मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 781–790
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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- माक्सय समाज व्यवस्था ७७९ जैसे स्वास्थ्यकर, तृप्तिकर स्वच्छ जलसे ही प्यास बुझाना उचित है, वैसे ही तृप्तिकर, स्वास्थ्यवर्द्धक स्त्री- पुरुष सम्बन्धमें कोई भी हानि नहीं है और अब तो गर्भपात करानेकी स्वाधीनता भी रूसमें मिल गयी है । ' पुरुष- समाजके हाथमें ही धर्म, नीति, रिवाज सब कुछ था, इसलिये पुरुषने स्त्रीको स्वाधीन बनानेका प्रयत्न किया, मार्क्सवादियोंका यह कथन भी दुरभिसंधिपूर्ण है । मार्क्सवादी अधिकार पाकर जैसे दूसरोंको सदाके लिये कुचल देना चाहते हैं, महर्षियों तथा ईश्वरके सम्बन्धमें भी उनकी वैसी ही धारणा होती है । उनके मस्तिष्कमें अब्भक्ष, वायुभक्ष, परम निष्काम लोककल्याणपरायण महर्षियोंमें भी पक्षपात ही प्रतीत होता है, परंतु मार्क्सवादियोंकी यह धारणा संगत नहीं है । धर्मबुद्धिसे शिष्य जैसे स्वेच्छापूर्वक गुरुका अनुसरण ( दास्य ) करनेमें लज्जित नहीं होता, पुत्र जैसे माता- पिताका दास्य करनेमें नहीं हिचकता, वैसे ही स्त्री भी अपने पति एवं सास- ससुरका दास्य या सेवन एवं अनुसरण करनेमें लज्जित नहीं होती । जबतक धर्मबुद्धि रहेगी, वहाँ यह भाव भी पहलेके समान ही जारी रहेगा । इसपर सम्पत्ति-विपत्तिका असर नहीं पड़ता है, बल्कि आपत्तिकालमें तो धीरज, धर्म, मित्र एवं नारीकी विशेषरूपसे परीक्षा होती है-'धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद काल परिखिअहिं चारी । ' रामराज्य - जैसी धन - सम्पदा, ऐश्वर्य- वैभवमें भी स्त्री-पुरुष अपने पूज्यों, गुरुजनोंके प्रति दास्यभाव ही रखते थे—' दासवत् सन्नतार्याङ्घ्रिः ' ( भागवत ७।४।३२ ) । प्रह्लाद गुरुजनोंके चरणोंमें सदा दासतुल्य विनत रहते थे । धन एवं सम्पत्तिकी वृद्धि खलोंको ही घमण्डी एवं उद्दण्ड बनाती है, सत्पुरुषोंको नहीं । इसीलिये औद्योगिक समृद्धिके युगमें भी सन्नारियोंके शीलस्वभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ा। प्राचीनकालमें भी असत् स्त्री- पुरुष होते ही थे, वे उस कालमें भी उद्दण्ड ही थे, कोई किसीके नियन्त्रणमें नहीं रहता था । वैयक्तिक सम्पत्ति एवं नर -नारीके धर्ममूलक सम्बन्ध शाश्वतिक हैं । जडवाद एवं नास्तिकताके प्रचारसे कुछ थोड़ा - बहुत ह्रास होना सम्भव है; फिर भी इनका मिट सकना सम्भव नहीं । पुरुषकी अपेक्षा भी नारी जाति श्रद्धालु है । वह अपने पतिसे भिन्न
