भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 101–110
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 101–110
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१४४ नाट्यशास्त्रम्
मध्यम नाट्यमण्डप का परिमाण -- चतुःषष्टिकरान्कुर्याद्दीर्घत्वेन तु मण्डपम् ।
द्वात्रिंशतं च विस्तारान्मर्त्यानां यो भवेदिह ॥ १७ ॥
इनमें जो (प्रेक्षागृह) मनुष्यों के लिए है उसकी लम्बाई चौंसठ हस्त एवं चौड़ाई बत्तीस हस्त की रखी जाए' ॥ १७ ॥
विशाल नाट्यमण्डप के दोष- अत ऊर्ध्वं न कर्तव्यः कर्तृभिर्नाट्यमण्डपः ।
यस्मादव्यक्तभावं हि तत्र नाट्यं व्रजेदिति ॥ १८ ॥
(नाट्यमण्डप की रचना ) करने वाले व्यक्तियों को चाहिए कि इससे अधिक बड़ा नाट्यमण्डप न बनाए क्योंकि वहाँ ( बड़े मण्डप में ) नाट्य की अभिव्यक्ति अस्पष्ट रह जाएगी ॥ १८ ॥
मण्डपे विप्रकृष्टे तु पाठ्यमुच्चारितस्वरम् ।
अनिस्सरणधर्म त्वाद्विस्वरत्वं भृशं व्रजेत् ॥ १ ९ ॥
(दण्डप्रमाण ज्येष्ठादि ) विप्रकृष्ट मण्डप में ऊँचे स्वर से किया गया उच्चारण (मण्डप में से ) शीघ्र न निकल पाने के कारण' अत्यधिक विस्वर हो जाता १. इसके द्वारा विकृष्ट मध्यम मण्डप का संकेत किया गया है क्योंकि इस मण्डप की भुजाओं की असमानता के कारण अन्य मण्डपों की भाँति एक भुजा के प्रमाणज्ञान से अन्य भुजाओं के परिमाण का बोध नहीं हो पाता है । २. अनिस्सरणधर्मत्वाद्- अभिनवगुप्त के मत में इसका अर्थ है पास वाले -दूसरे शब्द की उत्पत्तिरूप निस्सरण धर्म जहाँ न हो (शब्दान्तरस्य प्रसराभावा- दित्यर्थः ) अर्थात् अत्यन्त दूरी के कारण शब्द का प्रसार न होने से पाठ विस्वर हो जाता है । किन्तु इसका अर्थ यह करना असंगत नहीं कि 'अनिःसरण' द्वारा वाणी के • मण्डप से बाहर न जाने की ओर संकेत है । ज्येष्ठ विप्रकृष्ट मण्डप भुजाओं की विशालता के ही अनुपात में भी होगा और तब उस बृहदाकार भवन में उच्च स्वर से यदि पाठ किया जायेगा तो ध्वनि इतने बड़े मण्डप में शीघ्र ही बाहर नहीं निकल पायेगी । फलस्वरूप अनुशणनात्मक गूंज सुनाई पड़ती रहेगी एवं इसी गूंज ..के मध्य आगामी उच्चारणों का क्रम चलते रहने पर शब्दों का स्वर विकृत होकर -कुछ का कुछ प्रतीत होने लगेगा ।
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द्वितीयोऽध्यायः है' ॥ १ ९ ॥
यश्चाप्यास्यगतो भावो नानादृष्टिसमन्वितः ।
स वेश्मनः प्रकृष्टत्वाद् व्रजेदव्यक्ततां पराम् ॥। २० ॥
और उस (अभिनेता) के मुख पर भी अनेक दृष्टियों से समन्वित जो (सात्विक आदि ) भाव उत्पन्न होंगे, वह भी प्रेक्षागृह के अत्यन्त विशाल होने पर अत्यन्त अव्यक्त- (पीछे वाले दर्शकों को साफ दिखाई न देने के कारण अस्पष्ट) ही रहेंगे । (और इस प्रकार नाटक के चरम उद्देश्य रसानुभूति की भी सिद्धि नहीं होगी ।) ॥ २० ॥
