भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 161–170
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 161–170
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नाट्यशास्त्रम्
मया समवकारस्तु योऽयं सृष्टः सुरोत्तम! ।
श्रवणे दर्शने चास्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ७ ॥
इसके पश्चात् देवताओं के साथ ब्रह्मा ने शिव जी के निवासस्थान पर जाकर उनकी समुचित पूजा करके कहा-'हे देवश्रेष्ठ! मैंने जो इस समवकार की रचना की है, उसे सुनने तथा देखने की कृपा करें ॥ ६-७ ॥
पश्याम इति 3 देवेशो द्रुहिणं वाक्यमब्रवीत् ।
(* ततो मामाह भगवान् सज्जो भव महामते ॥ ८ ॥
देवाधिपति शिव द्वारा समवकार देखने की स्वीकृति देने पर ब्रह्मा ने मुझसे (नाट्यावतारणार्थ) सुसज्जित होने को कहा ॥ ८ ॥
ततोबहुभूतगणाकीर्णेहिमवतः पृष्ठे नानानगसमाकुलेरम्यकन्दरनिर्झरे ॥ ९ ॥
पूर्वरङ्गः कृतः पूर्वं तत्रायं द्विजसत्तमाः ।
तथा त्रिपुरदाहश्च डिमसंज्ञः प्रयोजितः ॥ १० ॥
हे ब्राह्मणों अनेक पर्वतों से युक्त, अगणित आम्रवृक्षों से व्याप्त तथा रमणीक कन्दराओं व झरनों से सुशोभित हिमालय पर्वत की उपत्यका में (नाटक की अव- तारणा के पूर्व किये जाने वाले ) पूर्वरंगकर्म का सम्पादन करके इस ( अमृतमंथन नामक समवकार ) का एवं त्रिपुरदाह नामक डिम का प्रयोग किया गया ॥ ९-१० ॥ - 15 || शंकर जी का ब्रह्मा से निवेदन क
ततो भूतगणा हृष्टाः कर्मभावानुकीर्तनात् ।
॥ महादेव सुप्रीतः पितामहमथाब्रवीत् ॥ ११ ॥
-(लोकव्यवहारगत ) चेष्टाओं एवं भावनाओं का अनुकरण' देखकर सभी भूतगण मुदितमन हो गए । शंकर जी भी प्रसन्न होकर ब्रह्मा से बोले ॥ ११ । न 185 . १. इदं त्रिपुरदाहे तु लक्षणंक्षणं ब्रह्मणोदित -दश ३.६० भीनाटक - २. कर्मभावानुकीर्तनात् अनुकरण की प्रधानता बता चुके हैं इसी. अध्यायकर्मभावानुदर्शनात्में भरत मुनि४-४ पहलेकर्म भीएवं नाटकभावों कामें अनुदर्शन या अनुकीर्तन ही नाटक है । जीवन में मनुष्य नित्यप्रति नानाविध क्रियाए एवं कार्यव्यापार सम्पादित करता रहता है । तदनुकूल नानाविध इच्छाएं या अनु- भूतियाँ उसके मन में प्रस्फुटित होती रहती हैं । नाटक में यही दैनिक क्रियाएँ एवं भावनाएँ एक अनूठे ढंग से प्रस्तुत की जाती हैं । यही कारण है कि काव्य या दर्शन की भांति अधिकारी व्यक्ति के ही लिए सुलभ न होकर नाटक जनसामान्य के मानस
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चतुर्थोऽध्यायः ९१ हिन्छ कि अहो नाट्यमिदं सम्यक् त्वया सृष्टं महामते । फा यशस्यं च शुभार्थं च पुण्यं बुद्धिविवर्धनम् ॥ १२ ॥
