भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 191–200

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 191–200

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१२० नाट्यशास्त्रम् सूचीपादो नतं पार्श्वमेको वक्षःस्थितः करः ॥ १३१ ॥

द्वितीयश्चावितो गण्डे गण्डसूची तदुच्यते । (७१ ) गण्डसूची- पैर की अवस्था सूची' हो, पार्श्व भाग उन्नत हो, एक हाथ वक्षःस्थल पर रखा हो, तथा दूसरे हाथ को अंचित मुद्रा में गाल पर रखा जाए' तो उसे 'गण्डसूची' करण कहा जाता है ॥ १३१-१३२ ॥ ऊर्ध्वापवेष्टितौ हस्तो सूचीपादो विवर्तितः ॥ १३२ ॥

परिवृत्तत्रिकं चैव परिवृत्तं तदुच्यते । (७२) परिवृत्त - अपवेष्टित मुद्रा में अवस्थित दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाकर रखा जाय एवं सूचीपाद को दूसरे पर वर्तित किया जाय तथा त्रिक को ( भ्रमरी चारी में ) परिवर्तित किया जाए तो उस करण का नाम 'परिवृत्त ' कहा जाता है ॥ १३२-१३३ ॥ एकः समस्थितः पाद ऊरुपृष्ठे स्थितोऽपरः ॥ १३३ ॥

मुष्टिहस्तश्च वक्षःस्थः पार्श्व जानु तदुच्यते । (७३ ) पार्श्वजानु--एक पैर सम अवस्था में हो और दूसरा जांघों के पिछली

१. सूचीपाद- उत्क्षिप्ता तु भवेत्पाणिरङ्गुष्ठाग्रेण संस्थितः ।

वामश्चैव स्वभावस्थः सूचीपादः प्रकीर्तितः ॥

( ९-२७ ९ उ० २८० पू० ) २. द्वितीयश्चाञ्चितो गण्डे - अभिनवगुप्त के विचार में गाल पर रखा जाने वाला यह हाथ अलपल्लव मुद्रा में होता है । ( अञ्चितोऽलपल्लवो गण्डक्षेत्रे ) । किन्तु गण्डसूची के करण के चित्र में दूसरा हाथ गाल पर नहीं है, नाभि के पास है । अभिनवगुप्त इस करण में कई मतभेदों का वर्णन करते हैं-- ( १ ) कुछ आचार्य सूचीपाद को गण्डदेश के समीप ले जाना बतलाते हैं । ( २ ) आचार्य सूचीमुख नामक नृत्त हस्त को गण्डप्रदेश में अश्चित मुद्रा में रखना और फिर क्रियाशील करना बतलाते हैं । ( ३ ) कुछ आचार्य सूचीमुख नामक वृत्त हस्त को गण्डस्थल के प्रधान भूषण के अभिनय का प्रदर्शन करने के लिए इस करण की उपयोगिता मानते हैं । ३. सूचीपादो विवर्तितः - अभिनवगुप्त के अनुसार सूचीपाद के विवर्तन का आश्रय बद्धाचारी ( १०-२१ ) है जिसके अनुसार जंधा के स्वस्तिक में होने पर उनकी पाश्र्ववर्ती गति से है ।

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चतुर्थोऽध्यायः १२१ तरफ मुड़ा हुआ हो तथा मुष्टि-हस्त वक्षःस्थल पर स्थित हो तो उसे 'पार्श्वजानु ' करण कहते हैं ॥ १३३-१३४ ॥ पृष्ठप्रसारितः पादः किञ्चिदञ्चित जानुकः ॥ १३४ ॥

यत्र प्रसारितौ बाहू तत्स्यात् गृध्रावलीनकम् । (७४ ) गृध्रावलीनक - एक पैर पीछे की ओर प्रसारित किया जाए, एक घुटना कुछ झुका हुआ हो तथा दोनों वाहें फैली हुई हो तो उसे 'गृध्रावलीनक ' करण कहा जाता है ॥ १३४· १३५ ॥ उत्प्लुत्य चरणौ कार्यावग्रतः स्वस्तिकस्थितौ ॥ १३५ ॥

