मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 971–980

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980

पृष्ठ 971

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मार्क्स और आत्मा ९६ ९ अतिक्रमण किये बिना काल विशेषमें स्थिति होती है । स्थिति शब्दसे स्वार्थमें ही तल प्रत्यय होनेसे स्थिति अर्थमें स्थितिताका प्रयोग है । धर्मनियामकता कारणता है । धर्म अर्थात् कारण कार्यके प्रति नियामक है । यदि कहा जाय कि इस प्रकारका कार्यकारणभाव बिना चेतनके नहीं हो सकता है, तो इसका समाधान है कि ' प्रतीत्य समुत्पादानुलोकता कारणे सति तत्प्रतीत्य प्राप्य समुत्पादानुलोमता प्रतीत्य समुत्पादानुसारिता या सैव धर्मता सा चोत्पादा सा नु व्यादात्मा धर्माणां स्थिता । न चेतनः कश्चिदुपलभ्यते । ' अर्थात् कारणके रहनेपर कारणको प्राप्त करके कार्य समुत्पादका अनुसरण करनेवाली धर्मता होती है । अन्वय- व्यतिरेकानुसारिणी कारण एवं कार्यमें स्थित है । यह प्रतीत्य समुत्पाद दो कारणोंसे सिद्ध होता है । हेतूपनिबन्धसे तथा प्रत्ययोपनिबन्धसे । एक मुख्य कारणसे सम्बन्धित हेतूपनिबन्ध होता है, अनेक सहकारी कारणोंसे सम्बन्धित प्रत्ययसमवाय सम्बन्धित प्रत्ययोपनिबन्ध है । उनके भी दो भेद हैं । ( १ ) बाह्य और ( २ ) आध्यात्मिक | ( १ ) बाह्य-– बीजसे अंकुर, अंकुरसे पत्र, पत्रसे काण्ड, काण्डसे नाल, नालसे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकसे पुष्प और पुष्पसे फल होता है । इसमें बीजको ज्ञान नहीं होता कि मैं अंकुरको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी तरह अंकुर पत्र और पुष्प आदिको भी ज्ञान नहीं होता कि मैं अपनेसे पश्चात् उत्पन्न होनेवालोंको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी प्रकार अंकुर - पुष्प-फलादिको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे बीजने उत्पन्न किया है । यह बाह्य हेतूपनिबन्धका उदाहरण है । छः धातुओंके समवायसे ही बीजसे अंकुर हो सकता है, अन्यथा नहीं । इसमें पृथिवी धातु बीजका संग्रह करती है । जिससे अंकुर कठिन हो जाता है, जलधातु स्नेह एवं तेजधातु परिपाक करता है । वायुधातु बीजसे अंकुरको ऊपर फेंकता है और आकाश धातु बीजका अवयव अलग करता है । ऋतु भी बीजका परिपाक करता है । अविकल छः धातुओंके समुदायसे ही बीज अंकुररूपमें परिणत होता है । इनमें न तो

