मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 881–890

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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मार्क्स और ज्ञान ८७९ है । फिर भी कहा जाता है कि ' यदि बोध स्वप्रकाश ही है, तो वेदान्तोंका क्या प्रयोजन रहेगा? ' परंतु इसका समाधान यही है कि उसी बोधका अनुवाद करके उसे ब्रह्मरूप समझाना ही वेदान्तोंका प्रयोजन है । उस अखण्ड स्वप्रकाश बोधसे प्रत्यक्षानुमानागमादि प्रमाण एवं जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, समाधि, मूर्च्छा--अवस्था स्वतः सत्तास्फूर्तिरहित होनेपर भी प्रकाशित होते हैं । इसी तरह निखिल प्रपंच जिस बोधके प्रसादसे सत्ता-स्फूर्तिवाला होकर भासमान होता है, जो स्वयं स्वमहिमस्थ एवं स्वप्रकाशबोध है, वही ब्रह्मात्मा है । जो स्वयं अन्यार्थ नहीं है और सब कुछ जिसके लिये है, वही निरतिशय पर-प्रेमका आस्पद आत्मा एवं आनन्दस्वरूप बोध ही सब कुछ है; अर्थात् सब कुछ उसीमें अध्यस्त है । भावाभावात्मक सभी पदार्थ जिसका आश्रय करते हैं, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि परस्पर विलक्षण अविद्याकार्यस्वरूप जगत् जिसमें प्रतिभासित होता है, वही सर्वविकारशून्य, सर्वसाक्षी अखण्ड बोध ब्रह्म है । कहा जा सकता है ' निद्रामें किसी नित्य अनुभवका पता नहीं लगता, फिर उसे अवस्थात्रय - साक्षी कैसे कहा जा सकता है? ' परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि निद्राकालमें भी सुख, निद्रा, विशेषज्ञानाभाव, सुखादिके भासक असंकुचित बोधका अस्तित्व है ही; अतएव श्रुति कहती है ‘ न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ' ( बृह० ४।३।२३ ) । अर्थात् द्रष्टाकी स्वरूपभूता नित्य- दृष्टि कभी भी लुप्त नहीं होती । फिर भी जागरस्वप्नमें प्रकाश्य स्फुट होनेसे प्रकाशकत्व स्फुट है, सुप्तिमें स्थूल दृश्य न होनेसे औपाधिक साक्षिता स्फुट नहीं होती । वस्तुतः साक्ष्यके सम्बन्धसे ही आत्मामें साक्षिताका भी व्यवहार होता है । प्रत्यग्बोधस्वरूप आत्मा तो मन, बुद्धि एवं वाक्का भासक होनेसे उनका भी अगोचर ही है । उसीमें कर्तृत्वादि अविद्याकल्पित है । अविद्या भी बोधसे ही प्रकाशित होती है । अविद्या अनादि होनेपर भी ब्रह्माकारवृत्तिसे बाधित हो जाती है । जैसे सौरालोकप्रकाशित तूलराशि सूर्यकान्तपर अग्निरूपसे व्यक्त उसी सौरालोकसे दग्ध हो जाती है, वैसे ही अविद्याभासक भान ही ब्रह्माकार-वृत्तिपर प्रकट होकर अविद्याका दाहक हो जाता है । भले वह बोध देह,

