भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 11–20
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 11–20
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२ नाट्यशास्त्रम् जाने की संभावना में सन्देह सहज हो जाता है । इस प्रकार की प्रयोग- मूलक, वैज्ञानिक और विराट् फलक वाली कृति अनेक जीवनव्यापी साधनाओं से ही निष्पन्न हो सकती है । का यह सम्भावना नहीं हो सकती कि भरत नामक एक व्यक्ति की मूल रचना "नाट्यशास्त्र " के अभिधान से प्रसिद्ध रही हो, ऐतिहासिककाल के सतत प्रवाह में नाट्यशास्त्रीय अनुशीलन करने वाले नाट्याचार्यों कीतथा को भी भरत संज्ञा अथवा भरत उपाधि प्राप्त होती रही हो ( जैसा कि आज कल शंकराचार्यअक्षुण्ण परम्परा पीठ पर अभिषिक्त व्यक्ति की उपाधि शंकराचार्य हो जाती है ) और उन्हीं भरतों की परम्परा ने मूल भरत कृत आदि "नाट्य- वर्तमान परिवर्धित तथा सुसंस्कृत रूप प्रदान किया हो । फिर भो वस्तुस्थिति" क्या थी, यह निश्चयपूर्वक शास्त्र को कह सकना कठिन है । जहाँ तक अभिनव का प्रश्न है वह निश्चय ही उसे भरतमुनि प्रणीत मानते हैं । " की परम्परा का अवलोकन करते हुए इस सन्दर्भ में यह संकेत " " " नाट्यशास्त्र भरतकृत नाट्यशास्त्र नामक ग्रन्थ ही इस दिशा में पहलाकरना प्रयासपरमावश्यकनहीं हैहै । किइसका सबसे बड़ा प्रमाण है नाट्यशास्त्र की रचना शैली । प्रकार पाणिनीय " अष्टाध्यायी " में पूर्ववर्ती आचार्यों के मतों का उल्लेख जिस है उसी भाँति "नाट्यशास्त्र " के भी आनुवंश्य श्लोक एवं आर्याए आदि मिलता आचार्यों की ओर संकेत करती हैं । " नाट्यशास्त्र " में शब्द-लक्षण के,,, भी पूर्ववर्ती गान्धर्व के प्रसंग में स्वास्ति छन्द निरूपण के सन्दर्भ में गुह प्रसंग में पूर्वाचार्य, एवं करणों की व्याख्या के अवसर पर धवाओंतण्डु तथाकीनन्दीपरिचर्चाएवं मानवीयमें नारदगुणों अङ्गहारके प्रसंग में बृहस्पति इत्यादि आचार्य भरत से पूर्वं के रूप में मिलते हैं । इसके अतिरिक्त पाणिनि ने शिलालिन् एवं नाट्यशास्त्रकारों का उल्लेख किया है जो आज अप्राप्य होने पर भी एवंभरतकृशाश्वमुनि सेप्रणीतपूर्व नाट्यशास्त्रीयनटसूत्रों परम्परा की अक्षुण्णता के द्योतक हैं । समकालीन या थोड़ा बहुत आगे पीछे भी अनेक नाट्यशास्त्रकारभरत मुनि हुएके लगभगहैं, जिनका प्रासंगिक नामोल्लेख अनुचित न होगा । इनमें प्रमुख हैं — कोहल, नान्दी या तण्डु, तुम्बुरु, काश्यप, दत्तिल, अश्मकुट्ट बादरायण । इन व्यक्तियों के नाम नाट्यशास्त्र के अतिरिक्त अन्य नाट्य एवं शातकर्णी के कारण नाट्यशास्त्र' के' आचार्य के रूप में अप्रमाणित ग्रन्थों में भी उल्लिखित होने एवं शेषतन्त्र के नाम भी नाट्य-, नहीं रहते । इसके अतिरिक्त वात्स्य शाण्डिल साक्ष्य न शास्त्र में मिलते हैं, किन्तु इनकी किसी कृति का उद्धरण या अतिरिक्त से इनकी प्रामाणिकता अतिरिक्त पुष्टि की अपेक्षा करती है । "मिलने
