मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 981–990

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990

पृष्ठ 981

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मार्क्स और आत्मा ९७९ क्षणिक है । यह तीनों अवस्तु स्वभाव ( निरुपाख्य) है । बुद्धिपूर्वक भावोंका विनाश प्रतिसंख्या निरोध तद्विपरीत अप्रतिसंख्यानिरोध होता है एवं आवरणभावमात्र आकाश है । आकाशपर विचार आगे किया जायगा । ये दोनों निरोध सर्वथा असम्भव हैं । यहाँ प्रश्न उठता है कि ये दोनों निरोध संतानके होंगे या भावरूप संतानोंके? पहला पक्ष ठीक नहीं । कारण, सभी संतानोंमें संतानियोंका अविच्छिन्न कार्यकारणभाव विद्यमान ही है, फिर संतानविच्छेद कैसे होगा? दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि किसी भी भावका निरन्वय नाश नहीं होता, सभी अवस्थाओंमें प्रत्यभिज्ञाबलसे अन्वयीकारणका अविच्छेद ही रहता है । घट, कपाल, कपालिका, चूर्ण, रज आदि सर्वत्र मूल कारण मृत्तिका अन्वित ही रहती है । जहाँ अन्वयीकी पहचान नहीं होती, वहाँ भी अन्यत्रकी तरह अनुमान किया जा सकता है । अतः दोनों ही निरोध असम्भव है । अभिप्राय यह है कि भावप्रतीपा ' वाधिका ' बुद्धि प्रतिसंख्या कहलाती है, उसके द्वारा निरोध ही प्रतिसंख्यानिरोध है । सत्को असत् बनानेकी बुद्धि ही भावप्रतीप बुद्धि है । तत्कृतनिरोध प्रतिसंख्यानिरोध है । उससे भिन्न निरोधको अप्रतिसंख्यानिरोध कहते हैं, परंतु यहाँ विचार यह करना है कि यह निरोध संतानका होगा या संतानीक्षणका । संताननिरोध तो हो नहीं सकता; क्योंकि हेतुफलभावसे व्यवस्थित संतानी ही उपकव्यय धर्मवाले होते हैं, संतान नहीं । अतः उसका निरोध असम्भव है । अन्तिम संतानीके निरोधसे ही संताननिरोध हो सकता है । पर क्या वह अन्तिम संतानी किसी कार्यका आरम्भ करता है या नहीं । यदि आरम्भ करता है तो उसमें अन्तिमत्व ही कहाँ रहा? तथा च संतान-विच्छेद भी नहीं हुआ, यदि वह कार्यका आरम्भक नहीं होता, तब वह अन्त्य तो हो सकता है, परंतु वह तो अर्थ- क्रियाकारितारहित होनेसे असत् ही ठहरेगा । अर्थ- क्रियाकारिता ही बौद्धोंकी सत्ता है । इस तरह जब कार्यानारम्भक अन्त्यक्षण अर्थक्रियाशून्य होनेसे असत् है, तब उसका जनक भी असत्का जनक होनेसे असत् ही होगा । इसी