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७८० मार्क्सवाद और रामराज्य पुरुषको भ्राता, पिता, पुत्रकी ही दृष्टिसे देखना उचित समझती है, धर्महीन मनमाने यौन- सम्बन्धको वह पाप ही समझती है । ' वेदोंकी नीतिमें तो मुख्य विशेषता ही यह थी कि देशमें कोई स्वैरी पुरुष भी नहीं होता था, फिर स्वैरिणी स्त्रीका तो होना सम्भव ही कैसे था-' न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ' ( छान्दो० ५ । ११ । ५ ) । स्त्री सर्वदा ही लज्जाशील होती है, वह कभी भी अभियोक्त्री नहीं होती । वेश्या भी अभियुक्ता होनेमें ही सुखका अनुभव करती है । पुरुष ही स्वैरी होकर स्त्रीको स्वैरिणी बनाता है । जहाँ पुरुष स्वैरी न होगा, वहाँ स्त्री भी स्वैरिणी नहीं हो सकती । स्त्री पुरुषकी हृदयेश्वरी है, प्राणेश्वरी है, आत्मा है, सब कुछ है । उसके हिस्से एवं अधिकारकी बात जडवादी नास्तिकोंके द्वारा ही उठायी जाती है । स्त्रीको पुरुषके बराबर बनानेका प्रयत्न करना उसका अपमान करना है, उसको हजारगुना नीचे उतारना है । शास्त्रोंने पितासे सहस्रगुना अधिक माताका सम्मान करना बतलाया है -' सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते । ' ( मनु० २ । १४५ ) धार्मिक दृष्टिसे चतुर्थाश्रमी यति सर्ववन्द्य है । गृहस्थ पिता भी पुत्र संन्यासीका वन्दन करता है, परंतु उस संन्यासीको धर्मानुसार मातृवन्दन विहित है - ' सर्ववन्द्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नतः । ' ( स्क० पु०, काशी० ११।५० ) इस तरह माताको कुछ अधिकार प्रदान करना, क्या उसके सर्वाधिकारको सीमित करना नहीं है? किसी भी उपासना एवं साधनामें शिष्यको जैसे अपनी आत्मा गुरुकी आत्मामें मिलानी पड़ती है, गुरुकी इच्छामें शिष्यको अपनी इच्छा विलीन कर देनी पड़ती है, वैसे ही पत्नीको अपनी आत्मा, अपनी इच्छा पतिकी आत्मा तथा इच्छामें मिलानी पड़ती है । पतिद्वारा किये हुए सत्कर्मों तथा आराधनाओंमें पत्नीका भाग रहता है । पाश्चात्य राजतन्त्रने जडवादकी धुनमें ईश्वर एवं धर्मसे नाता तोड़ लिया, फिर पूँजीपतियोंने राजतन्त्रको भी समाप्त कर दिया । जहाँ ईश्वर एवं धर्मका राजतन्त्रपर नियन्त्रण नहीं, वहाँ सामाजिक बन्धनोंका ढीला पड़ना स्वाभाविक है । पाश्चात्य शिक्षाका प्रभाव भारतपर अवश्य ही पड़ रहा है । इतना ही क्यों, भारतकी परिस्थिति तो अन्य देशोंकी अपेक्षा भी बदतर होती
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माक्सय समाज- व्यवस्था ७८१ जा रही है । सर्वप्रथम औद्योगिक विकास जिस इंग्लैण्डमें हुआ था, वहाँके सर्वप्रथम एवं सर्वोत्कृष्ट नागरिक राज्य-सिंहासनाधीश तथा उसके परिवारके सिंहासन- सम्बन्धित व्यक्तियोंके लिये अभी भी पर्याप्त धार्मिक नियन्त्रण अधिक है । उन्हें तलाक देनेवाले स्त्री-पुरुषके साथ शादी करनेकी मनाही है । तलाक दी हुई स्त्रीके साथ शादी करनेके लिये अष्टम एडवर्डको राजगद्दी छोड़नी पड़ी । इसी प्रकार ब्रिटेनकी रानीकी बहन कुमारी मार्गरेटको धार्मिक नियन्त्रणके कारण अपने प्रेमीसे शादीका निश्चय छोड़ना पड़ा । वहाँ ' बाइबिल ' के अनुसार पति - पत्नीका सम्बन्ध-विच्छेद ईश्वरीय नियमके