पृष्ठ 882

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८८० मार्क्सवाद और रामराज्य बुद्धि, मस्तिष्क आदिमें ही प्रतीत हो, फिर भी वह स्वतन्त्र है, देहादिका धर्म नहीं है । भले गृह, क्षेत्र आदिमें दिव्य रत्नादि मिलें, फिर भी वे गृह- क्षेत्रादिके धर्म नहीं हैं । भले ही काष्ठादिमें अग्नि उपलब्ध हो फिर भी अग्नि स्वतन्त्र है, काष्ठादिका धर्म नहीं है, वैसे ही बोध स्वतन्त्र, नित्य एवं ब्रह्मात्मस्वरूप है, वह देहादिका धर्म नहीं है । अनुभव - विमर्श अनुभव यदि दूसरे अनुभवसे अनुभाव्य होगा तो अनवस्थादोष होगा; क्योंकि वह जिस अनुभवसे अनुभाव्य होगा, उसे भी किसी अन्य अनुभवसे अनुभाव्य होना पड़ेगा । यदि प्रथमानुभवसे द्वितीयका एवं द्वितीयसे प्रथमका अनुभव माना जाय तो अन्योन्याश्रयदोष होगा । प्रथमका द्वितीयसे, द्वितीयका तृतीयसे अनुभव मानें तो अनवस्था और यदि प्रथमानुभवका अपनेसे ही अनुभव माना जाय तो आत्माश्रय- दोष होगा एवं वही कर्म और वही कर्त्ता होनेसे कर्म- कर्तृविरोध भी होगा । अतएव अनुभवत्व एवं अनुभाव्यत्व दोनोंका सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता । लोग कहते हैं कि ' यदि अननुभाव्यत्वके कारण अनुभवका अनुभवत्व सिद्ध किया जायगा, तब तो खपुष्प भी अननुभाव्य है, अतः उसमें भी अनुभवत्व ठहरेगा । ' परंतु ऐसा कहना ठीक नहीं । जैसे गोमें गोत्व, घटमें घटत्व होता है, वैसे ही अनुभवमें अनुभवत्व सिद्ध ही है । फिर उसे अननुभाव्यत्वरूप साधनसे सिद्ध क्या करना है? फिर भी यदि अननुभाव्यत्वरूपसे अनुभवत्व सिद्ध भी करना पड़े तो ' सत्त्वे सत्यननुभाव्यत्व ' अर्थात् सत्त्वविशिष्ट अननुभाव्यत्व भी अनुभवत्वका साधक हेतु माना जाता है । तथा च खपुष्पमें भले ही अननुभाव्यत्व रहे, परंतु विशेषणभूत सत्त्व न होनेसे उसमें अनुभवत्व नहीं जायगा । अज्ञात घटमें भी अनुभवयोग्यता है ही । अनुभवितुं योग्य ही अनुभाव्य होता है, अतः उसमें भी अतिव्याप्ति न होगी । कुछ लोग कहते हैं कि ' जो वर्तमान दशामें स्वाश्रयके प्रति स्वसत्तासे ही स्वविषयका साधन है, वही अनुभूति है । ' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि विषय साधनत्व विषय-प्रकाशकत्व ही है । उसका

