मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 711–720

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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- मार्क्स दर्शन ७०९ अवस्थाएँ होती हैं, इनमें पूर्व - पूर्व अवस्था उत्तरोत्तर अवस्थाओंकी जननी है - सहायक है, विरोधकल्पना दूरभिसंधिपूर्ण है । सिर्फ वर्गविद्वेष, वर्गविध्वंसके काले कारनामोंके समर्थनके लिये उसे दार्शनिकरूप देनेका प्रयत्न किया जाता है । जैसे पिता अपने उत्तराधिकारी पुत्रके जन्मके लिये प्रयत्नशील होता है, उसी प्रकार कारण भी अपने उत्तराधिकारी कार्यके जन्मके लिये अनुकूल होता है । राजा शिबि एवं दिलीपने तो स्वशरीर देकर भी कपोत तथा नन्दिनी गायकी रक्षाके लिये प्रयत्न किया था । यहाँ विरोध नहीं, किंतु उपकारकी भावना है । वस्तुस्थिति तो यह है कि विवर्धमान क्षीयमानका सहायक होता है, युवक वृद्धकी सेवासे अपनेको पुण्यात्मा मानता है; बलवान् निर्बलका, विद्वान् अविद्वान्‌का, धनवान् निर्धनका सहायक होता है — यही मानवता है । कहा जाता है कि ' द्वन्द्वमानके अनुसार निम्न स्तरसे ऊँचे स्तरपर विकासको हम साधारण पट-परिवर्तनके रूपमें नहीं देखते; बल्कि वस्तुओं और दृश्यगत घटनाओंमें वर्तमान विरोधके रूपमें तथा इन विरोधियोंकी बुनियादपर कायम दो विपरीत गतियोंके संघर्षके रूपमें देखते हैं । लेनिनके शब्दोंमें द्वन्द्वमान वस्तुओंकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है । लेनिनके ही शब्दोंमें द्वन्द्वमान वस्तुओंकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है और विकास विरोधियोंके संघर्षका नाम है । द्वन्द्वमान प्रतिदिनके साधारण तर्कशास्त्रका स्थान नहीं ले सकता, जिस प्रकार बीजगणित या संख्यानुगणित अंकगणितका स्थान नहीं ले सकते । जिस प्रकार अंकगणितकी सीमाके बाहरकी समस्याओंको हल करनेके लिये गणितकी उच्च शाखाओंका प्रयोग किया जाता है, उदाहरणार्थ उन समस्याओंका जिनमें अज्ञात और परिवर्तनीय परिमाण या संख्या और उनके सम्बन्धोंका विचार होता है । उसी प्रकार द्वन्द्वमान गतिशील सम्बन्धों और क्रियाओंका साधारण तर्कशास्त्रके दायरेमें लानेका साधन है; क्योंकि साधारण तर्कशास्त्र केवल स्थिर सम्बन्धोंको लेकर चलता है, द्वन्द्वमान उसीको लेकर कार्यारम्भ करता है, जिसको अपने दायरेके बाहर रख छोड़नेके लिये साधारण तर्कशास्त्र मजबूर है,