हे महाभाग! आपने बहुत सुन्दर किया जो इस कीर्तिवर्धक कल्याणकारी पुण्यप्रद एवं बुद्धिप्रद नाट्य की रचना की ॥ १२ ॥
मयापीदं स्मृतं नृत्यं सन्ध्याकालेषु नृत्यता । कि नानाकरणसंयुक्तरङ्गहारैविभूषितम् ॥ १३ ॥
सन्ध्याकाल में नृत्य करते हुए मुझे भी इस नृत्य की स्मृति हुई जिसमें विविध करणों से युक्त अंगहार' सुशोभित हैं ॥ १३ ॥
पूर्वरङ्गविधावस्मिंस्त्वया सम्यक्प्रयोज्यताम् । वर्धमानकयोगेषु गीतेष्वासार च ॥ १४ ॥ महाग चैवार्थान्सम्यगेवाभिनेष्यसि । इस (नृत्य ) को आप पूर्वरंग विधि में भलीभाँति प्रयुक्त करें तथा वर्धमानक
को प्रभावित करता है । अपने जीवन की नितान्त परिचित घटनाओं का प्रदर्शन होते देखकर भूतों व गणों को भी प्रसन्नता होती है एवं शंकर भी आह्लादित होते हैं । इससे यही सिद्ध होता है कि नाटक साधारण एवं प्रबुद्ध दोनों वर्गों के लिए समान रूप से मनोरंजक होता है । "अनुकीर्तन " शब्द से यह बोध होता है कि नाटक में जो व्यापार प्रस्तुत किए जाते हैं वह सर्वथा नवीन नहीं होता अपितु घटित कार्यो को नाटक में फिर से प्रदर्शित किया जाता है । इससे इस धारणा को बल मिलता है कि नाटक घटनाओं का अनुकरण होता है । इस सन्दर्भ में १-१०६ १०७ पर दी हुई टिप्पणी भी दृष्टव्य है । १. नानाकरणसयुक्त रङ्गहारै::---नृत्य की सूक्ष्ममुद्राओं (करणों) पर आधारित मुख्यमुद्राएँ ( अंगहार ) । श्री घोष के अनुसार इसका अर्थ है —अवयव संचालन । अभिनवगुप्त ने ४.१ ९ श्लोक की व्याख्या में अंगहार की व्याख्या इस भाँति की है— ' अंगानां देशान्तरे समुचिते प्रापणप्रकारोऽङ्गहारः, हरस्य चायं हारः प्रयोगः, अंगनिर्वर्त्यो हारोऽङ्गहारः ।' करणः — 'हस्तपादसमायोगो नृत्यस्य करणं भवेत् ' ४.३० अर्थात् नृत्य में हाथ पैरों के संचालन को करण कहते हैं ।
२. वर्धमानकः - नृत्य सहित गीत का एकरूप ।
... वर्धमानमथापीह ताण्डवं यत्र पूज्यते । ५- १३ तथा ३१-६९ ॥
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* ९ २ नाट्यशास्त्रम् गीत एवं आसारित' और महागीतों मेंमें भीभी इन (नृत्य द्वारा व्यक्त) भावों को अच्छी ता -तरह समायुक्त करें ॥ १४-१५ ॥ यश्चायं पूर्वरङ्गस्तु त्वया शुद्धः प्रयोजितः ॥ १५ ॥
एभिर्विमिश्रितश्चायं चित्रो नाम भविष्यति । आपने पहले जो 'शुद्ध' ( संज्ञक ) पूर्वरंग निष्पादित किया था उसमें इस (नृत्य ) को मिश्रित कर देने पर उसकी संज्ञा "चित्र " हो जाएगी ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्मा जी का शंकर जी को उत्तर देना- श्रुत्वा महेश्वरवचः प्रत्युक्तस्तु स्वयम्भुवा ॥ १६ ॥! प्रयोगमङ्गहाराणामाचक्ष्व सुरसत्तम ।
