मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 921–930
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930
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मार्क्स और ज्ञान ९१ ९ उसी अखण्ड बोधका विवर्त्त है । अन्वयव्यतिरेकसे जैसे मृत्तिका होनेपर ही मृद्विकार घटादि उपलब्ध होते हैं, मृत्तिकाके बिना वे उपलब्ध नहीं होते, जैसे जलके रहनेपर ही तरंगादि प्रतीत होते हैं, जलके बिना वे प्रतीत नहीं होते, वैसे ही मनके होनेपर ही बाह्य एवं आभ्यन्तर भौतिक दृश्यमात्र प्रतीत होते हैं, मनके बिना कुछ भी भासित नहीं होते हैं । इसी प्रकार सर्वान्तर्द्रष्टाका अस्तित्व ही सम्पूर्ण दृश्यके अस्तित्वका मूल है । अखण्ड बोधके बिना तो मन, अन्तःकरण या विज्ञान भी भासित नहीं होते । अतएव मूल पदार्थ अखण्ड बोध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है । मनसे भिन्न मस्तिष्क भी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है । मनको श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि दस बाह्य इन्द्रियोंसे भिन्न ग्यारहवीं आन्तर इन्द्रिय माननेमें भी कोई आपत्ति नहीं है । उसी मनमें बुद्धि, चित्त, मन, अहंकार – ये चार भेद होते हैं । उसमें इच्छा, द्वेष, सुख-दुःखादि गुण व्यक्त हुआ करते हैं । भले ही मस्तिष्कके तन्तुविशेषोंके निघर्षसे इसकी व्यंजना होती हो; परंतु यह मस्तिष्क एवं उसके तन्तु या तन्तुका निघर्षमात्र नहीं है । जैसे ठण्डे और गरम दो तार या दो तारोंका संघर्ष ही विद्युत् नहीं है, किंतु उनसे व्यक्त होनेवाली विद्युत् उनसे भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है, वैसे ही मन इन मस्तिष्क, तन्तु एवं उनके निघर्षसे भिन्न वस्तु है । शुद्ध स्फुरण, अखण्ड बोध तो विचारोंसे भी भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है । मार्क्सवादी कहते हैं कि ' विचारोंका जन्म बाह्यजगत्से ही होता है । फिर भी सभी विचार सत्य नहीं होते ॥ वास्तविकताका ठोस अनुभव ही बतलाता है कि विचार सही है या नहीं । विचार करनेपर यह भी असंगत ही प्रतीत होता है । फिर भी वास्तविकताके जिस ठोस अनुभवसे ही विचारकी सत्यताका निश्चय होता है, वह अनुभव क्या है? क्या वह भी जड, बाह्य वस्तु है? अतः हर दृष्टिसे यह मानना पड़ेगा कि विचार हो या अनुभव, ठोस हो या पोला, किसी भी वस्तुका अस्तित्व निर्दोष अनुभव या विचारके बिना सिद्ध नहीं होता । ' इससे इतना ही कहा जा सकता है कि पूर्वानुभवका बाधक अनुभवान्तर होनेसे पूर्वानुभवको भ्रम समझा जाता है । बाधक अनुभव न होनेसे पूर्वानुभवको स्वतः ही सत्य
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९२० मार्क्सवाद और रामराज्य माना जाता है । सर्वथा अपि अनुभवके बिना बाह्य पदार्थकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती है । साधारण विचार, साहित्य आदिपर अवश्य समाजकी छाप होती है । उसमें भी उच्च श्रेणीके विचारकों, लेखकोंके ग्रन्थोंमें उच्च सामाजिक स्थितियोंका अंकन होता है । निम्न विचारके ग्रन्थोंपर निम्नश्रेणीका ही प्रभाव अंकित होता है । इसी अंशमें लास्कीका कथन संगत है, परंतु