मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 791–800

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800

पृष्ठ 791

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- माक्सय समाज व्यवस्था ७८९ रामराज्यके अनुसार सन्नारीके बलपर कुल, गोत्र एवं वंशकी रक्षा होगी । समाजवादी - व्यवस्थामें इच्छानुसार किन्हीं नये - नये पुरुषोंसे संतान उत्पन्न करनेवाली नारीके पुत्र - पुत्रीका कुल, गोत्र, धर्म क्या होगा? एक ही माँसे उत्पन्न अनेक भाई- बहनें कितने ही पिताओंसे उत्पन्न हुए होंगे, उनका परस्पर क्या सम्बन्ध होगा? इससे मार्क्सवादीसे क्या मतलब होगा? मार्क्सवादमें तो जैसे सभी सम्पत्ति सरकारी, भूमि सरकारी; वैसे ही सब औरतें सरकारी, सब मर्द सरकारी और सभी बच्चे भी सरकारी होंगे । जैसे गाय- बैल, घोड़े - घोड़ी, ऊँट-ऊँटिनी आदि पशुओंका अपना न निजी कोई पति है, न पत्नी है, न अपना कोई माता - पिता है, न अपना कोई बच्चा-बच्ची है, सब सरकारी - ही- सरकारी हैं; वैसे ही स्त्री - पुरुष, बच्चे - बच्ची सब सरकारी- ही- सरकारी होंगे । फिर कहाँका पिण्डदान, कहाँका श्राद्धतर्पण, कहाँका गयाश्राद्ध, कहाँका धर्म, दान, पुण्य, मोक्ष; कहाँका परिवार, कुटुम्ब और कैसे पारिवारिक स्नेह? – सब पशुवत् जीवन होगा । सरकारी अफसरके आदेशानुसार जैसे किसी घोड़ा घोड़ीका सम्बन्ध कराया जाता है, वैसे ही समाज या समाजवादी सरकारके आदेशानुसार अनियतरूपसे स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध करा दिया जायगा । समाजके नामपर तानाशाही सरकार और उसके नौकर सब व्यवस्था करेंगे । वे ही लोगोंसे विभिन्न काम करायेंगे, वे ही रोटी कपड़ा देंगे, वे ही गर्भधारण करायेंगे, वे गर्भ तथा प्रसवकालका सब प्रबन्ध करेंगे । फिर पति- पुत्र और कुटुम्बका कोई भी स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रहेगा । गो, गर्दभ, श्वान, शूकरादि जानवरोंके या काक, कुक्कुट, कपोत आदि पक्षियोंके समूहके तुल्य ही मानव-समूह होगा । ' गरीब स्त्रीसमाजके कन्धेपर कोई भार न दिया जायगा, दयालु समाजमें और समाजवादी सरकारके कन्धोंपर ही सब भार रहेगा ', यह है समाजवादमें स्त्रियोंका स्थान । समाजमें यदि समानाधिकार लेना है, तो स्त्रियोंको यह सब स्वीकार करना पड़ेगा । बिना कमाये उन्हें अधिकार न मिल सकेगा । मार्क्सवादमें स्त्रियोंके लिये सरकारी गुलामी और सरकारी मजदूरी ठीक समझी जाती है, परंतु अपने सास-ससुर, पति- पुत्र आदिकी सेवा,

