मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 721–730

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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- मार्क्स दर्शन ७१९ व्यर्थकी परीक्षाएँ होती हैं, वे अमान्य होती हैं । कहा जाता है कि ' प्रत्येक वस्तु विराट् विश्वप्रक्रियाका एक अंग है । इसकी प्रकृतिको इसकी रूपान्तरिक अवस्थासे अलग करके नहीं समझा जा सकता । ' यही लेनिनका तीसरा सूत्र है । ' हमें वस्तु या दृश्यगत घटनाओंके विकास, इसकी अपनी गति, इसके अपने जीवन आदिका विचार करना चाहिये । लेकिन यह विकास ऐसा नहीं है, जो मनमानी ढंगसे, बिना किसी कारणके रहस्यमयरूपमें होता है । विकास सदा बाहरी सम्बन्ध तथा आन्तरिक सम्बन्धोंकी जाँचका है । हमें वस्तुकी अन्तर्विरोधी प्रवृत्तियों और दिशाओंकी खोज करनी चाहिये । ' यही लेनिनका चौथा सूत्र है । पाँचवाँ सूत्र है कि ' हमें वस्तुको विरोधियोंके एकत्व तथा योगफलके रूपमें देखना चाहिये । ' छठा सूत्र है -इन विरोधियोंके पटविस्तार तथा संघर्षको हमें देखना चाहिये और सातवाँ सूत्र वस्तु-विश्लेषण तथा समन्वयका एकीकरण है । आठवाँ सूत्र है - प्रत्येक वस्तुका सम्बन्ध न केवल बहुविध है, बल्कि सार्वभौमिक है । प्रत्येक वस्तु प्रत्येक अन्य वस्तुसे सम्बन्धित है । नवाँ सूत्र न केवल विपरीतोंका एकत्व बल्कि प्रत्येक गुणका उसके विपरीतमें रूपान्तरित होना है । दसवाँ सूत्र नये पार्श्वों और सम्बन्धोंके दृश्यगत होनेकी असीम क्रिया है । ग्यारहवाँ सूत्र है - मनुष्यद्वारा वस्तु, दृश्य, क्रिया इत्यादिके ज्ञानको गहराई में ले जानेकी तथा बाह्यावरणसे तत्त्वपर और कम गहराईके तत्त्वसे अधिक गहराईके तत्त्वपर पहुँचनेकी असीम क्रिया । बारहवाँ सूत्र है – सह अस्तित्वसे कार्यकारणके सम्बन्धको पहुँचना । एक प्रकारके सम्बन्ध और पारस्परिक निर्भरतासे अधिक गहरा तथा अधिक व्यापक सम्बन्ध- तथा पारस्परिक निर्भरताकी ओर जाना । तेरहवाँ सूत्र निम्नस्तरसे ऊँचे स्तरपर विकासकी क्रियामें कुछ गुणोंकी पुनरावृत्ति है । चौदहवाँ सूत्र प्रतीयमानरूपसे पुराने रूपपर लौट जाना ' प्रतिषेधका प्रतिषेध ' है । रामराज्यकी दृष्टिमें प्रत्येक वस्तु महाविराट्का ही अंश है । सुतरां मूलके गुण- धर्म, शाखा-उपशाखाओंमें होने उचित ही हैं । कारणकी अपेक्षा कार्योंमें अनिर्वचनीय विलक्षणता भी होती ही है । स्पष्टतया

