मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 841–850

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 841 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मार्क्स और ज्ञान ८३९ है, उसके बाद सविकल्प ज्ञान होता है । इन्द्रियोंके द्वारा मनोव्यापारके पहले प्रतिपत्ताको प्रथम अविकल्पित वस्तुमात्रका ही ग्रहण होता है । उस समय सामान्य- विशेषरूपसे अनाकलित और अविविक्त विषयका ही ग्रहण होता है । प्रतिपत्ता मनके व्यापारसे फिर सामान्य- विशेषरूपसे वस्तुकी विकल्पना करता है । यह सांख्यों तथा भट्टपाद कुमारिल आदिकोंको सम्मत है।‘प्रथमं सविकल्पकप्रत्ययात् पुरा यद्वस्तुमात्रगोचरं , बालमूकादिविज्ञानसमानं निर्विकल्पकज्ञानमस्ति तत्प्रतीति- सिद्धमालोचनात्मकं ज्ञानमभ्युपेयम्, तदभावे सविकल्पकज्ञानानुपपत्तेः । ' निर्विकल्प ज्ञानके उपरान्त बुद्धिके द्वारा नीलत्व घटत्वादिरूपसे विविक्त होकर जो गृहीत होता है, वही सविकल्पक ज्ञान है । एतावता केवल इन्द्रियसे उत्पन्न ज्ञान निर्विकल्पक एवं इन्द्रियसहकृत मनसे उत्पन्न ज्ञान सविकल्पकज्ञान है । प्रभाकरके मतानुसार ‘ स्वप्रकाशज्ञान विषयरूपसे घटादिका प्रकाश करता है और आश्रयत्वेन आत्माका प्रकाशक होता है । अतः ' अहं जानामि ' इस अंशमें अहं रूपसे आत्मा ही भासमान होता है । ' अहं ' यह अनात्मा नहीं है । कहा जाता है कि ' जैसे ' अयो दहति ' ( लोहपिण्ड दहन करता है ) यहाँ वस्तुतः लौहपिण्डमें जैसे स्वतः दाहकत्व नहीं होता, वैसे ही ' अहं ' में भी स्वतः ज्ञातृत्व नहीं हो सकता । ' परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि शीतल लौहपिण्ड और दीप -ज्वालात्मक दग्धा- दोनों जिस प्रकार विविक्तरूपसे उपलब्ध होते हैं, उस प्रकार अहंकार और ज्ञाताका कहीं भी विवेकेन उपलम्भ नहीं हो सकता । इसलिये आत्मा अहंकारास्पद है । वही संवित्का आश्रय होनेसे अपरोक्ष है । सांख्यवादी जड अन्तःकरणमें चित् प्रतिबिम्बको देखकर उसके कारणभूत तादृशबिम्बकी कल्पना वैसे ही करते हैं, जैसे दर्पणस्थ प्रतिबिम्बके आधारपर मुखका अनुमान किया जाता है, परंतु इन पक्षोंमें यदि आत्मा नित्यानुमेय है तो अपरोक्षावभास विरुद्ध है । नैयायिक आत्माको मानस प्रत्यक्षका विषय मानते हैं । मनका अन्वय- व्यतिरेक विषयानुभवसे ही गतार्थ हो जाता है । वस्तुतः विषयानुभव आश्रयरूपसे जब आत्माकी सिद्धि हो सकती है, तब पृथक् आत्म-