शंकर जी के कथन को सुनकर ब्रह्मा ने उत्तर दिया- "हे देवश्रेष्ठ! कृपया अंगहारों के उपयोग बताइए ॥१६-१७ ॥ ब्रह्मा द्वारा तण्डु को आदेश - ततस्तण्डुं समाहूय प्रोक्तवान् भुवनेश्वरःवै ॥। १७ ॥ प्रयोगमङ्गहाराणामाचक्ष्व भरताय इसके बाद भुवनेश्वर ( ब्रह्मा जी ) ने तण्डु नामक ऋषि को बुला कर कहा कि तुम भरत को अंगहारों के प्रयोग की विधि बतलाओ ॥ १७-१८ ॥ तण्डु मुनि द्वारा भारतमुनि को करणों व अंगहारों का उपदेश- ततो ये तण्डुनाप्रोक्तास्त्वङ्गहारा महात्मना ॥ १८ ॥
तान्वः करणसंयुक्तान्व्याख्यास्यामि सरेचकान् । तण्डु ने विविध करणों से युक्त एवं रेचकों के सहित जो अंग- तब उन महात्मा हार मुझे बताए उनकी मैं व्याख्या करूंगा ॥ १८-१९ ॥ बत्तीस अंगहारों के नाम- तथा पर्यस्तकः स्मृतः ॥ १९ ॥
स्थिरहस्तोऽङ्गहारस्तु + सूचीविद्धस्तथा चैव ह्यपविद्धस्तथैव च । I आक्षिप्तकोऽथ विज्ञेयस्तथा चोद्घट्टितः स्मृतः ॥ २० ॥
१. आसारितः - 'कलापातविभागार्थ' भवेदासारितक्रिया' ५.२१ कलापात, को खण्डों में विषयअर्थात् मेंसमयविस्तृत वर्णन ३१-५९ विभाजित, ७५ एवंकरने१५का९ -१ श्रेय९ ४ मेंआसारितमिलता हैको। होता है । इस २. गीतः- ५ १३, ३१ ३१-१९ ० । ३. ४-२५० २५६ ( ना० शा० ) तक रेचकों की व्याख्या की गई।
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चतुर्थोऽध्यायः ९३
विष्कम्भश्चैव सम्प्रोक्तस्तथा 11 चैवापराजितः ।
२१ ॥ विष्कम्भापसृतश्चैव मत्ताक्रीडस्तथैव च ॥
स्वस्तिको रेचितश्चैव पार्श्वस्वस्तिक एव च ।
वृश्चिकासृतः प्रोक्तो भ्रमरश्च तथापरः ॥ २२ ॥
कीफि मत्तस्खलितकश्चैव मदाद्विलसितस्तथा । गतिमण्डलको ज्ञेयः परिच्छिन्नस्तथैव च ॥ २३ ॥
कू परिवृत्तचितोऽथ स्यात्तथा वैशाखरेचितः । | परावृत्तोऽथ विज्ञेयस्तथा चैवाप्यलातकः ॥ २४॥
पार्श्वच्छेदोऽथ सम्प्रोक्तो विद्युदुभ्रान्तस्तथैव च ।
२५ । ऊरूवृत्तस्तथा चैव स्यादालीढस्तथैव च ॥
रेचितश्चापि विज्ञेयस्तथैवारितः स्मृतः २६ ॥ आक्षिप्तरेचितश्चैव सम्भ्रान्तश्च तथापरः ॥
॥ १६ । अपसर्पस्तु विज्ञेयस्तथा चार्धनिकुट्टकः ।
द्वात्रिंशदेते सम्प्रोक्ता अङ्गहारास्तु नामतः ॥ २७ ॥