पृष्ठ 982

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९८० मार्क्सवाद और रामराज्य क्रमसे सभी संतानी और संतान असत् ही ठहरेंगे, ऐसी स्थितिमें प्रति संख्यासे किसका विनाश होगा? बौद्ध कहते हैं कि सजातीय संतानियोंका कार्यकारण भाव ही संतान है, केवल कार्यकारण भाव ही संतान नहीं, तथा च विशुद्ध जातीयक्षण ( यहाँ क्षय शब्दका क्षणवर्ती पदार्थरूप अर्थ विवक्षित है ) - की उत्पत्ति होनेपर सजातीय हेतुक्षणभावकी निवृत्ति हो जाती है । इस तरह सजातीय कार्यानारम्भक होनेसे संतानका अन्तिम क्षण अन्त्य भी है । विशुद्ध विजातीय क्षणका आरम्भक होने तथा अर्थक्रियाशून्य न होनेसे असत् भी नहीं हुआ, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि इस तरह तो रूपविज्ञानके प्रवाहमें रसादिविज्ञानकी उत्पत्तिसे भी संतानोच्छेद समझा जायगा । कारण कि यहाँ भी विजातीय क्षणका आरम्भ हुआ है । यदि कहा जाय कि रूपविज्ञान रसविज्ञानका सजातीय ही है तो विजातीयोंमें भी कुछ-कुछ सारूप्य रहता ही है । अन्ततः सत्तारूपसे तो साजात्य रहेगा ही, जिससे कहीं भी संतानोच्छेद सम्भव नहीं । संतानी ज्ञानोंका सादृश्यतुल्य जातीय विषयत्व ही है । विषयोंकी तुल्यजातीयता क्या रूपत्व आदि अपरजातिसे माना जाय? या सत्ता सामान्यरूप परजातिसे माना जाय? पहली बात ठीक नहीं; क्योंकि संतान अनुवर्तमान रहनेपर भी रूपज्ञान संतानके विरत होनेके पश्चात् रसज्ञान उदित होगा, इसके बाद संतानोच्छेदका प्रसंग होगा । यदि परजातिसे विषयोंकी तुल्यजातीयता मानें तो सोपप्लव संतानके उपरम होने तथा विशुद्ध संतानोदयमें भी संतानोच्छेद नहीं होगा; क्योंकि परजातीयसत्तामात्रको लेकर सोपप्लव ज्ञान संतान और विशुद्ध ज्ञान संतानमें सादृश्य है ही । यदि कहा जाय कि विषय विशेषोपरागकृतसादृश्य नहीं विवक्षित है, अतः रूपज्ञानप्रवाहमें रसज्ञान उत्पत्ति मात्रसे संतानोच्छेदप्रसंग न होगा, सत्तासामान्यकृतसादृश्य भी नहीं विवक्षित है, अतः सोपप्लव चित्तसंतान उपरम होनेपर मुक्तिदशामें निरुपप्लव चित्तसंतानके उदय होनेपर पूर्वसंतानोच्छेदका भी प्रसंग न होगा । किंतु यहाँ विषयोपप्लवकृतसादृश्य ही विवक्षित है । तथा च निरुपप्लवज्ञान संतानोदय होनेपर सजातीय कार्य-

