मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 931–940
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940
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मार्क्स और आत्मा ९ २९ अन्य बोधका प्रागभाव अन्य बोधसे सिद्ध होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता । इस तरह अत्यन्ताबाध्य होनेके कारण वही बोधस्वरूप भी है । यही संवित् आत्मस्वरूप भी है; क्योंकि नित्य होकर स्वप्रकाश है । जो नित्य स्वप्रकाश नहीं, वह आत्मा नहीं, जैसे घटादि । बोध नित्य एवं स्वप्रकाश है, अतः वही बोध, संवित्, अनुभव या ज्ञान आत्मा है । आत्मा परप्रेमास्पद है, अतः आनन्दस्वरूप भी है । संसारमें सर्वत्र ही प्रेम आत्माके लिये होता है, आत्मामें प्रेम अन्यके लिये नहीं होता । जैसे शर्कराके सम्बन्धसे अन्यत्र मिठास होती है, किंतु शर्करामें मिठास स्वतः होती है । उसी तरह आत्मामें प्रेम स्वतः होता है । अन्यत्र प्रेम आत्मसम्बन्धसे होता है । निद्रादि सब जिससे अनुभूत होते हैं, उस अनुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता । अनुभूतिको अनुभाव्य माननेसे अनवस्था- दोष होता है, अतः अनुभूति - अनुभाव्य हुए बिना ही स्वप्रकाश है । ज्ञाता और ज्ञानका दूसरा ज्ञान न होनेसे वे ज्ञेय नहीं होते । असत् होनेसे उन्हें अज्ञेय नहीं कहा जा सकता । निद्रा आनन्दादि साक्षी होनेसे उसे असत् नहीं कहा जा सकता । गुडादि अपने सम्पर्कसे अन्यत्र चणक- चूर्णादिमें मधुरतादि समर्पण करते हैं, परंतु स्वयं गुड़ादिमें मधुरता अर्पण करनेवाले गुड़ादिकी अपेक्षा नहीं होती । इसी तरह आत्मामें वेद्यता, अनुभाव्यता न होनेपर भी बोधस्वरूप होनेमें कोई सन्देह नहीं । जैसे प्रकाश और तमके बिना यद्यपि आकाश उपलब्ध नहीं होता, तथापि निर्जगत् आकाश मान्य होता है । उसी तरह यद्यपि घटादिके बिना सत् या बोध उपलब्ध नहीं होता, फिर भी घटादि प्रपंचशून्य बोध या स्वप्रकाश सत् रहता ही है । तूष्णींभाव समाधिकालमें दृश्य विशेषणादिरहित शुद्ध सद्वस्तु उपलब्ध होती है, शून्य बुद्धि नहीं होती । इसलिये तूष्णींस्थितिमें शून्य नहीं कहा जा सकता । ' उस समय सद्बुद्धि भी न होनेसे सत् भी नहीं रहता ', यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सद्बुद्धि होनेपर भी स्वप्रकाश होनेसे सत् सिद्ध होता है । निर्मनस्कताका साक्षी स्वप्रकाश होता ही है, जैसे मनकी चंचलता मिटनेपर साक्षी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार मायाका विजृम्भण या विकास 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_30_1_Front