पृष्ठ 842

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 842 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४० मार्क्सवाद और रामराज्य विषयक ज्ञान मानना व्यर्थ ही है । ' भट्टपादके मतानुसार आत्मा प्रत्यक्ष होनेसे घटवत् ज्ञानका विषय है । एकहीमें कर्म- कर्तृविरोध होता है, परंतु यहाँ तो द्रव्यांशमें प्रमेयता और बोधांशमें प्रमातृता है । उसमें भी प्रमेय - अंशमें प्रधानता और प्रमाता - अंशमें अप्रधानता रहती है । प्रभाकर इस पक्षका भी विरोध करते हैं । उनके मतानुसार अचेतन द्रव्यांशको आत्मा नहीं कहा जा सकता । यदि . बोधांशको ही कर्म कहा जाय तो कर्म- कर्तृविरोध होगा । बोध समकालमें ही प्रमेयरूपसे और प्रमातारूपसे परिणत हो नहीं सकता; क्योंकि वह नित्य है । यदि प्रधान आदिके समान वह परिणत हो, तो भी प्रमातृभागके स्वप्रकाश होनेसे संवित्के आश्रयरूपसे वह प्रतीत न हो सकेगा । ऐसी स्थितिमें अपसिद्धान्त भी होगा । विषयरूपसे प्रतीत होनेपर घटादिके समान प्रमातामें भी अनात्मताकी प्रसक्ति होगी । इसलिये संवित् आश्रयरूपसे ही आत्माका एवं संवित्के विषयरूपसे घटादिका प्रत्यक्ष मानना चाहिये । प्रमिति स्वसत्तामें कभी भी अवेद्य होकर नहीं रहती । उपर्युक्त प्रकारसे प्रभाकरका ज्ञान या संवित् स्वप्रकाश है । भट्टपादके अनुसार विषय प्राकट्यरूप ही बोध उत्पन्न होता है । बौद्धोंका क्षणिक विज्ञान स्वतन्त्र है । उनमें सौत्रान्तिक ज्ञानमें विषयप्रतिबिम्ब देखकर उसके आधारपर और प्रतिबिम्ब बिम्बपूर्वक होता है, इस आधारपर ज्ञाननिष्ठ विषय प्रतिबिम्बके बलपर बिम्बरूप सत्य - विषयका अनुमान करते हैं । विज्ञानवादी ' विज्ञानरूप ही विषय है ', यह मानकर विषयोंकी अपरोक्षता मानते हैं । नैयायिकलोग मन: संयुक्त आत्मामें प्रमितिरूप ज्ञानकी उत्पत्ति कहते हैं । वे ज्ञानविषयक ज्ञान मानते हैं । ' अयं घटः ' यह ज्ञान व्यवसायात्मक होता है और 'ज्ञातो मया घटः ' अथवा ' घटमहं जानामि' इस आकारका ज्ञान अनुव्यवसायात्मक कहा जाता है । उत्तरोत्तर ज्ञानोंसे पूर्व- पूर्व ज्ञानोंका प्रामाण्य भी कहा जाता है, परंतु इस स्थितिमें पूर्व- पूर्व ज्ञानोंका अज्ञान भी मानना पड़ेगा, तभी अज्ञान- निवर्तकरूपसे उत्तरोत्तर ज्ञानोंकी सार्थकता हो सकती है । कोई भी प्रतीति स्वसत्ताकालमें प्रकाशहीन नहीं होती, अतएव घटादिके तुल्य

