मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 701–710
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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- मार्क्स दर्शन ६ ९९ लेकर बड़ी- से- बड़ी चीज, एक बालूके कणसे सूर्यतक, प्रोटिस्टा (प्राथमिक जीवित कोष) -से मनुष्यतक, लगातार आविर्भाव और तिरोधानकी अवस्थामें है, सदा परिवर्तनशील है और परिवर्तनकी अवस्थामें है, इसलिये एंजिल्सका कहना है कि द्वन्द्वमान वस्तुओं और उनके मानसिक प्रतिबिम्बोंको उनके पारस्परिक सम्बन्ध और संयोगमें उनकी गति, उनके उत्थान और अन्तर्धानमें देखता है । ' अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान विकासकी क्रियाको सामान्य वृद्धिके रूपमें, जहाँ परिमाणकी वृद्धि और ह्राससे गुणोंका परिवर्तन नहीं होता, नहीं देखता, बल्कि ऐसे विकासके रूपमें देखता है, जो नगण्य और अदृश्य परिवर्तनसे बुनियादी गुणोंके परिवर्तनके रूपमें परिणत होता है । इस विकासमें गुणात्मक परिवर्तन धीरे- धीरे नहीं होता, बल्कि एकाएक और द्रुतगतिसे; जो एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदानका रूप लेता है । यह आकस्मिकरूपसे घटित नहीं होता, बल्कि क्रमवर्धमान परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम है । द्वन्द्वमानके तरीकेके लिये यह आवश्यक है कि इस विकासकी क्रियाको हम चक्रगतिके रूपमें न देखें, न इस रूपमें कि जो कुछ पहले घटित हो चुका है, उसकी सामान्य पुनरावृत्ति हो रही है, बल्कि एक अनुगति और ऊर्ध्वगतिके रूपमें, एक गुणात्मक अवस्थासे दूसरी नयी गुणात्मक अवस्थामें परिवर्तनके रूपमें, साधारणसे असाधारण, निम्नस्तरसे उच्चस्तरपर विकासके रूपमें देखना चाहिये । ' अवश्य ही वस्तु -वैचित्र्य विचार- विस्तारमें उपयोगी है, फिर भी वस्तु बिना भी स्वप्नों, मनोरथोंमें विचार, विस्तार परिलक्षित होते हैं, परंतु विचार बिना तो वस्तुका विकास असम्भव ही है । जैसे वैज्ञानिक यन्त्र, रासायनिक तत्त्वोंका विकास, विश्लेषण विचारप्रभूत हैं, वैसे ही प्राकृतिक, भौतिक गति या विकास भी ईश्वरीय विचारमूलक ही हैं । इसीलिये- ' तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति ' (छां० उ० ६।२।३ ) –इत्यादि वचनोंसे उपनिषदोंमें स्पष्टरूपसे कहा गया है कि
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७०० मार्क्सवाद और रामराज्य स्वप्रकाश, सत्, चेतनने ही ईक्षणपूर्वक विश्व निर्माण किया । द्वन्द्वमानके जादूसे जड - प्रकृति या जड- भूतोंमें स्वतः चन्द्र, सूर्य आदि निर्माणकी क्षमता नहीं सिद्ध होती । पशु- मनुष्य एवं उसके दिव्य मस्तिष्क आदि यदि केवल भूतोंका ही करिश्मा है, तो विविध यन्त्रोंके निर्माणके लिये भी चेतन मनुष्यकी अपेक्षा न होनी चाहिये । अध्यात्मवादमें प्रकृति, वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर नहीं है । यह कल्पना तो असमीक्ष्यकारी जडमें ही हो सकती है । अध्यात्मवादमें तो संसारके किसी पदार्थकी चेष्टा कर्मसापेक्ष ईश्वरके विचारसे ही होती है । किसी भद्दे पाश्चात्य अध्यात्मवादमें प्रकृतिको वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर कहा जा सकता है । मार्क्सवादका प्रकृति शब्द भी भ्रामक है, वस्तुतः