विरुद्ध एवं पाप कहा गया है, परंतु जडवादसे प्रभावित, समाजवादका अन्धानुकरण करनेवाली भारतसरकार तलाकका नियम बनाकर स्त्रियोंको स्वाधीन करनेके नामपर उनका सर्वनाश कर रही है । घटना अवश्य समाजवादियोंके अनुसार घट रही है, परंतु यह घटना कॉलरा और प्लेगके समान अनिष्ट ही है, इष्ट नहीं । मार्क्सवादी- वर्णित स्त्रीसमाजकी दुर्दशाका मूल कारण धर्मविमुखता ही है, इसीसे बरक्कतमें भी कमी हुई । पहले घरमें एक व्यक्ति कमाता था, उससे घरभरका काम चलता था । आज पुरुष कमाता है, स्त्री कमाती है और बच्चे भी कमाते हैं, तब भी परिवारका पेट नहीं भरता । प्राचीन कालमें यथोचित वयमें कन्याओंका विवाह हो जाता था, स्त्रीको अनाथकी तरह भटकनेकी नौबत नहीं आती थी । अविवाहित दशामें प्रसवकालका, अनाथ- अवस्थाका उसे कोई अनुभव नहीं करना पड़ता था । मार्क्सवादी उत्तरोत्तर प्रगतिकी कल्पनाका स्वप्न देख रहे हैं, परंतु स्थिति यह दिखायी देती है कि समाजका उत्तरोत्तर अधिक पतन होता जा रहा है । स्त्रीसमाजकी दीनदशा उत्तरोत्तर बढ़ रही है । स्वतन्त्रताके नामपर तलाक-प्रथाके विस्तार होनेका परिणाम भीषण होगा । अल्पवयस्क लड़की भले ही तलाक देकर अपनी दूसरी शादी कर पाये, परंतु वही जब चार बच्चोंकी माँ हो चुकी होगी, उसका यौवन ढल गया होगा और सुन्दरता समाप्त हो गयी होगी, तब उसे यदि तलाक मिल गया तो उस अवस्थामें उसकी पुन: शादी होनी मुश्किल हो जायगी । उस दशामें वह औरत क्या
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७८२ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वयं खायेगी और क्या बच्चोंको खिलायेगी? उस समय वह खूनके आँसू बहाती हुई भारतको नरककुण्ड बनायेगी । धर्महीन क्या पूँजीवाद, क्या समाजवाद, सर्वत्र ही स्त्री- समाजकी दुर्गति ध्रुव है । रामराज्य- प्रणालीमें बाल्यावस्थामें ही लड़कियोंकी शादी हो जायगी । प्रत्येक कुटुम्ब एवं नागरिककी बेकारी, बेरोजगारी दूर करके सबका ही जीवनस्तर उन्नत बनाया जायगा । रामराज्यके अनुसार स्त्रियाँ गृह-लक्ष्मी, घरकी रानी होंगी, उन्हें नौकरानी बननेकी आवश्यकता ही न रहेगी । पुरुषोंका काम घरके बाहर होगा और स्त्रियोंका काम घरके भीतर । वैसे किसी खास अवसरपर उनकी बाहर आवश्यकता अपवादरूपमें ही होगी । सीता सदा गृहके भीतर रहती हुई भी शतमुख रावणका दर्प- दलन करनेके लिये रणचण्डीका रूप धारणकर पुष्करद्वीप गयी थी । (अद्भु० रामा० १७ । २४ ) इसी कोटिका हाँडी और झाँसीकी रानी आदिका उदाहरण है । विवाहकर परिवार -पालन करनेके उदात्त कर्तव्यको झगड़ा या झंझट समझनेकी प्रवृत्ति जडवादी उच्छृंखलपंथियोंकी ही प्रेरणा है । स्त्री और पुरुष सभी यदि नौकर- नौकरानी बनेंगे, तो उनकी संतानें भी अवश्य ही नौकर- मनोवृत्तिकी ही बनेंगी । माताका दुग्ध न पाकर, जननीका लाड़ - प्यार, लालन -पालन न पाकर; डिब्बोंके दूध