मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 851–860
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860
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मार्क्स और ज्ञान ८४९ कुछ लोग कहते हैं कि ' भावरूप अज्ञान ज्ञानके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि जागरणकालमें ज्ञान और अज्ञान दोनों ही एक साथ रहते हैं । ' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि यद्यपि अज्ञानमात्रका प्रपंच-ज्ञानके साथ विरोध नहीं है, तथापि विशेषाकाररूपसे परिणत अज्ञानका ज्ञानके साथ विरोध होता है । घटज्ञानाकारसे परिणत अज्ञान पटादि ज्ञानोंसे विरुद्ध होता ही है । अन्यथा घटज्ञानकालमें पटादि सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित होना चाहिये । इस दृष्टिसे सुषुप्तावस्थाकारसे परिणत अज्ञानका अशेष विशेष ज्ञानोंके साथ विरोध है ही, अतः अर्थापत्तिसे ज्ञानाभाव सिद्ध होगा । कुछ लोग प्रबोधकालमें ज्ञानका स्मरण होनेसे सुषुप्तिमें ज्ञानाभावका अनुमान करते हैं, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि मार्गस्थ तृणादिका भी स्मरण नहीं होता । फिर भी उनका अभाव नहीं कहा जा सकता । कहा जाता है कि ' यदि स्मरण न होनेसे अभावका अनुमान नहीं हो सकता, तो अस्मर्यमाण होनेसे गृहमध्यमें प्रातःकाल गज नहीं था, यह अनुमान कैसे बनेगा? ' परंतु यह कोई दोष नहीं है । वहाँ तो गृहमें कुसूलादि विविध पदार्थोंका अनुभव करके मध्याह्नमें उन्हींका स्मरण करके उनकी अन्यथानुपपत्तिसे प्रातः गजाभाव प्रमित होता है, अतः सुषुप्तिमें दुःखाभाव एवं ज्ञानभाव अर्थापत्तिसे ही वेद्य होते हैं । भावरूप अज्ञान, आनन्द तथा आत्माका स्मरण होता है । फिर भी सुषुप्तिमें न अहंकारका अनुभव होता है और न तो उत्थितको उसका स्मरण ही होता है । ‘ सुखमहमस्वाप्सम् ’ इस रूपसे स्मरणमें जो अहंका उल्लेख होता है, उसकी स्थिति यह है कि सुषुप्तिमें अहंकार अज्ञानमें विलीन हो जाता है । प्रबोधमें वह पुनः उद्भूत होता है । उत्पन्न होकर वही अहंकार स्मर्यमाण आत्माको स्पष्ट व्यवहारके लिये सविकल्परूपसे उपलक्षित करता है । अहंकारवृत्तिका यही प्रयोजन भी है । इसलिये आत्मा अहंवृत्तिको छोड़कर अन्य अन्तःकरणवृत्तियोंसे कभी भी व्यवहृत नहीं होता । इसीलिये नैष्कर्म्य -सिद्धिकारका कहना है कि ' प्रत्यक्स्वरूप एवं अति सूक्ष्म होने तथा आत्मदृष्टिसे उसका अनुशीलन होनेसे घटपटाद्याकार अन्य वृत्तियोंको छोड़कर अहंवृत्तिसे ही आत्मा उपलक्षित होता है ।
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८५० मार्क्सवाद और रामराज्य अहंकार या तो आत्माके साथ ही व्याप्त होकर रहता है अथवा विलयको प्राप्त होता है । उसकी अन्य तीसरी अवस्था नहीं होती । इसीलिये अहंबुद्धिसे आत्माका सविकल्प होता है । इस तरह जाग्रत्-स्वप्नमें आत्मरूपसे भासमान होनेपर भी अहंकार सुषुप्तिमें नहीं रहता, अत: वह स्वप्रकाश आत्माका स्वरूप नहीं है । अहंकार परमेश्वराधिष्ठित स्वविद्यासे ही उत्पन्न होता है । ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति उसका स्वरूप है । कूटस्थ चैतन्यसे ही उसकी सिद्धि होती है । कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि उसके कार्य हैं । सुषुप्तिमें अन्तःकरणका प्रलय हो जाता है, अतः वह वहाँ नहीं रहता । यद्यपि क्रियाशक्तिरूप प्राण सुषुप्तिमें भी रहता है, तथापि प्राण अहंकारसे भिन्न है, अतः अहंकारके लयमें कोई विरोध नहीं है । यदि प्राण अन्तःकरणका ही अंश माना जाय, तो यह मानना चाहिये कि प्राणांशको छोड़कर अवशिष्ट अन्तःकरणका सुषुप्तिमें लय होता है । दृष्टि सृष्टि- पक्षमें तो सुप्त पुरुषके प्रति सभीका मुख्य प्रलय ही होता है । जो लोग स्वतन्त्र अचेतन प्रकृति आदिको ही महत्त्व, अहंतत्त्व आदि सब प्रपंचका उपादान मानते हैं, परमेश्वराधिष्ठित अविद्याको नहीं, उनके यहाँ सब वस्तुएँ इदंरूपसे ही गृहीत होनी चाहिये । ' अयं कर्ता, अयं भोक्ता ' ( यह कर्ता है, यह भोक्ता है ) इस रूपसे प्रतीति होनी चाहिये, ' अहं कर्ता, अहं भोक्ता' ( मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ) इस प्रकारसे नहीं । ऐसी प्रतीति तो तभी बन सकती है, जब सभी वस्तुएँ आत्मामें अध्यस्त हों । ' नैयायिक अणु -परिमाण मनको इन्द्रिय मानते हैं । उसीको सुख- दुःख, इच्छा-ज्ञानका निमित्तकारण मानते हैं । इस मनके बिना आत्मा इन्द्रिय तथा विषयके संयुक्त होनेपर भी एक कालमें अनेक ज्ञान नहीं होते । मन अणु है, अतः एक कालमें अनेक इन्द्रियोंसे संयुक्त नहीं हो सकता । जिस समय वह जिस इन्द्रियसे संसृष्ट होता है, उस समय उसी विषयका ज्ञान होता है । इसीलिये एक कालावच्छेदेन दो ज्ञानकी उत्पत्ति न होना ही मनका लिंग है । ' युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( न्यायदर्शन० १ । १ । १६ ) यह कहा गया है । मनसे भिन्न मध्यम परिमाण अन्तःकरण नैयायिकोंको मान्य नहीं है । उनके मतानुसार मनके द्वारा
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मार्क्स और ज्ञान ८५१ सर्वगत आत्मामें समवायसम्बन्धसे ज्ञान-गुणकी उत्पत्ति होती है । आत्मा यद्यपि ज्ञानाश्रय है और वह सर्वगत है, तथापि निरवयव होनेसे उसका सर्वसंयोग सम्भव नहीं है, अतः युगपत् ( एक साथ ) सर्वप्रकाश नहीं होगा । क्रियारूप या गुणरूप ज्ञानका - स्वाश्रयका उल्लंघन करके - अन्यत्र संयोग सम्भव नहीं है, अतः उस ज्ञानसे किसी भी वस्तुका प्रकाश न होना चाहिये । यदि ज्ञान बिना संसर्गके असंसृष्टका ही ग्रहण करे तो अतिप्रसंग होगा, अर्थात् असंसर्ग समान होनेसे किसी भी वस्तुका ग्रहण होना चाहिये । ' शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेशसमवायी ज्ञान होता है ' इस पक्षमें भी विचारणीय है कि यदि प्रदेश आत्माका स्वाभाविक धर्म है, तब तो आत्मामें सावयवत्वापत्ति होगी । यदि प्रदेश औपाधिक है तो भी ज्ञान तत्प्रदेशसंयुक्त वस्तुका ही ग्राहक है, अतः देहादिसे बाह्य घटादिका प्रकाश न