मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 871–880
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880
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मार्क्स और ज्ञान ८६९ नहीं होता । सदृशभागमात्रका सम्प्रयोग होनेसे विशेष दर्शन-सामग्री न होनेके कारण अध्यास होता है । कहा जा सकता है कि ' उस समय भी शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्री तो है ही, फिर अध्यास क्यों नहीं होता? ' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अध्यास-समयमें भी शुक्तित्व- दर्शनाभावसे तत्सामग्रयभाव आपको भी मानना ही पड़ेगा । यदि सादृश्य-ज्ञानरूप अध्यास कारणदोषसे प्रतिबन्धके कारण शुक्तित्व - दर्शन- सामग्र्यभाव मान्य है, तब तो घट्टकुटीप्रभातन्यायसे सादृश्य -ज्ञानको अध्यासका कारण मानना ही पड़ा । इसपर दूसरे पक्षका कहना है कि रजताध्याससे समीप आनेपर शुक्तिमें रजतसादृश्यरूप चाकचिक्यके दृश्यमान रहनेपर ही शुक्तित्वका उपलम्भ होता है । इससे सादृश्य-ज्ञान शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक सिद्ध नहीं हुआ । अतः दूरत्वादि दोषोंसे प्रतिबद्ध होनेसे अथवा शुक्तित्व- व्यंजक नीलपृष्ठत्वादिग्राहक मानाभावसे विशेष दर्शन -सामग्रीका अभाव मानना पड़ेगा । इसी तरह दूरस्थ समुद्र-जलमें नीलशिलात्वका आरोप हो सकता है; क्योंकि वहाँपर नियत नीलरूपाध्यासके प्रयोजक दोषसे दूरत्वके कारण नीरत्व- व्यंजक तरंगादिग्राहक साधनके सन्निहित न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है । विस्तृत वस्त्रमें परिणाहादिरूप विशेष-दर्शनकी सामग्री होनेसे कमलत्वादिका अध्यास नहीं होता है । कर्त्तनादिद्वारा कमलाकारसम्पन्न पटमें विशेष दर्शन-सामग्री न होनेसे कमलत्वादि अध्यास हो जाता है । एक शंका यह भी होती है कि ' अध्यासमें यदि सादृश्य -ज्ञानकी अपेक्षा न हो तो करस्पृष्ट लौहखण्डमें उसके नीलरूपकी ग्राहक विशेष दर्शन -सामग्री न होनेसे रजताध्यास क्यों नहीं होता?" परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसे स्थलोंमें रजताध्यास होता ही है । हाँ, ताम्रादिव्यावर्त्तक विशेष सामग्री न होनेसे ताम्रादि अध्यास भी होता है, कहीं अनेक अध्यास होनेसे अध्यस्तमें संशय भी होता है । ' ताम्र है या रजत है ' इत्यादि कहीं रजतप्राय वस्तुपूर्ण कोषगृहादि लौहशकलमें रजतहीका अध्यास होता है ।
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८७० मार्क्सवाद और रामराज्य कहीं सादृश्य -ज्ञान रहनेपर भी करणदोष न रहनेसे शुक्तिमें रजताध्यास नहीं होता । वैसे ही कभी अध्यास न भी हो तो भी कोई दोष नहीं । अतः कार्यकल्प्य इदमाकारवृत्ति आवश्यक नहीं है । फिर ' इदमाकारवृत्ति आवरणभंग करती है या नहीं ' इत्यादि विचार व्यर्थ है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि ' अप्रतिबद्ध इदमर्थ- सम्प्रयोगरूप कारणसे भी इदमाकारवृत्तिकी कल्पना होगी ' क्योंकि इदमर्थ- सम्प्रयोगरूप कारणसे उत्पन्न होती हुई