पृष्ठ 843

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 843 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मार्क्स और ज्ञान ८४१ उसे अवेद्य नहीं कहा जा सकता । कुछ लोगोंका कहना है कि ' जैसे घटादिरूप वेद्य होता है, वैसे ही प्रमाणरूप आत्मव्यापारसे जायमान घटादिनिष्ठ प्राकट्य भी वेद्य हो सकता है । ' यहाँ भी प्रश्न होता है कि ' वह आत्मव्यापार क्या है, परिस्पन्द या परिणाम प्रथम पक्ष इसलिये माना नहीं कि सर्वगत आत्मामें परिस्पन्द नहीं हो सकता । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि मृत्तिकाका परिणामभूत घट जैसे मृत्तिकामें ही रहता है, वैसे ही आत्म- परिणामभूत ज्ञान आत्मामें ही रहना चाहिये, उसकी विषयनिष्ठता नहीं हो सकती । कहा जाता है कि ' बालोंके पकने (श्वेत होने ) -रूप परिणामसे जैसे शरीरमें वार्धक्य होता है, वैसे ही आत्मपरिणामसे विषयमें ज्ञानका प्राकट्य होता है । ' इसपर भी विचारणीय यह है कि ' प्राकट्यका जो आश्रय है, वह चेतन है या प्राकट्यका जो जनक है, वह चेतन है अथवा प्राकट्यजनक ज्ञानाख्य व्यापारका आधार ही चेतन है?' यदि पहला पक्ष ठीक है, तब तो घटादि विषयको चेतन होना चाहिये; क्योंकि विषय ही प्राकट्यका आश्रय है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि चक्षुरादि भी प्राकट्यके जनक हैं; अतः वे ही चेतन कहे जायँगे । तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि ‘ भोजनक्रियाजन्य तृप्ति -फल-सम्बन्धी देवदत्तके समान आत्मा ज्ञानक्रियाजन्य- फल-सम्बन्धी होनेसे ज्ञानक्रियावान् है ', इत्यादि अनुमानके आधारपर आत्माकी ज्ञानाधारताका अनुमान करना पड़ेगा, परंतु आत्मामें फल- सम्बन्धका अभाव होनेसे हेतु असिद्ध है; क्योंकि प्राकट्यरूप फल विषयमें ही रहता है, आत्मामें नहीं । अतएव तार्किकों और भाट्टोंका मत ग्रहण न करके प्रमातृव्यापारप्रमाण एवं प्रमाणफल-प्रमितिको स्वप्रकाश ही मानना उचित है । बौद्ध संवेदन ( अनुभव ) -को ही प्रमाण और उसे ही प्रमाणफल मानते हैं, परंतु इस पक्षमें वही प्रमाण और वही प्रमाणफल होनेसे कर्म- कर्तृ -विरोध स्पष्ट ही है । कहा जाता है कि ' यद्यपि प्रमाता आत्माका कोई व्यापार नहीं है, तथापि आत्मा, मन, ‘चक्षु एवं विषयोंका संनिकर्ष ही प्रमाणरूप होकर प्रमातृव्यापाररूपसे उपचरित होता है । प्रमाणफल तो अव्यभिचरितरूपसे

पृष्ठ 844

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 844 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४२ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रमिति ही है I। हान, उपादान, उपेक्षा व्यभिचरित होनेवाले हैं, अतः उन्हें प्रमाणफल नहीं कहा जा सकता । ' इस तरह प्रभाकरका मत है कि ' स्वप्रकाश विषयसंवेदनके आश्रयरूप प्रदीपाश्रय- वर्त्तिकाके तुल्य प्रकाशमान अहंकार आत्मा है, दृग्दृश्यका अन्योन्याध्यासरूप अहंकार नहीं । ' परंतु वेदान्ती आत्माको अनुभवरूप ही मानते हैं । यहाँ विचारणीय यह है कि ' क्या आत्मा ही चित्प्रकाश है अथवा आत्मा और अनुभव- दोनों ही चित्प्रकाश हैं अथवा केवल अनुभव ही चित्प्रकाश है और आत्मा जड ही है? ' यदि आत्मा ही चित्प्रकाश है, तो ' क्या अनुभव चक्षुरादिके तुल्य स्वयं अप्रकाशित रहकर ही विश्वको प्रकाशित करेगा या आलोकादिके तुल्य सजातीय प्रकाशान्तर-निरपेक्ष प्रकाशमान होकर विषयका प्रकाशक होगा?' पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि चक्षु तो स्वातिरिक्त अनुभवका जनक होता है । इस तरह अनुभव स्वातिरिक्त अनुभवका जनक नहीं है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव स्वजातीय अनुभवान्तरकी अपेक्षा न करके ही प्रकाशमान होता है । इस तरह स्फुरण लक्षणयुक्त होनेसे अनुभव ही चित्प्रकाश सिद्ध हो जाता है । यद्यपि अनुभव, चक्षु तथा आलोक- तीनों ही घटादिके व्यंजक हैं, तथापि अनुभव विषयाज्ञानका विरोधी होनेसे चित्प्रकाशरूप है । आलोक विषयगत तमका विरोधी होनेसे जड प्रकाशस्वरूप है और चक्षु अपरोक्ष अनुभवका साक्षात् साधन होनेसे अज्ञात कारण है । इसपर भी कहा जाता है कि ' आलोकके तुल्य अनुभव सजातीय प्रकाशानपेक्ष है । ' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि आलोक भी अपने प्रकाशके लिये सजातीय चक्षुकी अपेक्षा रखता ही है, कारण आलोक स्वतः तमसे रहित है, अतः चक्षुका तमके निवारणमें उपयोग नहीं है । हाँ, चक्षुर्जन्य अनुभवके द्वारा आलोकका प्रकाश होता है, परंतु वह आलोकका विजातीय ही है, अतः आलोककी तरह सजातीयानपेक्ष अनुभवका चित्प्रकाशरूप होना ठीक है । यदि इस प्रकाशको जड माना जाय, तो जगत्में अन्धता-प्रसक्ति हो जायगी । प्रमातृ- चैतन्य ही जडानुभवबलसे सबका अवभासन करता है । यदि आत्म- चैतन्यका विषयके साथ

