भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 91–100
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 91–100
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३४ नाट्यशास्त्रम् क्लीबानां धाष्टर्य करणमुत्साहः शूरमानिनाम् । विबोधश्च वैदुष्यं विदुषामपि ॥ ११० ॥ अबुधानां
(यह नाट्य ) नपुंसकों ( तक ) में धृष्टता को और शूरवीरों में उत्साह को उत्पन्न वाला है । प्राज्ञ जनों को विवेक देने वाला और विद्वज्जनों को वैदग्ध्यकरने प्रदान करता है ॥ ११० ॥
ईश्वराणां विलासश्व स्थैर्यं दुःखादितस्य च ।
धृतिरुद्विग्नचेतसाम् ॥ १११ ॥
अर्थोपजीविनामर्थो व्यक्तियों के लिए विलास, दुःखसंतप्त व्यक्तियों के लिए धैर्यं दिलाने वाला, धनोपजीवी ( ), ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के लिए अर्थमय अर्थ स्वरूप या अर्थप्रदाता ॥ एवं उद्विग्नमननानाभावोपसंपन्नंवाले व्यक्तियों के लिए धैर्यनानावस्थान्तरात्मकम्देने वाला है ॥ १११ । ११२ ॥ लोकवृत्तानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम् ॥ नानाविध भावों से समन्वित, अनेकविध अवस्थाओं से युक्त एवं लोकव्यवहार का अनुकरण करने वाला यह नाट्य मैंने बनाया है ॥ ११२ ॥
। उत्तमाधममध्यानां नराणां कर्मसंश्रयम् ॥ ११३ ॥ हितोपदेशजननं धृतिक्रीडासुखादिकृत् ( एतद्रसेषु भावेषु सर्वकर्मक्रियास्वथ । सर्वोपदेशजननं नाट्यं लोके भविष्यति || )
(यह नाटक ) श्रेष्ठ, नीच एवं इन दोनों के बीच के — मध्यम प्रकार के मनुष्यों , कल्याणप्रद उपदेश देने वाला तथा धैर्य, मनोरंजन एवं के आचरण पर आश्रित सुखादि को उत्पन्न करने वाला (सिद्ध होगा ) ॥ ११३ ॥
यह नाट्य रसों, भावों एवं सब कर्मों तथा क्रियाओं में, सर्वविध ( संसार में उपदेश देने वाला होगा । )
दुःखार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम् ।
विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद्भविष्यति ॥। ११४ ॥
से शिथिल, तथा शोकसंतप्त लोगों के ( =तप- स्विनाम्दुःख) सेलिएकातरयह नाट्यपरिश्रमसमय-समय पर विश्रान्तिप्रद होगा ॥ ११४ ॥
धर्म्यं यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धिविवर्धनम् । लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद्भविष्यति ॥ ११५ ॥ यह नाट्य धर्म को उत्पन्न करने वाला, यश देने वाला, आयुप्रद, मंगलमय,
ज्ञानवर्धक एवं संसार को उपदेश देने वाला होगा ॥ ११५ ॥
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प्रथमोऽध्यायः ३५
न तज्ज्ञानं, न तच्छिल्पं, न सा विद्या, न सा कला ।
नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ ११६ ॥
ऐसा कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग अथवा कर्म नहीं है जिसका इस नाट्य में चित्रण न होता हो' ॥ ११६ ॥