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आमुख ३ इस प्रकार भारतीय नाट्यशास्त्र के सम्बन्ध में एकमात्र प्राप्य एवं नितान्त •सम्पूर्ण ग्रन्थ भरतकृत "नाट्यशास्त्र" ही मिलता है । यों "अभिनवभारती " की अध्यायगत पुष्पिकाओं में इसका स्मरण "भारतीय नाट्यशास्त्र " के रूप में ही किया गया है । प्रतिपाद्य विषयों की व्यापकता और तद्गत विवेचन की सांगो- पांगता को देखते हुए यह ग्रन्थ इतना विलक्षण तथा अद्भुत है कि अध्येता के मन को बरबस इसके प्रणेता के प्रति श्रद्धावनत कर देता है । नाट्य के विषय में भरत का कथन है—
न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥
(ना०शा० १.११७-१८ ) ( ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग अथवा कर्म नहीं है जो इस नाट्य में प्रदर्शित न किया जाता हो ) । यह सम्पणं उक्ति स्वयं 'नाट्यशास्त्र' के प्रति पूरी तरह सटीक बैठती है । संसार का कोई ऐसा विषय नहीं है जिसकी चर्चा 'नाट्यशास्त्र' नामक विश्वकोष में न की गयी हो । प्रायः 'षट्साहस्री संहिता ' के नाम से प्रसिद्ध इस ग्रन्थ में अधिकतर ३६ अध्याय एवं ६००० श्लोक मानने की परम्परा चली आ रही है । इन श्लोकों को सामान्यतः ३६ अध्यायों में विभक्त किया गया है । ३६वें अध्याय में नाट्य के पृथ्वीतल पर अवतरण और राजा नहुष की प्रार्थना पर स्वर्गस्थ नाट्य के भूलोक में आविर्भाव की कथा दी गयी है । परन्तु अनेक संस्करणों में ३७ अध्याय भी मिलते हैं, वहाँ नाट्यावतार ३६ वें की ओर नहुष का आख्यान ३७ वें की विषत- वस्तु बनते हैं । अभिनवभारती के अध्यायगत मंगल एवं अन्त्य
श्लोकों को सरसरी तौर पर ही देखने से पता चल जाता है कि इस विषयानुरूप
अध्याय- विभाजन में अभिनवगुप्त काश्मीर शिवाद्वयवाद के छत्तीस ( सैंतीसवां परमशिव ) तत्त्वों की अनुस्यूति मानते प्रतीत होते हैं । विषयान्तर दोष के कारण इस बात को यहीं छोड़ना उचित होगा । यद्यपि प्रस्तुत प्रथम खण्ड का सम्बन्ध पहले दस अध्यायों से है अतः सारे अध्यायों की विषयवस्तु का आकलन आमुख के अनावश्यक विस्तार के भय से यहाँ करना सम्भवतः प्रयोजनीय न होगा । फिर भी इतना उल्लेख आवश्यक होगा कि नाट्य प्रयोग, नाट्य- व्यवहार, नाट्य- सामग्री और नाट्यानुभव की दृष्टि से सम्भवतः कोई भी विषय, चाहे वह बड़े से बड़ा हो या छोटे से छोटा, ऐसा नहीं होगा जिसे भरत की आर्ष मेधा का पूल संस्कार या स्पर्श न मिला हो ।