मध्यम प्रेक्षागृहाणांनाट्यमण्डप की ज्येष्ठता-सर्वेषां तस्मान्मध्यममिष्यते ।
यावत्पाठ्यं च गेयं च तत्र श्रव्यतरं भवेत् ॥ २१ ॥
इस प्रकार समस्त प्रेक्षागृहों में मध्यम ( प्रेक्षागृह ) उपयुक्ततम है क्योंकि उसमें जितना भी पाठ्य एवं गायन होता है वह सब अनायास सुनाई देता है ॥ २१ ॥
नाट्यमण्डपों के तीन भेद—
(प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां त्रिप्रकारो विधिः स्मृतः ।
विकृष्टश्चतुरस्रश्च त्र्यस्रश्चैव प्रयोक्तृभिः ॥
(नाट्य के प्रयोक्ताओं द्वारा समस्त प्रेक्षागृहों के तीन प्रकार निश्चित किए गये. हैं- १. विकृष्ट, २. चतुरस्र एवं ३. त्र्यस्र । नाट्यमण्डपों का श्रेणी निर्धारण- कनीयस्तु स्मृतं त्र्यसं, चतुरस्रं च मध्यमम् । ज्येष्ठं विकृष्टं विज्ञेयं नाट्यवेश्मप्रयोक्तृभिः ॥ ) रङ्गशाला के प्रयोक्ताओं को यह जानना चाहिये कि कनीय प्रेक्षागृह त्र्यत्र, मध्यम चतुरस्र, एवं ज्येष्ठ विकृष्ट होता है । )
मानवोपयोगी नाट्यमण्डप निर्माण की विधि- देवानां मानसी सृष्टिर्गृहेषूपवनेषु च ।
यत्नभावाभिनिष्पन्नाः सर्वे भावा हि मानुषाः ॥ २२ ॥
गृहों तथा उपवनों ( आदि ) के सम्बन्ध में देवताओं की दृष्टि मानसी ( सङ्कल्प १. अभिनवभारती के अनुस्वार मण्डप अधिक बड़ा होने पर उच्च स्वर से किया गया पाठ पास बैठे सामाजिकों के लिए तीक्ष्ण होने से एवं दूरवर्ती जनों के लिए अश्राव्य होने से विस्वर हो जाता है ।
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४६ नाट्यशास्त्रम् -मात्र से साध्य ) हैं, किन्तु मनुष्यों के समस्त भाव (गृहादि पदार्थ ) प्रयत्न द्वारा ही -सिद्ध हो पाते हैं ' ॥ २२ ॥
तस्माद्देवकृतैर्भावैर्न विस्पर्धेत मानुषः ।
मानुषस्य तु गेहस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २३ ॥
इस कारण देवताओं द्वारा बनाए गये भावों (गृह उपवन अथवा नाट्यमण्डपादि वस्तुओं ) के साथ मनुष्य को स्पर्धा नहीं करनी चाहिए । अब मैं मनुष्य के [उपयुक्त ] ( नाट्य ) गृह के लक्षणों को भलिभाँति बताऊँगा ॥ २३ ॥
भूमेर्विभागं पूर्वं तु परीक्षेत प्रयोजकः ।
ततो वास्तु प्रमाणेन प्रारभेत शुभेच्छया ॥ २४ ॥
[नाट्य के ] प्रयोजन को सबसे पहले भूमि के उस विभाग की ( श्रेष्ठता अथवा अनुपादेयता विषयक ) परीक्षा करनी चाहिये । इसके पश्चात् शुभ इच्छा से वास्तु- शास्त्र के प्रमाणानुसार कार्य का आरम्भ करना चाहिये ॥ २४ ॥
नाट्यमण्डपोपयोगी भूमि-
