भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 181–190
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 181–190
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११० नाट्यशास्त्रम् उ अञ्चितः स्यात्करो वामः सव्यश्चतुर एव तु ॥ ९९ ॥
दक्षिण: कुट्टितः पादश्चतुरं तत्प्रकीर्तितम् । ( ३ ९ ) चतुर - बायाँ हाथ अश्चित ( अलपल्लव' ) मुद्रा में हो, दाहिना हाथ चतुर मुद्रा' में हो तथा दाहिना पैर कुट्टित हो तो उस करण का नाम चतुर कहा जाता है ॥ ९९ -१०० ॥ भुजङ्गत्रासितः पादो दक्षिणो रेचितः करः ॥ १०० ॥
लताख्यश्च करो वामो भुजङ्गाञ्चितकं भवेत् । ( ४० ) भुजंगाञ्चित – पैर भुजंगत्रासित चारी में हो, दाहिना हाथ रेचित -हो, तो वह भुजंगाञ्चित करण कहलाता है ॥ १००-१०१ ॥ विक्षिप्तं हस्तपादं तु समन्ताद्यत्र दण्डवत् ॥ १०१ ॥
रेच्यते तद्धि करणं ज्ञेयं दण्डकरेचितम् । (४१ ) दण्डकरेचित - जिस करण में हाथों एवं पैरों को दण्ड की भाँति चारों ओर प्रसारित किया जाए और फिर उन्हीं हाथ पैरों को रेचित किया जाए तो उसका नाम दण्डकरेचित होता है ॥ १०१-१०२ ॥ १. अञ्चित – “अञ्चित इत्यलपल्लव: ( ९ - ९ १ ) " अञ्चित पद की यह अभिनवगुप्त कृत व्याख्या है । अर्थात् अभिनव के मत में यहाँ वर्णित अंचित मुद्रा एवं नवें अध्याय में वर्णित अलपल्लव मुद्रा एक ही है । तदनुसार अलपल्लव मुद्रा अथवा अंचित मुद्रा में हाथ की अंगुलियाँ बिना आपस में जुड़े हथेली की ओर मुड़ी रहती हैं तथा हथेली खड़ी हुई रहती हैं । २. चतुर - तिस्रः प्रसारिता यत्र तथा चोर्ध्वा कनीयसी । तासां मध्ये तथाङ्गुष्ठः स करश्चतुरः स्मृतः ॥ ९ - ९ ३ हाथ की तीनों अंगुलियां फैली हों, कनिष्ठिका खड़ी हो और उनके बीच में अंगूठा हो तो उसे हाथ की चतुर मुद्रा कहते हैं । ३. इस करण में संकेतित सभी परिभाषिक शब्द यथा रेचित, लतामुद्रादि " पूर्वव्याख्यात हैं अतएव यहाँ इनकी फिर से परिभाषा नहीं दी गई । भुजंगत्रस्त- रेचित एवं भुजङ्गाश्चित करण में जो मूलभूत पार्थक्य है वह यह है कि दोनों में पैर भुजंगत्रासित चारी में होते हैं किन्तु प्रथम में दोनों हाथ रेचित होते हैं जबकि दूसरे करण में केवल दाहिना हाथ रेचित होता है एवं बायाँ लता- मुद्रा में होता है । ४. अभिनवगुप्त के विचार में हाथों की इस अवस्था से दण्डपक्ष तथा पैरों की अवस्था से दण्डपादचारी का बोध होता है ( दण्डवद्धस्तविक्षेपेण रेचनेन च
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चतुर्थोऽध्यायः १११ वृश्चिकं चरणं कृत्वा द्वावप्यथ निकुट्टितौ ॥ १०२ ॥
विधातव्यौ करौ तत्त ज्ञियं वृश्चिककुट्टितम् । (४२ ) वृश्चिककुट्टित – वृश्चिक चरण' बना कर दोनों को निकुट्टित करना ही वृश्चिककुट्टित संज्ञक करण होता है ॥ १०२-१०३ ॥ सूचीं कृत्वापविद्ध च दक्षिणं चरणं न्यसेत् ॥ १०३ ॥