पीनेवाले बच्चे निम्न श्रेणीके ही होंगे । माता-पिताका भी बच्चोंमें कोई प्रेम न होगा, बच्चोंका भी माँ- बापके प्रति कुछ आकर्षण- अनुराग न होगा । पति- पत्नीका भी परस्पर स्थायी प्रेम न होनेसे किसी भी सम्बन्धकी स्थिरता न होगी । सभी सम्बन्ध वासना- तृप्ति और पैसेके कारण होंगे । विवाह और तलाककी अबाध परम्परा चलती ही रहेगी । अर्थमूलक समाजमें सामाजिक सम्बन्ध मार्क्सवादी सभी सम्बन्धोंकी धार्मिकता एवं परम्परामूलकताका नष्ट हो जाना आवश्यक मानते हैं । उनकी दृष्टिमें ' सब सम्बन्ध जब अर्थमूलक हो जायँगे, तब पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई- बहन, शिक्षक-शिष्यका अर्थमूलक सीधा संघर्ष हो सकेगा । किसी परम्पराकी ओटमें संघर्षके कारणको छिपाया न जा सकेगा । सीधा संघर्ष क्रान्तिके अनुकूल
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माक्सय समाज-व्यवस्था ७८३ ही होगा', परंतु जिन्हें कुटुम्ब, समाज, धर्म, कर्म, सभ्यता, संस्कृति, भक्ति, प्रेम एवं आध्यात्मिक उन्नति अभीष्ट है, उनके लिये तो ये बातें गुण नहीं, अपितु कॉलरा एवं प्लेगके समान एक रोग ही होंगी । रामराज्य-प्रणालीमें स्त्रियोंकी यह दुर्दशा किसीको स्वप्नमें भी नहीं देखनी पड़ेगी । जैसे लता, वल्लरी आदि वृक्षाश्रित रहकर ही पनपती, फलती -फूलती हैं, उन्हें यदि अपने ही पैरों खड़ा करनेका प्रयत्न किया जाय तो भी वे वृक्षके समान सीधी खड़ी नहीं हो सकती हैं, पृथ्वीपर ही वे फैलती हैं और फिर उन्हें शतशः पादप्रहारकी भागिनी बनना पड़ता है, वैसी ही स्त्रियोंकी भी स्थिति है । उन्हें स्वतन्त्रताका पाठ पढ़ाकर ही पाश्चात्य जगत्ने भीषण दुर्दशातक पहुँचा दिया है । यह तो सभीको मानना पड़ता है कि अनेक अंशोंमें स्त्रीसमाज तथा पुरुषसमाजमें समानता होते हुए भी अनेक अंशोंमें भिन्नता भी है । स्त्रियोंमें जितनी कोमलता, सुन्दरता और विश्रान्तहेतुता है, उतनी पुरुषोंमें नहीं है । वह गर्भ- धारण करती है और शिशुका पालन- पोषण करती है, अतः उसे पुरुषका आश्रय अपेक्षित है । बुद्धि एवं मस्तिष्ककी विचक्षणता होते हुए भी उसमें श्रद्धा एवं भक्तिका भी अंश अधिक होता है । पुरुषके कठोर, परिश्रमपूर्ण एवं रूक्ष जीवनको इसीसे सरसता मिलती है । प्राचीन दार्शनिकोंका तो मत है कि जैसे अग्नि एवं दाहिकाशक्ति, जल एवं शीतलता, दुग्ध एवं उसकी स्वच्छता, बीज एवं उसकी अंकुरोत्पादिनी शक्तिका अविच्छेद्य सम्बन्ध है, वैसे ही पति- पत्नीका भी अविच्छेद्य सम्बन्ध है । शक्ति आधेय है और शक्तिमान् आधार । शक्तिके बिना शक्तिमान् अकिंचित्कर है । शिव जब शक्तिसे समन्वित होता है, तभी संसारका उत्पादन, पालन, संहरण कर सकता है, अन्यथा शक्तिके बिना देव शिव हिल - डुल भी नहीं सकता- ' शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम् । न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥ ' ( सौन्दर्यल० १ ) विश्व- निर्माण जैसे महाकार्यनिर्माणकी बात तो दूर रही, शक्तिमान्से शक्तिके पृथक् करनेसे दोनोंकी ही दुर्गति होती है । इसीलिये भारतीय सभ्यतामें शक्तिसहित ही शक्तिमान्की आराधना होती है । अतएव
