Mundakopanoshad — पृष्ठ 211–214

Mundakopanoshad · पृष्ठ 211–214

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तृ ates ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य विश्व - इन्द्रियाणि वैश्वानर सैक्स - प्रात कर्माणि - भूतप्रपचम् ' विज्ञानमयश्च मात्मा पञ्चप्राकृतात्मा १ इष्टव्य माण्डुक्योप ० ७ । [ २१३ ] महदक्षरनिरूपण प्राम • परेष्यध्ये सर्व एकीन ; है का देश से ग्रहण है । प्रारणरूप विश्वसंचालक ज्ञानमयकम्मं का कम्मणि से ग्रहण है । सौर - विज्ञान का विज्ञानमयेश्य में ग्रहण हैं । जीव ऐसे प्रजापति का अंश है, अतः पूर्णमदः पूर्णमिदं प इत्यादि के अनुसार इसमें इन सबकी सत्ता सिद्ध हो जाती है । मध्यात्मपद की शरीरकमाएँ इस विश्वकमा पर प्रतिष्ठित हैं । क्षर उस क्षर पर प्रतिष्ठित है, भक्षर उस धक्षर पर प्रतिष्ठित है एवं अव्यय उस व्यय पर प्रतिष्ठित है । परान्तकाल में जीव की सारी कलाएँ ईश्वर कलाओं में या मिली हैं । यहाँ का क्षर वहाँ के क्षर में मिलता है, अक्षर प्रक्षर में, अव्यय अव्यय में, देवता अपने प्रतिचम देवता में, प्राण प्राण में, विज्ञान सूर्य में, इस लय - क्रम से ' परमव्यय ' में सब लीन हो जाते हैं अथवा इस मन्त्र को जीवाव्यथपरक ही लगाना चाहिए । ' मध्यात्म में प्रथम पर है । अक्षर परावर है । क्षर प्रवर है । सारे देवता, सारे कर्म्म, सारे सुत विज्ञानादि क्षरयुक्त भोकात्मा सब झर पर प्रतिष्ठित हैं । भ्रात्मा से प्रकरणानुगत मोकात्मा अभिप्रेत है । मुक्तावस्थापनयुक्त का प्रात्मा - विज्ञानवान् भवति के अनुसार विज्ञानमय रहता है । ऐसा यह मात्मा सारे. कम्मै, सारे इन्द्रिय देवता, उसी उपथ क्षर में जाते । क्षर महदुक्य है । उसमें से देवता क सबै निकले हैं । देवता का प्रसंग उपथ है । कम्मं का घ er उपथ है । क्षरात्मा का अलग उपय है । इन सब उक्यों को भरने में रखने वाला प्रयोपशम ' नाम से प्रसिद्ध प्रक्षर महदुमय है । इसमें सब जब होते हैं । पक्षर की पांच कला है । ये पांचों क्रमशः मत प्रशाद में, बसाद बाद में, बाबू प्राप: में, आपः प्राण में लीन होकर एक कर रह जाता है । यह कर पञ्चाक्षर में लीन होम का विष्णु में मय होता है, अग्नि को इन्द्र में लय होता है, इन्द्रविष्णु का ब्रह्मा में लय होता है । इस प्रकार पांचों बक्षर एकरूप हो जाते हैं । यह युतपञ्चाक्षर सत्यरूप है । यह सत्य उस क्षररूप देवसत्य का अधिष्ठाता है, भतएब यह प्रक्षरतस्य सत्यस्य सत्यम् नाम से प्रसिद्ध है । यह ' सत्यस्य सत्यम् ' ( अक्षर ) उस पर नाम से प्रसिद्ध उस भव्यय में लीन होता है । यहाँ प्राकर सारा भेद नष्ट हो जाता है । सृष्टिकम जिस कम से है, उसी क्रम से प्रतिसृष्टि - क्रम है, यहीं तात्पर्य्यं है । अम्यय प्रक्षर बनता है । मर्जर कर बनता है । क्षरे वक्त महान - विज्ञान - प्राश - संश्वानर - तेजस- इन्द्रियग्राम - मूठग्राम शरीर बनता है । प्रतिसंचरकर्म भूर्तरूप रूम्मं, प्राकृर्तरूप पाँचों क्षरात्मा ( ज्ञानमय ), इन्द्रियदेवता, वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ मात्रेवाडी पन्द्रहों हलाएं, उस ' पर प्रव्यय ' में लीन हो जाती हैं । वाक् का प्राण में लय है । प्राण का अम सब मैन का विज्ञान में, विज्ञान का धानन्द में लय है । इस लयक्रम से परान्सकास सुद्ध अव्यय बच जाता । पञ्चदश कसा - प्रतिष्ठारूपा - प्रात्मत्वात्

