मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 651–660
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660
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- मार्क्स दर्शन ६४९ होता, तब तो उन -उन निमित्तोंको लेकर यथेष्ट क्षीर बनाया जा सकता था । परंतु यह भी कथन ठीक नहीं है, तृणादिका क्षीर आदि परिणाम निष्कारण नहीं है । धेनुसे खाये हुए तृणादिसे ही क्षीर बनता है । यदि धेनु दुग्ध बननेका असाधारण निमित्त न होती तो धेनुसे अनुपभुक्त या वृषभ आदिसे उपभुक्त तृणसे भी क्षीर बनना चाहिये था । अतएव धेनु आदि निमित्तोंको लेकर दुग्ध यथेष्ट बनाया ही जा सकता है । धेनु एवं उसकी उदर-वह्नि आदि ही तृणादिको क्षीर बनाती हैं । अधिक दुग्ध चाहनेवाले धेनुको पर्याप्त दाना -घास देकर उसे प्राप्त करते हैं । संसारमें कई वस्तुएँ मानुष-सम्पाद्य वस्तुएँ होती हैं और कई देवसम्पाद्य होती हैं । जो लोग प्रकृति- भूतों या परमाणुओंमें भी चेतन शक्तिकी कल्पना करते हैं, वे तो फिर जडवादी नहीं रह जाते । साथ ही अनेक चेतन परमाणुभूत या परमाणु विद्युत्को कारण माननेकी अपेक्षा लाघवार्थ एक व्यापक सर्वशक्ति चेतन ईश्वरको ही कारण मानना कहीं श्रेष्ठ है । जड परमाणुओंसे संयुक्त होकर कार्यारम्भके लिये कर्म अपेक्षित होगा । देखा जाता है कि तन्तुओंमें कर्म (हलचल) होता है । तभी संयोग आदिद्वारा पटादिकी उत्पत्ति होती है । कर्म भी कार्य है, अतः उसका भी कोई निमित्त चाहिये । यदि कोई निमित्त न होगा, तो परमाणुमें आद्यकर्म ही नहीं होगा । यदि लोकानुसार प्रयत्न या अभिघातादि परमाणु कर्मका निमित्त मान्य है, तब तो तदर्थ चेतन ईश्वर मानना ही युक्त है । कहा जाता है कि ' ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपंचकी उत्पत्ति इसीलिये नहीं हो सकती कि प्रपंच ब्रह्मसे विलक्षण है । सुवर्णसे उत्पन्न मुकुट-कुण्डलादिमें, मृत्तिकासे उत्पन्न घटादिमें समानता होती है । मृत्तिकासे मुकुट -कुण्डलादि नहीं बनते । जगत् अचेतन है, अतः इसका कारण भी अचेतन होना ठीक है । इसी तरह ज्ञानसे विलक्षण होनेसे प्रपंच ज्ञानका कार्य नहीं । प्रीति, परिताप, विषादका हेतुभूत प्रपंच चेतनका कार्य नहीं हो सकता, किंतु प्रकृतिका ही कार्य होना चाहिये । विपरीत दृष्टान्त भी मिलते ही हैं । लोकमें चेतनत्वेन प्रसिद्ध पुरुष, पशु आदिसे विलक्षण केश, नख आदिकी उत्पत्ति होती है तथा अचेतनत्वेन प्रसिद्ध गोमय, केश,