इदंवृत्तिका दुष्टेन्द्रिय- सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याके परिणामभूत इदंवृत्तिके समकाल उत्पन्न रजत ही विषय होता है । वहीं प्रातिभासिक रजत दोषयुक्त चक्षुसे गृहीत होता है । कहा जा सकता है कि चक्षुसे रजतका सम्प्रयोग हुए बिना रजत चाक्षुष नहीं हो सकता । दुष्टेन्द्रिय- सम्प्रयोगजन्य रजत इदंवृत्तिके समकाल नहीं हो सकता; क्योंकि ज्ञान-कारण इन्द्रिय- सम्प्रयोगसे ज्ञान ही उत्पन्न हो सकता है । रजत तो अर्थ है, उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? अतः इदंवृत्तिके अनन्तर तज्जन्य तदभिव्यक्त साक्षीमें ही रजतका अध्यास होता है, इसलिये साक्षीसे ही रजतका भान होता है । रजतमें चाक्षुषत्वका अनुभव इसलिये होता है कि स्वभासक चैतन्यव्यंजक इदंवृत्तिका चक्षु जनक है, अतः परम्परासे चक्षुर्जन्य होनेके कारण चाक्षुषत्वका अनुभव होता है । इस पक्षमें अन्य लोग यह दोष देते हैं कि ' इस तरह तो पीत शंखभ्रममें चक्षुकी अपेक्षा न होनी चाहिये; क्योंकि रूपके बिना केवल शंख चक्षुसे ग्राह्य हो नहीं सकता । पीतिमा ग्रहणके लिये भी चक्षु अनावश्यक है; क्योंकि साक्षिभास्यत्वपक्षमें आरोप्य ऐन्द्रियक मान्य नहीं होता । ' यह भी नहीं कहा जा सकता कि ' पीतिमाका स्वरूपाध्यास नहीं होता, अपितु नयनगत पित्तकी पीतिमा ही अनुभूयमान होती है । उसका केवल शंख -संसर्ग ही अध्यस्त होता है, इसलिये उसी पीतिमा अनुभवार्थ चक्षुकी अपेक्षा होती है । ' कारण इस स्थितिमें तो शंख और पीतिमाका संसर्ग प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिये; क्योंकि नयनप्रदेशगत पित्तकी पीतिमाकारवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यके साथ शंख और पीतिमाके संसर्गका सम्बन्ध ही नहीं है, अतः वे साक्षिभास्य नहीं हो सकते । पीतिमासे संसृष्ट
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मार्क्स और ज्ञान ८७१ शंखगोचर एकवृत्ति स्वीकृत नहीं है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि ' नयनप्रदेशस्थित पित्तकी पीतिमाके दोषसे शंखमें संसर्गाध्यास नहीं होता, किंतु नयनरश्मियोंसे निर्गत विषयव्यापी पित्त द्रव्यकी पीतिमाका ही संसर्गाध्यास होता है । जैसे रक्त रंगसे व्याप्त घटमें अनुभूयमान रक्तरूपके संसर्गका भान होता है । अतः पित्त पीतिमाकारवृत्तिसे शंखदेशमें चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे शंखपित्तपीतिमाका अपरोक्ष अनुभव हो सकता है, परंतु उक्त कथन इसलिये ठीक नहीं है कि फिर तो जैसे सुवर्णलिप्त घटादिमें अन्य लोगोंको भी पीतिमाका अनुभव होता है, वैसे ही शंखमें लिप्त पित्तकी पीतिमाका अनुभव अन्य लोगोंको भी होना चाहिये । ' कुछ लोग कहते हैं कि ' समीपमें गृहीत होकर ही पीतिमा दूरगृहीत होती है । जैसे दूर आकाशमें उड़ते हुए पक्षीका तभी दर्शन होता है, जब उसका समीपमें दर्शन हुआ हो, परंतु अन्य नयनगत पित्तद्रव्यकी पीतिमा अन्यको समीपसे गृहीत नहीं होती, अतः उसे शंखव्यापी पित्तकी पीतिमा भी