पृष्ठ 722

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७२० मार्क्सवाद और रामराज्य स्पर्शहीन आकाशसे स्पर्शवान् वायुकी, रूपहीन वायुसे रूपवान् तेजकी उत्पत्ति स्पष्टरूपसे होती है । मनमानी ढंगसे विकास तो जडवादी ही मानते हैं । अध्यात्मवादी तो हरएक कार्यके साधारण, असाधारण - कई ढंगके कारण मानते हैं, परंतु सभी कारण दृष्ट ही नहीं, कुछ अदृष्ट भी होते हैं । दिक्, काल, आकाश, ईश्वर, अपूर्व ' अदृष्ट ' प्रागभाव, प्रतिबन्धकाभाव आदि साधारण कारण होते हैं । उपादान, निमित्त, सहकारी आदि अनेक असाधारण कारणका योग होता है, तभी कोई विकार सम्पन्न होता है । विरोधियोंके एकत्वकी अपेक्षा सहयोगियोंके सहयोगसे कार्यकी उत्पत्ति कहना कहीं अधिक संगत है । विरोधियोंके संघर्षकी कल्पनाकी अपेक्षा यही कहना ठीक है कि किसी समान उद्देश्यकी सिद्धिके लिये विरोधी भी सहयोगी हो जाते हैं । विरोधियोंके संघर्षका सहयोगरूपमें परिवर्तन हुए बिना दोमेंसे एकका विनाश ध्रुव है I। फिर विरोधियोंकी एकताका स्वप्न व्यर्थ ही है । संघर्ष रहते हुए पदविस्तारकी कल्पना भी निराधार है । वस्तुके विश्लेषण तथा समन्वयका एकीकरण क्रमेण विश्लेषण, विभाजन तथा समन्वय हो सकता है, परंतु समकालमें दोनोंका अस्तित्व तथा एकीकरण असंगत एवं अप्रमाणित है । प्रत्येक वस्तुके सम्बन्धोंका बहुविधत्व, सार्वभौमत्व अंशतः ठीक ही है; पर इसमें भी सहयोग विरोध तथा उदासीनताको भी गिन लेना चाहिये । वाच्यत्व, प्रमेयत्वादि तथा दैशिक, कालिक सार्वभौम सम्बन्ध अध्यात्मवादको भी मान्य है । किंतु इससे कोई माक्सय अभिप्राय नहीं सिद्ध होता । विपरीतोंका एकत्व तथा प्रत्येक गुणका रूपान्तरित होना सारशून्य है । भाव- अभाव, सत्- असत् आदि विपरीतोंकी एकता असम्भव है, यह कहा जा चुका है । अग्नि, जल, सत्त्व, रज आदि विपरीतोंका एकत्व न कहकर सहयोग ही कहना ठीक है । कारणकी अपेक्षा कार्योंमें तथा अल्पसंख्यकोंकी अपेक्षा बहुसंख्यकोंमें गुणधर्मका वैलक्षण्य अध्यात्मवादमें मान्य है । मृत्तिकासे जलानयनका कार्य नहीं सम्पन्न होता, मृत्तिकाके कार्य घटसे वही कार्य सम्पन्न हो जाता है । तृण साधारण नगण्य