वे सांख्योंकी प्रकृतितक पहुँच भी नहीं सके हैं । वे तो भूतों, परमाणुओं तथा उसके कतिपय विश्लेषणोंतक ही पहुँच सके हैं । अध्यात्मवादियोंकी दृष्टियोंसे आकाशसे भी सूक्ष्म शब्द तन्मात्रा और उससे भी सूक्ष्म अहं, अहंसे भी सूक्ष्म महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे भी सूक्ष्म प्रकृति है । इसका विस्तृत विवेचन अन्यत्र किया जा चुका है । प्रपंचकी विचित्रतासे सम्बन्धकी भी विचित्रता होती है, अतएव विच्छिन्न, अविच्छिन्न, स्वतन्त्र, अस्वतन्त्र - अनेक प्रकारके पदार्थ संसारमें होते हैं । प्रत्येक भोग्य पदार्थ भोक्तृसम्बद्ध होते हैं । प्रत्येक कार्य कारणसम्बद्ध भी होते हैं । साथ ही अनेक पदार्थ परस्पर सम्बद्ध होते हैं, कई असम्बद्ध होते हैं । कई अनुकूल सम्बन्धवाले, कई प्रतिकूल सम्बन्धवाले होते हैं । भौतिकवादी सम्मत-प्रपंचकी अप्रामाणिक एक सूत्रबद्धताकी अपेक्षा ईश्वर, काल, कर्म तथा भोक्तासे उसकी सम्बद्धता कहीं श्रेष्ठ है । घटनाओंके सम्बन्धमें भी यही बात कही जा सकती है । संसारमें कितने ही पदार्थ उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, उनका परम्परासे भी परस्पर सम्बन्ध नहीं होता; फिर प्रत्येक पदार्थको परस्पर निर्भर कैसे कहा जा सकता है? द्वन्द्वमानमें ही नहीं, किसी भी दर्शनमें किसी वस्तुको समझने, पहचाननेके लिये अपेक्षित अंगोपांगका ज्ञान सम्पादित किया जाता है । किसी रोगको समझनेके लिये उसके निदान, आहार-विहार, देश-
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- मार्क्स दर्शन ७०१ काल, साक्षात् या परम्परासे प्रभाव डालनेवाले पदार्थों तथा घटनाओंपर विचार किया ही जाता है । इसी प्रकार सम्बन्धित सभी घटनाओंके सम्बन्धमें विचार किया ही जाता है । प्रकृतिकी अविराम गति और प्राचीनका तिरोभाव, नवीनका आविर्भाव आदि कल्पनाएँ सांख्योंकी ही हैं । इसी आविर्भाव- तिरोभावको निर्माण तथा ध्वंस कहा जा सकता है । अवश्य ही सांख्यके मतानुसार सत्का ही आविर्भाव-तिरोभाव होता है; अत्यन्त असत्का नहीं— 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । ' ( गीता २।१६ ) यह कोई द्वन्द्वमानका नया दृष्टिकोण नहीं है । सभी विचारक किसी भी घटनामें आविर्भाव-तिरोभावके विचारको आदर देते हैं । जिसकी आयति ( भविष्य ) उत्तम होती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है । इसीलिये द्वितीयाके चन्द्रका वन्दन किया जाता है; क्योंकि वह उत्तरोत्तर वर्धमान दशामें रहता है । आयतिशून्य पूर्णिमाका पूर्ण चन्द्र भी इतना मांगलिक नहीं माना जाता; क्योंकि उसके अभ्युदयके दिन समाप्त हो चुके होते हैं, अब उसका उत्तरोत्तर ह्रास ही होनेवाला है— ' प्रतिपच्चन्द्रमिव प्रजाः । ' फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि जो ह्रासको प्राप्त हो रहा है, अब उसका विकास होगा ही नहीं । देखते ही हैं कि जिस चन्द्रमाका ह्रास होता है, उसीका पुनः विकास होता है । जिस समुद्रमें भाटा आता है, उसमें पुनः ज्वार आता है । अनेक बार मनुष्यकी रुग्णता और पुनः स्वस्थता होती है । माली हालतमें भी बिगाड़, सुधार होता रहता है । पृथ्वी अनेक बार अनुर्वरा हो जाती है, उपज घट जाती है; पुनः उपचारसे उर्वरा बनायी जाती है । मार्क्स तथा लेनिनकी भविष्यवाणी थी कि ' मजदूरोंद्वारा ही क्रान्ति होगी । किसान सामान्य पूँजीवादी भले ही संख्यामें अधिक हों और गरीब भी हों; तब भी वे कभी वर्धमान, विकासमान नहीं हैं; अतः उनकी कभी उन्नति होनेवाली नहीं । ' पर चीन और भारतमें ठीक इसके विपरीत हुआ, यहाँ किसानों, मध्यवर्गों, सामान्य उत्पादन साधनवालों अर्थात् साधारण
