भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 171–180
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 171–180
पृष्ठ 171
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०० नाट्यशास्त्रम् ६३ पताकाञ्जलि वक्षःस्थं प्रसारितशिरोधरम् ॥ ६६ ॥
निहञ्चितांसकूटी च तल्लीनं करणं स्मृतम् । ( ६ ) लीन- 'पताका" हाथों को जोड़कर अज्ञ्जलि मुद्रा में वक्ष पर रख लिया
जाए; ग्रीवा को संकुचित न करें और पुट्ठे को झुका देने से जो स्थिति होती है।
उसकी संज्ञा 'लीन ' नामक करण है ॥ ६६-६७ ॥
स्वस्तिको रेचिताविद्धो विश्लिष्टौ कटिसंश्रितो ॥ ६७ ॥
यत्र तत्करणं ज्ञेय बुधैः स्वस्तिकरेचितम् । ( ७ ) स्वस्तिक रेचितम् --जब रेचित' एवं आविद्ध अवस्था' से हाथों को स्वस्तिक* मुद्रा में संयोजित किया जाए और फिर उन्हें अलग करके कमर पर रख लिया, जाए तो उस करण को सुविज्ञजन ' स्वस्तिकरेचित ' मानते हैं ॥ ६७-६८ ॥ १. पताका —— ‘ पताकाभ्यां तु हस्ताभ्यां संश्लेषादञ्जलिः स्मृतः । ९-१२८ दो पताका हाथों को मिलाने से अञ्जली की मुद्रा बनती है एवं पताका की परिभाषा है- प्रसारितसमाः सर्वा यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि । कुचितश्च तथाङ्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः । ९ -१८ अर्थात् पताका में अंगुलियाँ हथेली से बाहर की ओर फैली रहती हैं पर एक दूसरे से सटी रहती है एवं अंगूठा मुड़ा रहता है ।15 THE BE मीशा378 २. रेचित-- रेचितावपि विज्ञेयो हंसपक्षी द्रतभ्रमौ । ९ -१ ९ ३ हंसपक्ष उस हस्तमुद्रा का नाम है जिसमें तीन अंगुलियां फैली रहती है; कनिष्ठिका उठी रहती है एवं अंगूठा झुका रहता है—
समाः प्रसारितास्तिस्रः तथा चोर्ध्वा कनीयसी ।
अंगुष्ठः कुश्चितश्चैव हंसपक्ष इति स्मृतः ॥ ९ १०६
३. आविद्ध— भुजांसकूर्पराग्रैस्तु कुटिलावर्तितौ करौ । पराङ्मुखतलाविद्धौ ज्ञेया वाविधवक्रकौ ॥ ९ -१ ९ ० अर्थात् विरोधी दिशा के कंधे, कोहनी, हाथ एवं हथेलियों का स्पर्श करके कुटिल गति से दोनों हाथों का पीछे की ओर मुड़ जाना आविद्धवक्रता है । ४. स्वस्तिक मणिबन्धनविन्यस्तावराली स्त्रीप्रयोजितो । उतानी वामपार्श्वस्थी स्वस्तिकः परिकीर्तितः ॥ ९ -१३५ दो अराल हस्तों को ऊर्ध्वमुख करके कलाई से जुड़ा रखने पर स्वस्तिक मुद्रा बनती है । एव
पृष्ठ 172
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०१ स्वस्तिको तु करौ कृत्वा प्राङ्मुखोर्ध्वतलौ समौ ॥। ६८ ॥ तथा च मण्डलं स्थानं मण्डलस्वस्तिकं तु तत् । (८ ) मण्डलस्वस्तिक- हाथों की मुद्रा स्वस्तिक बनाकर उनकी हथेलियाँ एक ही समान ऊपर की ओर रखी जाए एवं देह को मण्डल स्थान में रखा जाए तो उसे मण्डलस्वस्तिक कहते हैं ॥ ६८-६९ ॥ निकुट्टितौ यदा हस्तौ स्वबाहुशिरसोऽन्तरे ॥ ६ ९ ॥ पादौ निकुट्टिती चैव ज्ञेयं तत्त निकुट्टकम् । ( ९ ) निकुट्टन -अपनी ( दूसरी ) बाँह और सिर के बीच में हाथ निकुट्टित' किया जाए और पैर भी' निकुट्टित हो तो उसे निकुट्टक कहते हैं ॥ ६ ९ -७० ॥ अञ्चितौ बाहुशिरसि हस्तस्त्वभिमुखाङ्गुलिः ॥ ७० ॥