पृष्ठ 723

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- मार्क्स दर्शन ७२१ तथा अल्पशक्ति होता है, पर वही सामूहिकरूपमें एकत्रित रज्जु बनकर दुरुच्छेद्य बन जाता है । वस्तुतः कारणसे भिन्न होकर कार्य नहीं होता, फिर भी व्यवहारमें कारण- कार्यका वैलक्षण्य मान्य होता है । अतत्त्वभूत रज्जुसर्पसे भी सत्य भय- कम्प आदि देखा जाता है । अतएव नये पार्श्वों और सम्बन्धोंकी कल्पना निराधार है; क्योंकि अत्यन्त अविद्यमान कोई वस्तु या सम्बन्ध व्यक्त नहीं होता है । वटबीजमें जितनी शक्ति विद्यमान है, उतना ही विकास होता है । विकास ही नहीं, किंतु विकासके साथ ह्रास भी स्पष्ट दिखायी देता है । संश्लेषण -विश्लेषणकी विचित्रतासे शक्तियोंमें विचित्रता भी परिलक्षित होती है । औषधोंके संयोग-वियोग तथा पौधोंके कलम ' जोड़ ' से तथा बीजोंके संस्कारसे विकासमें विचित्रता होती है; फिर भी विकास निस्सीम नहीं है । प्रत्येक वस्तुमें 'जायते अस्ति वर्धते ' के बाद ही ' विपरिणमते अपक्षीयते एवं विनश्यति ' की स्थिति आ जाती है । अर्थात् उत्पत्ति वृद्धिकी एक सीमा है । उसके बाद ही विपरिणाम, अपक्षय एवं विनाश आ जाता है । व्यष्टिमें जो गुण- धर्म हैं, समष्टिमें भी उनका अस्तित्व रहता है । अतः शुद्ध स्वप्रकाश ब्रह्मातिरिक्त किसी भी वस्तुको निस्सीम नहीं कहा जा सकता । जब संसारमें सावयव पदार्थोंकी उत्पत्ति और विनाश दृष्ट है, तब सावयव विश्व- प्रपंचकी भी उत्पत्ति तथा विनाश मानना अनिवार्य है । प्रवाह भी प्रवाहियोंसे भिन्न नहीं होता । दिन-रातका प्रवाह या बीजांकुरका प्रवाह एवं कर्म तथा देहोंका प्रवाह आदि सभी प्रवाह प्रवाहियोंके अनित्य होनेसे अनित्य ही है । जिस वस्तुका प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव बन सकता है, उस वस्तुको निस्सीम कहना उपहासास्पद ही है । जैसे अनादि परमाणुकी श्यामता अग्निजन्य पाकसे नष्ट होती है, अग्निसे दग्ध होनेसे अनादि बीजांकुरकी परम्परा टूट जाती है, उसी तरह विश्वप्रपंचकी परम्परा भी कालसे किंवा तत्त्वज्ञानसे टूट जाती । मार्क्सवादी विश्वकी निस्सीमतामें प्रत्यक्ष-प्रमाण एवं प्रत्यक्ष साधन - यन्त्रोंका प्रयोग वर्तमान कालके लिये जो भी करें, परंतु

पृष्ठ 724

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७२२ मार्क्सवाद और रामराज्य भविष्यके सम्बन्धमें तो प्रत्यक्ष या यन्त्र कथमपि सफल नहीं हो सकते । अनुमान कोई ऐसा निर्दोष नहीं है, जिससे विश्वकी अनन्तता या निस्सीमता विदित हो सके । फिर क्रिया कोई भी चाहे वह प्रातिस्विक हो या सामूहिक, निःसीम नहीं कही जा सकती । मनुष्यद्वारा वस्तु, दृश्य, क्रिया इत्यादिके ज्ञानकी गहराईमें ले जानेकी तथा बाह्यावरणसे तत्त्वपर और कम गहराईके तत्त्वसे अधिक गहराईपर पहुँचनेकी असीम क्रियाकी बात भी कल्पना ही है । अतत्त्व अनात्मसम्बन्धी ज्ञान यद्यपि अल्पज्ञ जीवके लिये असीम ही है; फिर भी सर्वज्ञ ईश्वरके लिये वह भी निस्सीम नहीं । दूसरी दृष्टिसे ज्ञातरूपसे तथा अज्ञातरूपसे सभी वस्तु साक्षीभास्य हैं -' किञ्चिज्जानामि किञ्चिन्न जानामि ' अमुकको नहीं जानता हूँ, अमुकको जानता हूँ- इस रूपसे अज्ञानविषयतया या ज्ञानविषयतया सभी वस्तु साक्षीभास्य हैं । सर्वकारण सर्वाधिष्ठानरूपसे भी परम तत्त्वका ज्ञान अन्तिम ही तत्त्वज्ञान है । इसी ज्ञानके सम्बन्धमें गीताचार्यका कहना है— ' ' यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ (७।२) जिसको जानकर पुनः अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रहता । 'एतबुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ ' ( १५/२० ) इस तत्त्वको जानकर प्राणी बुद्धिमान् होता है और कृतकृत्य हो जाता है । उपनिषदें भी कहती हैं- आत्माके श्रवण, मनन, विज्ञानमें सबका श्रवण, मनन तथा विज्ञान हो जाता है— ' आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ' ( बृहदा० उप० २।४।५ ) जैसे पृथ्वीके विज्ञानसे पार्थिवतत्त्व, जलके विज्ञानसे जलीयतत्त्व तरंग आदिका विज्ञान हो जाता है, वैसे ही सर्वकारण सर्वाधिष्ठान विज्ञानसे सब कुछ विज्ञात हो जाता है । सहयोगियोंका सहअस्तित्व तो सभी मानते हैं । विरोधियोंका