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७८४ मार्क्सवाद और रामराज्य मन्दिरोंमें गौरी- शंकर, लक्ष्मी-नारायण, सीता - राम, राधा - कृष्ण, शक्ति- शक्तिमान् दोनोंकी आराधना चलती है । अभ्यर्हित होनेसे, पिताकी अपेक्षा भी माताके सहस्रगुणित अधिक पूज्य होनेके कारण ही नाममें पहले गौरी और पीछे शंकरका, पहले लक्ष्मी और पश्चात् नारायणका, प्रथम सीता एवं राधाका तथा पश्चात् राम और कृष्णका उच्चारण होता है । राष्ट्ररूपी मन्दिरमें भी लक्ष्मीस्थानीय नीतिके सहित ही नारायणस्थानीय धर्मका सम्मान श्रेयस्कर होता है । धर्महीन नीति विधवा - तुल्य और नीतिहीन धर्म विधुर- तुल्य माना जाता है । व्यष्टिरूपमें दस वर्षपर्यन्तकी कुमारी नव- दुर्गारूपमें और सुवासिनी साक्षात् भगवतीके रूपमें पूजित होती है । साक्षात् परमेश्वर ही जैसे शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि रूपमें पूजित होता है, वैसे ही शक्तिप्रधान परमेश्वर ही दुर्गा, लक्ष्मी, सीता, राधा आदिके रूपमें पूजित होता है । अधार्मिक, जडवादी लोग ही स्त्रीको केवल भोगकी सामग्री समझकर उसका अपमान करते हैं और उसे विपज्जालमें डालते हैं तथा उसी पापके कारण वे स्वयं भी सर्वनाशके गर्तमें निपतित होते हैं । स्वतन्त्रता, आत्मनिर्णयका अधिकार आदि मोहक नामोंसे स्त्रियोंको बरगलाकर अपना शिकार बनाना और उन्हें मजदूरी या वेश्यावृत्ति करनेके लिये निराश्रय एवं असहाय छोड़ देना उनके साथ घोर अन्याय करना है । पुरुष जब सहर्ष अपनी कमाई स्त्रियोंको खर्च करनेके लिये समर्पण करता है, तब उन्हें कमानेके काममें लगानेका अर्थ ही क्या है? इसके अतिरिक्त गृहका कार्य भी कुछ कम नहीं है । यदि गृहिणी सुप्रबन्ध करनेवाली गृहलक्ष्मी न हो तो पुरुषके लाखों कमानेपर भी घरमें बरक्कत नहीं होती । मानव-जीवन और गृहको सरस एवं मांगलिक बनानेवाली स्त्रीके सिरपर कमानेका भार न होना ही अच्छा है । स्त्रीद्वारा उत्पादित रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, ध्रुव, शिबि, दिलीप, भगीरथ- जैसी, एक भी संतान समष्टि - व्यष्टि जगत्के लोक-परलोकका जीवन मांगलिक एवं समुन्नत बना सकती है । उपयोगितावादी स्मिथ तो धर्म, संस्कृति, प्रेम, सौन्दर्य, कला, क्षमा, दया, त्याग आदि सभी उदात्त गुणोंमें उपयोगिता