समा स्थिरा तु कठिना कृष्णा गौरी च या भवेत् ।
भूमिस्तत्रैव कर्तव्यः कर्तृभिर्नाट्यमण्डपः ॥ २५ ॥
जो भूमि समतल, स्थिर', मजबूत तथा काली अथवा गौरवर्ण की हो उसी भूमि पर [ नाट्यमण्डप ] बनवाने वालों को नाट्यमण्डप बनवाना चाहिये ॥ २५ ॥
१. इस श्लोक के द्वारा मध्येतर रङ्गस्थलों की उपादेयता पर प्रकाश डाला गया है । भरतमुनि ने हस्त प्रमाण मध्यम नाट्यवेश्म को ही मनुष्यों के लिए उपयुक्त माना है तो स्वभावतः प्रश्न उठता है कि फिर नाट्यशास्त्र में उल्लिखित मध्येतर नाट्यवेश्मों का क्या प्रयोजन है? इसका उत्तर है कि देवता तो अपने भवनादि संकल्पमात्र से यथेच्छ नाप के बनाते हैं व प्रयोग में लाते हैं किन्तु मनुष्यों के भवनादि तो एकबार प्रयत्नपूर्वक जैसे बन गये वैसे सदा प्रयोग में लाने पड़ते हैं 1। इसलिए नाट्यशास्त्रकार ने स्पष्ट कर दिया कि मध्येतर नाट्यमण्डपों में क्या दोष है जिससे • मनुष्य प्रयत्न करके अन्य मण्डपों की रचना करने के श्रम एवं तज्जन्य निराशा से बच जाए । २. स्थिरा - तूफान या बाढ़ के प्रकोप से जिसके ढह जाने की सम्भावना न हो ।
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द्वितीयोऽध्यायः ४७
भूमि का संस्कार- - प्रथमं शोधनं कृत्वा लाङ्गलेन समुत्कृषेत् ।
अस्थिकीलकपालानि तृणगुल्मांश्च शोधयेत् ॥ २६ ॥
पहले [ भूमि को ] साफ करके हल से अच्छी तरह जुतवाना चाहिये और हड्डी, कील, कपाल [ खोपड़ी अथवा खपड़े ] घासफूस एवं झाड़ियों आदि को साफ कर कर देना चाहिये ॥ २६ ॥
नाट्यमण्डप निर्माणोपयोगी नक्षत्र -. शोधयित्वा वसुमतीं प्रमाणं निर्दिशेत्ततः । निर्देश दे । पृथ्वी की सफाई के बाद (ज्येष्ठमध्यादि ) प्रमाण के अनुसार (त्रीण्युत्तराणि सौम्यं च विशाखापि च रेवती । हस्ततिष्यानुराधाश्च प्रशस्ता नाट्यकर्मणि ॥ ) एवं उत्तरभाद्रपद) [उत्तर शब्द से युक्त तीन नक्षत्र (उत्तराषाढ, उत्तराफाल्गुनी मृगशिरा, विशाखा, रेवती, हस्त, तिष्य ( पुष्य ) और अनुराधा नामक नक्षत्र नाट्य- कर्म के लिए शुभ हैं । ] सूत्र- लक्षण -- ॥ २७ ॥ पुष्यनक्षत्रयोगेन शुक्लं सूत्र प्रसारयेत्
की डोरी फैलाना (अतएव) पुष्य नक्षत्र का योग होने पर सफेद रंग चाहिए ॥ २७ ॥
कार्पासं बाल्बजं वापि मौजे वाल्कलमेव च ॥। २८ ॥ सूत्रं बुधैस्तु कर्तव्यं यस्य च्छेदो न विद्यते विज्ञजनों को चाहिए कि यह डोरी कपास, बल्ब ( घास आदि) मूज अथवा वल्कल ( पेड़ की छाल ) की बनी हुई हो, और कहीं से कटी न हो (जिससे वह कार्यावस्था में ही टूट न जाय ) ॥ २८ ॥
सूत्रभंगजन्य हानियाँ- अर्धच्छिन्ने भवेत्सूत्रे स्वामिनो मरणं ध्रुवम् ।
त्रिभागच्छिन्नया रज्ज्वा राष्ट्रकोपो विधीयते ॥ २९ ॥
