मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 891–900
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
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मार्क्स और ज्ञान ८८९ ( कठोप० १ । २ । १८ ) इत्यादि श्रुतियोंसे जीवात्माकी नित्यताका प्रतिपादन होता है । इस तरह अनुभव ही प्रत्यक् ब्रह्म है, उसका प्रागभावादि सिद्ध नहीं होता । यह स्वयंप्रकाशत्व, नित्यत्वादि अजन्य नित्यज्ञानका ही है । वृत्तिरूप इन्द्रिय- सन्निकर्षादिजन्य ज्ञानके सम्बन्धमें यह बात नहीं है । ' कुछ लोग कहते हैं कि ' जैसे पृथ्वी नित्य है, फिर उसके अवस्थाविशेष घटादि अनित्य हैं, वैसे ही ज्ञानद्रव्यके नित्य होनेपर भी उसके अवस्थाविशेष स्मृतित्वादि अनित्य होंगे । ' पर यह कहना भी ठीक नहीं, कारण नित्य वस्तुमें अवस्था नहीं होती । सिद्धान्ततः पृथ्वी आदि भी अनित्य ही हैं । अनित्य क्षीरादि द्रव्यकी ही क्षीरत्व, दधित्वादि अवस्थाएँ होती हैं, नित्य ज्ञानकी कोई अवस्था वास्तविक नहीं होती । अवस्था स्वयं विकार है । विकारी वस्तु अनित्य ही होती है । कहा जाता है कि ' जैसे वेदान्ती घटावच्छिन्न चैतन्यको अनित्य मानता है, फिर भी उसे शुद्ध चैतन्य नित्य मान्य है । ' पर यह ठीक नहीं है; क्योंकि वहाँ भी चैतन्य नित्य ही है, किंतु घटकी अनित्यतासे तदवच्छिन्न चैतन्यमें अनित्यताका व्यवहार होता है । यदि उसी तरह ज्ञानकी नित्यता एवं स्मृति, प्रमा आदिकी अनित्यता जडवादीको भी मान्य हो, तब तो ठीक ही है । कुछ लोग कहते हैं कि ' स्वयंप्रकाशत्व, नित्यत्वका सामानाधिकरण्य नहीं होता । स्वयंप्रकाश भी दीपादि अनित्य होता है । आकाश, कालादि स्वयंप्रकाश न होनेपर भी नित्य होते हैं, ' परंतु यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि जो स्वयंप्रकाश नहीं, वह स्वत:सिद्ध भी नहीं होता । जो स्वत: सिद्ध नहीं है, वह नित्य भी नहीं होता । काल, आकाश आदि भी अनित्य ही हैं । दीपादिकी स्वयंप्रकाशता सापेक्ष ही है । अतएव उसे भी अपने प्रकाशके लिये दीपान्तरकी अपेक्षा न होते हुए भी चक्षु, मन एवं चैतन्यकी अपेक्षा है ही । जो लोग योग्यानुपलब्धिके बलपर ज्ञानप्रागभाव सिद्ध करना चाहते हैं, वे भी भ्रान्त ही हैं; क्योंकि अनुपलब्धि-उपलब्धिका अभाव ही है । उपलब्धि अनुभव ही है । तथा च निष्कर्ष यह निकला कि अनुभवाभावसे ही अनुभवका प्रागभाव सिद्ध होता है । यहाँ विचारणीय है कि दोनों अनुभवों एवं दोनों अभावोंका यदि अभेद
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८९ ० मार्क्सवाद और रामराज्य है, तब तो आत्माश्रयदोष होगा, अतः उसी अनुभवाभावसे अनुभव-प्रागभाव नहीं गृहीत हो सकता । यदि दोनोंका भेद है, तो प्रश्न होगा कि ' अनुभवाभाव किससे गृहीत होगा?' यदि दूसरे अनुभवसे, तब तो अन्योन्याश्रय-दोष होगा । कहा जाता है कि ‘ यदि यहाँ घट होता तो उपलब्ध होता, घट नहीं उपलब्ध होता, अतः वह नहीं है । इसी प्रकार इस