पृष्ठ 883

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मार्क्स और ज्ञान ८८१ भी अर्थ होगा विषय -प्रकाशजनकत्व | विषय -प्रकाश विषयानुभवरूप ही होगा । तथा च निष्कर्ष यह निकलेगा कि अनुभव अनुभवका जनक है । यदि इन दोनों अनुभवोंकी एकता मान्य है, तब तो आत्माश्रय -दोष होगा । जैसे स्वयं देवदत्त अपनेसे उत्पन्न नहीं हो सकता, वैसे अनुभव भी अपनेसे ही उत्पन्न नहीं हो सकता । यदि दोनोंको भेद माना जाय तो द्वितीय अनुभवको प्रथमानुभवसे जन्य कहना पड़ेगा, परंतु प्रथमानुभव किससे उत्पन्न होगा? यदि उसे विषयेन्द्रिय सन्निकर्षसे जन्य मानें, तब तो द्वितीय अनुभवको भी उस सन्निकर्षसे जन्य मानना चाहिये । फिर उसे प्रथमानुभवसे जन्य क्यों माना जाय? अतः ' अनुभव स्वविषय अनुभवका जनक है ' यह कल्पना व्यर्थ ही है । ' अनुभव स्वाश्रयके प्रति स्वविषयका प्रकाशक है ' इस तरह ' स्वाश्रयके प्रति ' यह अंश भी व्यर्थ ही है; क्योंकि अनुभव किसीके आश्रित नहीं रहता । जो कहते हैं कि ' अनुभव आत्मा आश्रित रहता है ', वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव स्वयं ही तो आत्मा है । कुछ लोग कहते हैं कि ' अनुभविता ही आत्मा है, अनुभव नहीं ', पर यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव ही अनुभविता भी है । जैसे प्रकाशस्वरूप सविता ही प्रकाशक भी कहा जा सकता है, वैसे ही अनुभवस्वरूप आत्मा ही अनुभविता भी कहा जा सकता है । कहा जाता है कि ‘ संकोचविकासशाली धर्मभूत नित्यद्रव्य आत्मस्वरूपसे भिन्न ही ज्ञान है, ' परंतु संकोचविकास सावयव पदार्थका ही धर्म होता है । जो विकारी है, वह नित्यद्रव्य नहीं हो सकता । फिर इस पक्षमें यदि धर्मभूत ज्ञानद्रव्य स्वसत्तासे ही स्वविषयका प्रकाशक होता है, तो इसी तरह ज्ञानस्वरूप आत्मा भी स्वसत्तासे विषयप्रकाशक हो ही सकता है । वस्तुतस्तु शुद्ध बोध ब्रह्मस्वरूप ही है, अतएव वह निर्धर्मकही है । अतएव उसमें अनुभवत्व, बोधत्वादि धर्मकी कल्पना व्यर्थ है । ' अनुभवका लक्षण क्या है? ' इस प्रश्नका उत्तर यही है कि अनुभवका स्वरूप लक्षण अनुभव ही है । यदि अनुभवका भी अन्य स्वरूप हो, तब तो उस स्वरूपका भी कोई अन्य स्वरूप होगा एवं उस स्वरूपका भी अन्य

पृष्ठ 884

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८८२ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वरूप होगा, फिर अनवस्थाप्रसंग अनिवार्य होगा । तटस्थ लक्षण अनुभवका वही है, जो ब्रह्मका है–' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्ब्रह्म ' (तैत्ति० उप० ३।१ ) अर्थात् जिससे समस्त भूत उत्पन्न होते हैं, जिसमें जीवित रहते हैं और जिसमें विलीन होते हैं, वही ब्रह्म है । कहा जाता है कि ' अनुभव यदि परप्रकाश्य होगा, तो अनवस्थादि दोष होंगे, अतः उसे स्वयंप्रकाश कहना पड़ेगा । इस तरह स्वयंप्रकाशत्व धर्म उसमें रह सकता है, फिर उसे निर्धर्मक कैसे कहा जा सकता है? ' पर यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यद्यपि ब्रह्ममें व्यावहारिक सधर्मकत्व है तथा पारमार्थिक धर्म उसमें कोई नहीं है; क्योंकि वह सजातीय- विजातीय-स्वगत सर्वविध भेदशून्य है । कहा जाता है कि ‘ अनन्यावभास्यत्वविशिष्ट स्वेतरसर्वावभासकत्व ही स्वयंप्रकाशत्व है । अनुभवके सर्वावभासक होनेका अर्थ है सर्वावभास या सर्वानुभवजनक होना, ' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है । वस्तुतः निर्विकल्पक ज्ञान चैतन्य शब्दसे कहा जाता है और सविकल्पक ज्ञान वृत्तिशब्दवाच्य है । इस दृष्टिसे सविकल्पक ज्ञानकी उत्पत्ति निर्विकल्पक ज्ञानसे हो सकती है । यहाँ भी प्रश्न होता है कि ' वृत्तिज्ञान क्या है? वृत्ति चैतन्य या अन्य कुछ? ' पहला पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वृत्ति स्वयं जड है, वह विषयावभासक नहीं हो सकती । ज्ञान भासक होता है । भान ही ज्ञान है । जडवृत्ति तो स्वकालमें भी भानरूप नहीं बन सकती । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि चैतन्यको तो वृत्तिज्ञानका जनक ऊपर कहा गया है । फिर वही जन्य कैसे होगा? तीसरा पक्ष भी संगत नहीं है । वृत्ति एवं चैतन्यसे भिन्न ज्ञानरूप कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं है । उपर्युक्त प्रश्नका समाधान यह है कि वृत्तिप्रतिफलित चैतन्य ही वृत्तिज्ञान है । वही चैतन्य विषयचैतन्यसे अभिन्न होकर प्रत्यक्ष होता है । इसीलिये केवल चैतन्य एवं केवल वृत्तिसे वह वृत्तिज्ञान अन्य ही है । एक ही ज्ञानमें उपाधिभेदसे जन्यजनकभाव हो सकता है अथवा अनुभव ' स्वेतर सर्वावभासक है ' इसका अर्थ यह है कि स्वेतर सभी विषयोंमें ' भाति ' ( प्रतीत होता है ) इत्याकारक

