मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 691–700

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700

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- मार्क्स दर्शन ६८ ९ अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अंकुरकी उत्पत्ति मान ली, परंतु वस्तुतः यहाँ भाव- अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही नहीं उठता! विनाश, अभाव या असत्से न कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है, न सत्-असत्का कोई सम्बन्ध हो सकता है । न ख- पुष्प, वन्ध्यापुत्रसे किसीकी उत्पत्ति हो सकती है, न किसीसे उनका कोई सम्बन्ध ही हो सकता है । बीजावयव ही अंकुरके कारण हैं और उन्हींका कार्यमें अनुवेध भी रहता है, परंतु एक उपादानमें कार्यान्तरकी उत्पत्तिके लिये पूर्वकायका तिरोधान आवश्यक होता है । इसीलिये बीजावस्थाका तिरोभाव नान्तरीयकरूपसे होता है । अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका उदाहरण भी ऐसा ही है । जैसे आम्रादि बीजसे आम्रादि वृक्षकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही मनुष्य, पशु आदि बीजोंसे ही मनुष्य, पशु आदि देहोंकी उत्पत्ति होती है । अवयवपरिवर्तनादिद्वारा गोलांगूल, मनुष्य आदि विकासकी कल्पना सर्वथा अप्रमाणित है । उसमें मुख्य आपत्ति यह है कि उन -उन प्राणियोंकी परम्परा स्वतन्त्ररूपसे आज भी प्रचलित है, आज वैसा कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता । न तो पूँछ घिसनेसे आज कोई मनुष्य बनता है और न मनुष्यसे आगे कोई विकसित वर्ण दिखायी देता है । न कोई मनुष्यका अंग बढ़ रहा है और न कोई घट रहा है । यों परिणामवादमें कार्योंके रूपमें भिन्नता और कारणात्मना अभिन्नताका सिद्धान्त मान्य है ही । इसका तत्त्व भेदाभेद विवेचनमें आ चुका है । हीगेलके दृष्टान्तोंसे भाव - अभाव, सत्- असत्का विरोध मिट नहीं सकता । जमा- उधार, लेना- देना; ॠण - धन, पूर्व- पश्चिम आदिमें भाव, अभावकी अपेक्षा बुद्धिजन्य कल्पनामात्र है । उनकी सम्पत्ति या रास्तेके एक स्थानमें ऋण धन और पूर्व- पश्चिमकी एकता हो सकती है; परंतु क्या इसी तरह उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्धसे, उसी रूपमें, उसी घटका भाव और उसीका अभाव साथ-साथ रह सकता है? क्या इसी तरह मित्रापुत्र और वन्ध्यातनयका सह अस्तित्व हो सकता है? वस्तुस्थिति यह है — ‘ क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वानधिकरणत्व '