। रेचिता च कटियंत्र कटिभ्रान्तं तदुच्यते [४३ ] कटिभ्रान्त - सूची चारी में दाहिना पैर यदि अपविद्ध' मुद्रा में रखा जाए और कटि रेचित की जाए तो उसे कटिभ्रान्त करण कहते हैं ॥ १०३-१०४ ॥ अश्वितः पृष्ठतः पादः कुञ्चितोर्ध्वतलाङ्गुलिः ॥ १०४४ ॥।
लताख्यश्च करो वामस्तल्लतावृश्चिकं भवेत् । दण्डपक्षौ सूच्येते । पादविक्षेपेण तु दण्डपादा चारी ) । इनके लक्षण नाट्यशास्त्र के अनुसार निम्नलिखित हैं- "हंसपक्षकृती हस्तौ व्यावृत्तपरिवर्तितौ । तथा प्रसारितभुजौ दण्डपक्षाविति स्मृतौ " ॥ ९-२०२ 13 "नूपुरं चरणं कृत्वा पुरतः सम्प्रसारयेत् । क्षिप्रमाविद्धकरणं दण्डपादा तु सा स्मृता ” ॥ १०-४४ वृश्चिकोपलक्षितं १. वृश्चिकं चरण कृत्वा--पृष्ठभागे रेचितजङ्घमुत्तानतलं पैर को पीठ की.. 2चरणं कृत्वा अभिनवगुप्त की इस व्याख्या के अनुसार ओर मोड़कर ऊँचा करना वृश्चिक चरण कहलाता है । श्री घोष ने अपने अनुवाद में 'चरण' के स्थान पर 'करण' पाठभेद मानकर अनुवाद किया है । अतः किसी अन्य व्याख्या के अभाव में 'वृश्चिक- चरण' विषयक अभिनवगुप्त की धारणा को ही मान्यता देनी पड़ेगी ।
२. सूची— “कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्व सम्प्रसारयेत् ।
पातयेदप्रयोगेन सा सूची परिकीर्तिता" ॥ १०-३४ ॥
भरतमुनि की इस परिभाषा के अनुसार कुश्चित पैर को ऊपर उठाकर जंघा तक ले जाना एवं फिर उसे पैर के अगले भाग के सहारे पृथ्वी पर टिका देना सूची कहलाता है । ३. अपविद्ध--श्री घोष के अनुसार अपविद्ध चेष्टा हाथों के चक्राकार संचालन की है । किन्तु यहाँ पाठ में हाथों का उल्लेख नहीं है, अभिनवगुप्त के मत में कटि के भ्रमित होने के साथ हाथ भी गतिशील होते हैं अतः अपविद्ध मुद्रा में हाथों की अपेक्षा पैरों की स्थिति मानना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है ।
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११२ • नाट्यशास्त्रम् (४४ ) लतावृश्चिक – एक पैर अञ्चित मुद्रा में हो और बायें हाथ की कुश्चित अंगुलियाँ एवं हथेली ऊपर की ओर मुड़ी दशा में हो और वह [ बायाँ हाथ ] लता मुद्रा में हो तो लतावृश्चिक करण सिद्ध होता है ॥ १०४-१०५ ॥ अलपद्मः कटीदेशे छिन्ना पर्यायशः कटी ॥ १०५ ॥
वैशाखस्थानकेनेह तच्छिन्न करण भवेत् । ( ४५ ) छिन्न--छिन्न दशा में अवस्थित कटि के ऊपर अलपद्म हस्त' रखना, तथा शरीर को वैशाख मुद्रा में रखना ही हिन्न करण कहलाता है ॥ १०५-१०६ ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा स्वतिकौ च करावुभौ ॥ १०६ ॥
रेचितो विप्रकीणों च करौ वृश्चिकरेचितम् । (४६) वृश्चिक रेचित - वृश्चिक करण धारण करके, स्वस्तिक मुद्रा में स्थित दोनों हाथों को रेचित करके विप्रकीर्ण मुद्रा बनाना वृश्चिकरेचित करण कहलाता है ॥ १०६-१०७ ॥ बाहुशीर्षाञ्चितौदूरसन्नतपृष्ठंचहस्तौ पादःवृश्चिकंपृष्ठाञ्चितस्तथातत्प्रकीर्तितम् ॥। १०७ ॥ (४७ ) वृश्चिक – दोनों हाथों को मोड़कर बाहुशीर्ष ( कंधे ) की तरफ मोड़ना एवं पैर को दूर तक पीछे की ओर मोड़ना वृश्चिक नाम करण कहा जाता है ॥ १०७-१०८ ॥ शशातील आलीढं स्थानकं यत्र करौ वक्षसि रेचितौ ॥ १०८ ॥ ऊर्ध्वाधोविप्रकीर्णौ च व्यंसितं करणं तु तत् ।