पृष्ठ 712

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७१० मार्क्सवाद और रामराज्य वह यह कि किसी वस्तुको अपने ही द्वारा समझा नहीं जा सकता । इसको यों ही समझा जा सकता है कि यह और किसी वस्तुसे आया और किसी अन्य वस्तुकी ओर यह जा रहा है और इसकी गतिका कारण है, इसके और इसके बहिरावेष्टनके बीचका एक क्रियाशील सम्बन्ध । इसलिये द्वन्द्वमान प्रत्येक वस्तुकी अन्य वस्तुओंके बीच पारस्परिक क्रिया -प्रतिक्रियाके फलस्वरूप गतिका मूर्तरूप ही समझता है । प्रत्युत्पादक, विपरीतानुवर्तन, विरोध और संघर्ष ( जो परिवर्तन और विकासका भी जनक है ) -के बिना द्वन्द्वमान असम्भव हो जाता है । गति और उसके रूपान्तरके अध्ययनके लिये द्वन्द्वमान अत्यावश्यक है । लेकिन जहाँ रूप, सार सम्बन्धका विकार तुलनात्मकरूपसे नहीं होता, वहाँ साधारण तर्कशास्त्रका प्रयोग ही सिद्ध है । ' ' द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मनुष्यके वास्तविक भौतिक अस्तित्वके स्थूल सत्यको लेकर चलता है । यह उस अतिभौतिकवादी तरीकोंका तिरस्कार करता है, जो संसारके विषयमें एक कल्पित मतका प्रचार करना चाहता है, जैसे यह एक है या अनेक, यह युक्त है या विच्छिन्न इत्यादि । प्रत्यक्षीकरण और प्रत्यक्षीभूत कल्पनाका रूप प्रतिबिम्बका रूप है । बाहरी दुनियाका द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इस ओर भी दृष्टि आकर्षित करता है कि यह मानसिक क्रियाशील है, यह निष्क्रिय प्रतिबिम्बमात्र नहीं है । इसके अनुसार विचार, भूत जिसका वास्तविक अस्तित्व है, जो क्रियाशील और इसलिये विकासमान है कि सम्बन्धित सम्पूर्णता और जीवित मनुष्योंके बीच व्यावहारिक सम्बन्धका परिणाम है । यान्त्रिक भौतिकवाद विश्वको मशीनकी तरह एक प्रणालीबद्ध रूपमें देखता है, जब कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इसको एक असीम सृजनात्मक क्रियाके रूपमें देखता है । ' पूर्वोक्त युक्तियोंसे स्पष्ट है कि मार्क्सवादियोंका विरोध एक विचित्र वस्तु है, जो कारणगत विरोधरूपसे उच्चस्तरीय विकासका कारण बनता है । अध्यात्मवादीको इसमें विरोधकी कोई बात ही नहीं दिखती । जो एक साथ मिलकर कार्योत्पादक होते हैं, उन्हें अध्यात्मवादी

पृष्ठ 713

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- मार्क्स दर्शन ७११ सहयोगी ही कहते हैं, विरोधी नहीं । अग्नि, जल, सत्त्व, रज, तम आदि परस्पर विरोधी तत्त्व भी सहयोगी होकर कार्योंके जनक होते हैं, यह स्पष्ट किया जा चुका है । साधारण तर्कशास्त्र एवं द्वन्द्वमानका भेद भी वैसा ही है, जैसे मित्रातनय एवं वन्ध्यातनयका । कहना न होगा कि ऐसा कोई भी द्वन्द्वमानका विषय नहीं है, जो तर्कशास्त्रका विषय न हो । जो वस्तु अनादि, अपौरुषेय, शास्त्रैकसमधिगम्य है, वह धर्म-ब्रह्मादि न तर्कका विषय है, न द्वन्द्वमानका । अतः ' अंकगणितकी सीमाके बाहरकी समस्याओंको हल करनेके लिये जैसे बीजगणित-संख्यानुगणित अपेक्षित होते हैं, वैसे ही साधारण तर्ककी सीमाके बाह्यकी समस्याओंको हल करनेके लिये द्वन्द्वमान है, यह भी साधारण तर्कसे उच्चकोटिका तर्क है, ' इत्यादि कथन भी मार्क्सवादियोंका स्वगोष्ठिनिष्ठ सिद्धान्त है । स्थिर, अस्थिर- सभी सम्बन्धोंमें तर्कशास्त्रका प्रवेश होता है । वस्तुतः मार्क्सवादमें साधारण तर्क या द्वन्द्वमानका कोई भी स्पष्ट अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भव दोषरहित लक्षण और परिभाषा नहीं है । इसीलिये रबड़-छन्दके समान मार्क्सवादमें मनमाना तर्क चलता है । किंतु तर्कशास्त्रमें तर्ककी विशेष परिभाषा है— ' व्याप्यारोपेण व्यापकारोपस्तर्कः । * व्याप्यके आरोपसे व्यापकका आरोप तर्क कहलाता है । तर्क स्वयं प्रमाण नहीं होता, किंतु अनुमानमें अपेक्षित व्याप्तिज्ञानका सहायक होता है । जो अतर्क्य है, उसीको तर्कशास्त्र छोड़नेको मजबूर होता है । उस सम्बन्धमें द्वन्द्ववाद भी मूक ही रहेगा । साध्य, साधनभाव जैसे स्थिर, वैसे ही गतिशील पदार्थोंके सम्बन्धमें भी लागू होते हैं । किसी वस्तुको समझनेके लिये सम्भावित, असम्भावित सम्बन्धों तथा विविध परिस्थितियोंको जानना तर्कशास्त्रको भी अभीष्ट है । कुछ भारतीय तार्किकोंका तो यहाँतक कहना है कि एक घटका ज्ञान भी पूरा और सही तब होता है, जब घटेतर सकल वस्तु प्रतियोगि- * अथवा ' अविज्ञात तत्त्वको प्रमाण, हेतु, उपपत्तिसे जाननेके लिये ऊहापोह करना तर्क है । ' ( न्याय० १ । १ । ४० )