एतेषां तु प्रवक्ष्यामि प्रयोग करणाश्रयम् । बत्तीस प्रकार के अंगहार कहे गए हैं जिनके नाम यह हैं –( १ ) स्थिरहस्त, (२ ) पर्यंस्तक, ( ३ ) सूचीविद्ध, ( ४) अपविद्ध, ( ५ ) आक्षिप्तक, ( ६) उद्घट्टित, (७) विष्कम्भ, (८ ) अपराजित, ( ९ ) विष्कम्भापसृत, ( १० ) मत्ताक्रीड, ( ११ ) स्वस्तिक रेचित, ( १२ ) पार्श्वस्वस्तिक, ( १३ ) वृश्चिकापसृत, ( १४ ) भ्रमर, ( १५ ) मत्तस्खलि-- तक, ( १६ ) मदविलसित, ( १७ ) गतिमण्डल ( १८ ) परिछिन्न, ( १ ९ ) परिवृत्तरेचित, ( २० ) वैशाखरेचित, ( २१ ) परावृत्त, ( २२ ) अलातक, ( २३ ) पार्श्वच्छेद, ( २४ ) विद्युदुम्भ्रान्त, ( २५) करूवृत्त, ( २६ ) आलीढ, ( २७ ) रेचित, ( २८ ) आच्छुरित,.. ( २ ९ ) आक्षिप्तरेचित, ( ३० ) सम्भ्रान्त, ( ३१ ) अपसर्प, ( ३२ ) अर्धनि कुटट्क ॥ १ ९-२७ ॥ अंगहार वर्णन का उपकरण— * शिक्ष हस्तपादप्रचारश्चअङ्गहारेषु वक्ष्यामियथाकरणेषुयोज्यःच प्रयोक्तृभिःवै द्विजाः ॥। २८ ॥ अब मैं करणों पर आश्रित इन ( अंगहारों ) के प्रयोग के विषय में कहूँगा और यह भी बताऊँगा कि अंगहारों एवं करणों में प्रयोक्ताओं को किस प्रकार हाथ व
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९४ नाट्यशास्त्रम् पैरों का संचालन ' करना चाहिए ॥ २८-२९ ॥ करण वर्णनसर्वेषामङ्गहाराणांका उपक्रम निष्पत्तिः करणैर्यतः ॥ २ ९ ॥ तान्यतः सम्प्रवक्ष्यामि नामतः कर्मतस्तथा । क्योंकि समस्त अंगहारों का सम्पादन करणों से होता है अतएव मैं करणों के नाम एवं क्रियाओं का वर्णन करूँगा ॥ २ ९ -३० ॥ JIVFकरण का। लक्षण-हस्तपादसमायोगो नृत्यस्य करणं भवेत् ॥ ३० ॥
नृत्य में किए जाने वाले, हाथ और पैर दोनों के युगल संचालन की प्रक्रिया की संज्ञा 'करण' है ॥ ३० ॥
नृत्तमातृका, अंगहार, कलापक, मण्डक तथा संघातक का लक्षण - नृत्तकरणे चैव भवतो नृत्तमातृका । द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुभिर्वाप्यङ्गहारस्तु मातृभिः ॥ ३१ ॥
त्रिभिः कलापकं चैव चतुभिः मण्डकं भवेत् । क पञ्चैव कारणानि स्युः सङ्घातक इति स्मृतः ॥ ३२ ॥
दो वृत्तकरणों को नृत्तमातृका कहते हैं, एवं दो मातृकाओं के योग का नाम अंगहार है, तीन मातृकाओं के योग का कलापक, चार मातृकाओं के योग का नाम मण्डक (ना० शा० उ से ० षण्डक ) एवं पाँच मातृकाओं के योग का नाम संघातक होता है ॥ ३१-३२ । अंगहार लक्षण तथा करण वर्णनोपक्रम - (-7) षड्भिर्वा सप्तभिर्वापि अष्टभिर्नवभिस्तथा । करणैरिह संयुक्ता अङ्गहाराः प्रकीर्तिताः ॥ ३३ ॥ वडी
एतेषामेव हस्तपादविकल्पनम् । इसी भांति छ:, सात, आठ अथवा नौ करणों से भी युक्त अंगहार होते हैं । अब मैं इन ( करणों ) में किए जाने वाले हाथ पैर के संचालन का वर्णन करूँगा ॥ ३३-३४ ॥ १. हस्तपादप्रचार - अभिनवगुप्त के मत में इसका अर्थ है कि अंगहारों के प्रयोग में करणों का प्रयोग किया जाता है । एक करण से दूसरे करण में संक्रमित होने के लिए हाथ व पैरों का जिस भाँति संचालन करना चाहिए यह बताना अभिप्रेत है ।