पृष्ठ 885

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मार्क्स और ज्ञान ८८३ प्रतीतिविषयताका जनक है । ' भाति' इस प्रतीतिकी विषयता ही सर्वावभास्यता है । चिदाभासरूप फलकी व्याप्ति हुए बिना कोई भी जड वस्तु ' भाति ' इस प्रतीतिका विषय नहीं हो सकती । एतावता स्वतः सर्वदा सर्वका अवभासन करता हुआ भी वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यके द्वारा सभी वस्तुओंमें ' भाति ' ( भासमान है ) इस प्रतीतिकी विषयता होती है । कहा जा सकता है कि ' भाति यह प्रतीति ही तो अनुभव है, इससे अतिरिक्त अनुभव कुछ नहीं है, ' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि प्रतीतिसे अतिरिक्त अनुभव है । चक्षुसे घटका साक्षात्कार करके पुरुष निश्चय करता है कि घट है और भासमान है । इस तरह घटसाक्षात्काररूप अनुभवसे भिन्न ही अनुभवजन्य प्रतीति होती है । फिर भी ' भाति ' इस प्रतीतिसे भिन्न अनुभव क्या है? इस प्रश्नका उत्तर वस्तुतः दुर्वच ही है । यद्यपि कहा जाता है कि ' निर्विकल्पक अनुभव ही दुर्वच होता है, सविकल्पक अनुभव तो सुवच ही होता है । ' तो भी यह ठीक नहीं; क्योंकि सविकल्पक अनुभवकी भी वही दशा होती है । हाँ, भेद यह है कि निर्विकल्पक अनुभवका विषय दुर्वच है, सविकल्पक अनुभवविषय सुवच होता है । स्वयं अनुभव तो दोनों ही दुर्वच ही होते हैं । विषयभेदके कारण वही अनुभवका सविकल्प- निर्विकल्परूप द्वैविध्य भी होता है । स्वतः तो अनुभव एक ही होता है । वह अनन्यावभास्य होकर स्वेतर सर्वका भासक होता है । यही उसका लक्षण है । यद्यपि यहाँ भी बहुत-से विकल्प उठते हैं, जैसे अनुभवका घटावभासकत्व क्या है? घट इत्याकारक प्रतीतिकी जनकता अथवा घट इस प्रतीतिविषयताकी जनकता अथवा घटाकारानुभवजनकत्व अथवा घटानुभवविषयत्वजनकत्व? अनुभव और प्रतीति यदि एक ही हैं, तो अनुभव अनुभवका जनक कैसे हो सकेगा? क्योंकि अभेदमें कार्यकारणभाव नहीं होता । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि घट तो सर्वदा विषय ही होता है, अतः उसमें विषयता सदा ही रहती है । फिर उसमें कादाचित्क जन्यता और अनुभवमें जनकता कैसे सम्भव होगी? इस तरह अन्य पक्ष भी असंगत ही हैं । इस सम्बन्धमें अध्यात्मवादियोंका समाधान स्पष्ट है । प्रतीति-