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९३० मार्क्सवाद और रामराज्य रुकनेपर स्वप्रकाश सत् भी स्फुट हो जाता है । कुछ लोग आकाशादिसे भिन्न सत् नहीं मानते, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि ‘ आकाशः सद् घटः सत्' इत्यादि व्यवहारोंमें जैसे घटादि शब्द एवं घटादि बुद्धि होती है, उसी तरह सत् शब्द एवं सद्बुद्धि होनेसे आकाश और सत्—दोनों ही पृथक् पदार्थ हैं । जैसे ' मृद् घट: ' इस व्यवहारमें शब्द एवं बुद्धिके कारण ही मृत्तिका और घट दो पदार्थ सिद्ध होते हैं । उनमें मृद्बुद्धिके अनुवृत्त होनेसे और घट- शरावादि बुद्धि व्यावृत्त होनेसे मृत्तिका कारण और घटादि कार्य समझे जाते हैं । उसी तरह सत् अनुवृत्त होनेसे कारण तथा आकाश घटादि व्यावृत्त होनेसे कार्य सिद्ध होते हैं । अधिक वृत्ति होनेसे सत् धर्मी है, अल्पवृत्ति होनेसे आकाशादि धर्म हैं । बुद्धिसे यदि आकाशसे सत्को पृथक् कर दें, तब तो आकाश असत् ही हो जाता है । जैसे जाति- व्यक्ति और देह - देहीका भेद होता है, वैसे ही आकाशादि प्रपंच एवं सत्का भी भेद सिद्ध होता है । सावधानी एवं एकाग्रतासे विचार करनेपर भेद-ज्ञान स्थिर हो जाता है । विवेचन करनेपर सत् शून्य अवकाशात्मक आकाश रह जाता है एवं निरवकाशात्मक सत् रह जाता है— येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च। स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम्॥ ( पंचदशी, महावाक्यविवेकप्र० १ ) जिस नेत्रजन्यवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे पुरुष रूपको देखता है, श्रोत्रजन्य शब्दाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे शब्द ग्रहण करता है, गन्धाकारवृत्तिव्यक्त चैतन्यसे गन्ध ग्रहण होता है, वही बोधस्वरूप चैतन्य प्रज्ञान है—'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते । ' ( बृहदा० उप० ४। ३ । २३ ) द्रष्टाकी स्वरूपभूत दृष्टिका कभी भी विलोप नहीं होता । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिकी सभी वस्तुएँ अपने - अपने स्थानपर ही रहती हैं; किंतु द्रष्टा तीनों ही अवस्थामें रहता है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिके प्रपंचका जो प्रकाशक भान है, वही ब्रह्म है । तीनों अवस्थाओंका भासक साक्षी भोग्य, भोक्ता और भोग- तीनोंसे ही विलक्षण होता है । वह 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_30_1_Back
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मार्क्स और आत्मा ९३१ चिन्मात्र ही है । चिदाभास एवं अहंका भी सुषुप्तिमें विलय होता है, उसका भी साक्षीसे ही प्रकाश होता है । जैसे आकाशीय सूर्यद्वारा प्रकाशित घट-कुड्यादि दर्पणादित्यदीप्तिसे प्रकाशित होता है अर्थात् दर्पणप्रतिबिम्बित आदित्यद्वारा प्रकाशित होता है । यदि कुड्यपर अनेक दर्पणप्रतिबिम्बित आदित्यकी दीप्तियाँ प्रकट हों, तो उनके बीच - बीचमें स्वाभाविक निरुपाधिक आकाशीय आदित्यकी दीप्तियाँ परिलक्षित होती हैं और दर्पणजन्य विशेष प्रभावोंके न होनेपर भी वह सामान्य आदित्यप्रकाश रहता ही है । ठीक इसी तरह स्वप्रकाश बोध सामान्य चेतनद्वारा प्रकाशित देह भी बुद्धि - प्रतिबिम्बित चिदाभासके द्वारा प्रकाशित होता है । चिदाभासविशिष्ट बुद्धि- वृत्तियोंके बीच - बीचमें सामान्य - चेतन या शुद्ध नित्यबोध परिलक्षित होता है । बुद्धिवृत्तिप्रतिबिम्बित