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६ ९ ० मार्क्सवाद और रामराज्य ही असत् है, अर्थात् जो किसी भी उपाधि या अधिकरणमें सत्त्वेन प्रतीत न हो, वही असत् है । जो प्रातिभासिक रजतादि कहीं शुक्तिकादिमें सत्त्वेन प्रतीत होता है, वह शुक्ति रजतादि प्रातिभासिक सत् है । कारण ब्रह्ममें सत्त्वेन प्रतीत आकाशादि व्यावहारिक सत् है और अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाशरूपसे भासमान सत् पारमार्थिक सत् है । ऐसे सत्- असत्की भी यदि एकता हो सकती है, तब संसारमें विरोध क्या है । फिर शोषक- शोषित वर्गोंका ही अमिट विरोध क्यों? उनमें तो एकता स्पष्ट ही है । दूसरोंके भक्षक जंगली जानवर या पानीकी मछली आदि स्वयं ही दूसरोंद्वारा भक्षित होते हैं, फिर यहाँ तो एक स्थानमें ही शोषकत्व, शोषितत्व स्पष्ट है । वस्तुतः सत्- असत्का भेद अपेक्षाबुद्धिजन्य कल्पनामात्र नहीं है । हाँ, जहाँ भावान्त ही अभाव है, वहाँ विरोधकी चर्चा व्यर्थ है । पटाभाव घट स्वरूप है, अतः घटका, पटाभावका कोई विरोध नहीं है; एतावता घटाभावका भी घटके साथ विरोध नहीं है, यह कहना उपहासास्पद ही है । साथ ही भाव, अभाव एक- दूसरेके ऊपर निर्भर है— इसका दो अर्थ हो सकता है । एक तो यह कि अभाव किसी वस्तुका और किसी अधिकरणमें होता है, अर्थात् प्रतियोगिनिरूपक (जिसका अभाव हो ) और दूसरा अनुयोगी, (जैसे ' भूतले घटो नास्ति' ' भूतलमें घट नहीं है ' ) । भूतलका तथा घटका ज्ञान हुए बिना घटाभावका ज्ञान नहीं हो सकता । अभाव अधिकरणस्वरूप है, इस दृष्टिसे अनुयोगिस्वरूप तो अभाव कहा जा सकता है; परंतु अभाव और प्रतियोगी भी कभी एक हो जाते हों, ऐसी बात नहीं है । इसके अतिरिक्त अभाव तो अवश्य ही अनुयोगी प्रतियोगीकी अपेक्षा रखता है; परंतु भाव इस प्रकार अभावकी अपेक्षा नहीं रखता । निरुपाख्य असत्त्व इससे भी अधिक अव्यवहार्य है । चुम्बकके उत्तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव एवं बिजलीकी धनात्मक-ऋणात्मक दो धाराएँ परस्पर विरोधी होनेपर भी भावरूप हैं । उनका जुट सकना सम्भव है, परंतु इसी तरह भाव - अभाव, सत्- असत्का जुटना असम्भव है । उपर्युक्त विरोध सत्त्व, रज, तमके विरोध जैसा है, जो कि विरोध होनेपर भी समन्वित

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- मार्क्स दर्शन ६ ९ १ होकर कार्यारम्भक होते हैं । इस प्रकार भाव - अभाव, सत्- असत्का समन्वय होकर कार्यारम्भकता सम्भव नहीं है । कहा जाता है कि ' प्रकृतिके दृश्यगत घटनाओंके मूलमें भूतकी गति है । इसका विरोध स्पष्ट है । यदि कोई पूछे कि कोई गतिशील पदार्थ किसी विशेष समयपर किसी स्थानपर है या नहीं, तो युवेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता कि ' हाँ' ' हाँ ' है और ' नहीं ' ' नहीं ' है । गतिशील पदार्थ एक बिन्दुपर है भी और नहीं भी है । इसका विचार इसी संकेतसे किया जा सकता है कि ' हाँ ' ' नहीं ' है और ' नहीं ' ' हाँ' । गतिशील पदार्थ ' विरोधके तर्क ' की अकाट्य दलील है और जो इस तर्कको नहीं मानता, उसको जैनोंके साथ कहना पड़ेगा कि गति इन्द्रियोंका भ्रममात्र है । जो ऐसा नहीं मानते, उन्हें या तो युवेरवेगके तर्कशास्त्रके बुनियादी नियमको मानकर गतिका त्याग करना पड़ेगा अथवा गतिको मानकर इस बुनियादी नियमका परिहार करना होगा । ' पहले ही कहा जा चुका है कि प्रकृतिकी दृश्यगत घटनाओंकी बुनियादी बात है भूतकी गति । लेकिन गति एक विरोध है । इसका विचार द्वन्द्वमानके नियमसे किया जाना चाहिये । अर्थात् इस संकेतसे कि ' हाँ ' नहीं है और ' नहीं ' ' हाँ ' है । इसलिये यह मानना पड़ेगा कि दृश्यगत घटनाओंके सम्बन्धमें हम विरोधी तर्कके राज्यमें हैं । लेकिन गतिशील भूतके अणुओंके संयोगसे वस्तुओंकी सृष्टि होती है । यह संयोग कम या अधिक क्षणस्थायी होकर तिरोहित हो जाता है और दूसरे संयोग इसका स्थान ले लेते हैं । जो अनन्त है, वह है भूतकी गति । जब बाहरी गतिके कारण भूतके एक विशिष्ट संयोगका आविर्भाव होता है और गतिहीके कारण जबतक उसका अन्तर्धान नहीं होता, तबतक इसके अस्तित्वके प्रश्नको भावात्मकरूपसे ही हल किया जा सकता है । यही कारण है कि यदि कोई बुधग्रहको दिखाकर हमसे पूछे कि उसका अस्तित्व है या नहीं? तो हम निःसंकोच यह उत्तर देंगे कि ' हाँ ' है । इसका अर्थ यह है कि स्पष्ट वस्तुओंके सम्बन्धमें हम युवेरवेगके ही नियमका अनुसरण करेंगे । इस राज्यमें ' हाँ ' ' हाँ ' है और ' नहीं ' ' नहीं '