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९७० मार्क्सवाद और रामराज्य पृथिवी धातुको यह ज्ञान रहता है कि हमने बीजका संग्रह -कृत्य किया है और न तो ऋतुको ही ज्ञान होता है कि हमने बीजका परिणाम किया है । साथ ही अंकुरको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे इन धातुओंने बनाया है । यह बाह्य प्रत्ययोपनिबन्धका उदाहरण है । ( २ ) आध्यात्मिक — इसी तरह अविद्यासे संस्कार, संस्कारसे जन्म तथा जन्मसे जरा और मृत्यु होती है । अविद्याको ज्ञान नहीं होता कि मैंने संस्कारको बनाया है और न संस्कारको ही ज्ञान होता है कि मुझे अविद्याने बनाया है । यह आध्यात्मिक हेतूपनिबन्धका उदाहरण है । इसी तरह पृथिवीसे तेज, वायु, आकाश और विज्ञानधातुओंके समवायसे शरीर बनता है । पृथिवी धातुसे शरीरकी कठिनता और जलसे शरीरका स्नेह होता है । तेजधातु भुक्त- पीतका परिपाक करता है, वायुधातु श्वास-प्रश्वासादि करता है, आकाश शरीरके भीतर अवकाश प्रदान करता है । विज्ञानधातु पंचज्ञानेन्द्रिययुक्त मनोविज्ञानको उत्पन्न करता है । यह आध्यात्मिक प्रत्ययोपनिबन्धका उदाहरण है । इन छः धातुओंकी जो पिण्ड-संज्ञा, पुद्गल-संज्ञा ( परमाणुसंज्ञा ) मनुष्य -संज्ञा, अहंकार- संज्ञा, ममकार संज्ञा यह अविद्या है । यही अविद्या संसारका ( अनर्थ सामग्रीका) मूल कारण है । अविद्याजन्य राग-द्वेष- मोहात्मक संस्कार विषयोंमें प्रवृत्ति कराते हैं । वस्तु -विषयज्ञान ही विज्ञान है । इन सबको एक प्रकारसे नामरूप कह सकते हैं । शरीरकी कलल बुदबुद आदि अवस्था और नामरूप मिश्रित इन्द्रियाँ षडायतन कही जाती हैं । नामरूप इन्द्रियोंका सम्बन्ध ही स्पर्श है । स्पर्शसे सुख-दुःखादि वेदना होती है । वेदनाके अनन्तर मुझे सुखप्राप्तिके लिये यह कार्य फिर करना चाहिये, ऐसा निश्चय तृष्णा है । उसमें वाणी शरीरकी चेष्टा है, उसका नाम उपादान है । उसमें धर्माधर्म होते हैं । उसका नाम भव है, उसीसे जन्म होता है । जन्मसे ही जरा - मृत्यु होती है, उससे अन्तर्दाह शोक होता है, शोकसे विलाप, दुःख और दौर्मनस्य होता है । यह परस्परहेतुक अविद्यादि सार्वजनिक अनुभवसिद्ध हैं । इनका अपलाप नहीं किया जा सकता । ये जन्मादिहेतुक

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मार्क्स और आत्मा ९७१ अविद्यादि और अविद्यादिहेतुक जन्मादि चक्र घटीयन्त्रके समान निरन्तर चलता रहता है तथा यह सार्वजनिक अनुभवसिद्ध है । अतः इनका अपलाप भी नहीं हो सकता; क्योंकि इनसे संघातका अर्थतः आक्षेप हो जायगा । इस तरह बौद्धमतके अनुसार कोई अनुपपत्ति नहीं, परंतु बौद्धोंका यह कथन भी ठीक नहीं, कारण प्रत्ययोपनिबन्धमें नाना कारणोंका समवधान आवश्यक है । बिना किसी चेतनके अनेक कारणोंका एकत्र होना नहीं बन सकता । यदि कहा जाय अन्त्यक्षणप्राप्त क्षित्यादि अंकुरका उत्पादन करते हैं, उनका उपसर्पण स्वभाव है, इसलिये समवधान भी हो जायगा तो फिर किसानको कृषि करनेकी क्या आवश्यकता है? भण्डारमें रखे बीज अंकुरित हो जायँगे और सारा कार्य बिना चेतनका ही हो जायगा, किंतु ऐसा होता नहीं । इसलिये बिना कर्ताके संघातका बनना असम्भव है । जो कहते हैं कि अविद्यासे संघातका अर्थात् आक्षेप हो जायगा, इसका क्या तात्पर्य है? यदि यह तात्पर्य है कि अविद्यादि बिना संघात टिक नहीं सकते - इसलिये उन्हें संघातकी अपेक्षा है; फिर तो संघातका निमित्त बतलाना चाहिये । यदि यह अभिप्राय हो कि अविद्यादि ही संघातके निमित्त हो जायँगे तो संघातके ही सहारे टिकनेवाले संघातके निमित कैसे होंगे । यदि ऐसा माना जाय कि संसारमें प्रवाहरूपसे संघात चले आ रहे हैं और उनके सहारे ही अविद्यादि रहते हैं, तो फिर यह प्रश्न होगा कि एक संघातसे जो दूसरा संघात उत्पन्न होता है, वह नियमतः उसके सदृश ही होता है अथवा अनियमित विसदृश? यदि नियमतः सदृश होता है और मनुष्यपुद्गल ( मनुष्यपरमाणु) कभी देवयोनि या तिर्यग्योनि नहीं बन सकती, यदि नियम नहीं है तो मनुष्यपुद्गल कभी क्षणमें हाथी बनकर क्षणमें सिंह और क्षणमें पुनः देवता एवं क्षणमें फिर मनुष्य बन सकता है, परंतु ऐसा नहीं होता - यह दोनों ही प्रकार लोकसिद्ध न्याय- विरुद्ध है ।