(४८ ) व्यंसित जब आलीढ स्थान की अवस्था में दोनों हाथ वक्षस्थल पर ११. अलपद्महस्त नाट्यशास्त्र के नवें अध्याय के श्लोक ९ १ में वर्णित अल-पल्लव मुद्रा एवं अपद्म मुद्रा एक ही हैं । २. अभिनवगुप्त के मत में इसका प्रयोग आकाश में भ्रमण या ऐरावतादि के विषय का प्रदर्शन करने के समय होता है । उनके अनुसार यहाँ हस्त एवं बाहु शिर को अंचित करने से यह तात्पर्य है कि करिहस्त का प्रयोग किया जाना चाहिए । ३. अभिनवगुप्त का कथन है कि बिच्छू की पूँछ की जगह पर जो पैर होता है उसी के समान एकदम पीछे की ओर किये हुए पैर की संज्ञा वृश्चिक होती है-[वृश्चिकपुच्छस्थानीय चरणं वृश्चिकमेतत्करणं तदुपलक्षितपादो वृश्चिकः ] ।.! ४ अस्यैव दक्षिणं पादं पञ्चतालान् प्रसार्य तु आलीढस्थानकं कुर्याद् रुद्रश्चास्याधिदैवतम् ॥ १०-६७, ६८ अर्थ —श्लोक ८०-५५ ६६ में बतलाये गये ऐन्द्रमण्डल नामक स्थानक में यदि
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चतुर्थोऽध्यायः ११३ रेचित किए जाएँ और फिर उन्हें (हाथों को) विप्रकीर्णमुद्रा' में ऊपर नीचे गति- शील किया जाए तो उस करण का नाम व्यंसित होता है ॥ १०८-१०९ ॥ हस्तौयत्र तुतत्करणंस्वस्तिकोज्ञेयपार्श्वे बुधैःतथा पादोपार्श्वनिकुट्टितम्निकुट्टितः ॥। १० ९ ॥ (४९ ) पार्श्वनिकुट्टक-5- जब स्वस्तिक मुद्रा में स्थित दोनों हाथों को (शरीर के, एक पार्श्व में रखा जाए तथा पैर को निकुट्टित ( ऊपर- नीचे ) किया जाए तो उस करण को विद्वज्जन ' पार्श्वनिकुट्टित' मानते हैं ॥ १० ९ -११० ॥ वृश्चिक चरणं कृत्वा पादस्याङ्गुष्ठकेन तु ॥ ११० ॥
ललाटे तिलकं कुर्याल्ललाटतिलकं तु तत् । (५० ) ललाटतिलक पैर की अवस्थिति वृश्चिक बनाकर पैर के अंगूठे से मस्तक पर तिलक लगाने की संज्ञा 'ललाटतिलक ' करण है ॥ ११०-१११ ॥ पृष्ठत कुश्वितं कृत्वा व्यतिक्रान्तक्रमं ततः ॥ १११ ॥
आक्षिप्तौ च करौ कार्यों क्रान्तके करणे द्विजाः । ( ५१ ) क्रान्तक -कुंचित पैर को पीछे की ओर मोड़ना अतिक्रान्त चारी का होना और दोनों हाथों का नीचे पड़े रहना -यह 'क्रान्तक' करण का लक्षण है ॥ १११-११२ ॥ उत्तानोआद्यः पादो नतःवामपार्श्वस्थस्तत्कुञ्चितमुदाहृतम्कार्यः सव्यहस्तश्च कुञ्चितः ॥ । ११२ ॥ ( ५२ ) कुंचित - दाहिने पैर को नीचे झुकाना चाहिए और दाहिने हाथ को कुंचित (झुका ) करके इस दशा में बायें पार्श्व की तरफ रखना चाहिए कि उसकी
हथेली ऊपर की ओर रहे । इसे ' कुञ्चित' करण कहते हैं ॥ ११२-११३ ॥
प्रलम्बिताभ्यां बाहुभ्यां यद्गात्रेणानतेन च ॥ ११३ ॥