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६९ २ मार्क्सवाद और रामराज्य का ही संकेत लागू होता है । लेकिन इस नियमका राज्य अबाध नहीं है । जब कोई वस्तु उत्पत्तिकी अवस्थामें है तो उसका उत्तर देनेमें कुछ संकोच नहीं होता । जब किसी मनुष्यके सरके बाल काफी उड़े देखे जाते हैं, तो कहा जाता है कि वह गंजा है । लेकिन वह कब पूरा गंजा हो जायगा, ठीक उस मुहूर्तका निश्चय नहीं किया जा सकता । ‘ किसी विशिष्ट प्रश्नका कि अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, ' हाँ ' या ' ना ' में ही उत्तर दिया जा सकता है । लेकिन जब कोई वस्तु परिवर्तनकी स्थितिमें है, किसी विशेष गुणका उसमें संयोग या वियोग हो रहा हो, तब इसका उत्तर दिया जा सकता है—' हाँ' ' नहीं ' है तथा ' नहीं ' है ' हाँ ' । युवेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता । यह एतराज किया जा सकता है कि जिस गुणका वियोग हो रहा है, उसका अभी अन्तर्धान नहीं हुआ और जिस गुणका संयोग हो रहा है, अभी वह पहलेसे ही वर्तमान है । इसलिये ' हाँ ' या ' ना ' में इसका उत्तर असम्भव नहीं, किंतु बाधितामूलक है, चाहे वह वस्तु परिवर्तनहीकी क्रियामें क्यों न हो । लेकिन यह एतराज गलत है । जिस युवककी ठोढ़ीपर दाढ़ीकी रेखा उग रही हो, उसको दाढ़ीवाला नहीं कहा जायगा; यद्यपि यह रेखा धीरे - धीरे दाढ़ीमें परिणत हो रही है । गुणात्मक परिवर्तनके लिये परिमाणकी एक सीमातक पहुँचना आवश्यक है । जो इसको भूलता है, वह वस्तुओंके गुणोंके सम्बन्धमें स्पष्ट राय नहीं दे सकता । ' सिद्धान्ततः भूत स्वयं प्रकृतिका कार्य है, प्रकृतिके गुण भूतमें भी रहते हैं । सभी घटनाओंका मूल ईश्वर चेतनाधिष्ठित प्रकृति है । ' चञ्चलगुणवृत्तम् ' के अनुसार प्रकृति क्षण- परिणामशील या गतिशील है । सुतरां तत्तत्परिणामभूत सभी कार्य भी गतिशील हैं, परंतु परिच्छिन्न कोई पदार्थ समकालमें अनेक स्थानमें नहीं हो सकता । अवश्य ही वह जिस समय किसी स्थलमें है, उसी समय तदन्यस्थलमें नहीं कहा जा सकता । कितनी भी तीव्रगति किसीकी क्यों न हो, फिर भी एक ही देशकालमें उसका भाव - अभाव नहीं कहा जा सकता । काल बड़ा सूक्ष्म होता है, अतः किसी स्थलपर समकालमें गतिशील पदार्थका अस्तित्व, नास्तित्व