सन्नतौ च तथा हस्तौ सन्नतं तदुदाहृतम् । (७५ ) सन्नत - उछलकर दोनों पैरों को सामने की ओर स्वस्तिक मुद्रा में रखा जाए तथा दोनों हाथ सन्नत' अवस्था में हो तो उसे 'सन्नत ' करण का नाम दिया जाता है ॥ १३५-१३६ ॥ कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य कुर्यादग्रस्थितं भुवि ॥ १३६ ॥

प्रयोगवशगौ हस्तौ सा सूची परिकीर्तिता । ( ७६ ) सूची- ' सूची' नामक करण में कुंचित चरण को उठाकर भूमि पर अग्रभाग ( पंजों ) के सहारे रखना चाहिए एवं दोनों हाथों की गति के अनुकूल रहने चाहिए ॥ १३६-१३७ ॥ अलपद्मः शिरोहस्तः सूचीपादश्च दक्षिणः ॥ १३७ ॥

यत्र तत्करणं ज्ञेयमर्धसूचीति नामतः । ( ७७ ) अर्धसूची -जब अलपद्म हस्त' सिर पर रखा हो और दाहिना पैर सूची चारी में हो तो उस करण का नाम 'अर्धसूची' जानना चाहिए ॥१३७-१३८ ॥ पादसूच्या यदा पादो द्वितीयस्तु प्रविध्यते ॥ १३८ ॥

कटिवक्षःस्थितौ हस्तौ सूचींविद्धं तदुच्यते । (७८ ) सूचीविद्ध'-*-जब सूची चारी में स्थित एक चरण दूसरे चरण से लगा १. सन्नतौ - हाथों द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली सन्नत मुद्रा वस्तुत: दोलाहस्त का ही दूसरा नाम है । अभिनवगुप्त का भी कथन है- 'सन्नतौ च दोलाहस्ती' । २. अलपद्महस्त - अलपद्म अथवा अलपल्लव हस्त का तात्पर्य यह है कि समस्त अंगुलियाँ हथेली की ओर मुड़ी हो पर एक दूसरे से अलग-अलग हों । ३. डा० रघुवंश का कथन है कि इस करण में सूचीचारी की गति प्रक्रिया की अन्तिम स्थिति का प्रयोग स्वीकार किया गया है, अर्थात् कुचित पैर समपाद की एड़ी से सटाया जाता है । सूची प्रक्रिया के कुचित चरण की ओर वाला हाथ अर्धचन्द्र चेष्टा में कमर पर प्रतिष्ठित होता है और दूसरा खटकामुख चेष्टा में

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१२२ नाट्यशास्त्रम् होता है और दोनों हाथ क्रमशः कमर तथा वक्ष पर स्थित होते हैं तो उसे 'सूचीविद्ध ' करण कहा जाता है ॥ १३८-१३९ ॥ कृत्वोरुवलितं पादमपक्रान्तक्रमं न्यसेत् ॥ १३ ९ ॥ प्रयोगवशगौ हस्तावपक्रान्तं तदुच्यते । (७९ ) अपक्रान्त -यदि उस को वलित करके पैर को अपक्रान्त चारी ' में प्रयुक्त किया जाता है एवं हाथ प्रयोग के अनुकूल होते हैं तब उस करण का नाम 'अपक्रान्त' करण होता है ॥ १३ ९ -१४० ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा रेचितौ च तथा करौ ॥। १४० ॥ तथा त्रिकं विवृत्तं च मयूरललितं भवेत् । (८० ) मयूरललित -जब चरण वृश्चिक' हो, दोनों हाथ रेचित हो तथा त्रिक का परिवर्तन किया जाए तो वह ' मयूरललित' करण की स्थिति होती है ॥ १४०-१४१ ॥ अञ्चितापसृतौ पादौ शिरश्च परिवाहितम् ॥ १४१ ॥

रचितौ च तथा हस्तौ तत्सर्पितमुदाहृतम् । ( ८१ ) सर्पित-जब अंचित' चरणों को अपसृत किया जाए, सिर परिवाहित" मुद्रा में हो एवं दोनों हाथ रेचित हों तो उसे 'सर्पित' करण कहा जाता है ॥ १४१-१४२ ॥ अपनी ओर के वक्षःप्रदेश पर न्यस्त होता है । अभिनवगुप्त ने अर्धचन्द्र हस्तचेष्टा के साथ पक्ष वंचित चेष्टा का उल्लेख भी किया है ।

