Mundakopanoshad — पृष्ठ 201–210
Mundakopanoshad · पृष्ठ 201–210
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तृतीयण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानाच्य महदक्षरनिरूपण प्रमृत - ब्रह्म - शुक्र तीनों को हमने क्रमशः ग्राम - क्षण - पशु यौनि कहा है । प्रमृत पोष ह ब्रह्मः प्राण - प्रापः - वाक् - प्रर्ष असद है एवं ब्रह्मा समन्वयात् सिद्धं हवं तु के अनुसार सुबहा आपः ( म्यङ्गिरा ) गमित ब्रह्माग्नि शुक्र है । साप रहित प्रकाश रोचि है । तापसहित प्रकाश शौचि है । शोचि हो शुक्र है । खप्ताचिका के अनुसार शुक साक्षाद धमि है । परन्तु केवल अग्नि शुरू नहीं है । धरितु, अमित प्रति शुरू है । प्रमाग सुबा कहलाता है । श्रमिभाग ब्रह्म हैं । पुरुष के शुक्र में आप दोनों का प्रत्यक्ष कर सकते हैं । शुक्र में पानी तो प्रत्यक्ष है हीं । यह सुबह्य मार्ग हैं । सांकहीं । में यह प्रतित है । वही बहा है । दोनों की समष्टि शुरू है । स्वयम् काष्ठी सुबल, दोनों मिलकार हुआ है । इसी से आगे की मैयुमोष्ट होती है । इस शुरु से सृष्टि होती है एक - सह से सत्य सृष्टि होती है । ममृत से प्रात्मसृष्टि होता इस प्रकार तीन प्रजापतिसंस्थाएं ही जाती है--१ -- अमृतात्मसंस्थप्रजापति = परुिषं ब्रह्म = निरुक्तप्रजापति - पुरुषः २- सत्यात्मसंस्थ प्रजापति ३- यशात्मसंस्थप्रजापति = शुक्रियं ब्रह्म + सर्वप्रजापति शुक्रिया का भाषार प्राकृतं ब्रह्म है । प्राकृत ब्रह्म का आधार - पौरुषं ब्रह्य है । शुक्र का भाधार ब्रह्म है । ब्रह्म का प्राधार प्रमृत हैं । शुक्रसृष्टि चूंकि ब्रह्म पर प्रतिष्ठित है, अतएव हम ब्रह्म को शुक्र का धाम ( प्रतिष्ठास्थान ) कहने के लिए तय्यार हैं एवं ब्रह्म ( स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी ) उस अमृत ( षोडशी गुढोत्मा ) पर प्रतिष्ठित हैं । प्रचापतिः प्रथाः पृष्ठवा भवभयब के अनुसार कोसीवात्म-संस्थ प्रजापति ने क्षरभाग से अक्षर द्वारा विश्व ( ब्रह्म ) उत्पन्न कर उसे अपने में प्रतिष्ठित करता होड-चूंकि शुश्रूषामरूप ब्रह्म ममृतरूप षोडशी पर प्रतिष्ठित है, भक्एब षोडशी को हम यही ( महा का घाम ) कहने के लिए तय्यार हैं । arraged in renu में अधिष्ठान बतलाया गया है एवं क्षर ( आत्मक्षर ) की पीरमण बतलाया गया है । अक्षर को निमित्त बतलाया है । इस पुरुष प्रकृति के समन्वय से ब्रह्मरूप ( स ) सृष्टि होती है । पाँच मण्डली के बो पाँच प्राकृतात्माओं की समष्टि है - वह वेदमूला है, अतः इन पांच को संयष्टि को हम बह्य कहने के लिए तय्यार हैं एवं मृगु अंगिरा के समन्वय से सुब्रह्म रूप अस्यस्त्रासस्य उत्पन्न होता है । इससे पांचों आत्माओं के पचि पिण्ड बनते है । इनका शुक्र से सम्बन्ध है । सुब्रह्मरूप शुक्रात्मकं पिण्ड का धाम वही आत्मरूप ब्रह्म हैं । सुदा का वाम वही पोडशी पुरुष हैं । इसी में साथ विश्व प्रतिष्ठित है । ब्रह्मधाम नाम से प्रसिद्ध षोडशी पुरुष ही कठादि में गुठीमा नाम से प्रसिद्ध है । यह है- मन्त्रगत ब्रह्मषाम शब्द का स्वरूप परिचय । यह है- ज्ञानकाण्ड । उपासना काण्ड में इसी षोडशीपुरुष ब्रह्मरूप ब्रह्मघाम के तीन विभाग कर दिए जाते हैं । ब्रह्मधाम अव्यय - अक्षर क्षारात्मक है । क्षरदृष्टि से भी उसकी उपासना की जा सकती है । वही उपासना प्रकार प्रतब विद्या -प्रतिष्ठापि [ २०३ ]
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तृतीय ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य महदक्षरनिरूपण विवियाभादि नामों से प्रसिद्ध हैं । अव्ययदृष्टि से भी उस ब्रह्मधाम की उपासना की जा सकती है । वही उपासनाप्रकार अश्वत्थ - विद्या, ऊर्ध्वमूला - स्वयम्भूविद्या आदि नामों से प्रसिद्ध हैं । प्रक्षर हृष्ट्वा भी उस ब्रह्मधाम की उपासना की जा सकती है । वही उपासनाप्रकार उद्गीयविद्या - हिरण्य-वर्णविद्या- हृदयमूला सूर्य्यविद्या प्रादि नामों से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों में से हमारे इस मुण्डकोपनिषत् ' में. अधारमूला ब्रह्मधाम की उपासना का ही प्रकार बतलाया गया है । इस उपनिषत् में हिरण्यगर्भविद्या का, दूसरे शब्दों में अक्षरविद्या का ही निरूपण है, अतएव मन्त्रगत ब्रह्मधाम समय से हम अक्षर का ही ग्रहण करेंगे । यहां ब्रह्मधाम से अक्षरभाग का ग्रहण है । इसीलिए महषि ने परमं कहा है । अक्षर ही पण कहलाता है । यही अक्षर परम ब्रह्मधाम नाम से प्रसिद्ध है । प्रसंगागत एक बात और बतला देते हैं । संप्रदाय के प्रवर्तक भगवान् वल्लभाचार्य ने प्रक्षर को विष्णुधाम माना है । उनका कहना है कि मोलोकनाथ विष्णु अक्षर पर प्रतिष्ठित हैं । विश्व उनका भवरधाम है । प्रक्षर परमधाम है । बात बिल्कुल ' यथार्थ है । अक्षर पर अव्यय प्रविष्ठित है । प्रव्यय के लिए प्रवश्य ही अक्षर परषाम है । पक्षर प्राप्त होने पर आवागमन शुट जाता है । इसी अभिप्राय सेयं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ( प्रम्ययस्य ) -यह कहा जाता है । तबृक्षिष्णोः परमं पदम् - का धर्थ करते हुए कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य में बतलाया जा चुका है कि विष्णु साक्षात् पव्यम पुरुष है । कहना सारे प्रपञ्च से प्रकृत में केवल यही है कि प्रकार परम ब्रह्मषाम है । उसी में ब्रह्म सुब्रह्मरूप सारा विश्व प्रतिष्ठित हैं । जो कामना छोडकर इस ब्रह्मधाम की ( अक्षर की उपासना करते हैं, वे ही उस विश्वरूप शुक्र का प्रतिक्रमण करने में समर्थ हो सकते हैं । १-२ तृतीयमुण्डक के प्रथमखण्ड में प्रपरामुक्ति से सम्बन्ध रखने वाले विज्ञानाक्षर का निरूपण है । यपि इस द्वितीयखण्ड में भी निरूपण इसी का है । इसी खण्ड में क्यों? सारे उपनिषत् का ही प्रधान लक्ष्य. हिरण्यमूलक विज्ञानाक्षर पर है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । परन्तु विज्ञानाक्षर के साथ - साथ दूसरे मुण्डक में विज्ञानक्षर के साथ - द्वादिः संनिहितं ही महदक्षर भव्ययादि पर भी दृष्टि डाली गई है । गृहाचरं नाम व्यात् पदम् इत्यादि रूप से महवक्षर का भी निरूपण है । प्राज इस तृतीयमुण्डक के faatravr में अक्षर के साथ अभ्यय पर भी दृष्टि है । जैसा कि छठे मन्त्र से स्पष्ट हो जाएगा । विज्ञान - क्षर से मुक्ति होती है, परन्तु धपरामुक्ति होती है । सारी गुहाग्रन्थियों से छुटकारा नहीं होता । कहने को भरा मुक्ति में द्वैतावीतता है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । इसीलिए तो विज्ञान क्षरमात्र के उपासक के लिए यं यं लोकं मनसा संविभाति यह कहा है । वह यथाकाम यथाचार बन जाता है । विशुद्धसत्त्वा हो जाता है । परन्तु कामना की एकान्ततः निवृत्ति नहीं है, अतएव द्वैतातीत नहीं है । तभी तो लोक - संचरण बन सकता है । विज्ञानाक्षर के ऊपर महदक्षर है । महान् का ही नाम शुरू है । मह-१ मैत्री उपनिषत् भी अक्षरविद्या का ही निरूपण करती हूं । २ म्रष्टव्य - मुण्डकोप ० ३।११ ९ । [ २०४ ' ]
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तृतीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य महदक्षरनिरूपण ' हक्षर के ऊपर अव्यय है । शुक्र कामना का बीज है । जब तक उसके पार नहीं पहुंच जाता तब तक थम्य नहीं मिलता एवं बिना भ्रव्यय पर पहुंचे परामुक्तिरूप समवलय नहीं होता । बस, इस द्वितीय-खण्ड में उसी की प्राप्ति का उपाय है । महदक्षर महत् हैं । परमधाम है । वही महदक्षर शुक्रातीत है । महान शुक्र है । उससे ऊपर महदक्षर है । शुक्र सारे विश्व का उपादान है । शुक्र भक्षरयुक्त है, भतः धारस्म के मन्त्र में महदार को विष्व का भालम्बन माना है । भासम्बनता धव्यय से सम्बन्ध रखती है । महदार भम्पयाविना भूत है, मतः धव्ययमय उस परम ब्रह्मधामरूप महदक्षर के लिए - बच विश्वं हिले-कहा है । उस महदार की प्राप्ति का उपाय चद्यपि है उपासना ही । क्योंकि बिनो उपासना के उस पर पति नहीं । महदविशिष्ट होने से वह सोपाधिक है । सोपाधिक की प्राप्ति उपासना से ही सम्बन्न रखती है । परन्तु