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६५० मार्क्सवाद और रामराज्य काष्ठ आदिसे वृश्चिक, यूका, दीमकादिकी उत्पत्ति होती है ।' इसपर भी कहा जा सकता है कि वस्तुतः अचेतन शरीरोंसे ही अचेतन केश आदिकी उत्पत्ति होती है । इसी तरह गोमयादिसे वृश्चिकादिके अचेतन शरीरकी उत्पत्ति होती है । तो भी उक्त दृष्टान्तोंसे कारण कार्योंकी विलक्षणता तो सिद्ध ही हो जाती है । गोमयकी अपेक्षा वृश्चिक शरीरमें शरीरकी अपेक्षा केश आदिकी विलक्षणता भोगायतन और भोगानायतनरूपसे स्पष्ट ही है । कारण-कार्यमें अति समानता होनेसे तो कार्य कारणभाव ही नहीं होता । कुछ समानता तो इधर भी है ही । ब्रह्मगत सत्ता स्फूर्ति जगत्में भी अनुगत है ही । मार्क्सवादी तो स्वयं ही अचेतनभूतसे चेतनाकी उत्पत्ति मानते हैं । वे भी गोमयादिसे वृश्चिकादिकी उत्पत्तिका दृष्टान्त उपस्थापित करते हैं । इस दृष्टिसे भी चेतन ब्रह्मसे तद्विलक्षण अचेतन प्रपंचकी उत्पत्तिमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । किंच जैसे पृथ्वीत्व जातियुक्त पाषाणोंमें ही हीरक, पद्मराग आदि बहुमूल्य रत्न होते हैं, कोई मध्य वीर्यके सूर्यकान्त आदि मणि होते हैं, कोई कुत्ता, बगुला, कौवाके हटानेके लायक सामान्य पाषाण होते हैं, बीजोंसे ही बहुविध पत्ते, पुष्प, फल, गन्ध, रसादि विचित्र वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, वैसे सभी बीज पार्थिव ही हैं । फिर पृथक् बीजोंसे पृथक् ढंगके पत्र, पुष्प, फल, रसादि उत्पन्न होते हैं । एक ही अन्नरसके लोहितादि, रस, केश, नख आदि विचित्र कार्य होते हैं । उसी तरह एक ही ब्रह्मसे विविधवैचित्र्योपेत प्रपंचका निर्माण होता है । बौद्धलोग सम्पूर्ण प्रपंचको उत्पत्तिके पहले असत् कहते हैं, अर्थात् सत्के अभावको ही विश्वका मूल कारण कहते हैं । इस कथनमें यह असंगति है कि असत् है या असत् था । इस प्रकार असत् या अभावके साथ अस्तित्वका सम्बन्ध कैसे होगा? क्योंकि सत्के साथ ही सत्का सम्बन्ध हो सकता है । खपुष्पके तुल्य असत् या अभावके साथ सत्ताका सम्बन्ध सम्भव नहीं । इसी तरह प्रमाण या प्रमाता होनेपर ही भाव या अभावका बोध हो सकता है । यदि प्रमाता एवं प्रमाणका अस्तित्व था, तब तो असत् या अभाव कैसे कहा जा सकेगा? क्योंकि प्रमाता और
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- मार्क्स दर्शन ६५१ प्रमाणका ही अस्तित्व था । यदि प्रमाता- प्रमाण नहीं थे, तब तो फिर अभाव या असत्का प्रबोध भी कैसे हो सकता था? बीजके उपमर्दन होनेसे अंकुरकी उत्पत्ति होती है, यह देखकर बौद्धलोग अभावसे ही अंकुरादि कार्योंकी उत्पत्ति कहते हैं, परंतु यदि ऐसी बात होती, तब तो बीजके दाहसे भी अंकुरकी उत्पत्ति होनी चाहिये; क्योंकि बीज- दाहमें भी तो बीजका उपमर्दन या अभाव हुआ ही । अतः बीजके अवयव ही अंकुरके कारण हैं । बीज अंकुरोत्पत्तिके पूर्वकी अवस्था है । जैसे घटोत्पत्तिके पहले मृत्तिकाकी पिण्डावस्था होती है । पिण्डमें घटमें, कपालमें जो व्यापक है, वह मृत्तिका ही सबका कारण है । पिण्डादि सब मृत्तिका कार्य ही हैं । उसी तरह बीजावयव ही बीज एवं अंकुरादिमें व्यापक होनेसे वही कारण है । पिण्ड या बीज, घट- अंकुरादिमें व्यापक नहीं हैं, अतः वे कारण नहीं हैं । एक कारणमें युगपत् विरुद्ध अनेक कार्य नहीं हो सकते, अतः एक कारणसे होनेवाले कार्योंमें क्रमभाविता है । पिण्ड, घट, कपाल, बीज, अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखोपशाखादि कार्य क्रमसे ही होते हैं । जो कहते हैं कि पिण्ड, कपालादि कार्योंसे भिन्न होकर कारण मृत्तिका कुछ भी नहीं है, उन्हें अन्वय- व्यतिरेकादि प्रमाणोंपर अवश्य ध्यान देना चाहिये । जैसे पुष्पोंके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी उनमें अनुवृत्त सूत्र उनसे भिन्न होता है, वैसे ही पिण्ड, घट, कपालादिके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी सबमें अनुवृत्त मृत्तिका स्पष्ट ही उन कार्योंसे पृथक् है । अतः इस कारणको असत् नहीं कहा जा सकता । इसी तरह उत्पत्तिके पहले कार्य भी सत् ही रहता है । जैसे अविज्ञात ही घट विज्ञात होता है, वही ज्ञायमान होता है और वही विस्मृत होता है और फिर उसीका स्मरण भी होता है । इसी तरह सामग्रीके अभावसे या कुड्यादि दीवाल आदि आवरणसे वर्तमान रहता हुआ भी घट प्रतीत नहीं होता है । पिण्डमें घट रहता हुआ भी आवृत्त होनेसे उपलब्ध नहीं होता । जैसे एक ही आकाशमें चान्द्र प्रकाश सौर्य प्रकाशसे आवृत्त होता है, एक ही घटमें नीर क्षीरसे आवृत्त होता है, वैसे ही एकदेशस्थ ही घट पिण्डसे आवृत्त रहता है ।
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६५२ मार्क्सवाद और रामराज्य एक ही मिट्टीमें पिण्ड आदि सहस्रों कार्य हैं, जिसकी अभिव्यक्तिकी सामग्री उपस्थित होती है, वही अभिव्यक्त होता है, अन्य आवृत्त रहते हैं । इस तरह पिण्डसे घट, घटसे कपाल, कपालसे घट आदि आवृत्त होते हैं । लोकमें अनेक ढंगसे अभिव्यक्ति होती है, दीपसे रूपकी अभिव्यक्ति होती है । दण्ड, चक्र, कुलालादिसे घट अभिव्यक्त होता है । जैसे दीपसे आवरण- नाशके अतिरिक्त घट सप्रकाश बनाया जाता है, वैसे ही कुलालादिद्वारा आवरणभंगके साथ घटाभिव्यक्ति हो जाती है । इसीलिये शिलाघातसे पिण्ड- भंग होनेपर भी कुलालादि बिना घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती । जैसे अज्ञातताकी निवृत्तिके लिये प्रमातालोग प्रमाणका उपादान करते हैं, प्रमाणके सम्बन्धसे प्रमेयकी अज्ञातता नष्ट होती है, प्रमातासे प्रमाणकी अभिव्यक्ति होती है । निष्पन्न प्रमाण प्रमेयसे संगत होकर उसी तरह प्रमेयाकार हो जाता है, जैसे कुल्या ( नहर ) -का जल नालियोंद्वारा क्षेत्रमें जाकर क्षेत्राकार हो जाता है, प्रमाणके प्रमेयाकार होनेसे अज्ञातताके नष्ट होनेसे प्रमेयकी अभिव्यक्ति होती है । इसी तरह दीपप्रकाशसे घट सप्रकाश होता है । वही घटनिष्ठ प्रकाश घटनिष्ठ तमका अपनोदन करता है । इसी तरह मृत्तिकामें स्थित घटाकार दण्ड-चक्रादिसे स्फुट होता है । शिलादिसे पिण्डभंग होनेपर दूसरे चूर्णादि कार्य सम्पन्न हो जाते हैं, वे भी