Mundakopanoshad — पृष्ठ 1–10
Mundakopanoshad · पृष्ठ 1–10
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अथर्ववेदीय-मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पं. मोतीलाल शास्त्री daarata थिकः राजस्थान पत्रिका प्रकाशन केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर ।
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4 अथर्ववेदीय-मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पं. मोतीलाल शास्त्री daaratafre: शंकर श्री * नई शिक्षायतन पुस्तकालय तेजपात प तकालय
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प्रकाशक: राजस्थान पत्रिका लिमिटेड, कैसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । © सर्वाधिकार - लेखकाधीन ग्रन्थ - प्राप्ति: राजस्थान विकतस्वशोचसंस्थान, tamaran ', guiger die, जयपुर -१६ मुद्रक: श्रीबालचना यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', दुर्गापुरा रोड, जयपुर -१६
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पूज्यपाद विद्यावाचस्पति श्री मधुसूदन ओझा
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प्रक rasta स्व ० पं ० मोतीलाल शास्त्री जी के द्वारा निबद्ध वैदिक वाङ्मय के प्रकाशनक्रम में ' मुण्डकोपनिषद्वि-ज्ञानमाध्य ' का प्रकाशन करते हुए मुझे अत्यधिक हर्ष का अनुभव हो रहा है । इससे पूर्व शास्त्री जी द्वारा विरचित कई उपनिषत् - माष्य जैसे- ' उपनिषद्विज्ञानभाष्य भूमिका ', ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य, केनोपनिषद्विज्ञान-माध्य, माण्डूक्योपनिषद्विज्ञानभाष्य यादि का प्रकाशन स्व ० शास्त्री जी के समय में ही हो चुका था । मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य में मूलतः परापरविद्या का निरूपण, पराबरात्मक ईश्वर का निरूपण एवं इसकी प्राप्ति के उपाय के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है । इसी तरह परा एवं अपरा मुक्ति को समझाते हुए महदक्षरविशिष्ट विज्ञानाक्षर एवं अव्यय विशिष्ट महदक्षर का विस्तार के साथ विवेचन किया गया है । सम्पूर्ण ग्रन्थ में प्रक्षर का ही प्रधान रूप से निरूपण किया गया है । स्व ० शास्त्री जी द्वारा विरचित ग्रन्थों के प्रकाशन - काव्यं से जुड़े प्रो ० मदनमोहन शर्मा ने उक्त धन्यमाला के अन्तर्गत मूलपाण्डुलिपि के पाठ - निर्धारण, भाषा सम्पादन एवं मूल संस्कृतअंशों के प्रामाणिक पा ० - निर्धारण में बहुमूल्य योगदान किया है, इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं । स्व • शास्त्रीजी के सुपौत्र चि ० प्रद्युम्न कुमार शम्र्मा ने प्रत्य के विभिन्न स्थलों पर पाद - टिप्पणियाँ दे कर, ग्रन्थ में उद्धृत सन्दर्भों के स्रोतों का सन्धान कर, सन्दर्भों को अंकित किया है । उनका परिश्रम श्लाघनीय है । श्री हीरालाल गहलोत मूल प्रति के सुपाठ्य पुनर्लेखन एवं प्रूफ संशोधन, सन्दर्भ - शोधन में सहायता प्रदान करने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं । # माशा करता हूं कि वेद - निष्ठ महानुभाव हमारे इस प्रयास से लाभान्वित होंगे । इसी मात्म-विश्वास के साथ ----कृष्णवन्माष्टमी वि ० सं ० २०४६ कर्पूरचन्द ' कुलिस '