अभ्यन्तरापविद्धः स्यात्तज्ज्ञेयं चक्रमण्डलम् । ( ५३ ) चक्र मण्डल – दोनों हाथ दोनों तरफ सीधे लटकते रहें, और शरीर- दाहिना पैर पाँचताल तक फैलाया जाय तो उसे आलीढ नामक स्थानक कहते हैं । उसके १. अधिदेवता'एकस्य रुद्र तर्जन्याद्युद्वेष्टितेनहैं । ९-२१६ ) करणेनाधो विप्रकीर्णता । द्वितीयस्तर्जन्यादिपरावर्तित करणेनोर्ध्वगतः, क्षेत्रपर्यायेणैक उत्तानो हँस पक्षो द्रुतभ्रम-लक्षणो रेचकम् । अवरोधोमुख ऊर्ध्वाध इत्येकीकरणम् । तच्च करणमुभयत्र संबध्यते । एतच्च विभ्रमादि- परिक्रमविषयम् ।
२. अतिक्रान्तक्रम - कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
उत्क्षिप्य पातयेच्चैनमतिक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ १०-३० ॥
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११४ नाट्यशास्त्रम् यष्टि झुकी रहे तथा आदि में अपविद्ध चारी' की स्थिति हो तो उसे 'चक्रमण्डल' करण कहा जातास्वस्तिकापसृतीहै ॥ ११३-११४ ॥पादावपविद्धक्रमौ यदा ॥ ११४ ॥
उरोमण्डलको हस्तावुरोमण्डलिक तु तत् । ( ५४ ) उरोमण्डल - जब स्वस्तिक मुद्रा में स्थित दोनों पैरों की स्थिति बदल कर उनसे अपविद्ध ( अड्डिता) चारी का प्रयोग किया जाए और हाथों से उरोमण्डल मुद्रा बनाई जाए तो वह 'उरोमण्डल' करण होता है ॥ ११४-११५ ॥ आक्षिप्तं हस्तपादं च क्रियते यत्र वेगतः ॥ ११५ ॥
आक्षिप्तं नाम करणं विज्ञेयं तद्विजोत्तमाः । (५५ ) आक्षिप्त - जिस अवस्था में हाथों एवं पैरों को शीघ्रतापूर्वक आक्षिप्त किया जाता है उसे विद्वज्जन 'आक्षिप्त ' करण की संज्ञा देते हैं ॥ ११५-११६ ॥ ऊर्ध्वाङ्गुलितलः पादः पार्श्वनोर्ध्वं प्रसारितः ॥ ११६ ॥
प्रकुर्यादञ्चिततली हस्तौ तलविलासिते । ( ५६ ) तलविलसित — पैर की अंगुलियाँ एवं तलुए को ऊर्ध्वमुख करके एक पार्श्व में काफी ऊँचे पर उठाए रखे तथा पताकामुद्रा वाले दोनों हाथों की हथेलियों को परस्पर मिला लें तो उसे ' तलविलसित ' करण कहते हैं ॥ ११६-११७ ॥ पृष्ठतः प्रसृतः पादो द्वौ तालावर्धमेव च ॥ ११७ ॥
तस्यैव चानुगो हस्तः पुरतस्त्वर्गलं तु तत् । (५७) अर्गल - पैर को पीछे की ओर फैला कर दो ताल की दूरी पर रखना, और हाथों को इसी प्रकार करना अर्गल करण कहलाता है ॥ ११७-११८ ॥ विक्षिप्तं हस्तपादं च पृष्ठतः पार्श्वतोऽपि वा ॥ ११८ ॥
एकमार्गगतं यत्र तद्विक्षिप्तमुदाहृतम् । (५८ ) विक्षिप्त--जब हाथ एवं पैर पीछे की ओर या एक पार्श्व की ओर १. अभ्यन्तरापविद्ध – अभिनवगुप्त के अनुसार यहाँ अड्डिताचारी से अभिप्राय है जिसका लक्षण नाट्यशास्त्र के दसवें अध्याय के तेइसवें श्लोक में दिया गया है ।
२. उरोमण्डल – उद्घोष्टितो भवेदेको द्वितीयश्चापवेष्टितः ।
भ्रमितावुरस: स्थाने ह्य रोमण्डिलिनौ स्मृतौ ॥ ९-२०५ ॥
३. अभिनवगुप्त के मतानुसार पैर को आक्षिप्तवारी की स्थिति में रखे, पार्श्व- भाग को थोड़ा झुका ले एवं चतुरस्र हस्त को खटकामुख मुद्रा में कर ले यह 'अक्षिप्त करण कहलाता है ।