अर्धभाग ( बीचो बीच ) से सूत्र के टूट जाने पर स्वामी ( राजा अथवा नाट्य •मण्डप के स्वामी ) की मृत्यु हो जाती है । तिहाई भाग टूटने से राष्ट्र में विप्लव होता है ॥ २ ९ ॥
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४८ नाट्यशास्त्रम्
छिन्नायां तु चतुर्भागे प्रयोक्तुर्नाश उच्यते ।
हस्तात्प्रभ्रष्टया वापि कश्चित्त्वपचयो भवेत् ॥ ३० ॥
चौथाई भाग से टूटने पर नाट्य का प्रयोग करने वाले (नाट्याचार्य अथवा जाने पर कोई न अभिनेता) का नाश होता है । (नापते समय ) हाथ से सूत्र गिर कोई हानि अवश्य होती है ॥ ३० ॥
रज्जुग्रहणमिष्यते । तस्मान्नित्यं प्रयत्नेन कार्यं चैव प्रयत्नेन मान नाट्यगृहस्य तु ॥ ३१ ॥
इस कारण रस्सी को सदा प्रयत्नपूर्वक पकड़ना चाहिए और नाट्यगृह की नाप भी बड़ी सावधानी से लेनी चाहिये ॥ ३१ ॥
नाट्यमण्डप के प्रारम्भिक कृत्य- मुहूर्तेनानुकूलेन तिथ्या सुकरणेन च ।
ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा तु पुण्याहं वाचयेत्ततः ॥। ३२ ॥
शान्तितोयं ततो दत्वा ततः सूत्रं प्रसारयेत् । अनुकूल मुहूर्त एवं तिथि तथा शुभ करण' में ब्राह्मणों को तृप्त करके उनसे पुण्याह वाचन कहलवाये और (इसके बाद शान्तियुक्त अभिषेक करके ही सूत्र फैलाना चाहिये ॥ ३२-३३ । नाट्यमण्डप परिमाण एवं रंगशीर्ष निर्माण- चतुष्षष्टिकरान्कृत्वा द्विधा कुर्यात्पुनश्च तान् ॥ ३३ ॥
पृष्ठतोसममर्धविभागेनयो भवेद्भागोरङ्गशीर्षंद्विधाभूतस्यप्रकल्पयेत्तस्य तु ॥। ३४ ॥ - पहले चौसठ हाथ नाप लेना चाहिए, फिर उसके [ बत्तीस-बत्तीस हाथ के ] दो भाग कर देने चाहिए । [ इन दोनों भागों में] जो पीछे का भाग हो उसके आधे [सोलह हाथ ] भाग को पुनः आधा करके रङ्गशीर्ष बनाना चाहिये ॥३३-३४॥ १. करण – “ विष्ट्यादिरहितं " ऐसी अभिनवगुप्त की व्याख्या है । विष्टि एक अशुभ करण का नाम हैं । करण ज्योतिष का पारिभाषिक शब्द है । यह चान्द्र तिथि का अर्धभाग होता हैं । करणों की संख्या एकादश है । इनके नाम प्रस्तुत हैं -- [ १ ] वव, [ २ ] बालव, [ ३ ] कौलव, [४ ] तैतिलं, [ ५ ] गर, [ ६ ] वणिज, [७] विष्टि, [८ ] शकुनि, [ ९ ] चतुष्पद, [ १० ] नाग और [ ११ ] किस्तुघ्र । २. इस नाप के अनुसार विकृष्ट आकार के मध्यम परिमाण वाले नाट्य-मण्डप की रचना का विधान किया गया है ।
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मूलपाठ के अनुसार विकृष्ट आकार के मध्यम परिमाण नाट्यमण्डप का चित्र अ नेपथ्यगृह रङ्गशीर्ष फ रङ्गपीठ इ स अ स = ६४ हाथ, अइ ३२ हाथ, अ फ १६ हाथ अ उ = ८ हाथ, उफ = ८ हाथ