पृष्ठ 983

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मार्क्स और आत्मा ९८१ कारणभावरूप संतानावच्छिन्न हो जाता है । फिर भी निरन्वय नाश कहीं भी सम्भव नहीं है, यह दोष यहाँ भी है ही । क्षणिकवादमें पदार्थ उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाता है, फिर उसका प्रतिसंख्या निरोध क्या होगा? उसमें पुरुष-प्रयत्नकी तो अपेक्षा ही नहीं है । पहले तो उत्पन्न होते ही सर्वपदार्थ ज्ञात नहीं हो जाते हैं । कितने ही पदार्थ तो जीवनभर अज्ञात ही रहते हैं । कितने ही अबतक भी जाने नहीं जा सके हैं । अस्तु, उत्पन्न पदार्थका ज्ञान, फिर उसको नष्ट करनेकी बुद्धि, फिर इच्छा, फिर कृत्तिद्वारा विनाश आदि करनेमें अनेक क्षण आवश्यक होते हैं । तबतक क्षणिक पदार्थ नष्ट ही हो जायगा, पुनः प्रतिसंख्या प्रतिरोध कैसे होगा? साथ ही निरन्वय नाश नहीं होता है । अवश्य ही उसमें कारणांश अन्वित रहता है । अतः निरुपाख्य निरोध नहीं हो सकता । नष्ट पदार्थ भी अन्वयीरूपसे उपाख्येय ही होता है । जो अन्वयीरूप होता है, उसका ही परमार्थ सद्भाव होता है । अवस्थाविशेष ही उत्पन्न-विनष्ट होनेवाली होती है । अवस्थाएँ सभी अनिर्वचनीय हैं; उनका स्वतः परमार्थसत्त्व ही नहीं होता । अन्वयीरूप ही उनका तत्त्व है; क्योंकि वही सर्वत्र प्रत्यभिज्ञात होता है और उसका विनाश नहीं होता । इस तरह अवस्थाओंके भी तत्त्वका अविनाश होनेसे अवस्थाओंका निरन्वय नाश नहीं होता; क्योंकि उनके तत्त्व अन्वयीका सर्वत्र ही अविच्छेद है । घट, कपाल, चूर्ण, रज, सबमें मृत्तिका ही अन्वयी है । कहा जा सकता है कि ' मृत्पिण्डः, मृद्घटः, मृत्कपालः ' आदिरूप पिण्डघटादि मृत्तिकाका अन्वय दृष्ट होता है, अतः घटादिमें मृत्तिकाका अन्वय भले ही माना जाय; किंतु तत्पाषाणतलपर निपतित होकर नष्ट होनेवाले जलबिन्दुका तो कोई भी अन्वयीरूप उपलब्ध नहीं होता है, फिर उसका निरन्वय नाश माननेमें क्या आपत्ति है, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अस्पष्ट प्रत्यभिज्ञा वहाँ भी सम्भव है । अर्थात् वहाँ भी जलबिन्दु तेजके द्वारा बादल बनानेके लिये मार्तण्डमण्डलमें पहुँचा दिया जाता है । मृत्तिकादि अन्वयीका अविच्छेद देखकर ऐसा अनुमान किया

पृष्ठ 984

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९८२ मार्क्सवाद और रामराज्य जा सकता है कि इसी तरह तप्त लौहपिण्ड या अग्निनिक्षिप्त जलबिन्दु भी तेजोभावापन्न होकर मेघादिभावको प्राप्त हो जाता है, इसके अतिरिक्त तोयत्व -जलत्व सामान्य तो बिन्दुके नष्ट होनेपर भी सिन्धुमें अन्वित रहता ही है, फिर निरन्वय नाश कैसे कहा जा सकता है? अतएव वाचस्पतिमिश्रका भामतीमें कहना है कि—

उदबिन्दौ च सिन्धौ च तोयभावो न भिद्यते ।

विनष्टेऽपि ततो बिन्दावस्ति तस्यान्वयोऽम्बुधौ ॥

बौद्ध अविद्यादिनिरोधको प्रतिसंख्यानिरोध मानते हैं, इस सम्बन्धमें प्रश्न होता है कि यह निरोध साधनसहित सम्यग्ज्ञानसे होता है या स्वतः । यदि प्रथम पक्ष मान्य है तो निर्हेतुक विनाश स्वीकारका सिद्धान्त खण्डित हो जाता है । यदि निरोध स्वतः मानें तो क्षणिक नैरात्म्यादि भावनादिरूप मार्गोपदेश, धर्मदर्शनादि प्रवर्तन, साधनाभ्यासादि व्यर्थ ही होंगे । इसी तरह आकाशको भी निरुपाख्य नहीं कहा जा सकता । वेदादिशास्त्रोंसे आकाशकी उत्पत्ति और वस्तुत्व ज्ञात होता है । शब्दगुणके द्वारा उसका अनुमान भी हो सकता है । जैसे गन्धादिगुण पृथिवी आदिके आश्रित रहते हैं, वैसे ही शब्द आकाशके । ' शब्द गुण है, जातिमान् होकर स्पर्शरहित होकर बाह्य एक इन्द्रियसे ग्राह्य होनेके कारण गन्धके समान ' इस अनुमानके आधारपर सिद्ध होता है कि शब्द गुण है । सामान्यविशेषतया समवायमें शब्दका अन्तर्भाव नहीं है; क्योंकि वे जातिहीन होते हैं । किंतु शब्दके शब्दत्व जाति होनेसे वह जातिमान् है । हेतुका वायुमें व्यभिचार नहीं है । वायु स्पर्शवान् है और यह स्पर्शरहित है । हेतुका दिक्काल आदिसे व्यभिचार नहीं है; क्योंकि वह इन्द्रियग्राह्य नहीं है । इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें व्यभिचार नहीं है; क्योंकि हेतुमें एकेन्द्रियग्राह्यत्व विशेषण है, ऐसा हेतु शब्दमें ही है । इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें नहीं, गन्धत्वजातिमें भी व्यभिचार नहीं है, यतः यह जातिमान् है और गन्धत्वादि जातिहीन है । गुणत्वसिद्धिके बाद यह भी विचार ठीक है कि शब्द किस द्रव्यका गुण है । वह आत्माका गुण नहीं हो सकता । कारण बाह्येन्द्रिय ग्राह्य है ।