होना चाहिये । यदि ज्ञान बाह्यात्मप्रदेश- संयुक्त वस्तुका भी ग्राहक है, तो फिर सभी बाह्य वस्तुएँ बाह्यात्मप्रदेश- संयुक्त हैं ही, अतः सबका ही ग्रहण होना चाहिये । कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि 'ज्ञानाधार आत्मासे मन संयुक्त होता है, मनसे इन्द्रिय संयुक्त होती है और इन्द्रियसे विषय संयुक्त होता है । इस तरहकी संयोगपरम्परासे वस्तुका बोध होता है, ' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि यह परम्परा तो ज्ञानोत्पादनमें ही उपयुक्त होती है । ज्ञान उत्पन्न होनेके बाद भी यदि संयोगपरम्परासे विषयका प्रकाश हो, तब तो विषयसंयुक्त, तत्संयुक्तादिरूपसे अवस्थित सभी जगत्का प्रकाश होना चाहिये । वेदान्त -मतानुसार सर्वगत चिदात्माको आवृत करके स्थित भावरूप अविद्या ही सम्पूर्ण जगत्के आकारसे स्थित होती है । शरीरके मध्यमें अविद्याविवर्त्त अन्तःकरण रहता है । इसीकी सूक्ष्म पंचभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशसे भी उत्पत्ति मानी जाती है । वही धर्माधर्मसे प्रेरित होकर नेत्रादि इन्द्रियोंद्वारा निकलकर घटादि विषयोंको व्याप्त होकर तत्तद्-विषयोंके आकारसे आकारित होता है । जैसे पूर्ण सरोवरका जल सेतुच्छिके द्वारा निकलकर कुल्याप्रवाहरूप ( नहर- नालियों ) -से खेतोंमें पहुँचकर तदाकार हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये । फिर
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८५२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी जलके समान अन्तःकरण बहता नहीं है, किंतु सूर्यरश्मिके तुल्य ही है । तैजस होनेसे अन्तःकरण दीर्घ प्रभाकारसे परिणत होता है और रश्मिके समान ही सहसा उसका संकोच भी उपपन्न होता है । अन्तःकरण सावयव है, अतः उसका परिणाम उपपन्न होता है । वह अन्त: करण घटाद्याकारसे परिणत होकर देहके भीतर और घटादिमें व्याप्त होकर देह एवं घटादिके मध्यमें दण्डायमान अविच्छिन्नरूपसे अवस्थित रहता है । देहावच्छिन्न अन्तःकरणका भाग ' अहंकार ' एवं ' कर्ता ' कहा जाता है । मध्यवर्ती दण्डायमान अन्तःकरणका भाग ' वृत्तिज्ञान ' नामकी क्रिया कही जाती है । विषयव्यापक भाग विषयको ज्ञानका कर्म बनानेवाला अभिव्यक्ति योग्य कहा जाता है । वह तीनों ही भागवाला अन्तःकरण अतिस्वच्छ होता है, अतः उसमें स्वच्छ काँचपर सौर प्रकाशके समान आत्म- चैतन्य अभिव्यक्त होता है । अभिव्यक्त चैतन्य यद्यपि एक ही है, तथापि अभिव्यंजकके त्रैविध्यसे उसमें त्रिधा व्यवहार होता है । कर्तृभागावच्छिन्न चिदंश ' प्रमाता', क्रियाभागावच्छिन्न चिदंश ' प्रमाण ' और विषयगत योग्यत्वभागावच्छिन्न चिदंश ' प्रमिति ' कहलाता है । तीनों ही भागोंमें अनुगत एकाकार अन्तःकरणमें प्रमातृ-प्रमेय- सम्बन्धरूप ' मयेदमवगतम्’ ( मैंने इसे जाना ) यह विशिष्ट व्यवहार बनता है । व्यंग्य चैतन्य एवं व्यंजक अन्तःकरणका ऐक्याध्यास होनेसे अन्योन्यमें अन्योन्य- धर्मका व्यवहार भी संगत है । प्रकाशरूप होनेसे