पृष्ठ 725

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- मार्क्स दर्शन ७२३ सहअस्तित्व अगर मार्क्सवादको मान्य है, तब तो फिर मजदूर और मालिकका भी सहअस्तित्व हो ही सकता है । फिर मार्क्सवादी चूहा, बिल्लीके तुल्य वर्गोंका अमिट विरोध क्यों मानते हैं? पारस्परिक सम्बन्ध तथा निर्भरताकी बात अच्छी है, पर स्वात्मनिर्भरताका भी महत्त्व नहीं भूलना चाहिये । परमुखापेक्षिता दोष भी है । अध्यात्मपक्ष माननेपर तो बाह्य साधनानपेक्षता बड़े ही महत्त्वकी वस्तु है । उत्तरोत्तर ज्ञान, क्रिया, शक्तिका विकास हो रहा है, संसार उन्नतिके उच्च शिखरकी ओर बढ़ रहा है, इस विश्वासमें भी अन्धविश्वासका ही अंश अधिक है । स्तर- भेद होनेपर भिन्नता ही कहनी चाहिये, पुनरावृत्ति नहीं । प्रतिषेधके प्रतिषेधकी मार्क्सवादी मान्यता असंगत है, यह पीछे दिखाया जा चुका है । अंकुरके कारणभूत जौके दाने अंकुरके फलभूत जौके दानोंसे सर्वथा भिन्न हैं । यह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण नहीं हो सकता । इसका शुद्ध उदाहरण पीछे दिखलाया जा चुका है । ' पन्द्रहवाँ सूत्र लेनिनका है - रूप और सार, आकार और आकारके अन्दर अस्तित्वका संघर्ष तथा इसका विपरीत । सोलहवाँ सूत्र है— परिमाणका गुणोंमें परिवर्तन तथा इसका विपरीत; व्याख्या और उदाहरण । जीवनका उदाहरण प्रकृतिके द्वन्द्वात्मक रूपपर स्पष्ट प्रकाश डालता है । अवयवके तथा कोषके जीवनमें जीवन और मृत्यु आविर्भाव और तिरोभाव, अन्तर्ग्रहण तथा बहिर्मोचन, भूत और शक्तिको ये पास-पास ही मिलते हैं तथा परस्पर संश्लिष्ट रहते हैं । इसके अतिरिक्त पूँजीवादमें अन्तर्विरोधके तीन सूत्र हैं - १. प्रत्येक भिन्न फैक्टरीमें उत्पादनका सुचारुरूपसे संघटन होता है और सामाजिक उत्पादन क्षेत्रमें अराजकताकी चेष्टा की जाती है । २. एक ओर मशीनकी उत्पत्ति और उत्पादनका विस्तार प्रत्येक पूँजीवादीके लिये बाध्यतामूलक नियम है; दूसरी ओर उद्योगकी रिजर्व सेनामें वृद्धि और सामयिक संकटका बार- बार होना, ये उत्पादनके सम्बन्ध पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धोंके विरुद्ध विद्रोह करते हैं । ३. सम्पूर्ण पूँजीवादी प्रथामें एक ओर पूँजी ही सम्पत्ति है और दूसरी ओर उद्योगमें पूँजीका प्रयोग किया जाता है, यानी एक ओर बैंकमें एकत्रित पूँजी है