शुक्र का प्रतिक्रमण करवाने वाली विज्ञानक्षर की उपासना नहीं है क्योंकि दिशा-माक्षर से सौर अक्षर प्राप्त होता है । शुक्ररूप महान् ( परमेष्ठी ) इससे ऊपर है । उसके प्रतिक्रमण के लिए महदक्षर की उपासना अपेक्षित है । इस उपासना से महत् शुक्र छूट जाता है एवं कामना से एका-सतः विनिर्मुक्त होता हुआ, यह उपासक उस अक्षरविशिष्ट श्रव्यय को प्राप्त करता हुआ, हेतातीत हो जाता है । बस, यह द्वितीयखण्ड इसी घयं का निरूपण करता हुआ हमारे सामने घाता है यह महदक्षर कैसे प्राप्त किया जा सकता है? बस, भागे से इसी पर्थ का निरूपण चलता है । वह महवात्मा, जिसे कि हम - हासुपर्णा ० के अनुरोध से ईश्वर कहेंगे ( जो कि अध्यात्म में ही साक्षीरूप से प्रविष्ट है ) प्राप्तव्य है एवं विज्ञानप्रज्ञानसंपरिष्वक्त भोक्तात्मा प्राप्त करने वाला है । यह उसे कैसे पा सकता है? यह प्रश्न है । इसका समाधान करते हुए ऋषि कहते हैं -" नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेघया न बहुना भूतेन । यमेवैष वणुते तेन लभ्यस्तस्यैव थात्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ” by, pu एक मनुष्य को सामने बैठा लो । तुम्हारे सामने बैठा हुम्रा वह मनुष्य मान्य बुद्धिमान है । पराकाष्ठा का मेघावी है । जो बात एक बार सुन लेता है, जीवनभर उसे नहीं भूलता । चाथ ही में इसने मेववेदाङ्गादि सारे शास्त्रों का प्रध्ययन कर रखा है । वह श्रुत है, परन्तु उसने कमी भाज नहीं लाया है! मात्र का स्वाद कैसा होता है? यह वह नहीं जानता । भय प्राप उसे समझाइए कि मान का स्वार मधुर होता है । ऐसा होता है । वैसा होता है । हम दावे के साथ प्राप से यह कहने का साहस करते हैं कि एक जन्म में तो क्या, जन्मसहस्रों में मी प्रवचन द्वारा ( शब्दप्रपञ्च द्वारा ) स्वानुभूत भा प्रस्वाद का ज्ञान नहीं करवा सकते । स्वाद मानन्द है । मात्मा का स्वरूप है । अनिर्वचनीय है । भला, सांसारिक विषयानन्दों को ही जब भाप शब्द द्वारा नहीं बता सकते तो फिर विषयातीत आत्मानन्द की तो कथा ही क्या है? उसे आम्रस्वाद मालूम हो सकता है । इसका एकमात्र उपाय है । वह यदि स्वयं आम्ररस पान करेगा तो उसे उसका मानन्द भा जाएगा । जो अपने आप उसका अनुभव करेगा, उसे ही वह मिलेगा । प्रानन्द स्वानुभव कगम्य तत्त्व है । [ २०५ ]
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तृतीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य महदक्षरविण सिखाए से, बुद्धिमान होने से, बहुश्रुत होने से वह नहीं मिलता । भ्रप्राप्तवस्तु को प्राप्त करना, मिलना है । आत्मानन्द प्राप्त है । उसे अन्य स्थान से नहीं लाना है । फिर अन्य साघन उसकी प्राप्ति के ' कारण कैसे बन सकते हैं? बस, सारे श्रुतिवचनों का यही निष्कर्ष है । छ, हो त बुद्धिमान् हो । बहुश्रुत हो । परन्तु क्या हुआ? भ्रात्मप्राप्ति के लिए हमारे व्यर्थ है । हो, इतनी बात अवश्य है कि यह साधन धावरण की अवश्य हटा देते हैं । - एकान्ततः यहीं हमारे सब तक खूब सुनो- खूब सुनाओ, कुछ नहीं होगा । " कुछ नहीं होस । उटको प्राप्त करने का उपाय है विशुद्ध सत्व बन जाना । शुकका सेव -किए हुए हैं । शुक्ररूप महान् महानात्मा है । इन संस्कारों से इसमें मलिन स्वरेज-भादा हो रहा है । जन्म से सस्यमतिन हो रहा है । अक्षार तिन भारमाश्व-ब ) वर मोकात्मा के बीच में यही तमोरूप वावरण ना रहा है । सोशात्मा का अंश है है । यह कोता है । यह साक्षी है । यदि यह उसके साथ एकीबाब को प्राप्त हो जाता है तो पैसा-कोषामध्यतित महत् ( शुक्र ) का अतिक्रमण कहने में समर्थ हो जाता है । परन्तु इसमें प्रति-बन्धक वही साप राम बन हा है । यह से उसके साथ नहीं मिलने -..