Mundakopanoshad — पृष्ठ 11–20

Mundakopanoshad · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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प्रथ मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य

पृष्ठ 12

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अथ प्रथममुण्डके-पराविद्यानिरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः १

पृष्ठ 13

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अण्डकोपनिषद-प्रथममुण्डके प्रथमः खण्डः “ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा: 1 स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु " ॥ [ मूल ] ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्व विद्याप्र तिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥

प्रथर्वणे यां प्रथवेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥२ ॥

शौनको ह वे महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसनः पप्रच्छ । कस्मिक्षु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥३ ॥

तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मवियो वदन्ति परा चैवापरा च ॥४ ॥

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं

निरुक्तं खन्वो ज्योतिषमिति । श्रथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥५ ॥

यत्तवनेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमथभुः श्रोत्रं तबपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तवव्ययं यद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥

[ x ]

पृष्ठ 14

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verse ( reta ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परा विद्यानिरूपणे

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति ।

यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽनमभिजायते । नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् || ८ || यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतदवाद्य नाम व्यमतं व जायते ॥६ ॥

इति प्रथममुण्डके प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥

[ … ]

पृष्ठ 15

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अथ प्रथममुण्डके -पराविद्यानिरूपणात्मकः प्रथमः खण्डः “ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु " ॥ [ विज्ञानभाष्य ] प्राणपुरुष की कृपा से अथर्ववेदीय प्राणोपनिषत् ( प्रश्नोपनिषत् ) समाप्त हो चुका है । अब देवसत्यरूप सर्वभूतान्तरात्मा साक्षीपुरुष ( ईश्वर ) के अनुग्रह से अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषत् प्रारम्भ किया जाता है । प्रथर्ववेदीय यच्चयावत् उपनिषदों में भद्रं कर्णेभिः ० इत्यादि रूप से ही प्राचन्त में शान्तिपाठ किया जाता है । इस शान्तिपाठ का वैज्ञानिक रहस्य पूर्व के प्रश्नोपनिषत् में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है, अतः यहाँ पुनरुक्ति करने की कोई uretreat नहीं है । मंगलाचरण के अनन्तर ब्रह्मा dent प्रथमः संबध से उपनिषत् प्रारम्भ होता है । हमारा सदा से ही यह विश्वास बना पा रहा है fe सब उपनिषदों में प्राचीन व्यास्यातानों के अनुसार एक ही विषय का निरूपण नहीं है । प्रत्येक उपनिषत् में भिन्न - भित्र विषय हैं, जैसा कि पूर्व के उपनिषत् - निरूपणों से पाठकों को भली - भाँति विदित हो गया होगा । इसी विभिन्नता के भाधार पर हम कह सकते हैं कि हमारा यह उपनिषद् ईश्वरीय वेवसस्योपनिषत् है । ब्रह्मसत्य पर देवसत्य प्रतिष्ठित है । ये दोनों षोडशी मृतात्मा पर प्रतिष्ठित हैं । तीनों की समष्टि- ' प्रजापति ' है । जीव इसी प्रजापति का अंश है । इनमें जीव के प्रमृत, ब्रह्मसत्य, वेवसत्य का तो पूर्व के उपनिषत् में विस्तार से निरूपण ना चुका है, किन्तु अभी तक ईश्वर-प्रजापति का स्पष्ट विवेचन नहीं हुधा है । बस, इसी काय्र्य्यं के लिए हमारा यह पांचवां उपनिषत् प्रापके सामने भाता है । इसमें गौणरूप से तो ममृत, ब्रह्मसत्य, देवसस्य प्रजापति के इन तीनों भागों का ही निरूपण है । परन्तु प्रधानता देवसत्य की ही है । वैश्वानर, हिरण्यगमं, सर्वज्ञ की समष्टि देवसस्य है । यही सर्वभूतान्तरात्मा है । यही साक्षी, बेता, केवल, निर्गुण है । बस, इस ' मुण्डकोपनिषत् ' में प्रधानरूप से इसी का निरूपण है । इस देवसत्य को सामने रख कर हो इस उपनिषत् को हाथ में उठाना चाहिए | इस विषय के श्रादिप्रवर्तक हैं- महर्षि अंगिरा । देवसत्य का स्वरूप यदि सबसे पहले किसी ने समझा है तो अंगिरा ने ही । भषिदेवत, भष्यात्म, मषिभूत तीनों में देवसत्य भाग है । तीनों के माता, प्रवर्तक महर्षि अंगिरा ही हैं । पहले प्रधिदेवतपक्ष को ही लीजिए । ' प्रश्नोपनिषत् ' के प्रथम प्रश्न में हमने रयि और प्राणरूप भृगु- अंगिरा का निरूपण किया है । भृगु, प्राप: - वायु - सोम भेद से तीन प्रकार का है । अंगिरा, भग्नि वायु - प्रादित्यभेद से तीन प्रकार का है । उन्मुग्धावस्था अंगिरा है । उद्बुद्धा-1