(सर्वशास्त्राणि शिल्पानि कर्माणि विविधानि च । अस्मिन्नाट्ये समेतानि तस्मादेतन्मया कृतम् ॥ ) ( समस्त शास्त्र, शिल्प, तथा नानाविध कर्म इस नाट्य में सन्निहित हैं, इसी कारण मैंने इसकी रचना की । ) तन्नात्र मन्युः कर्तव्यो भवद्भिरमरान्प्रति । सप्तद्वीपानुकरणं नाट्यमेतद्भविष्यति ॥। ११७ ॥ ( येनानुकरणं नाट्यमेतत्तद्यन्मया कृतम् ॥ ) इस कारण आप ( दैत्य) लोग देवताओं से इस ( नाट्य के ) विषय में कुपित न हो, इस नाट्य में सातों द्वीपों में प्राप्य भावों ) का अनुकरण किया गया है, १. नाट्य की तथारूपता का कारण यह है कि यह सप्तद्वीप निवासियों के भावानुकीर्तनरूप है ( सप्तद्वीपगतभावानुकीर्तन रूपे नाट्ये... अभिभा० ) । यह श्लोक नाटक के क्षेत्र के महत्त्व एवं व्यापकता का बोधक है । नाटक लोक का अनुकीर्तन करता है । अतः लोक में प्राप्य समस्त ज्ञान, कला, साहित्यादि नाटक में यथास्थान प्रयुक्त किये जाते हैं । इस श्लोक में भरतमुनि ने जो दावा किया है, वह नाट्यशास्त्र के अध्ययन से नितान्त उपयुक्त प्रतीत होता है । अलंकार, रस, छन्द, वास्तुकला, नृत्य, गीत, कामशास्त्र आदि अनेकानेक कलाओं का इसमें समावेश मिलता है जिसमें नाट्यशास्त्र की विषयगत विविधता एवं विस्तार के सम्बन्ध में कोई संदेह नहीं रहता । अभिनवभारती की व्याख्या के अनुसार यहाँ प्रयुक्त ज्ञानादि शब्दों के अर्थ निम्नलिखित है—है- ज्ञान -यह "उपादेय आत्मज्ञानादि " का वाचक शब्द है । शिल्प – इससे माला, चित्र या पुस्त ( दर्शनीय वस्तु) बनाने के रचनाकौशल का बोध होता है । विद्या- विद्या शब्द से दण्डनीति इत्यादि चौदह विद्याओं का ग्रहण होता है । कला - इससे गीत वाद्यादि का ग्रहण होना चाहिये । योग- योग का अर्थ है - मिलाना । यहां यह ज्ञान से लेकर कला तक के तत्त्वों को स्वयं अपने भेदों के साथ, अथवा परस्पर मिलाने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है ।
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३६ नाट्यशास्त्रम् [क्योंकि मेरे द्वारा रचित नाट्य अनुकरण ( मात्र ) है' ] ॥ ११७ ॥
देवानामसुराणां च राज्ञामथ कुटुम्बिनाम् ।
ब्रह्मर्षीणां च विज्ञेयं नाट्यं वृत्तान्तदर्शकम् ॥ ११८ ॥
नाट्य को देवताओं, दैत्यों, राजाओं तथा सम्बन्धी जनों एवं ऋषियों के वृत्तान्तों को प्रदर्शित करने वाला जानना चाहिये ॥ ११८ ॥
योऽयं स्वभावो लोकस्य सुखदुःखसमन्वितः ।
११ ९ ॥ सोऽङ्गाद्यभिनयोपेतो नाट्यमित्यभिधीयते ॥
संसार का जो यह सुख एवं दुःख से परिपूर्ण स्वभाव है, अङ्ग' आदि के अभिनय से युक्त होने पर उसी को 'नाट्य ' कहा जाता है ॥ ११ ९ ॥
(वेदविद्येतिहासानामाख्यानपरिकल्पनम् ।
विनोदकरणं लोके नाट्यमेतद्भविष्यति ॥