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नाट्यशास्त्रम् आज के नाट्य प्रयोक्ता, जो पारम्परिक रूप से नाट्य प्रयोग न करके नए प्रयोगों एवं मौलिक विधाओं पर बल देना चाहते हैं, उनके लिये भरत के "नाट्य-शास्त्र" के जो मध्याव विशेष रूप से दृष्टव्य हैं, वे इस प्रकार हैं- प्रेक्षागृह के •निर्माण एवं व्यवस्था से सम्बन्धित दूसरा अध्याय, नाटक के लक्ष्य रसानुभूति और रस की व्याख्या करने वाला छठा अध्याय, भावाध्याय नामक सातवाँ अध्याय, स्वर के उतार चढ़ाब से अभिनय में प्रभाव डालने वाला उन्नीसवाँ अध्याय, रूपकों के भेद बताने वाला बीसवाँ अध्याय तथा व्यक्तियों को उनके अनुरूप भूमिका प्रदान वाला वीसवाँ अध्याय । छत्तीस अध्यायों में आबद्ध नाट्यशास्त्र के प्रतिपाद्य--- करने वर्गीकरण करने पर जो मुख्य तत्त्व प्राप्त होते हैं उन्हें हम नीचे देखेंगे १. भरत की दृष्टि में नाट्य विषय का परम्परा का आदि स्रोत वही है जो भारतीय संस्कृति का मूळ उत्स है, अर्थात् वेद । उनके अनुसार चारों वेदों से एक एक अंग लेकर नाट्योत्पत्ति हुई है । ' उस नाट्य को प्रस्तुत करने के लिए एक उपयुक्त एवं नाटच मण्डप के निर्माण की विधि बतायी गयी है तथा वास्तविक नाटय सुरुचिपूर्ण प्रयोग के पूर्व की जाने वाली क्रियाओं को पूर्वरंग कहा गया है । २. नाटच प्रयोग का प्रमुख उद्देश्य है उद्विग्न, श्रान्त या दुःखी मन को शान्ति
पहुँचाना- दुःखार्तानां श्रमार्ताना शोकार्तानां तपस्विनाम् ।
विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद्भविष्यति ॥
( ना०शा० १.११४ ) शाब्दिक अर्थ भरत प्रतिपादित "रस " यद्यपि इस स्थल पर विश्रान्ति पद का में रस के लिए संविद्विश्रान्तिमय नहीं है, किन्तु बागे भारतीय काव्यशास्त्र
श्लोक में विद्यमान है । इस दृष्टि से स्वरूप का विकास हुआ उसका बीज इस
दूर नहीं है क्योंकि आज भी कला का आज का नाटककार भी भरत की आत्मा से एवं प्राण को मिलने वाली एक अनोखी सर्वोच्च लक्ष्य है सर्वोच्च आह्लादकता, मन हटाकर आत्मा को प्राप्त होने वाली स्फूर्ति तथा समस्त बाह्य उपकरणों को निर्वृति । ३. नाटय के उद्देश्य तक पहुंचाने के लिये उसकी प्रयोग विधि के सम्यक् ज्ञान की आवश्यकता है । एतदर्थं एक ओर तो भरत ने चतुविध अभिनय का सांगोपांग विवेचन किया है तो दूसरी ओर प्रयोग के विषय नाट्य के रूपकादि दसों भेदों तथा. उनके उपभेदों व अङ्गों आदि का पूर्ण विश्लेषण किया है । इसी के साथ १ जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामभ्योरसानाथर्वणादपिगीतमेव च ॥। (ना०शा०१-१७ ) यजुर्वेदादभिनयान्