पृष्ठ 985

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मार्क्स और आत्मा ९८३ आत्मगुण इच्छादि बाह्येन्द्रिय ग्राह्य नहीं होते । वह मनका भी गुण नहीं है; क्योंकि मनके भी गुण प्रत्यक्ष नहीं होते । यद्यपि वेदान्तमतमें सुखादि मनके ही गुण होते हैं, तथापि साक्षिग्राह्य हैं इन्द्रियग्राह्य नहीं । शब्द पृथिव्यादिका भी गुण नहीं है; क्योंकि गन्धादिके साथ शब्द नियत साहचर्य उपलब्ध नहीं होता । गन्धादिके समान असाधारण इन्द्रियग्राह्य शब्दगुण जिस द्रव्यके आश्रित है, वह पंचभूत आकाश ही मान्य होना चाहिये । बौद्ध कहते हैं कि आवरणाभाव आकाश है, परंतु उनका यह कथन ठीक नहीं । एक पक्षीके भी उड़ते समय आवरण हो ही जायगा, फिर उड़नेकी इच्छा रखनेवाले दूसरे पक्षीको अवकाश नहीं होना चाहिये ॥ यदि कहा जाय कि जहाँ आवरण नहीं होगा, वहाँ दूसरा पक्षी उड़ेगा? तो यह भी ठीक नहीं, यतः आवरणाभावको जिससे विशेषित किया जायगा, वह वस्तुभूत ही रहेगा । अतः आवरणाभावमात्र आवश्यक नहीं । सार यह है कि निषेध्यके निषेधाधिकरणका निरूपण किये बिना निषेधका निरूपण हो ही नहीं सकता । इसलिये आवरणाभावाधिकरण वस्तु ही आकाश है । साथ ही आकाश वस्तु नहीं है, यह सिद्धान्त बौद्धके स्वसिद्धान्तके विरुद्ध है । ' पृथिवी भगवः किं सन्निःश्रया ' वे इस प्रकारके प्रश्न प्रतिवचन-प्रवाहमें ' वायुः किं सन्निःश्रयः ' इस प्रश्नके उत्तरमें कहा गया है ‘ वायुराकाशसन्निश्रयः । ' अर्थात् वायुका क्या आश्रय है, इस प्रश्नके उत्तरमें कहा गया है कि वायुका आकाश आश्रय है । इस प्रकार आकाशको अवस्तु मानना अभ्युपगमविरुद्ध होगा । इसके साथ ही बौद्ध कहते हैं अपि च निरोधद्वयमाकाशं च त्रयमप्येतन्निरुपाख्यमवस्तु नित्यं च अर्थात् दोनों निरोध और आकाश-ये तीनों निरुपाख्य अवस्तु एवं नित्य हैं । यह बात परस्परविरुद्ध है । जो अवस्तु है, उसमें नित्यता या अनित्यता कुछ भी नहीं हो सकती । नित्यत्वादि धर्म वस्तुके आश्रित होते हैं । जहाँ धर्म - धर्मिभाव होता है, वहाँ निरुपाख्यता हो ही नहीं सकती । बौद्ध सब वस्तुको क्षणिक मानता हुआ उपलब्धाको भी क्षणिक