गृहीत नहीं होती । ' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि पित्तरोगवाले मनुष्यके चक्षुके समीप चक्षु रखनेसे पीतिमा-सामीप्य तो है ही; फिर उसका ग्रहण अन्य लोगोंको होना ही चाहिये । इसी तरह अतिधवल बालुकामय तलमें बहनेवाली स्वच्छ नदीके जलमें नीलत्वके अध्यासमें तथा गगनमें नीलत्वके अध्यासमें एवं चाँदनीमें स्थित रक्त वस्त्रके नैल्याध्यासमें अनुभूयमान आरोपका निरूपण नहीं हो सकता । यदि यहाँ नैल्यसंसृष्ट तादृग् जल या गगनादि-अधिष्ठान- गोचर चाक्षुषवृत्ति स्वीकार नहीं की जायगी, तब तो चक्षुका अनुपयोग दुष्परिहार्य ही होगा । ' पंचपादिका ' कारकी दृष्टिमें जिस बालकने इस जन्ममें तिक्तरसका अनुभव नहीं किया है, उसे मधुर दुग्धमें तिक्तताकी प्रतीति जन्मान्तरीय अनुभवजन्य संस्कारसे होनी मान्य है । इससे स्वरूपतः अध्यस्त तिक्तरसका रसनासे ही अनुभव मानना स्पष्ट है, अन्यथा रसना - व्यापारके बिना भी तिक्तताकी प्रतीति होनी चाहिये । अतः पूर्वोक्त नीलता- अध्यासस्थलोंमें भी अधिष्ठानसम्प्रयोगसे तद्विषयक चाक्षुषवृत्तिका उदय होता है और उसी समय नीलताका अध्यास होता है । वही अध्यस्त नीलता उस वृत्तिका
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८७२ मार्क्सवाद और रामराज्य विषय होती है, अतः वह भी चाक्षुष ही है; क्योंकि रूपके बिना गगनादि अधिष्ठानोंमें चाक्षुषवृत्ति हो नहीं सकती । अतः अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे अध्यस्तनीलता अधिष्ठानचैतन्यसे भास्य नहीं हो सकती । तिक्त-रसस्थलोंमें तो अध्यस्त एवं अधिष्ठान दोनों ही एक रसनेन्द्रियग्राह्य नहीं हैं । ' त्वक् इन्द्रियसे मधुर दुग्धरूप अधिष्ठानगोचरवृत्ति उत्पन्न होती है । उस वृत्तिसे अधिष्ठान -चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे पित्तोपहत रसनाका सम्प्रयोग होता है, उसी चैतन्यमें तिक्तरसका अध्यास होता है । उसी समय अध्यस्त रसविषयक रासनवृत्ति उत्पन्न होती है । त्वगिन्द्रियजन्य अधिष्ठानगोचरवृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें यदि परम्परासे भी रसनाका उपयोग न होगा तो रासनत्वानुभवका समर्थन किसी भी तरह नहीं होगा । इसी तरह रजतके भी चाक्षुषत्वकी उत्पत्ति हो सकती है । अतएव ‘ चक्षुषा रजतं पश्यामि' ( नेत्रसे रजत देखता हूँ) यह अनुभव होता है । कहा जा सकता है कि ' चक्षुसे रजतका सन्निकर्ष हुए बिना ही यदि रजतमें चाक्षुषत्व हो, तब तो प्रत्यक्ष रजतमें विषयेन्द्रिय-सन्निकर्ष कारण है, द्रव्य- प्रत्यक्षमें द्रव्येन्द्रिय- संयोग कारण है । रजत- प्रत्यक्षमें रजतेन्द्रिय- संयोग कारण है, इत्यादि कार्य-कारणभाव भंग होगा, ' परंतु यह कोई दोष न होगा । सन्निकर्ष, संयोगादि कोई एक कारण अनुगत नहीं है, अतः प्रथम नियम नहीं बनता । नैयायिकोंके मतमें संयोगायोग्य तमरूप अद्रव्यमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है और संयोगायोग्य गुणादिमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है, अतः द्वितीय