भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 1–10

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 1–10

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हिन्दी नाट्य शास्त्र सुधा रस्तोगी कृष्णदास अकादमी • वाराणसी वाराणसी

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कृष्णदास संस्कृत सीरीज -१०५ नाट्यशास्त्रम् सटिप्पण' नाट्यचन्द्रिका' हिन्दीव्याख्यासहितम् सम्पादिका व्याख्याक डॉ० श्रीमती सुधा रस्तोगी ( प्रथम भागः )

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कृष्णदास संस्कृत सीरीज १०५ श्रीमद्भरतमुनिप्रणीतं सचित्रं नाट्य शास्त्र म् टिप्पण'नाट्यचन्द्रिका'- हिन्दी-व्याख्यासहितम् परिशिष्ट- समीक्षात्मकबृहद्भूमि कादिभिर्विभूषितञ्च ( गायकवाड संस्करणानुसारि ) सम्पादिका व्याख्याकर्त्री च सुधा रस्तोगी एम० ए०, पी-एच० डी० ( लखनऊ ) प्रथमो भागः ( दशमाध्यायान्तः ) अकादमी कृष्णदास वाराणसी कृष्णदास अकादमी, वाराणसी- २२१००१ १९८९

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प्रकाशक: कृष्णदास अकादमी, वाराणसी मुद्रक: चौखम्बा प्रेस, वाराणसी संस्करण: प्रथम, वि. सं. २०४६ मूल्य: रू० १००-०० FPUIS IF © कृष्ण दास अकादमी पो० बा० नं ० १११८ चौक, ( चित्रा सिनेमा बिल्डिङ्ग ), वाराणसी -२२१००१ [ भारत अपरं च प्राप्तिस्थानम् चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस के ० ३७ / ९९, गोपाल मन्दिर लेन पो० बा० १००८, बाराणसी-२२१००१ ( भारत ) फोन: ६३१४५

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KRISHNADAS SANSKRIT SERIES 105 444* NATYASASTRA OF BHARATA MUNI ( Based on Baroda recension ) Edited with ' Natyacandrika' Hindi translation, Introduction and various Indices Bout By Sudha Rastogi M. A., Ph. D. ( LUCKNOW ) FIRST PART ( Chapters 1 to 10 ) अकादमी कृष्णदास वाराणसी. most bed ad to al soino asins2 fidance adswor KRISHNADAS Academy sibui VARANASI- 221001 1989

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KRISHNADAS ACADEMY Oriental Publishers & Distributors Post Box No. 1118 Chowk, ( Chitra Cinema Building ), Varanasi - 221001 AIT ( INDIA ) IIII IIIIIII aoitsfenext ihaill libosy diw betiba 2sibal apoitev bus coitoubortal First Edition apter 1989 2 Price: Rs. 100-00 II I IIII ( 01 of 1 aholqado ) Also can be had from Chowkhamba Sanskrit Series Office vmab K. 37/99, Gopal Mandir Lane Post Box No. 1008, Varanasi - 221001 ( India ) Phone: 63145

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सचित्र नाट्य शास्त्र म्

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आमुख भारतीय नाटकों के परिप्रेक्ष्य में "नाट्यशास्त्र " तथा भरतमुनि ये दो ऐसे नाम हैं जो कदाचित् गीता तथा व्यास की भांति जनमानस में अक्षुण्ण रूप से विराजमान हैं । परम्परागत प्रसिद्धि के अनुसार "नाट्यशास्त्र " की रचना भरत मुनि ने की थी । इतिहास में दशरथ - पुत्र भरत, दुष्यन्त पुत्र भरत, मान्धाता के परपोते भरत एवं जड़ भरत का उल्लेख मिलता है । किन्तु इनमें से किसी को भी "नाट्यशास्त्र ' का रचयिता नहीं माना जा सकता । "ऋग्वेद " में भी कई स्थलों पर "भरत " शब्द का प्रयोग एक जाति के रूप में होता रहा है । किन्तु " नाट्यशास्त्र" के सन्दर्भ में भरत नाम किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का हो सूचक प्रतीत होता है । सम्पूर्ण " नाट्यशास्त्र " भरत नामक एक व्यक्ति की ही कृति है:- इस धारणा को निर्विरोध मान्यता नहीं मिली है । भरत की एकता और अनेकता को लेकर दो धारणाएँ स्पष्टतौर पर मिलती हैं । एकव्यक्तिवादी पक्ष की पुष्टि में सबसे प्रबल प्रमाण है कि अभिनवगुप्त, जो कि लोकपि "अभिनवभारती" नामक टीका के यशस्वी प्रेणता हैं, के काल तक यह भावना व्याप्त हो चुकी थी कि "नाट्यशास्त्र " भरत-प्रणीत है । तभी तो अभिनव को तत्कालीन एक वर्ग में प्रचलित इस धारणा का खण्डन करने की आवश्यकता हुई कि "नाट्यशास्त्र" का प्रथम प्रणयन सदाशिव, फिर ब्रह्मा और अन्त में भरत मुनि ने किया । उनके अनुसार, वस्तुतः सदाशिव, ब्रह्मा और भरत ने तीन स्वतन्त्र ग्रन्थों का निर्माण किया था । वर्तमान "नाट्यशास्त्र" तो मुख्यतः ब्रह्मा के मत को उपजीव्य मानकर अन्य मतों के निराकरणपूर्वक भरतपूर्व की सारी परम्परा का आकलन करता है - एतेन सदाशिव ब्रह्मभरत मत त्रयविवेचनेन ब्रह्ममत- सारताप्रतिपादनाय मतत्रयीसारासारविवेचनं तद्ग्रन्थखण्डप्रक्षेपेण विहितमिदं शास्त्रम् । ( नाट्यशास्त्र, प्रथम गायकवाड संस्करण, भाग १ पृष्ठ ८ ) भावप्रकाश के अनुसार "नाट्यशास्त्र " की द्वादशसाहस्रीं संहिता की रचना आदि भरत ने की थी तथा भरतवृद्धेन कथितं गद्यमीदृशम् । ( भावप्रकाश, पृ० ३६ ) इसी प्रकार काव्यमीमांसा में राजशेखर ने रूपकाधिकरण के कर्तृत्व का श्रेय भरत को दिया है । दूसरी ओर, भरत के अनेकत्व के पक्ष में 'नाट्यशास्त्र ' के वे अंश सहायक सिद्ध होते हैं जहाँ भरत का प्रयोग अभिनेता, सूत्रधार, नट, विदूषक, आभरणकृत्, मालाकार आदि नाट्य प्रयोक्ताओं के लिए हुआ है । वस्तुतः जिस बृहत् एवं सांगोपांग रूप में नाट्यशास्त्र आज प्राप्य है उससे वह एक व्यक्ति की कृति माने