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७०२ मार्क्सवाद और रामराज्य पूँजीपतियोंद्वारा ही क्रान्ति हुई । इतना ही नहीं, भारतमें तो शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक आन्दोलनद्वारा पर्याप्त सफलता मिली है, जिसकी मार्क्सवादमें कल्पना भी नहीं हो सकती । परिवर्तनसम्बन्धी एंजिल्सकी बात अध्यात्मवादीके लिये कोई नवीन वस्तु नहीं है । हाँ, आत्मा कूटस्थ होनेसे अपरिवर्तनशील है, वह सब परिवर्तनोंका द्रष्टा है, अन्यथा परिवर्तनका अस्तित्व भी कैसे सिद्ध होगा? बाह्य वस्तुओंमें मन एवं मानसिक परिवर्तनोंके होनेपर भी सर्वसाक्षी अपरिवर्तित ही रहता है । सच्ची बात तो यह है कि मार्क्सवादियोंने भारतीय दर्शनोंकी गम्भीरता ही नहीं समझी । वे अध्यात्मवादके नामपर बहुत-सी अनर्गल बातें कहते हैं । अध्यात्मवादी सामान्य - वृद्धिरूप विकास नहीं मानते, किंतु बादलोंके संघर्षसे या ऋणात्मक, धनात्मक विद्युत्- धाराओंके सम्पर्कसे एकाएक महान् प्रकाश-जैसा द्रुतगामी प्रकाशरूप विकास भी मानते हैं । जलका बर्फ बन जाना और बाष्प बन जाना यह कौन नहीं जानता? इसे एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाकी कुदान कही जाय या क्रमवर्धन परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम कह लिया जाय अथवा सीधी भाषामें परिणामविशेष कह लें, कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ता । इसी तरह विकासकी गति उत्तरोत्तर अग्रगति, ऊर्ध्वगतिकी ओर अवश्य होती है; परंतु जिनका इतिहास क्षुद्रतम है, उन्हीं लोगोंके लिये ऐसी अनुभूति होती है । जिनके यहाँ वर्तमान सृष्टिका ही इतिहास अरबों वर्षोंका है, फिर अनन्त सृष्टि - संहारोंका इतिहास भी जिनके सामने है, उनके लिये तो चन्द्रमा ह्रास- विकासके तुल्य, सूर्यके उदय - अस्तकी तरह दिन- रात, जन्म- मरण, समुद्रके ज्वार- भाटा, सोने-जागने तथा ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त शिशिर, वसन्त ऋतुके परिवर्तनके तुल्य सृष्टि-प्रलयकी परम्परा चलती है । संसारके सबसे प्राचीन ग्रन्थ अपौरुषेय अनादि वेद कहते हैं- ' ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत(तै० आ० १० ॥ १ । १४ ) ' धाताने यथापूर्व ही सूर्य- चन्द्रका निर्माण किया । ' महादार्शनिक
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- मार्क्स दर्शन ७०३ भगवान् श्रीकृष्ण गीतामें कहते हैं— ' भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । ' ( ८ । १९ ) ये वे ही भूतग्राम पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन होते हैं । यह प्रपंच-प्रवृत्ति निरुद्देश्य नहीं है । जड प्रकृतिका स्वतन्त्र कोई उद्देश्य नहीं होता । उद्देश्य चेतनका ही होता है । अनादि अविद्या काम - कर्मबद्ध जीवोंको भोग एवं अपवर्ग सम्पादन करना ही प्रकृतिप्रवर्तनका