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- मार्क्स दर्शन ६ ९ ३ नहीं कहा जा सकता । उसी वस्तुको रूपान्तरसे भाव एवं रूपान्तरसे अभाव कहना सम्भव है, परंतु उसी रूपसे भाव - अभाव - दोनों कोटि-कोटि प्रयत्नोंसे भी सम्भव नहीं हैं, तीव्रगामी बाण या तलवारसे समवेत सहस्र कमलपत्रका छेदन समकालमें ही प्रतीत होता है । पापड़ खाते समय समकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी प्रतीति समकालमें मालूम पड़ती है, फिर भी सर्वत्र क्रमिकता ही है । हाँ, क्रम इतना सूक्ष्म है कि परिलक्षित नहीं होता, फिर भी उसका अनुमान तो होता ही है । इस तरह अति तीव्रगतिमें, अतिसूक्ष्मकालमें अस्तित्व-नास्तित्वका क्रम भी बदल जाता है । इसीलिये अस्तित्व-नास्तित्व एकत्र स्थलमें क्रमिक ही रहता है; समकालिक नहीं । सामान्य गतिमान् पदार्थका जब विभिन्न स्थानीय अस्तित्व, नास्तित्व, भिन्नकालिक है, तो इसी तरह तीव्र गतिमान् पदार्थोंका भी एकत्र अस्तित्व, नास्तित्व भिन्नकालिक ही मानना उचित है । इस तरह उसे अकाट्य तर्क समझना भ्रम ही है । युवेरवेग हो या कोई और हो, यौक्तिक विचारमें जिसका पक्ष उचित हो ग्रहण करना चाहिये । अयुक्तियुक्त किसीका भी मत त्याज्य होना चाहिये । किसी भी नियमसे सत् असत्, असत् सत् नहीं हो सकता । द्वन्द्वमानकी बाजीगरी भी इस सम्बन्धमें व्यर्थ ही है । सिर्फ घटका स्वेन रूपेण अस्तित्व है, अन्यरूपेण नास्तित्व है । इसके सिवा अस्ति, नास्तिकी एकत्र अवस्थिति सर्वथा असम्भव है । गतिशील परमाणुओंके संयोगसे दृश्य वस्तुओंका निर्माण हो अथवा प्रतिक्षण परिणामी प्रकृति-तत्त्वका परिणामस्वरूप दृश्य वस्तु हो, उसकी अस्थिरता निश्चित है । फिर भी वस्तुके भाव- अभावमें सन्देह नहीं होना चाहिये । सन्देह होता है स्थिरता एवं अस्थिरतामें । नदीप्रवाह एवं दीपशिखामें स्थूलदृष्टिसे स्थिरता एवं एकता प्रतीत होती है, किंतु वस्तुतः उनमें स्थिरता-एकता सादृश्यमूलक भ्रम ही है । गगन, पर्वत, समुद्र, नक्षत्रादि- सभीमें स्थिरता, एकता, प्रत्यभिज्ञा इसी प्रकार सादृश्यमूलक भ्रम ही है । फिर भी अविचारित रमणीय एकता आदिका व्यवहार चलता ही है । सदृश परिणाम जबतक चलता है, तबतक

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६ ९४ मार्क्सवाद और रामराज्य एकता विसदृश परिणाम होनेसे ही भिन्नता, अनेकताकी प्रतीति होने लगती है । सदृश- विसदृश किसी भी परिणाममें अस्तित्व तो रहता ही है, आविर्भाव, तिरोभावके आधारपर होनेवाले भाव- अभावके व्यवहारमें भी क्रम अनिवार्य है । समकालमें, समदेशमें, समसम्बन्धसे, समरूपसे एक ही वस्तुका भाव या अभाव नहीं रह सकता । यह पर्वतवत् अकम्प्य विरोध है, यह कहा जा चुका है । प्रमाणकी दृष्टिसे सब स्पष्ट ही होता है, अस्पष्ट नहीं । सिरके अधिकांश बालोंके उड़ जानेपर भी हम यही कह सकते हैं कि ' वह खल्वाट हो रहा है । ' जिसे पूरे मुहूर्तका पता लगाना अभीष्ट है, उसे घड़ी लेकर त्राटक लगाकर बैठना ही पड़ेगा । जिसे गर्दभके बालोंकी जिज्ञासा है, उसे गिननेका श्रम करना ही पड़ेगा । जैसे अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, इस प्रश्नका उत्तर हाँ या नहीं में देना उचित है; वैसे ही परिवर्तनकी हालतमें भी निश्चित उत्तर दिया ही जा सकता है । सांख्यीय सत्कार्यवादके अनुसार छोटे - से वटबीजके अन्दर वटवृक्षकी सत्ता है, तभी उसका प्रादुर्भाव होता है । फिर भी जबतक उसका आविर्भाव नहीं है, तबतक अभावका व्यवहार चलता है और जिस कालमें अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पल्लवादिकी अवस्था है, उस कालमें स्पष्टतया उसी रूपमें उसका भाव, अन्य रूपमें अभाव कहनेमें कोई अड़चन नहीं हो सकती । युवककी ठोढ़ीमें बालोंकी जो अवस्था है, उसी रूपमें उसका भाव अन्यरूपमें अभाव कहनेमें भी कोई अड़चन नहीं । उसी भूतलपर देश-कालभेदसे, सम्बन्ध तथा रूपभेदसे, घटके भाव -अभावका व्यवहार होता ही है । वस्तुओं तथा उसके गुण सम्बन्धमें यही स्पष्ट मत है । ' हाँ' नहीं है, ' नहीं ' हाँ है, यह मत कभी भी स्पष्ट मत नहीं कहा जा सकता । कारणमें कार्यका अस्तित्व रहता है, इसलिये बीजमें भी अंकुर है । युवक क्या, शिशुकी भी ठोढ़ीमें बालोंका अस्तित्व है । जबतक आविर्भाव नहीं है, तबतक अंकुरके तुल्य बालोंका भी अभाव है । जितना प्रादुर्भाव है, उतनेका भाव, जितनेका नहीं, उतनेका अभाव है, इससे अधिक स्पष्टता क्या हो सकती है ।