पृष्ठ 845

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 845 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मार्क्स और ज्ञान ८४३ सम्बन्धमात्रके लिये जडानुभवका उपयोग है, तब तो यह वेदान्तका ही मत है । वृत्तिरूप अनुभव सम्बन्धार्थ या आवरणाभिभवार्थ ही होता है । कुछ लोग आत्म- चैतन्यसे पृथक् ही विषयकी अभिव्यक्तिके लिये जडानुभवजन्य अनुभवान्तर मानते हैं; परंतु वह अनुभव भी यदि जड है तो उसे भी अन्य अनुभव अपेक्षित होगा । इस तरह अनवस्था होगी । ' आत्मा और अनुभव दोनों ही चित्प्रकाश हैं ' यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि इस तरह आत्मा और अनुभव दोनों ही अन्योन्य- निरपेक्ष सिद्ध होंगे, फिर उनका सम्बन्ध किसके द्वारा विदित होगा? दोनोंके ही अन्योन्यवार्तानभिज्ञ होनेके कारण दोनोंमेंसे कोई भी सम्बन्धग्राही नहीं हो सकता । कहा जा सकता है कि ' जैसे पुरुषान्तरका ज्ञान चिद्रूप होनेपर भी दूसरेको विदित नहीं होता, वैसे ही चिद्रूप होनेपर भी आत्मा स्वयं प्रकाशित नहीं होगा । इसलिये अनुभवाधीन ही आत्माकी सिद्धि होती है । ' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो यही आपत्ति अनुभवके सम्बन्धमें भी हो सकती है । यदि कहा जाय कि ' पुरुषान्तर संवेदनव्यवहित होता है, किंतु अपना अनुभव अव्यवहित है, अतः स्वप्रकाश है, ' तो आत्माके सम्बन्धमें भी यही कहा जा सकता है । आत्मा चिद्रूप एवं अव्यवहित होनेसे अपने अनुभवके समान स्वयं ही प्रकाशित होता है । ' अनुभव ही चित्प्रकाश है ' यह तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि ‘ आत्मा ही चित्प्रकाश है ' यह पक्ष मानना अनिवार्य है । कारण, आत्मा और अनुभवका अभेद ही है । ' यह अनुभव आत्माका गुण है ' ऐसा तार्किक और प्राभाकर मानते हैं । ' आत्मस्वरूप होनेसे द्रव्य ही अनुभव है ' यह सांख्यमत है । ' ज्ञान- परिणाम क्रियाका फल है तथा च क्रिया और फलमें अभेदकी विवक्षासे कर्म ही ज्ञान है ' यह भाट्टमत है, परंतु ज्ञानको कर्मरूप माननेसे गमनादि क्रियाके तुल्य ही उसमें प्रकाशरूपता और फलता नहीं बन सकती । द्रव्य होनेपर भी अनुभव यदि अणुपरिणाम हो, तब तो खद्योतके समान परिमित वस्तुके एक देशका ही प्रकाशक होगा, सम्पूर्ण वस्तुका प्रकाशक ज्ञान नहीं होगा । यदि अनुभव महत्परिमाण द्रव्य माना जाय, तब तो अनुभवस्वरूप