( १० ) अर्धनिकुट्ट निकुञ्चितार्धयोगेन- बाहुए 'अंचित" हों एवंभवेदर्धनिकुट्टकम्हाथ की अंगुलियाँ । सामने की ओर तावेव मणिबन्धान्ते स्वस्तिकाकृतिसंस्थितौ । स्वस्तिकाविति विज्ञेयो विच्युतौ विप्रकीर्णको ॥ ९-१८७ तलमुख हाथ कलाई पर एक दूसरे को क्रास करे तो स्वस्तिक होता है और दोनों हाथ जुड़े न हों तो उसकी संज्ञा विप्रकीर्ण होती है । १. निकुट्टन – "उन्नमनं विनमनं स्यादङ्गस्य निकुट्टनम् । ” निकुट्टन की कोहल कृत यह परिभाषा अभिनवगुप्त ने उधृत की है । इसी आधार पर प्रो० घोष ने भी निकुट्टन का अर्थ ऊपर नीचे घुमाना किया है । २. एव अभिनवगुप्त के मत में एक पद द्वारा यह प्रकट किया गया है कि समय बायाँ पैर दक्षिण हस्त का प्रयोग करने पर दक्षिण एवं बायें हाथ के प्रयोग के क्रियाशील होगा । ३. अञ्चित – अभिनवगुप्त ने यहाँ ' अंचित' के स्थान पर 'कुञ्चित' पाठ मान्य समझा है । इसका अर्थ उन्होंने 'अलपल्लव' मुद्रा किया है । मुद्रा अलपल्लव की परिभाषा भरतमुनि ने इस प्रकार की है- आवर्तिन्यः करतले यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि । पार्श्वगास्ता विकीर्णाश्च स हस्तस्त्वलपल्लवः ॥ ९ - ९ १ ॥ ि अर्थात् इस मुद्रा में अंगुलियाँ हथेली की ओर मुड़ी होती हैं एवं एक दूसरे से अलग- अलग रहती है । अभिनवगुप्त ने 'अंचित' पद की शंकुक-कृत व्याख्या भी उद्धृत की है जिसके अनुसार- शंकुकादिभिस्त्वंचनं देहाभिमुख्येन पृष्ठभागेन मनागलक्षणमिति व्याख्यायितं नाम्ना न संगतमित्यास्ताम् ।
पृष्ठ 173
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०२ नाट्यशास्त्रम् हों तथा पैर ऊपर नीचे गतिशील ( निकुवित ) हों तो अर्धनिकुट्ट नामक करण की सिद्धि होती है ॥ ७०-७१ ॥ पर्यायशः कटिरिछन्नाः बाह्वोः शिरसि पल्लवौ ॥ ७१ ॥
पुनः पुनश्च करणं कटिच्छिन्न तु तद्भवेत् । पल्लव ('११हाथ) कटिच्छिन्नबारी -बारी–सेकटिप्रदेशसिर परक्रमशःस्थितछिन्न मुद्रातो उसमें अवस्थितकरण कोहो कटिच्छिन्नऔर दोनों कहते हैं ॥ ७१-७२ ॥ ॥ ० अपविद्धकरः सूच्या पादचं व निकुट्टितः ॥ ७२ ॥
सन्नतं यत्र पार्श्वं च तद्भवेदर्धरेचितम् । ( १२ ) अर्धरेचित - सूचींमुख मुद्रा में हाथ बँधे हों, बारी बारी से ( दोनों ) पैर ऊपर नीचे गतिशील हों तथा पार्श्व भाग सन्नत हों तो वह अर्धरेचित करण होता है ॥ ७२-७३ ॥ स्वस्तिकौ चरणौ यत्र करौ वक्षसि रेचितौ ॥ ७३ ॥