प्रामाणिक दर्शनके लिये तो देश, काल, परिस्थितियोंके आवरणोंका भेदन करनेसे ही तत्त्वानुभूति होती है । बिना रंगीन चश्मा उतारे वस्तुका वास्तविक रूप-ज्ञान सर्वथा ही दुर्घट होता है । देहके समान ही इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं है । यदि सम्मिलित होकर इन्द्रियाँ आत्मा हैं, तब तो एक इन्द्रिय नष्ट होनेपर आत्मनाश -प्रसंग होगा; क्योंकि एकके नष्ट होनेपर भी समस्तता विनष्ट हो गयी । यदि प्रत्येक इन्द्रियाँ आत्मा हैं, तो परस्पर विरुद्ध दिक्क्रिया होनेसे शरीर ही उन्मथित हो जायगा । ' योऽहं चक्षुषा घटमद्राक्षं सोऽहं घटं त्वचा स्पृशामि ' ' जिस मैंने चक्षुसे घट देखा था, वही मैं त्वक्से घटका स्पर्श करता हूँ' इस अनुभवसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि नेत्र, श्रोत्र, त्वक्से काम लेनेवाला आत्मा इनसे भिन्न है । चक्षु यदि आत्मा है, तो वह स्पर्शका कर्ता क्यों नहीं हो सकता । त्वक् आत्मा है तो वह दर्शन- क्रियाका कर्ता क्यों नहीं हो सकता? अतः यहाँ कोई इन्द्रियोंसे भिन्न ही आत्मा है, जो कि दर्शन, घ्राण, स्पर्श, श्रवण आदि सभी क्रियाओंका कर्ता है, उसी एक आत्माकी विभिन्न क्रियाओंके कर्तारूपसे प्रसिद्धि है । क्षणिक विज्ञान भी आत्मा नहीं; क्योंकि अनुभव एवं स्मृति का एक ही कर्ता होता है । अन्यद्वारा अनुभूतका अन्य स्मरण नहीं करता । मैंने उसे देखा था और मैं इसे देख रहा हूँ । इस तरह अनेक काल- सम्बन्धी आत्मा क्षणिक नहीं हो सकता है । पूर्वोत्तरदर्शी एक प्रत्ययी न हो तो स्मृति नहीं हो सकती है । ' सोऽहं ' यह प्रत्यभिज्ञा भी स्थायी आत्माके बिना नहीं बन सकती । यदि स्मरण एवं अनुभवके कर्ता भिन्न हों तो मैंने देखा, अन्यने स्मरण किया, यह व्यवहार होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यके कारण एकताकी प्रतीति होती है । जैसे नदी - प्रवाह, दीप, केश
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मार्क्स और ज्ञानं ९२१ आदिमें तत्सदृश होनेसे ‘ त एवेमे केशाः; सैवेयं दीपकलिका ' वे ही ये बाल हैं, वही यह दीपशिखा है - यह प्रत्यभिज्ञा होती है, परंतु यह भी ठीक नहीं है । ' तेनेदं सदृशम्' यह उसके सदृश है, इस प्रकार सादृश्यग्रहणके लिये भी तो पूर्वकालवर्ती तत्का, वर्तमान-कालवर्ती इदंका तथा तदुत्तरवर्ती सादृश्यका ग्राहक एक स्थायी आत्मा हो, तभी सादृश्यबोध भी हो सकता है । कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यप्रत्यय भी स्वतन्त्र ही है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसी स्थितिमें ' तेनेदं सदृशम्' इत्यादि प्रतीति न होनी चाहिये । बाह्य विषयमें भले ही कभी सादृश्यमूलक-एकत्वका भ्रम भी हो, तथापि उपलब्धि या अनुभवितामें तो सन्देह ही नहीं होता । मैं वही हूँ या तत्सदृश अन्य हूँ, किंतु यहाँ तो स्पष्ट ही निश्चित प्रत्यभिज्ञान होता है, जो मैंने कल देखा था, वही मैं आज स्मरण कर रहा हूँ ।