पृष्ठ 714

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७१२ मार्क्सवाद और रामराज्य भेदयुक्त घटका बोध होता है । अर्थात् स्वेतर सकल पदार्थोंसे ' भिन्नत्वेन रूपेण' घटका बोध होता है । इतर-भिन्नता जाननेके लिये इतर सकल पदार्थोंका ज्ञान भी आवश्यक होता है । कौन वस्तु किन-किन हेतुओंसे उद्भूत होती है, किन -किन प्रमाणोंसे विदित होती है, इसका अन्तिम परिणाम क्या होगा, उसका किन वस्तुओंपर किस ढंगका प्रभाव होगा- यह तो राजनीति, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, आयुर्वेद, अध्यात्मशास्त्र, मन्त्रशास्त्र आदि शास्त्रोंमें विचारा जाता है । इतना ही नहीं, किसका कितना दृष्ट प्रभाव पड़ेगा, कितना अदृष्ट प्रभाव पड़ेगा, यह भी विचार भारतीय शास्त्रोंमें होता है । फिर भी संसारकी प्रत्येक वस्तुका क्रिया -प्रतिक्रियारूप सम्बन्ध नहीं होता । संसारमें कितने ही पदार्थ परस्पर सहयोगी होते हैं, कितने विरोधी होते हैं, कितने ही उदासीन भी होते हैं । हाँ, प्रत्येक कार्य वस्तु त्रिगुणात्मक होनेसे और गुणोंका चल स्वभाव होनेसे गतिका मूर्तरूप तो नहीं, किंतु गतिका फल कहा जा सकता है । उसमें जैसे गति निदान है, वैसे ही सत्त्वका प्रकाश और तमका अवष्टम्भ भी मिला हुआ है । विपरीतानुवर्तन विरोध एवं संघर्षके अनेक स्थान हैं, परंतु वहाँ द्वन्द्वमान नामकी कोई सर्वसम्मत वस्तु नहीं है । गतिका रूपान्तरण स्वयं नहीं होता, किंतु किसी वस्तुके रूपान्तरणमें गति कारण अवश्य है, परंतु वहाँ द्वन्द्वमानकी गन्ध भी नहीं है । द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और यान्त्रिक भौतिकवादका भेद भी अवास्तविक है । एकता- अनेकता, युक्तता- अयुक्तता, विच्छिन्नता-अविच्छिन्नताका विचार काल्पनिक नहीं है । इन विचारोंके बिना वस्तुयाथात्म्यका बोध असम्भव ही है । समूचे शरीरको ही मनुष्य या आत्मा मान रखना अविवेकका पूरा परिचय है । जैसे ईंट, चूना, पत्थर, काष्ठ आदिसे बना हुआ मकान एक संघात है, वह किसी अपनेसे असंहत भोक्ता चेतनके लिये होता है, वैसे ही माता-पिता शुक्र, शोणितसे बना हुआ अस्थि, मांस, चर्ममय पंजर देह भी मकानके समान ही किसी अपनेसे असंहत, असंग चेतनके लिये होना चाहिये ।

