी तरह बाह्य साधन बिना चेतनब्रह्म भी विश्वकी रचना करता है । यद्यपि कहा जा सकता है कि देवादिका अचेतन शरीर ही अन्य शरीरका कारण है । यहाँ अचेतन ही कारण है, मकड़ीका मुखलालादि ही कठोर होकर तन्तु बन जाता है, बलाका भी गर्जन - श्रवणसे गर्भ धारण करती है, यहाँ भी बाह्य निमित्त है ही । इसी तरह पद्मिनी चेतनप्रयुक्त अचेतन शरीरसे ही दूसरे सरोवरमें जाती है, जैसे लता वृक्षपर आरूढ़ होती है, तथापि कुलालादिसे विलक्षणता तो इन कारणोंमें स्पष्ट ही है । वस्तुतः लक्षण एवं प्रमाणसे ही वस्तुकी सिद्धि होती है । जो-जो पदार्थ प्रमाण-सिद्ध होते हैं, उन्हींका अस्तित्व माना जाता है । विज्ञान आदिके प्रयोगद्वारा भी ज्ञान ही सम्पादन किया जाता है । विश्व, राष्ट्र या देहादि प्रपंच तथा भूतप्रकृति आदि भी प्रतीत होते हैं, प्रमाण सिद्ध हैं, तभी उनका अस्तित्व माना जाता है । तथा च जैसे नील, पीत, हरितरूपका प्रकाशक प्रकाशरूपसे प्राक् सिद्ध है, वैसे ही भूतादि प्रपंच, प्रमेय, प्रमाण तथा प्रमाता — इन सबका भी भासक अखण्ड बोधरूप साक्षी उन सबसे प्रथम सिद्ध है । जड़भूतकी सिद्धि तो चेतन साक्षीके परतन्त्र है, परंतु प्रमाण, प्रमाता या साक्षीको उनकी सिद्धिके लिये किसी जड़की अपेक्षा नहीं होती । जैसे घटादिके प्रकाशके लिये भले ही सूर्यकी अपेक्षा हो, परंतु सूर्यके प्रकाशके लिये घटादिकी अपेक्षा नहीं, उसी तरह भूत आदि सिद्धिके लिये प्रमाण, साक्षी आदिकी अपेक्षा है; परंतु प्रमाण आदिकी

पृष्ठ 648

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६४६ मार्क्सवाद और रामराज्य सिद्धिके लिये जडभूतादिकी अपेक्षा नहीं । संसारमें प्रकाशके सम्पर्कसे या प्रकाशरूप होनेसे ' प्रकाशित होता है, ' ऐसा व्यवहार होता है । ' प्रकाशः प्रकाशते, घटः प्रकाशते ' –ये ही दोनोंके उदाहरण हैं, इसी तरह स्वप्रकाश चेतनमें सूर्यादिके समान प्रकाश स्वरूप होनेसे ' प्रकाशते ' का व्यवहार होता है । ' प्रपञ्चः प्रकाशते ' में ' घटः प्रकाशते ' के समान चेतन सम्पर्कसे ' प्रकाशते ' का व्यवहार होता है । इस तरह परतन्त्र एवं अस्वत:सिद्ध जडभूतसे चेतनकी उत्पत्ति माननेकी अपेक्षा स्वतन्त्र स्वत: सिद्ध चेतनसे जडभूतकी सिद्धि कहीं श्रेष्ठ तथा बुद्धिगम्य है । भौतिकवादी तथा प्रकृतिवादियोंका कहना है कि ' अचेतन प्रपंचका अचेतन प्रकृति या भूतादि ही कारण हैं, चेतन ब्रह्म या ईश्वर कारण नहीं हो सकता । जैसे घट आदि कार्योंमें मृत्तिका अन्वित होती है, वैसे ही प्रपंचमें जड़ता या सुख, दुःख, मोहकी अन्विति प्रतीति होती है । ' परंतु यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि यदि दृष्टान्तबलसे ही यह सिद्ध करना है, तब तो यह भी कहा जा सकता है कि संसारमें कहीं भी चेतनसे अधिष्ठित हुए बिना स्वतन्त्ररूपसे अचेतन कोई पुरुषार्थ सम्पादन नहीं कर सकता । प्रज्ञावान् शिल्पीलोग ही गृह, प्रासाद, वायुयान आदिका निर्माण करते हुए देखे जाते हैं । उसी तरह कहा जा सकता है कि नानाकर्म - फलोपभोग योग्य बाह्य आध्यात्मिक विविध वैचित्र्ययुक्त संसार बड़े - बड़े शिल्पी जिसे मनसे भी कल्पना नहीं कर सकते, उसे अचेतन प्रकृति या भूत किस तरह रच सकते हैं? जड लोष्ट- पाषाण जैसे स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकते, वैसे ही प्रकृति भूतादि भी स्वतन्त्ररूपसे विश्व- निर्माणमें असमर्थ हैं । कुम्भकारादिसे अधिष्ठित ही मृत्तिकादिसे घटादि बनते हैं, उसी तरह भूत या प्रकृति भी चेतनसे अधिष्ठित होकर ही कोई कार्य कर सकते हैं । फिर यह भी तो नहीं कहा जा सकता कि जड घटका कारण जड मृत्तिका है । अतः जड विश्वका भी जड ही कारण होना चाहिये; क्योंकि उसके विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि ' चेतन कुलाल जैसे मृत्तिकासे घट बनाता है,