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द्वादश परिच्छेद मार्क्स और आत्मा शास्त्र- संस्कारवर्जित जनसाधारण तथा भूतसंघातवादी चार्वाक और आधुनिक मार्क्सवादी जीवित देहको ही आत्मा कहते हैं; क्योंकि ' मनुष्योऽहं जानामि ' मैं मनुष्य हूँ, जानता हूँ, इस रूपसे ही शरीर ही ' अहं ' प्रत्ययका आलम्बन और ज्ञानके आश्रयरूपसे आत्मा प्रतीत होता है । दूसरे लोग इन्द्रियोंको ही आत्मा कहते हैं । उनके मतसे ' चक्षु, श्रोत्रादि इन्द्रियोंके बिना रूपादि-ज्ञान नहीं होता, अतः वे ही आत्मा हैं । ' अन्य लोग ' स्वप्नमें चक्षुरादि न होनेपर भी ज्ञान होता है, अतः ' अहं ' प्रत्यय और विज्ञानका आश्रय होनेसे मनको ही आत्मा मानते हैं । ' विज्ञानवादी क्षणिक विज्ञानको और माध्यमिक शून्यको ही आत्मा कहता है । यहाँ जीवित देहको ही आत्मा माननेवाले मार्क्सवादियोंसे प्रश्न हो सकता है कि क्या भोक्तृत्व और चैतन्य व्यस्त ( अर्थात् प्रत्येक ) भूतोंका धर्म है अथवा समस्त ( सम्मिलित) भूतोंका? पहले पक्षमें भी क्या सभी भूत समानकालमें ही भोक्ता हैं? यदि हाँ, तो स्वार्थके लिये प्रवृत्त सभी चैतन्य गुणयुक्त भूतोंका परस्पर अंगांगिभाव नहीं हो सकेगा, अंगांगिभाव बिना बने संघात नहीं बन सकता । लोकमें देखते ही हैं कि मुंज आदि तृणोंका अंगांगीभाव होनेसे रज्जुरूप संघात निष्पन्न होता है । यदि संघातके बिना ही पृथक् - पृथक् भूतोंका स्वतन्त्र भोक्तृत्व मान लिया जाय तो देहसे बाहर भी एक-एक भूतमें भी भोक्तृताकी उपलब्धि होनी चाहिये, जो कि अदृष्ट ही है । यदि व्यस्त भूतोंका समानकालमें ही भोक्तृत्व न होकर क्रमेण भोक्तृत्व हो तो भी संघातकी अनिष्पत्ति बनी ही रहेगी । यदि वर- विवाहादि न्यायसे जैसे प्रतिविवाहमें एक-एक पुरुष प्रधान और अन्य वरयात्रिक अप्रधान होते हैं, उसी तरह एक-एक भोगमें एक-एक भूत प्रधान होगा । दूसरे उसके गुणभूत होंगे, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि जैसे एक-एक वरके लिये असाधारणरूपसे एक-एक कन्या
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मार्क्स और आत्मा ९ २३ भोग्य वस्तु है, वैसे ही भोग करनेवाले पृथिवी, जल, तेज, वायुके लिये एक- एक गन्ध, रस, रूप, स्पर्शादि भोग्यवस्तु व्यवस्थित नहीं हैं, अतएव पृथिवीमें रूप-रसादिकी भी उपलब्धि होती है । यदि किसी तरह व्यवस्था मान भी ली जाय कि तेजका रूप ही, वायुका स्पर्श ही, जलका रस ही भोग्य है तो भी एक कालमें शब्द-स्पर्शादि सभी विषयोंका सन्निधान होनेपर भोगमें क्रम अर्थात् अयौगपद्य उपपन्न नहीं हो सकेगा । जैसे एक ही मुहूर्तमें प्रत्येक भोग्य-कन्याके उपस्थित होनेपर वरोंका क्रम विवाह और गुण - प्रधानभावेन संघात नहीं बन सकता, अर्थात् भोग्यकी उपस्थितिमें भोक्ता क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें प्रवृत्त होगा । उसी तरह प्रत्येक भोक्ता भूत, भोग्य शब्दादिके उपस्थित होनेपर क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें संलग्न होगा । अतः इनका भी अंगांगी - भावरूपसे संघात नहीं बन सकेगा । इसी तरह समस्त ( सम्मिलित) भूतोंका भी भोक्तृत्व नहीं बन सकता; क्योंकि यदि प्रत्येक भूतोंमें चैतन्य नहीं है तो वह संघातमें भी नहीं हो सकता । अतएव संघातमें भी भोक्तृत्व नहीं बन सकता । यदि कहा जाय कि अग्निमें डाले हुए एक-एक तिल ज्वालाके जनक न होनेपर भी