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चतुर्थोऽध्यायः ११५ ले जाये जाते हैं तो वह 'विक्षिप्त ' करण कहा जाता है' ॥ ११८-११९ ॥ प्रसार्य कुञ्चितं पादं पुनरावर्तयेद् द्रुतम् ॥। ११ ९ ॥ प्रयोगवशगौ हस्तौ तदावर्तमुदाहृतम् । (५ ९ ) आवर्त -जब कुश्चित पद को फैला कर शीघ्रता से लौटा लिया जाए और दोनों हाथ (नृत्य के अनुकूल ) गतिशील रहें तो उसे 'आवर्त ' नामक करण कहते हैं' ॥ ११ ९ -१२० ॥ कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पाश्र्वात्पार्थं तु डोलयेत् ॥ १२० ॥
प्रयोगवशगी हस्तौ डोलापादं तदुच्यते । ( ६० ) डोलापाद - कुश्चित पद को ऊपर की ओर उठाकर दोनों पार्श्वभागों की ओर झुलाया जाए और दोनों हाथ ( नृत्य की गति के अनुकूल ) गतिशील रहें तो उसे 'डोलापाद करण' कहते हैं ॥ १२०-१२१ ॥ १. अभिनवगुप्त के मतानुसार विद्युद्भ्रान्ता तथा दण्डपादा इन दोनों चारियों के द्वारा उद्वेष्टित अपवेष्टित तथा रेचक मुद्रा में दोनों पावों और आगे तथा पीछे की ओर हाथों तथा पैरों का विक्षेप ( फेंकना) विक्षिप्त नामक करण कहलाता है । २. अभिनवगुप्त के मतानुसार इस करण का प्रयोग चाषगत्याचारी में किया जाता है क्योंकि दायें पैर को फैलाकर फिर लौटाना चाषगत्याचारी की ही क्रिया है । यथा- वामःपादः प्रसारितःसव्योपसर्पीसव्यःच पुनश्चैवापसर्पितःचाषगत्यामिति ॥। १०-१८ ॥ श्री घोष कृत अनुवाद में इस श्लोक की प्रथम पंक्ति प्रसार्य कुञ्चितं पादं पुन-'रावर्तयेद्रतम्' के उत्तरार्द्ध की व्याख्या नहीं हो पाती क्योंकि वह केवल यही अर्थ देते हैं कि कुचित पैर को सामने की ओर फैलाकर दोनों हाथों को शीघ्रता से गतिशील किया जाए । हमारे विचार से प्रथम पंक्ति में प्रयुक्त "द्रुतम्" की संगति द्वितीय पंक्ति में आ रहे 'प्रयोगवशगी हस्ती' की अपेक्षा प्रथम पंक्ति में प्रयुक्त पाद के साथ अधिक सटीक बैठती हैं । ३. अभिनवगुप्ताचार्य ने इस करण में ऊर्ध्वं जानुपाद एवं दोलापाद चारी का होना संकेतित किया है— " पूर्वमूर्ध्वजानुचारी ततो ( ना० शा० १०-३३ ) दोलापादा । " पूर्ववर्ती श्लोक की भाँति इस श्लोक में भी श्रीघोष महोदय प्रथम पंक्ति के उत्तरार्द्ध को द्वितीय पंक्ति से समन्वित करके यह अर्थ करते हैं कि कुञ्चित पद को ऊपर उठाकर दोनों को नृत्य की गति के अनुकूल इधर से उधर झुलाया जाए ।
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११६ नाट्यशास्त्रम् आक्षिप्तं हस्तपादं च त्रिकं चैव विवर्तयेत् ॥ १२१ ॥
चितौ च तथा हस्तौ विवृत्त करणे द्विजाः । ( ६१) विवृत्त - विवृत्त नामक करण में दोनों हाथों और पैरों को बाहर की ओर प्रसारित किया जाता है, त्रिक का परिवर्तन किया जाता है' और दोनों हाथों को रेचित किया जाता है ॥ १२१-१२२ ॥ सूचीविद्धं विधायाथ त्रिकं तु विनिवर्तयेत् ॥। १२२ ॥ करौ च रेचितौ कार्यों विनिवृत्ते द्विजोत्तमाः । ( ६२) विनिवृत्त - विनिवृत्त नामक करण में विद्वज्जन सूचीविद्ध चारी का प्रयोग करके त्रिक का परिवर्तन करने तथा हाथों को रेचित करने का विधान करते हैं ॥ १२२-१२३ ॥ पार्श्वक्रान्तक्रमं कृत्वा पुरस्तादथ पातयेत् ॥ १२३ ॥