या प्रकाशसंसृष्ट होनेसे ही वस्तुओंका प्रकाश होता है । सूर्यादि प्रकाशरूप होनेसे प्रकाशित होते हैं । घटादि प्रकाशसंसर्गी होनेसे प्रकाशित होते हैं । वैसे ही आत्मचैतन्य या अखण्ड बोध अथवा नित्यज्ञान प्रकाशरूप होनेसे एवं अन्य वस्तुएँ तत्संसर्गी होनेसे प्रकाशित होती हैं । चैतन्यका विषयके साथ संयोग, समवायादि सम्बन्ध नहीं होता, किंतु आध्यासिक ही संसर्ग होता है । जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास होता है, वैसे ही चैतन्यमें प्रपंचका अध्यास है । अतः अधिष्ठान चैतन्यमें प्रपंच अध्यस्त है । उसी चैतन्यसे प्रपंचका प्रकाश होता है । किंतु वह चैतन्य अविद्यांशोंसे ढका रहता है । उन्हीं आवरणांशोंके हटानेके लिये प्रमाता-प्रमाणादिका व्यापार होता है ।
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मार्क्स और ज्ञान ८५३ घटादिकी प्रत्यक्षतामें आलोक, चक्षु, मन आदिकी आवश्यकता पड़ती है । आलोककी अपरोक्षताके लिये अन्य आलोक अपेक्षित नहीं होता । चक्षुके ज्ञानमें दूसरे चक्षु आदिकी अपेक्षा नहीं होती । सर्वविज्ञाता, प्रमाता या ज्ञानको अपने प्रकाशके लिये अन्यकी अपेक्षा नहीं होती । सर्वसाक्षी प्रमाताका भी प्रकाशक अखण्डभान साक्षात् अपरोक्ष कहा जाता है । दो उपाधियोंके एकत्रित होनेसे दो उपहितोंका भी अभेद हो जाता है । जैसे घट और मठ एकत्रित होनेसे घटाकाश और मठाकाश दोनों एक ही हो जाते हैं, वैसे ही जहाँ अन्तःकरण विषय- प्रदेशपर इन्द्रियादिद्वारा जाता है, वहाँ विषय एवं अन्त: करण दोनों उपाधियाँ एकत्रित होनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य एक हो जाते हैं । इसीको प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं । जहाँ अन्तःकरणवृत्ति विषयसे संसृष्ट नहीं होती, वहाँ परोक्ष ज्ञान होता है और अन्तःकरण तथा विषय दोनों एकत्रित होनेसे अन्तःकरणावच्छिन्न एवं विषयावच्छिन्न चैतन्यकी एकता हो जाती है । उस समय विषयावच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त विषय विषयावच्छिन्न चैतन्यभिन्ना अन्तःकरणवच्छिन्न प्रमातृ चैतन्यमें भी अध्यस्त समझा जाता है । इसीलिये प्रमातृ चैतन्यसे विषयका अपरोक्षज्ञान होता है । इसपर शंका होती है कि ' अन्तःकरणसे चैतन्यकी अभिव्यक्ति क्या है? यदि आवरण- विनाश, तब तो घटज्ञानसे ही मोक्ष हो जाना चाहिये; क्योंकि वेदान्तमतमें आवरण-विनाश ही मोक्ष है । यदि अभिव्यक्ति आत्मगत अतिशय - विशेष है, तब तो सातिशय आत्मा विकारी ही होगा, ' परंतु इसका समाधान यह है कि आवरणाभिभव ही अभिव्यक्ति है । एतावता निरावरण चैतन्यसे विषयका प्रकाश होता है । कहा जाता है कि ' चैतन्य सर्वगत है, फिर स्वसंसृष्ट सर्वभासक होनेसे प्रतिकर्म- व्यवस्था नहीं होगी । प्रमाण- प्रमेयादि व्यवहार ही प्रतिकर्म - व्यवस्था है, परंतु यह दोष नहीं है । ‘ जो सुख-दुःखादि एक पुरुषको अनुभूत होते हैं, वे क्या सभी पुरुषोंको अनुभूत होने चाहिये; क्योंकि चैतन्य एक ही है?' यह आपत्ति है अथवा यह कि ' देवदत्त जिस समय घटका अनुभव करता है, उसी समय सम्पूर्ण जगत्का अनुभव होना चाहिये; क्योंकि देवदत्तका