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७९ ० मार्क्सवाद और रामराज्य लालन-पालन असह्य है । यह स्त्रीके लिये गुलामी है, उसे आत्म- समर्पणके लिये बाध्य करना है । श्वशुरकुलकी साम्राज्ञी, पतिके घर एवं हृदयकी महारानी, पुत्रोंकी पूज्या होकर गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी बनना श्रेष्ठ है या सरकारी नौकरानी बनकर पिल्ली-कुतियाका जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है, इसे समझदार स्त्रियाँ स्वयं सोचें और सोचें वे पुरुष, जिन्हें आगेसे ऐसी ही पत्नी और माता पाना है । व्यभिचारका उन्मूलन मार्क्स लिखता है कि ' हम स्त्रीको पुरुषकी सम्पत्ति बनाने और धर्मके भयसे जकड़ देनेके पक्षमें नहीं हैं । यह भी हमें स्वीकार नहीं है कि संतान उत्पन्न करनेके लिये किसी स्त्रीका एक पुरुष-विशेषकी दासी या सम्पत्ति बन जाना जरूरी है । वह स्त्री- पुरुषके सम्बन्धको स्त्री - पुरुषकी शारीरिक आवश्यकताका सम्बन्ध मानता है; परंतु इसके लिये वह दोनोंमेंसे एक- दूसरेका दास बन जाना आवश्यक नहीं समझता । इस सम्बन्धमें वह कानूनके भी दखल देनेकी जरूरत नहीं समझता; परंतु इसके साथ ही वह स्त्री- पुरुषके सम्बन्धकी उच्छृंखलताको भी स्वीकार नहीं करता । किसी स्त्री या पुरुषका दूसरोंके शारीरिक भोगके लिये अपने शरीरको किरायेपर चढ़ाना वह अपराध समझता है । समाजवादी और समष्टिवादी समाजमें जीविकाके साधन अपनी योग्यता और अवस्थाके अनुसार सभीको प्राप्त होंगे, इसलिये जीविकाके लिये व्यभिचारसे धन कमानेकी आवश्यकता हो नहीं सकती और जो लोग पूँजीवादी - समाजके संस्कारोंके कारण ऐसे करेंगे, वे अपराधी होंगे । संक्षेपमें स्त्री - पुरुष और विवाहके सम्बन्धमें मार्क्सवाद समाजके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्यके विचारसे पूर्ण स्वतन्त्रता देता है, परंतु उच्छृंखलता, गड़बड़ या भोगको पेशा बना लेनेको और इसके साथ ही अपने भोगकी इच्छाके लिये दूसरे व्यक्तियों और समाजकी जीवन - व्यवस्थामें अड़चन डालनेकी वह भयंकर अपराध समझता है । स्त्री- पुरुषके सम्बन्धमें मार्क्सवादका रुख लेनिनकी एक बातसे स्पष्ट हो जाता है । लेनिनने कहा था- स्त्री- पुरुषका सम्बन्ध शरीरकी दूसरी आवश्यकताओं- भूख, प्यास, नींदकी तरह ही