पृष्ठ 986

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९८४ मार्क्सवाद और रामराज्य ही मानता है, परंतु यदि उपलब्धा भी क्षणिक हो तो अनुभवसे उत्पन्न होनेवाली स्मृति कैसे बन सकेगी; क्योंकि वह तो तभी बन सकती है, जब कि उपलब्धि और स्मृतिका कर्ता एक ही हो । अतएव पुरुषान्तरसे अनुभूत विषयमें पुरुषान्तरको स्मृति नहीं होती है । अनुभव करनेवालेको ही अनुभूतकी स्मृति होती है । जबतक पूर्वोत्तरदर्शी एक आधार न हो, तबतक ‘ मैंने उसको देखा, अब इसे देख रहा हूँ' यह व्यवहार नहीं बन सकता । कथंचित् समान- संततिमें कार्यकारणभावसे स्मृति बन भी जाय तो भी यह प्रत्यभिज्ञा तो उपलब्धाके अस्थिर होनेपर बन ही नहीं सकती । दर्शन -स्मरणके एक कर्ता होनेपर ही प्रत्यभिज्ञा-प्रत्यय होता है ' उसे देखा, इसे देख रहा हूँ' यदि यहाँ दर्शन - स्मरणका कर्ता भिन्न-भिन्न हों तो ' देखा अन्यने और स्मरण मैं कर रहा हूँ' ऐसा प्रत्यय होना चाहिये, परंतु ऐसा अनुभव किसीको भी नहीं होता । जहाँ ऐसा प्रत्यय होता है, वहाँ कर्ता अवश्य ही भिन्न -भिन्न होते हैं । ' मैं स्मरण कर रहा हूँ, अमुकने देखा है । ' ' अहं स्मरामि, असावद्राक्षीत्। ' बौद्ध भी दर्शन-स्मरणका एक ही कर्ता समझता है, परंतु जैसे अग्निको अनुष्ण और अप्रकाश नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार दर्शन- स्मरण- कर्ता आत्माको भिन्न नहीं कहा जा सकता । जब उपलब्धामें भिन्नकारणके दर्शन - स्मरणका सम्बन्ध हुआ तो सुतरां क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य हो जाती है । जन्ममें मरणतककी उत्तरोत्तर प्रतिपत्तियोंकी एककर्तृकता देखता हुआ भी वैनाशिक आत्माको किस प्रकार क्षणिक कह सकता है? यदि कहा जाय कि सादृश्यके कारण उपलब्धामें एकताकी प्रतीति होती है, तो यह भी ठीक नहीं, कारण ' तेनेदं सदृशम्' ' उसके यह तुल्य है ' इस प्रकारकी सादृश्यबुद्धि तभी हो सकती है, जब भिन्नकालवर्ती दो वस्तुका ग्राहक एक हो, यदि पूर्वोत्तर क्षण और सादृश्यका ग्राहक एक स्थिर आत्मा है तो एककी अनेक क्षणवर्तिता सिद्ध हो गयी, फिर क्षणिकत्व -प्रतिज्ञा भंग ही हो गयी ।