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आमुख समीक्षा प्रस्तुत की करने के साथ- साथ-5 नाट्यगयी हैसे। अभिन्नइस प्रकारछन्दनाट्यशास्त्र तथासिद्धान्तोंसंगीतशास्त्रका शास्त्रीयकी भी विश्लेषणविस्तृत में अत्यन्त विस्तृत नाट्य को प्रस्तुत करने के क्रियात्मक पक्ष का भी नाट्यशास्त्र अतः परवर्ती कालर पर्यवेक्षण हुआ है । भरत की दृष्टि नाट्य प्रयोक्ता की रही है । में रस एवं रूपक के दसों भेदों को लेकर चाहे कितनी ही काव्यशास्त्रीय परम्परायें7 " "में भरत के नाट्यशास्त्र में संसार के अनुकीर्तन रूप नाट्य के - ' चली हों परन्तु करने पर ही बल दिया गया है त्रैलोक्य-न सम्यक् प्रयोग द्वारा आनन्द को प्रस्फुटित स्यास्य सर्वस्य नाट्य' भावानुकीर्तनम् । ' ( ना० शा० १.१०७ ) घ में नाट्य कला एवं तत्सम्बन्धी अन्य विधाओंों का जैसा ' ४. नाट्यशास्त्र संसार की किसी अन्य भाषा में अप्राप्य है ।य विस्तृत विवेचन मिलता है वैसा विषयों की सम्पूर्णता एवं विविधता, स्पष्टता एवं उपयोगिता की दृष्टि प्रतिपाद्य यवं से यहइसकीग्रन्थ सीमाओंअपने आपकामेंतथाप्रसारअद्वितीयशब्दचतुर्दिकशास्त्रहै । कीहै ।भांतिवास्तुकलास्वरों के कीस्थानतरहतथानाट्यशब्द मण्डपप्रभेद;;; केकाव्यशास्त्रस्वरूप भाषाविज्ञानकी तरह रस, गुण, अलंकार; छन्दः शास्त्र की तरह छन्द एवं वृत्त ललित,त की तरह लोकधर्मी परम्परा और लोकानुजीवी भाषा बेशभूषा तथा; नृतत्त्वविज्ञान; की तरह गान एवं वाद्य नृत्य शास्त्र की तरह नृत्त एवं. नृत्यअलंकरण; सौन्दर्यशास्त्रसंगीतशास्त्रकी तरह नाट्यानुभूति; समाजशास्त्री की तरह मानवीय प्रकृति सांस्कृतिक परम्पराओं; ठोस भूतशास्त्र की तरह ये रासायनिक पुराशास्त्र की तरह से " विधियों; साथ ही नाट्य के उपांगों और उपादेय अवान्तर अनुषंगों और आनुषंगिकों का,, यं उसकाइतनासमकालीनगहरा उपमानसूक्ष्म व्यापकढूंढना असंभवऔर अद्यावधिहै । प्रासंगिक विवेचन हुआ है का के सन्दर्भ में यह बात विशेष रूप से याद रखने वाली है कि ५. नाट्यशास्त्र उन पाँच प्रश्नों का उत्तरश्री भरत की दृष्टि प्रयोग परक है । वस्तुतः नाट्यशास्त्र -ली जो ऋषियों ने भरत से किये थे । वे प्रश्न हैं- १ नाट्यशास्त्र की रचना,, - है किसके लिए की गयी २- इसके कितने हैं ३ इसके कितने अङ्ग, विभाग - जानने के प्रमाण क्या हैं ५ नाटक के उपदिष्ट अङ्गों का क् हैं क्यों, ४-एवंइन अङ्गों को 1. This work is probably unique in the world's literature onका. Hardly any work on dramaturgy in any सों dramaturgylanguage has the comprehensiveness, the sweep and थ literary artistic flair of Natya Shastra. - P. V. Kane, History of Sanskrit Poetics, pp. 39-40.