ईश्वरीय उद्देश्य है । मार्क्सय विचार- धाराका आधार इतिहास लघुतम है । जिसमें कुछ शताब्दियोंसे ही मनुष्य संसारकी उत्पत्ति, वर्गसंघर्षके इतिहासका प्रारम्भ और कुछ ही शताब्दियोंमें वर्गसंघर्षके इतिहासकी समाप्ति भी हो जाती है । मार्क्सके मतानुसार कम्युनिष्ट- राज्य होते ही वर्ग - संघर्षकी समाप्ति हो जाती है । इस वर्ग- संघर्षके भी विकासकी उत्तरोत्तर प्रगति क्यों नहीं होती, यह तो वे ही जान सकते हैं । यदि किसी भी सिद्धान्तके विरोधी कुछ लोग हो सकते हैं और उनकी संख्या बढ़कर प्रतिवाद खड़ा हो जाता है, तो कम्युनिज्म ही इसका अपवाद क्यों? उसके भी तो विरोधी हैं ही, उनकी संख्या भी बढ़ती ही है । सिद्धान्ततस्तु—
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम्॥
( वाल्मी० रा० अयोध्या० १०५ । १६ ) संसारके सभी संग्रहोंका एक दिन क्षय होता है, सभी उत्थानोंका एक दिन पतन होता है, सभी संयोगोंका एक दिन वियोग होता है और सभी जीवनोंका एक दिन मरण होता है । फिर कम्युनिष्ट राज्यका कभी अन्त न होगा, यह कल्पना भी अन्ध- विश्वास ही है । यदि सब पुरानी वस्तुओंका विनाश होता है, तो कभी कम्युनिष्टराज्य या वर्गविहीन - राज्य भी पुराना होगा और इसका भी विनाश, ध्वंस किंवा निर्वाण ध्रुव है । एंजिल्सके शब्दोंमें ' प्रकृति द्वन्द्वमानका परीक्षास्थल है । ' यह मानना पड़ेगा कि आधुनिक प्रकृति-विज्ञानने इसके प्रभूत उदाहरण दिये हैं, जो
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७०४ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं और इस प्रकार यह प्रमाणित कर दिया है कि अन्तिम विश्लेषण करनेपर प्रकृति आतिभौतिक नहीं बल्कि द्वन्द्वात्मक है । अनन्तकालसे यह किसी चित्रगतिसे नहीं घूमती; बल्कि इसका एक इतिहास है । यहाँ डार्विनका नाम सर्वप्रथम है, जिसने यह प्रमाणित कर कि आजका सावयव संसार उद्भिज्ज पशु और इस प्रकार मनुष्य भी कोटिशः वर्षोंकी विकास-क्रियाका परिणाम है, प्रकृतिकी आतिभौतिक कल्पनापर प्रचण्ड प्रहार किया । वह कहता है -' भूतविज्ञानमें प्रत्येक परिवर्तन परिणामका गुणमें परिवर्तन है । यह परिणाम किसी-न-किसी प्रकारकी गतिका परिणाम है, जो या तो वस्तुविशेषमें वर्तमान है या उसको दी जाती है । उदाहरणार्थ पानीके उत्तापको एक सीमातक बढ़ाते हुए उसकी द्रवावस्थापर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । लेकिन ज्यों- ज्यों यह उत्ताप घटता या बढ़ता है, एक क्षण आता है, जब पानीकी अवस्थामें परिवर्तन होता है और एक दशामें यह भाप बन जाता है और दूसरी दशामें बर्फ । किसी प्लैटिनमके तारको गर्म करनेके लिये कि वह चमक सके, एक निश्चित परिमाणकी बिजली आवश्यक है । हर खनिज पदार्थके लिये गलनेका एक विशेष उत्ताप होता है । हर वायवीय पदार्थके लिये एक निश्चित बिन्दु है, जब कि उचित ठंढक और दबावके प्रयोगसे उसको तरल पदार्थमें परिणत किया जा सकता है । पदार्थ -विज्ञानमें जिनको स्थिरसंज्ञक माना जाता है, अधिकांश क्षेत्रमें वे ही बिन्दु हैं, जब गति या बिन्दुके ह्राससे वस्तुविशेषमें गुणात्मक परिवर्तन होता है । ऐसी स्थिर संज्ञाका उदाहरण है वह कोण, जिसपर आलोक रश्मिका परिवर्तन होकर सीधा प्रतिफलन होता है । ' रसायनशास्त्रपर विचार करते हुए एंजिल्स आगे चलकर कहता है— ‘ रसायनशास्त्रके विज्ञानका सार यह है कि वस्तुओंमें परिमाणात्मक परिवर्तनके फलस्वरूप उसके गुणोंमें परिवर्तन होता है । हीगेलको इसका ज्ञान था । अम्लजन, यदि इसके अणुमें दो न होकर तीन परमाणु हों, तो यह ओजोन बन जाता है, जिसका गुण साधारण अम्लजनसे भिन्न है । अतिभौतिकवादके विरुद्ध द्वन्द्वमान यह समझता है कि सब वस्तुओंमें तथा