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माक्सय समाज व्यवस्था ७८५ ही ढूँढ़ता है । लोककल्याणार्थ अपने प्राणतकको बलिदान कर देनेमें स्मिथको कुछ भी उपयोगिता नहीं दिखायी दे सकती, परंतु क्या इतनेसे ही यह त्याग व्यर्थ कहा जा सकता है? संसारमें उपयोगिता ही सब कुछ नहीं है । माता, भगिनी, पुत्री, पत्नीका महत्त्व उपयोगिताकी कसौटीपर नहीं परखा जा सकता । वर्गवाद मार्क्सके मतसे ' भारतमें औद्योगिक विकाससे होनेवाला परिवर्तन यूरोपके प्रभावसे देरमें आरम्भ हुआ, बल्कि अभी शनैः - शनैः हो रहा है और पूरे रूपमें हो भी नहीं पाया, स्त्रियोंकी अवस्थामें भी परिवर्तन अभीतक यहाँ नहीं हो पाया है । जनसाधारण या जमींदार- श्रेणी और पूँजीपति- श्रेणीकी स्त्रियाँ इस देशमें अभीतक उसी अवस्थामें हैं, परंतु मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी अवस्थामें -जिनपर आर्थिक परिवर्तनका प्रभाव गहरा पड़ा है, परिवर्तन तेजीसे आ रहा है । ' ' यूरोपमें जहाँ पूँजीवाद पूर्ण उन्नति कर चुकनेके बाद ठोकरें खाने लगा है, स्त्रियोंकी अवस्था पुरुषोंकी अपेक्षा जीवन- निर्वाहके संघर्षमें कम योग्य होनेके कारण पुरुषोंसे भी गयी - बीती है । बेकारी और जीवन- निर्वाहकी तंगीके कारण लोग ब्याहकर परिवार पालनेके झगड़े में नहीं फँसना चाहते, इसलिये स्त्रियोंके लिये घर बैठकर बच्चे पालने और निर्वाहके लिये रोटी कपड़ा पाते रहनेका भी मौका गया । अब उन्हें भी मिलों, कारखानों, खानों, खेतों और दफ्तरोंमें मजदूरीकर पेट पालना पड़ता है । यदि उनका विवाह हो जाता है तो माता बननेका उनका काम ज्यों - त्यों निभ जाता है और वे फिर मजदूरी करने चल देती हैं । यदि विवाह नहीं हुआ और शरीरकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके कारण वे माता बन गयीं तो उनकी मुसीबत है । प्रसवकी अवस्थामें उनके निर्वाहका सवाल बहुत कठिन हो जाता है और प्रसवकालमें ही उन्हें सहायताकी अधिक आवश्यकता रहती है । प्रसवकालमें यदि वे कामपर नहीं जा सकतीं तो उनकी जीविका छूट जाती है और प्रसवकालके बाद जब उन्हें एकके बजाय दो जीवोंकी जरूरतोंको पूरा करना पड़ता है, तो वे बिना साधनके
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७८६ मार्क्सवाद और रामराज्य हो जाती हैं । इससे समाजमें उत्पन्न होनेवाली संतानके पोषण और अवस्थापर क्या प्रभाव पड़ता है, यह समझ लेना कठिन नहीं । ' ' स्त्रियोंकी इस अवस्थाके कारण देशकी जनताके स्वास्थ्यपर जो बुरा प्रभाव पड़ता है, उसके कारण अनेक पूँजीवादी सरकारोंने स्त्रियोंकी रक्षाके लिये मजदूरीसम्बन्धी कुछ नियम बनाये हैं । जिनके अनुसार मिल मालिकोंको प्रसवके समय स्त्रियोंको बिना काम किये कुछ तनख्वाह देनी पड़ती है और बच्चा होनेपर मिलमें काम करते समय माँको बच्चेको दूध आदि पिलानेकी सुविधा भी देनी पड़ती है । इन कानूनी अड़चनोंसे बचनेके लिये मिलें प्रायः विवाहित स्त्रियोंको और खासकर बच्चेवाली स्त्रियोंको मिलमें नौकरी देना पसन्द नहीं करतीं । यूरोपमें अस्सी या नब्बे प्रतिशत लड़कियाँ विवाहसे पहले किसी-न- किसी प्रकारकी मजदूरी या नौकरीकर अपना