पृष्ठ 886

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८८४ मार्क्सवाद और रामराज्य शब्दप्रयोगलक्षण व्यवहार है । अनुभव उससे भिन्न उसका जनक है । इस तरह प्रतीति और अनुभवमें भेद होता है । यद्यपि स्वानुभवसमयमें शब्दप्रयोग नहीं होता, परोपदेशसमयमें ही शब्दप्रयोग होता है, तथापि स्वानुभव- समयमें भी सूक्ष्म मानसिक शब्दप्रयोग होता ही है । इस तरह प्रतीतिजनकता अनुभवमें संगत है ही । इसी तरह अनुभूत घट ही ' घट' इस व्यवहारका विषय होता है । अतः अनुभव ही घटकी व्यवहारविषयताका जनक है । यदि घटका अनुभव न हो तो घटमें व्यवहारविषयता ही नहीं बन सकती । तीसरे पक्षमें भी कोई बाधा नहीं; क्योंकि केवल अनुभव घटानुभवका जनक हो ही सकता है । जैसे केवल प्रकाश घटप्रकाशका जनक कहा जा सकता है, वैसे ही यहाँ भी व्यवहार हो सकता है । निरुपाधिक अनुभव सोपाधिक अनुभवका जनक है । इस तरह घटरूप उपाधिके द्वारा कार्यकारणभाव होता है । अतएव चौथा पक्ष भी ठीक ही है । भले ही घट सर्वदा ही सामान्यानुभवका विषय हो, तथापि विशेषानुभवविषयता सदा नहीं रहती । किंतु चक्षु एवं घटका संयोग होनेसे ही घट विशेषानुभवका विषय होता है । इस तरह घटानुभवविषयत्वजनकता भी अनुभवकी घटावभासकता हो ही सकती है । फिर प्रश्न होता है कि ' वह सामान्यानुभव साक्षिचैतन्यरूप है अथवा साक्ष्याकार- वृत्तिज्ञानरूप? ' कहा जा सकता है कि ' साक्ष्याकार- वृत्ति होनेपर साक्षीका साक्षात्कार समझा जायगा और फिर तो सभीको मुक्त ही होना चाहिये । ' परंतु यह ठीक नहीं है, कारण कि प्रमाणजन्य साक्षात्कारवृत्तिसे साक्षीके आवरक अज्ञानकी निवृत्तिके बिना साक्षात्कार नहीं होता है । इसपर भी विचार चलता है कि ' साक्षीका साक्षात्कार क्या हो सकता है? क्योंकि अनुभवका अनुभव क्या होगा? ' परंतु इसका भी समाधान यही है कि साक्षीसे भिन्न द्वैतका अनुभव न होना ही साक्षीका साक्षात्कार है । कहा जा सकता है कि ' इस तरह तो द्वैतानुभवाभाव ही साक्षीका अनुभव हुआ । ' परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि अनुभव नित्य है । फिर वह अभावका प्रतियोगी कैसे बन सकता है? अतः विशेष अनुभवका अभाव ही सामान्यानुभव है । विशेषानुभव तो चक्षुघट - संयोग