- १. अपक्रान्तचारी ऊरुभ्यां वलनं कुञ्चितं पादमुद्धरेत् ।

पार्श्व विनिक्षिपेच्चैनमपक्रान्ता तु सा स्मृता ॥

( १०-३१ ) २. अभिनवगुप्त की व्याख्या के अनुसार इस करण में एक पैर वृश्चिक मुद्रा में होता है एवं दोनों रेचित हंसपक्ष हस्त द्रुतगति से भ्रमित किए जाते हैं । पैर को उस स्थान पर निकुचित करके भ्रमरी चारी की चेष्टा में न्यस्त किया जाता है ।

३. अंचितपाद - पाणिः यस्य स्थिता भूमावूर्ध्वमग्रतलं भवेत् ।

अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः स पादोञ्चित उच्यते ॥

( ९/ २७५ उ ०२७६ पू० ) ४. अपसृत – ' अपसृत' का तात्पर्य है एक पैर का दूसरे पैर के पास से हटाना । इस अंचित अवस्था से पैर अर्धवृताकार घूमकर अलग होते हैं । ५. परिवाहित - पार्यायशः पार्श्वगतं शिरः स्यात्परिवाहितम् ( ८-२६ ) अर्थात् सिर का क्रमशः पार्श्वो में घूमना परिवाहित कहलाता है ।

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चतुर्थोऽध्यायः १२३ ॥ १४२ ॥ नूपुरं चरणं कृत्वा दण्डपादं प्रसारयेत्

। • क्षिप्राविद्धकरं चैव दण्डपादं तदुच्यते (८२) दण्डपाद - 'दण्डपाद' करण उसको कहा जाता है जब पैर को नूपुर चारी' में लाया जाए और फिर उसे दण्डपादचारी ' में प्रसारित किया जाए और दोनों हाथ शीघ्रतापूर्वक आविद्ध किए जाए ॥ १४२-१४३ ॥ अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा समुत्प्लुत्य निपातयेत् ॥ १४३ ॥

जङ्घाञ्चितोपरि क्षिप्ता तद्विद्याद्धरिणप्लुतम् । (८३ ) हरिणप्लुत - जिस करण में अतिक्रन्तक्रम का निष्पादन करके फिर पैर को उछाल कर नीचे रखा जाता है और अंचित जाँघ को ऊपर की ओर क्षिप्त किया जाता है उसे 'हरिणप्लुत' करण जानना चाहिए ॥१४३-१४४ ॥ डोलापादक्रमं कृत्वा समुत्प्लुत्य निपातयेत् ॥ १४४ ॥

परिवृत्तत्रिक चैव तत्प्रेङ्खोलितमुच्यते । (८४) खोलित - दोलापाद चारी को सम्पन्न करके जब उछल कर पैर को गिराया जाए और त्रिक का परिवर्तन हो तो उसे 'प्रेङ्खोलित' करण कहते हैं ॥ १४४-१४५ ॥ भुजावूर्ध्वविनिष्क्रान्तौ हस्तौ चाभि ( धो ) मुखाङ्गुली ॥ १४५ ॥

बद्धा चारी तथा चैव नितम्बे करणे भवेत् । ( ८५ ) नितम्ब - नितम्बकरण में दोनों भुजाएं ऊपर की ओर निकली रहती हैं' औरहोती हैं और हाथ की उंगुलियां ऊपर की ओर १. नृपुरपादचारी -पृष्ठतोऽभ्यश्वितं कृत्वा पादमग्रतलेन तु । द्रुतं निपातयेत् भूमौ चारी नुपुरपादिका ॥ ( १०-३५ ) २. दण्डपादचारी- "क्षिप्रमाविद्धकरणं दण्डपादा तु सा स्मृता । ( १०-४४ ) भुजाओं का संचालन अपविद्ध ( ९ -२२० ) चेष्टा में होता है, जिसमें हाथ बाहरी स्थिति से अन्दर की ओर गतिशील होते हैं । ३. हरिणप्लुताचारी- अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा चोत्प्लुत्य विनिपातयेत् । जङ्घाश्विता परिक्षिप्ता सा ज्ञेया हरिणप्लुता ॥ ( १०-४३ ) अर्थात् उछलकर पैर को जमीन पर रखना और अंचित पैर की जंघा को क्षिप्त रखकर हरिणप्लुत चारी का सम्पादन किया जाता है ।