पृष्ठ 846

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 846 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४४ मार्क्सवाद और रामराज्य आत्माका सर्वत्र अवभास होना चाहिये । यदि आत्मा महत्परिमाण अनुभवका आश्रय हो तो भी वही प्रसंग रहेगा । यदि अनुभवको मध्यम परिमाण माना जाय तो उसे सावयव कहना पड़ेगा और फिर अनुभव अवयवोंके परतन्त्र होगा, आत्माधीन रहेगा । यदि कहा जाय कि ' जैसे भूतलपरिणाम घट भूतलाधीन होता है, वैसे ही आत्मपरिणाम अनुभव आत्मपराधीन होगा, ' तब भी प्रदीप एवं प्रकाशके समान आत्मा और अनुभवका अभेद ही कहना पड़ेगा । जैसे प्रदीपसे घटादि प्रकाशित होते हैं, वैसे ही ' घटो मयावगतः ' ( मैंने घट जाना ) इत्यादि व्यवहार होता है । यदि आत्मा और चैतन्य या ज्ञानका भेद होगा, तब तो ' काष्ठेन प्रकाशितः ' ( काष्ठके द्वारा प्रकाशित होता है ) -के समान ' मयावगतम्' यह प्रयोग भी औपचारिक ही समझा जायगा । 'ज्ञान गुण है ' इस पक्षमें जैसे प्रदीपमें रहनेवाले भास्वररूपकी उत्पत्ति आश्रयकी उत्पत्तिसे भिन्न नहीं होती, वैसे ही अनुभवकी भी उत्पत्ति उसके आश्रयकी उत्पत्तिसे भिन्न नहीं होगी । ऐसी स्थितिमें आत्मा नित्य है, उसमें अनुभवका व्यभिचार कभी नहीं होता, अतः अनुभव और आत्मा दोनोंमें भेद नहीं है, किंतु अनुभवस्वरूप ही आत्मा है । यदि आत्माकी सिद्धि अनुभवके अधीन हो, तब तो घटादिके समान ही आत्मा भी अनात्मा ही ठहरेगा । कहा जा सकता है कि ' नील- पीतादि अनुभव अनेक हैं, वे आत्म- स्वरूप कैसे हो सकते हैं? ' परंतु अनुभवोंमें स्वरूपतः कोई भी भेद नहीं है । जैसे एक अनन्त आकाशमें घटादि उपाधिके भेदसे भेद प्रतीत होता है, वैसे ही नील-पीतादि विषय एवं तदाकार बुद्धिवृत्ति आदि उपाधिसे आकाशवत् अनन्त अखण्ड एक अनुभवमें औपाधिक भेद प्रतिभासित होते हैं । अनुभवके भेदमें कोई प्रमाण नहीं है । अनुभवका जन्म और विनाश भी अप्रामाणिक है, अतः ' घटमें पाकके अनन्तर रक्तरूप उत्पन्न होनेपर रक्तानुभव उत्पन्न होता है । रक्तानुभवके पहले श्यामरूपका अनुभव था, अब वह नहीं है, ' इत्यादि कथन ठीक नहीं हैं; क्योंकि भेदसिद्धि होनेपर जन्म - विनाश सिद्ध होगा और जन्म-विनाश सिद्ध होनेपर भेदसिद्धि होगी । इस तरह