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वेदवाचस्पति पं. मोतीलाल शास्त्री
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मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय - सूची विषय प्रथममुष्यक-१ - पराविद्या निरूपणात्मक प्रथमखण्ड ( अक्षरानुगत सृष्टि प्रपञ्चाधिकरण ) मूल २- अपरा विद्यानिरूपणात्मक द्वितीयखण्ड ( अक्षरकृतयज्ञ सृष्टि निरूपणाधिकरण ) मूल विज्ञान भाष्य द्वितीयमुण्डस--१- पराय रात्मक - ईश्वरीय देवसत्य निरूपणात्मक प्रथमखण्ड ( अक्षरात्मक विराट्स्वरूपनिरूपणाधिकरण ) मूल २ - ईश्वरप्राप्त्युपायात्मक द्वितीयखण्ड ( मक्ष रोपासनाप्रका रत्रदर्शनाधिकर ) मूल ानभ
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मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय तृतीयमुण्डक-१- प्रपरा मुक्तिसाधकमहदक्ष रवि शिष्टविज्ञाना क्षरनिरूपणात्मक प्रथमखण्ड ( देव सत्यात्मकाक्षरस्वरूप निरूपणाधिकरण ) मूल विज्ञाय २ -- परामुक्तिसाधकाव्ययबिशिष्टमहरू द्वितीयखण्ड मूल विज्ञान भाष्य अन्य सम्पूर्ण
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१- प्रथममुण्ड ---प्रत्यस्य मुण्डकत्रय्यन्तर्गत विषय - सार ( च ) प्रथममुण्डक प्रथमखण्ड - प्रथममुण्डक के प्रथमखण्ड में अक्षर से होने वाली सृष्टिविद्या का बिस्लेषण हुआ है । विश्वानुबन्धी काव्य - कारणभाव प्रदिमाविक, सान्तानिक, सांस्कृतिक, नौमलिक, पौपपादिक, प्राकृतिक, पारिणामिक, रसानुवृत्तिक, सांयोगिक, श्रीपादानिक, सांक्रामिक भामि प्रातिभासिक, वैकल्पिक, ऐच्छिक, नोदनालक्षण आदि भेदों से अनेक भागों में विभक्त माना गया है । इन सब काय्ये कारणभावों को चार काय्र्य - कारणभावों में प्रन्तर्भाव ' मानते हुए सृष्टिको निण हुआ है । पृथिवी से घोषधियों का उत्पन्न होना, पुरुष से केशलौम उत्पन्न होना, ऊर्णनांमि ( मकड़ी ) से सन्तु ( जाल ) का उत्पन्न होना, अग्नि से विस्फुलिंग ( अग्निकण - दिनगारी ) उत्पन्न होना, ये चारों ही उपोदीनात्मक कार्य्यं कारणमाव हैं ' परन्तु, चारों के स्वरूप में विभेद है । तमोल कारण कम्र्म्म से ब्रह्म का चयन होता है, इसे फोसि होती है हम से वर्ष भारत का विकास होता है, प्रायस से मन- उबुक होता है माता विकास से सत्यात्सक, विज्ञान ( सुि विकसित होता है, सत्य से महदनुबम्बी लोक का विकास होता है । लोक से कम का जनक होता है । कमसंमय भौतिक विश्व में इन सम्पूर्ण सर्पों का एकसस्त्र प्रवर्तक अक्षरा ही है और यही असा के प्रथमखण्ड का प्रशस्त विषय है । ( ब ) प्रथममुण्ड द्वितीयखण्ड- प्रथममुण्डक के द्वितीयखण्ड में प्रक्षर के प्राधार पर होने वा अरात्मक, अष्ठादलापर्वावन्दिनः । प्राकृतिकः यशशवः सत्र विश्लेषण हुआ है । यह यज्ञाग्नि की सप्ताह का विश्लेषण भी इसी खण्ड का विषय: है: प्रारम्भ में शास्ति से सम्बद्ध बिताना यह क ताश्विक विश्लेषण करते हुए मन्त में इसकी क्षररूपता का स्पष्टीकरण हुआ है । इसी वर के आधार पर सर्वान्त में ' प्लवा ह्यतेः प्रष्ठा यशस्या कहते हुए कामना - प्रधान इस यो प्रमृताक्षरप्राप्ति में प्रति बल्य मानते हुए, प्रात्मासता ( समारोप तर निष्काम यश नुसता ) कारादेशः हुमा है । प्रथममुण्डक के द्वितीयखण्ड का यही संक्षिप्त विषय है । २- द्वितीयमुण्डक-( a ) द्वितीयमुष्क प्रथमखण्ड — द्वितीयमुण्डक