पृष्ठ 726

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७२४ मार्क्सवाद और रामराज्य और दूसरी ओर औद्योगिक पूँजी है । इस प्रभेदके उदाहरण हैं सूदजीवी, जिनकी जीविका है पूँजीपर सूदद्वारा और दूसरे जो अपनी जीविका पूँजीके व्यावहारिक प्रयोगसे अर्जन करते हैं । ' ( लेनिन ) ' हर प्रथा या क्रियाके आन्तरिक विरोधोंके रूप और गुण भिन्न होते हैं । सर्वहाराके अधिनायकत्वमें राष्ट्रका लोप भी विरोधका उदाहरण है, पर यही वर्ग - संघर्षके अन्तका कारण बन जाता है और इस प्रकार राष्ट्रका लोप होता है । आपेक्षिक और पूर्ण सत्य भी विरोधका उदाहरण है । विशिष्ट और व्यापकके सम्बन्धमें अन्तः प्रवेश भी विरोधका एक उदाहरण है । व्यापक ( साधारण ) -के सम्बन्धसे विच्छिन्न होकर विशिष्टका कोई अस्तित्व नहीं है और विशिष्टोंसे ही व्यापकका अस्तित्व है । प्रत्येक व्यापकरूप केवल करीब- करीब ही सब विशिष्ट वस्तुओंको अपनी व्यापकतामें ला सकता है और प्रत्येक विशिष्ट वस्तु कुछ-न-कुछ व्यापक रूप ग्रहण करती है । ' अन्तर्विरोधपर बुखारिन ' एक- दूसरेकी विरोधी भिन्न कार्यकारी शक्तियाँ पृथ्वीमें वर्तमान हैं । व्यतिक्रमके रूपमें इन शक्तियोंका समीकरण होता है, तब विरामकी स्थिति होती है । यानी उनके वास्तविक विरोधपर एक आवरण पड़ जाता है । लेकिन किसी एक शक्तिमें तनिकमात्र परिवर्तन करनेहीसे अन्तर्विरोधोंका पुनराभास होता है और उस समीकरणका अन्त होता है और यदि एक नये समीकरणकी सृष्टि होती है तो यह एक नये आधारपर यानी शक्तियोंके एक नये संयोगसे ही होती है । मार्क्सय द्वन्द्वन्याय इस विरोधको भुला नहीं देता, लेकिन सामाजिक विकासमें इस विरोधको मुख्य स्थान नहीं देता । इतिहासके अध्ययनसे हम यह पाते हैं कि यद्यपि भिन्न देशोंमें भूगोल, जलवायु, उद्भिज्ज, जंगम और प्राकृतिक सम्पद्में परिवर्तन नहींके बराबर हुआ, तथापि वहाँके सामाजिक सम्बन्धोंमें महान् परिवर्तन हो गये, जैसे सामन्तप्रथाके स्थानपर पूँजीवादकी स्थापना । ' रूप एवं सार आदिका संघर्ष तथा परिमाणका गुणमें परिवर्तनकी