पृष्ठ 887

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मार्क्स और ज्ञान ८८५ आदिसे उत्पन्न होता है, अतः उसका अभाव हो सकता है । विशेषानुभवदशामें भी यद्यपि सामान्यानुभव रहता है, तथापि वह असत्- जैसा ही रहता है, किंतु विशेषानुभवाभावदशामें सामान्यानुभव सत्ताप्रकर्षको प्राप्त हो जाता है । इसीलिये विशेषानुभवाभाव सामान्यानुभवरूप साक्षीका साक्षात्कार है । कहा जाता है कि ‘ विशेषानुभवाभावदशामें अज्ञानका ही अनुभव होता है, साक्षीका नहीं । ' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि साक्षीके आवरक अज्ञानका अनुभव ही साक्षीके अनुभवरूपसे व्यवहृत होता है । अज्ञानावच्छिन्न साक्षीका अनुभव ही सामान्यानुभव है । कहा जाता है कि ' यद्यपि सोपाधिक साक्षीका अनुभव हो सकता है; क्योंकि वह अनुभाव्य होता है, परंतु केवल साक्षीका अनुभव कैसे हो सकेगा? केवल साक्षी ही अनुभव है, यह भी नहीं कहा जा सकता । ' परंतु यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि जबतक अविद्या रहती है, तबतक साक्षी केवल रह ही नहीं सकता । अविद्या उपाधिके द्वारा साक्षीकी सोपाधिकता बनी रहती है । यह भी कहा जाता है कि ' फिर तो समाधिमें भी अज्ञान रहता है, अतः वहाँ भी साक्षीका स्फुरण कैसे होगा? पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि समाधिमें साक्षी केवल ही है, उपाधिशून्य है, तब तो अवश्य समाधिमें साक्षीका अनुभव नहीं हो सकता; क्योंकि साक्षीका अनुभव करनेके लिये वहाँ कोई प्रमाता ही नहीं होता । किंतु उस समय केवल साक्षी ही रहता है । इसीलिये उस समय ' मैं साक्षीको देख रहा हूँ' ऐसी प्रतीति नहीं होती । अतः अज्ञान एवं अज्ञानकार्य जिस किसी विशेषके अनुभवका अभाव ही साक्षीका साक्षात्कार है । कहा जा सकता है ‘ अभाव साक्षात्काररूप कैसे हो सकता है? ' पर यह ठीक नहीं, क्योंकि अभाव स्वयं अधिकरणरूप ही होता है । अतः विशेषानुभवाभावाधिकरण साक्षी ही साक्षीका साक्षात्कार है । ' विशेषका अध्यास सामान्यमें ही होता है । अध्यासाभाव अधिष्ठानसे अनतिरिक्त अधिष्ठानरूप ही होता है । विशेषानुभवाभावरूप साक्षीका 'साक्षात्कारसाक्षीका उपपन्नपरिशेषहोरहनासकतासाक्षीकाहै अथवाअनुभवयह हैभीऔरकहासर्वद्वैतकीजा सकताअप्रतीतिहै कि