निकुञ्चितं तथा वक्षो वक्षस्स्वस्तिकमेव तत् । १. छिन्न —कटिमध्यस्य वलनाच्छिन्ना । ९-२४५ कटि को मध्य भाग से मोड़ना छिन्न नामक मुद्रा कही जाती है । २. पल्लवौ – मणिबन्धनमुक्तौ तु पताकी पल्लवी स्मृतौ ॥ ९-१ ९ ६ अर्थात् पताका मुद्रा में स्थित दोनों हाथ यदि कलाई पर जुड़े हों तो उसे पल्लव मुद्रा कहते हैं । ३. सूचीमुख- हस्तौ तु सर्पशिरसौ मध्यमाङ्गुष्ठको यदा । तिर्यक्प्रसारितास्यौ च तदा सूचीमुखौ स्मृतौ ॥ ९-१ ९ १ अर्थात् साँप के फन के आकार में स्थित दोनों हाथ की मध्यमा अंगुलियों को अंगूठे छूते रहें एवं दोनों हाथ तिरछे फैले हों तो हाथों की वह मुद्रा सूचीमुख कहलाती है । ४. अपविद्धः करः - (एक ही मुद्रा में जड़ न होकर हाथ गति करता रहे । ) यहाँ अभिनवगुप्त की व्याख्या इस प्रकार है- 'सूचीमुखेन हस्तेनापगमपूर्वकं विद्धो निकटयोजितः ' अर्थात् वह अपविद्ध से सूचीमुख मुद्रा का तात्पर्य लेते हैं । श्री घोष क भी यही कथन है । लाल
पृष्ठ 174
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः १०३ ( १३ ) वक्षःस्वस्तिक ——इस करण में पैर स्वस्तिक मुद्रा में होते हैं तथा दोनों हाथ रेचित अवस्था में वक्ष पर होते हैं एवं वक्ष झुका हुआ (निकुञ्चित) होता है ॥ ७३-७४ ॥ अञ्चितेन तु पादेन रेचितौ तु करौ यदा ॥ ७४ ॥
उन्मत्त' करणं तत्तु विज्ञेयं नृत्तकोविदैः । ( १४) उन्मत्त –जब पैर अंचित' होते हैं एवं हाथ रेचित तब उसे सुधीजन उन्मत्त नामक करण कहते हैं ॥ ७४-७५ ॥ भवतः स्वस्तिकौ यदा ॥ ७५ ॥ हस्ताभ्यामथ पादाभ्यां
तत्स्वस्तिकमिति प्रोक्तं करणं करणार्थिभिः । करने वाले लोग उस करण को स्वस्तिक ( १५ ) स्वस्तिक —करणों का प्रयोग दोनों पैरों से स्वस्तिक मुद्रायें बनती करण कहते हैं जिसमें दोनों हाथों एवं हों ॥ ७५-७६ ॥ स्वस्तिकौ चरणौ यदा ॥ ७६ ॥ विक्षिप्ताक्षिप्तबाहुभ्यां
तत्पृष्ठस्वस्तिकं भवेत् । अपक्रान्तार्धसूचिभ्यां ( १६ ) पृष्ठस्वस्तिक — ऊपर नीचे गतिशील होकर दोनों बाहें स्वस्तिक मुद्रा में स्थित हों जाएं तथा दोनों पैरों से भी अपक्रान्त' एवं अर्धसूचित चारी द्वारा स्वस्तिक बनता हो तो उसे पृष्ठस्वस्तिक करण कहा जाता है ॥ ७६-७७ ॥ १. जिस प्रकार हाथों को एक दूसरे पर क्रास करके स्वस्तिक मुद्रा बनाई जाती है, उसी प्रकार पैरों से भी स्वस्तिक बनाया जाता है । इस विषय में अभिनवभारती द्रष्टव्य है— 'पादावन्योन्यं जङ्घानुगुल्फवलनेन स्वस्तिको कार्यों ।'
२. पाणिर्यत्र स्थिता भूमावूर्ध्व मग्रतलं तथा ।
अंगुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः पादोऽञ्चित उच्यते ॥ ९- २७५-२७६ ॥