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९७२ मार्क्सवाद और रामराज्य दूसरी बात यह है कि सुगत सिद्धान्तमें संघातका भोक्ता स्थिरजीव तो कोई होता नहीं, फिर तो भोग भोगके लिये, मोक्ष मोक्षके लिये होगा । किसी दूसरे पुरुषसे प्रार्थनीय पुरुषार्थ नहीं होगा । यदि भोग और मोक्ष दूसरेसे प्रार्थनीय माने जायँ तो भोग-मोक्षकालमें उनकी स्थिति रहनी चाहिये । फिर तो क्षण- भंगुवादका सिद्धान्त ही भंग हो जायगा । अतः अविद्यामें भले ही परस्पर कार्य- कारणभाव हों, परंतु उनसे संघातसिद्धि नहीं हो सकती । सार यह है कि भले ही हेतूपनिबद्ध कार्य अन्यान्यपेक्ष केवल मुख्य हेतुके अधीन उत्पन्न होनेवाला होनेसे कथंचित् उत्पन्न हो जाय ( यद्यपि चेतनाधिष्ठित ही बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है, जैसे कुलालाधिष्ठित मृत्तिकासे घट) फिर भी पंचस्कन्धसमुदाय तो प्रत्ययोपनिबद्ध है, वह एक हेतुमात्र अधीन उत्पन्न नहीं होता है, किंतु उसमें नाना हेतुओंका समवधान अपेक्षित होता है । चेतनके बिना नाना हेतुओंका एकत्रीकरण नहीं हो सकता । बीजसे अंकुरोत्पत्ति भी धरणी- अनिल-जलादि सहकारी सापेक्ष होनेसे प्रत्ययोपनिबद्ध ही है, अतः वह पक्ष कुक्षिमें निक्षिप्त है । इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि चेतनानधिष्ठित बीजसे अंकुरोत्पत्तिके समान चेतनानधिष्ठित अचेतन अविद्या आदिसे उत्तरोत्तर कार्य उत्पन्न होंगे; क्योंकि बीजसे अंकुरोत्पत्ति भी पक्षकोटिमें ही है । वहाँ भी चेतनानधिष्ठितत्व सिषाधयिषित है, वह दृष्टान्त नहीं हो सकता । कुम्भकाराधिष्ठित मृत्तिकासे घटोत्पत्ति होती है, यह दृष्टान्त निर्विवाद तथा वादि-प्रतिवादि उभयसम्मत है, परंतु चेतनानधिष्ठित बीजसे अंकुरकी उत्पत्ति तो विवादास्पद एवं संदिग्ध है । इसीलिये वह संदिग्ध साध्यवान् होनेसे पक्ष है, दृष्टान्त नहीं हो सकता । यदि पक्षको लेकर व्यभिचारका उद्भावन किया जाय तो अनुमानका उच्छेद हो जायगा । ऐसी स्थितिमें पर्वत पक्षमें ही धूमका वह्नि व्यभिचार दिखाया जा सकता है । इस तरह अधिष्ठातारूप अर्थात् अनेक कारणोंके संनिधायक रूपसे एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् चेतन कारणका