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१२४ नाट्यशास्त्रम् बद्धाचारी' का प्रयोग किया जाता है ॥ १४५-१४६ ॥ दोलापादक्रमं कृत्वा हस्तौ तदनुगावुभौ ॥ १४६ ॥

रेचितो घूर्णितो वापि स्खलितं करणं भवेत् । ( ८६) स्खलित - स्खलित कारण उसको कहते हैं जब दोलापादचारी का प्रयोग करके रेचित' एवं घूर्णित' अवस्था में युक्त दोनों हाथों को भी पैरों की गति के ही अनुरूप रखा जाए ॥ १४६-१४७ ॥ एको वक्षःस्थितो हस्तः प्रोद्वेष्टिततलोऽपरः ॥ १४७ ॥

अञ्चितश्चरणश्चैव प्रयोज्यः करिहस्तके । (८७ ) करिहस्तक* -करिहस्तक करण में हाथ को वक्षःस्थल पर रखना १. बद्धाचारी- "अन्योन्यजङ्घासंवेधात् कृत्वा तु स्वस्तिकं ततः । ऊरुभ्यां वलनं यस्मात् सा बद्धाचार्युदाहृता ॥ ( ना०शा० १०-२१ ) अभिनवगुप्त के मतानुसार पताका हस्त की ऊंगलियां व हथेलियाँ उपर उठाए हुए सिर के पास ले जाकर फिर कन्धों के समानान्तर रखते हुए वक्ष के नीचे ले जाकर पताका मुद्रा के अन्तर्गत ऐसे रखना चाहिए कि दाहिने हाथ का उल्टा भाग वक्षःस्थल से सटा रहे और बायें हाथ के अंगूठे का अगला सिरा व दाहिने हाथ का करभ बाए हाथ की तर्जनी के अगले भाग से श्लिष्ट रहे । फिर हाथों की अंगुलियों को शरीराभिमुख रखते हुए रेचित एवं घूर्णित हस्त मुद्राओं के अन्तर्गत नितम्ब अवस्था में रखना चाहिए । नितम्ब हस्त चेष्टा का लक्षण है- ' ( ) बाहुशीर्णाद्विनिष्क्रान्तो आदि १ ९ ६ जिसके अनुसार दोनों पताका हस्त कन्धों से नितम्ब पर लाए जाने चाहिए । २. अभिनवगुप्त के मत में यहाँ रेचित से हंसपक्ष - रेचित का तात्पर्य ग्रहण करना चाहिए । ३. घूर्णित कोई विशिष्ट मुद्रा न होकर गोलाकार घूम रहे हाथों का परिचायक है ।

४. करिहस्त - "समुन्नतो लताहस्तः पार्श्वत्पार्श्व विलोलितः ।

त्रिपताकोऽपरः कर्णे करिहस्तः प्रकीर्तितः ॥ ९ -२०० ॥

अर्थात् एक हाथ लता -हस्त मुद्रा में वक्षःस्थल पर इस पार्श्व से उस पार्श्व तक झूलता रहता है और दूसरा हाथ त्रिपताका मुद्रा में कान पर रखा जाता है तो उसे ' करिहस्त ' कहते हैं ।