तिलसमूह ज्वालाका जनक होता है, उसी तरह भूतोंका समूह भी चैतन्यका जनक होगा, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि संघातकी उत्पत्तिमें कोई स्पष्ट हेतु नहीं दिखायी देता । कारण, मार्क्सवादीके मतमें संघातात्मक शरीरसे भिन्न कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं, जो कि प्रत्येक अचेतन भूतका चेतनात्मक संघात उत्पन्न कर सके । यदि भावी भोगको ही संघातका कारण कहा जाय तो वह भी ठीक नहीं, कारण यदि भोगको अप्रधान माना जाय तो परस्पर गुणप्रधानभावशून्य भूतोंका संघात कैसे बनेगा? अर्थात् गुणभूत भोगके द्वारा प्रधानभूत भूतोंका संघात सम्पादन असंगत है । यदि भोगको ही प्रधान माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि भोग सर्वथा ही भोक्ताका शेष ( अंग) हुआ करता है । कहा जा सकता है कि शेषी ( अंगी ) अर्थात् प्रधानभूत भोगके प्रति शेषभूत ( अर्थात् अंगभूत ) स्त्री - पुरुष शरीर भोक्ताओंका संहत ( सम्मिलित ) होना देखा
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९२४ मार्क्सवाद और रामराज्य गया है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सिद्धान्तमें वहाँ भी स्त्री -पुरुष शरीरमें भोक्तृत्व सम्प्रतिपन्न नहीं, किंतु वहाँ शरीर-भिन्न दोनोंके भोक्ता आत्मा ही भोगके लिये दोनों शरीरोंको सम्मिलित करते हैं और ज्वालाके प्रति तिलोंकी संघातापत्तिका दृष्टान्त भी जडवादीके मतमें असिद्ध है; क्योंकि उसके मतमें संघात नामकी कोई चीज सिद्ध नहीं होती । वादी-प्रतिवादी उभयसम्मत होनेसे ही कोई दृष्टान्त किसी सिद्धान्तका साधक हो सकता है । संघात क्या है? यह भी विचारणीय है । ' जैसे अनेक वृक्षोंका एक देशमें आना ही उनका संघातभूत ' वन ' कहा जाता है, वैसे ही भोग और भोक्ताका समानाधिकरणत्व अर्थात् एक देशस्थता संघात हैं ', यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि इस तरह तो सर्वव्यापी सभी भूत सर्वत्र हैं । अतएव चैतन्य और भोग भी सार्वत्रिक ठहरेगा तथा शरीरमें ही भोगका निमय बाधित होगा । ‘ उन भूतोंसे आरब्ध अवयवी संघात है ', यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि यदि वह अवयवी चार भूतोंसे भिन्न है, तो उसे पाँचवाँ तत्त्व मानना होगा, जो भौतिकवादियोंको अस्वीकृत ही है । यदि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न है, तब तो भूतमात्र ही होगा । भेद एवं अभेद दोनोंका होना असंगत ही है । यदि कहा जाय कि अवयवी अवयवोंके परतन्त्र है; अतः पंचमतत्त्वापत्ति नहीं होगी, तो यह भी ठीक नहीं; कारण, इस तरह जल आदि भी पृथ्वी आदिके परतन्त्र होनेसे जलादिमें भी स्वतन्त्र तत्त्वका व्यवहार होता है । फिर तो पृथिव्यादि भूतचतुष्टय तत्त्व हैं, यह सिद्धान्त बाधित हो गया । कुछ लोग कहते हैं कि ' एकद्रव्य- बुद्धिका अवलम्बन योग्य होना ही संघात है । देहमें एकबुद्धि- अवलम्बन- योग्यता है ही ', परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वस्तुतः अनेकोंमें एकत्वबुद्धि विभ्रम ही है । ' एकार्थक्रियामें युगपत् ( एक कालमें ) अन्वय ही संघात है जैसे प्रमातृत्व आदि व्यवहाररूप एक कार्यके लिये पृथिव्यादि चारों भूतोंका अन्वय होता है । ' पर यह भी ठीक नहीं, कारण, ऐसा माननेपर वायुजन्य वेणुसंघर्षजनित काष्ठाश्रित वह्निसे संतप्त जलमें चारों भूतोंका समन्वय है ही, फिर उस जलमें भोक्तृत्व होना