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मार्क्स और आत्मा ९७३ मानना बौद्धोंके लिये अनिवार्य होगा । यद्यपि बौद्ध कहते हैं कि अनपेक्षित बीज एवं क्षित्यादि अन्त्यक्षणको प्राप्त होकर अंकुरका आरम्भ करते हैं । उपसर्पण प्रत्ययवशसे परस्पर समवधान होता है । यह नहीं कहा जा सकता कि एक ही कारणसे कार्यसिद्धि हो सकती है । यदि एक कारणसे कार्यसिद्धि हो जाय तो अन्य कारणोंकी अपेक्षा ही क्या रह जायगी । अतः करणचक्रके अनन्तर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है । अतः एक कारण कार्योत्पत्तिका साधक नहीं । जडकारण स्वयं प्रेक्षावान् नहीं होते, अतः वे यह नहीं सोच सकते कि हममेंसे एक भी कार्य सम्पन्न कर सकता है, फिर हम सबके सन्निधानसे क्या लाभ, किंतु उपसर्पण प्रत्ययवशात् उनमें परस्पर सन्निधान उत्पन्न होता है । वे न तो असन्निहित रह सकते, न अनुत्पादक रह सकते हैं । उन अनपेक्ष कारणोंको प्राप्त करके कार्य भी न उत्पन्न होनेमें असमर्थ ही रहता है । स्वमहिमासे सब कारण कार्योंका उत्पादन करते हुए भी नाना कार्योंका उत्पादन नहीं कर सकते । एक ही कार्यकी उत्पत्तिमें उनका सामर्थ्य होता है । बीजके द्वारा अंकुरजननमें ही मृत्तिका जलादिकी सहकारिता होती है । अतः उनके द्वारा भी उस अंकुरकी ही उत्पत्ति होती है । कारणभेदसे कार्यभेद आवश्यक नहीं; क्योंकि सामग्री एक होनेसे ही कार्य एक होता है । परंतु बौद्धोंका यह कथन असंगत है; क्योंकि यदि अन्त्यक्षणप्राप्त कारण स्वयं कार्यजननमें अनपेक्ष ही रहते हैं, अर्थात् किसीकी अपेक्षा नहीं रखते हैं तो इसी क्रमसे पूर्व - पूर्वके कारण भी स्वकर्मजननमें अनपेक्ष ही रहेंगे । कुसूलमें अंकुरजननोपयोगी बीजसंताननिर्वर्तक बीजक्षण और भक्षणादि उपयोगी बीजक्षण भी है । यद्यपि इस सम्बन्धमें यह विरोधी अनुमान नहीं किया जा सकता है कि कुसूलगत विगतबीजक्षण ( अर्थात् अंकुरोपजननोपयोगी बीज - संताननिर्वर्तकबीजक्षण ) अनपेक्ष होकर बीजक्षणका जनन नहीं करता । कुसूलस्थ होनेके कारण ' जैसे तत्कालोद्धृतभक्षित बीजक्षण अनपेक्ष होकर बीजक्षण नहीं जनन करता है, ' परंतु इस अनुमानमें

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९७४ मार्क्सवाद और रामराज्य अंकुरोपयोगि संतानानन्तः पातित्व उपाधि है । अनपेक्ष बीजक्षणाजनकत्वरूप साध्य तत्काल भक्षित बीजक्षणमें है । उसमें अंकुरोपयोगि सन्तानानन्तः पातित्व है, कुसूलस्थत्वरूप साधन अंकुरोपयोगि संताननिर्वर्तक बीजक्षणमें है, परंतु वहाँ उपाधि नहीं है, अपितु अंकुरोत्पादनोपयोगि संतानानन्तःपातित्व ही है । अतः कुसूलस्थताकी समानता होनेपर भी जिस कुसूलस्थ बीजको स्वकार्यक्षण परम्परासे अंकुरोत्पत्ति समर्थ बीजक्षण जनन करता है, वह बीजक्षण स्वकार्यजननमें अनपेक्ष ही रहेगा । फिर इसी तरह तदनन्तरानन्तरवर्ती सभी बीजक्षण अनपेक्ष ही रहेंगे, फिर तो कुसूलनिहित बीजोंसे ही किसान कृतकार्य हो जायगा, पुनः दुःखबहुल कृषिकार्य करनेकी उसे क्या आवश्यकता? क्योंकि जिस बीजक्षणको स्वक्षण परम्परासे अंकुर उत्पन्न करता है, उसकी क्षण- परम्परा अनपेक्ष कुसूलमें ही अंकुरादि सम्पादन कर देगी, जब यह सर्वथा निरपेक्ष है तो उसे देशकालकी अपेक्षा ही क्यों होगी? इसीलिये यह मानना आवश्यक है कि- अन्त्य मध्य या पूर्व क्षण स्वकार्यजननमें परस्पर सापेक्ष ही रहते हैं । तदर्थ कारणोंका समवधान (एकत्रीकरण ) आवश्यक है । वह प्रेक्षावान् चेतन ही हो सकता है । बौद्ध कहता है कि अविद्यादिके द्वारा ही संघातका आक्षेप होगा । यहाँपर उससे प्रश्न होता है कि आक्षेपका क्या अर्थ है? उत्पादन या ज्ञापन! पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि कारण स्वयं अनुपपन्न होकर कार्यका उत्पादन नहीं कर सकता, किंतु वह स्वसामर्थ्यसे ही कार्यका जनन करता है, अतः दूसरा ही पक्ष कहना पड़ेगा कि कारण संघातका आक्षेप करते हैं अर्थात् ज्ञापन करते हैं । तथा च ज्ञापित संघातका उत्पादक तो अन्य ही होना चाहिये । ज्ञापक ही उत्पादक नहीं होता । यदि वैशेषिकोंके स्थिर पक्षमें स्थिर भोक्ता आत्माके रहनेपर भी अधिष्ठाता चेतनके बिना संघातोत्पादन नहीं हो सकता तो फिर क्षणिकवादमें संघात कैसे बन सकेगा? भोक्ताका भोग भी कभी संघातका कल्पक हो सकता है, परंतु क्षणिक विज्ञान आदि तो भोक्ता