पृष्ठ 715

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- मार्क्स दर्शन ७१३ अचेतनके सभी व्यवहार चेतनकी दुःख - निवृत्ति - सुखप्राप्तिके लिये होते हैं, वैसे ही देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, दिल, दिमाग आदिक प्रवृत्तियोंको भी किसी चेतनके सुखार्थ मानना युक्तियुक्त है । इसे काल्पनिक कहना अनुचित है । अतएव मानसिक क्रियाको क्रियाशील मानना भी अनभिज्ञता है । गुण और क्रिया स्वयं ही द्रव्याश्रित होते हैं । जैसे गुण गुणका आश्रय नहीं होता, वैसे ही क्रिया भी क्रियाका आश्रय नहीं होती है । वस्तुतः मानसिक क्रिया भौतिक है - यह भारतीय अध्यात्मवादी भी मानते हैं । ब्रह्मात्मक ज्ञान नित्य-ज्ञान है, वह विभिन्न मानसिक क्रियाओंका भी निर्विकार भासक है । मानसी क्रियाओंकी विशेषता स्पष्ट है, नित्य ज्ञान क्रिया नहीं है, अध्यात्मवादी इसे प्रतिबिम्बरूप मानते ही नहीं । 'फिर निष्क्रिय प्रतिबिम्ब नहीं है ' - यह कथन भी अनुक्तोपलम्भ है । विकासमान भूतकी सम्बन्धित पूर्णता या जीवित मनुष्योंके बीच व्यावहारिक सम्बन्धका परिणाम ही ज्ञान है— यह कथन मानसिक क्रियारूप ज्ञानके सम्बन्धमें कहा जा सकता है, परंतु नित्यज्ञानके सम्बन्धमें ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ज्ञानका प्रागभाव या प्रध्वंसाभाव नहीं सिद्ध होता; क्योंकि भाव, अभाव किसी वस्तुके ग्रहणके लिये ज्ञान आवश्यक ही है । ज्ञानको स्वभावका ज्ञापक कहना ' वदतोव्याघात ' है । जैसे महाकाशमें घटादि उपाधिद्वारा परिच्छिन्नता और अनेकता प्रतीत होती है, वैसे ही विषयों एवं मानसी वृत्तियोंके कारण नित्य ज्ञानमें परिच्छिन्नता तथा अनेकता प्रतीत होती है । वस्तुतः निरुपाधिक अनन्त आकाशके तुल्य ही निरुपाधिक ज्ञान भी नित्य एवं अनन्त है । अपरप्रेरित जडपदार्थोंमें स्वतः सर्जनकी शक्ति नहीं होती । विज्ञानसे भी नहीं सिद्ध होता है कि किसी चेतन मनुष्यके प्रयत्नके बिना जडपरमाणु, जडविद्युत्कण, जभूत या प्रकृति गतिशील होनेपर भी नियमित तथा अनुकूल बनाकर अभीष्ट कार्य- सिद्धि कर सकेंगे । जल तथा वायु गतिशील हैं, फिर भी कार्यसिद्धिके अनुकूल गतिशील बनाना चेतनका ही कार्य है । इसी तरह गतिशील भूतोंको भी नियामक चेतनकी आवश्यकता है ।

पृष्ठ 716

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७१४ मार्क्सवाद और रामराज्य क्रिया कोई भी असीम नहीं होती, कर्म या क्रिया स्वयं क्षणभंगुर ही होती है । हाँ, सदृश क्रियाओंका प्रवाह असीम हो सकता है, परंतु यह असीमता भी तो प्रत्यक्ष नहीं है । असीमताका अनुमान ही करना पड़ेगा । अनुमानका भी कोई निश्चित लिंग नहीं है । संसारभरके प्रायः सभी अध्यात्मवादी सम्प्रदाय तथा बौद्ध योगाचार, सौत्रान्त्रिक, वैभाषिक एवं माध्यमिकतक बन्धको अनादि, किंतु सान्त मानते हैं । भगवान् कृष्णकी गीता भी उसे अनन्त बतलाती है । 'नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ' ( १५ । ३ ) । इस संसारका न अन्त है, न आदि है । अद्वैतवेदान्तके अनुसार अनादि होते हुए भी सान्त है । गीताके वचनका अभिप्राय यही है कि तत्त्व-साक्षात्कारके बिना इस संसारका अन्त नहीं होता । असीम भी हो, सर्जनशक्ति भी हो, तो भी, जडका प्रेरक- प्रवर्तक चेतन आवश्यक ही है । किसी भी जडकी अनुकूल सर्जनशक्तिके बिना नियन्त्रणके सर्वथा अदृष्टचर है । ' मनुष्यके मानसिक तथा बाहरी वस्तुओंके संयोगजनित व्यवहारने · यह सिद्ध किया कि जिस दिशामें प्राचीन भौतिकवादी सत्यको खोजना चाहते थे; वह वहाँ नहीं है, उसको खोजनेके लिये दूसरी दिशाको जाना पड़ेगा । मनुष्यका विचार जिस सत्यको पहुँच सकता है, वह अनन्त कालके लिये सम्पूर्ण सत्य नहीं है, जिसका अस्तित्व ऐसे पुरुषके लिये है, जो मनुष्यके राग- द्वेष और ससीमतासे मुक्त हो । जिस सत्यको मनुष्य पहुँच सकता है, वह उन सम्बन्धोंका -जिनके अन्दर मनुष्य जाता है, चलता-फिरता है और रहता है - एक विकासमान समन्वय है । यह आपेक्षिक सत्य है; क्योंकि यह कुछ पारस्परिक सम्बन्धों तथा क्रिया- प्रतिक्रियाओंका रूप है, जिनको हम उन सम्बन्धोंके अन्दरसे ही देखते हैं । पुनः परिमाणकी दृष्टिसे भी यह आपेक्षिक है; क्योंकि इसमें सदा वृद्धि होती रहती है और अधिकतर वृद्धिप्राप्ति करनेकी इसमें शक्ति है । लेकिन गुणात्मक दृष्टिसे और तुलनात्मकरूपमें यह सत्यपूर्ण भी है । यद्यपि यह पूर्ण सत्य नहीं, तथापि जहाँतक यह प्रयोग सिद्ध है, वहाँतक यह सत्य ही है । '