समय यदि अनुभव होता, तो वह उपलब्ध होता, अनुभव उपलब्ध नहीं होता, अतः अनुभव नहीं है । इस तरह अनुभवाभाव सिद्ध होगा । ' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यदि अनुभव उपलभ्य या भास्य हो, तभी इस प्रकार अभावसिद्धि हो सकती है । यदि अनुभव रहता हुआ भी वेद्य नहीं होता, स्वप्रकाश होनेसे अनुभवान्तरका गोचर नहीं होता, तो इस प्रकारकी अनुपलब्धिसे अभाव कैसे सिद्ध हो सकता है? घटका उपलब्धा आत्मा होता है, परंतु अनुभवका कोई भी उपलब्धा नहीं होता । आत्मा तो स्वयं अनुभवरूप ही है । प्रमाता भी अनुभवका ही सोपाधिक रूप है, अतः अनुपलब्धिप्रमाणसे अनुभवाभावका बोध नहीं हो सकता । कुछ लोग यह भी आपत्ति उपस्थित करते हैं कि ' प्रत्यक्ष ज्ञान स्वसत्ताकालमें विद्यमान ही स्वविषय घटादिका साधक होता है, घटादिकी सर्वदा सत्ताका बोध नहीं कराता । इसीलिये पूर्व एवं उत्तर कालमें घटादिकी सत्ता प्रतीत नहीं होती । प्रत्यक्ष-ज्ञानरूप संवेदन कालपरिच्छिन्नरूपसे प्रतीत होता है । इसीलिये घट भी कालपरिच्छिन्नरूपसे प्रतीत होता है । यदि घटादिविषयक संवेदन स्वयं कालानवच्छिन्न होकर प्रतीत हो; तब तो वेदनाविषय घटादिको भी कालानवच्छिन्नरूपसे ही प्रतीत होना चाहिये और फिर इस तरह घटादि भी नित्य ठहरेगा । ' परंतु यह आपत्ति निःसार है; क्योंकि यदि घटादि विषयके परिच्छिन्न होनेसे तद्विषयक प्रत्यक्ष -ज्ञान भी परिच्छिन्न कहा जायगा, तब तो यह भी कहना होगा कि ईश्वर एवं आत्मा आदि विषयके नित्य होनेसे तद्विषयक प्रत्यक्ष -ज्ञानकी भी नित्यता होनी चाहिये । यह भी नहीं कहा जा सकता कि ' जब घटादि प्रत्यक्षस्थलमें प्रत्यक्षकी अनित्यता दृष्ट है, तब तदनुसार ही ईश्वर या आत्मादिस्थलमें
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मार्क्स और ज्ञान ८९१ भी प्रत्यक्षको अनित्य ही मानना ठीक है । ' परंतु यह भी तो कहा जा सकता है कि ' ईश्वरात्मस्थलमें ज्ञानकी नित्यता देखकर घटादिस्थलमें भी ज्ञान नित्य ही है । ' फिर शंका होती है कि ' संवेदनके नित्य होनेसे संवेदनविषय घटादिको भी नित्य होना चाहिये । ' परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ भी कहा जा सकता है कि संवेदनके अनित्य होनेसे ब्रह्म आदि भी अनित्य क्यों न हों? अतः स्वविषयके नित्यत्व एवं अनित्यत्वसे प्रत्यक्षका नित्यत्व या अनित्यत्व नहीं कहा जा सकता । घटसंवेदनके क्षणिक या त्रिचतुः क्षणस्थायी होनेपर भी तद्विषय घटादिको महीनों एवं वर्षोंतक स्थिर देखा ही जाता है । अतः घटादिको संवेदनके समकालिक नहीं कहा जा सकता । यदि घट संवेदनके असमकाल हो सकता है, तो संवेदन भी घटके असमकाल हो ही सकता है । फिर तो संवेदनके नित्य होनेपर भी घटादिकी नित्यताका कोई प्रसंग नहीं आता । यह भी विचारणीय है कि ' संवेदन अपने पूर्वोत्तरकालमें घटाभावका बोधन करता है अथवा घटका पूर्वोत्तरकाल घटाभावका बोधन करता है । ' पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि संवेदनके पूर्वोत्तरकालमें घटका सत्त्व रहता ही है । व्यावहारिक घटकी अज्ञात सत्ता भी मान्य है ही । सामान्यतया कोई भी यह नहीं समझता कि ' इसी समय मुझे घटज्ञान हुआ, अभी ही घट भी हुआ, पूर्वोत्तरकालमें घट नहीं था । ' अद्वैतीका जो कहना है कि ' जब घटप्रतीति होती है, तभी घट है । घटप्रतीति नहीं तो घट भी नहीं । ' उसका आशय केवल इतना ही है कि प्रतीतिमें घट अध्यस्त होता है, अतः प्रतीतिसे अतिरिक्त घटकी सत्ता नहीं होती और दृष्टिसृष्टिवादकी व्यवस्था अत्युच्च अधिकारियोंके लिये ही है । इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजन्य घटादिज्ञान क्षणिक त्रिचतुःक्षणस्थायी होता है अथवा स्वविरोधिवृत्त्यन्तरोत्पत्ति-पर्यन्त स्थायी होता है । अतः उसकी अनित्यता वेदान्तीको भी अभीष्ट ही है । जो अजन्य ज्ञान है, वही नित्य है । कुछ लोग कहते हैं कि ‘ अजन्य ज्ञान है ही नहीं । ' परंतु उन्हें वृत्तिरूप ज्ञानकी उत्पत्तिसे ही तदुपाधिकज्ञानकी जन्यताकी भ्रान्ति होती है । वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यरूप ज्ञान तो अजन्य ही है । उसकी जन्यतामें कोई प्रमाण नहीं है ।
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८९ २ मार्क्सवाद और रामराज्य वृत्ति एवं चैतन्यका विवेचन अतिदुष्कर है । जैसे मिले हुए क्षीर- नीरका विवेचन हंस ही कर सकता है, वैसे ही वृत्ति एवं चैतन्यका विवेचन अन्तर्मुख परमहंस ही कर सकता है । जो कहते हैं कि ‘ संविद्की अपेक्षासे ही विषयकी अतीतता एवं अनागतता होती है ', उन्हें यह भी बतलाना चाहिये कि फिर संविद्की अतीतता आदि किसकी अपेक्षासे होगी? यदि संविका अतीततानागतत्व स्वापेक्षासे ही मान्य है, तब तो विषयका भी अतीतत्वादि स्वापेक्षासे ही हो सकेगा । फिर संविद्की अपेक्षा क्यों होगी? यदि संविद्की अतीतता, अनागतता विषयकी अपेक्षासे मानी जाय, तब तो अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा । एक संविका अतीतत्वादि अन्य संविद्की अपेक्षा मान्य हो, तब तो उस संविद्की अतीतता आदिमें अन्य संविद्की अपेक्षा होगी, उसको अन्य संविद्की अपेक्षा होगी, इस तरह अनवस्था-प्रसंग होगा । अतः कालकी अपेक्षा ही विषयकी अतीतता आदिका होना उचित है । वर्तमानकालावच्छिन्न घट वर्तमान है, अतीतकालावच्छिन्न घट अतीत होगा । आगामिकालावच्छिन्न घट अनागत कहलाता है । कहा जा सकता है कि ' काल तो नित्य है, फिर उसमें अतीतत्वादि - व्यवहार कैसे होगा?' परंतु यह ठीक नहीं है । दिन- मासादिलक्षण कालमें अतीतत्वादि दृष्ट ही है । ' सविद्की अपेक्षासे कालमें अतीतत्वादि माना जाय ' यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वस्तुतः कालकी अपेक्षासे ही संविदमें अतीतत्वादिका व्यवहार होता है । ' इस समय घटज्ञान वर्तमान है, पूर्वक्षणमें घटज्ञान वर्तमान था, उत्तरक्षणमें घटज्ञान होगा ' इस व्यवहारसे संविमें कालावच्छिन्नताकी प्रतीति