पृष्ठ 977

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मार्क्स और आत्मा ९७५ भी नहीं हो सकते । प्रत्ययोपनिबन्ध - पक्षमें अनेक कारण- उपकार्योपकारक भावसे अवस्थित होकर ही कार्यजनन करेंगे, यह बौद्धोंको मानना पड़ेगा, परंतु क्षणिक पक्षमें उपकार्योपकारकभाव हो ही नहीं सकता । कारण इस पक्षमें कोई स्थिर भाव मान्य नहीं है, जो उपकारका आस्पद बने । क्षण इतना सूक्ष्म एवं अभेद्य होता है कि क्षणिक पदार्थमें उपकारकता या उपकार्यता कुछ बन ही नहीं सकती । यदि कालभेद मानकर उपकार्योपकारकभावका उपपादन किया जाय तो अनेक कालावस्थायी होनेसे फिर वही क्षणभंगु - भंग होगा । बौद्ध कहते हैं कि यदि प्रत्ययोपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पाद माना जाय तो भले ही अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा हो; परंतु हेतूपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पादमें तो अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है । तथा च अविद्यादि ही संघातके निमित्त होंगे । हेतुस्वभावसे ही कार्य -सम्पादन कर देंगे । परंतु उनका यह भी कथन विचारसह नहीं है; क्योंकि संघातके ही आधारपर सिद्ध होनेवाले अविद्यादि उसी संघातके निमित्त कैसे बन सकेंगे? इसके अतिरिक्त हेतूपनिबन्ध कार्यमें भी चेतनाधिष्ठित ही अचेतन कारण कार्योत्पादक होता है । यह घटोत्पत्तिके उदाहरणसे कहा जा चुका है । बौद्ध कहता है कि प्रत्ययोपनिबन्ध पक्षमें अस्थिरके भाव सदा संहत ही उत्पन्न होते हैं, संहत ही नष्ट होते हैं, यह नहीं कि वे इतस्ततः बिखरे रहते हैं और किसीके द्वारा संहत किये जाते हैं । इस प्रकार समवघाटकचेतन अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है, परंतु उसका यह भी कथन युक्तिसह नहीं है, अतः यहाँ भी प्रश्न होता है कि- संघात संतानमें रहनेवाले धर्माधर्मरूपी संस्कार संतान सुख-दुःखको पैदा करते हुए किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करके सुख-दुःख पैदा करेंगे या निरपेक्ष ही । यदि आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा बिना किये ही सुख- दुःख पैदा करें