पृष्ठ 717

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- मार्क्स दर्शन ७१५ 'सिद्धान्त और प्रयोग, पूर्णता और आपेक्षिकता, पुरानी अवस्थाका जारी रहना और परिवर्तित होना, कायमी अवस्था और वृद्धि, इन विरोधियोंके एकत्वमें ही काण्टके पूर्व यान्त्रिक भौतिकवाद तथा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादका प्रमेय है । एंजिल्सके शब्दोंमें- ' पिछली सदीमें भौतिकवादका रूप यान्त्रिक होनेके कारण यह था कि उस समय प्रकृतिविज्ञानकी शाखाओंमें यन्त्रविज्ञानका ही काफी विस्तार हो चुका था । देकार्तेके लिये पशु एक मशीन -जैसा था । अठारहवीं सदीके भौतिकवादके लिये मनुष्य भी वैसे ही था । उस समयके फ्रांसीसी भौतिकवादकी यह संकीर्णता थी कि वह हर प्रक्रियाके सम्बन्धमें यन्त्रवादका प्रयोग करता था, चाहे वह रसायन-शास्त्र हो, चाहे जीव -प्रकृति; जिसके सम्बन्धमें यान्त्रिक सिद्धान्त लागू है सही, लेकिन जिनका नियन्त्रण और उच्चकोटिके नियमोंद्वारा होता है । उसकी दूसरी संकीर्णता यह है कि वह विश्व संसारको सक्रियरूपमें भूतके ऐतिहासिक विकासके रूपमें नहीं देखता । प्रकृतिकी अविराम गतिका ज्ञान तो लोगोंको था, लेकिन उस समयके विचारके अनुसार यह गति अनन्तकालसे एक चक्रके आकारमें है और उन्हीं परिणामोंका बारम्बार आविर्भाव होता रहता है । यान्त्रिकवाद एक यन्त्रचालकका अनुमान करता है और इस प्रकार ईश्वर और अप्रकृतिवादकी पुनः सृष्टि करता है । वास्तविक परिवर्तनकी व्याख्या यह नहीं कर सकता । वास्तविक परिवर्तनका कारण है वस्तुकी स्वयंगति । ' द्वन्द्वमानके संक्षिप्त सूत्र १६ हैं - हीगेलके तर्कशास्त्रके ऊपर लेनिनने १६ सूत्रोंका विस्तार किया है, जिनके अध्ययनसे द्वन्द्वमानको समझनेमें बहुत सहायता मिलती है । लेनिनके शब्दोंमें द्वन्द्वमानका संक्षिप्त विवरण है, विरोधियोंका एकत्व । एक प्रकारसे ये सोलहों सूत्र इसीके विशद विस्तार हैं । मनन - क्रियाका आरम्भ होता है, विश्व-प्रक्रियासे । उसके कुछ विशिष्ट गुणोंको अलग करके उनके अलग रूपको ही ध्यानमें लाकर वस्तु ( कर्म ) -को लेकर ही मनन-क्रियाका आरम्भ है । इसलिये द्वन्द्वात्मक मनन- क्रियाके लिये पहले आवश्यक है, वस्तुओंको ज्यों-की-त्यों उनके अलग रूपमें देखना । यही लेनिनका पहला सूत्र है-