घटके आवरण ही हैं, अतः घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती । इसीलिये भिन्न-भिन्न घटादि कार्योंकी अभिव्यक्तिके साधन नियत हैं । प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि भी अन्योन्याभावके तुल्य ही भावरूप हैं । जैसे घटान्योन्याभाव घटरूप ही है, वैसे ही प्रागभाव पिण्डरूप है । प्रध्वंसाभाव कपालादिरूप है । भावान्तर ही किसी दृष्टिसे अभाव कहा जाता है— ' भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया । ' जो प्रागभाव, प्रध्वंसाभावको शून्य ही कहता है, उससे यह भी प्रश्न होगा कि उन दोनोंमें भेद है या नहीं? यदि कहा जाय कि भेद नहीं है, तो भेद- व्यवहार क्यों है? अगर भेद है तो उन दोनोंका भेदक क्या
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- मार्क्स दर्शन ६५३ है? अगर विलक्षण स्वरूपको ही भेदक कहें तो भी ठीक नहीं; क्योंकि शून्यमात्रमें विलक्षणस्वरूपता क्या हो सकती है? विलक्षणस्वरूपता हो तो शून्यता भी कैसी होगी? शून्यके साथ उपाधि सम्बन्ध भी नहीं बन सकता, अतः औपाधिक भेद भी नहीं कहा जा सकता । ' घट-प्रभावकी पिण्ड ही उपाधि है ' ऐसा कहें तो उसमें प्रमाण बतलाना पड़ेगा । यदि प्रत्यक्ष-प्रमाण कहें, तो भी ठीक नहीं, कारणरूप तथा स्पर्शहीन प्रागभावके साथ चक्षु आदिका सम्बन्ध सम्भव नहीं है । अतः प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता । यदि पिण्डके दर्शनसे ही प्रागभावका दर्शन मानें, तब तो प्रागभावके भाव रूप माननेसे ही सब काम चल ही सकता है । ' स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मकम्' इस दृष्टिसे अभाव या असत्से जगत् या कार्यकी उत्पत्ति असंगत है, किंतु स्वप्रकाश चेतन ब्रह्मसे ही पूर्वोक्त युक्तियोंसे जगत्की उत्पत्ति संगत है । इसी तरह अचेतन अदृष्ट आदि भी चेतनके बिना कर्मके कारण नहीं हो सकते । परमाणु यदि सावयव हैं, तब तो वे भी कार्य एवं अनित्य ही होंगे । उनकी उत्पत्तिमें कारणान्तर ढूँढ़ना पड़ेगा । यदि निरवयव हैं, तब तो उनका दूसरे परमाणुओंसे संयोग होनेपर परिमाणवृद्धि न होगी; क्योंकि एक देशसे संयोग होनेपर तो संयोगसे अव्याप्त देशोंद्वारा प्रथिमा ( विस्तार ) हो सकता है, परंतु इस दशामें सावयवत्व, अनित्यत्वादि दोष होते हैं । निरवयवका तो सम्पूर्णरूपसे ही अव्यवधानेन संयोग मानना होगा तथा च एक- दूसरेहीमें समा जायँगे, वृद्धिकी कोई आशा नहीं होती । इसके अतिरिक्त संसारमें प्रदेशवाले पदार्थोंका ही संयोग होता है, फिर निष्प्रदेश निरवयव परमाणुओंका संयोग भी कैसे होगा? इसी तरह परमाणुओंको प्रवृत्तिस्वभाव, निवृत्तिस्वभाव, उभयस्वभाव या अनुभय - स्वभाव मानना पड़ेगा, परंतु इनमें कोई पक्ष ठीक नहीं है । प्रवृत्तिस्वभाव है, तब तो नित्य ही प्रवृत्ति होनेसे वस्तुनाशरूप प्रलय नहीं होगा । निवृत्तिस्वभाव होनेसे कभी सृष्टि न होगी । विरोधात् उभयस्वभाव भी नहीं कहा जा सकता । अनुभयस्वभाव कहेंगे, तब तो दूसरे किसी निमित्तसे उनकी प्रवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर वही सर्वज्ञ