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८५४ मार्क्सवाद और रामराज्य चैतन्य सर्वगत है । ' पहली आपत्ति इसलिये संगत नहीं है कि केवल चैतन्य अनुभवका हेतु नहीं है; क्योंकि वह अविद्यासे आवृत है, किंतु अन्तःकरणद्वारा अभिव्यक्त चैतन्यसे ही विषयोंका अनुभव होता है । वह अन्तःकरण प्रतिपुरुष भिन्न है, अतः जिस पुरुषके अन्तःकरणसे अभिव्यक्त चैतन्यद्वारा जिस विषयका सम्पर्क होता है, उसीको उसका ज्ञान होता है । दूसरी आपत्ति भी ठीक नहीं है; क्योंकि परिच्छिन्न अन्तःकरणसे अभिव्यक्त चैतन्यका युगपत् सम्पूर्ण जगत्से सम्बन्ध नहीं होता, अतः सर्वावभासका प्रसंग ही नहीं है । अतः प्रतिकर्म - व्यवस्थामें कोई अनुपपत्ति नहीं है । ' कहा जाता है कि ' परिच्छिन्न अन्तःकरणका भी सूर्यरश्मिवत् सर्वव्यापी परिणाम होगा । ' परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि पुण्य-पाप, नेत्र -श्रोत्र आदिके रूपसे अन्तःकरणके परिणामकी सामग्री प्रतिविषयमें निश्चित है, अतः परिणाममें भी व्यवस्था ही सिद्ध होगी । जो कोई योगाभ्यासद्वारा अन्तःकरणकी सर्वव्यापी परिणाम-सामग्री सम्पादन कर लेता है, वह सर्वज्ञाता हो ही सकता है । यहाँ भी शंका होती है कि ' क्या चैतन्यके असंग होनेके कारण स्वतः विषयोपराग असम्भव होनेसे विषयोपरागके लिये अन्तःकरण-उपाधि अपेक्षित है अथवा उपराग होनेपर भी विषय -प्रकाश-सिद्धिके लिये अन्तःकरण-उपाधि मान्य है? ' पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि असंगी होनेसे अन्तःकरणोपाधिपर भी चैतन्यका उपराग सम्भव नहीं है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि चित् सम्बन्धसे ही प्रकाश सिद्ध होता है, फिर उपाधि व्यर्थ है । तब तो उपाधि- परित्यागसे सर्वगत चैतन्यसे संयुक्त सर्ववस्तुका प्रकाश होना ही चाहिये । इसी प्रकार यह समाधान भी पर्याप्त नहीं है कि ' प्रतिबिम्बभूत जीव चैतन्य परिच्छिन्न होनेसे सर्वभासक नहीं हो सकता । ' बिम्बभूत ईश्वरकी सर्वज्ञता मान्य ही है । यद्यपि जीव-ब्रह्मका अद्वैत वेदान्तमें भेद मान्य नहीं है, तथापि व्यावहारिक अल्पज्ञता- सर्वज्ञता आदिका भेद तो है ही; क्योंकि विषयका अनुभव ब्रह्मचैतन्यरूप है । जीवमें सर्वज्ञताके समान ही अल्पज्ञता भी नहीं बन सकेगी । यदि कहा जाय कि ' जीवोपाधि
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मार्क्स और ज्ञान ८५५ अन्तःकरणका चक्षु आदिद्वारा विषयसम्बन्ध होता है, अतः जीव विषयोंका ज्ञाता हो सकेगा ' सो भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि अन्तःकरणसे सृष्ट होनेसे जीव ज्ञाता हो, तब तो जीवको सदा ही ब्रह्मस्वरूपका भी ज्ञाता होना चाहिये; क्योंकि सर्वगत ब्रह्मका अन्तःकरणके साथ संसर्ग है ही । यदि कहा जाय कि ' अविद्योपाधिक ही जीव सर्वगत है और वह सभी जगत्को प्रकाशित कर सकता है, फिर