अक्षर ( सह तिष्ठत सदसदिनन्यमन - अंशी समाय सहल शुरू संस्कायु - प्रावरणांतिक अतएव शुकारिवर्तन का प्रभाव भोकात्मा = मंश = प्राप्तकर्त्ता भोकात्मा उसमें चला जाए यह काम शास्त्रों का नहीं है । क्यों कि शास्त्र शब्दप्रपञ्च है । वह पाती है । वह ती उसमें सब हो जाएगा जब कि उस अंशी का इस पर अनुग्रह होगा । वह इसे स्वयं अपनाएगा तभी इसका छुटकारा सम्भव है । पुत्र कुपुत्र है! व्यभिचार - सुरापानस्य प्रादि कमी वह ऐसा दुराचारी बन गया है कि धोरों को जाने दीजिए स्वयं पिता ने उससे सम्बन्ध हटा " लिया है । ' पिता बडा मासदार है - सम्पन्न है, परन्तु दुराचारी पुत्र की वह सम्पति से बस्ति रखता है । इस दुराचार की कृपा से, पिता का अनुग्रह हट रहा है पतंएव यह मारा - मारा फिरता है । सर्वत्र तिर-" स्कार का भागी बनता है । समझनि वाले हजार प्रयत्न करें, परन्तु वे कभी पुत्र पर पिता का अनुग्रह नहीं करवा सकते क्योंकि दुराचार प्रतिबन्धक बन रहा है । हाँ, यदि समझाने वाले कर सकते हैं तो प्रदेशादि से इतना अवश्य कर सकते हैं कि वे इसे बुरे मार्ग से रोक सकते हैं । यदि उपदेश के सकल चलता हुआ यह अपने दुराचार छोड़ देता है तो प्रतिबन्धक के हट जाने से सम्बन्धविच्छेत् पिता इन इसे अपना लेता है । छाती से लगा लेता है एवं पुत्र पुनः मानन्द का अधिकारी बन जाता है । बख, ठीक यही स्थिति यहाँ है । ate a free पिता प्रजापति को पा लिया है । इसी से यह उससे का अंश हैं जुज है । परन्तु प्रज्ञापराध से इसने वासना - पुज नहीं मिल सकता । उसका अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकता । [ २०६ ]
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( द्वितीय खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्वान भाष्य इसके लिए इसे पूर्व में बतलाए हुए तप सत्म- वेदानुकखन आदि उत्तयों को अपनाना चाहिए । कासान्तर के अभ्यास के अनन्तर श्रवण, मनन, निदिध्यासन द्वारा वह भाग जाएगा । हटने से इसका सत्व ( महान् ) विशुद्ध हो जाएगा । वही प्रावर तो मन बह जाता है तो उस धन का इस पर अनुग्रह हो जाता है । प्रावरण से जिस पाल्मा से इस कर रखा था - धाने स्वरूप को छुपा रखा था वही प्रावरण हट जाते से स - प्रात्तसुताः के अनुसार अपने पाप को उसके सामने प्रकटदेता है सेवाभाय बना सकते हैं, परन्तु कामादव उसके ग्राम का काम है । बहुश्रुत कीया भारत को है, करुणा से कारण हो वह स्वयं ही । वह अपने ग्राप को प्रकट कर देता है इसका कांही हट से: यह अंश उस धन से युक्त हो जाता है । बाकरण हटता ही उसका करण करताओं ही नएको प्ति है । शुद्धाद्वेतक वल्लभाचार्य ने इसको मनु कहा है । अभी तक वह बंद होने से कीत पा परन्तु चाष वह उसे प्राप्त होकर व्रत बन जाता है - विषुम बन जाता है । बह को प्रात्रामय से वह किया है । ऐसे ही जी पुष्ट सहना है भगवदनुग्रह से अनुग्रहीत ऐसे मुक्ति के अधिकारी जीवों की समष्टि हो पुष्टि संप्रदाय है । पुष्टिमार्ग है । ' ' जिनका संस्कार नहीं हटा है अपितु, जोदुराचार में लीन हो रहे है उनकी पायस्य -यह परि " स्थिति हैं । " ऐसे दुराचारी मनुष्य संसारसमुद्रप्रवाह में तृणवत् इसर - उधर मारे मारे किल-माचायं ने ऐसे जीवों को प्रवाहिनी कहा है । परन्तु जो शास्त्रमार्ग पर मार हैं, “ मर्गवासि के लिए वासना को हटाना चाहते हैं, तदयं शास्त्रविहित मर्यादा पर भारत हैं उन्हें मर्स्थापित जीव कहा है । यथार्थ है । जीव की तीन ही स्थिति हो सकती । विषयवासनाओं में लिप्त रहकर संसार-च में फँसे रहना पहली स्थिति है । शास्त्रीय मार्ग पर चलकर वासना को दूर करने का प्रयास करते रहना दूसरी स्थिति है एवं शास्त्रप्रभाव से श्रीनसेवा होकर, सहनु को प्राप्त कर लेना- भगवद्भक्त बन जाना तीसरा मार्ग है । इन्हीं तीनों के लिए बाचार्य ने क्रमशः - प्रवा हिजीब, मर्यादित जी, पुष्टजीव ये तीन नाम रखे है । पुष्टजी पोत सुखे शुद्ध तानेव भवति के अनुसार शुद्ध ' बनकर उस शु मिल जाता है, प्रवर्ूव इस सम्प्रदाय को शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय कहा जाता है । लोककल्याणां मगवदंश से अवतीर्ण पूज्य--पाव माचायों के ऐसे गहून तास्विक यथार्थ श्रुतिमूलक सिद्धान्तों को न समझकर सम्प्रदाय को करने वाले इन्द्रियलोलुप स्वाथियों ने भगवदनुग्रह का यह तात्प्रम्यं समझ रखा है, कि भगवान, जिस पर कृपा करते हैं, चाहे वह दुराचारी ही क्यों न हो, मैं उसे अपना लेता हूँ । अपनी स्वायसिद्धि के लिए ये स्वार्थी-" अपि चेत्सुदुराचारो अजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्य: सम्यख्यवसितो हि सः ” । ' १ गीता ९ ।३० । | २०७३ 2013 Fa