पृष्ठ 847

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 847 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मार्क्स और ज्ञान ८४५ अन्योन्याश्रय दोषकी प्रसक्ति होती है । कुछ लोगोंका कहना है कि 'चक्षुरादि साधनोंकी अर्थवत्ताके लिये उत्तर संवित्का जन्म मानना आवश्यक है और एक कालमें दो संवित् नहीं रह सकतीं, अतः पूर्व संवित्का विनाश भी मानना चाहिये । ' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि एक ही संवित्के भिन्न-भिन्न विषयोंके साथ होनेवाले सम्बन्धोंके ही उत्पत्ति- विनाशसे साधनोंकी सार्थकता एवं यौगपद्य ( एककालिकता ) -की निवृत्ति बन जायगी । बौद्धोंका कहना है कि ' संविदोंमें भेद रहता हुआ भी सादृश्यके कारण प्रतीत नहीं होता । नील-पीतादि विषयरूप उपाधिके संसर्गसे ही वह भेद प्रतीत होता है, ' परंतु यह कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि ज्वालाएँ अन्यवेद्य हैं, उनमें भेदकी अप्रतीति हो सकती है, परंतु स्वप्रकाश संवित्में होनेवाले भेदकी अप्रतीति नहीं बन सकती । कहा जा सकता है कि ' जैसे वेदान्तियोंका स्वप्रकाश भी ब्रह्म अज्ञात रह सकता है, वैसे ही संवित्का भेद भी अप्रतीत रह सकता, ' परंतु यह भी ठीक नहीं है । ब्रह्ममें अविद्याका आवरण प्रमाणसिद्ध है, अतः एक ही संवित् अनादि है; क्योंकि उसका प्रागभाव नहीं है । सुरेश्वराचार्यका कहना है कि प्रत्येक कार्य प्रागभावपूर्वक ही होता है । उस प्रागभावकी भी सिद्धि संवित्से ही होती है, अतः संवित्का प्रागभाव नहीं है । यदि संवित् न हो तो प्रागभाव ही सिद्ध नहीं हो सकता और जब संवित् है ही, तब उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है? ' कार्यं सर्वैर्यतो दृष्टं प्रागभावपुरस्सरम् । तस्यापि संवित्साक्षित्वात् प्रागभावो न संविदः ॥ ' इस तरह स्वप्रकाशानुभव नित्य है, वही आत्मा भी है । आत्मा ही विषयोपाधिक होकर अनुभव कहलाता है । विषयोपाधिकी विवक्षा न होनेसे वही अनुभव आत्मा कहलाता है । जैसे वृक्ष ही समूहरूप उपाधिके कारण वन कहलाते हैं और उपाधि- विवक्षा न होनेसे वे ही वृक्ष कहलाते हैं । अतः प्रभाकरका यह कहना ठीक नहीं है कि ' अनुभवके आश्रयरूपसे आत्माका प्रकाश होता है । ' कहा जाता है कि ‘ घटमहं पश्यामि ' यहाँ अहंकार ही घटका द्रष्टा

पृष्ठ 848

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 848 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४६ मार्क्सवाद और रामराज्य है, वही आत्मा है, परंतु यह ठीक नहीं है । यदि ' अहं ' ही आत्मा है, तब तो सुषुप्तिमें भी उसका स्फुरण होना चाहिये, परंतु सुषुप्तिमें अहंकी प्रतीति नहीं होती, अतः अहंकार आत्मा नहीं है । कुछ लोग कहते हैं कि ' सुषुप्तिमें विषयानुभव नहीं होता, अतः अहंकारकी भी प्रतीति नहीं होती । ' यह कहना भी ठीक नहीं है । यहाँ यह विचारणीय है कि ' क्या सुषुप्तिमें अनुभव ही नहीं है अथवा विषयसम्बन्धका ही अभाव है?' पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव नित्य है, अतः उसका अभाव नहीं कहा जा सकता । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि विषय -सम्बन्ध आत्मप्रतीतिका कारण नहीं है । कहा जाता है कि ' आत्माका द्रष्टृत्वरूप आकार ही अहंकार है, द्रष्टृत्वकी प्रतीतिमें विषय - सम्बन्ध आवश्यक है, ' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है । यहाँ विचारणीय यह है कि ' द्रष्टृत्व क्या है? क्या दृश्यका अवभासकत्व ही द्रष्टृत्व है अथवा दृश्यभिन्नता द्रष्टृता है, किंवा चिन्मात्र ही द्रष्टृत्व है? पहले और दूसरे पक्षमें दृश्यके ही द्वारा द्रष्टाका निरूपण होता है । दृश्यके आगन्तुक होनेसे द्रष्टा भी आगन्तुक ही होगा । तब वह आत्मा कैसे होगा? अतः अहंकार आत्मा नहीं हो सकता । तीसरे पक्षमें तो दृश्यकी अपेक्षा ही नहीं रहती, अतः सुषुप्तिमें विषय न रहनेपर भी अहंकारका उपलम्भ होना चाहिये । ' सुषुप्तिमें अहंकी प्रतीति होती है ' यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जैसे पूर्व दिनके अहंका स्मरण होता है, वैसे ही सुषुप्तिके भी अहंका उल्लेख होना चाहिये । यद्यपि जिसका अनुभव होता है, उसका स्मरण होना अनिवार्य नहीं है । फिर भी जब आत्माका स्मरण होता ही है, तब चिद्रूप अहंकारका स्मरण होना ही चाहिये । कहा जा सकता है कि ' सुषुप्तिके अहंकारका भासक नित्य चैतन्यरूप अनुभव है । उसका विनाश न होनेसे संस्कार उत्पन्न नहीं होता, अतः स्मृति नहीं होती । ' परंतु तब तो पूर्व दिन अहंकारका भी स्मरण न होना चाहिये 1। वेदान्तमतमें तो अहंकारावच्छिन्न चैतन्यसे ही अहंकारकी प्रतीति होती है । वह अनित्य ही है, अतः संस्कारोत्पत्ति तथा स्मरण बननेमें कोई आपत्ति नहीं । यदि कहा जाय कि ' सुषुप्तिके भी अहंकारका स्मरण होता ही है, अतएव