पृष्ठ 16

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tranush ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्यानिरूपण वस्या अग्नि वायु श्रादित्य है । अंगिरा प्राण ही भग्नि, वायु, प्रादित्य का प्रवर्तक है । वही इन तीन स्वरूपों में प्रवृत्त होता है । अग्निभाग वैश्वानर है, वायुभाग हिरण्यगर्भ है एवं प्रादित्यभाग सवंश है । तीनों की समष्टि ही देवसत्य है । इस देवसत्य का प्रवर्तक वही पितर अंगिरा है । पितृम्यो देवमानवाः ' के अनुसार देवसत्य का प्रवर्तक पितृप्राण है । परमेष्ठी पितृलोक है, वहाँ का पाग्नेय अंगिरा पितर है । वही देवसत्यरूप प्रग्निवायु - मादित्यात्मक वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ का प्रभव प्रतिष्ठा - परायण है । इसी विज्ञान के प्राधार पर हम कह सकते हैं कि ईश्वरीय जगत् रूप अघिदेवतमण्डल में इस देवसत्य के प्रथम प्रवर्तक अंगिरा ही थे । अब चलिए मयात्म की घोर भ्रष्यात्म जगत् में महान् परमेष्ठी है । इसमें रयि - प्रारण दोनों हैं । प्राणभाग अंगिरा है । यही अंगिरा सूय्यंरूप - विज्ञान के द्वारा वैश्वानर तंजस - प्राशरूप में परिणत होता है । सुतरां जैवदेवसत्य के प्रति महद्गमित अंगिरा का प्रवर्तकत्व सिद्ध हो जाता है । तीसरा है-अषि भूतपक्ष । तत्प्राणों को आत्मसात् करनेवाले मनुष्य ऋषि उस वैदिक युग में तप्तन्नामों से ही पुकारे जाते थे । इस सामान्य व्यवस्था के अनुसार अंगिराप्रारण को पहचानने के कारण हमारे यह मनुष्य ऋषि अंगिरा नाम से प्रसिद्ध हुए एवं अंगिराप्राण से सम्बन्ध रखने वाले देवसत्य को सर्वप्रथम इस महर्षि अंगिरा ने ही पहचाना एवं महाशास शौनक ने पहले पहल अंगिरा से देवसत्य का स्वरूप सीखा और प्रचार किया । उसी देवसत्य के स्वरूप को परमकारुणिक मगवान् मुष्टक ने ग्रन्यरूप में परिणत करके जगत् का उपकार किया । प्राज उसी उपकारक की उपकृति को देशिक भाषा में हम अपने उपनिषत्प्रेमी पाठकों के सामने रखते हैं - यह देवसत्यविद्या किस रूप से हमारे पास भाई है? deer यमय प्रतएव वेदमय ईश्वरीय ज्ञान का भवतार किस क्रम से हुआ है? पहले इसी प्रश्न का समाधान करते हुए महर्षि मुण्डक कहते हैं—

" ब्रह्मा वेदानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।

स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥१ ॥

अथर्वणे यां प्रवदे ब्रह्माचर्या तां पुरोवाचा ङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।