पृष्ठ 987

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मार्क्स और आत्मा ९८५ बौद्ध कहता है कि ' तेनेदं सदृशम्' यह स्वतन्त्र ही एक विकल्प- प्रत्यय है । विकल्प स्वाकारको ही बाह्यरूपसे निश्चित करता है, वह तत्त्वतः पूर्वापरक्षण तथा उसके सादृश्यका ग्रहण नहीं करता । अतः पूर्वोत्तरक्षणग्रहण निमित्तक ' तेनेदं सदृशम्' यह प्रत्यय नहीं है । इस प्रत्ययसे स्थिर आत्मा नहीं सिद्ध होता, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि ' तेन, इदं ' इन दोनों पदोंका उपादान होनेके कारण इसे पूर्वोत्तर क्षणग्रहणनिरपेक्ष प्रत्यय नहीं कहा जा सकता । सादृश्य-ज्ञान स्वतन्त्र-ज्ञान होता तो ' सदृशम्' इस ढंगसे उल्लेख होना चाहिये था । ' तेन इदं सदृशम्' इस प्रकारका उल्लेख तथा वाक्यका प्रयोग नहीं होना चाहिये । यदि बौद्ध नानापदार्थ सम्पृक्त वाक्यार्थबोधक ' तेनेदं सदृशम्' इस विकल्पकी प्रथा या प्रतीति मानता है, तो फिर कैसे कह सकता है कि उसमें ' तेनेदं सदृशम् ' ये नाना पदार्थ नहीं भासित होते हैं । ऐसा कहना तो अपने संवेदनके ही विरुद्ध है. इसके सिवा यदि उसके यह सदृश है, यह एक विकल्प ज्ञान हो तो इसमें ' तेन इदम्' इत्यादि नाना आकार नहीं हो सकते थे; क्योंकि एकका नानात्व व्याहत होता है । जब ज्ञानसे अतिरिक्त आकार नहीं है तो आकार नानात्व -ज्ञान नानात्व ही ठहरेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जितने आकार हैं, उतने ही ज्ञान हैं; क्योंकि तब तो प्रत्येक आकारमें ज्ञानकी समाप्ति होगी और वे सभी परस्पर वार्तानभिज्ञ होंगे, फिर नाना, यह व्यवहार भी न होगा; क्योंकि जब एक ज्ञानसे नाना पदार्थोंकी प्रतीति होती है, तभी नाना यह उल्लेख होता है I। इसीलिये ज्ञानसे भिन्न अर्थ मानना चाहिये । तथा च ' तेन इदं ' इत्यादि नाना आकारवाले ज्ञानकी उपपत्ति स्थायी एक आत्मा माननेसे ही सम्भव है 1 बौद्ध कहता है कि ज्ञानमें अर्थाकार कल्पित है, अर्थ बाह्य नहीं है और प्रतीतिमात्र भी नहीं है । तथा च उसी कल्पित आकारभेदसे व्यवहार भी उपपन्न होगा । पर यहाँ यह प्रश्न होगा कि वह कल्पित अर्थ ज्ञानसे अभिन्न है या भिन्न । तीसरा पक्ष अनिर्वाच्यताका है वह बौद्धको मान्य ही नहीं । यदि