पृष्ठ 888

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८८६ मार्क्सवाद और रामराज्य होनेपर ही वह होता है । ' यह भी कहा जा सकता है कि ' साक्षिस्वरूप ही साक्षीका साक्षात्कार है । जैसे राहुका शिर, आत्माका चैतन्य, सूर्यका प्रकाश आदि स्थानोंमें अभेदमें भी भेद- व्यवहार होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये । इस तरह प्रत्यगभिन्न स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही नित्य अनुभव है । ' कुछ लोग कहते हैं कि ' अनुभवका प्रागभाव अनुभवसे ही गृहीत होता है, अतः अनुभवको नित्य नहीं कहा जा सकता । ' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर प्रश्न होगा कि ' जिस किसी वस्तुका जिस किसीसे गृह्यमाण प्रागभाव होता है अथवा अगृह्यमाण भी प्रागभाव होता है? ' दूसरा पक्ष तो सर्वथा असंगत है; क्योंकि इस तरह तो प्रमाणके बिना ही किसी वस्तुका अस्तित्व सिद्ध हो सकेगा । पहला पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि अनुभवका प्रागभाव अपनेसे ही ग्राह्य है या अन्यसे? पहली बात ठीक नहीं; क्योंकि पुत्रका प्रागभाव पितासे गृह्यमाण होता है, स्वयं पुत्र अपना प्रागभाव ग्रहण नहीं कर सकता । इसी तरह अनुभव स्वयं अपना प्रागभाव ग्रहण नहीं कर सकता । यदि अपने प्रागभाव-ग्रहणके समय अनुभव रहता है, तो उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है? यदि स्वयं नहीं है, तो प्रागभावका ग्रहण किस तरह होगा? स्वप्रागभाव अन्यसे गृहीत होना तो ठीक है, परंतु प्रकृतमें तो अनुभवसे भिन्न सब जड ही है । फिर जडसे अनुभव -प्रागभाव किस तरह गृहीत हो सकेगा? ' अनुभवका प्रागभाव आत्मासे गृहीत होगा ' यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आत्मा ही तो अनुभव है । कहा जाता है कि ' अनुभवके प्रागभावको अनुभव ग्रहण नहीं करता, यह आपने कहीं देखा है या नहीं?' पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि उसी आपके दर्शनसे अनुभवका प्रागभाव सिद्ध हो जायगा । अनुभवका अपने प्रागभावको ग्रहण न करना भी अनुभवका प्रागभाव ही है । उसका दर्शन आपको है ही । दूसरा पक्ष भी इसलिये ठीक नहीं है कि यदि आपने यह देखा ही नहीं, तो कैसे कह सकते हैं कि ' अनुभव अपने प्रागभावको ग्रहण नहीं करता?' यदि अदृष्ट भी ग्राह्य हो, तब तो

पृष्ठ 889

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मार्क्स और ज्ञान ८८७ शशशृंग भी ग्राह्य हो सकेगा । परंतु इस कथनमें कुछ सार नहीं है; क्योंकि पुत्रका प्रागभाव पुत्र स्वयं ग्रहण नहीं करता । ' यह मैंने देखा है ' इससे स्वप्रागभाव अपनेसे गृहीत नहीं होता, यह व्याप्तिज्ञान होता है । इसी आधारपर यह कहना संगत है कि ' अनुभव-प्रागभावको अनुभव नहीं ग्रहण कर सकता ।' कहा जाता है कि ‘ भले ही पुत्र-प्रागभावको पुत्र ग्रहण न करे, पर क्या एतावता पुत्र -प्रागभाव सिद्ध नहीं होता? उसी तरह भले ही अनुभव स्वप्रागभाव ग्रहण न करे, तथापि उसके प्रागभावकी असिद्धि नहीं कही जा सकती । ' पर यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि दृष्टान्तमें तो पुत्र- प्रागभावको पिता ग्रहण करता है, अतः वहाँ पुत्र-प्रागभाव सिद्ध होता है, परंतु अनुभवप्रागभावको कोई भी नहीं ग्रहण करता, अतः उसकी सिद्धि नहीं हो सकती । कहा जाता है कि ' पुत्र भी अपने प्रागभावको अनुमानसे जान सकता है, जैसे कि ' उत्पत्तिके पहले मैं नहीं था; क्योंकि उत्पत्तिके पहले घटका असत्त्व देखा जाता है । ' परंतु यह भी कथन संगत नहीं है; क्योंकि स्वप्रागभाव स्वप्रत्यक्षका विषय नहीं होता, यही उपर्युक्त कथनका आशय है । एतावता स्वानुमानकी विषयता स्वप्रागभावमें हो भी तो कोई आपत्ति नहीं । जो लोग कहते हैं कि ' फिर तो इसी तरह अनुभव भी अनुमानके द्वारा स्वप्रागभावको जान सकता है, ' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अनुभव स्वसत्तासे ही स्वविषयका प्रकाश होता है, यही अनुभववादियोंकी धारणा है । फिर अनुभव यदि अनुमानरूप अन्य व्यापारसे स्वविषयको प्रकाशित करेगा तो सिद्धान्त -विरोध होगा । ऐसा होनेमें अनुभवमें स्वयंप्रकाशता भी नहीं सिद्ध होगी । ' कुछ लोग कहते हैं कि ' अनुभव अतीत वस्तुको भी प्रकाशित करता है, इसीलिये योगियोंको अतीत वस्तुका भी प्रत्यक्ष होता है । इसी तरह अतीत प्रागभावको भी अनुभव ग्रहण कर सकता है । ' पर यह ठीक नहीं है; क्योंकि हमारा यह कहना नहीं है कि अनुभवमें वर्तमान वस्तु ही विषय होती है, किंतु योगीको या सर्वज्ञ ईश्वरको त्रैकालिक वस्तुओंका प्रत्यक्ष हो सकता है । अनुभवप्रागभाव अनुभवका विषय नहीं