स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् " ॥२ ॥

चिरकाल से विलुप्तप्राय वैज्ञानिक परिभाषाओं को न जानने के कारण आज वेदार्थ सम्बन्ध में बडी - बडी भ्रान्तियां फैल रही हैं । कितने ही विद्वान् वेद को विज्ञानमय समझते हैं । कितने ही ईश्वरीय-थानपरक मानते हैं । कितने ही पाश्चात्य विद्वान् वेद को इतिहासपरक मानते हुए राजा, ऋषि मुनि मादि की वंशावलियाँ समझते हैं । सब अपने मत को श्रेष्ठ समझते हुए एक - दूसरे का खण्डन करते हैं । विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, देस, प्रद्वैत सभी मत दृष्टिकोणभेद से यथार्थ हैं, परन्तु एक दूसरे का खण्डन करना प्रययार्थ है । बस, ठीक यही दार्शनिक सिद्धान्त वेद के विषय में लागू है । सर्व वेदात् १ मनुस्मृति ३।२० १ । [ " }

पृष्ठ 17

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terrors ( rea ण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्यानिरूपण प्रसिष्यति ' के अनुसार वेद में विज्ञान भी हैं, ईश्वरीयज्ञान भी है, इतिहास भी है सब कुछ है । दूसरे शब्दों में वेद में प्रविदेवत - अध्यात्म - प्रषिभूत तीनों भावों का निरूपण है । तीनों संमिश्रित है । इसी मिश्रण से साधारण मनुष्य नान्त हो जाते हैं एवं उसके समन्वय के लिए नाना उत्पयों का ear लेते हुए वास्तविक तत्व से दूर जा गिरते हैं । उदाहरण के लिए यहाँ के ' भरद्वाज ' ऋषि को ही लीजिए, ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रप्त - भरण करने वाले प्राणविशेष को ' भरद्वाज ' कहा गया है एवं उपनिषद वृति ' भाज से अंगिरा ने सीखा, अंगिरा से महाशाल - शौनक ने सीखा ' - यह कहती हुई इतिहास को हमारे सामने रखती है । इस द्वेष के कारण साधारण मनुष्य ऐतिहासिक पदार्थों को बलात्कार से विज्ञान की तरफ अंचने लगते हैं । निदर्शन मात्र है । ऐसे असंख्य स्थल हैं जहाँ लोगों ने मनमाना नाटक रच कर का अर्थ कर डाला है । इसलिए हम a पने वेदप्रेमी पाठकों को बतला देना चाहते हैं कि te न केवल प्रषिदेव रूप ईश्वरीयजगत् का निरूपण करता है न केवल अध्यात्मरूप जीवजगत् का निरूपण करता है एवं न केवल अधिभूतरूप ऐतिहासिक जगत् का निरूपण करता है - मपि तु तीनों का fare करता है | इन तीन मावों के कारण वैदिक प्राख्यान- उपाख्यान प्राठ भागों में विभक्त हो जाते है । कहीं शुद्ध प्र rfeites are है । कहीं शुद्ध भषिभूत है । कहीं शुद्ध अध्यात्म है । कहीं तीनों का after है । कहीं तों का वैपरीत्य है । इस क्रम से निम्नलिखित कुल पाठ विभाग हो जाते हैं-२ - अध्यात्म इमधिभूत ४ - प्रदेिवत अध्यात्म विभूत ५- अधिदेवत, अध्यात्म ६ -- afreen, प्रषिभूत ७- अध्यात्म, घषिभूत सत् सर्वथा कल्पित ( मिथ्यालॉजी- माइथोलॉजी ) at arora पाख्यान व्यवस्था इस निगम विभाग में है वहीं निगम के आधार पर चलने वाले surance पुराणशास्त्र में समझनी चाहिए । इन म्राठों के स्वरूप जान लेने पर न निगमशास्त्र gravi का शिकार बनता है एवं न पुराण पर ही कोई माक्षेप करने का साहस कर सकता है । भस्तु, यह विषय प्रकृत है । यहाँ हमें इस प्रपञ्च से केवल यही बतलाना है कि प्रकृत में इन पाठों पक्षों में से चौथे पक्ष का ग्रहण है । वेदानां प्रथमः- इत्यादि दोनों मन्त्र प्राधिदैविक, प्राध्यात्मिक, भाषिभौतिक ratri रहस्यों का fr रूपण करते हैं- जैसा कि आगे के प्रकरण से स्पष्ट हो जाएगा--१ मनुस्मृति १२/६७ । [ C ]