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teree ( factres ड ) guest पनिषद्विज्ञान भाष्य महदक्षरनिरूपण के असली मम्मं को न समझकर ऐसे वाक्यों से साधारण जनतामें निरा भ्रम फैलाने का साहस कर डालते हैं । हाथ में माला - मुंह में नाम बगल में छुरी, दिखाऊ तिलक लगानेवाले इन बकश्रेष्ठों में भाज इस देश में कितना प्रत्याचार फैला रखा है । इसमें कुछ नहीं कहना है । इन्हीं की कृपा से परम पवित्र बनातनधर्म साधारण मनुष्यों के द्वारा समालोचना का विषय बन रहा है । सुदुराचारः में सु पद नग रहा है । प्रथमसण्ड में बतला भाए हैं कि जो निष्काम भक्तियोग करता है - उस पर संस्कार का लेप नहीं होता पतएव यह अच्छा बुरा सब कुछ करता हुआ भी प्रकर्ता रहता है । म स मातृवर्धन होमले नस -आदि वचन इसी मर्य को पुष्ट करते हैं । कहने को पीसने में वह दुराचारी है । भग-बात है कि जो सर्वधम्मं परित्यागलक्षण निष्काम भक्तियोग कर रहा है, वह तुम्हारी दृष्टि में बुरा-बारी है, परंतु यथार्थ में वह दुराचारी नहीं है । ऐसा दुराचारी भी अच्छा है । सुदुराचारी है, क्योंकि उसने व्यवसायद्धि को प्राप्त कर लिया है । इस प्रपञ्च से कहना यही है कि यथा राजा तथा प्रथा-के अनुसार इस अनर्थ का मूल, पवित्रगद्दी की शोभामात्र प्राजकस के प्राचार्य ही है, भ्रतः उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे दिन - दिन बढनेवाले प्रघमंमूलक प्रविश्वास को दूर करें । एसवर्ष अपने गद्दी के प्रथम हाचार्य के चरित्र की उपासना करें । जिस दिन ऐसा होगा । उसी दिन भारत का कल्याण होना । आरे से प्रत में हमें केवल यही बतलाना है कि uret ज्ञान स्वयमेव मिलता है । अपने साथ ही उसे सोचना चाहिए । परन्तु इसके लिए विशुद्धसत्व होना अपेक्षित है । तदर्थं श्रुत्युक्त सत्य, तप, खान की अपेक्षित हैं । परम्परया इनको भी कारणता है यही ध्वनि है । # # # इसी को शब्दरूप में प्रकट करते हुए ऋषि कहते हैं-" मायमात्मा बलहोनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष श्रात्मा दिसते: ब्रह्मवाम " ॥ जिसका सत्व मसिन रहता है - उसका प्रात्मा निर्बल रहता है । प्रात्मा का बल विशुद्धसस्य है । हूँ । इस पर वह साक्षी प्रतिष्ठित है । एक राजा का मामूली सा सिपाही-मगरखेत का तिरस्कार करने में समर्थ हो जाता है, जो कि नगरसेठ ऐसे छप्पन सौ साठ सिपाही मोल लेकर छोड देने का सामध्यं रखता है । कारण इसका राजबल है । राजा के बल ने इसे सबल बना रखा है । यह राजा का अंश है । राजाज्ञा राजा का अंश है | भाग है । तयुक्त सिपाही भी राजाशारूप बन रहा है । बस, इस भक्तिर्बल के प्रभाव से यह निर्बल सबल बन रहा है । वही बात यहीं है । यदि मिठा हट जाती है तो उससे युक्त होकर भोक्ता उस धन - बल से सबल होता हुधा उसे प्राप्त कर लेता है । बलहीन के लिए वह प्राप्य है । वह प्राप्ति साधनभूत सत्त्वबल - सत्य द्वारा प्राप्त होता है । प्रथमखण्ड में सत्यतत्त्व का विवाद निरूपण किया जा चुका है, प्रतएव यहाँ उसे दोहराने की आवश्यकता । २०० ।
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तृतीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) १ गीता ३३६ । ४ कठोप ० ११३१४ | मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य २ ऋग्वेद मं ० १।११५।१ । ५ कठोप ० १।३।७ । [ २०६ ] महदक्षरनिरूपण ३ कठोप ० १ / २१६,८,६ ६ गीता १८।