निर्वाह करती हैं या अपने परिवारको सहायता देती हैं, परंतु विवाह हो जानेपर उन्हें जीविका कमानेकी सुविधा नहीं रहती । इन कारणोंसे स्त्रियाँ विवाह न करने या विवाह करनेपर भी गर्भ हटा देनेके लिये मजबूर होती हैं । जीविकाका कोई उपाय न मिलनेपर उन्हें अपने शरीरको पुरुषोंके क्षणिक आनन्दके लिये बेचकर अपना पेट भरनेके लिये मजबूर होना पड़ता है । ' ' वैयक्तिक सम्पत्तिके आधारपर कायम पूँजीवादी - समाजमें स्त्री व्यक्तिकी सम्पत्ति और मिल्कियतका केन्द्र होनेके कारण या तो पुरुषके आधिपत्यमें रहकर उसके वंशको चलाने, उसके उपयोग- भोगमें आनेकी वस्तु रहेगी या फिर आर्थिक संकट और बेकारीके शिकंजोंमें निचोड़े जाते हुए समाजके तंग होते हुए दायरेसे, अपनी शारीरिक निर्बलताके कारण— जिस गुणके कारण वह समाजको उत्पन्न कर सकती है, समाजमें जीविकाका स्थान न पाकर केवल पुरुषके शिकारकी वस्तु बनती जायगी । पर यह अवस्था है साधनहीन गरीब और मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी । साधन -सम्पन्न और अमीर श्रेणीकी स्त्रियाँ यद्यपि भूख और गरीबीसे तड़पती नहीं, परंतु उनके जीवनमें भी आत्मनिर्णय और विकासका द्वार बन्द रहता है । ' मार्क्सके अनुसार ' समाजमें स्त्रियोंका समान अधिकार
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मार्क्सय समाज-व्यवस्था ७८७ होनेके लिये उन्हें भी समाजमें पैदावारके कार्यमें सहयोग देनेका अवसर मिलना चाहिये । ' मार्क्सवाद इस बातको स्वीकार करता है कि ' समाजमें संतान उत्पन्न करना न केवल स्त्रीके, बल्कि सम्पूर्ण समाजके सभी कामोंमें महत्त्वपूर्ण काम है; क्योंकि मनुष्य समाजका अस्तित्व इसीपर निर्भर करता है । इस महत्त्वपूर्ण कार्यके ठीक रूपसे होनेके लिये अनुकूल परिस्थितियाँ होनी चाहिये । स्त्रीको संतानोत्पत्ति मजबूर होकर या दूसरेके भोगका साधन बनकर न करनी पड़े, बल्कि वह अपने आपको समाजका एक स्वतन्त्र अंग समझकर, अपनी इच्छासे संतान पैदा करे । संतान पैदा करनेके लिये समाजकी सभी स्त्रियोंके लिये ऐसी परिस्थितियाँ होनी चाहिये, जो स्वयं स्त्री और संतानके स्वास्थ्यके लिये अनुकूल हों । गर्भावस्थामें स्त्रीके लिये इस प्रकारकी परिस्थिति होनी चाहिये कि वह अपने स्वास्थ्यको ठीक रख सके और स्वस्थ संतानको जन्म दे सके, परंतु पूँजीवादी - समाजमें साधनहीन तथा पूँजीपति दोनों ही श्रेणियोंके लिये ऐसी परिस्थितियाँ नहीं हैं । साधनहीन श्रेणीकी स्त्रियोंको गर्भावस्थामें उचितसे अधिक परिश्रम करना पड़ता है और पूँजीवादी श्रेणीकी स्त्रियाँ बिलकुल निष्क्रिय रहनेके कारण जैसी संतान पैदा करना चाहिये, वैसी नहीं कर पातीं । ' ' समाजवादी और समष्टिवादी - समाजमें स्त्री भी समाजका परिश्रम या पैदावार करनेवाला अंग समझी जाती है । उसे केवल पुरुषके भोग और रिझावका साधन नहीं समझा जाता । ' मार्क्सवाद' मनुष्यमें