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६५४ मार्क्सवाद और रामराज्य चेतन अपेक्षित होगा । इसके अतिरिक्त लोकमें रूपादिमान् वस्तु अपने कारणकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होती है । जैसे पट तन्तुओंकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होते हैं । अंशुओंकी अपेक्षा तन्तु स्थूल तथा अनित्य होते हैं । परमाणु भी यदि रूपादिमान् हैं, तो उनका भी कारण होना चाहिये और उसकी अपेक्षा उनमें स्थूलता एवं अनित्यता भी होनी चाहिये । इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि गन्ध, रस, रूप, स्पर्श गुणसंयुक्त पृथ्वी स्थूल है । तदपेक्षया रूप, रस, स्पर्श गुणसंयुक्त जल सूक्ष्म है । इसी प्रकार रूप, स्पर्श गुणवाला तेज एवं स्पर्श गुणवाला वायु और भी सूक्ष्म है । तद्वत् पृथिव्यादि परमाणुओंमें सूक्ष्मता, स्थूलताका तारतम्य होना चाहिये । यदि गुणोंकी अधिकतासे पृथ्वी, जल परमाणुमें मूर्तिवृद्धि होगी, तब फिर वे परमाणु ही क्या रहेंगे? जब कार्योंमें गुणोंके उपचयसे मूर्तिवृद्धि होती है तो परमाणुमें भी गुणोपचयसे मूर्तिवृद्धि क्यों न होगी? यदि परमाणुओंमें गन्धादिगुण न मानें तो उनके कार्योंमें ही गन्धादि कहाँसे आयेंगे? क्योंकि कारण गुण ही कार्यगुणोंके आरम्भक माने जाते हैं । यदि सबमें एक ही गुण माने जायँ, तब तो पृथ्वीमें रस, जलमें रूप, तेजमें स्पर्श नहीं उपलब्ध होने चाहिये । यदि समताके लिये सभीको गन्धादि चारों गुणोंसे युक्त मानेंगे, तब तो जलमें भी गन्ध एवं तेजमें भी गन्ध, रस उपलब्ध होने चाहिये । वायुमें भी रस- गन्धका उपलम्भ होना चाहिये, परंतु ऐसा होता नहीं । द्रव्य एवं गुण यदि अत्यन्त भिन्न हों, तो जैसे पुष्प-पलाशादि भिन्न हैं, स्वतन्त्र हैं, वैसे ही गुण भी द्रव्यसे पृथक् स्वतन्त्र होने चाहिये, परंतु यहाँ तो गुण द्रव्य - परतन्त्र ही होता है । द्रव्यके साथ-साथ सहभाव होनेसे द्रव्यमात्र ही गुण है, यह मानना ठीक है । धूम, अग्निके समान-द्रव्य - गुणमें भेद नहीं प्रतीत होता- इसी प्रकार कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय भी द्रव्य ही है । जैसे एक ही देवदत्त विभिन्न सम्बन्धिरूपोंकी अपेक्षासे मनुष्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, बाल, युवा, वृद्ध, पिता, पुत्र, पौत्र, भ्राता या जामाता आदि रूपसे कहा जाता है, जैसे एक ही अंक स्थानविशेषके योगसे दस, शत,