पृष्ठ 18

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प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण १ - खविर्देवपक्ष प्रानन्द - विज्ञान- मन - प्राण वाङ्मय धव्ययालम्बन पर प्रमृत- ' ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, भग्नीषोममय ' अक्षर द्वारा मर्त्य -ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोममय विपरिणामी उपादानभूत भात्मक्षरद्वारा क्रमशः प्राण - प्रापः - वाक् - मन्त्र- प्रसाद नाम से प्रसिद्ध पाँच विकारक्षर उत्पन्न होते हैं । इन पाँचों विकारक्षरों के पञ्चीकरण से वैशेष्यात् तद्वावस्तववाद: - के धनुसार प्राण - प्रापः - वाक् मादि उन्हीं नामों से प्रसिद्ध पाँच पञ्चजन उत्पन्न होते हैं । इन पञ्चजनों से वेद - लोक- प्रजा भूत- पशु, ये पांच पुरंजन उत्पन्न होते हैं । इन पुरंजनों से क्रमशः स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी ये पांच पुर उत्पन्न होते हैं । स्वयम्भूपुर वेदरूप प्राणमय है । यही पहता स्वयम्भू ब्रह्मा है । ' कठोपनिषत् ' और ' ईशोपनिषत् ' में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि स्वयम्भू ब्रह्मा से ब्रह्मनिःश्वसित वेद उत्पन्न होता है । इसी को यजुः बह्म की धपेक्षा से - बह्म बतलाया गया है । ऋक्साम - यजुः की अपेक्षा से यही द्विब्रह्म ' त्रयीवा ' कहलाता है । स्वयम्भू ब्रह्म इसी त्रयीब्रह्म पर प्रतिष्ठित है । इस त्रयीब पर प्रतिष्ठित स्वयम्भू ब्रह्मा अपने यजुः के वाक्माग से काम, तप, श्रम द्वारा प्रापः उत्पन्न करते हैं । इसी मभिप्राय से सोऽपो-ऽसृवत बाथ एव सोकात् ' -यह कहा जाता है । वाक् श्रग्नि है । भग्निघर्षण से प्रप एव ससद के अनुसार सबसे पहले पापोमय परमेष्ठी का जन्म होता है । इस प्रापः की उन्मुग्धावस्था का नाम ' परमेष्ठी ' है एवं उदमुद्धावस्था का नाम भृगु भोर भंगिरा है । भृगु सोम है । अंगिरा भग्नि है । सोम रयि है । प्रग्नि प्राण है - जैसा कि प्रश्नोपनिषत् के प्रथम प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इसी रयिमारणरूप भृगु - अंगिरा की समष्टि - ' प्रथर्वा ' है । वस्तुतस्तु, प्रथर्वा ' भृगु भोर अंगिरा ' दोनों से पृथक् तत्त्व है । ' गोपथ ब्राह्मण ' में प्रारम्भ में ही इन तीनों का विस्तार से निरूपण किया गया है । वहाँ बतलाया गया है कि सृष्टि के पहले प्रजापति नाम से प्रसिद्ध ' स्वयम्भू ब्रह्मा ' ही था । उसने सृष्टि कामना से प्रेरित होकर तपःश्रम द्वारा अपने वाक्-मान को पानी बना डाला । वह स्वेद ही - पथर्ववेद हुभा । प्रनन्तर उस ' बापू ' से माप, धारा, जाया - ये तीन प्रकार के सृष्ट्युपयोगी बल उत्पन्न किए । उस प्रापोरूप स्वेदग्रा के संतप्त भाग से भृणु पैदा हुआ । इस भृगु का तरलावस्थारूप जो वायु था उसके मातरिश्वा, पवमान, प्राण, सविता चार भेद हो गए । इस भेव का मुख्य कारण ४ दिशाएं ही थीं । इन चारों के प्रलावा जो भृगु - भाग शेष रह गया वही अब अर्वाड परिशिष्ट: - इस व्युत्पत्ति से प्रथर्वा कहलाया । यही मथर्वा भागे जा कर अंगिरा की उत्पत्ति का कारण बना । इस प्रकार ' गोपथ ' ने यद्यपि अथर्वा को भृगु - अंगिरा से पृथक् तत्त्व माना है, तथापि प्रथर्वा भृगु की ही एक अवस्था विशेष है एवं भृगु धौर भंगिरा दोनों धापोरूप हैं, मतएव इस उन्मुग्धभाव को सामने रखते हुए भृगु - भंगिरा के लिए ' पथव ' शब्द का प्रयोग कर सकते हैं । धर्षा परमेष्ठी है । यही प्रापपन है एवं प्रथर्षा पर प्रतिष्ठित प्रथर्वा की उदबुद्धावस्थारूप भृगु और free हैं । जंसा कि ' प्रश्नोपनिषद् के प्रथम प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इस प्रथर्वा के बाद अथर्वा ( परमेष्ठी ) के पेट में सूयं पैदा होता है । बाद में पृथिवी पैदा होती है । १ शत ० ब्रा ० ६।१।१६ । २ मनुस्मृति १८ । [ 1 ]