३ अपक्रान्त — ऊरुभ्यां वलनं कृत्वा कुञ्चितं पादमुद्धरेत् । पार्श्वे विनिक्षिपेच्चैनमपक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ १०-३१ दोनों जाँघों की वलन मुद्रा होती है । एक कुञ्चित पद ऊपर उठाकर पार्श्व- भाग में फैला दिया जाता है ४. अर्ध सूची—कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्व सम्प्रसारयेत् । पातयेच्चाप्रयोगेन सा सूची परिकीर्तिता ॥ १०-३४ अर्थात् एक कुचित पैर को उपर उठा कर दूसरे पैर के घुटने के ऊपर ले जाया जाता है और फिर उसे सामने के भाग पर गिरा दिया जाता है । अभिनवगुप्त के मत में पृष्ठस्वस्तिक की परिभाषा इस प्रकार है--
पृष्ठ 175
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
III नाट्यशास्त्रम् पार्श्वयोरतश्चैव यत्र श्लिष्टः करो भवेत् ॥ ७७ ॥
स्वस्तिको हस्तपादाभ्यां तद्दिक्स्वस्तिकमुच्यते । ( १७ ) दिक्स्वस्तिक — एक ही साथ पार्श्व एवं अग्र दिशा की ओर झुकते हुए -हाथों और पैरों से स्वस्तिक मुद्रा बनाने को दिक्स्वस्तिक करण कहते हैं ॥ ७७-७८॥ अलातं चरणं कृत्वा व्यंसयेद्दक्षिणं करम् ॥ ७८ ॥
ऊर्ध्वजानुक्रमं कुर्यादलातकमिति स्मृतम् । ( १८ ) अलात -अलात चारी नामक (चरण' मुद्रा ) निष्पन्न करते हुए हाथों को कंधे से नीचे करके ऊर्ध्वजानु चारी ( क्रम ) के सम्पादन की संज्ञा अलात है ॥ ७८-७९ ॥ स्वस्तिकापसृतः पादः करो नाभिकटिस्थितौ ॥ ७ ९ ॥ पार्श्वनुद्वाहितं चैव करणं तत्कटीसमम् । ( १ ९ ) कटीसम - स्वस्तिक करण के सम्पादन के पश्चात् पैरों को अलग कर लिया जाए, एक हाथ नाभि पर व दूसरा कटि पर स्थित हो, तथा पार्श्व भाग 'उद्वाहित' मुद्रा में हो तो वह करण कटीसम संज्ञक होता है ॥ ७९ -८० ॥ 'उद्वेष्टितक्रियया बाहुद्वयविक्षेप-समकालमपक्रान्ता चारी । तया अपवेष्टित- करणसमकालं द्वितीयेन पादेन सूचीं विधाय स्वस्तिकं पादाभ्यां तथा हस्ताभ्यां कुर्यादिति । पृष्ठे पाश्चात्ये समे यत्स्वस्तिकं तथा दक्षिण-पृष्ठे वामपादेन स्वस्तिकं त्रिकवलनया च पराङ्मुखीभूय स्वस्तिकमिति पृष्ठस्वस्तिकम् । ' १. अलातचरण — चरण का अर्थ यहाँ चारी है । श्री घोष का भी यही मत है । अभिनवगुप्त का भी निर्देश है ".... अलातां चारी प्रयुञ्जानो..." अलातचारी की परिभाषा नाट्यशास्त्र के अनुसार निम्नलिखित है । पृष्ठे प्रसारितः पादो वलितेनान्तरीकृतः । पाणिप्रपतिता चैवमलाता सा प्रकीर्तिता । १०-४१ पैर को पहले पीछे की ओर ले जाकर घुमाकर फिर अपनी जगह पर इस तरह लाना कि वह एड़ी पर स्थित हो जाए, उसे अलात चारी कहते हैं । २. ऊर्ध्वजानुचारी – कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानुस्तनसम न्यसेत् । द्वितीयं च क्रमं तूर्ध्वमूर्द्धजानुः प्रकीर्तिता । १०-३३ अर्थात् कुञ्चित पैर को उठाकर घुटने को वक्ष के बराबर ले आए व दूसरा पैर स्थिर रहे । फिर दूसरे पैर को पहले की भाँति ऊपर लाए व पहला स्थिर रहे । ३. उद्वाहित— “ उद्वाहितं तूर्ध्वगतमुरो ज्ञेयम् । ९ -२३१ "तत्पार्श्वमप्युद्वाहितम् । " (अभि० भा० पृ ० १०६ )