पृष्ठ 988

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९८६ मार्क्सवाद और रामराज्य भिन्न है तो जैसे ज्ञानसे भिन्न दूसरा ज्ञान अकल्पित होता है, वैसे ही ज्ञानसे भिन्न अर्थाकार भी अकल्पित ही होगा । यदि आकारोंका ज्ञानसे अभेद माना जाय तो उसके समान ही ' तेन इदम्' इत्यादि पदार्थोंका भी परस्पर अभेद ही हो जायगा; क्योंकि ज्ञानसे अभिन्न आकारोंका परस्पर भी अभेद ही होता है, तथा च इतरेतररूपसे प्रसिद्ध पदार्थोंका और ज्ञानसे ज्ञेयके प्रसिद्ध भेदका भी अपलाप हो जायगा । यदि लोकप्रसिद्ध पदार्थोंको परीक्षक स्वीकार न करेंगे तो स्वपक्ष-साधन परपक्षदूषणके निरूपण करनेपर भी वे किसीकी बुद्धिमें आरूढ़ न होंगे । अतः जो लोकसिद्ध हो, वही कहना चाहिये, अन्यथा कथन अनर्गल प्रलाप ही समझा जायगा । एक ही अधिकरणमें परस्पर विरुद्ध दो प्रकारके धर्मोंका अभ्युपगम करनेसे ही विवाद होता है । तभी कोई स्वपक्षका साधन तथा अन्य पक्षको दूषित करता है । यदि विकल्पोंके विषय लोकप्रसिद्ध बाह्य पदार्थ न हों तो यह सब नहीं बन सकता । यदि विकल्पमें भासित होनेवाले नित्यत्व- अनित्यत्वादि ज्ञानाकार ही हैं और ज्ञान भी ' इदं नित्यम्, इदमनित्यम्' इस प्रकारसे दो हैं तो एक आश्रय न होनेसे विवाद ही न उठेगा । आत्मा नित्य है और बुद्धि अनित्य, इस तरह कहनेवालोंमें कभी कोई विवाद ही नहीं होता । यदि कोई अनित्य शब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ छोड़कर विभु अर्थ माने, विभुत्व अर्थमें ही अनित्य शब्दका प्रयोग आत्मामें करे और अन्य कोई लौकिकार्थ नित्यशब्दका आत्मामें प्रयोग करे तो उनका आपसमें विवाद नहीं हो सकता है । अतः जिसे परपक्षखण्डन एवं स्वपक्षकी स्थापना करनी है, उसे विकल्पोंका लोकप्रसिद्ध अर्थ एवं बाह्य आलम्बन मानना चाहिये । यह प्रासंगिक विज्ञानवाद खण्डन आ गया है, परंतु वैभाषिक तथा सौत्रान्तिक बाह्यार्थ मानते हैं । उनके अनुसार यद्यपि बाह्यार्थ क्षणिक एवं निर्विकल्पज्ञानमें भासित होता है, सविकल्पक प्रत्यय तो विकल्परूप है । वही सादृश्यादिरूपसे भासित होता है, अतः बाह्यार्थवादमें विप्रतिपत्ति आदि व्यवहार बन जायगा । तथा च विकल्पोंके विषय ग्राह्य एवं अवसेयरूपसे दो

पृष्ठ 989

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मार्क्स और आत्मा ९८७ प्रकारके होते हैं । ज्ञानका स्वाकार तो ग्राह्य होता है और बाह्यविषय अवसेय होते हैं । उसी अवसेयरूप विषयको लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष- परिग्रह आदि सम्पन्न हो जायँगे, तथापि यह पक्ष भी ठीक नहीं है? क्योंकि यहाँ भी विचारणीय यह है कि विकल्प विषयकी अवसेयता क्या है । यदि ग्राह्यता ही है तो विषयकी द्विविधता नहीं हुई । यदि वह अन्य है तो क्या है? यदि कहा जाय कि ज्ञानमें उसका स्वाकार ही प्रतिभासित होता है, तथापि उसी बाह्यार्थरहित भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थ अध्यवसायसे बाह्यार्थ घटादिमें प्रवृत्ति होती है, अतः भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थका आरोप ही विषयकी अवसेयता है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ भी विचारणीय है कि विकल्पाकारका अर्थाध्यवसाय क्या है अर्थात् आन्तर अनभिधेय ज्ञानाकारका तद्विपरीत बाह्याकाररूपसे अध्यवसाय क्या है? तद्रूपसे निष्पादन है या सम्बन्ध या उसके आकारसे आरोपण । पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि अन्यका अन्यरूपसे निष्पादन असम्भव है । हजारों शिल्पी भी मिलकर घटको पट नहीं बना सकते, फिर आन्तर ज्ञानाकारका बाह्यरूपमें सम्पादन कैसे होगा । निष्पादनके समान ही आन्तरका बाह्यसे सम्बन्ध या संयोजन भी नहीं हो सकता । यदि ऐसा हो भी तो बाह्य अर्थ है, इस व्यवहारके विपरीत बाह्य आन्तरसे जुड़ा है, यह व्यवहार होना चाहिये । आरोपपक्षमें भी यह विचारणीय है कि गृह्यमाण बाह्यमें आन्तर ज्ञानाकारका आरोप है या अगृह्यमाणमें । यदि गृह्यमाणमें तो भी क्या विकल्पात्मक ज्ञानसे गृह्यमाणमें या उसी समय उत्पन्न अविकल्पक ज्ञानसे गृह्यमाणमें? यहाँ भी यह प्रश्न उठता है कि उसमें भी गृह्यमाण बाह्य क्या है स्वलक्षण है या सामान्यरूप है? विकल्प- प्रत्ययसे स्वलक्षण ( जात्यादिरहित स्वरूपमात्र ) ग्राह्य होता है, यह इसलिये ठीक नहीं कि विकल्प- प्रत्यय तो अभिलापसंसर्ग योग्यको ही विषय करता है, जिसके साथ शब्दका शक्तिग्रह हो ही नहीं सकता, ऐसे देशकालाननुगत स्वलक्षणको वह विषय नहीं कर सकता । इसीलिये कहा गया है कि-