पृष्ठ 849

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 849 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मार्क्स और ज्ञान ८४७ ' सुखमहमस्वाप्सम्' ( मैं सुखपूर्वक सोया था ) इस सुप्तोत्थितके स्मरणमें अहंकी प्रतीति होती है । ' इसपर तार्किकका कहना है कि ' यह स्मरण है ही नहीं, किंतु उत्थानकालमें प्रतीत होनेवाले आत्मामें सुखोपलक्षित दुःखाभावका अनुमान किया जाता है । मैं स्वप्न एवं जागरितके बीचमें दुःखरहित था; क्योंकि उस बीचके दुःखका घटादिके समान कभी स्मरण नहीं होता । ' मुख्य सुख सुषुप्तिमें हो नहीं सकता, अतः जैसे सिरका भार हटनेपर प्राणीको सुखका अनुभव होता है, वैसे ही सुषुप्तिमें दुःख न होनेसे सुखका व्यवहार होता है । कहा जा सकता है कि ' सुखका स्मरण होनेसे सुषुप्तिमें मुख्य ही सुख मानना ठीक है । ' परंतु फिर तो सामान्य विशेषनिष्ठ होता है, अतः भोजनसुख, पानसुख आदि रूपसे विशिष्ट सुखका भी स्मरण होना चाहिये । यदि कहा जाय कि ' उस विषयमें संस्कारका उद्बोध नहीं हुआ ', तब भी ' सुखमहमस्वाप्सम्' के साथ ' नाहं किञ्चिदवेदिषम्' ( मै कुछ भी नहीं जानता था ) यह ज्ञानाभावका परामर्श सुखानुभवका विरोधी है, अतः दुःखाभावमें ही सुखका व्यवहार मानना ठीक है । जो कहा जाता है कि ' सुप्तोत्थितमात्रका अंगलाघव, प्रसन्नवदनत्वादिसे पूर्वकालमें सुखानुभवका अनुमान होता है, ' तो वह भी ठीक नहीं है । अनुभवके अनन्तर क्षणमें स्मरण ही हो सकता है, फिर अनुमान व्यर्थ है । यह भी कहा जाता है कि ' तारतम्यरूपसे दृश्यमान अंगलाघवादि सातिशय स्वापसुखानुभवके बिना उपपन्न नहीं हो सकते । दुःखाभाव तो एक रूप ही होता है, अतः उस आधारपर अंगलाघवादिका तारतम्य नहीं बन सकता । ' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि प्रतियोगिदुःखजनक करण- व्यापारोंके उपरमके तारतम्यसे अंगलाघवादिके तारतम्यकी प्रतीति होनेमें कोई बाधा नहीं है । वेदान्तसिद्धान्तानुसार तो स्वप्रकाश साक्षिचैतन्यस्वरूप ही आनन्द है । वह यद्यपि सर्वदा ही भासमान रहता है, फिर भी जाग्रत् एवं स्वप्नमें तीव्र वायु विक्षिप्त प्रदीपप्रभाके समान ' अहं मनुष्यः ' इत्यादि मिथ्याज्ञानसे विक्षिप्त होनेके कारण स्पष्ट प्रतीत नहीं होता, परंतु सुषुप्तिमें वह मिथ्या