पृष्ठ 19

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प्रथममुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य पराविद्या निरूपण सर्वान्त में चन्द्रमा उत्पन्न होता है । इस प्रकार उस परमप्रजापतिरूप स्वयम्भूब्रह्मा के प्रथर्वा, सुय्यं, पृथिवी, चन्द्रमा - ये प्रतिमाप्रजापतिरूप ४ पुत्र उत्पन्न जाते हैं । इन चारों में ज्येष्ठपुत्र यही प्रथर्षा है । देवता का विकास प्रथर्वा के अंगिरा - भाग से उत्पन्न आदित्यात्मक सूय्यं में होने वाला है, अतएक स्वयम्भू ब्रह्मा को हम प्रवश्य ही देवताओं से पहले व्यक्त होने वाला मानने के लिए तय्यार हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव कहा है । इस ब्रह्मा के प्राण, भापः, बाकू, मन्नान्नाद ये चार मुख हैं । इन बारों से यह क्रमश: -वेद, लोक, प्रजा, धम्मं सृष्टि करता है । इन चारों सृष्टियों की समष्टि ही विश्व है । इसीलिए उसे विश्वस्य कर्ता कहा है । साथ ही में इन्हीं चार कलामों से यह चतु. संस्थविश्व की रक्षा करता है । जैसे वसुधानकोश ( डिब्बी ) स्य वस्तु का गोप्ता वसुधानकोश है - एवमेव प्रपने वैश्वरूप्यरूप वसुधानकोश में शेष चारों प्रजापतियों को अपने में सुरक्षित रखता हुमा यह ब्रह्मा - विश्वस्य गोप्ता है । इस स्वयम्भू ब्रह्म का विद्याभाग ( त्रयीमाग ) सबसे पहले इसके ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा में ही प्रतिष्ठित होता है जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । संवर्ग, परिमर, उद्गीय, वैश्वानर प्रादि - आदि जितनी भी विद्याएं हैं उन सबका प्राधार वही ब्रह्मविद्या है । ' माहे ' किसी विशेष रहस्य को बतलाने के लिए कहा गया है । वाक् ही शब्द की जननी है । वाक् ही पानी बना है । पानी ही सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम् के प्रनुसार सब कुछ बना है । पानी वाक् रूप है, अतएव पांचों भूतों में ' प्रापः ' शब्द का प्रत्यक्ष कर सकते हैं । इसीलिए तत्तल्लोकसृष्टियों में स भूरिति व्याहरत् इत्यादि कहा जाता है । ' भू ' बोल कर भूलोक पैदा किया । इसका अर्थ यही है कि ' भू ' शब्दवाक्पूर्वक सृष्टि धारा चलती है । शब्दवाक् मत्यवाक् है । मर्त्यवाक् ही मत्यंविश्व की जननी है । इसीलिए भगवान् मनु ने भी बेवबागृभ्यः न कह कर वेदशब्देभ्य एवादी पृथक्संस्थारच निर्ममे - यह कहा है । प्रपि च ऋषि को इस मन्त्र से भाधिभौतिक अर्थ का भी निरूपण करना है । इसीलिए भी ' प्राह ' कहा है । ' प्राह ' से दोनों मतलब निकल जाते हैं । विज्ञान पक्ष में प्राह का प्रथर्वा च प्रावात् वो यही अर्थ समझना चाहिए । प्रागम मोर निगम विद्या के स्थूल दो ही विभाग हैं । दोनों में भागम का भावार प्रथमय ( ब्रह्ममय ) निगम ( ब्र ० नि ० वे ० ० ) ही है । सारा भागमशास्त्र प्रग्नीषोममय इसी थर्वाङ्गिरा पर प्रतिष्ठित है । प्रथर्वासूत्र का ७ पोढी तक बराबर सम्बन्ध रहता है । बस, प्रथम मन्त्र का यही वैज्ञानिक अर्थ है ॥१ ॥