पृष्ठ 649

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- मार्क्स दर्शन ६४७ वैसे ही चेतन ब्रह्म ही जड प्रकृति, परमाणु आदिसे जगत् बनाता है । ' सुख, दुःख आदि आन्तर हैं, बाह्य शब्दादि उनके निमित्त हो सकते हैं, परंतु सुखादिरूप नहीं हो सकते । विशिष्टकार्य किसी प्रेक्षावान्द्वारा ही निर्मित देखा जाता है, अतः अवश्य ही प्रपंच भी वैसे ही होना चाहिये । प्रकृतिकी साम्यावस्थासे प्रच्युति भी बिना चेतनके होना असम्भव है । यह भी कहा जा सकता है कि ' केवल चेतनकी भी प्रवृत्ति नहीं दृष्ट है, परंतु चेतनयुक्त रथादि अचेतनकी प्रवृत्ति तो देखी ही गयी है । अचेतनयुक्त चेतनकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । अतः विचारणीय विषय यह है कि जिसमें प्रवृत्ति दृष्ट है, उसकी प्रवृत्ति मानी जाय या जिसके सम्बन्धसे प्रवृत्ति हो रही है, उसकी प्रवृत्ति मानी जाय? यदि कहा जाय कि जिसमें प्रवृत्ति दृष्ट है, उसीकी मानी जाय; क्योंकि दोनों ही प्रत्यक्ष हैं, जैसे रथादि प्रवृत्तिके आश्रयरूपसे प्रत्यक्ष हैं, वैसे ही केवल चेतन प्रवृत्तिके आश्रयरूपसे प्रत्यक्ष नहीं है । किंतु प्रवृत्तिके आश्रयभूत देहादि संयुक्त ही चेतनके सद्भावकी सिद्धि होती है; क्योंकि केवल अचेतन रथादिकी अपेक्षा जीवित देहमें विलक्षणता दृष्ट है, परंतु सद्भावमात्रसे प्रवृत्तिके प्रति चेतनकी हेतुता नहीं सिद्ध होती, जैसे सद्भावमात्रसे घटादिके प्रति आकाशकी निमित्तता नहीं सिद्ध होती । अतः प्रवृत्तिमें चेतन हेतु नहीं है । इसीलिये प्रत्यक्ष देहके रहनेपर ही प्रवृत्ति एवं चैतन्यका उपलम्भ होता है । देह न रहनेपर चैतन्यका भी उपलम्भ नहीं होता । अतः देहका ही धर्म प्रवृत्ति एवं चैतन्य है, यह चार्वाक कहते हैं । इस दृष्टिसे अचेतनकी ही प्रवृत्ति सिद्ध होती है । ' इसपर अध्यात्मवादीका कहना है कि भले ही जिस देहमें प्रवृत्ति दिखायी देती है, उसीकी प्रवृत्ति मानी जाय; परंतु वह चेतनसे ही होती है; क्योंकि चेतनके रहनेपर ही प्रवृत्ति होती है, चेतनके न रहने प्रवृत्ति नहीं होती । यद्यपि काष्ठादिके आश्रय ही दहन, प्रकाशन आदिरूप क्रियाएँ देखी जाती हैं, केवल अग्निमें दहन, प्रकाशनादि नहीं उपलब्ध होते । चन्द्र, सूर्य, विद्युत्– सभी प्रकाश जलीय एवं पार्थिव -काष्ठ, लोहादिके ही आश्रित हैं, तथापि अग्निसे दाह-प्रकाश आदि होते हैं; क्योंकि