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माक्सय समाज-व्यवस्था ७९१ एक आवश्यकता है । इसमें मनुष्यको स्वतन्त्रता होनी चाहिये, परंतु प्यास लगनेपर शहरकी गन्दी नालीमें मुँह डालकर पानी पीना उचित नहीं । उचित है स्वच्छ जल, स्वच्छ गिलाससे पीना । स्त्री- पुरुषका सम्बन्ध मनुष्योंकी शारीरिक, मानसिक तुष्टि और समाजकी रक्षाके लिये होना चाहिये न कि स्त्री - पुरुषोंको रोग और कलहका घर बना देनेके लिये । अबतकके पारिवारिक और विवाह सम्बन्धी बन्धन पूँजीवादी आर्थिक संगठनपर कायम हैं, जिनमें स्त्रीका निरन्तर शोषण होता रहा है; इसलिये अब समाजको इसे बदलकर स्त्री -पुरुषकी समानतापर लाना चाहिये । ' यह सही है, कि मार्क्सवादमें जीविकाके लिये स्त्रियोंको व्यभिचार न करना पड़ेगा, परंतु काम-प्रेरणासे होनेवाले व्यभिचारपर मार्क्सवादमें क्या रोक है? गन्दी नालीका पानी पागल ही पीता है, अन्य सभी स्वास्थ्यकर स्वच्छ ही जल पीना चाहते हैं । क्या मार्क्सवादमें अपने पति या अपनी पत्नीसे अन्य स्त्री- पुरुषसे सम्बन्ध गन्दी नालीके जल पीनेके तुल्य मान्य है? किसी भी मार्क्सवादी ग्रन्थमें ढूँढ़नेपर भी स्त्री - पुरुषके स्वेच्छापूर्वक सम्बन्धोंमें कोई रुकावटकी बात नहीं दिखलायी देती, सिर्फ दूसरेकी इच्छाके बिना या पेशा किंवा जीविकाके लिये व्यभिचार करना अपराध माना गया है, परंतु शारीरिक- मानसिक स्वास्थ्यके विचारसे नितान्त स्वेच्छापूर्ण स्त्री - पुरुष- सम्बन्धकी मार्क्सवादमें पूरी स्वाधीनता है । फिर इससे भिन्न और उच्छृंखलता या गड़बड़ क्या है? स्त्री - पुरुष दोनोंमें किसीकी जिसमें अनिच्छा न हो, जो पेशेके लिये न हो, जो शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्यके प्रतिकूल न हो; ऐसे स्वेच्छापूर्ण मनमाने सम्बन्धमें कोई रुकावट नहीं है । फिर जब पाप - पुण्यका प्रश्न है ही नहीं, तब ऐसे सरल, सुखकर कामसे पेशेपर ही रुकावट क्यों हो? किन्हीं मार्क्सवादी वाक्योंसे भी चारित्रिक जीवनका समर्थन नहीं मिलता और पुलिस एवं गुप्तचरकी आँखोंमें धूल डालकर, अदालतको धोखा देकर कोई दुराचार कर सके तो क्या होगा? अध्यात्मवादीकी दृष्टिमें तो प्रथम संयतात्मा सावधान व्यक्तियोंका गुरु ही शास्ता है, उनके लिये राज्यशासन आवश्यक ही नहीं है, परंतु

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७९२ मार्क्सवाद और रामराज्य दुरात्मा प्राणीका नियन्त्रण करनेके लिये राजा शास्ता होता है । किंतु जो प्रच्छन्न पातकी होते हैं, जो पुलिस एवं अदालतको चकमा देकर पाप करते हैं, उनका शासक वैवस्वत यम ही हैं । ( नारदस्मृ० १८ । १०८; विदु० नी० ) एक जडवादीके मतमें यदि निर्विघ्न रूपसे दूसरेका धन या दूसरेकी सुन्दर कलत्र प्राप्त हो जाय, तो उससे बचना, उसे अस्वीकार कर देना या वह जिसकी है, उसके पास सही -सलामत पहुँचा देना शुद्ध मूर्खता ही कही जायगी; क्योंकि उसके सिद्धान्तानुसार किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्ति जायज नहीं है, सब सम्पत्ति राज्यकी ही है । स्त्री- पुरुष कोई भी किसीकी वस्तु नहीं है, सब समाजकी वस्तु है, उसके लेनेमें पाप- पुण्यकी कोई बात ही नहीं है, परंतु एक अध्यात्मवादी, परान्न, पर- वित्तको स्वीकार करना जघन्य कृत्य समझता है । वह कहता है कि पर- वित्त, परान्न यदि मार्गमें पड़ा हो, चाहे घरमें, अपना वैध स्वत्व हुए बिना उसे कभी ग्रहण नहीं करना चाहिये, यही सत्पुरुषका लक्षण है –' परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे । अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद् ब्राह्मणलक्षणम्॥ ' अपने यहाँ पति- पत्नी, माता- पुत्र आदिका सम्बन्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक, शास्त्र एवं परम्परामूलक समझा जाता है, जब कि मार्क्सवादी सम्पूर्ण धार्मिकताओं, परम्पराओंको मिटाकर शुद्ध अर्थमूलक सम्बन्धको ही क्रान्तिके लिये लाभदायक मानते हैं । इनके मतानुसार ' अपनी शारीरिक प्रेरणाओंसे ही स्त्री - पुरुष सम्बन्धित होते हैं, उनसे तीसरा व्यक्ति बतौर ' एक्सिडेंट ' ( आकस्मिक घटना ) -के उत्पन्न हो जाता है । माँका दूध पिलाना भी उसके लिये अनिवार्य है, बिना स्तनसे दूध निकले उसे कष्ट हो सकता है, इसीलिये माँ बच्चेको दूध पिलानेके लिये बाध्य होती है । ' अतः ' माता पितासे सहस्रगुणित पूज्य है '-' सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ' ( मनु ० २ । १४५ ) का मार्क्सवादमें कोई महत्त्व नहीं है । सीता, सावित्री, दमयन्ती, अरुन्धती आदिके पातिव्रत्यका भी मार्क्सवादमें कोई गौरव नहीं, केवल भूख-प्यासकी तरह शारीरिक आवश्यकताकी पूर्तिमात्र ही वहाँ स्त्री - पुरुषके सम्बन्धका आधार है । राम - राज्यमें पातिव्रत्य सर्वधर्मसार है और सीता, सावित्री आदि उसके