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६ नाट्यशास्त्रम् प्रदर्शन करते हुए नाट्य का प्रयोग किस भाँति करना चाहिये - "स कथमुत्पन्नः केन प्रयोजन, प्रकारेणोत्पन्नः.., तत्प्रयोजनस्य.. ' वेदेभ्य एव ' सिद्धेः ।•...... कस्याधि- कारिणः कृते कत्यंगः किम्प्रमाणश्चेति अस्येति नाट्यस्य कीदृक् प्रयोग: ( अभिनवभारती, ना० शा० भा० १, पृ ० ६-७ ) । इन प्रश्नों का उत्तर जिन नियमों का प्रणयन करते हैं उनका मूल प्रयोजन है प्रयोक्ता का मार्गदर्शन करना । दूसरे शब्दों में नाट्य वस्तु का कैसे मंचावतरण किया जाये इस दिशा में प्रयोगकर्ता का उपकार करना - "तावन्नानेन किचिदुपदिश्यते तं प्रत्युपकाराद्ऋते " । ( वही, पृ ० ४ ) । इन नियमों में भरत बड़े आधुनिक हैं । आधुनिकता का अर्थ है गतिशीलता- देश और काल के आग्रह, धर्म और सीमाओं के साथ सामंजस्य कर सकना । अतः भरत ने अपने नियमों को कहीं भी अन्तिम मानने पर जोर नहीं दिया है वह केवल दिशा संधान करते हैं । भरत के नियम अन्तिम न होने पर भी इतने व्यापक हैं कि परवर्ती सारे नाट्यशास्त्र के बहु आयामी विकास और विस्तार का बीज भरत में खोजा जा सकता है । भरत के सम्बन्ध में जो अन्य बात याद रखने की है वह है नाट्यकला के प्रति उनका समर्पित व्यक्तित्व । उनके लिये नाट्यकला मात्र एक ललित कला ही नहीं है । अपितु वह एक अखण्ड, सम्पूर्ण कला है जिसका उपजीव्य सम्पूर्ण और अखण्ड, जीवन । इसीलिये सारी ललित कलायें - काव्य, संगीत और वास्तु- विद्यायें और उप- विद्यायें नाट्य कला में अन्तर्भूत हो जाते हैं । सच पूछा जाये तो भरत के लिये नाट्यकला एक जीवनानुगुण्यमयी कला है जो केवल हमें मनस्तोष ही नहीं प्रदान करती अपितु हमारी चेतना का संस्कार भी करती है । ऊपर की पंक्तियों से इतना तो स्पष्ट है कि भरत के नाट्यशास्त्र को भारत की सांस्कृतिक कलात्मक सर्जनात्मकता का विश्वकोश कहने में कोई अत्युक्ति न होगी । प्रस्तुत ग्रन्थ के ख्यापन में यही बात लेखिका के लिए मूल प्रेरणा का काम करती रही है । इस ग्रन्थ का आरम्भ आज से लगभग १४ वर्ष पूर्व स्नातकोत्तर ( पोस्ट डॉक्टोरल ) अध्ययन के प्रसंग से हुआ था । विषय था "भरत के नाट्य-शास्त्र का सानुवाद आलोचनात्मक अध्ययन" । उसी की प्रथम परिणति के रूप में यह ग्रन्थ आकार ग्रहण कर सका है । नाट्यशास्त्र के विद्यार्थी इस तथ्य से परिचित हैं कि भरत का नाट्यशास्त्र केवल कलेवर में ही भारी भरकम नहीं है वह एक अत्यन्त दुरूह ग्रन्थ भी है । यही सम्भवतः कारण है कि न तो उसका कोई मानक संस्करण ही अब तक निकल पाया है और न ही किसी भी भारतीय भाषा में पूरा अनुवाद ।