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- मार्क्स दर्शन ६५५ सहस्र आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है । विचार करनेपर कारणसे भिन्न होकर कुछ नहीं होता । मिट्टीसे भिन्न होकर घटादि पदार्थ उपलब्ध नहीं होते । जन्मके पहले प्रध्वंसके पश्चात् कार्यकी उपलब्धि नहीं होती, अन्तःकरणसे भिन्न उनकी सत्ता नहीं होती । सद्बुद्धि तथा असद्बुद्धि- दोनों ही सर्वत्र उपलब्ध होती हैं । जिस विषयकी बुद्धि कभी भी व्यभिचरित नहीं होती, वही सद्बुद्धि और जिस विषयकी बुद्धि व्यभिचरित होती है, वह असद्बुद्धि होती है । ' नीलम् उत्पलम्' के तुल्य ‘ सन् घटः, सन् पटः, सन् हस्ती ', इसी तरह सन्-सन् सर्वत्र घटादिमें सद्बुद्धि बनी रहती है । घटादि बुद्धि व्यभिचरित होती है, अतएव घटादि बुद्धिके विषय घटादि असत् हैं; क्योंकि उसका व्यभिचार होता है । सद्बुद्धिका विषय सत् है; क्योंकि उसका व्यभिचार नहीं होता । कहा जा सकता है कि घट नष्ट होनेपर तो घटबुद्धि व्यभिचरित ( बाधित ) हो ही जाती है, परंतु यह कहना ठीक नहीं, कारण पटादिमें सद्बुद्धि रहती ही है । ' सन् घटः ', ' सन् पट: ' इस रूपसे घट, पट विशेष्यरूपसे, सन् विशेषण रूपसे प्रतीत होता है । घटके नष्ट हो जानेपर विशेष्य न रहनेपर विशेषणबुद्धि नहीं होती । जैसे गो व्यक्ति न रहनेपर अभिव्यंजक न रहनेसे गोत्वकी प्रतीति नहीं होती, यह नहीं कि गोत्व नहीं रह गया । वैसे ही गोत्वके समान सत्के विद्यमान होते हुए भी अभिव्यंजकविशेष्य घटादि न रहनेपर सत् प्रतीत नहीं होता । इसीलिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे घट नष्ट होनेपर पट आदिमें सद्बुद्धि बनी रहती है, वैसे ही घटबुद्धि भी घटान्तरमें बनी रहती है; क्योंकि भले घटान्तरमें घटबुद्धि बनी रहे, परंतु फिर भी पटादिमें तो घटबुद्धिका व्यभिचार है ही, परंतु सद्बुद्धिका तो कहीं भी व्यभिचार नहीं होता । कहा जा सकता है कि घट नष्ट हो जानेपर उसमें सद्बुद्धि भी नहीं रहती, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विशेष्य न रहनेसे सद्बुद्धि नहीं होती । सद्बुद्धि विशेषणविषया होती है, विशेष्य नहीं होनेसे
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६५६ मार्क्सवाद और रामराज्य विशेषणता नहीं बनती । फिर भी सद्बुद्धि कैसे हो सकती है? यह नहीं कहा जा सकता कि सद्बुद्धिका विषय सत् रहा ही नहीं, इसलिये सद्बुद्धि नहीं रहती । यहाँ यह शंका होती है कि घटादि विशेष्य असत् हैं, तो उसके साथ सत्का सामानाधिकरण्य नहीं होना चाहिये? परंतु इसका समाधान यह है कि जैसे रज्जु- सर्पके सम्बन्धमें सर्पके बाधित होनेपर भी इदमंशके साथ ' अयं सर्पः ' सामानाधिकरण्य- व्यवहार होता है । इसी तरह घटादिके असत् होनेपर भी ' घटः सन्, पटः सन्' इस रूपसे अबाधित सत्के साथ असद् घटादिका सामानाधिकरण्य- व्यवहार बन जाता है । पूँजीका स्वरूप कहा जाता है कि ' अर्थशास्त्रके क्षेत्रमें पूँजी स्वयं उदाहरण है । वह धनका एक निम्नतम परिमाण है, जिसके रहनेपर ही उसका