पृष्ठ 718

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७१६ मार्क्सवाद और रामराज्य वस्तुनिरीक्षण । ‘ लेकिन वस्तुतत्त्वके तोड़नेके पहले कदमको पूरा करना पड़ता है । दूसरे कदमसे इस द्वन्द्वमानका पुनर्निर्माण करके यदि विश्व संसार एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है, जिसके अंग परस्पर सम्बन्धित हैं तो हम इनकी पहचान यों करते हैं कि मस्तिष्कमें इन आंशिक क्रियाओंको, यथा समाज उत्पादनके साधन परिवर्तनशील वस्तु शब्दको अलग कर लेते हैं । इनका हम नाम देते हैं — पृथकित ( आइसोलैट्स ) । यह पृथकित, पारिपार्रिवक अवस्थासे ( बहिरावेष्टन ) या स्थान, काल, भूतसे अलग कर लिया गया है । इसलिये स्वयं पृथकित एक कल्पनामात्र है; क्योंकि द्वन्द्वात्मक दृष्टिसे पारिपाश्विक अवस्थासे मुक्त कोई वस्तु रह नहीं सकती । लेकिन यह कल्पना भी वास्तविक ही है, इसलिये कि वस्तुराज्यमें इसका अस्तित्व है । द्वन्द्वमानके अध्ययनका पहला कदम है इन पृथकितोंका स्वतन्त्ररूपसे अध्ययन करना और फिर उनको अपनी पारिपाश्विक अवस्थासे संयुक्तकर द्वन्द्वमान पुनर्निर्माण करना । इसी प्रकार हम अतिभौतिकवादी अलाहिदापने और एकतरफापनेके ऊपर उठ सकते हैं और दुनियाको एक अन्तःसम्बन्धित गतिके रूपमें देख सकते हैं । यही लेनिनका दूसरा सूत्र है । हमें प्रत्येक वस्तुके दूसरे वस्तुओंसे सम्बन्धोंकी विचित्रता और परिपूर्णताका विचार करना चाहिये । ' प्राचीन भौतिकवादी एवं द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दोनोंहीकी खोजसे परमार्थ सत्य मिलनेवाला नहीं है । परमार्थ निःसीम सत्य एक ही है, उसमें पूर्णता - अपूर्णताकीखिचड़ी नहीं है । उसी परमार्थ सत्यका औपाधिकरूप स्वप्न, शुक्ति, रजतादिमें प्रातिभासिक सत्यरूपमें प्रस्फुटित होता है । व्यावहारिक आकाशादिमें व्यावहारिक सत्यरूपमें प्रस्फुटित होता है । अत्यन्त अबाध्य वस्तु ही परमार्थ सत्य होती है, अतः परमार्थ सत्यका अनन्त एवं कालातीत होना स्वाभाविक है । अविचारित संघातप्राय मनुष्य भले ही आपेक्षिक सत्य हो, परंतु विचारनिर्णीत स्वरूप तो मनुष्योंका ही नहीं, प्राणिमात्रका अनन्त सत्य ही है और इस अनृत मर्त्य मनुष्य-देहादिसे ही सत्य अमृत प्राप्त करना जीवनका ध्येय है, यही बुद्धिमानोंकी