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एक सौ आठ करणों के नाम- चतुर्थोऽध्यायः काण्ड ह तलपुष्पपुढं पूर्वं वर्तितं वलितो च ॥ ३४ ॥
अपविद्धं समनखं लीन स्वस्तिकरेचितम् ।
मण्डलस्वस्तिकं चैव निकुट्टकमथापि च ॥ ३५ ॥
तथैवार्धनिकुट्ट च कटिच्छिन्न तथैव च ।
अर्धरेचितकं चैव वक्षःस्वस्तिकमेव च ॥ ३६ ॥
उन्मत्त स्वस्तिकं चैव पृष्ठस्वस्तिकमेव च ।
दिक्स्वस्तिकमलातं च तथैव च कटीसमम् ॥ ३७ ॥
आक्षिप्तरेचितं चैव विक्षिप्ताक्षिप्तकं तथा ।
॥ अर्धस्वस्तिकमुद्दिष्टमञ्चितं च तथापरम् ॥ ३८ ॥
निकुञ्चितंभुजङ्गत्रासितंच प्रोक्तमूर्ध्वजानु तथैवचैव हिच ॥। ३ ९ ॥ स्याद्रेचकनिकुट्ट च तथा पादापविद्धकम् । वलितं घूर्णितं चैव ललितं च तथापरम् ॥ ४० ॥
ठीक.PP दण्डपक्षं तथा चैव भुजङ्गत्रस्तरेचितम् । नूपुरं चैव सम्प्रोक्तं तथा वैशाखरेचितम् ॥ ४१ ॥
करील P भ्रमरं चतुरं चैव भुजङ्गाञ्चितमेव च ।
दण्डरेचितकं चैव तथा वृश्चिक कुट्टितम् ॥ ४२ ॥
कटिभ्रान्तं तथा चैव लतावृश्चिकमेव च ।
छिन्नच करणं प्रोक्त तथा वृश्चिकरेचितम् ॥ ४३ ॥
वृश्चिकं व्यसितं चैव तथा पार्श्वनिकुट्टकम् ।
ललाटतिलकं क्रान्तं कुञ्चितं चक्रमण्डलम् ॥ ४४ ॥
III उरोमण्डलमाक्षिप्तं तथा तलविलासितम् ।
अर्गलं चाथ विक्षिप्तमावृत्त दोलपादकम् ॥ ४५ ॥
विवृत्त विनिवृत्तं च पार्श्वक्रान्तं निशुम्भितम् ।
विद्युदुद्भ्रान्तमतिक्रान्तं विवर्तितकमेव च ॥ ४६ ॥
गजक्रीडितकं चैव तलसंस्फोटितं तथा ।
गरुडप्लुतकं चैव गण्डसूचि तथापरम् ॥। ४७ ॥
परिवृत्तं समुद्दिष्ट पार्श्वजानु तथैव च ।
गृध्रावलीनकं चैव सन्नतं सूच्यथापि च ॥ ४८ ॥
अर्धसूचीति करणं सूचीविद्धं तथैव च ।
अपक्रान्तं च सम्प्रोक्तं मयूरललितं तथा ॥ ४ ९ ॥
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९६ बाट्यशास्त्रम् । सर्पितं दण्डपादं च हरिणप्लुतमेव च ॥ ५० ॥ ॥ ४६ प्रेङ्खोलतं नितम्बं च स्खलितं करिहस्तकम्
। प्रसर्पितकमुद्दिष्टं सिंहविक्रीडितं तथा ६ ॥ ५१ ॥ सिहाकषितमुद्वृत्तं थोपव च । तलसङ्घट्टितं चैव जनितं चावहित्थकम्
|| ३६ ॥ ५२ ॥ निवेशमेलकाक्रीडमूरुद्वृत्तं तथैव च मदस्खलितचैव विष्णुक्रान्तमथापि च ॥। ५३ ॥ सम्भ्रान्तमथ विष्कम्भमुद्धट्टितमथापि च
वृषभक्रीडितं चंव लोलितं च तथापरम् । 35 ॥ ५४ ॥ नागापसपितं चैव शकटास्यं तथैव च
। गङ्गावतरणं वेत्युक्तमष्टाधिकं शतम् ॥ ५५ ॥ 1125 अष्टोत्तरशत ह्य तत्करणानां मयोदितम्