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७ आमुख प्रो० मनमोहन घोष का अंग्रेजी अनुवाद दो खण्डों में अनेक वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ । बड़े श्रम से किए जाने पर भी उसके पुनरीक्षण और परिसंस्करण की उस समय अनुभव की गयी थी । इस बीच में हिन्दी में अनेक अच्छे आवश्यकतासामने आए हैं पर वे सभी आंशिक है । प्रस्तुत प्रयास एक तो पूर्ण, अनुवाद सामने रखने की चेष्टा करता है जिसके पहले खण्ड में नाट्यशास्त्र का अनुवादकड़ी के रूप में प्रकाशित हो रहे हैं । दूसरे, अब तक की १० अध्याय पहली सामग्री, जिसमें अभिनवगुप्त की लोकविश्रुत अभिनव भारती भी शामिल उपलब्ध में अनुवाद की प्रकृति को विशुद्ध विश्लेषणात्मक रखने की चेष्टा कोहै, गयीके आलोकहै । अनुवाद भर में फैली प्रभूत टिप्पणियाँ इस बात को प्रमाणित करेंगी । प्रयत्न इस बात का रहा है कि दोनों ही -सामान्य तथा शोधार्थी- पाठक इसे मुख्य उपयोगी पाए । पूरे अनुवाद को तीन खण्डों में विभाजित किया गया है । पहले खण्ड में १० अध्याय हैं । मुख्यतः प्रथम अध्याय में नाट्य की दिव्य उत्पत्ति तथा प्रथम नाट्या• भिनय का वर्णन है । द्वितीय अध्याय में नाट्य को जहाँ प्रस्तुत किया जाता है उस प्रेक्षागृह का बड़ा ही सम्यक् निरूपण हुआ है । चौकोर ( चतुरस्र ), आयत (विप्रकृष्ट ) एव तिकोने ( त्र्यत्र ) प्रेक्षागृहों के अनेक अङ्गों का वर्णन, प्रकाश एवं ध्वनि की समायोजना, प्रेक्षकों के बैठने की व्यवस्था तथा प्रेक्षागृह की सजावट आदि तथ्यों की विशद विवेचना इस अध्याय में की गयी है । इस प्रसंग में भरत उठायी गयी समस्यायें और उनके विवेचन बड़े आधुनिक हैं और रंगमंच के द्वारा की दृष्टि से उनका महत्त्व असंदिग्ध है । तृतीय अध्याय में रंगदैवत प्रस्तुतीकरण है । रंगस्थापना के पश्चात् नाट्य प्रयोग के पहले पूर्वरंग के पूजनअन्तर्गतका विविधविवरण देवताओं की पूजा का इसमें उल्लेख है । आज की दृष्टि से आपाततः इन अर्चनाओं का अधिक महत्त्व नहीं है । परन्तु प्रबुद्ध नाट्य प्रयोक्ता इसमें वातावरण की सर्जना के अतिरिक्त न केवल नई सांस्कृतिक चेतना का अनुसंधान करते हैं प्रत्युत नए प्रयोगों की अनेक सम्भावनाओं के द्वार भी उन्मुक्त पाते हैं । चतुर्थ अध्याय में नाट्य के अत्यन्त उपकारक विषय नृत्य के अन्तर्गत करणों, अंगहारों, ताण्डव इत्यादि की विवेचना की गयी है । पाँचवें अध्याय में नाट्य प्रयोग के समारम्भ से पहले किये जाने वाले पूर्वरंग, नान्दी, प्रस्तावनादि का विधान किया गया है । नाट्यशास्त्र का छठा अध्याय ही वह प्रसिद्ध अध्याय है जिसमें रस- निरूपण के माध्यम से नाट्यानुभव की प्रकृति और प्रक्रिया का विचार किया गया है । उत्तरकालीन रस मीमांसा का प्रधान उपजीव्य भरत का लोक- समादृत रससूत्र "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" - इसी अध्याय में है । काव्यशास्त्र के इतिहास में इस सूत्र की विविध व्याख्याओं के
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८ नाट्यशास्त्रम् आधार पर विभिन्न सिद्धान्तों की स्थापना और विविध प्रस्थानों का संधान किया गया है । परवर्ती सम्पूर्ण रस- चेतना के वैज्ञानिक विश्लेषण के निमित्त सारा भारतीय साहित्य नाट्य शास्त्र के इस अध्याय का ऋणी है । इस अध्याय की समसामयिक प्रासंगिकता भी निर्विवाद है । (सातवें अध्याय में रस प्रकरण के ही अन्तर्गत भाव, विभाव, स्थायी भाव आदि का विवेचन किया गया है । इसे भावाध्याय कहा जाता है । आठवें अध्याय से अभिनय का वर्णन प्रारम्भ हो जाता है । आंगिक, वाचिक, आहार्य एवं तात्त्विक -ये चार अभिनय के भेद बताये गये हैं । जिसमें से आंगिक अभिनय के अन्तर्गत उपांगाभिनय का अध्ययन किया गया है ।