स्वामी पूँजीपति कहला सकता है । मार्क्सने उद्योगकी किसी शाखाके एक श्रमिकका उदाहरण लिया है, जो आठ घण्टेतक अपने लिये अर्थात् अपनी मजदूरीका अर्थ उत्पन्न करनेके लिये श्रम करता है और चार घण्टे अतिरिक्त अर्थ पैदा करनेके लिये जो उसके मालिककी जेबमें जाता है । इस विशेष दृष्टान्तमें यदि पूँजीपति अपने अतिरिक्त अर्थके द्वारा मजदूर- श्रेणीका जीवन भी बिताना चाहता है तो उसके पास इतना धन होना चाहिये कि वह दो मजदूरोंके लिये मजदूरी, कच्चा माल तथा उत्पादनके साधनोंका बंदोबस्त कर सके । लेकिन पूँजीपतिका उद्देश्य केवल जीना नहीं है, बल्कि अपनी सम्पत्तिकी वृद्धि करना है । इसलिये इस धनका मालिक अभी पूँजीपति नहीं है । अब यदि पूँजीपतिको मजदूरसे दुगुना अच्छा जीवन व्यतीत करना है और अतिरिक्त अर्थका आधा कारोबारमें फिर डालना है तो उसे आठ मजदूरोंको काममें लगाना चाहिये और पहले अर्थ- संग्रहका चौगुना कारोबारमें लगाना चाहिये । अब यह अर्थसंग्रह पूँजीका आकार ले लेता है । इस प्रकार अर्थ- संग्रहका परिणाम बढ़ते-बढ़ते एक सीमापर वह पूँजीके रूपमें परिणत हो जाता है । ' परंतु यह कहना ठीक नहीं; कारण, मार्क्सका अतिरिक्त श्रम और
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- मार्क्स दर्शन ६५७ अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना ही निराधार है, इसका विवेचन पीछे हो चुका है । यह भी कहा जा चुका है कि व्यापार या उद्योगद्वारा धनार्जनका तरीका ही इस प्रकारका होता है, जिसमें बुद्धिमानीसे एक मृतमूषिकाद्वारा भी कोटिपति बना जा सकता है । मार्क्सके मतानुसार उत्पादन -साधन ही पूँजी है, उसकी मात्रा अल्प हो या बड़ी । इसीलिये किसानोंके खेत भी उत्पादन - साधन हैं । इस दृष्टिसे किसान भी पूँजीपति रहते हैं । समाज- विज्ञानके क्षेत्रमें इस गुणात्मक परिवर्तनकी गवाहीके लिये एंजिल्सने नेपोलियनको साक्षी माना है । वह कहता है कि ‘ फ्रांसीसी घुड़सवार, जो नियन्त्रित सिपाही थे, लेकिन कोई अच्छे घुड़सवार नहीं थे और मामेलुक जो बहुत अच्छे घुड़सवार थे, लेकिन जिनमें नियन्त्रण नहीं था । उनकी लड़ाईके सिलसिलेमें दो मामेलुक आसानीसे तीन फ्रांसीसियोंका मुकाबला कर सकते थे । सौ मामेलुक सौ फ्रांसीसियोंके बराबर थे । लेकिन ३०० फ्रांसीसी साधारणतया ३०० मामेलुकोंको हरा देते थे और १ हजार फ्रांसीसी १५ सौ मामेलुकोंको हरा देते थे । पहलेके उदाहरणकी तरह इससे यह स्पष्ट है कि नियन्त्रित सिपाहियोंके जत्थेके परिमाणके बढ़नेपर उसका किस प्रकार गुणात्मक परिवर्तन होता है और वह अपनेसे अधिक संख्याकी फौजको हरा देता है । ' परंतु इससे भी यही सिद्ध होता है कि अनियन्त्रण, अनुशासनहीनता अल्पसंख्यकोंमें इतनी हानिकर नहीं होती, जितनी कि बहुसंख्यकों में । इसी प्रकार नियन्त्रणका गुण अल्पसंख्यकोंमें भले कुछ प्रकट हो, किंतु बहुसंख्यकोंमें