करणों की संख्या एक सौ आठ हैं एवं उनके नाम इस प्रकार हैं- १. तलपुष्प- ६. लीन, ७. पुट, २. वर्तित ३. वलितोरू, ४. अपविद्ध, ५. समनख, स्वस्तिक रेचित, ८. मण्डलस्वस्तिक, ९. निकुट्टक, १०. अर्धनिकुट्ट, ११. कटि- छिन्न, १२. अर्धरेचित, १३. वक्षः स्वस्तिक, १४. उन्मत्त, १५. स्वस्तिक, १६. पृष्ठस्वस्तिक, १७. दिवस्वस्तिक, १८. अलात, १ ९. कटीसम, २०. आक्षिप्तरेचित, २१. विक्षिप्ताक्षिप्तक, २२. अर्धस्वस्तिक, २३. अञ्चित, २४. भुजंगत्रासित, २५. ऊर्ध्वजानु २६. निकुश्चित, २७. मत्तल्लि, २८ अर्धमत्तल्लि २९. रेचकनिकुट्ट, ३०. पादापविद्धक, ३१ वलित, ३२. घूर्णित, ३३. ललित ३४. दण्डपक्ष, ३५. भुजंगत्रस्तरेचित, ३६. नूपुर, ३७. वैशाखरेचित,,.,,, ३८. भ्रमर ३ ९ चतुर ४०. भुजंगाश्वित दण्डरेचितक ४२. वृश्चिक- कुट्टित, ४३. कटिभ्रान्त, ४४. लतावृश्चिक, ४५. छिन्न, ४६. वृश्चिकरेचित ४७. वृश्चिक, ४८. व्यसित, ४ ९. पार्श्वनिकुट्टक ५०. ललाटतिलक, ५१. क्रान्तक ५२. कुचित ५३. चक्रमण्डल, ५४. उरोमण्डल, ५५. आक्षिप्त, ५६. तलविलासित, ५७. अर्गल, ५८. विक्षिप्त, ५९. आवृत्त, ६०. दोलपादक, ६१. ॥ विवृत्त, ६२. विनिवृत्त, ६३. पार्श्वक्रान्त, ६४. निशुम्भित ६५. विद्युद्भ्रान्त, ६६. अतिक्रान्त, ण६७. विवर्तिक, ६८. गजक्रीडितक ६ ९. तलसंस्फोटित, ७०. गरुडप्लुतक, ७१. गण्डसूची, ७२. परिवृत्त, ७३. पार्श्वजानु, ७४ गृध्रावलीनक, ७५. सन्नत, ७६. सूची, ७७. अर्धसूची, ७८. सूचीविद्ध, ७९. अपक्रान्त, ८०. मयूरललित, ८१. सर्पित, ८२. दण्डपाद, ८३. हरिणप्लुत, ८४. प्रेङ्खोलित, ८५. नितम्ब, ८६. स्खलित, ८७. करिहस्त ८८. प्रसर्पित,
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चतुर्थोऽध्यायः ९७ ८९. सिंहविक्रीडित, ९०. सिंहाकर्षित, ९ १. उद्धत, ९ २. उपसृत, ९ ३. तलघिट्टक, ९४. जनित, ९५. अवहित्थक, ९ ६. निवेश, ९७. एलकाक्रीड, ९८. उद्वृत्त,, ९९. मदरुखतिलक, १००. विष्णक्रान्त, १०१. सम्भ्रान्त, १०२. विष्कभ, १०३. उद्घट्टित, १०४. वृपभक्रीडित, १०५. लोलित, १०६. नागपसर्पित, १०७. शकटास्य, १०८. गंगावतरण | करणों के प्रयोगस्थल
नृत्ते युद्धे नियुद्धे च तथा गतिपरिक्रमे ।
गतिप्रचारे वक्ष्यामि युद्धचारीविकल्पनम् ॥ ५६ ॥
नृत्य, युद्ध, मल्लयुद्ध एव' गतिशीलता के प्रसंग में [ इन करणों का प्रयोग होता है ] ॥ ५६ ॥
यत्र तत्रापि संयोज्यमाचार्यैर्नाटयशक्तितः । नाट्याचार्य नाट्यशक्ति (अभिनय कला ) के अनुसार इन करणों का स्वेच्छानुसार किसी भी स्थान पर प्रयोग कर सकते हैं ॥ ५७ ॥