होती है । यह भी कहा जाता है कि ' संविद्से ही कालका अतीतत्वादि विदित होता है । ' परंतु इसमें किसीको विवाद ही नहीं है । संविद्से कालका वेदन होनेमें कोई आपत्ति नहीं । आपत्ति तो है घटसंविद्से कालवेदनमें । संविद्से भिन्न सभी वस्तुएँ संविकें अधीन ही स्थितिवाली हैं । एकमात्र संविद् ही स्वतःसिद्ध है । ' कालका अतीतत्वादि एवं कालपूर्वक विषयका अतीतत्वादि संविद्से ही ज्ञात होता है ' इस कथनसे संविका अतीतत्वादि
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मार्क्स और ज्ञान ८ ९३ सिद्ध नहीं होता । यह आवश्यक नहीं है कि अतीत संविद्से अतीत विषयका एवं वर्तमान तथा आगामी संविद्से वर्तमान तथा आगामी विषयका ग्रहण हो; क्योंकि संविदवच्छेदक कालके अतीतत्वादिसे ही विषयोंका अतीतत्वादि सिद्ध हो जाता है । जैसे एतद्दिनस्थिति सूर्यप्रकाशभास्य घट भी पूर्वदिनस्थित सूर्यप्रकाशसे ही भास्य होता है; क्योंकि कालके भेदसे सूर्यप्रकाशमें भेद नहीं होता । इसी तरह एतद्दिनसंविद्भास्य घटादि भी पूर्वदिनस्थित संविद्से ही भास्य होता है । दिनभेदसे संविद्में भेद सिद्ध नहीं हो सकता है । अतः घटज्ञान नित्य एवं स्वप्रकाश है । उसका विषयभूत घटादि अनित्य एवं जड है । घटकी अनित्यतासे ही ज्ञानमें अनित्यताका व्यवहार होता है । कुछ लोग कहते हैं कि ' निर्विषय अनुभव ही नहीं होता; क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती । ' परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि ' यह निर्विषय संविद्का अनुपलम्भ कहनेवालेको है या अन्यको? ' पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि जिसको निर्विषय संविद्का उपलम्भ नहीं है, वह अज्ञानी होनेके कारण ' नहीं जानता ' यही कहा जा सकता है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरेका हृदय दूसरेको प्रत्यक्ष नहीं होता । ' दूसरेको भी निर्विषय संविद्का उपलम्भ नहीं होता ' यह कैसे कहा जा सकता है? यदि कहा जाय कि ' निर्विषय संविद् सम्भव ही नहीं है ', तो इसमें कोई-न -कोई हेतु होना चाहिये । ‘ अनुपलभ्यमानत्व हेतु है ' यह भी नहीं कहा जा सकता । यह हेतु तो सविषय ज्ञानमें भी अतिव्याप्त है; क्योंकि सविषय ज्ञान भी तो स्वप्रकाश होनेसे उसमें भी उपलब्धिविषयतारूप उपलभ्यमानता नहीं है । फिर तो अनुपलभ्यमानत्वरूप हेतुसे सविषय ज्ञानका भी अभाव ही सिद्ध हो जायगा । ‘ ज्ञानमें ज्ञेयत्व नहीं हो सकता ' यह कहा जा चुका है । ' निर्विषय ज्ञान नहीं है ' यह कथन निर्विषयज्ञानाभावको जानकर कहा जाता है अथवा बिना उपलम्भके ही? पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि अभाव प्रतियोगिपूर्वक ही होता है । जो घट नहीं जानता, उसे घटाभावका भी ज्ञान कैसे हो सकता है? जो निर्विषय-ज्ञान नहीं जानता,