प्रयोगवशगौ हस्तौ पार्श्वक्रान्तं तदुच्यते । ( ६३ ) पार्श्वक्रान्त -- पार्श्वक्रान्तचारी ' का प्रयोग करते हुए ( पैर को ) सामने दोलापाद की परिभाषा के अनुसार पैर को ही गतियुक्त किया जाता है-- 'कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पावत्पार्श्व विलोलयेत्..' ॥ १०-३६ ॥ तथा अभिनवगुप्त भी डोलापाद चारी को समन्वित मानते हैं । अतः हमने अपने अनुवाद में पैर की ही गति का उल्लेख किया है, हाथ का नहीं । १. त्रिक के विवर्तन (परिवर्तन) का तात्पर्य यह है कि पहले दाहिने पैर से भ्रमरी नामक चारी करे । ( फिर बायें पैर से भ्रमरी नामक चारी करे । ) २. अभिनवगुप्त के मतानुसार रेचित हस्त से तात्पर्य हंसपक्ष मुद्रा वाले हाथों से है- 'तद्र चितौ च हंसपक्षौ द्रुतभ्रमौ हस्ताविति ।'
३. सूचीविद्ध चारी- कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्वं सम्प्रसारयेत् ।
पातयेच्चाप्रयोगेन सा सूची परिकीर्तिता ॥ १०-३४ ॥
४. अभिनवगुप्त इस करण में चारियों के दो विकल्प मानते हैं । पहले के अनुसार सूचीविद्ध चारी करके दूसरे (वायें ) पैर के पाणिभाग ( एडी ) में स्वस्तिक की योजना करके फँसा ले तथा उसके बाद त्रिक का परिवर्तन करे । दूसरे के अनुसार बद्धा नामक चारी से ऊरु की बलित मुद्रा करे व हाथों को रेत्रित करके हंसपक्ष में शीघ्रतापूर्वक घुमाये । ५. पार्श्वक्रान्ताचारी- कुचितं पादमुत्क्षिप्य जानुस्तनसमं न्यसेत् । उद्धट्टितेन पादेन पार्श्वक्रान्ता विधीयते ॥ १०-३२
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चतुर्थोऽध्यायः ११७ की ओर स्थापित करे' तथा दोनों हाथ (नृत्य के अनुकूल) प्रयोग रत रहें तो 'पार्श्व-'क्रान्त' करण कहा जाता है ॥ १२३-१२४ ॥ पृष्ठतः कुञ्चितः पादो वक्षश्चैव समुन्नतम् ॥। १२४ ॥ तिलके च करः स्थाप्यस्तन्निशुम्भितमुच्यते । ( ६४ ) निशुम्भित' -जब एक पैर को पीछे की ओर मोड़ा जाता है, ( ललाट में ) तिलक वक्षःस्थल को सीधा तान कर रखा जाता तथा हाथ को ( स्थान ) से ऊपर रखा जाता है, तो उसको 'निशुम्भित ' करण कहा जाता है ॥ १२४-१२५ ॥ पृष्ठतो वलितं पादं शिरोघृष्टं प्रसारयेत् ॥। १२५ ॥ सर्वतो मण्डलाविद्धं विद्युद्भ्रान्तं तदुच्यते । अर्थात् एक पैर को कुश्चित मुद्रा में ( द्रष्टव्य ९।२७८ ) ऊपर की ओर उठाकर घुटने को वक्षस्थल के पास तक ले जाए तथा दूसरे पैर को उद्घट्टित मुद्रा में (द्रष्टव्य ९ ।२६६ उ० २६७ पू० ) रखे तो इसे पार्श्वक्रान्ता चारी कहते हैं । १. पुरस्तादथ पातयेत्— इस प्रथम पंक्ति के उत्तरांश में कर्ता का अभाव होने से प्रश्न उठता है कि सामने की ओर किस वस्तु को लाए? प्रो० घोष पूर्ववर्ती श्लोकों की भाँति यहाँ भी इस अंश को द्वितीय पंक्ति गत प्रयोगवशगी हस्तो से समन्वित करके यह अर्थ करते हैं कि हाथों को सामने की ओर फैलाना चाहिए । अभिववगुप्त ने इस अंश को पैर के उत्क्षेपण से सम्बन्धित माना है - "'... तयाग्रे चरणं पातयेत् । " वस्तुतः चारी का प्रयोग पैर की क्रिया से सम्बन्धित है । अतः हमारे