इस प्रकार सर्व विद्या - प्रतिष्ठिारूप जिस ब्रह्मविद्या को सबसे पहले ब्रह्मा ने प्रथर्वा को कहा था, अथर्वा ने सबसे पहले उस ब्रह्मविद्या को अंगिरा के अधिकार में दिया । अंगिरा ने सत्यवाट् भरद्वाब के लिए उसको प्रदान किया एवं भरद्वाज ने इस परावरविद्या को मंगिरा को सिखलाया । इस प्रकार क्रम क्रमशः उतरती हुई वह वेदविद्या भन्त में मंदिरा में प्रतिष्ठित हुई । अथर्वा से अंगिरा धौर भृगु ये दो तस्व प्रादुर्भूत होते हैं । भङ्गिरा तेज तत्त्व है एवं भृगु स्नेह है । भृगु की सात प्रवस्थाएं हैं एवं अंगिरा की २१ भवस्थाएं हैं । जलते हुए अंगारे पर दृष्टि डालिए, भंगारे की ज्वाला त्रिकोण बनाती हुई पर्वत - शिखर के समान ऊपर जाती है । बस, इस लो के ऊपर के भाग में जो वायुग्रत सोममय प्रज्वलित प्राण रहता है - प्रविधि भृगुः संबभूव - इस विज्ञान के अनुसार वही प्राण भृगु है । पर्बत-१ तै ० ब्रा ० २।२।४।२ । २ मनुस्मृति १।११ । ३ यास्क निरुक्त ३।१७ । [ ११ ]