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- मार्क्स दर्शन ७०५ दृश्यगत घटनाओंमें अन्तर्विरोध वर्तमान है; क्योंकि इनमें एक भावात्मक और दूसरा अभावात्मक कोण है । एक भूत तथा भविष्य है । इनमें कुछ विकास हो रहा है, परिमाणात्मक परिवर्तनोंकी गुणात्मक परिवर्तनोंमें परिणति हो रही है । विकास क्रियाकी भीतरी बात है इन विरोधियोंका संघर्ष, पुराने और नयेमें; जिसका विनाश हो रहा है और जन्म हो रहा है, उसमें; जो अदृश्य हो रहा है तथा जिसका विकास हो रहा है, उसमें । ' आधुनिक विज्ञान कोई ऐसी चीज नहीं है, जो इदमित्थं सही हो और उसके आधारपर आत्मा, धर्म तथा ईश्वरकी समस्या हल की जा सके । उसके सम्बन्धमें कितने ही विकल्प हैं । लार्ड केल्विनकी घोषणा थी कि वे ऐसा भाव समझनेमें असमर्थ थे, जिसको वे यन्त्र -रचनामें परिणत न कर सकें, परंतु अब तो केन्द्राकर्षण, काल और दिक्सम्बन्धी विचारतक बदल गये । गणित तथा पदार्थ- विज्ञानमें बहुत-से सिद्धान्त ऐसे हैं, जो परस्पर विरोधी हैं । उदाहरणार्थ पहले यूक्लिडके स्वत: सिद्ध नियम अनिवार्य विचार- तत्त्व माने जाते थे; परंतु सालिवानके अनुसार अब वह पुरानी वस्तु हो गयी । उनका कहना है आजसे सौ वर्ष पूर्व लोवाशेफ्स्की नामक रूसीने और बोलीयाई नामक हंगेरियनने यह जान लिया था कि यूक्लिडका रेखागणित अविवेच्य आवश्यकताका स्थान नहीं ले सकता । दो हजार वर्षतक यूक्लिडके सिद्धान्तोंने निर्विरोध राज्य किया, सभी वैज्ञानिक उन्हें जितना मनुष्योंके लिये, उतना ही देवताओंके या ईश्वरके लिये भी आवश्यक मानते थे । उस समय लोआशेफ्स्की तथा बोलियाईको लोग विक्षिप्त कहते थे । महान् विद्वान् गाँसतकको जो स्वयं इसे समझ चुका था, अपना आविष्कार प्रकाशित करनेका साहस न हो सका, परंतु अन्तमें लोआशेफ्स्की आदिकी बात मान्य हुई । सालिवानके अनुसार ' आज जर्मन रेखागणितकार रीमानके रेखा-गणितसे ही अपने प्रश्नोंका निर्णय होता है । ' अब वैज्ञानिकोंको विश्वास हो गया कि जिस दिक्में हमारा अस्तित्व है, वह यूक्लिडके रेखा-गणितके नियमोंपर नहीं चलती, रीमानके दो रेखागणितके नियमोंपर चलती है । आज पहलेके सिद्धान्तोंके विपरीत मान्यता है कि दिक्का 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_23_1_Front
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७०६ मार्क्सवाद और रामराज्य विस्तार असीम नहीं, सीमित है । दो बिन्दुओंके बीचका न्यूनतम अन्तर ऋजु रेखा नहीं, एक त्रिकोणके तीनों कोण सम्मिलित होकर दो समकोण नहीं बनाते । प्रकाशकी किरणें ऋजु रेखाओंमें नहीं फैलतीं । जिस वस्तुपर प्रकाश-रश्मि पड़ती है, उसपर दबाव डालती है । सीमित एवं गोलाकार दिक्का आकार निरन्तर तेजीसे बढ़ता जा रहा है । दिक् पारिमाणिक नहीं । एक परमाणुका प्रभाव सम्पूर्ण विश्वपर रहता है । परमाणुमें इलेक्ट्रान ( परमाणुका