पृष्ठ 176
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः १०५ हस्तो हृदि भवेद्वामः सव्यश्चाक्षिप्तरेचितः ॥ ८० ॥" रेचितश्चापविद्धश्च तत्स्यादाक्षिप्तरेचितम् । (२० ) आक्षिप्तरेचितम्— बायाँ हाथ हृदय पर हो, दाहिना हाथ रेचित होकर
(ऊपर एवं पार्श्व भाग में ) स्थित हो और फिर दोनों हाथ अपविद्ध मुद्रा में रेचित हों तो वह आक्षिप्रेचित संज्ञक करण होता है ॥ ८०-८१ ॥ विक्षिप्तं हस्तपादं च तस्यैवाक्षेपणं पुनः ॥ ८१ ॥
यत्र तत्करणं ज्ञेयं विक्षिप्ताक्षिप्तकं द्विजाः । (२१ ) विक्षिप्ताक्षिप्तक — जिस करण में हाथ एवं पैर पहले ऊपर एवं फिर नीचे आक्षिप्त किए जाए उसे विद्वान् विक्षिप्ताक्षिप्तक जानते हैं ॥ ८१-८२ ॥ स्वस्तिकौ चरणौ कृत्वा करिहस्तं च दक्षिणम् ॥ ८२ ॥
तथा वाममर्धस्वस्तिकमादिशेत् । (२२ ) अर्धस्वस्तिक - दोनों पैरों से स्वस्तिक बनाए, दाहिने हाथ से करि- हस्तमुद्रा' बनाए, और बायाँ हाथ हृदय पर स्थिर करे तो उसे अर्धस्वस्तिक करण कहते हैं ॥ ८२-८३ ॥। व्यावृत्तपरिवृत्तस्तु स एव तु करो यदा ॥ ८३ ॥
अञ्चितो नासिकाग्रे तु तदञ्चितमुदाहृतम् । (२३ ) अञ्चित -अर्धस्वस्तिक करण में करिहस्त को व्यावृत्त एवं परिवृत्त करके नासिका के अग्रभाग पर रखना अश्चित करण कहलाता है ॥ ८३-८४ ॥ कुञ्चितंकटिजानुविवर्ताच्चपादमुत्क्षिप्यभुजङ्गत्रासितंP त्र्यश्रमूरु विवर्तयेत्भवेत् ॥। ८४ ॥ ( २४ ) भुजंगत्रासित – कुश्चित पद को ऊपर आक्षिप्त करे और जंघाओं से तिर्यक् निवर्तन गति करें तथा कटि एवं जंघाओं को भी इसी भाँति गतिशील करे तो भुजंगत्रासित करण कहा जाता है ॥ ८४-८५ ॥ कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानुस्तनसमं न्यसेत् ॥ ८५ ॥
प्रयोगवशगौ हस्तावूर्ध्वजानु प्रकीर्तितम् ।
१. करिहस्त -समुन्नतो लताहस्तः पारवत्पार्श्व तु दोलितः ।
त्रिपताकोs परः कर्णे करिहस्तः प्रकीर्तितः ॥ ९-१ ९९ ॥
लता मुद्रा में स्थित एक हाथ ( तिर्यक् प्रसारित एवं पार्श्वसंस्थित हस्त) को ऊपर उठाकर इधर उधर झुलाने एवं त्रिपताका मुद्रा में दूसरे हस्त को कान पर रखने को करिहस्त कहते हैं ।
पृष्ठ 177
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०६ नाट्यशास्त्रम् ( २५ ) ऊर्ध्वजानु — एक कुञ्चित' पैर को ऊपर ( इस प्रकार ) उठाया जाए कि घुटना वक्षःस्थल के स्तर तक आ जाए । दोनों हाथ (नृत्य की) स्थिति के अनुकूल रहें तो यह ऊर्ध्वजानु करण कहलाएगा ॥ ८५-८६ ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा करं पार्श्वे निकुञ्चयेत् ॥ ८६ ॥