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- मार्क्स दर्शन ६ ९५ एफीसियसका प्राचीन दार्शनिक कहता है कि ' सभी चीजें परिवर्तनशील हैं, सभी परिवर्तित हो रही हैं । जिन संयोगोंको हम वस्तु नाम देते हैं, वे सदा ही परिवर्तनकी स्थितिमें हैं । ' जबतक ऐसे संयोगोंका अनुपात कायम रहता है, उनका विचार हम हाँ-हाँ और नहीं - नहींके संकेतसे कर सकते हैं । लेकिन जिस समय उनमें ऐसा परिवर्तन होता है कि वह पहला अनुपात नहीं रहता, तब उनका विचार विरोधके तर्कसे ही हो सकता है । हमें हाँ और ना दोनोंमें उत्तर देना पड़ेगा । वह है भी और नहीं भी है । ' जैसे स्थिरता गतिका एक विशिष्ट प्रकार है, उसी तरह साधारण तर्कशास्त्र द्वन्द्वमान तर्कका एक विशेष प्रकार है । ' प्लेटोके शिष्य क्रैटिलसके विषयमें कहा जाता है कि जब हेराक्लिट्सने कहा कि एक ही नदीमें हम दो बार प्रवेश नहीं कर सकते, तब उसने कहा कि एक बार भी हम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते; क्योंकि प्रवेश करते - करते उसमें परिवर्तन होता रहता है । वह एक दूसरी नदी हो जाती है । ऐसी रायमें होनेकी क्रियाको उसके अस्तित्वसे अधिक महत्त्व दिया जाता है । यह द्वन्द्वमानका अपव्यवहार है । हीगेलका कहना है कि ' कुछ ' सर्वप्रथम ' प्रतिषेधका प्रतिषेध ' है । द्वन्द्वमान और भौतिकवादका आपसमें कोई विरोध नहीं है । वास्तवमें द्वन्द्वमानकी बुनियाद ही भौतिकवाद है । यदि प्रकृतिकी भौतिकवादी धारणाका अन्त हो जाय तो साथ ही द्वन्द्वमानका भी अन्त हो जायगा । हीगेलकी प्रथामें ' द्वन्द्वमान और अतिभौतिकवाद दोनों समानार्थसूचक हैं । माक्र्सीय दर्शनमें द्वन्द्वमान प्राकृतिक सिद्धान्तके सहारे खड़ा है । हीगेलके अनुसार धारणाओंमें जो विरोध है, उनके आविष्कार और हलसे ही विचारधारा आगे बढ़ती है । भौतिकवादी सिद्धान्तके अनुसार धारणाओंमें अवस्थित विरोध उन विरोधोंके प्रतिबिम्बमात्र हैं, जो दृश्यगत जगत् वर्तमान हैं और जिनका मूल कारण प्रकृतिका अन्तर्विरोध यानी उसकी गति है । ' एफीसियसके प्राचीन दार्शनिककी दृष्टि भी इस सम्बन्धमें भ्रमात्मक