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माक्र्सय समाज- व्यवस्था ७ ९३ उच्च आदर्श एवं मार्गदर्शक हैं । भूत और शक्ति मार्क्सवादी कहते हैं, ' कुछ आधुनिक वैज्ञानिक अब रहस्यवादकी शरण लेते हैं । उन वैज्ञानिकोंका कहना है कि ' भूत शक्ति ही है और शक्तिका पूर्णरूपसे बोध नहीं हो सकता । ' लेकिन यह बात सही नहीं है । यदि यह मान लिया जाय कि भूत बिजली ही है, तथापि इस बिजलीका परिमाण और वजन है; इसलिये भूतकी धारणा भले ही बदल जाय, इसका अस्तित्व नहीं मिट जाता । जैक्सनके शब्दोंमें ' उन वैज्ञानिकोंकी, जो भूतको केवल शक्तिका ही संगठन मानते हैं, तुलना उस वीरसे की जा सकती है, जिसने केवल धारसे तलवार बनायी अथवा उन केवटोंसे जिन्होंने जालकी यह परिभाषा की कि यह सुतलीसे बँधा हुआ छेद है । ' आईंस्टीनके सापेक्षताके नियमका प्रारम्भ है कि निरपेक्ष गतिकी न तो धारणा की जा सकती है और न इसको मापा जा सकता है । किसी दी हुई रेखा या बिन्दुसे ही इसको मापा जा सकता है । इससे कुछ वैज्ञानिक इस नतीजेपर पहुँचे कि ' गति वास्तविक नहीं है; ' किंतु यह हीगेलका ही सिद्धान्त है कि 'अस्तित्व सम्बन्ध- बोधक है । किसी वस्तुको दूसरी वस्तुद्वारा ही मापा जा सकता है और किसी पदार्थका गुण किसी दूसरे पदार्थपर प्रतिक्रियाका नाम है । ' द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद प्रयोगको ही प्रथम स्थान देता है । निरपेक्ष गति हो या न हो, हमारे लिये घड़ी और स्थान दोनोंकी आवश्यकता है; इसलिये दोनों ही वास्तविक हैं । वस्तुतः ईमानदार वैज्ञानिक ही कहीं भूतके रूपमें शक्ति मानते हैं और उसे दुर्ज्ञेय मानते हैं । पूर्वोक्त न्यायसे कहा गया है कि सूक्ष्मसे ही स्थूलकी उत्पत्ति होती है । धारसे तलवार तथा सुतलीसे बँधे हुए छेदसे और शक्तिसे भूतनिर्माणमें पर्याप्त अन्तर है । तन्तुसे पट बनता है, फिर भी पटका तन्तु है, यह भी व्यवहार होता है । मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है; फिर भी घटकी मृत्तिका है, यह भी व्यवहार होता है ।