चिदाभासोंके बिना भी वह स्वप्रकाश बोध रहता ही है । घट-ज्ञानादि शब्दवाच्य चिदाभासविशिष्ट बुद्धिवृत्तियोंकी सन्धियों एवं सुषुप्तिमें उन बुद्धिवृत्तियोंके अभावका प्रकाशक नित्य- बोध रहता है । घटाकार- बुद्धिस्थ चित् घटमात्रका प्रकाश करती है, परंतु घटगत ज्ञातताका प्रबोध नित्य-चैतन्यसे ही होता है । घटाकार -बुद्धिके प्रथम 'घटो मया न ज्ञात: ' इस प्रकार घटकी अज्ञातता भी व्यापक अखण्ड बोधसे ही गृहीत होती है । जैसे अज्ञातत्वेन घट ब्रह्मबोधित था, उसी तरह बुद्धि उत्पन्न होनेपर घट ज्ञातत्वेन भी ब्रह्म-चैतन्यसे ही प्रकाशित होता है । कोई भी घटादि विषय चित्प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिवृत्ति एवं अज्ञान दोनोंसे ही व्याप्त होते हैं । जब वह चिदाभासयुक्त वृत्तिसे व्याप्त होता है, तब ज्ञात कहलाता है, जब अज्ञानसे व्याप्त होता है, तब अज्ञात कहलाता है 1 अज्ञातरूपसे घटादि ब्रह्म अर्थात् व्यापक नित्य बोधसे प्रकाशित होता है । यह शंका हो सकती है कि ' चिदाभासयुक्त वृत्तिसे ही घटका प्रकाश हो सकता है, फिर ब्रह्म-प्रकाशकी क्या आवश्यकता?' परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि जैसे अज्ञानने घटमें अज्ञातता पैदा की है, उसी तरह चिदाभासके द्वारा घटमें ज्ञातता उत्पन्न होती है । कहा जा सकता है कि ' ज्ञातता तो घटमें वृत्तिमात्रसे उत्पन्न हो सकती है, ' परंतु यह ठीक नहीं । 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_30_2_Front
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९३२ मार्क्सवाद और रामराज्य चिदाभासहीन बुद्धिसे घटादिमें ज्ञातता उत्पन्न नहीं हो सकती; क्योंकि मृत्तिकादिके तुल्य चिदाभासरहित बुद्धि या वृत्ति जड ही है । अतः जैसे काली - पीली मिट्टीसे लिप्त घट ज्ञात नहीं कहा जा सकता, उसी तरह बुद्धिवृत्तिव्याप्त घट भी ज्ञात नहीं कहा जा सकता । अतः वृत्ति - व्याप्त घटमें चित्प्रतिबिम्बका उदय होनेसे ही घटमें ज्ञातताका व्यवहार बनता है । कहा जा सकता है कि आकाशीय सौरालोक-तुल्य सामान्य नित्य-बोधरूप ब्रह्मसे ही घटादिकी ज्ञातता बन सकती है, फिर दर्पणादित्यदीप्तिके तुल्य वृत्तिपर चित्प्रतिबिम्ब या चिदाभास क्यों माना जाय? परंतु यह कहना ठीक नहीं । कारण, नित्य बोधरूप ब्रह्म तो प्रमाण - प्रवृत्तिके पहले भी था ही । यहाँ तो प्रमाण-प्रवृत्तिके पश्चात् घटादिमें ज्ञातताका व्यवहार होता है, यह चिदाभासमूलक ही है । अतः वृत्तिपर व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब घटमें ज्ञातता उत्पन्न करता है । वह ज्ञातता, अज्ञातताके तुल्य ही ब्रह्मसे भास्य होती है । बुद्धिवृत्ति, चिदाभास एवं घटादि सभी सामान्य सौरालोक-तुल्य नित्यबोधसे भासित होते हैं, फिर भी घटव्याप्त वृत्तिपर चिदाभासरूप फल होता है । अतः एक घटका ही स्फुरण होता है । घटादि विषयपर द्विगुणित चैतन्य व्यक्त होता है । जैसे कुड्यपर एक सामान्य सौरालोक फैला होता है, दूसरे दर्पणादित्यदीप्तिके