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तृतीयद्वितीयखण्ड ) कामी गुण्डकोपनिषदिज्ञान का वैश्वानर में जन्य है ।तर का संजस में तय है । जसका में प्रश्न का विज्ञान में, विज्ञान का महान में, महान का प्रयक्त में लय है । व्यक्त से लब है । इस प्रकार दीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । प्रातंषितान्येव तत्र का परिवेषा " ॥ ' प्रतीयन्ते तत्रैवाव्यक्त " ॥ . के अनुसार सारा विश्व- प्रपत्र ( जिसमें पांच प्राकृतात्मा है -वीच देवसस्य हैं, इति है भूत-धान है । ” इसी अव्यक्त में लीन हो जाता बाकी बचता है - षोडशी । इसमें परात्पर वो वितीय बघत है १५ कलाएं । ये उस भ्रष्यत्मिविश्व की प्रतिष्ठा है । प्रतिश्र्वरूप ये ११ जनाल मी पूर्वोक्त मानुसार एक बैम्पय में लीन हो जाती है । १५ १५ पूना, जाता रहता है । सत्य प्रवास रह जाता है । इतना काम परान्तकाल में मध्यात्म में ही रह जाता है । इसी सयम का करती प्रेतेरेय श्रुति कहती वारं पिचियं समेति जो बुक्ता श्रभियत् संचहन्ति सस्य सत्यनु यत्र युज्यते तथ देवाः सर्व एक भवन्ति fele VER RE साठणे प्र W15 21 ST FA BE FI N Firs # METR 3r AT PIE भी Tr 5 अमीर है है । इससे विकसते अलीक उस 14 कोई मिली है समुद्र में से महन्त हृदियां निकलती है । समुद्र नदियां मशरूपा है । कोई गंगा है । कोई प्रसुना है । कोई वक्त है. तब तक नाम रूप - कर्म से विश - मिल हैं । परन्तु अन्तकाल में समुद्र में प पाप को छोड़ देती हैं । सबका समुद्र ही नाम हो जाता है. 1. ईश् है । नल जी इसके प्रबंधु है । मकान में एकीभूत होकर सह एकीभूप नामरूप तक का परित्याग करता हुआ, उस दिव्य परात्पर नाम से प्रसिद्ध परपुरुष में लीन हो जाता है । तात्पय्यं यही है कि जीवाष्पय पर है । ईश्वराब्यय इस पर से भी परे है । इसलिए श्रुति ने इस ईश्वराज्यय को जीवाव्यय से पृथक् दिखलाने के लिएपरात्य कहा है से वह लण्ड को नहीं है । वहा तो मिप्त है । उसके लिए उपतिनहीं कहा जा सकता । सम्भव है - उपैति से भी कोई इस रहस्य को न समझे इसलिए ऋषि ने विव्यम् कहा है । बिम्पो झमूर्तः पुरुषः परात्परमः परैः ० - इत्यादि से दिव्यशब्द ईश्वराष्यय का वाचक है - जैसा कि वहीं इस बुद्धि के में जमा " लिया गया है । १ गीता २।२८ । ३ ऐ ० प्रा ० २३८।२० । २ गीता ६।१८ । ४ वाष्पीकरण प्रक्रिया द्वारा । [ २४ ]

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मुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य जीव rore की सारी कलाएँ नष्ट हो जाती हैं । शुद्ध जीवोव्यय रह जाता है । यह जीवाव्यय उस परात्पर पुरा में चला जाता है । एक तमोर - मज यय--" अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भवान्यात्मावग्रहः ॥ 30 1 25 के अनुसार प्राररूप पराप्रकृति को भागे करके ही जीवरूप में परिणत होता है । धाता द्वारा जाता भी है अक्षर के द्वारा । इस विज्ञान को लक्ष्य में रखकर महीदास कहते हैं--Thprsk AG मेति मुक्तक मुक्त अभिसिं सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति शिव का निम्नलिखित वर्ष भी किया जा सकता है मासे विक्स होकर पहले अपने बाध्यात्मक पर ' में ( अध्यय में ) लीक होता है : केज विषय पर ईश्वरा में उकरतातीत हो जाता है-insp mal p " सर्वा: कला जोवपर ( जीवाभ्यये ) एकी भवन्ति इति सप्तममत्रिणीसम् कनिष्कला जीवात्मानमात्सा निकलातु - परात ( जोडण्यात् ) काही. ( आंतिक 1 ॥ ८ ॥