नासाग्रे दक्षिणं चैव ज्ञेयं तत्तु निकुञ्चितम् । ( २६ ) निकुञ्चित- वृश्चिक नामक करण में की जाने वाली पैर की स्थिति हो', दोनों हाथ पार्श्व में झुके हो और दाहिना हाथ नासिका के अग्रभाग पर रखा हो तो उस करण की निकुचित संज्ञा होती है ॥ ८६-८७ ॥ वामदक्षिणपादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणैः ॥ ८७ ॥ उद्वेष्टितापविद्धैश्च हस्तैर्मत्तल्ल्युदाहृतम् । ( २७ ) मत्तल्लि दाहिने एवं बायें दोनों पैरों से चक्कर काटते हुए गोलाकार
घूमना और हाथों को उद्वेष्टित एवं अपविद्ध अवस्थाओं में गतिशील करना मत्तल्लि करण कहा जाता है ॥ ८७-८८ ॥ स्खलितापसृतौ पादौ वामहस्तश्च रेचितः ॥ ८८ ॥
सव्यहस्तः कटिस्थः स्यादर्धमत्तल्लि तत्स्मृतम् । ( २८) अर्धमत्तल्लि - स्खलित मुद्रा में स्थित पैर फैला दिए जाँए, बायाँ हाथ रेचित हो, और फिर कटि पर रख लिया जाए तो उसे अर्धमत्तत्लि करण का नाम दिया जाता है ॥ ८८-८९ ॥ रेचितो दक्षिणो हस्तः पादः सव्यो निकुट्टितः ॥ ८ ९ ॥ । दोला चैव भवेद्वामस्तद्रेचितनिकुट्टित
१. कुञ्चित— “ उत्क्षिप्ता यस्य पार्ष्णिः स्यादङ्गुल्यः कुञ्चितास्तथा ।
तथा कुञ्चितमध्यश्च स पादः परिकुञ्चितः ॥ ९-२७७ ॥
.... ” ( ) २. वृश्चिकं चरणं- पादः पृष्ठाञ्चितस्तथा ४-१०८ के अनुसार वृश्चिक करण में पैर पीछे की ओर मुड़ा रहता है । ३. हाथों की स्थिति के विषय में अभिनवगुप्त का विचार है कि एक हाथ सिर के पीछे व दूसरा वक्ष की ओर रहता है......' एक च हस्तं शिरः पार्श्व- क्षेत्रेऽरालं, द्वितीयं च नासाग्रक्षेत्रानुसारि वक्षस्यरालमेव कुर्यात् । हाथों की दूसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि एक पताका मुद्रा में हो एवं दूसरा सूची में – “( नासाग्रे एकः पताकः अन्यश्च सूच्यास्य इति । ) " ४. उद्वेष्टित एवं अपविद्ध अवस्थाएं पूर्व व्याख्यात हैं ।
पृष्ठ 178
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः १०७ (२ ९ ) रेचितनिकुट्टित -दाहिनाहाथ रेचित हो दाहिना पैर उद्घट्टित' हो और बायाँ हाथ दोला मुद्रा में हो तो वह रेचितनिकुट्टित करण होता है ॥ ८ ९-९ ० ॥ कायसूचीविद्वावपक्रान्तौनाभितटे हस्तौ पादीप्राङ मुखौपादापविद्धकेखटकामुखी ॥। ९ ० ॥ ( ३० ) पादापविद्धक - पादापविद्धक करण में दोनों हाथ कटकामुख अवस्था में होते हैं पर उनका पृष्ठ भाग नाभि की ओर होता है, पैर सूचीविद्ध एवं अपक्रान्त'- चारी में होते हैं ॥ ९ १- ९ २ ॥ भवेद्धस्तः सूचीपादस्तथैव च ॥ ९ १ ॥ तथा त्रिकं विवृत्त च वलितं नाम तद्भवेत् । ( ३१ ) वलित- जब हाथ अपविद्ध हो पैर सूची चारी में हो तथा १. भरत ने नाट्यशास्त्र में सर्वत्र सव्य का प्रयोग दाए के पर्याय के रूप में किया है अर्थात् सामान्यतः सव्य वाए को कहते हैं । २. उद्घट्टित - अभिनवगुप्त के अनुसार उद्घट्टित का अर्थ निकुट्टित होता है - " (...... निकुट्टित इत्युद्घट्टितक्रियया) । “स्थित्वा पादतलाग्रेण पाणिभूमौ निपात्यते ।" यस्य पादस्य करणे भवेदुद्घट्टितस्तु सः ॥ ९-२६७ ॥ निकुट्टन का अर्थ ४ ७० में स्पष्ट किया जा चुका है कि उन्नमन एवं विनमन की क्रिया को ही निकुट्टन कहा जाता है । ३. दोला - अंसौ प्रशिथिलो मुक्तौ पताकौ तु प्रलम्बितौ । यदा भवेतां करणे स दोल इति संज्ञितः ॥ ९-१४८ ॥ कही अर्थात् दोनों कंधे शिथिल हों और पताका मुद्रा में दोनों हाथ लटके हों तो वह दोला हस्त कहलाता है । यहाँ दोला शब्द को स्त्रीलिंग में प्रयुक्त करके हाथ का हिलाना सूचित किया गया है, जिससे आने -जाने का बोध कराया जाता है जैसा कि अभिनवगुप्ताचार्य की व्याख्या से स्पष्ट है- 'स्त्रीलिंगयोगेन दोलाहस्तस्य प्रेङ्खोलितं यद्वर्तनया गमनागमने सूचयति । "
१. सूचीविद्धौ पादौ- 'उत्क्षिप्ता तु भवेत्पाणिरङ्गुष्ठाग्रेण संस्थितः ।
वामश्चैव स्वभावस्थः सूचीपादः प्रकीर्तितः ॥ ९-२७ ९ ॥
२. अपक्रान्त- "ऊरुभ्यां वलनं कृत्वा" ( १०-३१ )
पृष्ठ 179
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०८ नाट्यशास्त्रम् त्रिक का परिवर्तन हो जाए तो उसे वलित करण कहते हैं ॥ ९ १ - ९ २ ॥ वतिताघूर्णितः सव्यो हस्तो वामश्च दोलितः ॥ ९ २ ॥ स्वस्तिकापसृतः पादः करणं घूर्णितं तु तत् । ( ३२ ) घूर्णित - दायाँ हाथ बलित मुद्रा में घूमे, और बायाँ दोला मुद्रा में हो, तथा स्वस्तिक करण में स्थित दोनों पैर एक दूसरे से अलग कर दिए जायँ तो उसे घूर्णित करण कहा जाता है ॥ ९ २- ९ ३ ॥ करिहस्तो भवेद्वामो दक्षिणश्च विवर्तितः ॥ ९ ३ ॥ बहुशः कुट्टितः पादो ज्ञेयं तल्ललितं बुधैः । ( ३३ ) ललित - बायाँ हाथ करिहस्त मुद्रा में हो, दाहिना हाथ अपरिवर्तित' हो, तथा दोनों पैर बारम्बार ऊपर नीचे गतिमय रहें तो विद्वानों ने उस करण की संज्ञा ललित मानी है ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ ऊर्ध्वजानुं विधायाथ तस्योपरि लतां न्यसेत् ॥ ९४ ॥
दण्डपक्षं तु तत्प्रोक्तं करणं नृत्तवेदिभिः (३४ ) दण्डपक्ष - ऊर्ध्वजानु चारी का प्रयोग करते हुए लता हस्तों को घुटनों पर रखने को नृत्त के ज्ञाता जन दण्डपक्ष करण कहते हैं ॥ ९ ४-९ ५ ॥ भुजङ्गत्रासितं कृत्वा यत्रोभावपि रेचितौ ॥ ९ ५ ॥ वामपार्श्वस्थितौ हस्तौ भुजङ्गत्रस्तरेचितम् । १. त्रिकं विवृत्तं - त्रिक के परिवर्तन ( बलन ) के कारण ही इस करण की •संज्ञा ' वलित' है- त्रिक भ्रमरिका चारी का पर्याय है । भ्रमरी चारी में अतिक्रान्त पैर ऊपर की ओर आक्षिप्त किया जाता है एवं सम्पूर्ण शरीर गोलाकार घुमाया जाता है ।