पृष्ठ 796

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७९४ मार्क्सवाद और रामराज्य आमतौरपर पृथ्वीका गन्ध, जलका रस, तेजका रूप, वायुका स्पर्श और आकाशका शब्द गुण माना जाता है । फिर भी सांख्य वेदान्त- सिद्धान्तानुसार शब्दतन्मात्रासे ही आकाश, स्पर्शतन्मात्रासे ही वायु, रूपतन्मात्रासे तेज, रसतन्मात्रासे जल तथा गन्धतन्मात्रासे पृथ्वीकी उत्पत्ति होती है । यह स्पष्ट है कि जिन भूतोंमें केवल शब्द है, वह सूक्ष्म आकाश है । वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुणोंका उपलम्भ होता है । वह आकाशकी अपेक्षा स्थूल है । उत्तरोत्तर रूप, रस, गन्ध गुणोंकी जैसे- जैसे अधिकता होती है, वैसे ही तेज आदिमें स्थूलता उपलब्ध होती है । इस दृष्टिसे शब्दस्पर्शात्मक ही भूत है । उपनिषदोंके अनुसार सत्से आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाशादिकी सत्ताका व्यवहार होता है । कारणसे कार्य उत्पन्न होनेपर मायाद्वारा प्रधान कारणकी अप्रधानता तथा अप्रधान कार्यकी प्रधानता हो जाती है, इसीलिये कार्य विशेष्य हो जाता है, कारण विशेषण हो जाता है । इसी कारण आकाशकी सत्ता, घटकी मृत्तिका, पटका तन्तु आदिका व्यवहार होता है । हर जगह शक्तिसे ही कार्य उत्पन्न होता है, मृत्तिकामें घट-शक्ति होती है, बीजमें अंकुर- शक्ति होती है । ऐसे ही सम्पूर्ण कार्योंके उत्पादनानुकूल उन-उन कारणोंमें शक्तियाँ रहती हैं, इस दृष्टिसे सत्में प्रपंचोत्पादिनी शक्ति रहती है । उसी सत्- शक्तिसे भूतोंकी उत्पत्ति होती है । सूक्ष्मरूपसे स्थूल भिन्न नहीं होता । सूक्ष्म कारण है, स्थूल कार्य है, यह कहा जा चुका है । घट कपालमात्र है, कपाल चूर्णरूप है, वह भी रजोमात्रा है । रज भी परमाणु रह जाता है । मृत्तिकासे भिन्न घट नहीं होता, रससे भिन्न जल नहीं, रूपसे भिन्न तेज नहीं । ऐसे ही धारसे भिन्न तलवार नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता । उसी तरह सुतलीसे भिन्न होकर सच्छिद्र जाल नहीं है; परंतु जालसे भिन्न होकर सुतली नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता; अतः विषम दृष्टान्त है । गति पदार्थकी आवश्यकता है, अवस्था अवस्थावान्से भिन्न नहीं । नाप- तौल तथा मार्क्सवादियोंका प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं होता है, अतः प्रयोगवादको भी सर्वकारण परममूलका अन्वेषण तो करना ही चाहिये ।