नियमका अभिप्राय यह है कि व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें तो अधिष्ठानगत इदंत्वके समान ही अधिष्ठानगत द्रव्यत्वका भी आरोप ही होता है । इसलिये प्रातिभासिक द्रव्यत्वाधिकरण रजतके इन्द्रियसंयोगके बिना भी प्रत्यक्ष होनेमें कोई हानि नहीं है । अतएव तृतीय नियमका भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाता । जहाँ बीज-सामान्यका अंकुर सामान्यके साथ कार्य- कारणभाव माननेपर बीजान्तरसे अंकुरान्तरकी उत्पत्तिका प्रसंग होता है, वही विशिष्ट कार्य-कारणभाव मानना
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मार्क्स और ज्ञान ८७३ आवश्यक होता है । प्रकृतमें वह सर्वथा व्यर्थ है । कहा जा सकता है कि ' द्रव्यप्रत्यक्षमें द्रव्य - संयोग कारण है, यह सामान्य नियममात्र माननेसे अन्य द्रव्यसंयोगसे अन्य द्रव्य-प्रत्यक्ष होने लगेगा । ' परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि तत्तद्द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्तद्द्द्रव्यसंयोग कारण है, ऐसा माननेपर कोई अतिप्रसंग नहीं होता । अन्यथा अन्य रजतसंयोगसे अन्य रजतका प्रत्यक्ष होनेका अतिप्रसंग भी अनिवार्य ही होगा । इसके अतिरिक्त ' इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि, नीलं गगनं पश्यामि ' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवोंमें ' प्रत्यक्षमात्रमें विषय- सन्निकर्ष कारण है ' इत्यादि नियमोंका व्यावहारिक विषयमें ही संकोच करना चाहिये । कहा जा सकता है कि ' इस तरह तो यही कहना ठीक है कि प्रमामें सन्निकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं, यह भी संकोच कल्पना हो सकती है । फिर तो असन्निकृष्ट देशान्तरस्थ रजतादिका भी भ्रम हो सकता है । इस तरह अन्यथाख्यातिका प्रसंग होगा । ' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध हुए बिना देशान्तरस्थ रजतकी अपरोक्षता नहीं बन सकती । रजतप्रतीति और बाध, दोनों ही बातोंमें भ्रमविषयक अनिर्वचनीय रजतको स्वीकार किये बिना काम नहीं चल सकता । कहा जा सकता है कि ' अधिष्ठान -सम्प्रयोगमात्रसे यदि प्रातिभासिक रजतको ऐन्द्रियक माना जायगा, तब तो शुक्ति- रजताध्यास - समयमें ही वही कालान्तरमें अध्यसनीय रंग ( राँगा )) --का भी चाक्षुषत्व होना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि रजताध्यास - समयमें रंग-रजतसाधारण चाकचिक्य दिखलायी पड़नेपर भी जिस राँगादिरूप दोषके अभावसे वहाँ रंगाध्यास नहीं होता, उसीके कारण रंगादिविषयक वृत्ति भी उत्पन्न नहीं होती । रजतमें राँगादि होता है, इसीलिये रजताध्यास एवं रजताकारवृत्ति उत्पन्न होती है । अतः इदमंशयुक्त रजताकार एक ही वृत्ति इन्द्रियजन्य उत्पन्न होती है । उसके पहले इदमाकारवृत्ति नहीं होती, परंतु अन्य लोगोंका मत है कि ' इदमाकारवृत्ति ' एक ही होती है । वही अध्यासके प्रति कारण है । अध्यस्त रजतादिका