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८ ९४ मार्क्सवाद और रामराज्य वह निर्विषय-ज्ञानाभाव भी कैसे जान सकेगा? दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि निर्विषय -ज्ञानाभावकी उपलब्धि नहीं है, तब तो निर्विषय-ज्ञानकी सिद्धिमें कोई बाधा है ही नहीं । फिर भी कहा जाता है कि 'ज्ञायते अनेन घटादिविषयजातमिति ज्ञानम्' इस व्युत्पत्तिसे ज्ञान विषयप्रकाशनस्वभाववाला ही प्रतीत होता है । विषयप्रकाशक ही ज्ञान है । जो विषयप्रकाशक नहीं, वह ज्ञान कैसे कहा जा सकता है? वह विषयप्रकाशकत्व ही ज्ञानका स्वयम्प्रकाशत्व भी है । यदि ज्ञान निर्विषय होगा, तब तो स्वप्रकाश-ज्ञानत्व ही उसमें नहीं रहेगा । परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यदि विषयप्रकाशकत्व ज्ञानत्व हो, तब तो घटादिप्रकाशक सूर्यादिप्रकाशको भी ज्ञान नहीं कहना चाहिये; क्योंकि उसीसे घटादिका प्रकाश होता है, अन्धकारस्थ घट भासित नहीं होता है । यदि सूर्यादिप्रकाशसे अतिव्याप्ति हटानेके लिये विषय-ज्ञानजनक ज्ञानको ज्ञान कहा जाय, तो इस वाक्यमें दो ज्ञान शब्द आते हैं । दोनोंका अर्थभेद है या नहीं? यदि भेद है तो क्या भेद है? यदि कहा जाय कि ' जन्य ज्ञान फल है, जनक ज्ञान उसका कारण है, तो भी विचारणीय यह है कि फलभूत ज्ञान स्वप्रकाश है अथवा परप्रकाश? ' पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि जो विषयज्ञानका जनक नहीं, वह तो आपके मतमें स्वप्रकाश हो ही नहीं सकता । दूसरा भी पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि फलभूतजन्य ज्ञानका प्रकाशक कोई है ही नहीं । यदि अन्य प्रकाशक ज्ञान माना जाय, तब तो अन्यमें होनेवाला प्रकृत फलज्ञानप्रकाशकत्व फलज्ञान ज्ञानजनकत्व ही होगा । फिर इस तरह अनवस्था प्रसक्त होगी । यदि दोनों ज्ञानशब्दोंका एक ही अर्थ है, तो व्याघातदोष होगा अर्थात् वही ज्ञान अपने -आप ही जन्य और अपने -आप ही जनक कैसे होगा? अतः यदि विषयावबोधजनकत्व ही स्वप्रकाशत्व कहा जायगा, तो विषयावबोधजनक करणभूत बोध ही स्वप्रकाश होगा, फलभूत बोध स्वप्रकाश ही न होगा । यदि करणभूतको ही स्वप्रकाश माना जायगा, तो कर्ता आत्मा भी स्वप्रकाश सिद्ध न हो सकेगा । इसी तरह ब्रह्ममें भी स्वप्रकाशता न रहेगी, अतः ' अनन्यावभास्यत्वे सति स्वेतरसर्वावभासकत्व' को ही स्वप्रकाशत्व कहना उचित है ।
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मार्क्स और ज्ञान ८९५ करणज्ञान तो जड होनेसे चैतन्यावभास्य है, अतः वह स्वप्रकाश नहीं कहा जा सकता । यह भी कहा जा सकता है कि ' अस्तित्वे सत्यनन्यावभास्यत्व ' ही स्वप्रकाशत्व है अर्थात् जो दूसरोंसे प्रकाशित न होकर भी स्वतः सत्तावाला है, वही स्वप्रकाश है । शशशृंगादिकोंकी सत्ता ही नहीं होती, अतः वे अन्यानवभास्य होनेपर भी स्वयंप्रकाश नहीं कहे जाते । व्यावहारिक सत्य अज्ञात जगत् अनन्यावभास्य नहीं होता, वह तो किसी ज्ञानसे भास्य ही होता है, अतः उसमें भी अतिव्याप्ति नहीं होगी । । वृत्तिज्ञान भी चैतन्यभास्य है ही । फलज्ञान ही इस प्रकारका स्वप्रकाश