पृष्ठ 797

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माक्सय समाज- व्यवस्था ७९५ क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति स्वाधीन है? ' मनुष्यकी इच्छा स्वतन्त्र है या नहीं ', यह दार्शनिक क्षेत्रमें एक प्राचीन प्रश्न है । द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इसका उत्तर देते हैं-' नहीं, इस प्रश्नका मूल भी धर्मविद्यामें है । यदि मनुष्यका कर्म उसकी स्वेच्छासे नहीं है, तो वह पाप- पुण्यके भारसे मुक्त हो जाता है तथा स्वर्ग और नरकका कोई अर्थ नहीं रह जाता । यही कारण है कि धर्म - विद्या मनुष्यकी इच्छाको स्वतन्त्र मानती है । ' इस प्रश्नका यों विचार कीजिये । सारा संसार कार्य - कारणके नियमसे बँधा हुआ है । क्या मनुष्य इस संसारका अंश नहीं? केवलमात्र मनुष्यकी इच्छा ही क्या इस प्राकृतिक नियमसे परे है? सब वस्तुओंकी तरह मनुष्यकी इच्छा भी कारणजनित है । उसकी इच्छाके प्राकृतिक तथा सामाजिक कारण हैं । मनुष्य ऐसा सोचता अवश्य है कि वह अपनी इच्छानुसार ही सब कुछ करता है । लेकिन वास्तविकता यह नहीं है । कविने उदाहरण दिया है कि प्रत्येक वारिबिन्दु भी यह सोचता है कि अपनी इच्छासे ही वह जमीनपर गिरता है । मातृ- स्तन पीते समय बच्चा भी यह सोचता है कि अपनी इच्छाको ही वह पूरी कर रहा है । यदि हमारी इच्छा स्वाधीन नहीं है तो बाध्य होनेपर ही हम कोई काम करते हैं । इस बाध्यताके सम्बन्धमें हीगेलने लिखा है - ' बाध्यता उसी हदतक दृष्टिहीन है, जहाँतक हम इसको समझते नहीं । ' इसपर टीका करते हुए एंजिल्सने लिखा है कि ' प्रकृति और मनुष्यके समाजमें ही स्वतन्त्रताका निवास है और इसकी बुनियाद है प्रकृतिकी मजबूरियोंका ज्ञान । ' इसका खण्डन करते हुए यह कहा जाता है कि- जहाँ हम मजबूरीके सामने पर झुकाते हैं वहाँ स्वतन्त्रता कहाँ? ' यहाँपर मजबूरीके अर्थपर हमें गौर करना चाहिये । ' अरस्तूने इस अवश्यम्भाविवाद या नियतिवादके विभिन्न अर्थोंपर बहुत पहले ही विचार किया था । यदि हमें रोगमुक्त होना है तो हम दवा लेनेके लिये बाध्य हैं । जीवनधारणके लिये श्वास लेना आवश्यक है । किसी स्थलमें दिये गये ऋणकी वसूलीके लिये वहाँ जाना जरूरी है, यह प्रयोजनीयता अवस्थापर निर्भर है, एक अवस्था दूसरी अवस्थापर निर्भर

पृष्ठ 798

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७९६ मार्क्सवाद और रामराज्य है, जैसे जीवन - धारण श्वास लेनेपर निर्भर है । मनुष्यको बाह्य प्रकृतिके सम्बन्धमें इसी तरहकी मजबूरियोंका सामना करना पड़ता है । फसल काटनेके लिये फसलका बोना जरूरी है । इसमें कुछ लोगोंको पराधीनताकी गन्ध आती है । निस्सन्देह मनुष्य अधिक स्वतन्त्र होता, यदि बिना परिश्रम ही उसकी आवश्यकताएँ पूरी हो जातीं । जब वह प्रकृतिको अपना मतलब पूरा करनेके लिये बाध्य करता है, तब भी वह प्रकृतिका अनुवर्ती है । लेकिन यह अनुवर्तिता ही उसकी स्वतन्त्रताकी शर्त है । प्रकृतिका अनुगामी बनकर प्रकृतिपर वह विजय पाता है और इस प्रकार वह अपनी स्वतन्त्रताके राज्यका विस्तार करता है । ' अब हीगेलके इस वाक्यका अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि ' प्रयोजनकी स्वीकृति ही स्वतन्त्रता है । ' किंतु यह ठीक नहीं है । ज्ञानसे इच्छा होती है, इच्छानुसार ही प्राणीकी कृति होती है । भले ही संसार कार्य -कारणके नियममें बँधा हो और भले ही मनुष्य तथा उसकी इच्छा भी संसारका अंश ही हो तथापि उसी संसारमें तो स्वतन्त्रता -परतन्त्रताका व्यवहार चलता है । जो प्राणी किसी अन्यकी प्रेरणा या आशासे काम करता है, वह परतन्त्र कहा जाता है । अपरप्रेरित अपनी इच्छासे काम करनेवाला स्वतन्त्र कहा जाता है । रहा यह कि इच्छा भी कारणजनित ही होती है । सो तो ' ज्ञानजन्या भवेदिच्छा ' ज्ञानसे इच्छा होती है, यह सिद्धान्त है । अन्यान्य प्राकृतिक तथा सामाजिक भी कारण रह सकते हैं । फिर भी स्वेच्छाधीन कार्य करनेवाला स्वतन्त्र कहा जाता है । इसमें विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती । तभी स्वेच्छाधीन भला बुरा काम करनेवाला मनुष्य निग्रह या अनुग्रहका भागी होता है । बिन्दुकी पृथ्वीपर गिरनेकी इच्छा तो काल्पनिक ही है; क्योंकि इच्छा चेतनका धर्म है, अचेतनका नहीं । फिर भी ' नद्याः कूलं पिपतिषति ' ( नदीका कगार गिरना चाहता है ), इस प्रकारकी इच्छाएँ वस्तुतः काल्पनिक हैं । आसन्नपतनता देखकर ऐसा व्यवहार किया जाता है । मातृस्तन पीनेकी इच्छा तो चेतनकी इच्छा है, वह क्षुधासे भी होती है । फिर भी इष्ट- साधनता-ज्ञानसे ही इच्छा मुख्य है । रोगमुक्त होनेके