(वेद चतुष्टय, चतुर्दश विद्याओं एवं इतिहास की कथाओं की कल्पना करने से यह नाट्य संसार में मनोरंजन का साधन ( सिद्ध ) होगा । ) श्रुतिस्मृतिसदाचार परिशेषार्थ कल्पनम् । विनोदजननं लोके नाट्य मेतद्भविष्यति ॥ ) (वेदों, स्मृतियों, सदाचरण, आदि समस्त तत्त्वों की कल्पनाएँ करने से नाट्य संसार में मनोरंजन का साधन (सिद्ध ) होगा । ) १. यहाँ पर भरतमुनि के कथन का आशय यह है कि नाट्य में प्रदर्शित समस्त प्रिय या अप्रिय कार्य वास्तविक न होकर अनुकरण मात्र होते हैं अतः उनसे वैयक्तिक राग, द्वेष का उदय नहीं होना चाहिये । नाट्य में प्रदर्शित सातों द्वीपों के दुःख का अनुकरण काव्यात्मक होता है, वास्तविक नहीं । अतः वह भी रसानुभव देता है - नाट्य के अवलोकन से आनन्द का हेतु बन जाता है । अतः किसी को भी दुःखी या क्रोधित न होना चाहिये । नाट्य का उद्देश्य आनन्द प्राप्ति है, न कि क्लेशानुभूति । २. अंगाद्यभिनय –इस पद के विभिन्न अर्थ किये जाने संभव है । (अ ) आंगिक, वाचिक, सात्त्विक एवं आहार्य नामक चतुविध अभिनय । (ब ) शाखा, नृत्तगीत आदि । (स) विभाव, अनुभाव, एवं व्यभिचारि भाव आदि । नाट्यफल है रस- निष्पत्ति, एवं यह विभावानुभावव्यभिचारिभाव के संयोग अर्थात् विभावादि के अभिनय से युक्त है, ऐसा अर्थ भी हो सकता है ।
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प्रथमोऽध्यायः ३७ ब्रह्मा द्वारा देवताओं को नाट्यमण्डप के पूजन का आदेश- एतस्मिन्नन्तरे देवान् सर्वानाह पितामहः । क्रियतामद्य विधिवद्यजनं नाट्य मण्डपे ॥ १२० ॥
इसके ( दैत्यों के कोप को शान्त करने के ) पश्चात् पितामह ने सभी देवताओं से कहा-आज इस नाट्यमण्डप में विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये ॥ १२० ॥
बलिप्रदानैर्होमैश्व मन्त्रौषधिसमन्वितैः ।
भोज्यैर्भक्ष्यैश्च पानैश्च बलिः समुपकल्प्यताम् ॥ १२१ ॥
यह (यज्ञ ) बलि के प्रदान एवं मन्त्री तथा औषधियों से युक्त होमाहुतियों के द्वारा सम्पन्न करना चाहिये । इसके साथ ही भोज्य, भक्ष्य' एवं पेय पदार्थों के द्वारा बलि सम्पन्न करना चाहिये ॥ १२१ ॥
मर्त्यलोकगताः सर्वे शुभां पूजामवाप्स्यथ ।
अपूजयित्वा रङ्ग तु नैव प्रेक्षां प्रवर्तयेत् ॥ १२२ ॥
(यदि आप देवता लोग इस समय यज्ञ पूजन करेंगे तो फलस्वरूप) मृत्युलोक में आप सब लोगों की भी पूजा की जायगी । (इसके अलावा ) रङ्ग की पूजा किये बिना नाट्य का प्रारम्भ नहीं करना चाहिये ॥ १२२ ॥
रङ्ग-मश्च के पूजन का महत्त्व- अपूजयित्वा रङ्गं तु यः प्रेक्षां कल्पयिष्यति ।. निष्फलं तस्य तज् ज्ञानं तिर्यग्योनिं च यास्यति ॥ १२३ ॥
जो कोई रङ्ग की पूजा बिना किये नाट्य का प्रदर्शन करेगा उसका वह (नाट्यविषयक ) ज्ञान व्यर्थ हो जायगा एवं ( मृत्यु के बाद ) वह तिर्यक् ( पशु, पक्षी की) योनि कोयज्ञेनप्राप्त होगासंमितं॥ १२३ ॥ ह्येतद्रङ्गदैवतपूजनम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्यं नाट्ययोक्तृभिः ॥ १२४ ॥
रङ्गस्थल के देवताओं की यह पूजा यज्ञ के समान है । इसलिए नाट्य का प्रयोग करने वालों को इसके अनुष्ठान का सब तरह से प्रयास करना चाहिये ॥ १२४ ॥