पृष्ठ 890

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८८८ मार्क्सवाद और रामराज्य होता, यही कहना है । फिर भी शंका होती है कि ' गुरूपदेशके पहले मुझे इस श्लोकार्थका ज्ञान नहीं था, इस प्रकारके अनुभवमें अनुभवका प्रागभाव विषय होता ही है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ

श्लोकार्थज्ञानका प्रागभाव श्लोकार्थज्ञानका विषय नहीं है; किंतु यह

प्रागभाव अन्य ज्ञानका ही विषय है । इस तरह ज्ञानान्तरके द्वारा ही

श्लोकार्थज्ञानका प्रागभाव सिद्ध होता है । एतावता अनुभव-प्रागभाव किसी

भी ज्ञानसे सिद्ध नहीं होता । हाँ, वृत्तिज्ञानका तो प्रागभाव एवं प्रध्वंसाभाव

चैतन्यसे गृहीत होता है । अतः वृत्तिज्ञानका प्रागभावादि हो सकता है, परंतु चैतन्यका प्रागभाव चैतन्यसे व्याघातदोषके कारण गृहीत नहीं होता । यदि कहा जाय कि ' एक चैतन्यका प्रागभाव अन्य चैतन्यसे गृहीत हो', तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अन्य चैतन्य है ही नहीं । चैतन्य चैतन्य सब एक ही हैं, आकाशवत् उसके भेदमें कोई प्रमाण नहीं है । जैसे पुत्र यह समझता है कि मैं उत्पत्तिके पहले नहीं था, वैसे चैतन्य यह अनुभव नहीं करता कि मैं उत्पत्तिके पहले नहीं था । अतः उसकी उत्पत्ति एवं प्रागभाव कथमपि गृहीत नहीं होते । फिर भी कहा जाता है कि ' मैं नहीं था ' इस तरह आत्मा अपने प्रागभावका अनुभव करता है और यदि आत्मा अनुभवरूप ही है, तब तो उसका प्रागभाव सिद्ध हो गया । पर यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि देहतादात्म्य ( अभेद ) -के अध्याससे देह- प्रागभावको ही आत्मप्रागभाव भ्रान्तिवश समझ लिया जाता है । वस्तुतः आत्मप्रागभाव अनुभूत नहीं होता । कहा जाता है कि ' मैं सर्वदा रहा हूँ ' इस प्रकार भी अनुभव नहीं जानता । परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभवस्वरूप विद्वान् आत्मा अवश्य अनुभव करता है कि मैं सर्वदा रहा हूँ । फिर भी कहा जाता है कि ' सृष्टिके पहले जीव आदि नहीं थे, केवल ईश्वर था । ' भागवत ' का कहना है-' अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्' ( २।९ ।३२ ) अर्थात् सृष्टिके पहले मैं ही था, अन्य सत्, असत् कुछ भी न था । पर यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि सिद्धान्तमें जीव-ईश्वरकी एकता ही है, अतः ईश्वरकी नित्यतासे तदभिन्न जीवकी भी नित्यता सिद्ध हो जाती है । इसीलिये ' अजो नित्यः शाश्वतोऽयम्'