भी वह अविद्यासे आवृत होनेके कारण स्वयं भी अप्रकाशमान रहता है, अतएव ' अहमज्ञः ' ऐसा अनुभव होता है । अविद्या यद्यपि परिच्छिन्न है, फिर भी वह सर्वगत चैतन्यका तिरोधान करती है । नेत्रके समीपमें धारित अंगुलिमात्रसे महान् आदित्यादिका भी तिरोधान होता ही है । इस दृष्टिसे जहाँ अन्तःकरणका उपराग ( सम्बन्ध ) होता है, वहीं अविद्या- आवरणका अभिभव होता है । वहाँ ही अभिव्यक्त चैतन्यसे किंचित् अंशका ही प्रकाश होता है, ' परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अविद्याकार्यभूत अन्तःकरणसे अविद्याका अभिभव असम्भव है । इसलिये प्रतिकर्म -व्यवस्था नहीं बन सकती । इन सब बातोंका वेदान्तीय समाधान यह है कि जीव चैतन्य असंग होनेसे यद्यपि अन्यसम्बन्धित नहीं होता, तथापि अन्तःकरणसे उसका सम्बन्ध होता है; क्योंकि अन्तःकरणका ऐसा ही स्वभाव है । जैसे सर्वगत भी गोत्वजाति सास्नादि ( गल- कम्बलादि) मती गो- व्यक्तिमें ही सम्बन्धित होती है, अन्यत्र नहीं, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये अथवा जैसे प्रदीप- प्रभा रूप, रस, गन्ध, वायु आदि प्रदेशोंमें व्याप्त होनेपर भी रूपको ही प्रकाशित करती है, अन्यको नहीं, वैसे ही अन्तःकरण-उपाधि चैतन्यसे विषयोपराग - सिद्धिके लिये संगत होगी । उपरागके बिना चित्प्रकाश विषयोंका प्रकाश नहीं कर सकता । जैसे प्रदीप-प्रकाश स्वसंयुक्तका ही द्योतक होता है, वैसे ही चैतन्य भी स्वोपरक्तका ही प्रकाशन कर सकता है । ब्रह्म सर्वप्रपंचका उपादान कारण है, अतः औपाधिक उपरागके बिना ही स्वस्वरूपके समान ही स्वाभिन्न सर्वजगत्का प्रकाशन करता है । जीव ऐसा नहीं कर सकता; क्योंकि वह प्रपंचका उपादान नहीं है । कहा जा सकता है कि ' जब जीव स्वतः अवभासक नहीं है, तब
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८५६ मार्क्सवाद और रामराज्य घटादिके समान ही अन्य सम्बन्धसे भी प्रकाशक नहीं हो सकता, ' परंतु यह ठीक नहीं । केवल लौह तृणादिका दाहक न होनेपर भी लौहपिण्डपर व्यक्त अग्नि जैसे तृणादिका दाहक होता है, वैसे ही असंग-साक्षी चैतन्य विषयोंका प्रकाशक न होनेपर भी अन्तःकरणवशात् निरावरण होकर विषयोंका प्रकाशक होगा । जिस पक्षमें अन्तःकरणस्थ चित्प्रतिबिम्ब ही जीव है, तब तो परिच्छिन्न होनेसे सुतरां प्रतिकर्म -व्यवस्था उपपन्न होगी । भले ही विषयानुभव ब्रह्म- चैतन्य हो, फिर भी जीवोपाधिभूत अन्तःकरणका वृत्तिरूप परिणाम जबतक विषयाकार नहीं होता, तबतक वह अव्यक्त ही रहता है । विषयाकार अन्तःकरण वृत्तिपर अभिव्यक्त चैतन्यको जीव- चैतन्य भी कहनेमें कोई विरोध नहीं है । ब्रह्मके अन्तःकरण-संसृष्ट होनेपर भी ब्रह्माकार अन्तःकरण वृत्ति न होनेसे जीवको सदा ब्रह्म -ज्ञान- प्रसंग नहीं आता । अन्तःकरणस्वरूप मात्र वस्तुका व्यंजक नहीं होता, किंतु तत्तद्वस्त्वाकार- अन्तःकरणके परिणाम ही उन-उन वस्तुओंके व्यंजक होते हैं । अतएव तदाकारवृत्ति न होनेसे ही अन्तःकरणमें ही रहनेवाले धर्मादिकी अभिव्यक्ति नहीं