५ । नहीं है । ' खल ' क्रिया का नाम है । क्रिया कर्मयोग है । यज्ञ ही कर्मयोग है । श्रयीसत्य पर प्रतिष्ठित क्रियामय बलसाधक यज्ञसत्य ही भात्मा का बल है । निष्काम यज्ञकम्मं बन्धन का कारण नहीं है, अपितु, आत्मानुयोगी है, मतएव इसके लिए यशार्थात् कर्म्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कम्मंब - धनः । ' -यह कहा जाता है । इससे प्रात्मा में बल माता है । भोक्तारमा पार्थिव श्राकर्षण में बद्ध रह कर दिव्यबस से हीन हो रहा है । मोक्तात्मा का प्रभव- प्रतिष्ठा परायण त्रयीमय सुम्पं है । इसीलिए तो-सु वा परस्पर - यह कहा जाता है । सौर - प्राण के सबल होने पर प्रात्मा सबल रहता है । परन्तु इसमें स्वभाव से ही पार्थिवप्राण प्रबल है । इससे भौतिक बल तो बढ रहा है, परन्तु धात्मबल कम हो रहा हैं । सौर - मात्मा ही विज्ञानात्मा कहलाता है । वह विज्ञानबल पार्थिवबल की प्रधानता से अब रहा है एवं यह धात्मा- ' तह विज्ञानेन परिपश्यन्ति घोराः ' -" यस्तु विज्ञानवान् भवति युकेन मनसा सदा । स तु तत् पदमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ” ॥ " -के अनुसार विज्ञानगम्य है - ज्ञानगम्य है । मन का संयम प्रधानतया अपेक्षित है । पार्थिव प्रधानता से मनोबल ( प्रशामबल ) बढ रहा है, विज्ञानबल कम हो रहा है । मन के वशवली भोकात्मा पियों में फँसा रहता है । ऋषि कहते हैं कि यदि तुम उस तस्व को प्राप्त करना चाहते हो तो अपना विज्ञान- बम बढायो । जिसका विज्ञानबल कम रहता है, उसका मन प्रबल हो जाता है । ऐसा अयुक्तमन बन्धन का कारण बन जाता है--" ग्रात्मेन्द्रियमनोयुकं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः " । " अनुसार वैश्वानर - चैजस - प्रात की समष्टिरूप देवसत्या, प्रज्ञानमन, इन्द्रियाँ यह भोक्तात्मा है । यह विज्ञान के बिना निर्बल बन रहा है । ऐसा निर्बंल अयुक्तमना आत्मा-" यस्तु प्रविज्ञानवान् भवति प्रमनस्कः सदाऽशुचिः । न स तत् पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति " ॥ " -के अनुसार संसार में ही फंसा रहता है । एक तरफ विश्वातीत भात्मा है, एक तरफ विश्व है । मध्य में गन्ता आत्मा है । भ्रात्मा सूर्य्यरूप विज्ञान से ऊपर है । विश्व नीचे है । निर्बलविज्ञान विश्व की बोर ले जाता है । सबल विज्ञान आत्मा की भोर ले जाता है । इस विज्ञान को सबल बनाने का उपाय है-निष्कामयज्ञ । सूर्य्यविज्ञान त्रयीमय है । यश त्रयीमय होने से विज्ञानवर्धक है । इसीलिए तो इसके लिए-म स्वयं कार्यमेव तत् " - यह कहा जाता है । विज्ञानबल ही उसकी प्राप्ति का कारण हैं । तदर्थं - निष्काम-बुद्धधा कर्मयोग में प्रवृत्त रहना चाहिए । बस, नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ० का यही तात्पर्य्यं है-
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तृत terush ( द्वितीय खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य
' नाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्क्रियः " ॥
- के अनुसार वही सच्चा आत्म जिज्ञासु है । परन्तु सावघान— " उतिष्ठत! जावत! प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता बुरत्थ्या दुर्गे पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥ हुन्छ p -के अनुसार यह मार्ग खांडे की घार है । जरा चूकते ही पतन है । यज्ञ करते हो - बॉब के लिए । यदि जरा भी आसक्ति रखी, जरा भी प्रमाद किया कि सबल होने की अपेक्षा और षिद्ध निर्बल बन जाता है । जरा सी प्रमादता सारा परिश्रम व्यर्थ कर देती है । जीवनभर विज्ञानबल बढाओ । एक दिन कोई कुकर्म्म कर बैठो । सब समान है । पूर्व में तप को आत्मप्राप्ति का साधक बतलाया है, परन्तु वह तप कर्म्ममय नहीं होना चाहिए- अपि तु ज्ञानमय होना चाहिए, जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है । तुम्हें अपने आत्मा को उसमें लीन करना है । इस लय का साधक कर्म्ममय तप नहीं है- अति तु ज्ञानमय तप है -यस्थ ज्ञानमयं तपः के अनुसार वह स्वयं ज्ञानमय तपरूप है । ज्ञानमय तप ( उपासना होने से अकृत है । कम्मंभय तप कर्म्मप्रधान होने से कृत है- महत्यः- कुतेन- इस सिद्धान्त के दा रूप निरर्थक है । लयं गच्छति, पेन सोनो भवति येन- इस व्युत्पत्ति से ज्ञानमय तथ ( जो