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६ ९६ मार्क्सवाद और रामराज्य ही है । सूक्ष्मकालभेदके अनुसार सूक्ष्मपरिवर्तित अवस्थाओंका भी सुस्पष्ट अस्ति या नास्तिरूपसे निरूपण किया जा सकता है । अनिश्चित अवस्था सदा ही अज्ञानकी अवस्था है, प्राकृतिक एवं यान्त्रिक प्रत्यक्ष साधनों, अनुमानों या आर्षविज्ञानों अथवा अपौरुषेय आगमोंके आधारपर उस अज्ञानको मिटाना ही उचित है । उभयतः आकर्षणकी स्थिरता एक गतिका प्रकार भले मान्य हो, परंतु सब गतियों एवं गतिमानोंकी अधिष्ठानभूत आत्मसत्ता गतिका प्रकारविशेष नहीं है । एकत्व-भ्रमके मूल कारण सादृश- ज्ञानके लिये ‘ तेनेदं सदृशम् ' ' के ते नेदं सदृशम्' जाननेके लिये अनेककालावस्थायी द्रष्टाको स्वतः स्थिर मानना पड़ता है । इसीलिये सांख्योंने सब पदार्थोंको क्षणपरिणामी मानते हुए भी चित्- शक्तिको कूटस्थ माना है— ' क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः । ' व्यवहारमें गतिमान, पशुपक्ष्यादि जंगम तथा स्थावर भूमि- पर्वतादि स्वतन्त्ररूपसे मान्य है । अतः गतिविशेष ही स्थिरता है, यह दृष्टान्त ही असंगत है । इस तरह सत्‌को असत्, असत्‌को सत् कहनेवाला द्वन्द्वमान कोई तर्क ही नहीं है । नदीके प्रथम प्रवेशकालमें ही नहीं, किंतु प्रतिक्षण भिन्नता क्रैटिलससे बहुत पहले भारतीय दर्शनोंने बता रखा है— नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च । कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥ यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः । तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः ॥

सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्त्रोतसां तदिदं जलम् ।

सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम्॥

( श्रीमद्भा० ११ । २२ । ४२-४४) नित्य ही भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय अलक्ष्य वेगवाले कालद्वारा होता रहता है । सूक्ष्म होनेके कारण वह प्रतीत नहीं होता । दीपादि अग्नि-ज्वालाओं, सरिताओं, फलों तथा वनस्पतियों एवं सभी भूतोंका वय एवं

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मार्क्स- दर्शन ६ ९७ अवस्थाओंके अनुसार क्षण-क्षणपर उत्पत्ति और प्रलय होता रहता है । क्षण- परिवर्तनशील होनेपर भी ' यह वही दीप है, यह वही जल है, यह वही पुत्रादि है, ' इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा- पहचान तथा एकत्व-बुद्धि भ्रान्ति ही है । पदार्थ तो सभी प्रतिषेधके प्रतिषेध हैं, परंतु यदि पहला प्रतिषेध भ्रमात्मक हो तभी जो प्रमात्मक घटके निषेधका निषेध है अथवा घटध्वंसका ध्वंस है, वह ध्वंस घटरूप नहीं हो सकता । अतः द्वन्द्वमानके तर्काभाससे व्यापक नियमोंका बाध नहीं हो सकता । इसीलिये भूत, भौतिक प्रपंच या भौतिकवाद या किसी वादके साथ द्वन्द्वमानका अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है । तर्क, प्रतितर्क, निष्कर्ष, वाद, प्रतिवाद, समन्वय या सिद्धान्त सर्वत्र आदरणीय हैं, परंतु इससे द्वन्द्वमान नामकी कोई स्वतन्त्र प्रमाण वस्तु सिद्ध नहीं होती । मार्क्सवादीके कथनानुसार भौतिकवादी धारणाका अन्त हो जाय, तो द्वन्द्वमानका ही अन्त हो जायगा, परंतु मार्क्सके गुरु हीगेलने, जो द्वन्द्ववादका आविष्कारक माना जाता है, अतिभौतिकवाद और द्वन्द्वमानको समानार्थक माना है । इस तरह मार्क्सका भौतिक द्वन्द्वमान आविष्कारकके मतसे ही विरुद्ध है । हीगेलके मतानुसार यह ठीक है कि तर्क-प्रतितर्क वादसे पक्ष-विपक्षका साधन, बाधन, विरोधोद्भावन तथा विरोध- परिहारसे विचारधारा आगे बढ़ती है, परंतु फिर भी उसकी सीमा है । तर्क या विचारधारा तत्त्वनिर्णयावसान ही होता है । तत्त्व -निर्णयके बाद वह व्यर्थ ही नहीं, अनिष्टकर भी है, परंतु विचारगत विरोध बाह्य वस्तुओंमें भी होना ही चाहिये, यह अनिवार्य नहीं है । अनेक प्रकारके दोषोंसे विचारोंमें भिन्नता होते हुए भी वस्तुओंमें भिन्नता नहीं होती । एक ही रज्जुमें सर्प, धारा, माला, भूछिद्रादि अनेक विचार उत्पन्न होते हैं; परंतु वस्तु एक ही है, उसमें कोई भेद नहीं । ' प्रपंचका मूल क्या है, आत्मा क्या है ', इस सम्बन्धमें वस्तुस्थिति एक रहनेपर भी तर्कों, प्रतितर्कों तथा विचारोंमें पर्याप्त भिन्नता होती है । तर्कोंमें बाह्य वस्तुओं एवं उनकी विचित्रताओंका असर होता है, यह अवश्य है । महाकारण ईश्वर या प्रकृति या भूत