फैलनेसे द्विगुणित प्रकाश हो जाता है, उसी तरह सामान्य नित्यबोधसे व्याप्त घटादिपर चित्प्रतिबिम्बयुक्त वृत्तिकी व्याप्ति होनेसे द्विगुणित चैतन्य हो जाता है । इसीलिये घटादिकी ज्ञातताका भासक ब्रह्म चैतन्य माना जाता है । नैयायिक आदि उसे ही अनुव्यवसाय (ज्ञानविषय ज्ञान) कहते हैं । ' घटोऽयम्' यह घट है— नैयायिकोंके शब्दोंमें यह व्यवसायात्मक ज्ञान है, यह बुद्धिवृत्तिसे होता है । ' मया घटो ज्ञातः ' मैंने घट जान लिया, यह अनुव्यवसायात्मक ज्ञान नित्य बोधरूप ब्रह्मसे होता है । इसी तरह अहंवृत्ति एवं काम-क्रोधादि वृत्तियोंमें चिदाभास, उसी तरह व्याप्त होकर रहता है, जैसे लोहपर अग्नि व्याप्त होती है । जैसे अग्नि-व्याप्त लोह केवल अपने -आपको ही प्रकाशता है, अन्यको नहीं, उसी तरह आभाससहित वृत्तियाँ अपनेको ही भासित करती हैं । 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_30_2_Back
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मार्क्स और आत्मा ९ ३३ क्रमसे विच्छिन्नावच्छिन्न होकर वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं । सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधिमें सभी वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं । सभी वृत्तियोंकी सन्धियाँ और अभाव जिस निर्विकार नित्य- बोधसे प्रकाशित होते हैं, उसे ही वेदान्तमतसे कूटस्थ शब्दसे कहा जाता है । जैसे बाहर वृत्ति - व्याप्त घटमें भासक चिदाभास और घटकी ज्ञातताका भासक ब्रह्मचैतन्य द्विगुण चैतन्य होता है, उसी तरह भीतर भी वृत्तियोंपर सन्धिकी अपेक्षा द्विगुण चैतन्य व्यक्त होता है । इसीलिये सन्धियोंकी अपेक्षा वृत्तियोंकी स्पष्टता अधिक होती है । भेद इतना अवश्य है कि बाहर घटादिमें ज्ञातता, अज्ञातता—दोनों ही रहती हैं, वैसे वृत्तियोंमें ज्ञातता, अज्ञातता— दोनों नहीं रहतीं । वृत्तियाँ स्वयं अपने - आपको ग्रहण नहीं करतीं, इसलिये ज्ञातता नहीं होती और वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्तिगोचर अज्ञान नहीं रहता, अतः वृत्तियोंकी अज्ञातता भी नहीं होती । वृत्तिगोचर वृत्ति माननेसे अनवस्थादि दोष आते हैं । अतः वृत्तियाँ साक्षिभास्य कही जाती हैं । चित्प्रतिबिम्बरूप ज्ञानकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीत होते हैं, अतः उसे विनश्वर कहा जाता है । अन्तःकरण एवं तद्वृत्तियोंका साक्षी अखण्ड नित्यबोध निर्विकार होनेसे कूटस्थ कहलाता है । बुद्धिसे परिच्छिन्न कूटस्थ एवं चिदाभासयुक्त बुद्धिके मिश्रणसे ही जीव- व्यवहार होता है । बुद्धि स्वच्छ है, इसलिये उसपर चित्प्रतिबिम्ब होता है । प्रतिबिम्ब एवं बिम्बमें कुछ तुल्यता और कुछ विलक्षणता होती है, इसी तरह स्फूर्तिरूपतामें तुल्यता होनेपर भी संगिता विकारितारूप विलक्षणता भी बिम्बकी अपेक्षा प्रतिबिम्बमें रहती है । कहा जा सकता है कि जैसे मृत्तिका रहनेपर ही घट रहता है, वैसे ही बुद्धिके रहनेपर ही चिदाभास रहता है, बुद्धिके न रहनेपर नहीं रहता । फिर उसे बुद्धिसे भिन्न क्यों माना जाय? यदि शास्त्र-प्रमाणसे देहके मरनेपर भी बुद्धिका अस्तित्व माना जा सकता है तो बुद्धिसे भिन्न चिदाभास भी शास्त्रोंसे सिद्ध होता ही है । बुद्धिकी विभिन्न वृत्तियों एवं अज्ञानके साक्षीरूपसे सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान अखण्ड बोधरूप ब्रह्म