विचार में पार्श्वक्रान्तचारी के सन्दर्भ में 'पुरस्तादथ पातयेत्' का सम्बन्ध पैर से करना अधिक उचित होगा न कि हाथ से । २. नाट्यशास्त्र के बड़ौदा वाले द्वितीय संस्करण में मूल पाठ में 'निःस्तम्भित' करण का पाठ है तथा टिप्पणी में ब प्रति में निशुम्भित, म प्रति में निस्सुम्भित तथा त प्रति में निसुम्भित पाठ प्राप्त होता है । ३. तिलके च करः - अभिनवगुप्त की व्याख्या के अनुसार हाथ को ही ललाट के ऊपर तिलक की भांति रखा जाता है- “तदेतद्द शो मध्यमाङ्गुलिरूपो, ललाटे तिलकवदिति । " श्रीघोष ने इस अंश को इस प्रकार अनूदित किया हैं कि 'हाथ को ललाट के बीच में रखा जाता है । हमारे विचारानुसार इन दोनों व्याख्याओं में कोई मूलभूत अन्तर नहीं है । तिलक का स्थान ललाट का मध्य ही है और हाथ को ललाट के मध्य में रखने पर हाथ की स्थिति तिलकवत् हो ही जायेगी । यही कारण है कि अपने अनुवाद में हमने हाथ की स्थिति ललाटवर्ती तिलक के स्थान के ऊपर बतायी है ।
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११८ नाट्यशास्त्रम् ( ६५ ) विद्युद्भ्रान्त- पैर को पीछे की ओर मोड़कर सिर के नितान्त समीप इस भाँति ले जायें कि वह सर्वथा गोलाकार हो जाए तो उसे 'विद्युद्भ्रान्त ' करण कहते हैं ॥ १२५-१२६ ॥ अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा पुरस्तात्संप्रसारयेत् ॥। १२६ ॥ प्रयोगaait हस्तावतिक्रान्ते प्रकीर्तितौ । ( ६६ ) अतिक्रान्त- अतिक्रान्तचारी के प्रयोग के अनुसार एक पैर को सामने की ओर फैला दे तथा हाथों का भी प्रयोग पैरों के ही समान करें तो उसे 'अति- क्रान्त' करण कहते हैं ॥ १२६-१२७ ॥ आक्षिप्तं हस्तपादं च त्रिकं चैव विवर्तितम् ॥ १२७ ॥
द्वितीयो रेचितो हस्तो विवर्तितकमेव तत् । ( ६७ ) विवर्तित - जब हाथ और पैर बाहर की ओर प्रसारित किए जाते हैं, त्रिक का परिवर्तन किया जाता है, एवं दूसरा हाथ रेचित होता है तो उसे 'विवर्तित' करण कहते हैं ॥ १२७-१२८ ॥ चारी का भी यही लक्षण है । इस श्लोक १. ना० शा ० १०।४० में विद्युदुद्भ्रान्त का श्रीघोष कृत अनुवाद कुछ भ्रामक सा है । उनके अनुवाद के अनुसार इस करण मण्डलाविद्ध मुद्रा प्रदर्शित की जाती है । में पैर को पीछे की ओर मोड़कर हाथों से नाट्यशास्त्र में अन्यत्र कहीं भी इसके इस मण्डलाविद्ध मुद्रा की परिभाषा अथवा उल्लेख तक से स्वयं घोष महोदय अनभिज्ञ हैं । दूसरी ओर बड़ौदा से प्रकाशित नाट्यशास्त्र के द्वितीय संस्करण में नृत्यरत मूर्तियों के जो परिशोधित चित्र दिए गये हैं तदनुसार भी पैर को बिल्कुल ऊपर की ओर उठाकर सिर तक ले जाया गया है, जिससे वह मण्डलाकार सा प्रतीत होता है, हाथों की मुद्रा तो बिल्कुल भी मण्डला- कार नहीं है । अभिनवगुप्त की मान्यता है कि इस करण के ' विद्युद्भ्रान्त' इस नामकरण के पीछे यह कारण हो सकता है कि पैर को बिजली की तेजी से झटका कर ऊपर ले जाया जाता है- 'तत्पदस्य विद्युत