होती । जीव भी जीवाकार अहंवृत्तिरूपसे परिणत अन्तःकरणमें ही अभिव्यक्त होता है, अन्तःकरणमात्रमें नहीं । इसीलिये सुषुप्तिमें अहंवृत्ति न होनेसे जीवकी भी प्रतीति नहीं होती । इस तरह अन्त: करण प्रतिबिम्ब जीवत्व- पक्षमें भी सब व्यवस्था बन जाती है । जिस पक्षमें अविद्योपाधिक सर्वगत जीव है, उस पक्षमें भी आवरणतिरोधायक अन्तःकरणसे सब व्यवस्था बनती है । जैसे, गोमय- कार्य वृश्चिक एवं मृदादिकार्य वृक्ष अपने कारण गोमय तथा मृदादिके तिरोधायक होते हैं, वैसे ही अविद्याकार्य अन्तःकरण भी अविद्याका तिरोधायक बन जाता है । वृश्चिक- शरीरमें गोमयके और वृक्ष- शरीरमें मृदादिके किंचित् भी अंशकी प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । इस तरह वेदान्तमतमें प्रमात्रादि व्यवहार ठीक सम्पन्न हो जाते हैं । चिदुपरागके लिये अथवा विषय- चैतन्याभेदकी अभिव्यक्तिके लिये या आवरणाभिभवके लिये वृत्तिका उपयोग हो सकता है । वृत्तिके द्वारा चैतन्य तथा विषयका विषय- विषयिभाव सम्बन्ध होता है । कुछ लोग विषयसंयुक्त वृत्तिके
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मार्क्स और ज्ञान ८५७ तादात्म्यसम्बन्धसे चैतन्यद्वारा विषयका प्रकाश मानते हैं । अन्य लोगोंका मत है कि अपरोक्ष जीव - चैतन्यके साथ साक्षात् सम्बन्धसे ही सुखादिका साक्षात्कार होता है, अतः परम्परासम्बन्ध ग्रहण न करके साक्षात् सम्बन्ध ही ग्रहण करना चाहिये । इसलिये जैसे तरंग और तरुके संस्पर्शसे तरुमें नदी -स्पर्श माना जाता है, वैसे ही विषयवृत्ति- संसर्गसे जीव- विषय- संसर्ग भी मान्य है । जैसे कारणाकारण - संयोगसे कार्याकार्य संयोग होता है, वैसे ही कार्याकार्य - संयोगसे कारणाकारण- संयोग भी होता है; अर्थात् नैयायिक लोग जैसे हस्त एवं वृक्षके संयोगसे देह- वृक्षका संयोग मानते हैं, हस्त अवयव होनेसे शरीरका कारण है, वृक्ष शरीरका अकारण है । कारण ( हस्त ) तथा अकारण ( वृक्ष ) -के संयोगसे कार्य ( शरीर ) तथा अकार्य ( वृक्ष ) -का सम्बन्ध मान्य है, वैसे ही वृत्ति जीव - चैतन्यका कार्य है और विषय अकार्य है, अत: कार्य ( वृत्ति) तथा अकार्य ( विषय ) संयोगसे कारण ( जीव - चैतन्य ) और अकारण ( विषय ) -का भी सम्बन्ध बन जायगा । इस तरह वृत्तिद्वारा जीव-चैतन्यका विषयके साथ साक्षात् सम्बन्ध बन जाता है । कुछ लोगोंका यह भी मत है कि ' अन्तःकरणोपहित विषयावभासक चैतन्यका विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्म -चैतन्यके साथ अभेदाभिव्यक्तिद्वारा विषयतादात्म्यसम्पादन ही चिदुपराग है । ' इस पक्षमें विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध ही मुख्य कारण है । वृत्तिद्वारा अभेद व्यक्त होनेपर विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचैतन्य एक ही हो जाता है, अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें अध्यस्त विषय - विषयावच्छिन्न चैतन्याभिन्न अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यरूप