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८७४ मार्क्सवाद और रामराज्य उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षिचैतन्यसे भान होता है । अतः रजताकारवृत्ति निरर्थक है । ' अन्य लोगोंके मतानुसार ' इदमाकार सामान्य ज्ञानरूपिणी एक ही वृत्ति होती है । इदं एवं रजतके तादात्म्यगोचरवृत्ति दूसरी होती है । अतः दो ज्ञान ही मान्य होना ठीक है । ' अन्य लोगोंका मत है कि ' जैसे इदमंशावच्छिन्न चैतन्यस्थ अविद्या रजतज्ञानाभासरूपसे परिणत होती है, इदंवृत्तिके तुल्य रजतज्ञान अनध्यस्त नहीं है, जैसे रजतमें अधिष्ठानगत इदंताके संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतज्ञानमें अधिष्ठानगत इदंत्व-विषयत्व संसर्गका भान हो सकता है । अतः ' इदं रजतम्' यह द्वितीय ज्ञान इदंविषयक नहीं कहा जा सकता । ' कहा जा सकता है कि ' साक्षिचैतन्यसे ही सब पदार्थोंका भान हो सकता है, वृत्तिकी क्या आवश्यकता है? यदि घटादिविषयक संस्कारके लिये वृत्ति आवश्यक भी हो, तो भी उसका निर्गम अनावश्यक है । परोक्षस्थलके समान ही अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही घटादिका प्रकाश हो ही सकता है । फिर भी परोक्ष-अपरोक्षकी विलक्षणता वैसे ही उत्पन्न हो सकेगी, जैसे परोक्षमें भी शाब्द एवं अनुमिति करणविशेषप्रयुक्त - वृत्तिसे विलक्षणता सम्पन्न हो जाती है । ' अन्य लोगोंके अनुसार ' प्रत्यक्ष-स्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयप्रकाश होता है, अतः विषय- चैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-निर्गम आवश्यक है । परोक्ष-स्थलमें व्यवहित वन्ध्यादिके साथ वृत्ति-संसर्ग नहीं होता, वहाँ इन्द्रियोंके समान वृत्ति-निर्गमका द्वार उपलब्ध नहीं होता, अतः अगत्या अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ही स्वरूपसम्बन्धसे विषय-प्रकाश माना जाता है । ' अन्य लोगोंके मतानुसार जैसे साक्षात् चैतन्यसंसर्गी अहंकार तथा सुख-दुःखादिका चैतन्यसे प्रकाश होता है, वैसे ही विषयसंसृष्ट चैतन्य ही अपरोक्षताका हेतु है । अतः विषयचैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-चैतन्य आवश्यक है । अन्य लोगोंका कहना है कि ' शब्दानुमानावगत विषयोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षावगत विषयकी स्पष्टता अनुभूत होती है । रसालके सौगन्ध्य-माधुर्यादिकी हजारों शब्दानुमानोंसे भी उतनी स्पष्टता नहीं होती, जितनी
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मार्क्स और ज्ञान ८७५ रासन, घ्राणजादि प्रत्यक्ष-ज्ञानसे होती है; क्योंकि प्रत्यक्षके बिना रसालका माधुर्य - सौगन्ध्य कैसा है, यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । अतः प्रत्यक्ष ग्राह्य पदार्थ अभिव्यक्त अपरोक्ष-चैतन्यसे अवगुण्ठित होता है, इसलिये उसकी स्पष्टताविषयक जिज्ञासा प्रशान्त हो जाती है । शब्दसे रसालकी मधुरता आदिका ज्ञान होनेपर भी तद्गत माधुर्यादि वृत्ति अवान्तर जातिका बोध नहीं होता । इसीलिये साक्षिवेद्य सुखादि भी स्पष्ट हैं । शब्दवृत्तिवेद्य ब्रह्म भी