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९ ३४ मार्क्सवाद और रामराज्य सिद्ध होता है । अखण्ड बोध- स्वरूप ब्रह्म ही अहंवृत्तिसे युक्त होकर कर्ता कहलाता है, इदंवृत्तियुक्त हो प्रपंचाकार प्रतीत होता है, वही आन्तर- बाह्य सभी विषयोंको साक्षीरूपसे प्रकाशित करता है । नृत्यशालास्थित दीप जैसे प्रभु, सभ्य एवं नर्तकी सभीको प्रकाशित करता है, उसी तरह साक्षी आत्मा ही अहंकार, बुद्धि एवं सभी विषयोंको प्रकाशित करता है । जैसे प्रभु, सभ्य आदिके न रहनेपर दीप सबके अभावका भी भासक होता है, उसी तरह अहंकार बुद्धिके सुषुप्ति दशामें रहनेपर भी साक्षी ही सबके अभावका भी प्रकाशन करता है । अखण्ड बोधरूप आत्मा नित्य ही स्वप्रकाशरूपसे विराजमान रहता है । उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होकर बुद्धि आदि व्यावृत होती हैं । जैसे दीप स्वस्थानस्थित रहकर ही आन्तर- बाह्य सभी वस्तुओंको प्रकाशित करता है, उसी तरह कूटस्थसाक्षी आन्तर- बाह्य सभी विषयोंको प्रकाशित करता है । देहकी अपेक्षासे ही उसमें आन्तरत्व एवं बाह्यत्व प्रतीत होता है । अन्तःस्थ बुद्धि ही इन्द्रियोंके द्वारा बार - बार बाह्य विषयोंकी ओर जाती है । उसीकी चंचलतासे तद्भासक साक्षीमें भी चंचलता प्रतीत होती है । सर्वदेश, काल, वस्तु बुद्धिकृत ही हैं । सर्वभासक अखण्ड बोधकी दृष्टिसे कुछ भी नहीं है । जैसे अग्निमें उष्णता एवं प्रकाश रहता है, वैसे ही आत्माका चैतन्य स्वभाव है । शब्दादि अचेतन होनेसे स्वतः सिद्ध नहीं हो सकते, किंतु शब्दाद्याकारवृत्तियोंसे ही उनकी सिद्धि होती है । वे वृत्तियाँ परस्पर भिन्न शब्दादि विषय विशेषणवाली होती हैं, अतः नीलपीताद्याकारवाली वृत्तियों या ज्ञानोंकी भी स्वतःसिद्धि नहीं हो सकती । जबतक नीलपीतादि बाह्याकार न होंगे, तबतक बाह्याकार- प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकते । इस तरह प्रत्यय भी संहत होनेसे अचेतन ही ठहरते हैं । इस दृष्टिसे स्वरूपभिन्न ग्राहकसे ही प्रत्यय भी ग्राह्य होंगे । जो असंहत होकर चैतन्यात्मक है, वही स्वार्थ हो सकता है । अन्य संहत अचेतन वस्तु परार्थ ही होते हैं । नील -पीताद्याकार ज्ञानोंका उपलब्धा आत्मा विक्रियावान् है, ऐसा संशय होता है, परंतु इसका समाधान यह है कि परिणामी चित्तादि