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अभिनव की व्याख्यानुसार विकृष्ट आकार के मध्यम परिमाण नाट्यमण्डप का चित्र नेपथ्य १६४३२ रङ्गशीर्ष ३२४८ मत्तवारणी १६४८ रङ्गपीठमत्तवारणी ३२४८ ३२४ ३२
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आयतमत्तवारणी के साथ विकृष्ट आकार का मध्यम P परिमाण नाट्यमण्डप, १६३२३१ रङ्गशीर्ष १६८ मत्तवारणी १६८ रङ्गपीठ १६८ ३२ × ३२
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वर्गाकार मत्तवारणी के साथ विकृष्ट आकार का मध्यम परिमाण नाट्य मण्डप नेपथ्यगृह १६४३२ ४ ३| रङ्गशीर्ष ८४३२ मत्तवारणी रङ्गपीठ ८८ १६४८ SEXSE ३२४३२
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द्वितीयोऽध्यायः ४९ नेपथ्यगृह निर्माण पश्चिमे च विभागेऽथ नेपथ्यगृहमादिशेत् । विभज्य भागान्विधिवद्यथावदनुपूर्वशः ॥ ३५ ॥ पीछे वाले आधे भाग में नेपथ्यगृह बनाना चाहिये । इस प्रकार पहले कही
गई विधि के अनुसार नाट्गृह के भागों को ठीक-ठीक विभाजित करना चाहिए ॥ ३५ ॥
नाट्य मण्डप - शिलान्यास विधि- शुभे नक्षत्रयोगे च मण्डपस्य निवेशनम् ।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोष र्मृदङ्गपणवादिभिः ॥ ३६ ॥
सर्वातौद्यैः प्रणुदितैः स्थापनं कार्यमेव तु ।
उत्सार्याणि त्वनिष्टानि पाषण्ड्याश्रमिणस्तथा ॥ ३७ ॥
। काषायवसनाश्चैव विकलाश्चैव ये नराः निशायां च बलिः कार्यो नानाभोजनसंयुतः ॥ ३८ ॥
। गन्धपुष्पफलोपेतो दिशो दश समाश्रितः पूर्वेण शुक्लान्नयुतो नीलानो दक्षिणेन च ॥ ३ ९ ॥ पश्चिमेन बलिः पीतो रक्तश्चैवोत्तरेण तु । मङ्गलकारी नक्षत्र का योग होने पर शंख एवं दुन्दुभि के घोष के साथ और मृदंग, तथा पणव आदि बाजों के साथ मण्डप की नींव डालने का कार्य करना चाहिए । ( मण्डप स्थापन के समय) अनिष्ट (पदार्थ ) एवं पाखण्डियों श्रमणों, गेरुआ वस्त्रधारी साधुओं एवं अपाहिजजनों को हटा देना चाहिये और रात्रि में दसों दिशाओं में विविध भाँति के भोजनों एवं सुगन्ध, पुष्प तथा फलों से बलि ' देनी चाहिये । पूर्वदिशा में श्वेत अन्न की, दक्षिण में नीले अन्न की, पश्चिम में पीले अन्न की तथा उत्तर में लाल अन्न की बलि देनी चाहिये ॥ ३६-४० ॥ यादृशं दिशि यस्यां तु दैवतं परिकल्पितम् ॥ ४० ॥
तादृशस्तत्र दातव्यो बलिर्मन्त्रपुरस्कृतः । जिस दिशा में जिस प्रकार के देवता की कल्पना की गयी है, उस ओर वैसी १. प्रथम अध्याय के १२१ वें श्लोक की टीका में अभिनवगुप्त ने ' बलि' का अर्थ "बलि: पूर्वोक्तरचनाविशेषः" किया है । (यह अर्थ लेने पर प्रस्तुत प्रसंग में) तात्पर्य निकलेगा कि चारों दिशाओं में अन्नादि से सुन्दर रचनाएँ बनाती चाहिए । ४ ना०