है; क्योंकि नित्य चैतन्य ही वृत्तिपर प्रतिफलित होकर फलज्ञान कहा जाता है । विषयावच्छिन्न चैतन्यके आवरक अज्ञानका निराकरण करना वृत्तिका उपयोग है । जैसे अजन्य नित्य मोक्षमें फलत्व -व्यवहार होता है, वैसे ही अजन्य फलज्ञानमें भी फलत्वव्यवहार हो सकता है । अज्ञात- विषयावच्छिन्न चैतन्य ही ज्ञात होकर फल कहलाता है । उसमें जन्यता नहीं है । कहा जा सकता है कि ' फिर इस तरह तो ज्ञानमें ज्ञातता मान ली गयी । ' परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि विषयावच्छिन्न चैतन्य ही ज्ञात होता है, केवल नहीं । केवल तो अनुभवरूप होनेसे स्वप्रकाश ही है । विषयगत अवभास्यत्वरूप धर्म विषयावच्छिन्न चैतन्यमें आरोपित किया जाता है । कुछ लोग कहते हैं कि ' भले ही फलभूत चैतन्यमें उपर्युक्त ढंगकी स्वप्रकाशता रहे, परंतु करणभूत ज्ञानमें तो विषय-प्रकाशकत्वरूप ही स्वप्रकाशता उचित है । तथा च निर्विषय वृत्तिज्ञान नहीं हो सकता । ' परंतु इस सम्बन्धमें सिद्धान्तीको कोई विवाद नहीं है । वेदान्ती जो निर्विकल्पज्ञानका समर्थन करता है, उसका अभिप्राय यही है कि निर्विकल्प ब्रह्मविषयक वृत्तिज्ञान ही निर्विकल्प-ज्ञान है । वह भी सविषयज्ञान है ही । अतः वृत्तिरूप ज्ञान निर्विषय न हो, इसमें कोई आपत्ति नहीं है । चैतन्यज्ञान तो निर्विषय होता ही है । कुछ लोग यह भी कहते हैं कि ' सोकर जागे हुए प्राणीको ' इतने समयतक मैंने कुछ भी नहीं जाना ' इस प्रकारका स्मरण होता है । इससे
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८९ ६ मार्क्सवाद और रामराज्य निद्राकालमें अनुभवाभाव सिद्ध होता है । ' पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि ' सुषुप्तिमें कुछ न जाननेवालेको ही सुषुप्ति मिटनेपर उक्त स्मरण होता है अथवा कुछ जाननेवालेको निद्राके अनन्तर उक्त स्मरण होता है? ' पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि कुछका न जानना यदि मान्य है, तब तो सुषुप्तिमें अनुभवकी सिद्धि होती ही है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो उक्त स्मरण ही नहीं सिद्ध होता । यदि कुछ वेदन था ही, तब कुछ नहीं जाननेका स्मरण कैसे संगत होगा? यहाँ कहा जाता है कि ' न किंचित् जाननेका अर्थ है किसी भी वेदनका अभाव अर्थात् सुषुप्तिमें कोई भी ज्ञान न था । ' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यह विचारणीय है कि सुषुप्तिके ज्ञानाभावको आपने जाना या नहीं जाना? यदि जाना, तब तो सुषुप्तिमें ज्ञानाभावका ज्ञान आपको था ही । फिर ज्ञानाभाव कैसे कहा जा सकता है? यदि आपने ज्ञानाभावको नहीं जाना, तो उसको स्वीकार कैसे किया जाय? यदि अविदितका भी अस्तित्व माना जाय, तब तो शशशृंगादिका भी अस्तित्व मानना पड़ेगा । अतः यही कहना ठीक है कि सुषुप्तिमें विशेषानुभव ही अभाव था । चैतन्यरूप सामान्यानुभवका अभाव नहीं कहा जा सकता है । इसी तरह यह भी शंका होती है कि ' जहाँ भी कहीं