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मार्क्स और आत्मा ९ ३५ क्रमसे ही स्वविषयोंके ग्राहक होते हैं, परंतु कूटस्थ आत्मा अक्रमेण सभी प्रत्ययोंका उपलम्भ करता है । अतएव अपरिणामिता सिद्ध होती है । अशेषचित्त प्रकारकी उपलब्धि कूटस्थताका निश्चायक है । यदि कूटस्थ आत्मा परिणामी होता तो अशेष स्वविषयचित्त प्रचारका साक्षी न होता, जैसे चित्त किंवा इन्द्रियाँ अपने विषयोंके एक देशका ही उपलम्भ करते हैं, इस तरह आत्मा अपने विषयोंके एक देशका उपलम्भ नहीं करता; किंतु अशेष प्रत्ययोंकी उपलब्धि आत्मासे होती है, अतः वह अपरिणामी ही है । कहा जा सकता है कि उपलब्धि धात्वर्थ क्रिया ही है, फिर उपलब्धिक्रियाका कर्ता विक्रियावान् ही है । उपपूर्वक लभ धातुसे कर्ता तृच् प्रत्यय करनेपर उपलब्धा शब्द बनता है । धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है । क्रिया स्वयं उत्पत्ति-विनाशशील होती है, अतः उपलब्धि भी क्रिया ही है, अतः उत्पत्तिविनाश उसका भी मानना ही चाहिये, फिर वह नित्य कैसे कहा जा सकता है । इसका समाधान यह है कि ' धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है और कर्ता ही प्रत्ययार्थ होता है, यह नियम सार्वत्रिक नहीं; क्योंकि ' गडि वदनैकदेशे ' इस गडि धातुसे गण्ड बनता है, जो कि मुखैकदेश कपोलका ही बोधक है । इसी तरह ' सविता प्रकाशते ' ' सविता प्रकाशयति ' ' सविता प्रकाशमान है या घटादिका प्रकाशक है, ' यहाँपर सविता किसी प्रकाश-क्रियाका कर्ता नहीं है; क्योंकि प्रकाश उसका स्वरूप ही है । उसके निर्विकार रहते हुए ही उसके सन्निधानमात्रसे अन्य वस्तुओंका प्रकाश होता है । बुद्धिजन्य वृत्तिरूप बौद्ध प्रत्यय ही क्रिया या विक्रिया है । वही धात्वर्थ है । आत्माकी स्वरूपभूत नित्य उपलब्धिमें विक्रियाका उपचार होता है । जैसा कि सूर्यके स्वरूपभूत प्रकाशमें भी विक्रियात्वका उपचार होता है । ' कहा जा सकता है कि ' बुद्धि द्रव्य है, उसका परिणाम वृत्ति भी मृत्तिका - परिणाम घटादिके तुल्य द्रव्य ही है । उसे भी क्रिया नहीं कहा जा सकता, परंतु मृत्तिकादि अपने पूर्वरूपको तिरोहित करके घटादिके रूपमें परिणत होते हैं । ' पर यहाँ तो तृणजलूका ( जोंक) एवं प्रकाशके
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९३६ मार्क्सवाद और रामराज्य तुल्य संकोच- विकासरूप ही क्रिया है । ऐसा परिणाम तो पारिणामिकी चेष्टारूप ही है । इसी तरह बुद्धिका पारिणाम ही वृत्ति है, वही क्रिया है । उस वृत्तिपर अभिव्यक्त बोध- प्रतिबिम्ब नित्य बोधरूप बिम्बके तुल्य ही होता है । इसीलिये चिच्छायापन्न वृत्तिके क्रिया होनेसे नित्यबोधमें भी क्रियात्वका आरोप होता है । लोकमें अर्थ-प्रकाश ही उपलब्धि - शब्दार्थ प्रसिद्ध है । वह अर्थ- प्रकाश अर्थका धर्म नहीं हो सकता; क्योंकि वह तो जड है, स्वतः स्फूर्तिरहित होना ही जडताका लक्षण है । अन्तःकरणका भी धर्म प्रकाश नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह तो प्रकाशकरण ( असाधारण कारण ) है, अतः वह भी चैतन्यरूप प्रकाशका आश्रय नहीं हो सकता । फिर भी स्वयं प्रकाशमान चैतन्य आत्मामें अहंरूपसे अन्तःकरणका अध्यास होता है । वह कभी भी अप्रकाशित होकर नहीं रहता । वही आत्मचैतन्य व्याप्त अन्तःकरण विषयवृत्तिको उत्पन्न करता हुआ उपलब्धा कहलाता है, वही