Mundakopanoshad
214 पृष्ठ · 22 खण्ड
विषय सूची
- अथर्ववेदीय-मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पं. मोतीलाल शास्त्री daarata थिकः राजस्थान पत्रिका प्रकाशन केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर… 1–10
- प्रथ मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अथ प्रथममुण्डके-पराविद्यानिरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः १ अण्डकोपनिषद-प्रथममुण्डके प्रथमः खण्डः “ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा… 11–20
- प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपमिषद्विज्ञानमाध्य पराविद्या निरूपण सकता है । हमारे जानने की तो यही वेदत्रयी है । इसके द्वारा उसे भले ही पहचान जाएँ… 21–30
- प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य पराविद्या निरूपण कहना यही है कि इस प्रकार विश्व में अनेक प्रकार के काव्य - कारणभाव होते हैं… 31–40
- प्रथममुण्डक ( प्रथखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य मानन्द - विज्ञान- मन - प्राण- यामय अव्यय पौरुषं ब्रह्म ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - धग्नि - सोममय =… 41–50
- ranush ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण गर्मित अग्निमय है । अग्नि अपना केन्द्र रखता है… 51–60
- प्रथममुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण कम्मंयोग में प्रन्तंभूत हो जाते हैं एवं कामना के परित्याग से विद्यानिरपेक्ष… 61–70
- terrush ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अपराविद्या निरूपण भटका करते हैं । अविद्या तमोरूप होने से स्वयं अन्ध है… 71–80
- प्रथ द्वितीयमुण्डके-परावरात्मक ईश्वरीय देवसत्य निरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः अक्षरसत्यनिरूपणद्वारा ईश्वरीयवैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञात्मकवेवसत्यनिरूपणम्… 81–90
- द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयवेवसत्यनिरूपण भी मीतर है । बाहर भी है… 91–100
- द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाय्य परावरात्मक ईश्वरीयदेव सत्यनिरूपण यज्ञ है- अग्नि - सोमभूत है । इसका श्राधार प्राणरूपवेद है… 101–110
- faateen ( प्रथमखण्ड ) कहाँ तक कहें-१ शत ० ब्रा ० ६ | ४ | ११८ | शिष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसस्यनिरूपण F Life it १०७ 1 सात मस्त् हैं… 111–120
- fastenure ( facta ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य ईश्वरप्राप्त्युपाय रहने वाले पुररूप वाचस्पति, सूत्र आदि पशु हैं । महान् श्रात्मा है… 121–130
- द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्युपाय धनुष को भाधार बनाए बिना मनरूप शर - लक्ष्य को प्राप्त करने में प्रसमयं ही रहता है… 131–140
- द्वितीय ( द्वितीय खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानाय ईश्वरपा चूंकि अक्षर से ग्रन्थिसामान्य का विमोक हो जाता है । इसीलिए - मिळते हाय: - यह कहा है… 141–150
- तृतीयमुण्डक ( प्रथम खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य २- द्वितीय पर्य twiters ाग को पूर्व के प्रकरणों में बतलाया है… 151–160
- तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य विज्ञानाक्षरनिष्पन " सविता यन्त्रः पृथिवीमरम्णावस्कम्भने सविता द्यामबृंहत्… 161–170
- एक प्रखण्ड ) restofou ज्ञानभाष्य - इस प्रन्नसम्बन्ध के कारण ही प्राण सत्य कहलाता है । वैज्ञानिक लोग सत्य सन्द ीक्षण मानते हैं--१- प्राणी अनं यतं सत्यम् २-… 171–180
- तृतीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य विज्ञानारनिरूप जिज्ञासु - पूछता है कि भगवन्! जिसको प्राप्त कर लेने से मनुष्य द्वन्द्वातीत होता हुआ… 181–190
- तृतीय ( द्वितीयखण्ड मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य महारण १- सृष्टि: शरीरापोनिः तत्र -सहका • अधिष्ठानम् = अव्ययपुरुषः # 1 घारूषणम् = क्षरप्रकृतिः निमित्तम्… 191–200
- तृतीयण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानाच्य महदक्षरनिरूपण प्रमृत - ब्रह्म - शुक्र तीनों को हमने क्रमशः ग्राम - क्षण - पशु यौनि कहा है… 201–210
- तृ ates ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विश्व - इन्द्रियाणि वैश्वानर सैक्स - प्रात कर्माणि - भूतप्रपचम् ' विज्ञानमयश्च मात्मा पञ्चप्राकृतात्मा १… 211–214