संविद्, ज्ञान या अनुभव होता है साश्रय ही होता है, निराश्रयज्ञान कहीं भी नहीं देखा गया । संविद्को आत्माके आश्रित मानना ठीक है; क्योंकि संविद् या ज्ञान एक क्रिया ही है । क्रिया कर्ताके आश्रित होती है, अतः आत्मा कर्ता है, तदाश्रित संविद्का होना ठीक है । ' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्मा स्वयं निष्क्रिय होनेसे अकर्ता है और संविद् भी वृत्तिसे अभिव्यक्त फल है, क्रिया नहीं । आत्मा ही संविद् है, संविद् ही आत्मा है । इस तरह संविद् ही सबका आश्रय है, वही सर्वाधिष्ठान है, वह किसीके भी आश्रित नहीं है । कहा जा सकता है कि ' आत्मा तो अनुभविता है, फिर वह अनुभवरूप कैसे होगा? ' परंतु यह ठीक नहीं । जैसे प्रकाशस्वरूप सविता ही प्रकाशक भी कहा जाता है, वैसे ही अनुभवस्वरूप आत्मामें अनुभविताका भी व्यवहार होता है । कुछ लोग कहते हैं, कि ‘ ज्ञानस्वरूप
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मार्क्स और ज्ञान ८९७ आत्माके आश्रित रहनेवाले ज्ञानद्रव्यको ही अनुभव कहते हैं, आत्माको नहीं । ' परंतु यह भी ठीक नहीं । यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप है, तब ' आत्मा ज्ञान नहीं है ' यह कहना असंगत है । यदि आत्माके स्वरूपभूत ज्ञानसे ही सब काम चल जाता है, तो तदाश्रित अलग ज्ञानद्रव्य मानना व्यर्थ है । इसमें गौरव भी है और कोई प्रमाण भी नहीं है । यदि ज्ञानमें भी अन्य ज्ञान होगा, तो फिर उस ज्ञानमें भी ज्ञानान्तर कहना पड़ेगा । इस तरह अनवस्था होगी । यदि आत्मा ज्ञानरूपी द्रव्य है, तो तदाश्रित ज्ञानरूपी अन्य द्रव्य मानना व्यर्थ भी है । अनवस्था, गौरवादि दोषोंसे दुष्ट भी है । यदि आत्माको द्रव्य न माना जाय, तो आत्माको सगुण माननेवालोंका पक्ष बाधित होगा । सुषुप्तिमें भी ' मैंने कुछ नहीं जाना, सुखपूर्वक सो रहा था ' इत्यादि स्मरणोंके बलसे अज्ञान एवं सुखका अनुभव रहता ही है । अतः सुप्तिमें चैतन्यरूप या वृत्तिरूप ज्ञानका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता । चैतन्य एवं अविद्यावृत्तिका अस्तित्व स्मरणबलसे स्पष्ट सिद्ध है । विशेषानुभवाभाव अवश्य मान्य है । कहा जाता है कि ' सुप्तिमें अन्तःकरण नहीं होता, विषय भी नहीं रहता, तब विषयाकारपरिणत अन्तःकरणकी वृत्तिरूप ज्ञान कैसे हो सकता है? ' परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि यद्यपि अन्य विषय न भी हो, तो भी सुख एवं अज्ञानरूप विषय होनेसे तदाकारपरिणत अविद्यावृत्ति हो सकती है । कहा जा सकता है कि ' सुषुप्तिमें फिर तो ज्ञान भी सविशेष ही हो गया । फिर निर्विशेष ज्ञानकी सिद्धि कैसे हो सकती है? ' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुप्तिमें सविशेष ही ज्ञानकी सिद्धि होती है, निर्विशेषकी नहीं । फिर भी कहा जा सकता है कि ' सुप्ति', ' स्वप्न ', ' जागर ' तथा ' समाधि ' में भी जब निर्विषय ज्ञान नहीं होता, तब तो ' सर्वदा