पृष्ठ 719

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- मार्क्स दर्शन ७१७ मनीषाका माहात्म्य है-- एषायत्सत्यमनृतेनेहबुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषामर्त्येनाप्नोतिच मनीषिणाम्मामृतम् ॥। ( श्रीमद्भा० ११ । २९ । २२ ) अठारहवीं सदीके भौतिकवादियोंसे बहुत पहले ईसाके भी बहुत पहले भगवान् श्रीकृष्णने स्थूलदेह एवं इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राणादियुक्त सूक्ष्म शरीरको यन्त्र मानकर यन्त्रारूढ़ जीवोंको ईश्वराधिष्ठित मायाद्वारा भ्रमण ईश्वरःकरना माना सर्वभूतानांहै— हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ( गीता १८ । ६१ ) शरीर, दिमाग आदिसे उत्तम यन्त्र अबतक कोई भी नहीं निकले हैं । बल्कि यों कहना चाहिये कि रेल, तार, रेडियो, मोटर, हवाईजहाज एवं अन्य कारखानोंके मशीन-यन्त्र आदि सबका आविर्भाव करनेवाला मनुष्य शरीर, बुद्धि, मस्तिष्क ही है । सुतरां इस सर्वोत्कृष्ट यन्त्रका निर्माता तथा संचालक सर्वज्ञ ईश्वर ही है । वस्तुकी स्वयंगति असिद्ध है । अचेतन रथादिकी गति चेतनाधिष्ठित ही होती है । अतः जल, वायु आदिकी प्रवृत्ति भी अन्तर्यामी चेतनसे अधिष्ठित ही होती है । यदि स्वयंगति भूत है, तब उनसे स्वयं ही विलक्षण कार्योंकी उत्पत्ति होनी चाहिये, फिर चेतन मनुष्यके इच्छानुसार जडभूतकी कार्याकारेण परिणति न होनी चाहिये । अग्नि, जल, वायुके तुल्य स्वयं गति होनेपर भी कार्यानुकूल गतिके लिये चेतन ईश्वर नियामक एवं व्यवस्थापकरूपसे आवश्यक है । विरोधियोंके एकत्वके सम्बन्धमें कहा जा चुका है कि भाव, अभाव-जैसे विरोधियोंकी एकता सर्वथा असम्भव तथा अदृष्ट है । अग्नि, जल, सत्त्व, रज, तम- जैसे विरोधियोंका भी सहयोग होता है, एकता नहीं । ‘ वस्तु अर्थात् कार्यसे मनन-क्रिया अर्थात् ज्ञानका आरम्भ होता है ', यह कल्पना भी व्यर्थ है । अनुभव-सिद्ध बात है कि 'जानाति, इच्छति, अथ करोति ' प्राणी किसी वस्तुको जानता है, फिर इच्छा करता है, फिर

पृष्ठ 720

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७१८ मार्क्सवाद और रामराज्य कर्म करता है । किसी भी कर्मके लिये पहले संकल्प अपेक्षित होता है । ' यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते । ' (छा० उ० ) प्राणी जैसा संकल्प करता है, वैसा ही कर्म करता है—

सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः ।

व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥

अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्।

यद्यद्धि कुरुते किञ्चित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥

(मनुस्मृ० २।३-४ ) सभी काम संकल्पसे ही होते हैं और सकामकी ही क्रिया होती है । निःसंकल्प निष्कामकी कोई भी क्रिया कभी भी देखी नहीं जाती । विश्वनिर्माण भी ईश्वरीय संकल्प तथा चिकीर्षामूलक ही है । व्यवहारमें भी कोई शिल्पी पहले वस्तुकी कल्पना या संकल्प करता है, फिर इच्छा करता है, पुनः साधन - संग्रहपूर्वक मनःस्थ वस्तुको बाह्याकार देता है । लेनिनका सूत्र इस सहज स्वाभाविक व्यवहारका उल्लंघन करता है । वस्तु-तत्त्वको तोड़ना और पुनर्निर्माण करना यह द्वन्द्ववादी भाषा ही असंगत है । पुनर्निर्माण शब्द निर्मित वस्तुके ही पुनर्निर्माणके अर्थमें प्रयुक्त होता है, नव निर्माण और पुनर्निर्माणमें यही अन्तर है । मृत्पिण्डका विभाजन घट- निर्माणके लिये होता है । एक अवस्था हटनेपर ही दूसरी अवस्था आ सकती है । अतः पिण्डावस्था हटती है, तब घटावस्था आती है । इस तरह कार्यावस्थासे पूर्व व्यवस्थाका प्रत्यावर्तन नहीं होता । देशकाल तथा विविध सम्बन्धित पदार्थोंसे सम्बन्ध रहनेपर भी पृथक्त्व रहता ही है, वैज्ञानिक विश्लेषण भी तभी सार्थक है । सम्मिलित, सम्बन्धित, अविविक्त भूमण्डल सूर्यमण्डलमें विवेकद्वारा विभिन्न गुणधर्मयुक्त अ पदार्थ मिलते हैं । यों तो कारणरूपसे सभीकी एकता है । पार्थिवरूपसे अभिन्न होते हुए भी लोहा, सोना, चाँदी, पत्थर, मिट्टी आदि रूपसे भिन्नता मानना ही तत्त्वज्ञान है । अध्यात्मवादके लिये यह कोई नयी वस्तु नहीं है । वस्तुके यथार्थ जो भी दृष्टिकोण हों, उपयोगिताकी दृष्टिसे सभीपर विचार होना चाहिये । काकदन्तपरीक्षा, गर्दभरोमगणना आदि