कर्ता और प्रमाता भी कहलाता है । जैसे लोह- पिण्डमें दाहकत्व-प्रकाशकत्वका व्यवहार होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये । अखण्ड बोधस्वरूप आत्माका आकाशवत् अविक्रिय होनेपर भी तादृक् अन्तःकरणगत चिदाभासके अविवेकसे अन्तःकरणके धर्मों एवं उसकी अवस्थाओंसे युक्त होकर प्रतीत होने लगता है । जैसे अग्नि निराकार होनेपर भी काष्ठोंपर प्रकट होती है, वैसे ही त्रिकोण- चतुष्कोण मोटा- पतला-सा प्रतीत होता है और अग्निका उत्पन्न होना, नष्ट होना भी उसी काष्ठादि उपाधिसे प्रतीत होता है । इसी तरह विकासी अन्तःकरणमें कर्तृत्व होनेपर भी उपलब्धिमें उत्पद्यमानता नहीं होती । अतः उपलब्धिस्वरूप आत्मा निर्विकार कूटस्थ ही है । कहा जा सकता है कि 'जैसे छिदिक्रियासाध्य द्वैधीभावरूप फल विक्रिया है, उसी तरह उपलब्धिरूप फल भी साध्य ही है, अतः वह भी विक्रिया ही है । ' परंतु वस्तुतः स्वरूपसे उपलब्धि फल ही नहीं है, वृत्तिव्याप्त घटादि विषयोंपर व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब ही फल है । नित्योपलब्धिस्वरूप आत्मामें उसीके अविवेकसे फलत्वका व्यपदेश होता है, अतएव यहाँ उपलब्धि एवं उपलब्धामें भेद नहीं है । उपलब्धि-
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मार्क्स और आत्मा ९३७ स्वरूप ही आत्मा है । यह उपलब्धि नित्य है, विक्रिया नहीं है । विक्रियारूप उपलब्धि चैतन्यव्याप्त बुद्धिवृत्ति है । उससे अविवेकके कारण ही नित्योपलब्धिमें फलत्वका व्यवहार होता है । इसीलिये उपलब्धाभासावसान उपलब्धिका धात्वर्थ है । उसी नित्योपलब्धिस्वरूप आत्मामें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति-तीनों ही अवस्थावाला अन्तःकरण भासित होता है । तीनों ही अवस्थाएँ आगन्तुक हैं । उपलब्धिस्वरूप आत्मा सर्वत्र अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान रहता है । सुषुप्तिमें भी कुछ नहीं देखा, इस प्रकार सर्वाभावकी उपलब्धि होती ही है । जागरादिमें भी प्रमाता स्वत: सिद्ध होता है । वही स्वयं प्रमाणद्वारा प्रमेयोंको जानता है । प्रमाताका भी भासक अखण्डबोध आत्मा स्वतःसिद्ध है । लोह-जल आदिमें दाहकत्व- प्रकाशकत्व लानेके लिये अग्निकी अपेक्षा होती है, किंतु अग्निमें दाहकत्व - प्रकाशकत्व लानेके लिये अन्य अग्नि आदिकी अपेक्षा नहीं होती । वही स्वत:सिद्ध संवित् आत्मा । वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाण है, वृत्तिमदन्तःकरण प्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाता है । प्रमेयप्रकाशकालमें वे दोनों ही प्रकाशित रहते हैं । उनका प्रकाशक कोई अन्य प्रमाता या प्रमाणान्तर माननेमें अनवस्था आदि दोष आते हैं, अतः स्वयंज्योतिः आत्माको ही तीनोंका भासक मानना ठीक है । कहा जा सकता है कि ' संवित् या बोध प्रमाणके फलरूपसे ही प्रसिद्ध है, फिर वह नित्य कैसे हो सकता है? ' परंतु यह ठीक नहीं; कारण, वृत्तिप्रतिबिम्बित अवगति ही अनित्या है, वही प्रमा है, वही प्रमाणफल