पृष्ठ 20

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verse ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य पराविद्या निरूपण शिखरवत् इसकी स्थिति है, अतएव पर्वतशिखर को भी भृगु कहा जाता है । इस भृगु के दोनों छोरों में ' वामदेव ' प्राण रहता है । मध्य की घनीभूता ज्वाला ' जमदग्नि ' ( जमा हुआ घन श्रग्नि ) है एवं जहाँ से ज्वाला उठती है उस अंगार और ज्वाला के बीच में एक नीला स्तर रहता है । इसी प्रारण का नाम ' गौतम ' है । तीन प्रवान्तर प्राण इसी प्रषि में प्रोर होते हैं जिनका कि विस्तारभय से प्रकृत में निरूपण नहीं किया जा सकता । यहाँ केवल यहीं बतलाना है कि श्रचि - भाग के प्राणभेद से सात भेद हो जाते हैं । इन सातों की जो ऊपर की लो है वही अग्नि की सात जिल्ह्वा हैं, जैसा कि भागे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । ये सातों भृगु है- भार्गव हैं । सातों की समष्टिरूप प्रचि के नोचे ज्वलदङ्गार है । प्राच जलता हुधा सोम ( स्नेह ) है । सोम ही ज्वाला बनता हुआ ज्योति का कारण बना हुआ है । इसीलिए तो सोम के लिए स्थं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ' यह कहा जाता है । नीचे का भंगारा प्राण - प्रारष्यति सम्यमूद के धनुसार अंगिरा है । यह तेज तत्त्व है । इसके भवान्तर २१ भेद हैं । वही २१ अंगिरा हैं | अंगारे को बुझाकर फिर जलाने से जो प्राण पाएगा वह पथ यहा अङ्गारा मवशान्ताः पुनरुव दीप्यन्त - ग्रंथ बृहस्पतिरभवत् ' - के धनुसार बृहस्पति होगा । बुझा कर तीसरी बार जलाने से वह मरद्वाज होगा । इस प्रकार एक श्रृंगारे को भाप २१ बार जलाकर पुनः प्रज्वलित कीजिए, २१ बार नया प्रारण उत्पन्न होगा । ये ही २१ प्राण २१ मंगिरा है । बडा चमत्कार है । अंगिरा की दौड़ २१ बार तक ही है । २१ वीं बार में अंगिरा जल कर भस्म हो जाता है । २२ वीं बार उसे प्राप जलाने के लायक नहीं पा सकते । २१ तक ही अंगिराधारा चल सकती है । अथर्वा में जो त्रयी ब्रह्मविद्या बाई थो - यह सबसे पहले प्रथम अंगिरा में भाती है । अंगिरा की दूसरी भवस्था बृहस्पति है । बृहस्पतिः पूर्वेषामुतनो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः - के अनुसार बृहस्पति सूय्यं से ऊपर है । बृहस्पति से ऊपर ब्रह्मणस्पति है । ब्रह्मणस्पति से ऊपर सविता है । सविता से ऊपर प्रथर्वापरमेष्ठी है । सविता ब्रह्मणस्पति को छोड दीजिए । सविता वाग्रह है । ब्रह्मणस्पति सोमग्रह है । बृहस्पति अंगिरा है । प्रथर्वा की वेदविद्या इसी मंगिरा में भाती है । राजा, वाज, ग्रह, हवि, इन चार प्रकार के सोमों में से वाजसोम के अधिष्ठाता यही बृहस्पति हैं । अतएव वाजपेय यज्ञ को ( जो कि सोमयज्ञ रूप सौर - यज्ञ से ऊपर का यज्ञ है ) ' बृहस्पतिसव ' कहा जाता है । इस बृहस्पति से नीचे ' मरद्वाज प्राण ' है । वाजान्न के प्रेरक प्राण का नाम ही भरद्वाज है । अन्नमरणकरणार्थ ही यह प्राण ' घखाज ' कहलाता है । भंगिराग्नि सत्य है, सत्य की प्रतिष्ठा ऋत मन्त है । इस ऋत अन्न द्वारा भरद्वाज ही बृहस्पतिरूप अंगिरासत्य का वहन करता है, अतएव हम इस भरद्वाज के लिए सस्यवाहाय सत्यरक्षकाथ कह सकते हैं । भृगु का सम्बन्ध सजातीय सौम्य -ब्रह्मणस्पति से होता है एवं अंगिरा का सम्बन्ध धाग्नेय बृहस्पति से होता है । यही मंगिरा है । त्रयीवेद इसी में माता हैं । इसके द्वारा भरद्वाज में जाता है । भरद्वाज से सूर्य्यरूप धादित्य मंगिरा में घाता है । धादित्यरूप प्रत्यक्षदृष्ट अंगिरा - साक्षात् वेदत्रयी है । यह वेद - अंगिरात्रयी है, वह ब्रह्मत्रयी था । वह ब्रह्म निःश्वसित था, यह गायत्रीमात्रिक है 1 । सूय्यं के ऊपर रहने वाली व ० ३०४ अपौरुषेया है । उसे हम देखने - समझने में प्रसमर्थ हैं । सैषा भयो विद्या तपति ' वाले सौर वेदत्रयी का ही हमें ज्ञान हो १ ऋग्वेद मं ० १।६१।२२ । ४ ब्रह्म वेदत्रयी । २ यास्क निरुक्त ३।१७ । ५ मात ० वा ० १ | १ | ४ | ३ | ३ ऐ ० वा०-३।३४ । [ ११ ]