अस्थिर शक्तिकण ), प्रोटान ( केन्द्रित शक्तिसमूह ) -के चारों ओर घूमे हुए बिना ही बीचके स्थानकी यात्राके एक मार्ग चिह्नसे दूसरे मार्गचक्रमें पहुँच जाता है । आज तो विज्ञान - वेत्ताओंने विद्युत्कणको स्वेच्छाचारी भी मान लिया है, जिससे यन्त्रवादका बिलकुल ही नाश हो जाता है । जिस आइजक न्यूटनके केन्द्रिय आकर्षणका सिद्धान्त आज भी श्रद्धासे पढ़ाया जाता है, उसीके सम्बन्धमें सालिवानका कहना है कि न्यूटनका यह आविष्कार और इसकी पुष्टि मानुषी बुद्धिकी चरम कृति समझी जाती थी, तो भी आज हम केन्द्रियाकर्षणकी व्याख्या सर्वथा भिन्न परिभाषाद्वारा करते हैं । इस विषयपर हमारा सम्पूर्ण दृष्टिकोण न्यूटन दृष्टिकोणसे जड़से ही भिन्न है । न्यूटनके सिद्धान्तको लागू करनेसे कई अंशोंमें वह अवास्तविक और अशुद्ध ठहरता है । आज वह प्रणाली जड़ और शाखासहित उखाड़ फेंकी गयी, जिसकी नींवपर इस सिद्धान्तको खड़ा किया गया था । इस तरह आजके पाठ्यग्रन्थोंमें पढ़ाया जाता है कि पृथ्वीमें गम्भीर प्रवेश करनेवाली प्रकाशरश्मियाँ दूरवर्ती तारकगणोंके स्तरपर हो रहे द्रव्यनिर्माणकी उपज हैं । दूसरे सिद्धान्तद्वारा इसी प्रकारकी उपजका कारण द्रव्यनाश बतलाया जाता है, जो कि ठीक पूर्वके विपरीत है । एक सिद्धान्तके अनुसार अस्थिर विद्युत्कण तरंगका गुण रखते हैं, दूसरे सिद्धान्तके अनुसार कणोंका इनमेंसे किसीका भी त्यागना सम्भव नहीं; क्योंकि कुछ घटनाओंकी व्याख्या पहले सिद्धान्तानुसार होती है, कुछका दूसरे ही द्वारा । मनोविज्ञानके क्षेत्रमें भी परस्परविरोधी सिद्धान्तोंपर आधारित चार सम्प्रदाय बन गये हैं । इन फ्रायड, एटलर, यूंग और 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_23_1_Back
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- मार्क्स दर्शन ७०७ स्टैक्कैलके सम्प्रदायमें बड़े -बड़े प्रतिभाशाली विद्वान् अपने पक्षका समर्थन करते हैं । जीवशास्त्रमें भी आकस्मिक परिवर्तनोंके प्रश्नपर प्रो० वाइजमैन एवं लेमार्कके अनुयायी एक- दूसरेका निरन्तर विरोध करते हैं । एलोपैथिकमें बी० सी० जी० के प्रामाणिक विद्वान् पी० बी० बैंजमिनके अनुसार बी० सी० जी० प्रभावशाली एवं निरापद यक्ष्मानिरोधक उपचार है । पर डॉक्टर डब्ल्यू० एफ० ब्राडले ( इंग्लैंड ) अभी भी इसे विवादास्पद ही समझते हैं । पाश्चात्य मनोविज्ञानका प्रवर्तक फ्रायड कहता है कि हिस्टीरियामें जो डॉक्टर औषध देता है, वह कोरा ठग है; किंतु सभी डॉक्टर हिस्टीरियामें औषध देते हैं । सालिवानके अनुसार सत्यसे वैज्ञानिकोंका वास्तविक अन्तिम अभिप्राय सुविधासे है । वैज्ञानिक सैद्धान्तिक दृष्टिकोणसे अपने- आपको कुछ भी समझें, वास्तवमें वे क्रियासाधक होते हैं । अलेक्सिस कैरलका कहना है कि गणित, भौतिक और रसविज्ञान आवश्यक विज्ञान हैं, परंतु चेतन द्रव्योंकी खोजमें मूल प्रारम्भिक विज्ञानोंका स्थान इन्हें प्राप्त नहीं हो सकता । उसके अनुसार मानव -जातिके दुष्ट और पतित बड़ी संख्याके नियन्त्रण तथा मार्गदर्शनके लिये सात्त्विक आहार- विहारद्वारा आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले तपस्वियोंकी एक अल्प संख्या बननी चाहिये - यह भारतीय ही सूझ है । अभी थोड़े ही दिन हुए डॉक्टर लोकी यह बात इंग्लैण्डकी