१. भोज्य एवं भक्ष्य पदार्थ यद्यपि हैं तो खाद्य वस्तुएँ ही, पर इनमें अन्तर यह है कि भोज्य कहते हैं मोदक, शष्कुली, सदृश कठोर खाद्य को एवं भक्ष्य से तात्पर्य है मुलायम खाद्य से यथा पायस, कृशरादि ।
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३८ नाट्यशास्त्रम्
नर्तकोऽर्थपतिर्वापि यः पूजां न करिष्यति ।
न कारयिष्यत्यन्यैर्वा प्राप्नोत्यपचयं तु सः ॥ १२५ ॥
जो कोई नर्तक (नट अभिनेता ) या ( नाटक का संरक्षक ) धनाधिपति रंग की पूजा स्वयं नहीं करेगा, या दूसरे से नहीं करायेगा उसकी हानि होगी ॥ १२५ ॥
यथाविधि यथादृष्टं यस्तु पूजां करिष्यति ।
स लप्स्यते शुभानर्थान् स्वर्गलोकं च यास्यति ॥ १२६ ॥
जो (नट या अर्थपति ब्रह्मा द्वारा बतायी गई) विधि के अनुसार (लोक एवं शास्त्र में ) जैसा देखा जाता है वैसी पूजा करेगा वह कल्याणप्रद अर्थ (धन अथवा वस्तु ) प्राप्त करके स्वर्ग लोक में जाएगा ॥ १२६ ॥
एवमुक्त्वा तु भगवान्द्रुहिणः सह दैवतैः ।
रङ्गपूजां कुरुष्वेति मामेवं समचोदयत् ॥ १२७ ॥
भगवान् ब्रह्मा ने इस प्रकार कहकर देवताओं के साथ ही मुझे भी रंगस्थल की पूजा करने की प्रेरणा दी ॥ १२७ ॥
॥ इति प्रथमोऽध्यायः ॥ - * -
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॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥ - * -
मुनियों का भरत से प्रश्न- भरतस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छुर्मुनयस्ततः ।
भगवन् श्रोतुमिच्छामो यजनं रङगसंश्रयम् ॥ १ ॥
भरत मुनि के वचनों को सुनकर मुनियों ने उनसे कहा कि हे भगवन्! हम रंगस्थल में किये जाने वाले यज्ञ के विषय में सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
अथ वा याः क्रियास्तत्र लक्षणं यच्च पूजनम् ।
भविष्यद्भिर्नरैः कार्यं कथं तन्नाटय वेश्मनि ॥ २ ॥
अथवा ( रंगस्थल में किये जाने वाले यज्ञ के पहले ) उस (नाट्यशाला ) में जो क्रियाएँ विधीयमान हो, तथा जिस लक्षण का पूजन हो उसे आगामी पीढ़ियाँ कैसे करें, ( यह बतलाने की कृपा करें । ) ॥ २ ॥
इहादिर्नाट्ययोगस्य नाट्यमण्डप एव हि ।
तस्मात्तस्यैव तावत्त्वं लक्षणं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
(क्योंकि ) नाट्ययोजना का मूलतत्त्व नाट्यमण्डप है, अतः आपको सर्वप्रथम उसका लक्षण ही बताना चाहिये ॥ ३ ॥
भरतमुनि द्वारा मुनियों के प्रश्न के उत्तर में नाट्यमण्डप की पूजनविधि का वर्णन-
तेषां तु वचनं श्रुत्वा मुनीनां भरतोऽब्रवीत् ।
लक्षणं पूजनं चैव श्रूयतां नाट्यवेश्मनः ॥ ४ ॥
उन मुनियों के इस कथन को सुनकर भरतमुनि ने कहा-आप लोग नाट्य- मण्डप के लक्षण एवं पूजनविधि को सुनिये ॥ ४ ॥
दिव्यानां मानसी सृष्टिर्गृहेषूपवनेषु च । ( यथाभावाभिनिर्वर्त्याः सर्वे भावास्तु मानुषाः ॥ ) नराणां यत्नतः कार्या लक्षणाभिहिताः क्रियाः ॥ ५ ॥
