भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 211–220

भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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६७ विवर्तितकम् ६८ गजक्रीडितकम् ६ ९ तलसंस्फोटितम् ७० गरुडप्लुतम् ७१ गण्ड सूची ७२ परिवृत्तम्

पृष्ठ 212

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७३ पाश्र्वजान ७४ गृधावली कम् ७५ सन्नतम् ७६ सूची ७७ अर्धसूची ७८ सूचीविद्धम्

पृष्ठ 213

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७९ अपक्रान्तम् ८० मयूरललितम् ८१ सर्पितम् ८२ दण्डपादम् ८३ हरिप्लुतम् ८४ प्रेङ्खोलितम्

पृष्ठ 214

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८५ नितम्बम् ८६ स्खलितम् ८७ करिहस्तम् ८८ प्रसर्पितकम् ८९ सिंहविक्रीडितकम् ९० सिंहाकर्षितम्

पृष्ठ 215

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९ १ उद्वृत्तम् ९ २ उपसृतकम् ९ ३ तलसङ्घट्टितम् ९४ जनितम् ९ ५ अवहित्थकम् ९ ६ निवेशम्

पृष्ठ 216

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९ ७ एलकाक्रीडितम् ९८ ऊरूद्वृत्तम् ९९ मदस्खलितकम् १०० विष्णुकान्तम् १०१ सम्भ्रान्तम् १०२ विष्कम्भम्

पृष्ठ 217

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१०३ उद्घट्टितम् १०४ वृषभक्रीडितम् १०५ लोलितम् १०६ नागापसर्पितम् १०७ शकटास्यम् १०८ गङ्गावतरणम्

पृष्ठ 218

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चतुर्थोऽध्यायः १२९ देने चाहिए, सिर को परिवाहित मुद्रा में और पैरों को वलित रखते हुए आविद्ध चारी में रखना चाहिए ॥ १५ ९-१६० ॥ करौ प्रलम्बितौ कार्यों शिरव परिवाहितम् ॥ १५ ९ ॥

पादौ च वलिताविद्धौ मदस्खलितके द्विजाः ।

पुरः प्रसारितः पादः कुञ्चितो गगनोन्मुखः ॥ १६० ॥

करौ च रेचितौ यत्र विष्णुक्रान्तं तदुच्यते । ( १०० ) विष्णुक्रान्त -जब एक पैर आगे फैलाया हुआ हो और दूसरा पैर सिकोड़कर आकाश की ओर ( ऊपर ) ले जाया जाय एवं दोनों हाथों को रेचित मुद्रा में रखा जाये तो उस करण को 'विष्णुक्रान्त' कहा जाता है ॥ १६०-१६१ ॥ करमावर्तितं कृत्वा ह्य रूपृष्ठे निकुञ्चयेत् ॥ १६१ ॥

ऊरूश्चैव तथाविद्धः सम्भ्रान्तं करणं तु तत् । ( १०१ ) सम्भ्रान्त - जब हाथ को आवर्तित करते हुए ऊरू के पृष्ठ भाग पर निकुचित किया जाए तथा ऊरू आविद्धा' चारी में रहे तो उसे ' सम्भ्रान्त ' करण कहते हैं ॥ १६१-१६२ ॥ अपविद्धः करः सूच्या पादश्चैव निकुट्टितः ॥ १६२ ॥

वक्षःस्थश्च करो वामो विष्कम्भे करणे भवेत् । रहेगे और जंघाओं के ऊपर की ओर घुमाया हुआ रखा जाएगा; ऐसा जाँघ की पेशी के द्वारा ही किया जा सकता है । १. सिर को क्रमशः पावों में घुमाने की संज्ञा परिवाहन है । डा० रघुवंश की व्यख्यानुसार इस करण में घुटने को झुकाए बिना पैर फैलाया जाता है । डा० रघुवंश ने 'गमनोन्मुखी' ( जाने के लिए तत्पर ) चरण सामने की ओर प्रसारित किया जाता है — ऐसा अनुवाद दिया है । किन्तु इसमें 'कुञ्चितः' पद का अनुवाद छूट जाता है । फिर यहाँ पर गगनोन्मुखः' है ' गमनोन्मुख ' नहीं, अतएव अपने अनुवाद में हमने पैर का ऊपर ( गगन की ओर ) गमन माना है । पुनश्च सामने फैलाए पैर को ऊपर की ओर गतिचरण के कुञ्चन के अभाव में होनी सहज नहीं है । अतः हमने प्रसारित पद के कुचन के पश्चात् ही उठाए जाने की संभावना व्यक्त की है । २. आवर्तित - व्यावर्तित गति को ही यहाँ आवर्तित कहा गया है यह अभि- 'नवगुप्त के कथन से स्पष्ट है- व्यावर्तितपरिवर्तितकरणेन । अर्थात् हाथको घुमाते हुए अलपल्लव मुद्रा में उस के पृष्ठ भाग पर रखा जाता है । ३. आविद्धा - 'स्वस्तिकस्याग्रतः पादः कुञ्चितश्च प्रसारितः । निपतेदविताविद्ध आविद्धा नाम सा स्मृता ॥ ( ना० शा० १०-३८ ) ९ ना०

पृष्ठ 219

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१३० नाट्यशास्त्रम् ( १०२ ) विष्कम्भ - विष्कम्भ करण में दाहिना हाथ अपविद्ध मुद्रा में होता 'है, तथा सूची' चारी में स्थित पैर 'निकुट्टित " रहते हैं एवं बायाँ हाथ वक्षःस्थल पर स्थित होता है ॥ १६२-१६३ ॥ पादावुद्धट्टितो कार्यों तलसङ्घट्टितो करौ ॥। १६३ ॥ नतञ्च पार्श्व कर्तव्यं बुधैरुद्घट्टिते सदा । ( १०३ ) उद्घट्टित -ज्ञानी जनों को सर्वदा उद्घट्टितकरण में दोनों पैर उद्घट्टिता मुद्रा में, तथा हाथ तलसंघट्टित मुद्रा में एवं पार्श्व को नत ( झुका