1 दृष्टि को अभिनय की आत्मा बताते हुये लगभग ३७ प्रकार की दृष्टियों के अभिनय का सूक्ष्म चित्रण किया गया है । नवें अध्याय में हस्ताभिनय का निरूपण करते हुये असंयुक्त व संयुक्त हस्तों के भेदों का कलात्मक वर्णन करते हुए हस्त मुद्राओं की उपयोगिता की विवेचना की गई है । तदुपरान्त वक्ष, कटि आदि के अभिनय का प्रतिपादन किया गया है । दसवें अध्याय में चारी का विधान किया गया है । केवल एक अङ्ग के उत्तम अभिनय से अभिव्यक्ति की उत्कृष्टता असम्भव है । इसके लिए भरत हाथ, पैर, कमर, वक्ष आदि सभी से किए जाने वाले अभिनय के समानीकरण या चारी का उल्लेख करते हैं 'तयोः समानकरणात् पादचारीं प्रयोजयेत्' ( ना० शा० ९.२८२ ) । चारी के निरूपण के साथ अभिनय का वर्णन एक प्रकार से पूर्ण हो जाता है । "एक प्रकार से " इसीलिए कह रही हूँ क्योंकि अभिनय के अन्य आयामों का वर्णन आगे हुआ है । अतः आकार और विषय दोनों दृष्टियों से पहले खण्ड को दसवें तक सीमित रखने का निर्णय पूर्णतः अयौक्तिक नहीं लगना चाहिए । संदर्भ- निष्ठा और अध्ययन - सौकर्य की दृष्टि से यहाँ पर यह उल्लेख आवश्यक होगा कि प्रस्तुत अनुवाद में प्रथम सात अध्यायों में गायकवाड ओरिएण्टल सीरीज आफ बड़ौदा से १ ९ २६ में प्रकाशित नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग के प्रथम संस्करण और अन्तिम तीन अध्यायों में १ ९ ३४ में प्रकाशित द्वितीय भाग के प्रथम संस्करण, जिसका संपादन मनवल्ली रामकृष्ण कवि ने बड़ी योग्यतापूर्वक किया था, का उपयोग आधारप्रन्थ के रूप में किया गया है । इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके सारे पाठ यथावत् स्वीकार कर लिए गए हैं । जहाँ आवश्यक हुआ है वहाँ स्वीकृत पाठ की अन्वर्थता पर भरपूर विचार किया गया है । दो तीन स्थानों पर मूल संस्करण के घोषित प्रक्षिप्ताशों या भ्रमवशात् पुनर्मुद्रित श्लोकों को दृष्टि में रखकर आवश्यक संशोधन की स्वतंत्रता भी ली गयी है । आशा है पाठकों को यह सुविधा-जनक प्रतीत होगा । विज्ञ पाठक जन देखेंगे कि भरत की क्रमागत प्रायः सभी
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आमुख रा प्रयासमहत्त्वपूर्णरहा धारणाओंहै । फिर भीका पाठआलोचनात्मकसे अधिक आग्रहअध्ययनधारणाकरने-याकाप्रत्ययलेखिका-बोधकापर सततरहाकिन्य है । साथ ही यह भी दृष्टि रही है कि अनुवाद सर्वजनगम्य हो । इस उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में लेखिका की एक चेष्टा यह रही है कि मूल ग्रन्थ में न होने से " पर भी संबन्ध अंश के प्रारम्भ में विषय के परिचायक शीर्षक / उपशीर्षक दे दिए जाएँ । प्रारम्भ की अध्यायगत विषयानुक्रमणिका इसी प्रयत्न का परिचायक है । इसी दृष्टि से परिशिष्ट में अनेकों सूचियाँ देने का उपक्रम हुआ है जिन्हें सुधी पाठक