सविषय ही ज्ञान होता है ' यही मानना ठीक है । तब तो फिर ' ज्ञानवान् ही आत्मा है, ज्ञानरूप नहीं ' यही मानना उचित है । पर यह भी ठीक नहीं । व्यवहारतः यद्यपि आत्मा वृत्तिरूप ज्ञानवान् ही है; तथापि परमार्थतः ज्ञानवान् नहीं है; क्योंकि वस्तुतः वृत्तिके भासक आत्माका वृत्तिके साथ आध्यासिक सम्बन्धके अतिरिक्त कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है । अतः 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_29_1_Front
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८९८ मार्क्सवाद और रामराज्य आत्मा चैतन्यज्ञानरूप ही है । प्रश्न होता है कि ' आत्माका स्फुरण होता है या नहीं? यदि होता है, तब तो स्फुरण होनेवाले आत्माका स्फुरण धर्म हो गया । इस तरह धर्मी आत्माका धर्मभूत ज्ञान सिद्ध होता है । जैसे प्रकाशमान सूर्यका प्रकाश धर्म है, वैसे ही यदि आत्माका स्फुरण न हो, तब तो बन्ध और मुक्तिमें कोई भेद ही न रहेगा । जैसे संसारमें आत्माका स्फुरण नहीं है, वैसे ही मुक्तिमें भी स्फुरण न हो, तो बन्ध-मुक्ति समान ही ठहरेंगे । इसके अतिरिक्त घटके समान ही यदि आत्माका भी स्वतः स्फुरण न होगा, तो घटवत् आत्मामें भी जडताकी ही प्रसक्ति होगी । मुक्तिमें अन्य है नहीं, जिससे कि परप्रकाश्यता भी सम्भव होती । परप्रकाश्यता माननेपर स्वयंज्योतिष्ट्व- श्रुतिका भी विरोध होगा, ' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इसी प्रकारका विकल्प आपके धर्मभूत कल्पित ज्ञानमें भी होगा । उसकी स्फूर्ति होती है या नहीं? प्रथम पक्षमें स्फूर्तिवाले धर्मभूत ज्ञानमें स्फुरणरूप धर्म मानना पड़ेगा, तथा च वह धर्मान्तर होगा । इस तरह अनवस्था होगी । द्वितीय पक्षमें घटवत् जडत्वापत्ति होगी । फिर उसे ज्ञान भी कैसे कहा जायगा? कुछ लोग कहते हैं कि ' धर्मिभूत ज्ञानका स्फुरण नित्य है, वह भासमानता व्यवहारके अनुगुण होता है । धर्मभूत ज्ञानका स्फुरण विषयसम्बन्धजन्य होता है । वह विषयसम्बन्धके समय ही होता है, अन्यत्र नहीं । सुप्तिमें उसकी सर्वविषय-सम्बन्धार्हता वह्निशक्तिके समान प्रतिबद्ध होती है, अतः उस समय स्फुरण नहीं होता । ' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वस्तुतः स्फुरमाण वस्तुका स्फुरण ही स्वरूप है । जैसे भासमान सूर्यका भास ही स्वरूप है, प्रकाशातिरिक्त सूर्य नहीं होता । फिर भी ' सूर्यका प्रकाश ' यह व्यवहार ' राहुका सिर ' के समान औपचारिक होता है । इसलिये ' प्रकाश भासित होता है या नहीं' इस विकल्पके समान ही ' आत्मा स्फुरित होता है या नहीं ' - यह विकल्प भी अयुक्त ही है । आत्मा स्फुरणरूप ही है । ' स्फुरण स्फुरित होता है या नहीं'– यह विकल्प कोई भी अनुन्मत्त नहीं कर सकता । फिर भी कुछ लोग कहते हैं कि ' स्फुरण स्फुरमाणका धर्म ही है, स्वरूप नहीं; क्योंकि क्रिया कर्ताका स्वरूप नहीं 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_29_1_Back