विज्ञानपरिषद्में दुहरायी गयी है कि आधुनिक विज्ञानकी सबसे बड़ी खोज यह है कि ‘ अभी हमलोग कुछ भी नहीं जानते हैं । ' फिर विज्ञानके बलपर मार्क्स, एंजिल्सका सब कुछ जान सकनेका दावा करना निरा दम्भ नहीं तो क्या है? जहाँ अभीतक अहंतत्त्व और महत्तत्त्वतक; शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध — इन मात्राओंको जाननेमें विज्ञान सफल नहीं हुआ है, फिर अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृतिकी बात तो दूरकी है । फिर ' अणोरणीयान् ' आत्मा और परमात्माको वैज्ञानिकोंकी यान्त्रिक कसौटीपर कसना केवल उपहासास्पद नहीं तो क्या है? इसी प्रकार एंजिल्स तथा मार्क्सका इतिहास महान् आर्ष इतिहासकी अपेक्षा एक विकृत अप्रामाणिक क्षुद्रतम इतिहास है, अतः इसके आधारपर संसारका स्वरूप निर्धारित नहीं 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_23_2_Front
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७०८ मार्क्सवाद और रामराज्य हो सकता । डार्विनने स्वयं ही अपने लिये अनेक विषयोंको अज्ञेय माना है । उद्भिज्ज, पशु और मनुष्योंकी विकास- कहानी स्वयं ही अप्रामाणिक है, फिर इसके द्वारा अतिभौतिकवादपर प्रचण्ड आघात आकाशमुष्टिहननके तुल्य है । हेतुविशेषोंसे वस्तुओंका रूपान्तरण होता है; किंतु वह रूपान्तरण वस्त्वन्तरण नहीं है । बर्फ हो जानेपर भी वस्तु जल ही रहता है । इसी तरह भाप बन जानेपर भी जलका अभाव नहीं हो गया । 'नासतो विद्यते भावः ' का निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर है । जैसे प्रसारित पट और संकुचित पट पटकी अवस्था -विशेष है, वैसे ही बर्फ और भाप जलकी अवस्था- विशेष ही हैं । अन्य उदाहरण भी इस सिद्धान्तके विरोधी नहीं हैं । रसायनशास्त्रके उदाहरण भी उक्त सिद्धान्तके बाधक नहीं हैं । अम्लजनके तीन परमाणुओंसे ओजोन बनता है, उसका गुण अम्लजनसे भिन्न होता है । इसी तरह नैयायिकोंके अनुसार दो परमाणुओंके द्व्यणुक बनते हैं; परंतु तीन परमाणुका कुछ भी नहीं बनता । छः परमाणुओंका त्रसरेणु बनता है, पाँचका कुछ नहीं । औषधोंकी मात्राभेदसे गुणभेद तो प्रसिद्ध ही है । पृथक् - पृथक् ओषधियोंके गुणोंसे सम्मिलित ओषधियोंके गुणोंमें संसर्गजनित विशेषता होती है । एक मात्रासे पानी, अन्न या दुग्ध शरीरके पोषक होते हैं और वे ही दूसरी मात्रासे शरीरके नाशक बन जाते हैं । ऐसी बातोंको अतिभौतिकवादके विरुद्ध समझना नितान्त भ्रम है । वस्तुओं एवं घटनाओंमें अन्तर्विरोधकी कल्पना भी तत्त्वशून्य है । भावात्मक - अभावात्मक यदि क्रमिक हों तो उनका विरोध कहा ही नहीं जा सकता, विरोध तो सम देश-कालमें उसी वस्तुके भावाभावका होता है । भूत और भविष्य आविर्भाव- तिरोभाव पुराने -नये - ये सभी भिन्नकालिक होनेसे विरोधी हैं ही नहीं । पिता-पितामहादि प्राचीन, पुत्र-पौत्रादि नवीन, अध्यापक प्राचीन, छात्र नवीन, इनमें विरोध नहीं है, किंतु उपकार्योपकारभाव है । मनुष्यकी बैठने, लेटने, चलने आदिमें कई ढंगकी अवस्थाएँ विकसित होती हैं, जो परस्पर एक- दूसरेसे विलक्षण होती हैं । इसी तरह बीजके अवयवोंकी बीज, अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा आदि अनेक 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_23_2_Back