के प्रथमखण्ड में अक्षर के सर्वव्यापक विराट् स्वरूप का प्रदर्शन हुआ है । प्रक्षरविभूति प्रदर्शन के साथ - साथ अक्षर की स्वात्मानुगता निमित्त कारणता का एवं ‘ अप्राण - अमनाः - शुभ्र - अज ' नामक श्रव्ययात्मानुगता सर्वालम्बनता का विश्लेषरण करते हुए ऋषि ने प्रसङ्गोपात्त प्रक्षरानुगत चेतन - सर्ग, प्राणसर्ग, श्रोषघि वनस्पतिसर्ग, धम्मंसृष्टि, गुहाशयों में प्रतिष्ठित चतुर्द्धा विभक्त सप्तप्राण, सप्ताचि, सप्तसमिघ, सप्त होम, सप्तलोक, प्रन्तः संज्ञ - असंज्ञसगं, श्रादि विराडक्षर की विराट् विभूतियों का प्रतिपादन किया है और यही इस खण्ड के संक्षिप्त प्रतिपाद्य विषय हैं । [ ७ ]
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मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ग्रन्थ ferrert ( a ) द्वितीयमुण्डक द्वितीयखण्ड - द्वितीयमुण्डक के द्वितीयखण्ड में महद्बह्म के आधार पर प्रतिष्ठित अतएव ' महद्ब्रह्म कमक्ष रम ' के अनुसार ' महदक्षर ' नाम से प्रसिद्ध अक्षरब्रह्म की उपासना का ( महदुपारिष्टि से ) प्रकार बतलाया गया है । उपासना - प्रकार प्रतिपादन के साथ - साथ अक्षरानुगत मोकार के तात्त्विक स्वरूप का विश्लेषण करते हुए ऋषि ने इस ' परावर ' मक्षर की सर्वव्याप्ति का भी दिग्दर्शन कराया है । अव्यय - शरयुक्त प्रक्षर सर्वज्ञ सर्ववित् सर्वकम्मंमूत्ति बनता हुधा विश्व का वरिष्ठ तस्व बन रहा है और यही प्रस्तुत खण्ड का संक्षिप्त प्रतिपाद्य विषय है । इ - तृतीयक-( प्र ) तृतीयमुष्य प्रथमण्ड - तृतीयमुण्डक के प्रथमखण्ड में ईश्वरीय देवसस्य तथा जीवा-स्मानुगत देवसत्य इन दोनों से मनुगृहीत देवसत्याक्षरों के तात्त्विक स्वरूप का विश्लेषण हुआ है । ' वा सुपर्णा सयुजा ० ' मन्त्र के अर्थ प्रकरण में प्रतिपादित अश्वत्थ वृक्ष की पार्थिव शाखा पर दो सुपणं प्रतिष्ठित हैं । एक साक्षी है, दूसरा मोका है । साक्षी सुपरणं ईश्वर है, मोक्ता सुपर्ण जीव है । भद्भुत, मिझता, माया, अविद्यादि पाप्मानों के सम्बन्ध से जीवाक्षर स्वात्मविभूति ( ईश्वराक्षर ) के सात्विक सहयोग से होता हुआ दुःख पाया करता है- ' अनीक्षया शोचति मुह्यमानः । जिस दिन जीवात्मा संत्य, तप, सम्यग्ज्ञान, ब्रह्मचय्यं वेदानुपालन भाषि व्रतों के अनुगमन से शोक - मोह से रहित हो जाता है; उसी दिन क्षीणदोष बनता हुधा, भ्रात्मसंयम से ' यति ' संज्ञा में परिणत होता हुआ यह जीवात्मा मन्तः शरीरस्य ( हृदयाकाशस्य वहराकाशस्थ ) उस ज्योतिम्य - शुभ - अक्षर ब्रह्म के विभूति सम्बन्ध का सत्पाद बन जाता है घौर इस दशा में पाकर यह विशुद्धसत्व जीव यथाकाम, यथाचार, सत्यसंकल्प धम जाता है । ( ब ) तृतीयमुण्डक द्वितीयान्ड - तृतीयमुण्डक के द्वितीयखण्ड में प्रधानरूप से अक्षर प्रतिष्ठा-रूप परमधाम का विवेचन हुवा है । धक्षर - प्राप्ति का क्या उपाय है? अक्षर कहाँ प्रतिष्ठित है? कौन प्रक्षर प्राप्त कर सकता है? अक्षर की प्राप्ति के धनन्तर जीवसंस्था का कैसा स्वरूप हो जाता है? इत्यादि प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत खण्ड में हुधा है । प्रस्तुत खण्ड अक्षर पर ही लक्ष्य समाप्त कर रहा है । वही हिरण्यगर्भ है, यहाँ मध्यात्म में विज्ञानात्मा है अतएव मुण्डकोपनिषत् का प्रधान प्रतिपाद्य यही माना गया है । [ ]