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मार्क्स और आत्मा ९ २५ चाहिये, परंतु यह है नहीं । जो कहा जाता है कि ' जैसे अग्निका लोह-पिण्डके साथ सम्बन्ध होता है, वैसे सम्बन्धको ही संघात कहा जाता है ', वह भी ठीक नहीं । कारण, शरीरमें वायुका सम्बन्ध उस प्रकारका न होनेसे शरीरमें भोक्तृत्व नहीं बन सकेगा । इसके अतिरिक्त वह्निव्याप्त लोहपिण्डमें उसके ही द्वारा उसमें जल शुष्क होता है और वायुका भी उसमें सम्पर्क रहता है । अतः उस लोहपिण्डमें ही भोक्तृत्व एवं चैतन्यका उपलम्भ होना चाहिये । यदि इन सब दोषोंके परिहारके लिये एक -एक भूतको भोक्ता माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सब भूतोंका शब्दादि विषय-सन्निधान होनेपर फिर किसका भोग या चैतन्य है? इसका निश्चय असम्भव होगा । अतः चारोंको भोक्ता मानना पड़ेगा और उनका संघात बन नहीं सकता, अतः संघातभावापन्न भूतोंको भोक्ता या चेतन माननेका पक्ष युक्तिहीन है । कहा जाता है कि ' शक्तिमद्द्रव्यान्तरकी कल्पनाकी अपेक्षा उन गोलकोंमें शक्तिमात्रकी कल्पनामें लाघव है ', परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो आत्मामें ही क्रमयुक्त सर्वविज्ञानसामर्थ्य माननेमें अत्यन्त लाघव है । कुछ लोग ' रूपादिकी उपलब्धि करणपूर्वक होनी चाहिये, कर्ताका व्यापार होनेसे छिदि क्रियाके तुल्य, अर्थात् जैसे कर्ता कुठारादि करणके द्वारा काष्ठछेदन करता है, उसी तरह आत्मा चक्षुरादि करणोंके द्वारा रूपादिकी उपलब्धि करता है ', इस अनुमानसे देहभिन्न इन्द्रियाँ सिद्ध करते हैं और यह भी कहा जाता है कि ' वे इन्द्रियाँ भौतिक हैं । चक्षु तैजस है; क्योंकि तैजसरूपका ही ग्राहक है । श्रोत्र आकाशीय है; क्योंकि आकाशीय शब्दका ग्राहक है । मन शब्द- स्पर्शादि सभीका व्यंजक है, अतः वह पंचभूतोंका ही कार्य है । इस तरह इन्द्रियाँ भी भोक्ता नहीं हो सकतीं । बौद्धोंके अनुसार ' दिखायी देनेवाले आँख, नाक, कान आदि गोलक ही इन्द्रियाँ हैं । ' ' उन गोलकोंमें देखने- सुनने आदिकी शक्ति ही इन्द्रियाँ हैं ' यह मीमांसकोंका मत है । ' गोलक -भिन्न द्रव्य ही इन्द्रियाँ हैं ' यह अन्य लोग मानते हैं । उनमें बौद्धमत इसलिये ठीक नहीं है कि कानरूपी
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९२६ मार्क्सवाद और रामराज्य गोलक न रहनेपर भी सर्पको शब्दका बोध होता है । वृक्षोंमें कोई गोलक नहीं होता, तो भी उन्हें शब्दादिका बोध होता है । यह आगमवेद्य है । आधुनिक वैज्ञानिकोंने भी उनका चेतन होना स्वीकार किया है । शास्त्रोंने भी उनकी हिंसा मना की है । उपर्युक्त दोषोंके कारण ही ' गोलकोंकी शक्ति इन्द्रियाँ हैं ' यह पक्ष भी ठीक नहीं । कुछ लोग इन्द्रियोंको आहंकारिक एवं सर्वगत मानते हैं, अन्य मध्यम परिमाण ही मानते हैं । बौद्ध अप्राप्यकारी कहते हैं, अर्थात् विषय- देशपर बिना गये ही इन्द्रियाँ विषयोंका प्रकाशन करती हैं, परंतु