पृष्ठ 727

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- मार्क्स दर्शन ७२५ कल्पना निराधार है । जीवन-मृत्युका तिरोभाव - आविर्भाव, अन्तर्ग्रहण तथा बहिर्मोचन आदि काल और विषयभिन्न होनेसे विरोध या संघर्षका प्रश्न ही नहीं उठता । ये सब चीजें समान वस्तुके विषयमें समान कालमें परस्पर विरुद्ध ठहरती हैं । कालभेदसे किसी भी वस्तुका आविर्भाव -तिरोभाव आदि निर्विरोध ही है । इसी तरह एक ही कालमें एककी मृत्यु, अन्यका जन्म आदि होनेसे कोई विरोध नहीं होता । पूर्वगृहीत वस्तुका बहिर्विमोचन, अगृहीत वस्तुका ग्रहण भी परस्पर विरुद्ध नहीं है । अत: इसे संघर्ष नहीं कहा जा सकता । पूँजीवादके अन्तर्विरोधकी कल्पना भी अतात्त्विक ही है । रामराज्यप्रणालीसे उत्पादन तथा वितरणकी व्यवस्था होनेसे यह विरोध टिक ही नहीं सकता । धन एवं पूँजीका भेद सिद्धान्ततः अमान्य है । प्रजाके उपभोगार्थ उत्पादनसे भी लाभ आनुषंगिकरूपमें प्राप्त होता है । उत्पादन-कार्यमें लाभके अनुसार कामके घण्टोंमें कमी, मजदूरोंकी संख्याकी वृद्धि तथा मजदूरोंका भी उचित दर होनेसे न बेकारी ही रहेगी और न क्रयशक्तिमें ही कमी आयगी और न मालकी खपतमें कोई गड़बड़ी होगी । भोगोपयोगी वस्तुओंका ही निर्माण करना और मजदूरोंके समुन्नत जीवनस्तर बनानेकी जिम्मेदारी मालिकोंपर होगी । व्यक्ति, समाज तथा सरकार— सभीका अनिवार्यरूपसे यह कर्तव्य होगा कि बेकारी तथा आर्थिक असन्तुलन सर्वथा दूर कर दिया जाय । विद्रोह भी प्रचारमूलक है, वास्तविक नहीं । वर्गसहयोगकी सम्भावनाका विस्तार होनेसे विद्रोहका अन्त हो सकता है । मशीनोंकी उन्नति बाध्यतामूलक नहीं है, किंतु लोभमूलक ही है । अन्ततोगत्वा मनुके सिद्धान्तानुसार महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध भी आवश्यक होगा । जैसे विश्वका संहारकारक एवं अनिष्टकारक होनेसे हाइड्रोजन बम आदिके विकासपर प्रतिबन्ध लगाना मार्क्सवादियोंको भी आज आवश्यक प्रतीत हो रहा है, उसी तरह बेकारी एवं संघर्ष तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका नाश होनेसे महायन्त्रोंपर भी प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक होगा । अर्थ तथा औद्योगिक पूँजीका आपसमें कार्यकारण भाव है । दोनोंका दोनोंसे विस्तार होता है । उद्योगवृद्धिसे अर्थमें वृद्धि होती है । उससे