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- माक्सय समाज व्यवस्था ७९७ लिये भी एक तो स्वेच्छासे ओषधि खायी जाती है, दूसरे अभिभावकोंद्वारा बाध्य किये जानेपर भी ओषधि खायी जाती है । इसी प्रकार जीवन- धारण करनेके लिये श्वास लेनेकी भी बात है । वस्तुतः प्रयोजनकी स्वीकृति ही स्वतन्त्रता है I। इस परिभाषासे ' स्वतन्त्रः कर्ता ' यह पाणिनिकी परिभाषा ही श्रेष्ठ है, जिसका आशय है ' क्रियामें स्वतन्त्ररूपसे विवक्षित अर्थ ही कर्ता होता है । ' स्वेतर समस्त कारकोंका प्रयोजक होकर स्वयं किसीसे प्रयुक्त न होना ही स्वतन्त्रता है । व्यवहारमें भी जितने विधि-निषेध होते हैं, सभी स्वतन्त्रके ही होते हैं । जिसके हाथ- पैर हथकड़ी - बेड़ीसे जकड़े हों, ऐसे परतन्त्र व्यक्तिको जल लाने या दौड़नेको कौन आदेश दे सकता है? यों कोई भी बुरा काम करता है तो परिस्थितियोंसे बाध्य होकर ही करना पड़ता है । काम, क्रोध, लोभ- सभी परिस्थितियोंके अनुसार ही होते हैं । चोरी कोई तभी करता है, जब वह परिस्थितियोंसे उसके लिये बाध्य हो । तो भी क्या समाजसे चोरी करनेको अपराध मानना बन्द हो जाना चाहिये? संसारमें सभी कार्य कामना या इच्छापूर्वक ही होते हैं । इच्छामें भी जब प्राणी सदा परतन्त्र ही है, तब तो फिर किसी बुरे कामसे हटनेका उपदेश या प्रयत्न व्यर्थ ही होंगे । इसी तरह किसी अच्छे काममें प्रवृत्त होनेका उपदेश और प्रयत्न भी व्यर्थ है । अतः सुस्पष्ट है कि परिस्थितियोंसे सम्बन्ध होते हुए भी इच्छाके अनुसार होनेवाले कार्योंको स्वाधीनतापूर्वक कर्म कहा जाता है । तभी शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार प्राणीको निग्रह एवं अनुग्रहका भागी होना पड़ता है, अन्यथा यह तो कोई भी अपराधी कह सकता है कि ' अमुक परिस्थितियोंने ही हमसे यह काम कराया है, अतः दण्ड उन परिस्थितियोंको मिलना चाहिये या परिस्थिति उत्पन्न करनेवालेको मिलना चाहिये । ' परिस्थिति उत्पन्न करनेवाले भी यही कह सकते हैं कि ' हमने भी परिस्थितिवश ही ऐसा किया है । ' मार्क्सवादी कहते हैं कि ' श्रेणी -विभाजन समाजमें जितना ही सुदृढ़ होता गया, शासक श्रेणी उतनी ही उत्पादनशक्तियोंसे दूर हटती गयी ।