पृष्ठ 650

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६४८ मार्क्सवाद और रामराज्य अग्निसंयोग होनेसे ही काष्ठादिमें दाहकत्वादि होते हैं, अग्निवियोग होनेपर काष्ठादिमें दाह -प्रकाशादि उपलब्ध नहीं होते । चार्वाक भी चेतन देहके सम्पर्कसे ही अचेतन रथ आदिकी प्रवृत्ति मानते हैं । अतः चेतनकी प्रवर्तकतामें विवाद नहीं है । कहा जा सकता है कि कर चरणादियुक्त प्राणी अपने व्यापारसे ही अचेतनका प्रवर्तक होता है । इधर ब्रह्मरूप चेतन तो प्रवृत्तिशून्य, कूटस्थ, नित्य है, वह कैसे प्रवर्तक होगा? परंतु इसका समाधान यह है कि जैसे अयस्कान्त मणि एवं सुन्दररूप आदि स्वतः प्रवृत्तिरहित होनेपर ही लोह तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके प्रवर्तक होते हैं । वैसे ही प्रवृत्तिरहित ब्रह्म भी अचेतनका प्रवर्तक होगा । कुछ लोग कहते हैं कि ' जैसे अचेतन क्षीरकी वत्सवृद्धिके लिये स्वतः प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार अचेतन जलवायु आदिमें भी स्वतः लोकोपकारके लिये प्रवृत्ति होती है । ' परंतु यह भी ठीक नहीं । यदि उभयवादिसम्मत रथ आदिमें चेतनाधिष्ठित प्रवृत्ति दृष्ट है, तब तो उसी दृष्टान्त क्षीर-जल आदिकी प्रवृत्तिमें भी चेतनाधिष्ठित होनेका अनुमान किया जा सकता है — ‘ जलादीनां प्रवृत्तिश्चेतनाधीना अचेतनप्रवृत्तित्वाद् रथादिप्रवृत्तिवत् । ' रथादिके समान अचेतनकी प्रवृत्ति होनेसे जलादिकी प्रवृत्ति चेतनाधीन है । क्षीरका प्रवर्तक तो चेतन धेनु ही है । ' योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरः, योऽपोऽन्तरः यमयति ' ( बृहदा० उप० ३ । ७।४ ) 'एतस्य " वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते ' (बृ० उ० ३।८।९ ) यह श्रुति कहती है कि अन्तर्यामी चेतन जलके भीतर रहकर उसका नियमन करता है, उसीके शासनसे नदियाँ बहती हैं । वत्सके चोषणसे भी दुग्धकी प्रवृत्ति होती है, जलके प्रवाहणके लिये निम्नभूमि प्रदेश आवश्यक होता है, चेतनापेक्षा तो सर्वत्र है ही । आधुनिक महायन्त्रोंमें भी मूल प्रवर्तक चेतन रहता ही है । कुछ लोग कहते हैं, तृण-पल्लवादि दूसरे निमित्तोंकी अपेक्षा बिना ही स्वभावसे ही क्षीरादिके रूपमें परिणत होते हैं, उसी तरह प्रकृति या भूत भी स्वभावसे ही विविध प्रपंचाकारसे परिणत होता है; क्योंकि क्षीर आदि बननेमें दूसरा कोई निमित्त उपलब्ध नहीं होता । यदि कोई निमित्त