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७२६ मार्क्सवाद और रामराज्य उद्योगवृद्धिमें सहायता मिलती है । पूँजीपर सूद तो अब रूसमें भी मिलता है । पूँजी उत्पादनसाधन है, जैसे सब उत्पादनोंसे लाभ होता है, वैसे ही पूँजीसे भी सूदके रूपमें लाभ होना उचित ही है । फिर रामराज्यकी दृष्टिमें तो कुसीदवृत्ति निम्नकोटिका जीविका साधन माना जाता है । प्रथाओं एवं क्रियाओंमें अन्तर्विरोध अप्रामाणिक है । सर्वहाराके अधिनायकत्वमें राज्यलोपकी कल्पना तो अभी स्वप्न ही है । अभी तो सर्वहाराका अधिनायकत्व भीषण तानाशाही बन रहा है । सर्वहाराके अधिनायकत्वमें वर्गका लोप केवल डण्डेके बलपर प्रतीत होता है । वस्तुतः लेखनभाषण, प्रेसकी स्वतन्त्रता न होनेसे वर्गभेद व्यक्त नहीं हो पाता । जब कभी अवकाश मिलेगा, वर्गभेद व्यक्त हो जायगा । मजदूर किसान आदि समान वर्गोंमें भी परस्पर संघर्ष चलता ही है । सोवियत रूसमें भी कम्युनिष्टोंमें स्टालिन, ट्राटस्की आदिका भीषण संघर्ष विख्यात है । आपेक्षिक एवं पूर्ण सत्यका भी विषयभेद होनेसे विरोध असंगत है । एक ही वस्तु आपेक्षित तथा पूर्ण सत्य नहीं हो सकती, यह कहा जा चुका है । व्यापकमें कोई विरोध नहीं है— जैसे पशुत्वका गोत्वसे, मनुष्यत्वका ब्राह्मणत्वसे कोई विरोध नहीं । इसी प्रकार सभी व्यापक- व्याप्योंमें अविरोध ही है । बुखारिनका यह कथन आंशिक सत्य है कि एक- दूसरेके विरुद्ध भिन्न कार्यकारिणी शक्तियाँ पृथ्वीपर वर्तमान हैं । यह कहना उचित है कि विचित्र विश्वमें विरोधिनी तथा अनुरोधिनी अनेक प्रकारकी शक्तियाँ वर्तमान हैं । यदि विरोध ही जगत्का तथ्य है, तब तो सहयोगमूलक कार्य ही नहीं होना चाहिये । किंतु वैर, प्रेम, सहयोग, विरोध- सभी संसारमें चलता है । सत्त्वादि गुण परस्पर विरोधी होनेपर भी विमर्दवैचित्र्य, परस्पर सहकारसे वे भी कार्यक्षम होते हैं । गुणोंकी विषमतासे गुणोंमें सहकार होता है; समतामें विरोध होता है । सारी सृष्टि गुणोंकी विषमता एवं सहकारके आधारपर ही टिकी है । परिणामी गुणोंका समता, विषमता– दोनों ही धर्म है । प्रलयानुगुण कर्मोंकी अपेक्षासे समता तथा सृष्टिके अनुगुण कर्मोंसे विषमता होती है । संसारमें प्रेम, परोपकार, सहयोग स्वाभाविक है; विरोध, ध्वंस निम्नगामिनी प्रवृत्तियोंके परिणाम तथा

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- मार्क्स दर्शन ७२७ प्रामादिक हैं । वेदान्तकी दृष्टिसे सभी चराचर विश्व विशेषतः प्राणिवर्ग परमेश्वरकी ही संतान है—' अमृतस्य पुत्राः ।' उनका तो समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृता ही मुख्य स्वभाव है । विरोध ही आवरणका कारण होता है, आवरण हटते ही विरोधका कहीं पता नहीं लगता- 'उमा जे राम चरन रत बिगतकाम मदक्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥ ' जो जगत्की स्वाभाविक मूलभूत स्वाभाविक स्थितिको पहचानते हैं, वे लोग सम्पूर्ण संसारको भगवद्रूप ही देखते हैं । फिर वे किससे विरोध करें? स्वाभाविक स्थितिसे अविद्या, काम, कर्मद्वारा प्रच्युति होनेपर अविद्या स्वार्थ आदिके जागरूक होनेपर फिर विरोधवैमनस्य चलता है । तभी ' जीवो जीवस्य जीवनम्' जीवसे ही जीवका जीवन चलता है - यह धर्म-प्रच्युतिमूलक मात्स्यन्याय फैलता है । स्पेन्सर आदिके संघर्षवादका अन्धानुकरण ही मार्क्सवादियोंका अन्तर्विरोध है । इसके अनुसार जो प्रबल होगा, उसीका जीवित रहना न्यायसिद्ध है । इसमें किसी गरीब कमजोरकी सहायता करना मूर्खता है । जो अपनेको बदली हुई परिस्थितिके अनुकूल नहीं बदल सकता, वही गरीब है । उसपर दया करना बेकार है, परंतु आजके परस्पर सहकार सहयोगके जमानेमें यह एक अत्यन्त उपहासास्पद वस्तु है । इसी तरह ' पुराने समीकरणका अन्त तथा नये समीकरणकी नये आधारपर शक्तियोंके नये संयोगसे सृष्टि होती है'–यह कहना भी पिष्टपेषण ही है । अभ्युदयानुगुण परिवर्तनमें नये संयोगों या नये परिणामोंका अंगीकार सभीको सम्मत है ही । सामाजिक परिवर्तनोंका कारण ज्ञान, क्रिया, शक्तिका परिवर्तन ही है और उसमें भी ज्ञान- शक्तिका विकास ही मुख्य है । भौगोलिक तथा वातावरणका परिवर्तन भी इन नये परिवर्तनोंमें कारण होते हैं । जो लोग उत्पादन -साधनोंके परिवर्तनोंके आधारपर ही सामाजिक परिवर्तन मानते हैं, उन्हें भी उत्पादन-साधनोंके परिवर्तनका कारण ढूँढ़ना पड़ेगा और अन्ततोगत्वा बुद्धिपर ही आना पड़ेगा । बुद्धिमें कारण शिक्षण तथा अभ्यास ही होता है । आरम्भमें शिक्षण,