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नाट्यशास्त्रम् देवताओं के गृहों एवं उपवनों में जो सृष्टि होती है वह मानसिक होती है । [ पर मनुष्यों के जो भाव (गृहादि सृष्टि ) हैं वह सब जैसे ( दृश्यमान ) होते हैं, वैसे ही विधिपूर्वक बनाये जाते हैं । ] अतः मनुष्यों को शास्त्र में कही हुई क्रियायें प्रयासपूर्वक सम्पन्न करनी होती हैं ॥ ५ ॥
श्रूयतां तद्यथा यत्र कर्तव्यो नाट्यमण्डपः ।
तस्य वास्तु च पूजा च यथा योज्या प्रयत्नतः ॥ ६ ॥
अतः जिस स्थल पर एवं जिस विधि से नाट्यमण्डप की रचना करनी चाहिए उसकी तथा उस (नाट्यमण्डप ) की गृहनिर्माण विधि तथा तदनुकूल पूजादि करने की विधि को ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६ ॥
नाट्यमण्डप के तीन भेद- इह प्रेक्षागृहं दृष्टा धीमता विश्वकर्मणा ।
त्रिविधः सन्निवेशश्च शास्त्रतः परिकल्पितः ॥ ७ ॥
यहाँ प्रेक्षागृह ( की रचनाविधि ) को देखकर बुद्धिशाली विश्वकर्मा ने शास्त्र के अनुकूल उसके तीन प्रकार के आकार की कल्पना की ॥ ७ ॥
त्रिविध नाट्यमण्डपों के त्रिविध परिमाण- विकृष्टश्चतुरश्रश्च त्र्यश्रश्चैव तु मण्डपः । तेषां त्रीणि प्रमाणानि ज्येष्ठं मध्यं तथाऽवरम् ॥ ८ ॥
( विश्वकर्मा की कल्पनानुसार ) मण्डप आयताकार, वर्गाकार और त्रिभुजाकार होता है । उन (त्रिविध मण्डपों अर्थात् प्रेक्षागृहों ) के ज्येष्ठ, मध्यम एवं अवर यह तीन, परिमाण होते हैं ॥ ८ ॥
प्रमाणमेषां निर्दिष्ट हस्तदण्डसमाश्रयम् ।
शतं चाष्टौ चतुःषष्टिर्हस्ता द्वात्रिंशदेव च ॥ ९ ॥
इन (त्रिविध मण्डपों) का परिमाण हस्त एवं दण्ड' पर आधारित हैं । परि-माण एक सौ आठ अथवा चौंसठ अथवा बत्तीस हस्त होता है ॥ ९ ॥
ज्येष्ठ, मध्य तथा कनिष्ठ नाट्यमण्डप का परिणाम- अष्टाधिकं शतं ज्येष्ठं, चतुःषष्टिस्तु मध्यमम् । कनीयस्तु तथा वेश्म हस्ता द्वात्रिंशदिष्यते ॥ १० ॥
एक सौ आठ हस्त (हस्त के परिमाण ) का ज्येष्ठ, चौंसठ ( हस्त ) का मध्यम एवं बत्तीस हस्त का (नाट्यमण्डप ) कनिष्ठ माना जाता है ॥ १० ॥
१. हस्त एवं दण्डादि माप की इकाइयाँ हैं । आगे भरत ने माप की अन्य इकाइयों का उल्लेख करते हुए स्वयं स्पष्ट किया है कि हस्तादि का क्या प्रमाण है ।
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द्वितीयोऽध्यायः ४१ देव, नृप, मानव आदि के लिए त्रिविध नाट्यमण्डप - देवानां तु भवेज्ज्येष्ठं नृपाणां मध्यमं भवेत् । शेषाणां प्रकृतीनां तु कनीयः संविधीयते ॥ ११ ॥
होता है एवं अन्य देवताओं का (प्रेक्षागृह) ज्येष्ठ होता है । राजाओं का मध्य सामान्यजन के लिए कनीय (नाट्यमण्डप ) विहित किया जाता है ॥ ११ ॥