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चतुर्थोऽध्यायः १२५ चाहिए और दूसरे हाथ की हथेली प्रोद्वेष्ठित रहनी चाहिए तथा पैरों को अंचित रखना चाहिए ॥ १४७.१४८ ॥ प्रसर्पिततलौएकस्तु रेचितो हस्तोपादौलताख्यस्तुप्रसर्पितकमेवतथा परःतत् ॥। १४८ ॥ (८८ ) प्रसर्पितक- यदि एक हाथ रेचित और दूसरा लता मुद्रा में हो व पैर 'तलसंचर" हो तो 'प्रसर्पितक' करण कहते हैं ॥ १४८-१४९ ॥ अलातं च पुरःकृत्वा द्वितीयं च द्रुतक्रमम् ॥ १४ ९ ॥ हस्तौ पादानुगौ चापि सिंहविक्रीडिते स्मृतौ । ( ८९ ) सिंहविक्रीडित – यदि ' अलात " चारी के प्रदर्शन के बाद द्रुतसंचरण के साथ साथ हाथों को भी पैरों की गति के अनुरूप रखा जाए तो उसे 'सिंह- विक्रीडित ' करण कहा जाता है ॥ १४ ९ -१५० ॥ पृष्ठप्रसर्पितः पादस्तथा हस्तौ निकुञ्चितौ ॥ १५० ॥

पुनस्तथैव कर्तव्यो सिंहाकर्षितके द्विजाः । ( ९ ० ) सिंहाकर्षित--जब ( एक ) पैर को पीछे की ओर फैलाया जाए, दोनों हाथ निकुचित किए हुए हों और फिर ऐसा ही ( शरीर के दूसरे पार्श्व के साथ ) किया जाए तो उसे सिंहाकपितक करण कहा जाता है ॥ १५०-१५१ ॥ आक्षिप्तहस्तमाक्षिप्तदेहमाक्षिप्तपादकम् ॥ १५१ ॥

उद्वृत्तगात्रमित्येतदुद्वृत्तं करणं स्मृतम् । ( ९ १ ) उद्वृत्त -यदि हाथ पैर और पूरे शरीर को झटके से उछाला जाए १. प्रसर्पितक - पैरों के तलवे घिसते हुए आगे बढ़ना । श्री घोष के अनुसार- पैर को समसर्पितल या तलसंचर मुद्रा में रखना चाहिए । अभिनवगुप्त के मत में रेचित कर की ओर जो पैर है उस से दोनों पैरों के बीच भूमि पर घर्षण करते हुए मंद मंद चलने का तात्पर्य है — रेचितकरस्य दिवपादः पादान्तरान्मन्दंमन्दं भूमि- घर्षणाच्चले । २. अलात चारी (ना० शा० १०-४१ ) में जिस ओर के पैर को द्रुतगति से आगे रखा जाता है, उसी ओर का हाथ भी गतिशील होता है ऐसा ही दूसरे चरण व हस्त से साथ होता है । इस प्रकार बार बार दोनों पैर व हाथ गतिशील होते हैं । अभिनवगुप्त के विचारानुसार इस करण में एक एक पैर वृश्चिक मुद्रा में रहता है । तथा दाहिने व बायें दोनों हाथ पद्मकोश एवं अर्णनाभ ( ९ -१२० ) मुद्रा में रहते हैं । फिर जब दूसरा पैर वृश्चिक चेष्टा में लाया जाता है तब दोनों हाथों को भी पुनः पूर्ववत् प्रसारित किया जाता है ।

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१२६ नाट्यशास्त्रम् और फिर शरीर उद्वृत्त चारी' की स्थिति में रहे तो वह 'उद्वृत्त ' करण माना जाता है ॥ १५१-१५२ ॥ आक्षिप्तचरणच को हस्तौ तस्यैव चानुगौ ॥। १५२ ॥ आनतं च तथा गात्रं तथोपसृतकं भवेत् । ( ९ २ ) उपसृतक – पैर आक्षिप्त चारी हों और हाथ उसी अवस्था के अनुकूल हों तथा शरीर झुका हुआ हो' तो वह 'उपसृतक ' करण कहा जाता है ॥ १५२- १५३ ॥ दोलापादक्रमं कृत्वा तलसङ्घट्टितौ करौ ॥ १५३ ॥

रेचयेच्च करं वामं तलसङ्घट्टिते सदा । ( ९ ३ ) तलसङ्घटित –दोलापादचारी' का प्रदर्शन करने के उपरान्त दोनों हाथों के तल जब संघटित होते हैं और बायाँ हाथ रेचित किया जाता है तो उसे 'तलसंघटित ' करण कहा जाता है ॥ १५३-१५४ ॥ निकुंचित का अर्थ श्रीघोष के अनुसार झुके हुए चक्राकर संचालित हाथ हैं- अभिनवगुप्त के अनुसार - क्रियावर्तनावशादपसार्य । श्रीशुक्ल ने अनुवाद किया है— ( या झुका) कर शरीर एक गोल घुमाव ले जो सामने व पीछे की ओर हाथ सिकुड़ा सिकुड़ने वाला हो ।