दूरसे स्पर्श, रस, गन्धका उपलम्भ नहीं होता । अतः त्वक्, रसना, घ्राणको अप्राप्यकारी नहीं कहा जा सकता । चक्षु भी दूरदेश जाकर ही दूरस्थ वस्तुका ग्रहण करता है । तेज शीघ्र ही दूरगामी देखा जाता है । शब्द भी वीचि- तरंगन्यायसे श्रोत्र- देशपर आता है, तभी उसका ग्रहण होता है । रेडियो आदिद्वारा शब्दका विस्तार और अधिक हो जाता है । अतः श्रोत्र भी अप्राप्यकारी नहीं । मनको भी •नैयायिक नित्य कहते हैं, परंतु वेदान्तमतमें उसकी उत्पत्ति मान्य है— ' तन्मनोऽसृजत्' ( ऐतरेय० ) नैयायिक मनको अणु- परिमाण और वेदान्ती मध्यम- परिमाण कहते हैं । ' मन, अन्तःकरण, बुद्धि, अहंकार एक ही वस्तुकी अवस्थाएँ हैं, आत्मा इन सभी साधनोंके द्वारा भोगके लिये प्रवृत्त होता है । वह सर्वगत एवं कर्ता है, यह नैयायिकोंका मत है । वेदान्त- मतमें ' आत्मा स्वप्रकाश है । ' निद्राकालमें सुखपूर्वक सोया, इस प्रकार सौषुप्त प्रत्यक्षानुभवके कारण ही प्रबुद्धको स्मरण होता है । ' आत्मा स्वप्रकाश है, क्योंकि स्वसत्तामें प्रकाशविहीन नहीं रहता, जैसे प्रदीप और ज्ञान । ये अपनी सत्तामें प्रकाशरहित नहीं होते, अतएव स्वप्रकाश हैं । इसी तरह आत्मा भी स्वसत्तामें प्रकाशशून्य नहीं होता, अतः स्वप्रकाश है । इसी तरह आत्मा प्रदीपके समान विषयका प्रकाशक एवं आलोकके तुल्य विषय प्रकाशका आश्रय है । इसलिये भी स्वप्रकाश है, इसी तरह ज्ञानके समान इन्द्रिय -गोचर न होकर अपरोक्ष होनेसे भी आत्मा स्वप्रकाश है । जैसे ज्ञान चक्षुरादिका विषय न होकर भी अपरोक्ष है, वैसे ही आत्मा भी । इसी तरह आत्मा धर्मी होते हुए भी अजन्य प्रकाश-
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मार्क्स और आत्मा ९२७ गुणवाला है; क्योंकि वह प्रकाश- गुणवाला है जैसे आदित्य । अर्थात् जैसे आदित्य प्रकाश- गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश- गुणवाला है, वैसे ही आत्मा भी प्रकाश - गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश- गुणवाला है । यह बात दूसरी है कि आदित्यका प्रकाशरूपी प्रकाश है, आत्माका ज्ञानरूप नीरूप प्रकाश है । ' अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' इत्यादि आगम भी आत्माको स्वप्रकाश कहते हैं । नैयायिक एवं पूर्वमीमांसक आत्माको कर्ता मानते हैं; किंतु सांख्य निरवयवमें परिस्पन्द एवं परिणामलक्षण क्रियाको असम्भव समझकर उसे असंग एवं अकर्ता ही कहते हैं । वैशेषिक, योगी, नैयायिक आदि भोक्ता जीवसे भिन्न सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् विश्वकर्ता ईश्वर मानते हैं । जाग्रत्कालमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि विषयवेद्य हैं । उनमें गो- अश्वादिवत् परस्पर विचित्रताके कारण उनकी भिन्नता भी माननी चाहिये । उन शब्दादिका बोध या संवित् उनसे भिन्न है । वेद्य और वेदिताका भेद प्रसिद्ध ही है । प्रकाश्य, प्रकाशकका भेद भी लोकमें प्रसिद्ध है । रूप और उसके प्रकाशक सौरालोकमें भेद स्पष्ट ही है । इसी तरह वेद्य शब्दादि एवं आकाशादिसे उनका भासक बोध और अनुभव भिन्न है । जैसे शब्दादिकी परस्पर विचित्रता होनेसे भिन्नता है, उसी तरह उनके बोधोंमें