उद्भ्रमणाद् विद्युद्भ्रान्तम्... । २. द्वितीयो रेचितो हस्तो - यहां द्वितीय के उल्लेख से प्रथम हस्त की अन्य किसी मुद्रा में अवस्थिति भासित होती है । अभिनवगुप्त ने - "आक्षिप्त- हस्तापेक्षया द्वितीयो हस्तः " कहकर प्रथम हस्त को आक्षिप्त माना है— अर्थात् पहले जो हाथ एवं पैरों का आक्षेपण विहित किया गया था वहीं दोनों हाथों का अभिप्राय न होकर एक ही हाथ से था । दूसरा हाथ रेचित होगा । श्रीघोष ने इसके विपरीत दोनों हस्तों को रेचित माना है । ऐसा उन्होंने किस आधार पर किया है यह स्पष्ट नहीं हो पाता ।
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११ ९ कर्णेऽञ्चितः करो वामो लताहस्तश्च दक्षिणः ॥ १२८ ॥
दोलापादस्तथा चैव गजक्रीडितकं भवेत् । ( ६८ ) गजक्रीडित -बायें हाथ को अंचित मुद्रा में (बायें ) कान पर रखा जाए और दाहिना हाथ लता मुद्रा' में हो एवं पैर दोलापाद चारी में हो तो उस करण की संज्ञा 'गजक्रीडित' होती है ॥ १२८-१२९ ॥ द्रुतमुत्क्षिप्य चरणं पुरस्तादथ पातयेत् ॥। १२ ९ ॥ तलसंस्फोटितो हस्तौ तलसंस्फोटिते मतौ । ( ६ ९ ) तलस्संफोटित - एक पैर को तीव्र गति से ऊपर उठाकर सामने की ओर गिराए और दोनों हाथों से ताली बजाए तो उसे 'तलसंस्फोटित " करण माना जाता है ॥ १२ ९ -१३० ॥ पृष्ठप्रसारितः पादः लतारेचितकौ करौ ॥ १३० ॥
समुन्नतं शिरश्चैव गरुडप्लुतकं भवेत् । (७० ) गरुडप्लुतक - दोनों पैरों को पीछे की ओर प्रसारित किया जाए एवं दोनों हाथों में से एक लता मुद्रा में हो एवं दूसरा रेचित हो और वक्षःस्थल सीधा तना रहे तो वह ' गरुडप्लुतक ' करण कहलाता है ॥ १३०-१३१ ॥ १. अभिनवगुप्त के मतानुसार इन चेष्टाओं से यहाँ ९।१ ९९ प्रोक्त करिहस्त का ग्रहण होता है— 'समुन्नतो लताहस्तः पारवत्पार्श्व विलोलितः । त्रिपातकोऽपरः कर्णे करिहस्तः प्रकीर्तितः ॥ ( ९/ २०० ) २. तलसंस्फोटिती हस्तौ - श्री घोष ने तलसंस्फोटित को एक ऐसी मुद्रा माना है जो नाट्यशास्त्र में कहीं भी व्याख्यात नहीं है । आचार्य अभिनवगुप्त की व्याख्या के अनुसार दोनों पताका हाथों को एक साथ संश्लेषित करने से जो शब्द उत्पन्न हो उसे 'तलसंस्फोटित' कहते हैं । नाट्यशास्त्र ( ब०, द्वि० सं ० ) में दी गई नृत्यमूर्तियों की रेखाकृतियों को देखने से भी हाथों का परस्पर संश्लेषण सिद्ध होता है । करतलों के परस्पर आस्फालन से उत्पन्न ध्वनि को हिन्दी में सामान्यतया ताली ही कहा जाता है । यही कारण है कि 'तलसंस्फोटितो हस्तौ' इस खण्ड का अनुवाद यहाँ 'दोनों हाथों से ताली बजाना' किया गया है । ३. बड़ौदा से प्रकाशित नाट्यशास्त्र के द्वितीय संस्करण के मूल पाठ में 'पृष्ठप्रसारितो पादी' इसके स्थान पर 'पृष्ठप्रसारितः' यह पाठ मिलता है । 'पृष्ठ-प्रसारिती पादो' यह पाठ टिप्पणी में 'ठ' प्रति के नाम से दिया गया है । 'गरुड- प्लुतक ' करण के चित्र में भी एक ही पैर पीछे की ओर प्रसारित है अतः ' पृष्ठप्रसा- रितः पादः' यह पाठ संगत प्रतीत होता है ।