कीट FIPB क इस उपनिषत् विद्या का उपक्रम प्रक्षर है - उपसंहार भी अक्षर है । प्रधानरूप से इसमें अक्षर । उसी के सम्बन्ध में पूर्व के मन्त्रों में अव्यय का भी निरूपण mee aasurine read कर दिया है । वस्तुतः नाम से प्रसिद्ध पारा ही है, अंतः उसी पर उपसंहार अक्षरबहा कहते है तो जो विद्वान नेता यह प्र भी के अनुसार स्वयं रू हैं । अपि - इस ब्रह्मवित् के कुल में ब्रह्मज्ञान से कोई भी शून्य नहीं रहता है ।, यह शाक्त पाइस ( बन्धनरूप ) सारे शोकसमुद्र से तरण कर जाता है । श्रात्मरूप होता हुआ विश्वीतीत हो जाता है । प्रन्थिश्रय से विमुक्त होकर जरामररारराहत होता हुआ अमृतभाव ( भारताव ) को प्राप्त हो जाता है । १ गीता ४।६ । २ ऐ ० था ० २३८२० । [ २१५ ]

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( द्वितीय ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य अधिकारिस्वरूप निरूपणम् महदक्षरनिरूपण पूर्वोक्त उपनिषद् विद्या पति रहस्यमयी विद्या है, अतः साधारण मनुष्य वस्त्रभमतानुसार महामह जीव के व्यवण के अधिकारी नहीं है- इसके प्राधिकारी निधिका बीच ही हो सुखते हैं । क्योंकि वही धागे जाकर धात्मा से अनुगृहीत हो सकते हैं । उपनिषदान की बहनता के uge afv कारी का निर्वचन करते हुए ऋचा कहती है-जो किया है - मर्याद सुनकर तदनुकूल क्रिया करने वाले हैं, जो वेदशास्त्र पसे हुए है एवं शाननिष्ठ है- ( फोरा वेद पढ़ना भी निरर्थक है जब तक कि उसका सम्मान हो, विषय, नहीं है - मपि तु तद्द्वारा बा पर सभ्य रहना वेद पढ़ना ' बेद पढता है एवं पढापूर्वक एकप ' में ( मास्थाग्नि में ) प्राहुति देने वाले है एवं जिन्होंने विपूर्वक शिरोत जियो है, उन्हीं को इसका उपदेश देना चाहिए । यशसत्य - वेवसत्य - ब्रह्यसत्य नाम से प्रसिद्ध तीनों सस्यों के प्रभव - प्रतिष्ठान्परायणरूप इसी धमूतरूप करस्य का ऋषि अंगिरा ने विधिवत् उपसन्न शौनक के लिए पहले कहा था । बचत ' मनुष्य इसके पढ़ने का, सुनने का अधिकारी नहीं है । जिन ऋषियों ने इस सत्यविद्या का लोका उपदेश दिया है, हम उनको बार - बार नमस्कार करते हैं । श्रात्मसमर्पण करते हैं । स्वाहा स्वधा नदिनेः बहू से वह कई प्रकार के होते हैं । इनमें मनुष्य यदि दूसरे मनुष्य के प्रति अपना शास्था उमर्पित करता of वह उसका एक प्रकार से पत्र बनता है । इस मनुष्य सम्बन्धी प्रत कहा जाता है । हम ऋषियों के मन - मोग्य हैं । उनका शासन, भाज्ञा, उपदेश हमें सर्वोत्पता सर्वेषा स्वीकार हैं । धर्मका अनुधावन सर्वथा सत्य है । उसके सामने हम अपना मस्तक झुकाकर उनकी शरण में जाते है क्योंकि की शरणामति हमें मुद्दाप्रन्थियों से विमुक्त कर सकती है । ॥ इति परानुक्तिसाधक - अध्ययद्वा रकम हदक्ष र निरूपणात्मको द्वितीयः खण्डः समाप्तः ॥ ॥२ ॥

" ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । निरेरी स्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो " बृहस्पतिर्दधातु " ॥ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ इति यज्ञ - सेव - मासस्य निरूपणद्वारिका हिरण्यगर्भमूला अक्षरसत्य-निरूपणपरा अथर्ववेदीया मुण्डकोपनिषत् समाप्ता १ इस एकषि प्राणाग्नि का ( मात्माग्नि का ) निरूपण ईशोपनिषद के पूषन्ने कर्षे ० इत्यादि मन्त्रार्थ में देखना चाहिए । { २१६ ।