मननादिके पहले अस्पष्ट होता है । मननादिसे जब पूर्ण अज्ञान मिटता है, तब स्पष्टता होती है । ' इसपर भी कुछ लोग कहते हैं कि ' विषयावच्छिन्न चैतन्यगत आवरक अज्ञान अनिर्गतवृत्तिसे नष्ट हो सकेगा और कहीं अतिप्रसंग भी नहीं होगा । ' कहा जा सकता है कि ' समानविषयक होनेसे देवदत्तके घटज्ञानसे यज्ञदत्तके घटाज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिये । अहमर्थ एवं विषयचैतन्यमें रहनेवाले ज्ञान - अज्ञानका भिन्नाश्रय होनेपर भी विरोध होगा ही; क्योंकि समानाश्रयता विरोधका प्रयोजक नहीं । ' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि समानाश्रयविषयत्वको ज्ञानाज्ञानके विरोधका प्रयोजक मानकर वृत्ति- निर्गम माननेपर भी देवदत्तीय घटज्ञान एवं यज्ञदत्तीय घटाज्ञान दोनों ही एक घटावच्छिन्न चैतन्यको आश्रय करते हैं, अतः अतिप्रसंग होगा ही । इसलिये कहना पड़ेगा कि ' विशिष्ट विरोधप्रयोजक जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवरण करता है, वही अज्ञान तद्विषयक ज्ञानसे निवृत्त होता है । फिर समानाश्रयता अपेक्षित नहीं है । दूसरे लोग उपर्युक्त पक्षको असंगत कहते हैं । उनके अनुसार ' वृत्ति-निर्गम अंगीकार किये बिना ज्ञान एवं अज्ञानके विरोधका कोई भी प्रयोजक निश्चित नहीं हो सकेगा । ' कोई लोग विषयगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिये वृत्तिका निर्गम आवश्यक समझते हैं । कुछ लोग चिदुपरागार्थ अर्थात् चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिये वृत्ति - निर्गम आवश्यक समझते हैं और कई लोग अभेदकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-निर्गम आवश्यक समझते हैं । ' ' तत्त्वशुद्धि' कारका कहना है कि ' प्रत्यक्ष- प्रमाण न तो घटपटादिको ग्रहण ही करता है और न उनका सत्त्व ही ग्रहण करता है । किंतु वह
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८७६ मार्क्सवाद और रामराज्य ( प्रत्यक्ष -प्रमाण ) अधिष्ठानरूपसे घटादि-अनुगत सन्मात्रको ही ग्रहण करता है । ‘ सत् ही प्रत्यक्ष-प्रमाणका विषय है, घटादिका प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे भ्रममें अधिष्ठानका इदमंश ही प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, इन्द्रियोंका अन्वयव्यतिरेक इदमंशके प्रत्यक्षमें ही उपक्षीण हो जाता है, आरोपित रजतांशका प्रतिभास भ्रान्तिसे होता है, वैसे सन्मात्रका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है । उसीमें इन्द्रियका व्यापार सार्थक है । घटादि-भेद प्रतिभास, भ्रान्तिसे ही होता है ।' कहा जा सकता है कि ' रजतादिकी तरह घटादिका बाध नहीं होता, अतः घटादि-प्रतिभासको भ्रान्ति मानना निर्मूल है । ' परंतु यह ठीक नहीं । बाधदृष्टि न होनेपर भी देशकालव्यवहित वस्तुके समान घटादिभेद वस्तु प्रत्यक्षके अयोग्य है, अतः उनका प्रतिभास भ्रान्ति है । इन्द्रिय- व्यापारके अनन्तर प्रतीयमान घट स्वभिन्न समस्त पदार्थोंसे भिन्न ही प्रतीत होता है । घटादि सर्वभिन्नरूपसे