पृष्ठ 700

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६९ ८ मार्क्सवाद और रामराज्य व्यापक होते हैं । उनसे विविध, विचित्र कार्य उत्पन्न होते हैं, तदनुकूल विचित्र अवस्थाएँ उद्भूत होती हैं । इनसे भिन्न अन्तर्विरोध नामकी कोई वस्तु नहीं है । कहा जाता है ' हीगेलके अनुसार घटनाओंका विस्तार, विचार- विस्तारसे विदित होता है ', परंतु भौतिकवादमें विचारका विस्तार वस्तुओंके विकासपर निर्भर है । अतिभौतिकवाद और द्वन्द्वमान अतिभौतिकवादी विचारमें- ' प्रकृति वस्तुओं और दृश्यगत घटनाओंका एक आकस्मिक बटोर है, जहाँ वे एक- दूसरेसे विच्छिन्न तथा स्वतन्त्र हैं । ' इसके विपरीत द्वन्द्वमान इन वस्तुओं और दृश्यमान घटनाओंको एक सूत्रमें बाँधता है, जिसमें उनकी पारस्परिक निर्भरता प्रकाश पाती है । इसलिये द्वन्द्वमानके अनुसार किसी प्राकृतिक घटनाको स्वतन्त्ररूपसे, अपने बहिरावेष्टनसे अलगकर नहीं समझा जा सकता; क्योंकि वे इन बहिरावेष्टनोंसे सम्बन्धित हैं और अपनी पारिपाश्विक अवस्थाद्वारा सीमित हैं । अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान यह मानता है कि प्रकृतिकी अवस्था स्थिर और गतिहीन नहीं है, बल्कि अविराम गति और परिवर्तनकी अवस्था है, अविराम नवीन और विकासकी अवस्था है, जहाँ किसी -न- किसी चीजका उत्थान और विकास होता है और किसी -न- किसी चीजका ध्वंस और निर्माण । इसलिये द्वन्द्वमानके तरीकेकी यह माँग है कि दृश्यगत घटनाओंका विचार न केवल उनके पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी पारस्परिक निर्भरताके दृष्टिकोणसे होना चाहिये, बल्कि उनकी गति, उनका परिवर्तन, विकास, आविर्भाव और अन्तर्धानकी दृष्टिसे भी होना चाहिये । द्वन्द्वमानका तरीका मुख्यरूपसे उसको महत्त्व नहीं देता, जो उस मुहूर्तमें स्थायी और दृढ़ मालूम होता है, लेकिन जिसका अन्त होना आरम्भ हो गया हो; बल्कि उसको जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो, यद्यपि उस क्षणमें वह भंगुर ही मालूम पड़ रहा है; क्योंकि द्वन्द्वमान उसीको अजेय मानता है, जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो । एंजिल्सके शब्दोंमें सारी प्रकृति, छोटी -से -छोटी