पृष्ठ 730

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७२८ मार्क्सवाद और रामराज्य अन्तमें अभ्यास और अन्वेषणके ही प्राखर्यसे बुद्धिका विकास होता है । बुद्धिविकाससे धन- धान्य- समृद्धिके कारण यन्त्रोंका भी विकास होता है और उसके बिना भी आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक क्षेत्रमें विकास होता है; इसीलिये कल- कारखानोंके विकासके बिना भी प्राचीन भारतमें आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक विकास उच्चकोटिका हुआ था । यद्यपि महायन्त्रोंका विकास प्राचीनकालमें भी हुआ था, तथापि उसका दुष्परिणाम देखकर उसे उपपातक निश्चितकर उसपर प्रतिबन्ध लगा दिया गया । फिर भी विशिष्ट शस्त्रास्त्र, विमान, रथ तथा शिल्पकलादिका विकास मय, विश्वकर्मादिद्वारा होता ही रहा । अतः यह नहीं कहा जा सकता कि भाप या बिजलीकी चक्की तथा कपड़ों, लोहों, ताम्रादिके बड़े - बड़े कल- कारखानोंके विकासके बिना धार्मिक, सामाजिक विकास या कोई उन्नति नहीं होगी । वस्तुतः व्यापक इतिहासके महान् क्षेत्रमें सामन्तवाद और पूँजीवाद- जैसी प्रथाओंका कोई बड़ा महत्त्व नहीं है । प्रमाद- पुरुषार्थ, सुव्यवस्था- दुर्व्यवस्थाके अनुकूल ही अनुकूल-प्रतिकूल परिवर्तन होते रहते हैं । मार्क्सवादियोंके सामने केवल कुछ शताब्दियोंका ही इतिहास है । यदि शताब्दियोंके इतिहासमें इतने परिवर्तन हुए हैं, तो सहस्राब्दियों एवं लक्षाब्दियोंके इतिहासमें क्या- क्या परिवर्तन हुए होंगे, इसका भी तो विचार करना चाहिये । आस्तिकोंकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें ही नहीं, किंतु देवलोकके भी विकास तथा अभ्युदयकी पराकाष्ठा निर्धारित ही है और परम उत्कर्ष कैवल्य- अपवर्गका भी स्वरूप निश्चित है । तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, कौषीतकि आदि उपनिषदों, इतिहास, पुराणोंमें लौकिक- पारलौकिक उन्नति तथा परम निःश्रेयसके स्वरूप निर्धारित हैं । अन्तमें कहा गया है कि अचिन्त्य अनन्त स्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुका एक तुषारमात्र आनन्द ही अनन्त ब्रह्माण्डके धर्मिष्ठ सार्वभौम सम्राट्, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, कर्मदेव, आजानदेव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति, ब्रह्मादिके उत्तरोत्तर प्रकृष्ट आनन्दके रूपमें वितरित होता है । मनुष्यलोकके उत्कर्ष- अपकर्षकी कोई ऐसी अवस्था नहीं, जो इन करोड़ों वर्षोंमें