पृष्ठ 850

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी, पृष्ठ 850 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४८ मार्क्सवाद और रामराज्य ज्ञान नहीं रहता, अतः वहाँ साक्षीरूप आनन्द स्पष्टरूपसे भासित होता है । आवरणभूत अविद्या ब्रह्मतत्त्वाकारका आच्छादन करती हुई भी स्वभासक साक्षिचैतन्याकारको नहीं ढकती, अन्यथा बिना साक्षीके तो अविद्या भी सिद्ध न हो सकेगी । अतः सुषुप्तिमें अनुभूत आनन्द, आत्मा एवं भावरूप अज्ञान, इन्हीं तीनोंका सुप्तोत्थितको ' सुखमहमस्वाप्सम्, नाहं किञ्चिदवेदिषम्' इस तरह स्मरण होता है । कहा जाता है कि ' इन तीनोंका अनुभव अन्तःकरण वृत्तियोंसे नहीं हो सकता; क्योंकि सुषुप्तिमें वृत्ति नहीं रहती । चैतन्यसे अनुभव हो सकता है, परंतु वह अविनाशी होनेसे संस्कारका उत्पादक न होगा, अतः स्मरण नहीं बनेगा, ' परंतु यह ठीक नहीं है । सुषुप्तिमें अविद्या- वृत्तिसे ही तीनोंका ग्रहण सम्भव है । अविद्या- वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही उक्त तीनों वस्तुओंका अनुभव होता है, उसीका नाश भी सम्भव है और संस्कार भी सम्भव है । उसी संस्कारसे स्मृति हो सकती है । कहा जाता है कि ' इस तरह तो अविद्याविशिष्ट आत्मा अनुभविता होगा और अन्तःकरणविशिष्ट आत्मा स्मर्ता होगा, अतः वैयधिकरण्य होगा । अन्यके अनुभूतका अन्य स्मर्ता नहीं होता । ' परंतु यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उत्थानकालमें भी अविद्याविशिष्ट ही आत्माका स्मर्ता है । स्मृत अर्थका शब्दानुविद्ध व्यवहार अन्तःकरणसे होता है । जो कहा जाता है कि 'सुखमस्वाप्सम्, नावेदिषम्' यह ज्ञान दुःखाभाव एवं ज्ञानाभावको ही विषय करता है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि सुषुप्तिमें यद्यपि ज्ञानाभाव एवं दुःखाभाव रहते हैं, फिर भी उनका अनुभव नहीं होता, कारण सुषुप्तिमें उनके प्रतियोगी दुःख तथा ज्ञानका स्मरण नहीं रहता । प्रतियोगिस्मरणके बिना अभावका ग्रहण असम्भव ही होता है । कहा जाता है कि ' तो फिर वेदान्त-पक्षमें भी सौषुप्त ज्ञानाभाव तथा दुःखाभावका अनुभव कैसे होगा?' इसका समाधान अर्थापत्तिसे किया जाता है । उक्त रीतिसे सुषुप्तिके अविक्षिप्त सुखका अनुस्मरण करके तद्विरोधी दुःखका अभाव प्रमित हो सकता है । परामृष्टभावरूप अज्ञानकी अन्यथा अनुपपत्तिसे अज्ञानविरोधी ज्ञानका अभाव निश्चित हो जाता है ।