सभी करणों की साधारण मुद्रा- चरणस्यानुगश्चापिप्रायेण करणे कार्यों वामोदक्षिणस्तुवक्षःस्थितःभवेत्करःकरः ॥। ५७ ॥ ि अधिकतर करण में बायाँ हाथ वक्षस्थल पर रहता है एवं दाहिना हाथ [दाहिने ] पैर के अनुसार रहता है ॥ ५७-५८ ॥ ए अंगों का संचालन- ॥ ५८ ॥ 11 हस्तपादप्रचार तु कटिपार्श्वोरुसंयुतम्
। उरःपृष्ठोदरोपेतं वक्ष्यमाण निबोधत कमर पार्श्व, जंघाओं, वक्ष, पीठ तथा उदर के संदर्भ में हाथ पैरों का संचालन किस प्रकार करना चाहिये यह जानो ॥ ५८-५९ ॥ मातृका तथा करण का लक्षण- यानि स्थानानि याचार्यो नृत्तहस्तास्तथैव च ॥ ५ ९ ॥ सा मातृकेति विज्ञेया तद्योगात्करणं भवेत् । स्थान, चारी एवं नृत्तहस्तों को ही मातृका कहते हैं । इन्हीं को मिला कर करण बनता है ॥ ५ ९ ॥ १. तद्योगता - स्थान, चारी और नृत्तहस्तों की विविधता के अनुसारे करण की विभिन्नता होती है । आचार्य अभिनवगुप्त ने करण की परिभाषा दी है- तदनुगतिस्थितिसंमिलिते करणं... ७ ना०
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९८ नाट्यशास्त्रम् सौष्ठव का लक्षण -कर्णसमा यत्र कोरांसशिरस्तथा ॥ ६० ॥
समुन्नतमुरश्च व C सौष्ठवं नाम तद्भवेत् । जहाँ कटि कर्ण की स्थिति के समान हो तथा कोहनी कंधा, सर एवं वक्षस्थल समुन्नत स्थिति में हों उसे सौष्ठव कहते हैं ॥ ६०-६१ ॥ एक सौ आठ करणों का क्रमशः वर्णन- वामे पुष्पपुटः पार्श्वे पादोऽग्रतलसञ्चरः ॥ ६१ ॥
तथा च सन्नतं पार्श्वं तलपुष्पपुटं भवेत् । ( १ ) तलपुष्पुट - तलपुष्पपुट नामक करण में हाथ ' पुष्पपुट " मुद्रा में बाईं तरफ रहता है, पैर ' अग्रतलसंचर" रहता है एवं पार्श्व भाग 'सन्नत " रहता है ॥ ६१-६२ ॥ कुञ्चितौ मणिबन्धे तु व्यावृत्तपरिवर्तितो ॥ ६२ ॥
हस्तौ निपतितौ चोर्वोर्वर्तितं करणं तु तत् । (२) वर्तित -जब हाथ व्यावृत्त एवं परिवर्तित होकर कलाई पर से मुड़े हुए हों और इसी (अवस्था में ) जंघाओं पर अवस्थित हों तो उस करण की संज्ञा 'वर्तित ' होती हैं ॥ ६२-६३ ॥
१. पुष्पपुट- यस्तु सर्पशिराः प्रोवतस्तस्यांगुलिनिरन्तरः ।
द्वितीयः पार्श्वसंश्लिष्टः स तु पुष्पापुटः करः ९. १५० ॥
अर्थात् दोनों हाथों की अंगुलियाँ इस तरह मिला ली जाए कि हाथ का आकार साँप के फन की भाँति हो जाए एवं दोनों हाथ आपस में एक तरफ से बिल्कुल सटे हो तो हाथ की इस मुद्रा को 'पुष्पपुट' कहते हैं । २. अग्रतलसञ्चरपाद - उत्क्षिप्ता तु भवेत्पाष्णिः प्रसृताऽङ्गुष्ठकस्तथा । अंगुल्यश्चाश्विताः सर्वाः पादोऽग्रतलसंचरे ॥ ९.२३५ ३. सन्नत— कटीभवेच्च व्याभुग्ना पार्श्वमाभुग्नमेव च । तथैवापसृतां च किंचित्पार्श्वं नतं स्मृतम् ॥ ९.२३५ कमर कुछ झुकी हुई हो, एक पार्श्व कुछ झुका हुआ हो एवं एक कंधा एक तरफ को कुछ खिचा हुआ सा हो तो उस अवस्था को 'सन्नत' कहते हैं । ४. अभिनवगुप्त के अनुसार वर्तित करण में दोनों हाथ स्वस्तिक की भाँति वक्षस्थल के सम्मुख रहते हैं पर कलाई के पास से आपस में जुड़े नहीं होते । इस दशा में हाथों को उलट कर मोड़ देने व उसी उत्तानावस्था में भी जंघाओं पर रखने से यह वर्तित करण सिद्ध होता है ।