अध्ययन प्रसंग में उपयोगी पाएंगे । इनमें करणों, अङ्गहारों, रस- भेद, -तद्गत वर्ण, देवता तथा भाव, उपांगकर्णी, हस्तकर्णी, चारियों, स्थानकों एवं न्यायों आदि की सूचियाँ प्रमुख हैं । संदर्भ ग्रन्थ सूची भी आशा है, विद्वानों को नितान्त निरुपयोगी नहीं लगेगी 1 प्रस्तुत प्रयास की कथा अपने छात्र जीवन के सहपाठी भाई कामेश्वर 4 ( डॉ० कामेश्वर नाथ मिश्र, प्रोफेसर, संस्कृत तथा पालि विभाग, केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ ) के उल्लेख के बिना अधूरी रह जाएगी । यह उनका ही आग्रह था कि आज यह पुस्तक प्रकाश में आ रही है । सच बात तो यह है कि मुद्रण के पीछे उनके प्रयत्न ही निमित्त रहे हैं । ऐसे कल्याण- बन्धु को धन्यवाद देकर उनकी गरिमा को लेखिका कम नहीं करना चाहती । अन्त में कृष्णदास अकादमी के निदेशकों का कृतज्ञतापूर्वक उल्लेख आवश्यक है । उन्होंने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि विलम्ब भले ही हो जाए पर वह प्रकाशन को स्तरीय ही रखेंगे । मुझे विश्वास है कि पाठकजन इस आश्वासन को सच पायेंगे । लेखिका को अपनी सीमाओं और अपने इस प्रयास की कमियों का एहसास हैं । विद्वानों से अनुरोध है कि इस प्रयास को अभिनव भारतीकार के शब्दों में -नाट्यशास्त्र के अर्थावबोध की "ऊर्ध्वोर्ध्वारोहणमयी " प्रक्रिया में केवल एक सोपान, वह भी नीचे का, के रूप में लें । यदि यह भी हो सका तो लेखिका अपने अकिंचन "प्रयत्न को कृतार्थंलखनऊमानेगी । -सुधा रस्तोगी आश्विन शुक्ल नवमी, सं० २०४३
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त्रैलोक्यस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम् । -ना० शा० १.१० 11 1557 139
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विषयानुक्रम प्रथम अध्याय- विषय श्लोक पृष्ठ मंगलाचरण १ १-२ नाट्यवेद की उत्पत्ति के विषय में मुनियों का भरत से प्रश्न २-५ ३.५. भरत मुनि द्वारा मुनियों के प्रश्नों का उत्तर ६-७ ५-६- नाट्यवेद की उत्पत्ति का वर्णन ८-१८ ६-१०- ब्रह्मा और इन्द्र का संवाद १९ -२४ ११-१२ भरत मुनि द्वारा सौ पुत्रों को नाट्यवेद का उपदेश २५-४० १२-१५ नाट्य की वृत्तियाँ ४१ १५ ब्रह्मा द्वारा कैशिकी वृत्ति की योजना ४२ १६. कैशिकी वृत्ति के प्रयोग के लिए ब्रह्मा द्वारा चौबीस अप्सराओं की सृष्टि ४३-४९ १९ ब्रह्मा द्वारा वाद्य तथा गायन के लिए स्वाति तथा नारद की नियुक्ति ५०-५१ १९ भरत मुनि का ब्रह्मा जी से प्रश्न ५१.५३ २० ब्रह्मा द्वारा भरत के प्रश्न का उत्तर ५४-५५ २० इन्द्रध्वज महोत्सव में इन्द्रविजय रूपक का अभिनथ ५५-५८ २०. देवों द्वारा अभिनेताओं को पुरस्कार प्रदान ५ ९ -६३ २२-२३ इन्द्रविजय रूपक देखकर दैत्यों एवं दानवों का क्षुब्ध होना और नाटक में विघ्न उत्पन्न करना ६३.६६ २३ इन्द्र द्वारा जर्जर से विघ्नों का विनाश करना ६६-७० २३-२४ देवगणों द्वारा इन्द्रध्वज का जर्जर नामकरण ७१-७५ २५ विघ्नों का पुनः आक्रमण ७६-७७ २६ भरतमुनि द्वारा ब्रह्मा से विघ्नों के निवारण के विषय में प्रश्न ७७.७९ २६