मध्य नाट्यमण्डप की श्रेष्ठता- (प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां प्रशस्तं मध्यमं स्मृतम् । तत्र पाठ्यं च गेयं च सुखश्राव्यतरं भवेत् ॥ ) (इन प्रेक्षागृहों में मध्यम प्रेक्षागृह सर्वोत्तम होता है, क्योंकि उसमें जो कुछ (कथोपकथन ) पढ़ा जाता है एवं जो ( गानादि ) गाए जाते हैं वह सरलतापूर्वक सुनाई देते हैं । त्रिविध नाटयमण्डपों के त्रिविध आकार- (प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां त्रिप्रकारी विधिः स्मृतः । विकृष्टश्चतुरस्रश्च व्यस्रश्चैव प्रयोक्तृभिः || ) समस्त प्रेक्षागृहों की तीन प्रकार की विधि होती हैं, ( जिसके अनुसार ) प्रयोक्ता गण उन्हें विकृष्ट (आयताकार ), चतुरस्र ( वर्गाकार ) एवं व्यस्त्र ( त्रिकोणाकार) रूप मानते हैं । • त्रिविध नाट्यमण्डपों का परिमाण- (कनीयस्तु स्मृतं त्र्यत्रं चतुरस्रं तु मध्यमम् । ज्येष्ठ विकृष्टं विज्ञेयं नाट्यवेदप्रयोक्तृभिः 11 ) नाट्यवेद के प्रयोक्ताओं के मतानुसार सबसे छोटे को व्यस्र एवं मध्यमाकार वाले को चतुरस्र एवं सबसे बड़े (प्रेक्षागृह) को विकृष्ट कहा जाता है । ' ) १. इस श्लोक एवं इसके पूर्ववर्ती श्लोक समुदाय के द्वारा भरतमुनि ने नाट्य- गृह के आकार पर विशेष रूप से प्रकाश डाला है । नाट्यगृह का त्रिविध विभाजन आकारपरक है । इस दृष्टि से प्रेक्षागृह के तीन प्रकार किए गए हैं- ( १ ) विकृष्ट; ( २ ) चतुरस्र, ( ३ ) त्र्यत्र । हस्तपरिमाण के आधार पर भी प्रेक्षागृह के तीन भेद माने गए हैं- ( १ ) ज्येष्ठ, ( २ ) मध्यम, और (३ ) कनीय । कुछ व्याख्याकारों के मत में प्रेक्षागृहों के भेद के यह उभय प्रकार एक ही हैं । इस तरह ज्येष्ठ = विकृष्ट, मध्यम = चतुरस्र एवं अवर = त्र्यत्र ।
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४२ नाट्यशास्त्रम् किन्तु अभिनवगुप्ताचार्य के मत में यह धारणा अमान्य है । उनके कथनानुसार कुछ लोगों का यह कहना कि विकृष्टादि ही क्रमशः ज्येष्ठादि हैं, उपयुक्त नहीं है । अपितु यह कथन सत्य है कि इनमें प्रत्येक के तीन-तीन भेद होते हैं और सब मिला- कर नी भेद होते हैं । (एतान्येव त्रीणि ज्येष्ठादीनि इति केचित्, अन्ये तु प्रत्येकं त्रित्वमिति नवेतेऽत्र भेदा इत्याहुः, एतदेव युक्तम् ) । इन नवविध मण्डपों की नाप भी प्रेक्षागृहों के अष्टादश दो प्रकार की हैं— हस्तात्मक एवं दण्डात्मक । इस तरह से रूप सिद्ध होते हैं, जैसा कि निम्न तालिका से स्पष्ट है— १. ज्येष्ठ विकृष्ट (हस्तप्रमाण) (देवतार्थ ) २. ज्येष्ठ चतुरस्र ( "" ) (:) ३. ज्येष्ठ व्यस्त्र ( 13 ) ( ४. मध्यम विकृष्ट 33 ) (नृपार्थ ) ' " ) ५. मध्यम चतुरस्र " ) ६. मध्यम व्यस्र ( ) ( ) ७. कनीय विकृष्ट ) (लोकार्थ) ८. कनीय चतुरस्र ( " ) (,, ) ९. कनीय त्र्यन (; 17 ) १०. ज्येष्ठ विकृष्ट (दण्डप्रमाण ) (देवतार्थ) ११. ज्येष्ठ चतुरस्र ) ( 13 ) ( " ) १२. ज्येष्ठ त्र्यस्र " ) १३. मध्मम विकृष्ट 17 (नृपार्थ) १४. मध्यम चतुरस्र ( 11 १५. मध्यम त्र्यत्र (,, ) १६. कनीय विकृष्ट ( (लोकार्थं ) " ) १७. कनीय चतुरस्र १८. कनीय व्यस्र ) यहाँ पर जिन हस्त एवं दण्डप्रमाणों का उल्लेख हुआ है वह प्रेक्षागृह की एक चतुरस्र एवं त्र्यत्र प्रेक्षागृहों का परिमाण जानने में तो भुंजा के वाचक हैं । इनसे कोई बाधा नहीं होती किन्तु विकृष्ट प्रेक्षागृह के विषय में संदेह निवारण नहीं हो पाता क्योंकि उसकी चारों भुजाएँ एक समान नहीं होतीं । इस शंका का समाधान आगे सत्रहवें श्लोक में जाकर हो जाता है—जहाँ मनुष्यों के विकृष्ट प्रेक्षागृह की भुजाओं का अनुपात, २: १ दिया गया है । यदि इसी अनुपात को अन्यत्र भी प्रयुज्य समझा जाए तो यह प्रयास कुतर्क नहीं होगा ।
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द्वितीयोऽध्यायः प्रेक्षागृहों की माप के प्रमाण ( बीट ) - प्रमाणं यच्च निर्दिष्टं लक्षणं विश्वकर्मणा । प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां तच्चैव हि निबोधत ॥ १२ ॥
विश्वकर्मा ने ( इन त्रिविध प्रेक्षागृहों का) जो प्रमाण एवं लक्षण तय किया है।
उसे भी अच्छी तरह जान लो ॥ १२ ॥
अणू रजश्च बालश्च लिक्षा यूका यवस्तथा ।
अगुलं च तथा हस्तो दण्डश्चैव प्रकीर्तितः ॥ १३ ॥
१. अणु, २. रज, ३. बाल, ४. लिक्षा, ५. यूका, ६. जौ, ७. अंगुल, ८. हस्त, एवं ९. दण्ड (प्रमाणों के यह प्रकार ) कहे जाते हैं ॥ १३ ॥
अणवोष्टौ रजः प्रोक्त, तान्यष्टौ वाल उच्यते ।
वालास्त्वष्टौ भवेल्लिक्षा, यूका लिक्षाष्टकं भवेत् ॥ १४ ॥
आठ ' अणु ' के संयोग को 'रज ' कहते हैं, वे आठ ( रज ) मिलकर 'बाल' कहे जाते हैं, आठ बालों की एक 'लिक्षा' ( लीख ) होती है और आठ लिक्षाओं को मिलाकर एक 'यूका ' (जू ) होती है ॥ १४ ॥
कास्त्वष्टौ यवो ज्ञेयो, यवास्त्वष्टौ तथाङ्गुलम् ।
अङ्गुलानि तथा हस्तश्चतुर्विंशतिरुच्यते ॥ १५ ॥
आठ ' यूका' का एक ' यव ' जानना चाहिए और आठ यव का एक 'अंगुल' होता है । एवं चौबीस अंगुलों का एक 'हस्त' होता है ॥ १५ ॥
चतुर्हस्तो भवेद्दण्डो निर्दिष्टस्तु प्रमाणतः ।
अनेनैव प्रमाणेन वक्ष्याम्येषां विनिर्णयम् ॥ १६ ॥
परिमाण की दृष्टि से चार 'हस्त' का एक 'दण्ड ' कहा गया है । इसी प्रमाण (के मापदण्ड ) से मैं इन (प्रेक्षागृहों ) के निर्णय को बतलाऊँगा ॥ १६ । १. माप की एकरूपता न होने से अनर्थ होने की आशंका है । हस्तों एवं दण्डों के नाप साधारणतः भिन्न भिन्न होते हैं अतः विविध नाप वाले हस्त एवं दण्डों को पैमाना बनाकर बने प्रेक्षागृह भी एक समान नहीं होंगे । इस वैभिरन्य की आशंका के निर्मूलन हेतु भरतमुनि ने प्रमाणों का एक स्तर तय कर दिया है । परिमाणों का यह विभाजन अपनी सूक्ष्मता एवं वैज्ञानिकता के लिए आज भी स्तुत्य है । अभिनव- गुप्त के मत में यहाँ अणु से तात्पर्य सामान्यतया प्रसिद्ध अणु ( परमाणु ) अर्थात्... द्वयणुक प्रमाण से न होकर, जहाँ से दृश्यता प्रारम्भ होती है, उस त्र्यणुक 'अणु से है ।