जीवचैतन्यमें भी अध्यस्त समझा जा सकता है । अभेदाभिव्यक्ति क्या है, इसपर कुछ लोगोंका कहना है कि ' जैसे कुल्याद्वारा तड़ाग एवं केदारसलिलकी एकता होती है, वैसे ही वृत्तिद्वारा विषय एवं अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी एकता होती है । यद्यपि विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्म-चैतन्य ही है और वही विषय-प्रकाशक है, तथापि वृत्तिद्वारा जीव- चैतन्यके साथ अभेद होनेसे उसमें जीवत्व सम्पन्न हो जाता है, इसलिये जीव विषयका प्रकाशक बन सकता
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८५८ मार्क्सवाद और रामराज्य है । ' दूसरे लोग कहते हैं कि ' बिम्बस्थानीय विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्मके साथ प्रतिबिम्बभूत जीवकी ( अभेदाभिव्यक्ति) नहीं होती । व्यावर्त्तक उपाधि दर्पणके समान जबतक बनी है, तबतक उपहितोंकी एकता नहीं हो सकती । जबतक दर्पण है, तबतक बिम्ब -प्रति-बिम्बभाव रहेगा ही । इसी तरह अन्तःकरणादि उपाधि जबतक है, तबतक जीव- ईश्वरभाव रहेगा ही । फिर ब्रह्म-चैतन्यका जीवचैतन्य बनना असम्भव ही रहेगा । यदि वृत्तिकृत अभेदकी अभिव्यक्तिसे विषयावच्छिन्न ब्रह्म जीव हो जायगा, तब तो ब्रह्मका विषय- संसर्ग न रहनेसे ब्रह्म उस विषयका ज्ञाता न रहेगा । फिर उसकी सर्वज्ञता बाधित होगी । अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य विषयसंसृष्ट वृत्तिके अग्रभागमें विषयप्रकाशक प्रतिबिम्बका समर्पण करता है । उसी प्रतिबिम्बका जीवके साथ एकीभाव होता है । इसी तरह अन्तःकरण, वृत्ति तथा विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्योंमें क्रमेण प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय- व्यवहार असंकररूपसे सम्पन्न होगा । ' कहा जा सकता है कि ' वृत्तिसे उपहित चैतन्य विषय-प्रमा होगी, उसका विषयाधिष्ठान चैतन्यके समान विषयके साथ आध्यासिक सम्बन्ध नहीं होगा । फिर विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध प्रयोजक है, यह सिद्धान्त असंगत हो जायगा, ' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विषयसे अवच्छिन्न विषयाधिष्ठान चैतन्य ही वृत्तिमें प्रतिबिम्बित है । इस दृष्टिसे अभेद उपपन्न होता है । कुछ लोग विषयाधिष्ठान - चैतन्यसे ही विषयका साक्षात् आध्यासिक सम्बन्ध होनेसे बिम्बभूत ब्रह्मचैतन्यको ही विषयप्रकाशक मानते हैं; किंतु बिम्बत्वादि विशिष्टरूपसे उसका भेद होनेपर भी बिम्बत्वोपलक्षितरूपसे एकीभाव ही अभेदाभिव्यक्ति है । बिम्बादिरूपमें भेद बना ही रहता है । अतः जीवब्रह्मके सांकर्यमें एवं ब्रह्मकी सर्वज्ञतामें विरोध आदि नहीं । इसी तरह ' वृत्तिसे आवरणका अभिभव होता है ', इस पक्षमें भी विचारणीय है कि आवरणाभिभव क्या है? यदि अज्ञाननाश ही आवरणाभिभव माना जाय तब तो घटज्ञानसे अज्ञानका नाश होगा और अज्ञानमूलक प्रपंचकी ही निवृत्ति हो जायगी । कुछ लोगोंके मतमें चैतन्यमात्रके आवरक अज्ञानका विषयावच्छिन्न-