पृष्ठ 978

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९७६ मार्क्सवाद और रामराज्य तो सदा ही उन्हें सुख-दुःख जनन करना चाहिये; क्योंकि जो समर्थ एवं निरपेक्ष है, उसके कार्यजननमें विलम्ब क्यों होगा । यदि किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करेगा, तब तो आगन्तुक हेतुका उपस्थापक कोई प्रज्ञावान् चेतन मानना आवश्यक हो जायगा । साथ ही यदि संघातके सदृश ही संघातान्तर उत्पन्न होंगे तो सदा ही मनुष्य- संघात मनुष्य- संघात ही होगा । फिर कर्मानुसार अनेक योनियोंमें जन्म लेनेकी बात खण्डित होगी । यदि विसदृश संघातकी उत्पत्ति मान्य होगी तो क्षणमें हस्ती, क्षणमें अश्व होना चाहिये । इत्यादि दोष अनिवार्य होंगे । अविद्यादि उत्पत्तिके निमित्त भी नहीं बन सकते हैं; क्योंकि क्षणभंगुवादमें उत्तर क्षणके उत्पद्यमान होनेपर पूर्व-क्षण नष्ट हो जाता है । वैशेषिक तो विनाश कारणके सन्निधानसे विनाश मानता है । इसके विपरीत बौद्ध अकारण ही विनाश मानता है । इस स्थितिमें - पूर्वोत्तर क्षणका कार्यभाव कारण कथमपि नहीं बन सकता; क्योंकि विरुध्यमान या विरुद्ध पूर्वक्षण स्वयं अभावग्रस्त होगा । अतः वह उत्तर क्षणका हेतु नहीं हो सकता । कार्योत्पादके प्राक्कालमें कारणकी सत्ता सार्थक होती है । कार्यकालमें कारणकी सत्ताका कोई उपयोग नहीं होता; क्योंकि कार्यकालमें तो कार्य निष्पन्न ही होता है । भावभूत पूर्वक्षण उत्तर क्षणका हेतु हो तब तो क्षणद्वयसम्बन्ध होनेसे क्षणिकता ही न रहेगी । लोकमें कोई भी भाव सत्तावान् होकर पुनः व्यापृत होकर कार्य- सम्पादन करता है । इससे अनेक क्षण सम्बन्ध होनेसे स्थिरता ही सिद्ध होती है । बौद्ध कहता है कि- भाव ही उसका व्यापार है, जैसा कि कहा है कि- भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैष चोच्यते । ' अर्थात् पदार्थोंकी जो उत्पत्ति होती है, वही उनकी क्रिया, कारक तथा कारण है, परंतु पदार्थोंमें इस प्रकारकी व्यापारवत्ता भले ही बन जाय तथापि वह कारण नहीं हो सकता; क्योंकि लोकमें देखा जाता है कि मृत्तिकाकार्य घटादि मृत्तिकासे एवं सुवर्णका कार्य कटक- कुण्डलादि सुवर्णसे समन्वित होते हैं । यदि कार्यके समय कारण न रहे तो कार्यमें

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मार्क्स और आत्मा ९७७ मृत्तिका सुवर्णादिकी प्रतीति कैसे बन सकती है? यदि कार्य-क्षणमें कारणकी सत्ता मानी जाती है तो भी क्षणिकत्वकी हानि होगी । ' बौद्ध कहते हैं कि कार्यमें कारणका तादात्म्य नहीं होता, किंतु सादृश्य होता है, परंतु कार्यमें जब कारणके किसी रूपका अनुगम हो, तभी सादृश्य भी हो सकता है । यदि किसी अनुगमका रूप मान लिया जाय, तब तो वही अनुगत रूप ही कारण है, फिर तो उसके साथ कार्यका तादात्म्य ( अभेद ) मानना ही ठीक है । ऐसी स्थितिमें भी क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य ही है । यदि हेतुस्वभावका कार्यमें अनुगमन होनेपर भी कार्यकारणभाव स्वीकार किया जायगा, तब सर्वत्र कार्यकारणभाव ही प्रसक्त रहेगा, फिर तन्तु -घटका भी कार्यक्षणभाव मानना पड़ेगा । बौद्धोंके सिद्धान्तमें ‘ तद्भावे तद्भावः ' आदि अन्वय - व्यतिरेकद्वारा कार्यकारण भावका नियम माना जाता है । तथा च तन्तु- घटका कार्य- कारणभाव नहीं होगा; क्योंकि उनका अन्वय- व्यतिरेक नहीं है । किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अन्वय- व्यतिरेक ग्रह एकक्षणमें नहीं हो सकता, उसके लिये वस्तुको अनेक क्षणस्थायी मानना पड़ेगा । यदि कार्य- कारण संतानों या सामान्योंका कार्यकारणभाव मानें और उन संतानोंको स्थायी मानें तो यह भी ठीक नहीं । कारण- व्यक्तियोंमें ही कार्य-कारणभाव होता है, संतानों या सामान्योंमें नहीं । यदि उनमें भी कार्य -कारणभाव माना जाय और उन कारणभूत संतानों या सामान्योंको स्थायी माना जाय तो भी क्षणिकत्वकी हानि हुई ही । बौद्धोंसे यह भी प्रश्न होता है कि उत्पाद और विनाश वस्तुस्वरूप ही हैं या वस्तुके अस्वान्तर अथवा वस्तुसे भिन्न वस्त्वन्तर हैं? यदि वस्तुके स्वरूप ही हैं तो वस्तु और उत्पाद- विनाश परस्पर पर्याय हो जायँगे । यह लोकविरुद्ध है । उत्पाद- विनाश और वस्तुको कोई पर्यायवाचक नहीं मानता । यदि कोई विशेषता वस्तुकी अपेक्षा उत्पादनिरोधमें है, तब तो कहना पड़ेगा कि मध्यवर्त्ति वस्तुकी उत्पाद और निरोध आदिम एवं