पृष्ठ 800

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७९८ मार्क्सवाद और रामराज्य कृषिकार्यका भार, कारखाना चलानेका भार होता है गुलामोंके ऊपर, मजदूरोंके ऊपर । पूँजीपति सोच- विचारकर समाजव्यवस्थाके नीतिविधानकी रचनामात्र करते हैं, वस्तुजगत्‌का उनसे कोई सम्पर्क नहीं । हाथ-पैरसे काम करनेके लिये हैं मजदूर, मिस्त्री या इंजीनियर; लाभकारी आविष्कारके लिये हैं वैज्ञानिक । यहाँतक कि पूँजीपतिको देखभालकी आवश्यकता नहीं । ईरानमें तेलकी खानें चलती हैं और लाखों मील दूर बैठकर पूँजीपति मुनाफा कमाता है । धनिक वस्तुजगत्‌के जिस अंशका भोग करता है, वहाँ वह देखता है कि वही कर्ता है, वह स्वाधीन और सर्वेसर्वा है और उसीकी आज्ञासे सब चलता है । इसलिये आधुनिक संस्कृति और दर्शनमें इच्छा-स्वाधीनताका दावा सहज ही मंजूर हो जाता है । ' ' वर्तमान आदर्शवादी दार्शनिक इच्छा-स्वतन्त्रताके दावेके प्रमाणके लिये आधुनिक विज्ञानकी शरण लेते हैं । आइसनवर्गके- ' प्रिंसिपुल ऑफ मिनेसी ' में उनको एक सहारा मिलता है । संक्षेपमें इसका सिद्धान्त यह है कि ' कोई इलेक्ट्रॉन दूसरे मुहूर्तमें क्या करेगा, यह निश्चित नहीं है । इलेक्ट्रॉन एक कक्षसे दूसरे कक्षको कूद रहा है, लेकिन कौन इलेक्ट्रॉन कूदेगा, इसका निश्चय नहीं । ' जैम्स, एलिंगटन, शोडिंगगेर इसीकी इच्छा- स्वतन्त्रताके प्रमाणके रूपमें सादर अभ्यर्थना करते हैं । यहाँपर दो बातें जान लेनेकी हैं; एक यह कि किसी एक इलेक्ट्रॉनकी गतिविधिको लक्ष्य करनेके लिये उसके ऊपर जो आलोक पार किया जाता है, उसीसे उसका स्थान परिवर्तन हो जाता है । दूसरी बात यह है कि मोरके ' करसपाण्डेंस प्रिंसिपुल ' के अनुसार परमाणुओंके संख्याधिक्यसे उनकी गतिकी निश्चयता बढ़ जाती है । इस प्रकार आधुनिक विज्ञान भी कारणविहीन स्वतन्त्रताका अन्त कर देता है । ' परंतु यह बात भी ठीक नहीं है । इच्छा-स्वतन्त्रताका प्रश्न केवल पूँजीपतियोंसे ही नहीं है; क्योंकि इच्छा और तदनुसार विविध चेष्टाओंका प्रश्न तो सभीके साथ रहता है, भेद होता है, इच्छापूर्तिमें । जिनके पास पर्याप्त साधन है, उनकी इच्छाओंकी पूर्ति होती है, जिनके पास साधन