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९९ १३ शुकतुण्डौ यदा हस्तौ व्यावृत्तपरिवर्तितौ ॥ ६३ ॥
ऊरू च वलितौ यस्मिन्वलितोरुकमुच्यते । (३ ) वलितोरु -जिस मुद्रा में 'शुकतुण्ड " हस्तों को उलट कर मोड़ा जाए एवं -जंधाए' 'वलित " अवस्था में हों, उसे वलितोरु कहते हैं ॥ ६२-६४ ॥ आवर्त्य शुकतुण्डाख्यमूरुपृष्ठे निपातयेत् ॥ ६४ ॥
वामहस्तश्च वक्षःस्थोऽप्यपविद्धं तु तद्भवेत् । (४ ) अपविद्ध - शुकतुण्ड मुद्रा में अवस्थित दाहिने हाथ को मोड़कर जंघा पर रखने तथा बायें हाथ के वक्षःस्थल पर अवस्थित करने की अवस्था को अपविद्ध करण कहा जाता है ॥ ६४-६५ ॥ श्लिष्टौ समनखौ पादौ करौ चापि प्रलम्बितौ ॥ ६५ ॥
देहः स्वाभाविको यत्र भवेत्समनखं तु तत् । ( ५ ) समनख - पैर 'समनख ' हों एवं एक दूसरे का स्पर्श करते हों, तथा दोनों हाथ लटकते रहें एवं शरीर सरल मुद्रा में स्थित हो तो उस करण का नाम समनख होता है ॥ ६५-६६ ॥ १. शुकतुण्ड- ' अरालस्य यदा वक्रानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् । शुकतुण्डः स तु करः ' ९ -५३ इस मुद्रा के नाम शुकतुण्ड - (तोते की चोंच ) से ही इसकी आकृति स्पष्ट हो जाती है । अरोलमुद्रा ( अनामिका को धनुषाकार बनाकर, अँगूठे को भी मोड़ कर एवं अन्य अंगुलियों को अलग रख कर बनी मुद्रा) में तर्जनी को भी मोड़ दिया जाता है । २. भवेदभ्यन्तरं जानु यत्राहुर्वलितं तु तत् । ९.२५२ ३. प्रलम्बितौ— अभिनवगुप्त के अनुसार इससे नीचे झूलते हुए हस्तों का बोध न होकर पार्श्वसंस्थित, तिर्यक्प्रसारित लता के समान फैले लताहस्तों का बोध -होता है । 'प्रलम्बिती कराविति लताहस्तौ मन्तव्यो । न तु दोलाहस्तो. किन्तु डा० घोष ने इसे नीचे लटकते हाथों का बोधक माना है ४. समनख -डा० घोष के अनुसार यह शब्द नाट्यशास्त्र में अन्यत्र अप्राप्य है । 'किन्तु वह इसका अर्थ नहीं बताते । अभिनवगुप्त भी इस सम्बन्ध में मौन हैं । समनख शब्द का अभिधेयार्थ है 'एक जैसे नाखून वाले' । पैरों के संदर्भ में इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि दोनों पैर एक जैसी अवस्था में हों, दोनों में से एक भी मुड़ा या तिरछा न हो जिससे दोनों पैरों के नख एक समान दशा में रहें ।