विचित्रता नहीं है । अतः उनका भेद भी नहीं है । अतएव बोध-बोध सब एक ही है । अनुमान भी किया जा सकता है । विवादास्पद शब्दादि- बोध स्वाभाविकभेदशून्य हैं; क्योंकि उपाधिको बिना ग्रहण किये हुए उनका भेद गृहीत नहीं होता, जैसे आकाशमें घटादि उपाधिके बिना भेद नहीं गृहीत होता, अतः वह भी स्वाभाविक भेदशून्य है, तद्वत् प्रकृतमें भी समझना चाहिये । संवित् होनेसे शब्दसंवित् स्पर्शसंवित्से भिन्न नहीं है, जैसे स्पर्शसंवित् अपनेसे भिन्न नहीं है । जैसे एक ही आकाशमें घटादि उपाधिके भेदसे भेद - व्यवहार हो जाता है, उसी तरह आकाशवत् व्यापक एक ही संवित्में शब्दादि विषयरूप उपाधिके भेदसे भेद- व्यवहार बन ही जायगा । उसी प्रकार स्वप्नमें भी विषयोंमें भेद और संवित्में अभेद
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९२८ मार्क्सवाद और रामराज्य है । स्वप्न और जागरमें भेद इतना ही है कि जागरमें विषय स्थिर है और स्वप्नमें अस्थिर । स्वप्न-जागर - अवस्थाएँ और उनके विषय भी विचित्रताके कारण पृथक् - पृथक् हो सकते हैं; परंतु दोनों अवस्थाओंके बोध एकरूप होनेसे अभिन्न ही हैं । इसी तरह सुषुप्ति-अवस्थाकी संवित् भी सुषुप्ति- अवस्थासे भिन्न हैं । सुषुप्ति और जाग्रदादि परस्पर विलक्षण होनेसे भिन्न हैं, परंतु उनकी संवित् एकरूप होनेसे परस्पर अभिन्न ही है । सोकर जगनेके पश्चात् सुप्तोत्थित प्राणीको सुषुप्ति- अवस्थाके अज्ञान या तमका स्मरण होता है, ' मैं सुखपूर्वक सोता था और कुछ भी नहीं जानता था । ' प्रत्यक्ष-साधन विषयेन्द्रिय- सन्निकर्ष एवं अनुमान -साधन व्याप्ति-लिंगादि न होनेसे ऐसे ज्ञानको स्मृति ही मानना उचित है । स्मृति अनुभवपूर्वक ही होती है, अतः सुषुप्तिकालमें सुख एवं तमोरूप अज्ञानका अनुभव मानना उचित है । यह अज्ञान अन्धकारके तुल्य वस्तुतत्त्वको ढकनेवाला भावरूप है । इसीलिये इसके द्वारा ज्ञानरूप ब्रह्मका आवरण होता है । ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' ( गीता ५ । १५ ) यह ज्ञानाभाव नहीं है; क्योंकि ज्ञानाभाव जाननेके लिये उसके अनुयोगी ( आधार ) प्रतियोगी ( ज्ञान ) - का ज्ञान होना चाहिये । जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी ( भूतलादि) और प्रतियोगी ( घट) -का ज्ञान आवश्यक होता है, परंतु यहाँ यदि इसी तरह अनुयोगी -प्रतियोगीका ज्ञान हो, तब ज्ञानाभाव कैसा? और यदि उनका ज्ञान नहीं तो ज्ञानाभावका ज्ञान ही नहीं हो सकता । अतः भावरूप अज्ञान ही साक्षीके द्वारा प्रकाशित होता है । अज्ञानका उपलम्भ होनेसे ही तद्विरुद्ध ज्ञानका अभाव विदित हो जाता है । इसलिये इस अज्ञानको तम भी कहा जाता है । इसी तरह दिनों, पक्षों, मासों, वर्षों, युगों, कल्पों, अतीतों, अनागतोंमें भेद है, परंतु उनके बोधोंमें कोई भी भेद नहीं । एक अनन्त आकाशके तुल्य ही यह बोध भी अनन्त एवं एक ही है । अतः इसका न उदय होता है न अन्त; क्योंकि उस बोधका प्रागभाव या उत्पत्ति अथवा विनाश भी बोधके बिना सिद्ध नहीं होता । यदि प्रागभाव -साधक बोध है, तो बोधका प्रागभाव हो कैसे कहा जा सकता है? यदि बोध नहीं तो प्रागभाव सिद्ध ही कैसे होगा? बोधोंमें भेद नहीं होता, अतः