असंदिग्ध, अविपर्यस्तरूपसे प्रतीत होते हैं । भेद-ग्रह प्रतियोगिग्रह-सापेक्ष होता है, परंतु देश, काल- व्यवधानसे असन्निकृष्ट प्रतियोगियोंका प्रत्यक्षसे ग्रहण नहीं हो सकता । जो लोग कहते हैं कि ' भेदज्ञान प्रतियोगि-अंशमें संस्कारकी वैसे ही अपेक्षा करता है, जैसे प्रत्यभिज्ञान तत्तांशमें संस्कारकी अपेक्षा करता है । ' परंतु यहाँ तो प्रतियोगि- अंशमें स्मृति भी सम्भव नहीं है । कहा जाता है कि ' वस्तुभेद होनेसे कनकाचल भेदका प्रतियोगी है — इस तरहके अनुमानसे प्रतियोगि- सम्बन्धगोचर संस्कार सम्भव है । ' परंतु यह भी ठीक नहीं है । भेदज्ञानके बिना अनुमति भी नहीं होगी । अनुमिति तभी हो सकती है, जब पक्ष, साध्य, हेतुका भेद ज्ञात हो । पक्षादि- भेदज्ञान तभी हो सकता है, जब अनुमिति हो, इस तरह आत्माश्रय दोष होता है । अतः भेदगत प्रतियोगि- सम्बन्धका भान नहीं हो सकता । पक्षादिके अभेद-भ्रम निराकरणके लिये भेदज्ञान आवश्यक है । सम्बन्धिद्वयका प्रत्यक्ष हुए बिना सम्बन्धका प्रत्यक्ष नहीं होता । प्रतियोगीका प्रत्यक्ष हुए बिना प्रतियोगि विशिष्ट भेदका प्रत्यक्ष नहीं होता । प्रत्यक्षायोग्य प्रतियोगीका प्रतिभान भ्रान्तिरूप ही है । फिर उसी ज्ञानमें भासित भेद एवं भेदविशिष्ट घटादि भी उसी
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मार्क्स और ज्ञान ८७७ भ्रममें भासित होते हैं, अतः निर्विशेष सन्मात्र ही भासित होते हैं । ' अनुभव और आत्मा ' वार्तिकसार ' में संवित्के सम्बन्धमें महत्त्वपूर्ण बातें कही गयी हैं । संवित्का भेद स्वतः नहीं कहा जा सकता । घटसंवित्, पटसंवित् इस रूपसे वेद्यपूर्वक ही संवित्का भेद भासित होता है, अतः संवित्का यह भेद स्वाभाविक नहीं; किंतु घटादि उपाधिके कारण ही प्रतीत होता है । वह सुतरां भ्रम है । इसी प्रकार सम्यक् ज्ञान, संशय एवं मिथ्याज्ञान इत्यादि भेद भी संवित्के स्वाभाविक नहीं हैं; क्योंकि ये भेद बुद्धिगत हैं । चिद्रूप संवित् तो सम्यक्, संशय, मिथ्या आदि सभी ज्ञानोंमें समान है; क्योंकि बाध न होनेसे रज्जु- सर्पका भी स्फुरण मिथ्या नहीं । यदि स्फूर्तिका बाध हो, तब तो रज्जुतत्त्वका भी स्फुरण कैसे हो सकेगा? यदि कहा जाय कि रज्जुस्फूर्ति सर्पस्फूर्तिसे पृथक् है; तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसी स्थितिमें दो स्फूर्तियोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग कैसे होगा? कहा जा सकता है कि स्फूर्तित्व-जातिके अनुगमसे ही दोनोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग हो सकेगा, परंतु वेदान्तमतानुसार व्यक्ति -जातिके स्थानमें व्यावृत्त एवं अनुवृत्त शब्दका प्रयोग होता है । तदनुसार यहाँ चित् अनुवृत्त है, बुद्धि व्यावृत्त है । तथा च सर्पबुद्धि, रज्जुबुद्धियोंकी परस्पर व्यावृत्ति होनेपर भी चित् या स्फूर्ति उभयत्र अनुगत है । उसीको कोई जाति कह लेते हैं । गोत्वादिमें भी यही न्याय लागू हो सकता है । सर्वत्र अनुगत ब्रह्म ही गोत्वादि जाति है । व्यावृत्त