१. उद्वृत्तचारी - पादमाविद्धमावेष्ट्य समुत्प्लुत्य निपातयेत् ।

परिवृत्त्य द्वितीयं तु सोवृत्ता चायुदाहृता ॥ १०-३९ ॥

दोनों कुचित पैरों को क्रमशः गोलाकार गति से ले जाकर इसके अनुसार ऊपर से नीचे गिराया जाता है । के भरतमुनि के कथन से तो यही तात्पर्य निकलता है कि हाथ पैरों २. कि बायें हाथ के व्यावर्तन अनुसार गतिशील होंगे परन्तु अभिनवगुप्त का कथन है में स्थित किया जाता है । में शरीर को झुकाकर दाहिना हाथ अराल मुद्रा 'वामतो व्यावृत्य करपरि- 'कुचित पादमुत्क्षिप्य' ( ना० शा० १०-३७ ) वर्तनेन गात्रमानम्य दक्षिणमरालतां नयेत् । ' किन्तु गा० ओ० सि० में प्रदर्शित चेष्टा में होना सिद्ध नहीं रेखाचित्र के अनुसार हाथों का अराल एवं व्यावृत्त इस कारण हम यहाँ अभिनव । उसके अनुसार हाथ दोला चेष्टा में न्यस्त हैं । होता करना उचित नहीं समझते । हमारे विचार में हाथ आक्षिप्त चारी( की -प्रक्रिया का अनुसरण करेंगे का समर्थन क्योंकि मूल में स्पष्टतः लिखा है कि हाथ उसके पैर के ) ही समान अवस्थित होगे । ३. अभिनवभारती के उल्लेखानुसार दोलापाद चारो के साथ पताका हस्तों को इस भाँति रखना चाहिए कि उनके तल एक दूसरे से संघटित रहें । फिर वैष्णव-

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चतुर्थोऽध्यायः १२७ एको वक्षःस्थितो हस्तो द्वितीयश्व प्रलम्बितः ॥ १५४ ॥

तलाग्रसंस्थितः पादो जनिते करणे भवेत् । ( ९४ ) जनित -जनित करण में एक हाथ वक्षःस्थल पर होता है और दूसरा झूलता हुआ रहता है एवं पैर अग्रतलसंचर मुद्रा में रहता है' ॥ १५४-१५५ ॥ जनितं करणं कृत्वा हस्तो चाभिमुखाङ्गुली ॥ १५५ ॥

शनैर्निपतितौ चैव ज्ञेयं तदवहित्थकम् । ( ९ ५ ) अवहित्थक –जनित करण के सम्पादन के बाद परस्परोन्मुख अंगुलियों वाले हाथों को धीरे धीरे नीचे की ओर ले जाया जाए तो उसे ' अवहित्थक ' करण जानना चाहिए' ॥ १५५-१५६ ॥ करौ वक्षःस्थितौ कार्यावुरो निर्भुग्नमेव च ॥ १५६ ॥

मण्डलस्थानकं चैव निवेशं करणं तु तत् । ( ९ ६ ) निवेश निर्भुग्न वक्षःस्थल पर दोनों हाथों को रख कर स्थानक में ( खड़े रह कर ) दाहिना हाथ कटि पर रखना चाहिए और दूसरे हाथ को हंसपक्ष की मुद्रा में द्रुतभ्रमित करते हुए रेचक करना चाहिए । सरल शब्दों में इस करण में दोनों हाथों की हथेलियों को मिला कर ताली बजाई जाती है और फिर रेचित मुद्रा में उन्हें अलग किया जाता है । १. जनितचारी - मुष्टिहस्तश्च वक्षःस्यः करोऽन्यस्य प्रवर्तते । तलसंचरपादश्च जनिता चायुदाहृता ॥ (ना०शा० १०-२५) इसके अनुरूप मुष्टि-हस्त वक्ष पर रहता है और दूसरा हाथ गतिशील रहता है । एवं पैर तल संचर गति में रहते हैं । २. अभिनवभारती के अनुसार यहाँ जनित चारी का उपयोग होता है और हाथों को वक्षःस्थल पर अराल तथा अलपल्लव मुद्रा में रखा जाता है । कुछ आचार्य इस ( अवहित्यक ) करण में हाथों को अवहित्यमुद्रा में करना मानते हैं - शुकतुण्डौ करौ कृत्वा वक्षस्याभिमुखाश्वितौ । शनैरधोमुखाविद्धौसोऽवहित्य इति स्मृतः ( ९ -१५६ )