कि एक प्रका संन्यासयोग है ) लिङ्गसप कहलाता है । विपरीत तप भलिङ्गतप कहलाता है । वह बल में सी प्राप्त नहीं हो सकता । इस प्रकार प्रमादरहित बलरूप निष्काम कम्मंयोग, लिङ्गतपरूप निष्काम उपासना योगरूप संन्यासयोग ही उसकी प्राप्ति का उपाय है । जो इन उपायों से उसे प्राप्त करने की चेष्टा करता है, उस विद्वान का वह भोक्तात्मा उस ब्रह्मधाम ( महदक्षर ) में प्रविष्ट हो जाता है । श्रुति के अक्षर बडे गम्भीरार्थंक हैं । पूर्वमन्त्र में इन उपायों का खण्डन किया है । वहाँ उपादेयता बतलाई है । द कारण नहीं है । इनकी कारणता सत्त्वशुद्धिमात्र पर अवलम्बित है । इसलिए तो पूर्व में इनको प्रकारण बतलाया है । परन्तु इन्हीं के आचरण से, प्रयत्न से आत्मा विशुद्धसत्व होकर उसे प्राप्त करने का अधिकारी बनता है । इस प्रकार परम्परासम्बन्ध से इनकी भी कारणता बसला दी गई है । परन्तु साक्षात् कारणता नहीं है । इसलिए-" एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वत्तस्यैव श्रात्मा विशते ब्रह्मधाम ' ४ * * - ये शब्द कहे हैं । विद्वान् इनसे यत्न करें । इससे श्रात्मा विशुद्धसत्त्व होता हुआ उसमें प्रक्टि हो जाएगा । इस प्रकार साक्षात् कारणता शुद्धसत्व की ही सिद्ध होती है । शुद्धसत्व भी यदि कारण है तो, आत्म - प्राप्ति का अन्य कारण हो गया । तपादि न हुए न सही, विशुद्धसत्त्व तो हो गया । फिर प्र ते तेन लभ्यः - इस प्रकार कारणमात्र का खण्डन करना क्या उचित कहा जा सकता है? कदाचित् १ गीता ६।१ । २ कठोप ० १।३।१४ । [ २१० ]
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तृतीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) फरव SENTEY 3 १३:३८ guest निषद्विज्ञानाध्य महदक्षरनिरूपण 118 11 ॥ ५ ॥
[ २११ ] कोई ग्रह करे तो इसके उत्तर में हम यही कहेंगे कि शुद्धसत्स्व महान् है । वह अक्षरात्मा इसी परं प्रतिष्ठित है । अक्षर महात् सत्त्व अविनाभूत है । दोनों तादात्म्यापन हैं । इसीलिए तो आत्मा को महाक्षर इस एक नाम से पुकारा जाता है । ऐसी अवस्था में हम अवश्य ही भात्मा श्रात्मा के ( महदक्षर के ) सुह से ही मिलता है, यह कह सकते हैं । उपायों के उस आत्मा को आप्त होने वाले, प्रात्मसाक्षात् करने वाले - प्रतएव साक्षरत्-यो बभूवुः - इस परिभाषा के अनुसार ऋषि नाम से प्रसिद्ध ज्ञानतृप्त नात्मा बीसासन शान्त विद्वान् उसे प्राप्त कर लेते हैं । अथवा उसे प्राप्त कर वे ऐसे हो जाते हैं । वे उस सर्व-व्यापक तत्त्व को सर्वात्मना प्राप्त होकर युक्तात्मा होते हुए, स्वयं भी सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं । युञ्जान मोर ' युक्तभिद से योगी की दो अवस्था होती हैं । उपायों का श्राचरण करता हुमा साम्यावस्थापन योगी यूवान कहलाता है एवं उपायों द्वारा उसे प्राप्त कर लेने पर वही युक्त कहलाने लगता है । चूंकि इस सिद्धावस्था में इनका श्रात्मा उस महदक्षर से युक्त हो जाता है, प्रतएव यह युक्तात्मा ( कृतात्मयोगाः ) नाम सें प्रसिद्ध हो जाते हैं । सांसारिक ज्ञान विषयावच्छिन्न होने से सीमित है, मतः यहाँ ज्ञानपिपासा शान्त नहीं 1 परन्तु पक्षर व्यापक है । विरुद्ध विरुद्ध सारे ज्ञान अक्षर के विवत हैं, अतएव वह सर्वश कहलाता है । अक्षर सबका प्रभवः प्रतिष्ठा- परायण है, प्रतएव यह सर्वविद - ( सर्व प्राप्त ) है । ऐसे सर्वन को प्राप्त कर वे सवंश बनते हुए ज्ञानतृप्त हो जाते हैं । मन्य हो, तब उसे जानने की कामना हो । अब उसके ज्ञान के बाहर कुछ बचता ही नहीं है, प्रतएव वह अवश्य ही ज्ञानैषणा से रहित हो जाता है । यह अपना है, यह पराया है- इस द्वैतभाव में रागद्वेष का उदय होता है । प्रक्षर अद्वैत है । उसे प्राप्त कर लेने पर द्वैत कैसा? द्वैत नहीं तो राग कैसा? रागद्वेष दोनों से यहाँ आसक्ति अभिप्रेत है । द्वेष में प्रतिकूल आसक्ति होती है । प्रेम में अनुकूल प्रासक्ति होती है । दोनों राग हैं, धतः रागद्वेष दोनों के लिए यहाँ राग शब्द प्रयुक्त हुआ है । रागद्वेष