है, बिम्बभूत अवगति नित्य ही है । यदि अवगति नित्य है, तब तो प्रमाण- व्यापार व्यर्थ होगा और अनित्य है तो प्रमाण - व्यापार आवश्यक होगा, परंतु प्रमाताकी अवगति तो प्रमाण-निरपेक्ष स्वतःसिद्ध है ही । यदि प्रमाताको आत्मसिद्धिमें प्रमाणकी अपेक्षा हो तो किसे प्रमित्सा होगी, यह भी विचारणीय है । जिसे प्रमित्सा होती है, वही प्रमाता होता है । प्रमित्सा प्रमेयविषयक ही होती है, प्रमातृविषया नहीं । प्रमातृविषयक प्रमित्सा होनेसे अनवस्था -दोष भी होता है । प्रमाताकी प्रमित्सा अव्यवहित होनेसे प्रमातृविषया नहीं हो सकती । लोकमें
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९३८ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रमाताकी इच्छा, स्मृति, प्रयत्न एवं प्रमाणजन्यके अनन्तर प्रमेय सिद्ध होता है । प्रमेय -विषया- अवगति अभीष्ट होती है । स्वयं प्रमाता अपनेसे या अन्य इच्छादिसे व्यवहित नहीं हो सकता । स्मृति भी स्मर्तव्यविषया होती है, स्मर्तृविषया स्मृति नहीं होती । इसी तरह इच्छा भी इष्टविषया होती है, इच्छावद्विषया इच्छा नहीं होती । यदि स्मृति एवं इच्छा स्मर्ता एवं इच्छावान्को विषय करें, तब इसमें भी अनवस्था दोष आयेगा । स्मृति, इच्छा, प्रयत्न एवं प्रमाण जन्मके अनन्तर ही स्मर्तव्य, इष्यमाण, प्रयतितव्य एवं प्रमेयका व्यवहार हो सकता है । कहा जा सकता है कि ' प्रमातृविषयक अवगति -उपपत्ति उपपन्न न होनेसे आत्मा अनवगत ही रहेगा', परंतु यह कहना ठीक नहीं । अवगन्ताकी अवगति अवगन्तव्यविषयक होती है, अवगन्तृविषयक अवगति नहीं होती । यदि ऐसा होगा तो अनवस्था -प्रसंग होगा । आत्माकी अवगति स्वरूपभूत ही है अर्थात् अवगन्ताकी अवगति उत्पन्न नहीं होती । अग्निकी उष्णता और प्रकाशके तुल्य ही आत्माका स्वभाव ही अवगति है । ' अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः ' ' आत्मैवास्य ज्योतिः ' ' एषोऽस्य परमो लोकः ' 'न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ' ( बृहदा० उप० ४।३।३० ) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माकी स्वरूपभूत ज्योति है । चैतन्यात्मज्योतिकी अवगति अनित्य है ही नहीं । असंहत, स्वप्रकाश एवं अपरार्थ ही आत्मा है । यदि आत्माकी अवगति अनित्य होगी तो उत्पत्तिसे प्रथम एवं प्रध्वंससे ऊर्ध्व उसका अभाव कहना पड़ेगा । फिर आत्माकी अपरार्थता आदि सभी बाधित होंगे । अवगति प्रमा है, वह स्मृति- इच्छादिपूर्विका अनित्या है, आत्मा स्वरूपभूत नित्य है । जैसे तिष्ठति शब्द अचलत्व- अर्थमें प्रयुक्त होता है, जंगम पदार्थ गतिपूर्वक अचल होते हैं; आकाश - पर्वतादि स्थावर पदार्थ सदा ही अचल रहते हैं, दोनोंमें ही तिष्ठति शब्दका प्रयोग होता है । ' तिष्ठन्ति मनुष्याः, तिष्ठन्ति पर्वताः, तिष्ठत्याकाशः ' उसी तरह अनित्य अवगति एवं नित्य आत्मस्वरूप-अवगतिमें भी प्रमात्व- व्यवहार बन जाता है । फलस्वरूप प्रमामें कोई अन्तर नहीं । प्रमाण फल ही प्रमा है । वह प्रमातृगतचित्स्वरूप प्रकाश ही