व्यक्ति मायिक है । इस तरह सम्यक्, संशय, मिथ्या आदि विभिन्न आकारवाली बुद्धि है । इसी तरह प्रमाता- प्रमाणादिका भी भेद है । जैसे घटादिका भेद है, वैसे ही सम्यक्त्वादि और प्रमात्रादिमें भी भेद है, परंतु यह भेद कल्पित है । इन्हीं कल्पित भेदोंसे संवित्का भेद भी कल्पित होता है । वस्तुतः प्रत्यक्स्वरूप संवित् स्वतः सिद्ध है और एक है । उसीके आधारपर भावाभाव सब व्यवहार चलता है । बोध, अनुभव, संवित् आदि शब्दोंसे वही परब्रह्म आत्मा कहा जाता है । अनुभवरूप संवित्से ही अहंप्रत्ययकी भी सिद्धि होती है । जो लोग अहंप्रत्ययसे आत्मसिद्धि मानते हैं, उनके यहाँ भी अहंप्रत्ययसिद्धिके लिये
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८७८ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुभवरूप आत्माकी अपेक्षा रहेगी ही, इस तरह अन्योन्याश्रय दोष होगा । जो अहंधीको स्वप्रकाश एवं आत्माको जड कहते हैं, उनका केवल भाषाका ही भेद है । स्वप्रकाशसे ही जडकी सिद्धि होती है । इस सम्बन्धमें उनका तथा वेदान्तीका ऐकमत्य ही है । श्रुतिके अनुसार ब्रह्म जड नहीं है; क्योंकि ‘ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' यह श्रुति ब्रह्मको ज्ञानरूप कहती है । यह भी विचारणीय है कि यदि संवित् प्रमेय है, तब तो प्रमेयविषयक प्रमा फलरूप संवित् अन्य होनी चाहिये, परंतु दो संवित्का उपलम्भ नहीं होता । यदि कहा जाय कि यद्यपि अन्य संवित्का उपलम्भ नहीं होता, तथापि व्यवहारलिंगसे उसका अनुमान किया जायगा, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि फलरूप संवित् तो स्वप्रकाश होती है, फिर उसके अनुमानकी बात कैसे चल सकती है? कहा जाता है कि जैसे ' अयं घटः ' इस व्यवसायज्ञानका प्रकाशक ' घटज्ञानवानहं ' यह अनुव्यवसायज्ञान होता है, वैसे ही आत्मामें भी संवित् एवं तद्विषयक संवित् इस तरह दो संवित् मान्य हैं, परंतु यह कहना असंगत है; क्योंकि यह प्रतीतिसे पराहत है अर्थात् दो संवित्की प्रतीति नहीं होती । जैसे घटादिविषयक संवित् होती है, वैसे संविद्विषयक संवित्की नहीं होती । कुछ लोग कहते हैं कि ' आत्मा द्रव्य एक बोधस्वरूप है, अतः आत्मा द्रव्यरूपसे प्रमेय है और बोधरूपसे प्रमाता । इस तरह एकहीमें ग्राह्यता-ग्राहकता दोनों ही बन सकती है, ' परंतु इस मतमें भी आत्मा अहंधीगम्य नहीं हो सकता । यदि द्रव्यांश अहंबुद्धि है, तो अन्योन्याश्रय दोष होगा; क्योंकि जैसे भासमान ही दीप घटादिका प्रकाशक होता है, वैसे ही भासमान ही बुद्धि किसीका साधक हो सकती है । अतः उसके प्रकाशके लिये बोध आवश्यक होगा । तदर्थ आत्माके ज्ञाततारूप लिंगसे अहंबुद्धिका अनुमान करना पड़ेगा । लिंगज्ञानमें ज्ञातताविशिष्ट आत्माका भी ज्ञान हो जायगा । तथा च आत्माके ज्ञानमें अहंबुद्धि होगी एवं अहंबुद्धिसे आत्माका ज्ञान होगा । यदि अहंबुद्धि बोधांश ही है, तो अन्तःकरणरूप उपाधिसे बोध ही अहंबुद्धि भी है और उसीसे सर्वव्यवहार उपपन्न हो सकता है, फिर द्रव्यांशका अंगीकार करना व्यर्थ