३. निर्भुग्न- 'स्तब्धं' च निम्नपृष्ठ य निर्भुग्नां समुन्नतम् ।

उरो निर्भुग्नमेतद्धि कर्मचास्य निबोधत ॥ ९ -२२७ ॥

अर्थात् केन्द्र मण्डल में पैर चार ताल की दूरी पर रहते हैं वक्ष स्तब्ध, पृष्ठ भाग झुका हुआ एवं कन्धे उठे हुए रहते हैं ।

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१२८ नाट्यशास्त्रम् मण्डल' स्थानक पर प्रदर्शन करना 'निवेश' नामक करण कहलाता है ॥ १५६-१५७ ॥ तलसञ्चरपादाभ्यामुत्प्लुत्य पतनं भवेत् ॥ १५७ ॥

सन्नतं वलितं गात्रमेलकाक्रीडितं तु तत् । ( ६७ ) एलकाक्रीडित'--यदि तलसंचर मुद्रायुक्त दोनों पैरों से उछल कर फिर भूमि पर आया जाए एवं झुके हुए शरीर को घुमाया जाए तो उसे 'एलका- क्रीडित' करण जानना चाहिए ॥ १५७-१५८ ॥ ( ९ ८ ) ऊरुद्वृत्त' –हाथों को आवृत्त करके ऊरु के पृष्ठभाग पर अंचित रूप में रखा जाए और जंघा को अंचित मुद्रा तथा उद्वृत्त गति में रखे तो उसे 'उद्वृत्त ' करण कहते हैं ॥ १५८-१५९ ॥ करमावृत्तकरणमूरुपृष्ठेऽञ्चितं न्यसेत् ॥ १५८ ॥

जङ्घाञ्चिता तथोद्वृत्ता ह्यूरूद्वृत्तं तु तद्भवेत् । ( ९९ ) मदस्खलितक — मदस्खलितक नाम करण में दोनों हाथ नीचे लटका १. मण्डलस्थानक- ऐन्द्र तु मण्डले पादौ चतुस्तालान्तरस्थिती । त्र्यश्री पक्षःस्थितौ चैव कटिजानू समौ तथा ॥ ( १०-६५ पू० ६६ उ० ) स्थानक का तात्पर्य खड़े होने की चेष्टा से है । २. एलकाक्रीडित चारी- तलसंचर पादाभ्यामुत्प्लुत्य पतनं तु यत् । पर्यायशश्च क्रियते एडकाक्रियता तु सा ॥ ( १०-२० ) में तल- संचर चरणों से क्रमशः ऊपर नीचे कूदा जाता है । धढ़ कुछ झुका और मुड़ा रहता है । ३. अभिनवभारती का कथन है कि इसमें उरुवृत्त चारी का प्रयोग होता है। जिसका लक्षण है- तलसंचरपादस्य पाणिोन्मुखी यदा 1 जङ्घाश्विता तथोद्वृत्ता ऊरुवृत्तेति सा स्मृता ॥ ( १०-२२ ) अर्थात् तलसंचर पैर की एड़ी बाहर की ओर स्थित होती है । जांघें झुकी और ऊपर की ओर घूमी हुई रहती है । इस करण में उरुवृत्त चारी के प्रयोग के साथ हाथों को घुमाकर अराल एवं खटकामुख मुद्रा में ऊरु के पीछे स्थापित करना चाहिए । डा० रघुवंश की टिप्पणी है कि जंघाओं के अंचित होने से पैर घुटनों से झुके

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१ तलपुष्पपुटम् २ वर्तितम् g ३ वलितोरुकम् ४ अपविद्धम् ५ समनखम् ६ लीनम्