यथा--क अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा त्रिकं तु परिवर्तयेत् ।
द्वितीयपादभ्रमणात्तलेन भ्रमरी स्मृता ॥ १०-४५ ॥
२. करिहस्त — समुन्नतो लताहस्तः पार्श्वत्पार्श्व विलोलितः ।
त्रिपताकोsपरः कर्णे करिहस्तः प्रकीर्तितः ॥ ९-१ ९९ ॥
(लता हस्त को ऊपर उठाकर इधर से उधर हिलाना एवं त्रिपताका मुद्रा में स्थित दूसरे हाथ को कान पर रखना करिहस्त कहलाता है ) ३. अपवर्तित - अभिनवगुप्त ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है— " " P दक्षिणं विविद्धं कृत्वा बहुशो वर्तितः ।
पृष्ठ 180
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः १० ९ ( ३५ ) भुजंगत्रस्तरेचित — भुजंगत्रस्तचारी में पैर स्थित हो, दोनों हाथ रेचित होकर बायें पार्श्व की ओर मुड़ जाएं तो उस करण को भुजंगत्रस्तरेचित कहते हैं ॥ ९ ५- ९ ६ ॥ त्रिकं सुवलितं कृत्वा लतारेचितकौ करौ ॥ ९ ६ ॥ नूपुरश्च तथा पादः करणे नूपुरे न्यसेत् । ( ३६ ) नूपुर — त्रिक' को ( भ्रमरी चारी में ) घुमाया जाए तथा एक हाथ लता व दूसरा रेचित मुद्रा में हो तथा पैर नुपुर पाद चारी' में हो तो उसे नूपुर करण कहते हैं ॥ ९ ६ - ९७ ॥ रेचितो हस्तपादौ च कटी ग्रीवा च रेचिता ॥ ९ ७ ॥ वैशाखस्थानकेनैतद्भवेद्वैशाखरेचितम् ( ३७ ) वैशाखरेचित- हाथ एवं पैर रेचित हों, कटि एवं गर्दन भी रेचित हो तथा सम्पूर्ण शरीर वैशाख मुद्रा में हो तो उसे वैशाखरेचित संज्ञक करण कहा जाता है ॥ ९७-९ ८ ॥ आक्षिप्तः स्वस्तिकः पादः करौ चोद्वेष्टितौं तथा ॥ ९८ ॥
त्रिकस्य वलनाच्चैव ज्ञेयं भ्रमरक तु तत् । ( ३८ ) भ्रमरक — आक्षिप्त चारों में स्वस्तिक पद हों, हाथों की गति उद्वेष्टित हो, तथा ( भ्रमरी चारी ) में त्रिक ' धूमे तो उसे भ्रमरक करण कहते हैं ॥ ९८- ९९ ॥ १. त्रिक - त्रिक के द्वारा रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले भाग की ओर संकेत । डा० घोष की भी यही मान्यता है । २. अभिनवगुप्त के मत में जिस तरफ के पैर से नूपुरपाद चारी का विधान किया जाए उसी ओर के हाथ से रेचित मुद्रा करनी चाहिए एवं दूसरे हाथ से लतामुद्रा करनी चाहिए-"... नूपुरपादिकां चारों येन पादेन करोति तद्द्द्दिक्केनैव (रेचितम् । द्वितीयो लताहस्तः ) ।” ३. नूपुर पादचारी - पृष्ठतोऽभ्यश्वितं कृत्वां पादमग्रतलेन तु । हाल द्रुतं निपातयेत् भूमी चारी नूपुरपादिका ॥ १०-३५ ॥ ४. आक्षिप्त: - आक्षिप्त चारी की परिभाषा भरतमुनि के अनुसार निन्न- लिखित है-- "कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य व्याक्षिप्य त्वश्वितं न्यसेत् । जङ्घास्वस्तिकसंयुक्तमाक्षिप्ता नाम सा स्मृता ॥ " १०-३७