पृष्ठ 980

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९७८ मार्क्सवाद और रामराज्य अन्तिम अवस्था है । तब फिर आद्य, मध्य तथा अन्त्यक्षण सम्बन्धी होनेके कारण वस्तुमें स्थिरता हो जायगी, फिर क्षणिकत्व समाप्त हो जायगा । यदि उत्पाद - निरोध— अश्वमहिषके तुल्य वस्तुसे अत्यन्त भिन्न माने जायँ तो वस्तुके उत्पाद-विनाशसे रहित होनेके कारण उसकी शाश्वतता सिद्ध हो जायगी । यदि वस्तुका दर्शन उत्पाद एवं वस्तुका अदर्शन विरोध माना जाय तो भी दर्शनादर्शन तो पुरुषके धर्म होंगे, वस्तुधर्म नहीं, इस प्रकार भी वस्तु तो शाश्वत ही ठहरेगी, इस प्रकार विवेचन करनेपर क्षणिकत्ववादमें अविद्यादि हेतूपनिबन्धदृष्टिसे भी उत्पत्ति-निमित्त नहीं हो सकते । यदि बिना हेतुके ही कार्योत्पत्ति मानी जाय तो बौद्धकी प्रतिज्ञा– हानि होगी; क्योंकि— ' चतुर्विधान् हेतून् प्रतीत्य चित्तचैत्ता उत्पद्यन्ते ' अर्थात् चतुर्विध हेतुओंको प्राप्त करके चित्त चैत्त उत्पन्न होते हैं । नीलाभास चित्तमें नीलालम्बन- प्रत्ययसे नीलाकारता समनन्तर- प्रत्ययरूप पूर्व विज्ञानसे बोधरूपता, चक्षुरूप अधिपतिप्रत्ययसे रूपग्रहणका नियम और आलोकरूप सहकारी प्रत्ययसे स्पष्टार्थता होती है । चित्त-चैत्तोंकी उत्पत्तिमें इस प्रकार चतुर्विध हेतुओंकी प्राप्ति मानी जाती है । सुखादि चैत्तोंमें भी इसी प्रकारका कार्यकारणभाव माना जाना चाहिये, परंतु वहाँ विज्ञानसे अतिरिक्त दूसरे अन्य तीन कारणोंकी सिद्धि नहीं होती । यदि निर्हेतुक उत्पत्ति मानी जायगी, तब तो कोई प्रतिबन्ध न होनेके कारण सभी वस्तु सर्वत्र उत्पन्न होती रहेगी । बौद्ध यह भी कहते हैं कि उत्तरक्षणकी उत्पत्तितक पूर्वक्षण अवस्थित रहता है । पर ऐसा माननेसे हेतुफल दोनोंका यौगपद्य ( समकालत्व ) होगा । उत्पत्ति उत्पद्यमानसे अभिन्न होती है तथा च एक क्षण दूसरे क्षणतक रह गया, फिर तो क्षणिक कैसे? ऐसी स्थितिमें सभी पदार्थ संस्कृत एवं क्षणिक हैं यह बौद्धोंकी प्रतिज्ञा भंग हो जायगी । बौद्ध यह भी कहते हैं कि प्रतिसंख्यानिरोध, अप्रतिसंख्यानिरोध और आकाश- इन तीनोंसे अन्य जो कुछ भी है, वह सब बुद्धि बौद्ध है, संस्कृत है,