अधिकरूपसे फलदायी होता है । नियन्त्रित संघटित समुदाय शक्तिशाली होता है । तृणादिनिर्मित रज्जु ही इसका दृष्टान्त है । परिणामवादानुसारी सत्कार्यवादमें कोई भी विद्यमान ही गुण किसी अवस्थाविशेषमें प्रकट होता है । सिकतामें तेल नहीं होता, अतः कभी नहीं व्यक्त होता । तिलमें तेल होता है, अतः वह कभी प्रकट होता है । वेदान्त- मतानुसार कारणकी अपेक्षा कार्यमें भिन्नता न होनेपर भी कुछ अनिर्वचनीय गुण भी सिद्ध होते हैं । जैसे मृत्तिकाद्वारा जलानयन नहीं होता, फिर भी मृत्तिकानिर्मित घटादिद्वारा जलानयन आदि कार्य होते हैं । तन्तुद्वारा
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६५८ मार्क्सवाद और रामराज्य अंगप्रावरण, शीतापनयन नहीं होता, फिर भी तन्तुनिर्मित पटद्वारा वह कार्य होता है । आकाशमें स्पर्श नहीं होता, फिर भी तन्निर्मित वायुमें स्पर्शगुण है, वायुमें रूप नहीं, तथापि वायुपरिणामभूत तेजमें रूपगुण उपलब्ध होता है । इसी तरह एक-एक व्यक्ति या अल्प व्यक्तिमें जो गुण नहीं व्यक्त होते, अधिक - संख्यक उन्हीं व्यक्तियोंमें वे गुण प्रकट होते हैं । इसी तरह एक या अन्य व्यक्तियोंमें अनियन्त्रणका जो दुष्परिणाम नहीं व्यक्त होता, बहुसंख्यकोंमें वह दुष्परिणाम स्पष्ट हो जाता है । प्रतिषेधका प्रतिषेध इसी तरह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण मार्क्सवादी उपस्थित करते हैं कि ' यदि यवका एक दाना जमीनमें डाला जाय तो गर्मी और नमीके प्रभावसे इसमें एक विशेष परिवर्तन होता है । इसमेंसे पौधा उगने लगता है । उस दानेके अस्तित्वका अन्त हो जाता है । उसका प्रतिषेध हो जाता है । उसके स्थानपर जो पौधा उगता है, वह उस दानेका प्रतिषेध है । वह पौधा बढ़ता है, उसमें फल आते हैं और फिर उसमें यवके दाने उत्पन्न होते हैं, लेकिन इन दानोंके पकनेके साथ ही उस पौधेका भी अन्त हो जाता है । अब प्रतिषेधका प्रतिषेध होकर नये यवके दाने हो गये । एक ही दाना नहीं, बल्कि मूल दानेका दस, बीस या तीस गुना । ' इसी तरह पतिंगोंके सम्बन्धमें उनका कहना है कि ' ये अण्डेसे निकलते हैं । उसके प्रतिषेधके बाद ये पतिंगे बढ़कर पूर्ण यौन विकासको प्राप्त होते हैं और यौन सम्बन्धसे अण्डे पैदा होकर मर जाते हैं । प्रतिषेधका प्रतिषेध करके फिर अण्डे पैदा हो गये, एक नहीं अनेक । ' इस सम्बन्धमें पीछे कहा जा चुका है कि बीज - विनाश या बीज- प्रतिषेध अंकुरादि कार्येका कारण नहीं है, किंतु बीजके अवयव ही अंकुरके कारण हैं; क्योंकि उनका ही अनुवेध कार्यमें होता है । बीजके विनाशका कारण यह है कि एक उपादान कारणमें एक कार्यकी अभिव्यक्ति होनेपर कार्यान्तरोंकी निवृत्ति होती है । बीज भी एक अवयवोंकी ही कार्यावस्था है । अंकुररूप कार्यकी अभिव्यक्तिसे उसकी निवृत्ति आवश्यक है । जहाँ पूर्व कार्यकी निवृत्ति आवश्यक नहीं है, वहाँ