से धारमा में क्षोभ पैदा होता है । क्षोभ ही भशान्ति का मृत्यु साथ है! राम - द्वेष नहीं तो क्षोभ कैसा? ओम नहीं तो प्रशान्ति कैसी? असन्ति नहीं तो दुःख कैसा? दुःख नहीं तो बन्धन कैसा? बन्धन नहीं तो द्वैत कैसा? निष्कर्ष यही है कि जो नित्यज्ञान - तृप्तित्व- वीतरागत्व - प्रशान्तत्व प्रादि प्रक्षर के घम्मं हैं- उसमें लीन होकर तद्रूप बनने से वे सारे धम्मं इसमें प्रा जाते हैं । यह वही बन जाता है यहीं निष्कर्ष है । उसे प्राप्त किए बाद क्या फल मिलता है, इसका यही उत्तर है । प्रकरण के प्रारम्भ में ही हम बतला प्राए हैं कि इस खण्ड में अक्षर - निरूपण द्वारा समय पर इष्टि रखी गई है । पांचवें मन्त्र में मक्षरप्राप्ति का फल बतलाया है एवं ६-७ तीत मन्त्रों में तद-
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तृतीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य महदक्षरनिरूपण भिन्नाव्यय का निरूपण करते हैं । महदक्षर अक्षर है । प्रक्षर के ऊपर अव्यय है । मिलते हृदय--इस मन्त्र का अर्थ करते समय तीन प्रकार की हृदय ग्रन्थियों बतलाई हैं । इनमें अक्षर धौर भावना के साथ जो ग्रन्थबन्धन होता है, उसे कारणग्रन्यि कहते हैं । इसी को कारणशरीर कहा जाता है । जब तक कारण है ae as मुक्ति है, परन्तु परिमुक्ति ( परामुक्ति ) नहीं है । यद्यपि हमने पूर्व में महुदक्षर को शुक्र के प्रतिवर्तन का कारण बतलाते हुए परामुक्ति का साधक बतलाया है । शुक्र का धतिवर्तन तो अवश्य हो जाता है, परन्तु परामुक्ति नहीं होती । परामुक्ति श्रव्यय - सम्बन्ध से ही होती है । परपुरुष से ही परामुक्ति का सम्बन्ध है । प्रक्षर मध्यपतित है, अतः इसके साथ भी ' पर ' का सम्बन्ध होता है । अक्षर के साथ धव्यय प्रतिष्ठित है, मतः भव्यय द्वारा होने वाली मुक्ति प्रक्षरमुक्ति कही जा सकती है । जो घर को प्राप्त कर लेते हैं, वे प्रोपनिषत् शान में राष्टविश्वास रखने वाले प्रतएव ब प्रतिपादित काम्यकम्मं- परित्यागलक्षण से यथादर्श तथात्मनि के अनुसार तसल्लोकों में सुख भोगकर परालकान में उसी ' पर ' में जाकर परामृत होते हुए सबसे विमुक्त हो जाते हैं । पूर्ण हृदयग्रन्थियां यहां माकर टूटती है । स्थूल सूक्ष्म दोनों प्रन्थियों का टूटना अन्तकाल है एवं प्रव्यय नाम से प्रसिद्ध पर - पुरुषप्राप्ति की साघनता कारणग्रन्थि के टूटने का नाम परान्तकाल है । प्रक्षर पर पहुंचना अमृत पर पहुंचना परान्तकाल में प्रव्यय में पहुँचना परामृत ( भव्यय ) में पहुंचना है । प्रक्षर परावरामुत हैं । भमय पराम है । प्रक्षर तक कामचार है । तत्तद्ब्रह्मलोकों में गमन है । मुक्ति हो गई । भावागमन छूट गया, परन्तु कामचार हैं, मतः इस अक्षर मुक्ति को परिमुक्ति ( परित: मुक्ति: सर्वथा मुक्ति: -धिमात्रविनो परा मुक्ति ) नहीं कह सकते । वह तो मव्यय द्वारा ही प्राप्त होती है । महदक्षर के मव्यवहितो रकाम ही यह मुक्ति होती है । बीच में अन्य प्रतिबन्धक नहीं हैं, पतएव पांचवें मन्त्र के मागे ही इसका निरुपण किया है । इस अव्यवहितत्व को लक्ष्य में रखकर ही प्रकरण के प्रारम्भ में हमने महदक्षर को ही परामूक्ति का कारण बतला दिया है ॥। ६ ॥ अव्यय को प्राप्त किए बाद कैसे इस जीव की परिमुक्ति होती है? - इसका निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं-ईश्वरप्रजापति षोडशीपुरुष है । पञ्चकल भ्रव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकलात्मक्षर परात्पर ही षोडशी है । उस षोडशी आत्मा के साथ सम्बन्ध रखनेवाला एक विश्व है । विश्वविशिष्ट बोडली का नाम ही ईश्वरप्रजापति है । इसमें पांच ब्रह्मसत्य हैं । तीन देवसत्य हैं । स्वयम्भू - परमेष्ठी-सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी वैश्वानर - हिरण्यगमं सवंश, कम्र्म्मसम्पादक प्राण, सोरविज्ञान - सबकी समष्टि का माम ही है । पाँचों ब्रह्मसत्य भी अग्नीषोममय होने से देवता हैं । देवसत्य भी देवता है ' । इन दोनों १ द्रष्टव्य केनोपनिषत् । [ २१२ ]