आनन्द, विनोद और रिझावकी जगह भी स्वीकार करता है, परंतु उसमें पुरुषको प्रधान बनाकर स्त्रीको केवल साधन बना देना उसे स्वीकार नहीं । पूँजीवादी - समाजमें स्त्री अपने माता बननेके लिये कार्यके कारण पुरुषके सामने आत्मसमर्पण करनेके लिये मजबूर होती है ( क्योंकि पुरुष जीविका कमाकर लाता है ) । समाजवाद और समष्टिवादमें स्त्रीके गर्भवती होने, प्रसवकाल और उसके बाद जबतक वह फिर परिश्रमके काममें भाग लेनेके योग्य न हो जाय, स्त्रीकी आवश्यकताओंकी पूर्ति और स्वास्थ्यकी देख-भालकी जिम्मेदारी समाजपर होगी । प्रसवसे दो-
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७८८ मार्क्सवाद और रामराज्य ढाई मास पूर्वसे लेकर प्रसवके एक मास पश्चात्तक वह समाजके खर्चपर रहेगी । संतान पैदा होनेके बाद समाज जो काम उसे करनेके लिये देगा, उसमें बच्चेकी देख- भालका समय और सुविधा भी उसे देगा । बच्चेके पालने -पोसने और शिक्षाकी जिम्मेदारी भी गरीब स्त्रीके ही कन्धोंपर न होकर समाजके सिर होगी । इस प्रकार संतान पैदा करना स्त्रीके लिये भय और मुसीबतका कारण न होकर उत्साह और प्रसन्नताका विषय होगा । ' उपर्युक्त मार्क्सवादी मन्तव्यसे यह स्पष्ट है कि मार्क्सवादियोंको स्त्री-हितसे उतना प्रयोजन नहीं है, जितना कि स्त्रीको अपने पति- पुत्रादि परिवारसे विच्छिन्नकर उसे समाजकी वस्तु बनानेसे है । स्पष्ट है कि पतिको अपनी पत्नीमें जितनी प्रीति है, पुत्रको अपनी मातामें जितना स्नेह है, उतनी प्रीति, उतना स्नेह समाजकी साधारण वस्तुमें समाजका क्यों होगा? जेलों एवं अनाथालयोंमें भी स्त्रियों-पुरुषोंको भोजन मिलता है, वस्त्र मिलते हैं, इलाज मिलता है और गर्भ तथा प्रसवकालमें बहुत -सी सुविधाएँ भी मिलती हैं, परंतु क्या स्वाधीनतापूर्वक गरीबी हालत भी जीवनका सुख उपर्युक्त स्थितिमें सम्भव है? पति, सास- ससुर, देवर- जेठ, पुत्र - पौत्र आदिके सहज सम्बन्ध और स्नेहकी तुलना समाजमें कहाँ प्राप्त हो सकती है? रामराज्य-प्रणालीमें स्त्री गृहलक्ष्मी रहेगी । वेदोंने विवाहके समय वरके मुखसे वधूको कहलाया है कि तुम श्वसुर, श्वश्रू, ननद और देवरमें सम्राज्ञी बनो -' सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव । ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु ॥ ' ( ऋक्० सं० १० । ८५ । ४६ ) स्त्री ससुर, पति, पुत्रादिकी कमाईकी रानी एवं मालकिन होगी, परिवारके लोग उसके इशारेपर काम करेंगे, उसका ही दिया हुआ खायेंगे और खर्च करेंगे । उसे मिलोंमें मजदूरी करने नहीं जाना पड़ेगा, समाजके नामपर हुकूमत करनेवाले मुट्ठीभर तानाशाहोंके प्रबन्धस्थापनमें कोई वस्तु पानेके लिये पंक्तिबद्ध खड़े रहकर उसे बाट नहीं जोहना पड़ेगा । बिना मजदूरी किये ही वह समाजमें पुरुषोंके बराबरका ही नहीं, उनसे हजारगुना अधिक ऊँचा स्थान प्राप्त करेगी ।