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९८८ मार्क्सवाद और रामराज्य तेषामतःअशक्यसमयोअर्थात् विकल्प- प्रत्ययह्यात्मास्वसंवित्तिर्नाभिजल्पानुषङ्गिणीशब्द संसर्गसुखादीनामनन्यभाक्ग्रह योग्य जाति ।विशिष्ट॥ वस्तुको ही विषय करता है; क्योंकि शब्दका शक्तिग्रह सामान्यके ही साथ सम्भव है; स्वलक्षणके साथ नहीं; क्योंकि देशकालाननुगत होनेसे स्वलक्षण अनन्त होता है । अतः उसमें संगतिग्रह सम्भव नहीं । सुखादि क्षणिक भावोंका स्वरूप अननुगत होनेके कारण संगतिग्रहके अयोग्य है । अर्थात् उसमें शब्दका शक्तिग्रह नहीं हो सकता । अतः उनकी असाधारणाकार विषया स्वसंवित्ति अभिजल्पानुषंगिणी नहीं होती, किंतु निर्विकल्पक ही होती है । पहले कही हुई रीतिसे जैसे सविकल्प प्रत्ययसे स्वलक्षण- बाह्य नहीं गृहीत हो सकता, वैसे ही सामान्यात्मक बाह्य भी नहीं गृहीत हो सकता; क्योंकि व्यक्तिग्रह बिना जातिरूप-सामान्यका ग्रहण सम्भव है । यदि विकल्पसे अगृहीत तत्समय समुद्भूत निर्विकल्प प्रत्ययसे गृह्यमाण बाह्य पदार्थमें विकल्प- प्रत्यय स्वाकार आरोपित करेगा, ऐसा कहें तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जैसे रजतज्ञानमें भासित होनेवाले पुरोवर्तीमें रजतज्ञान रजतका आरोप नहीं कर सकता, किंतु ' इदं रजतम्' इस रूपसे रजतज्ञानमें भासित पुरोवर्तीमें ही रजतका आरोप करता है, उसी तरह निर्विकल्प प्रत्यय भासित होनेपर भी बाह्य पदार्थ यदि विकल्प- प्रत्ययमें भासित नहीं होता तो उसमें वह स्वाकारका आरोप नहीं कर सकता । अर्थात् विकल्पसे अगृहीत एवं विकल्प समयोद्भूत अविकल्पसे गृहीत बाह्यमें विकल्प साकारका आरोप नहीं कर सकता । यदि बाह्य गृह्यमाण नहीं है तो अधिष्ठानके ग्रहण बिना आरोप्यमात्र प्रतीत हो सकता है, किंतु आरोप नहीं हो सकता । इस तरह अधिष्ठानका प्रतिभास असम्भव होनेसे बाह्यमें ज्ञानस्वरूपका आरोप नहीं हो सकता है । इसी तरह आरोप्यका स्फुरण भी असम्भव होनेसे आरोप नहीं बन सकेगा । यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या यह विकल्प जब स्वसंवेदन सत्- विकल्पको बाह्यरूपसे आरोपण करता है, तब पहले वस्तु सत्-