हुआ) रखना चाहिए ॥। १६३-१६४ ॥

प्रयुज्यालातकं पूर्वं हस्तौ चापि हि रेचयेत् ॥ १६४ ॥

कुञ्चितावञ्चितौ चैव वृषभक्रीडिते सदा । ( १०४ ) वृषभक्रीडित — करण में पहले अलात चारी का प्रयोग करके हाथों को रेचित करना चाहिए और फिर दोनों को कुचित एवं अंचित मुद्रा में रखना चाहिए || १६४-१६५ ॥ रेचितावञ्चितौ हस्तौ लोलितं वर्तित शिरः ॥ १६५ ॥

उभयोः पार्श्वयोर्यत्र तल्लोलितमुदाहृतम् । ( १०५ ) लोलित –जब दोनों अंचित हस्त रेचित मुद्रा में हों तथा मस्तक को १ सूची - अभिनवगुप्त के मत में सूची का अर्थ सूची-मुख हस्तमुद्रा ( ९ -१ ९ २) २. निकुट्टित का अर्थ यहाँ झुकाया जाना है । नाट्यशास्त्र में प्रकाशित चित्र से भी पैरों का निकुट्टन स्पष्ट है । ३. उद्घट्टित मुद्रा- स्थित्वा पादतलाग्रेण पाणिभूमौ निपात्यते । यस्य पादस्य करणे भवेदुद्धट्टितस्तु सः ॥ ( ९ -२६५ ) अर्थात् पैर के तलवे के अग्रभाग खड़े पर होकर एड़ी से जमीन को छूने की संज्ञा उद्घट्टित है । ४. तलसंघटित —दोनों करतलों के संघट्टन से शब्द उत्पन्न करना ( ताली बजाना ) । ५. अभिनवगुप्त की व्याख्यानुसार वैष्णव -स्थानक में खड़े रह कर दाहिने रेचित हंसपक्ष हस्त को द्रुतगति से चलाते हैं व बायें अलपल्लव हस्त को वक्ष पर रखते हैं । डा० रघुवंश ने ध्यान दिलाया है कि कि गा० ओ० सी० के रेखा-चित्र में इस करण के महत्त्वपूर्ण अंग वैष्णव- स्थान का अंकन नहीं हुआ है तथा हाथ स्वस्तिक चेष्टाका है ।

पृष्ठ 220

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चतुर्थोऽध्यायः १३१ ' ' होता लोलित मुद्रा में दोनों पार्श्वो में घुमाया जाए तो उसे लोलित करण कहतेनःस्थल हैं ॥ १६५-१६६ ॥ स्वास्तिकापसृती पादौ शिरश्च परिवाहितम् ॥ १६६ ॥

रेचितौ च तथा हस्तौ स्यातां नागापसर्पिते । ( )नोंपैर १०६ नागापसर्पित- दोनों पैर स्वस्तिक स्थिति में पीछे की ओर हटाए-, ' ' झुका जाएकहा जातासिरहैपरिवाहित' ॥ १६६.१६७मुद्रा में॥हो तथा हाथ रेचित रहें तो उसे नागपसर्पित करण निषण्णाङ्गस्तु चरणं प्रसार्य तलसञ्चरम् ॥ १६७ ॥

उद्वाहितमुरः कृत्वा शकटास्यं प्रयोजयेत् । ( ) ' - करके १०७ शकटास्य शरीर को स्थिर रखते हुए यदि पैर को तलसंचर मुद्रा ( )मुद्रा में मेंतोफैलायाउसे 'शकटास्यजाए तथा' करणवक्षःस्थलकहा जाताको उद्वाहितहै ॥ १६७-१६८उठी ॥हुई स्थिति में रखा जाए ऊर्ध्वाङ्गुलितलौ पादौ त्रिपताकावधोमुखौ ॥ १६८ ॥

क को हस्तौ शिरस्तन्नतं च गङ्गावतरणं त्विति । ( १०८ ) गंगावतरण -यदि दोनों पैरों के तलवे और अंगुलियाँ ऊपर की ओर ),१ ९ २ उठी दशा में रखे जाएं त्रिपताका मुद्रा में स्थित दोनों हाथों की हथेलियाँ अधोमुख ' ' ' ' ' शित होएवं सिर सन्नत मुद्रा में हो तो उसे गंगावतरण कहा जाता है ॥ १६८-१६९॥ ( निम्न चार श्लोक कुछ प्रतियों में नहीं है और अभिनव ने व्याख्या भी नहीं की है अतः श्री घोष ने इसका अनुवाद नहीं किया । ) १. अभिनवगुप्त की दृष्टि से इस करण का नाम नागापसर्पित इस कारण है कि की इसमें कुटिल गति होती है हाथ सिर को क्रमशः पार्श्व में घुमाया जाता है- परिवाहितं पर्यायशः पार्श्वगतं कुटिलगतियोगान्नागापसतिम् । करना २. शकटास्य चारी- प्रसार्य तलसंचरम् ।-चित निषण्णाङ्गस्तु चरणं शकटास्यां प्रयोजयेत् ॥ ( १०-१६ ) पर उद्वाहितमुरः कृत्वा अर्थात् पैरों को तलसंचर रूपेण आगे फैलाया जाता है एवं वक्ष उद्वाहित ( ) इस उठा हुआ रहता है । का तात्पर्य यह हो सकता है कि कमर बिल्कुल स्तक ३. सिर को सन्नत रखने मुड़ जाए ।